सोमवार, 6 जुलाई 2015

‘पिछली सीट से वाहन पर नियंत्रण का प्रयास’


गाड़ी जब सड़क पर फर्राटा भर रही हो तो उस पर नियंत्रण रखने व उसकी दशा-दिशा का निर्धारण करने की जिम्मेवारी हमेशा उस चालक की होती है जो ड्रायविंग सीट पर बैठकर स्टेयरिंग संभाल रहा हो। किसी दुर्घटना की हालत में भी आम तौर पर पिछली सीट पर बैठी सवारी को कभी जिम्मेवार नहीं माना जाता बल्कि कसूरवार हमेशा ड्रायविंग सीट पर बैठे चालक को ही ठहराया जाता है। यानि ड्रायविंग सीट पर बैठकर स्टेयरिंग संभाल रहे वाहन चालक से ही यह अपेक्षा की जाती है कि वह गाड़ी की गति व दिशा पर नियंत्रण रखते हुए सवारियों को सही समय पर उनकी मंजिल तक पहुंचा देगा। इन्हीं अपेक्षाओं के साथ चालक को यह सहूलियत भी दी जाती है कि वह मनचाही गति व सही रास्ते से गाड़ी को गुजारते हुए तयशुदा मंजिल का सफर तय करे। इस मामले में सवारियों को जरा भी चूं-चपड़ करने की इजाजत नहीं दी जाती। यहां तक कि सार्वजनिक परिवहन की गाडि़यों में स्पष्ट तौर पर यह लिखा भी होता है कि गाड़ी चला रहे वाहन चालक से कोई बातचीत ना की जाये। खैर, यह तो बात हुई सड़क पर यातायात के सामान्य नियम, कायदों व परंपराओं की। लेकिन सत्ता की मंजिल की ओर जानेवाली सियासत की सड़क पर फर्राटा भरनेवाली राजनीतिक दलों की गाड़ी की स्टेयरिंग जिस राष्ट्रीय अध्यक्ष व उसकी टोली के हाथों में सौंपी जाती है उसे अपने मनमुताबिक गति व दिशा से गाड़ी को गुजारने की सहूलियत शायद ही कभी मिल पाती हो। तभी तो छहदलीय जनता परिवार का विलय कराके उसकी कमान खुद अपने हाथों में लेने की सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव की इस पहलकदमी में सबसे मजबूत फच्चर पार्टी व परिवार की ओर से ही फंसाये जाने की खबरें आ रही हैं। इसी प्रयास में राजद सुप्रीमो लालू यादव और जदयू के शीर्ष संचालकद्वय शरद यादव व नीतीश कुमार सहित जदएस सुप्रीमो एचडी देवेगौड़ा व इनेलो के अभय चैटाला को भी सांगठनिक स्तर झेलनी पड़ रही भारी फजीहत की हकीकत भी किसी से छिपी नहीं है। यानि सच तो यही है कि पार्टी रूपी गाड़ी की सवारियों को सुहाने सफर का आनंद दिलाने की जिम्मेवारी सीधे तौर पर संगठन की स्टेयरिंग संभालनेवाले चालक यानि अध्यक्ष की ही होती है लेकिन तमाम सवारियों की चिल्ल-पों भी अक्सर उसे ही झेलनी पड़ती है। उस पर तुर्रा ये कि सफल व सुहाने सफर का श्रेय झपटने में तो पार्टी के तमाम शुभचिंतक, सहयोगी व समर्थक भी सबसे आगे नजर आते हैं लेकिन किसी दुर्घटना या दिक्कत का पूरा ठीकरा चालक के सिर पर ही फोड़ा जाता है। तभी तो सियासत में सबसे बेहतर माना जाता है पिछली सीट पर बैठकर ड्रायवर को अपने नियंत्रण में रखते हुए गाड़ी की गति व दशा-दिशा के निर्धारण पर पूर्ण नियंत्रण कायम करने का प्रयास करना। इस प्रयास में जिसे जितनी अधिक सफलता मिलती है उसकी उतनी ही अधिक वाहवाही। सारी सफलता उसके खाते में और विफलता का ठीकरा ड्रायवर के सिर-माथे। पिछली सीट पर रहकर सियासी वाहन पर नियंत्रण कायम करने के इसी लाभ की बात समझ जाने के बाद अब ना तो कांग्रेस में राहुल गांधी का खेमा उनको आगे आकर स्टेयरिंग संभालने के लिये विवश करता दिख रहा है और ना ही भाजपा की स्टेयरिंग मनचाहे हाथों में थमाने की दिशा में आरएसएस में कोई चिंतन मंथन चल रहा है। वैसे भी जब आरएसएस ने खुले तौर पर पिछली सीट से गाड़ी का संचालन शुरू कर दिया है और पार्टी की कार्यकारिणी से लेकर केन्द्रीय विभागों के कामकाज का एजेंडा भी कथित तौर पर वही निर्धारित व नियंत्रित कर रहा है तो कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति पर नियंत्रण कायम करने के राहुल के मौजूदा प्रयासों को कोई कैसे गलत कह सकता है। लंबी छुट्टी से लौटने के बाद नये अवतार में दिख रहे राहुल ने तो पिछली सीट पर रहकर इस कदर पार्टी की गाड़ी पर नियंत्रण कर लिया है कि ड्रायविंग सीट पर बैठी सोनिया गांधी की पूरी स्थापित टीम अब हाशिये पर सिमटती दिखने लगी है। राहुल ने दिल्ली प्रदेश के नेताओं के साथ मिल बैठकर रणनीति बनाने की शुरूआत की तो उसमें सोनिया द्वारा सूबे में शीर्ष पद पर स्थापित की गयी शीला दीक्षित का पूरा खेमा हाशिये की भेंट चढ़ा दिखा। पंजाब में राहुल की पदयात्रा हुई तो वहां के पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के पूरे खेमे को उतनी ही औकात मिली जितनी दिल्ली में शीला कैंप को। अब महाराष्ट्र में राहुल ने पार्टी की जमीन मजबूत करने की दिशा में कदम बढ़ाया तो वहां भी पूर्व स्थापित चेहरों को पूरी तरह किनारे लगा दिया गया। राष्ट्रीय स्तर पर भी सोनिया के शीर्ष सियासी सलाहकारों व सहयोगियों को संगठन में टके का भाव भी नहीं मिल रहा है। पार्टी में हर स्तर पर राहुल खेमे की युवा ब्रिगेड का ही बोलबाला है। ऐसे में जब संगठन की गाड़ी पर राहुल का नियंत्रण कायम हो ही गया है तो इससे क्या फर्क पड़ता है कि वे किस कुर्सी पर बैठे हैं। बहरहाल ड्रायवर को नियंत्रण में लेकर पिछली सीट से ही गाड़ी का संचालन करने की सियासी रणनीति सतही तौर पर तो बेहद कारगर व फायदेमंद नजर आती है लेकिन ड्रायवर को मुखौटे के तौर पर इस्तेमाल करते हुए पिछली सीट से गाड़ी की गति व दशा-दिशा पर पूर्ण नियंत्रण कायम करने की कोशिश गाड़ी व ड्रायवर की विश्वसनीयता पर नकारात्मक असर भी डाल सकती है।

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