कहने को भले ही अगली लोकसभा का गठन होने में दस महीने का वक्त बाकी हो लेकिन तमाम राजनीतिक दलों ने अभी से चुनावी बिसात पर अपनी गोटियां जमाने का काम युद्धस्तर पर आरंभ कर दिया है। जाहिर है कि कांग्रेस भी इसमें पीछे रहने का जोखिम नहीं उठा सकती है। लेकिन मसला है कि अब तक अमल में लायी जा रही रणनीतियां व कूटनीतियां जिस तरह से विफल होती दिख रही हैं उसके बाद अब नए सिरे से परिस्थितियों को अपने मन मुताबिक ढ़ालना और मोदी सरकार के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर एक मजबूत विकल्प प्रस्तुत करना बेहद मुश्किल हो गया है। आलम यह है कि अव्वल तो अपने दम पर चुनावी भवसागर में उतरने पर डूबने का खतरा स्पष्ट दिख रहा है और दूसरे जिन छोटे-बड़े दलों को समेट-गूंथ कर संप्रग की नैया के निर्माण की योजना बनाई गई थी वह योजना भी परवान नहीं चढ़ पा रही है। ऐसे में अब अंतिम उपाय के तौर पर नैया के खिवैया का पद रिक्त रखने के अलावा कोई दूसरा विकल्प ही नहीं बचा है ताकि पद प्राप्ति के लोभ में सभी संगी-साथी मजबूती से आपस में जुड़े रहें और भाजपा के अन्य विरोधियों को भी यही लोभ-मोह दिखाकर संप्रग के साए तले एकत्र होने के लिये सहमत किया जा सके। इसी रणनीति के तहत कांग्रेस ने तय किया है कि वह प्रधानमंत्री पद के लिये अपनी दावेदारी की जिद पर नहीं अड़ेगी बल्कि नेतृत्व के मसले पर अब आमसहमति से ही अंतिम फैसला किया जाएगा। हालांकि सच तो यही है कि कांग्रेस ने बड़े दिल या बड़प्पन का प्रदर्शन करते हुए कांग्रेस ने यह फैसला नहीं किया है। बल्कि यह काफी हद तक ऐसा ही त्याग है जैसा वर्ष 2004 में सोनिया गांधी ने संप्रग को बहुमत मिलने के बाद प्रधानमंत्री पद का परित्याग करके किया था। उस वक्त प्रधानमंत्री का पद ग्रहण करने से परहेज बरतना सोनिया की मजबूरी थी और मौजूदा वक्त में प्रधानमंत्री पद पर अपनी दावेदारी छोड़ना कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की विवशता है। तब स्वीकार्यता आड़े आयी थी और अब संप्रग के पुनर्गठन की चुनौती है। वर्ना राहुल के नेतृत्व को गैर-भाजपाई विपक्ष के अधिकांश दला़ें ने काफी हद तक नकार दिया है। राहुल का चेहरा आगे करके चुनाव लड़ने की कांग्रेस की जिद के कारण ही अब तक संप्रग के एकीकरण की राह तैयार नहीं हो पाई है। इसी जिद के कारण विपक्षी खेमे के अधिकांश ऐसे दलों ने कांग्रेस से दूरी बढ़ानी शुरू कर दी जो वर्ष 2004-2014 के दौरान लगातार कांग्रेसनीत संप्रग सरकार के साझीदार व समर्थक रहे थे और आज भी भाजपा के साथ उनका कोई तालमेल नहीं है। लेकिन संप्रग की नैया का राहुल को खिवैया बनाने की कांग्रेस की जिद ने गठजोड़ के पुराने घटक व समर्थक दलों के आपसी तालमेल व परस्पर विश्वास को अंदरूनी तौर पर इतना कमजोर कर दिया कि लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पर पूरे दिन चली चर्चा के बाद देर रात हुए मतदान के दौरान कांग्रेस से अलग दिखने की कोशिशों के तहत ही शरद पवार की राकांपा और चंद्रशेखर राव की टीआरएस ने मतदान की प्रक्रिया में शिरकत करने से ही परहेज बरत लिया। दरअसल कांग्रेस के हाथों में समूचे विपक्ष का नेतृत्व सौंपने को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर सहमति का माहौल बनता नहीं दिख रहा है। महाराष्ट्र की एनसीपी, तमिलनाडु की अन्ना द्रमुक, ओडिशा की बीजद, तेलंगाना की टीआरएस और आंध्र प्रदेश की टीडीपी सरीखी स्थानीय स्तर पर बेहद ताकतवर समझी जानेवाली उन पार्टियों को अपने साथ जोड़कर राष्ट्रव्यापी महा-गठजोड़ बनाना भी कांग्रेस के लिये बड़ी चुनौती बन गयी है जो किसी भी सूरत में भाजपानीत राजग के साथ चुनावपूर्व गठजोड़ कायम नहीं कर सकते। यहां तक कि उत्तर प्रदेश और बिहार में महा-गठजोड़ का प्रयोग पूरी तरह सफल रहने के बावजूद एक ओर बसपा सुप्रीमो मायावती ने ऐलान कर दिया है कि सम्मानजनक संख्या में सीटें मिलने पर ही वे साझेदारी में चुनाव लड़ने का प्रस्ताव स्वीकार करेंगी और दूसरी ओर बिहार में राजद के शीर्ष संचालक कहे जानेवाले तेजस्वी यादव ने भी बता दिया है कि विपक्ष में प्रधानमंत्री पद के लिये राहुल के अलावा और भी चेहरे उपलब्ध हैं जिनकी अनदेखी नहीं की जा सकती। इसके अलावा कर्नाटक में भी कुमारस्वामी द्वारा सार्वजनिक तौर पर आंसू बहाये जाने, गठबंधन की सरकार चलाने में पेश आ रही परेशानियों की तुलना जहर के घूंट से किये जाने और एचडी देवेगौड़ा द्वारा चुनाव पूर्व गठजोड़ को अव्यावहारिक बताये जाने के बाद यह संभावना बेहद कम दिख रही है कि वहां संप्रग की सरकार होने के बावजूद लोकसभा चुनाव में भाजपा के खिलाफ कोई मजबूत महा-गठजोड़ आकार ले पाएगा। यानि कांग्रेस को अब मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, गुजरात व पंजाब सरीखे उस सूबों में अपने बलबूते पर ही कोई करिश्मा कर दिखाना होगा जहां उसकी भाजपा से सीधी टक्कर होने वाली है और तीसरी ताकत के लिये कोई जगह ही नहीं है। ऐसे में देश की मौजूदा सियासी तस्वीर को समग्रता में समझने की कोशिश करें तो अगले चुनाव में विपक्षी महा-गठजोड़ बनाकर गैर-भाजपाई वोटों का राष्ट्रीय स्तर पर बिखराव रोकने की तमाम कोशिशें नाकाम होती दिख रही हैं। ऐसी सूरत में होगा यह कि जिन सीटों पर भाजपा का मुकाबला किसी गैर-कांग्रेसी दल से होगा वहां ना चाहते हुए भी कांग्रेस ही भाजपा को लाभ पहुंचाएगी क्योंकि ऐसी सीटों पर गैर-भाजपाई वोटों में कांग्रेस के कारण ही बिखराव होगा। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @नवकांत ठाकुर
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गुरुवार, 26 जुलाई 2018
सोमवार, 23 जुलाई 2018
‘नुक्स है कुछ मेरे बयान में क्या...???’
अमरोहा में जन्मे उर्दू के महान शायर जाॅन एलिया भले ही हिन्दुस्तान के बंटवारे के बाद पाकिस्तान में रह-बस गए लेकिन उनकी कलम से एक ऐसी गजल निकली जो पूरी तरह कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के दिल की आवाज बनने के काबिल है। जाॅन लिखते हैं कि- ‘‘उम्र गुजरेगी इम्तहान में क्या? अब भी हूं मै तेरी अमान में क्या? मेरी हर बात बेअसर ही रही, नुक्स है कुछ मेरे बयान में क्या? मुझको तो कोई टोकता भी नहीं, यही होता है खानदान मे क्या? बोलते क्यो नहीं मेरे अपने, आबले पड़ गये जबान में क्या?’’ राहुल वाकई बीते लंबे समय से इसी मसले से जूझ रहे हैं। वर्ना ऐसा कैसे हो सकता कि कोई जान-बूझकर ऐसी बातें और हरकतें करे जिससे उसकी किरकिरी हो, फजीहत हो। लिहाजा लग यही रहा है कि अव्वल तो राहुल को यह पता नहीं चल रहा कि उनसे क्या गलती हो रही है और दूसरे जिन लोगों पर फीडबैक पहुंचाने और सही सलाह देने की जिम्मेवारी है वे अपने कर्तव्य को इमानदारी से अंजाम नहीं दे रहे हैं। नतीजन उनकी जायज व वाजिब बातें भी उनकी हरकतों व गलतियों के बोझ तले दम तोड़ रही हैं। ऐसी ही तस्वीर दिखी लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान भी। यूं तो राहुल ने कितना सच बोला और किस हद तक झूठ का सहारा लिया इस पर अलग से बहस हो सकती है। लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती कि उनका भाषण काफी नपा-तुला, ओजस्वी, आक्रामक और धारदार था। अपने संबोधन को भावनात्मक रूप देते हुए युवाओं, महिलाओं, दलितों व अल्पसंख्यकों को संदेश देने में भी वे सफल रहे। मोदी सरकार की रीति-नीति पर प्रहार करते हुए यह साबित करने की कोशिश भी कामयाब रही कि किस तरह सरकार चुनिंदा उद्योगपतियों को भरपूर लाभ पहुंचाने के लिये आम लोगों की जेब से पैसा निचोड़ रही है। यानि कुल मिलाकर उनका भाषण ठीक वैसा ही था जिसकी मुख्य विपक्षी दल के शीर्ष नेता से अपेक्षा रहती है। लेकिन पूरा गुड़ गोबर हो गया उनकी हरकतों से। उन्होंने कुछ ऐसी हरकतें कर दीं जिसे कतई मर्यादित, संसदीय, अपेक्षित या अनुकरणीय नहीं कह सकते। तभी उनका भाषण हाशिये पर रह गया और हरकतों के कारण उनकी जमकर आलोचना हो रही है। पहली गलती यह हुई कि जब उन्होंने राफेल विमान सौदे को लेकर रक्षामंत्री निर्मला सीतारमण पर गलतबयानी का आरोप लगाया तब अपनी सफाई देने के लिये तुरंत निर्मला खड़ी हुईं लेकिन राहुल ने उन्हें बोलने का मौका ना देते हुए अपना भाषण लगातार जारी रखा। जबकि परंपरा है कि अगर संसद में कोई मंत्री कुछ कहने के लिये खड़ा होता है तो उस समय बोल रहा सदस्य तत्काल चुप होकर बैठ जाता है। लेकिन राहुल ने ऐसा नहीं किया। हालांकि इसके लिये लोकसभा अध्यक्षा ने राहुल को सभ्य भाषा में मर्यादा और परंपरा की याद भी दिलाई लेकिन राहुल की कानों पर जूं तक नहीं रेंगी। इसके बाद दूसरी गलती उन्होंने अकाली दल की सांसद व केन्द्रीय मंत्री हरसिमरत कौर बादल के बारे यह कहके कर दी कि भाषण में व्यवधान के दौरान जब सदन की कार्रवाई कुछ मिनटों के लिये स्थगित हुई तब वे उनकी ओर मुस्कुराते हुए देख रही थीं। जाहिर है कि किसी महिला के लिये ऐसी बात कहना हर लिहाज से बेहद गलत व अमर्यादित आचरण ही कहा जाएगा। तभी बिफरते हुए हरसिमरत ने उनसे पूछ लिया कि आज वे कौन सा नशा करके आए हैं? इसके बाद सबसे बड़ी गलती राहुल ने प्रधानमंत्री मोदी के गले लगने के बहाने उनके गले पड़कर की। गले लगना तो तब कहेंगे जब दो लोग एक साथ गले मिलने के लिये अपनी बांहें फैलाएं। लेकिन जब किसी बैठे हुए आदमी के पास जाकर कोई अचानक उसके गले में बांहों का फंदा डालकर उससे चिपट जाए तो इसे गले पड़ना कहा जाएगा। वैसे भी संसद के भीतर इस तरह के आचरण को कतई सामान्य, शिष्ट या संसदीय नहीं माना जा सकता। तभी इसके लिये लोकसभा अध्यक्षा की ओर कड़ी बात भी कही गई और हरसिमरत को भी यह कहने का मौका मिल गया कि यह मुन्नाभाई का मंच नहीं है जहां पप्पी-झप्पी डाली जाए। राहुल की इस हरकत को राजनाथ सिंह ने भी चिपको आंदोलन का नाम देकर चुटकी लेने में कसर नहीं छोड़ी। लेकिन सबसे आखिर में राहुल ने बेहद ही बचकाने तरीके से आंख मारकर यह जताने की जो कोशिश की कि मानो ऐसी हरकतें करके उन्होंने कोई बड़ा मैदान मार लिया हो वह सबसे अफसोसनाक था। इसका सीधा सा मतलब है कि उन्हें अपनी हरकतों का कोई अफसोस नहीं है और वे कतई यह नहीं मान सकते हैं कि उनसे कोई गलती हुई है। हालांकि लोकसभा अध्यक्षा ने बाद में राहुल को अपने बेटे जैसा बताते हुए उनकी गलतियों को बचपना समझ कर अनदेखा करने की पहल अवश्य की लेकिन यह बचपना था, मासूमियत थी, सरासर बदमाशी या आत्ममुग्धता की निशानी? आत्ममुग्धता इसलिये क्योंकि तमाम गलतियों के बाद राहुल की जुबान से साॅरी का एक छोटा सा औपचारिक अल्फाज भी नहीं निकला। बल्कि वे अपनी हरकतों पर अभीभूत होकर अपने पक्ष के सांसदों की ओर देखकर आंख मारते नजर आए। इस पूरे प्रकरण से हुआ यह है कि विरोधियों द्वारा उनकी पप्पू की जो छवि बनायी जाती रही है उसे इन्होंने खुद ही पूरी मजबूती से स्वीकार व अंगीकार कर लिया है जिसके लिये सिर्फ अफसोस ही जताया जा सकता है। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर #Navkant_Thakur
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गुरुवार, 5 अप्रैल 2018
‘सतह पर आने के बाद जड़ों की तलाश’
जिस दरख्त को वक्त की आंधी ने अर्श से फर्श पर पटक दिया हो उसके पास दो ही विकल्प बचते हैं। या तो वह दोबारा हिम्मत, ऊर्जा और जोश को एकत्र कर दोबारा खड़े होने के लिए कमर कसे या फिर जड़ों को कमजोर करनेवाली कमियां, खामियां और बीमारियां दुरूस्त करे ताकि मजबूत जड़ों के सहारे आसमान छूने के सफर की मजबूत शुरूआत की जा सके। इस लिहाज से देखें तो भारतीय राजनीति में कांग्रेस को इतना बुरा वक्त पहले कभी नहीं देखना पड़ा जैसा मौजूदा दौर में भुगतना पड़ रहा है। दशकों तक पूरे देश की पंचायतों, स्थानीय निकायों व प्रदेशों से लेकर पार्लियामेंट तक में जिस कांग्रेस की तूती बोलती थी उसकी अधोगति का आलम यह है कि इस समय उसकी झोली में सिर्फ तीन राज्य (पंजाब, कर्नाटक व मिजोरम) और एक केन्द्र शासित प्रदेश पुदुचेरी ही शेष है। प्रादेशिक स्तर पर गौर करें तो देश के सबसे ताकतवर सियासी सूबे उत्तर प्रदेश की विधानसभा में कांग्रेस के पास इतने विधायक भी नहीं हैं कि एक अदद राज्यसभा की सीट पर पार्टी अपना कब्जा जमा सके। पंजाब को छोड़ दें तो पूरे उत्तर व मध्य भारत में कांग्रेस का सफाया हो चुका है और दक्षिण में भी उसकी हालत महज उपस्थिति दर्ज कराने भर की ही बची है जबकि मिजोरम पर शासन के नाते नाम भर को पूर्वोत्तर में कांग्रेस का एक पांव जमा हुआ है। अलबत्ता देश के पश्चिमी सूबों में सत्ता से बेदखल होने के बावजूद मजबूत विपक्ष के नाते पार्टी ने गिनाने भर को अपनी मजबूत पकड़ अवश्य बरकरार रखी हुई है। यानि समग्रता में देखें तो पार्टी ऐसी स्थिति में पहुंच चुकी है जहां से अगर वह नहीं संभल पायी तो कांग्रेस का नाम सिर्फ किताबों में ही सिमट कर रह जाएगा। यही वजह है कि कर्नाटक के चुनाव को लेकर कांग्रेस भी जान और मान रही है कि यह उसके अस्तित्व की लड़ाई है। लेकिन कहते हैं कि राजनीति असीमित संभावनाओं को संभव कर दिखाने का ऐसा खेल है जिसमें किसी भी संभावना को किसी भी वक्त कतई खारिज नहीं किया जा सकता है। इसी आस और उम्मीद से कांग्रेस ने भी एक नयी शुरूआत करके अगले साल होने जा रहे लोकसभा चुनाव के महासंग्राम में एक बार फिर विजय पताका लहराने के लिए कमर कसना शुरू कर दिया है। हालांकि पार्टी की जो मौजूदा दुर्दशा दिख रही है काफी हद तक वैसे ही जनविरोध का सामना इसे तब भी करना पड़ा था जब आपातकाल के बाद के दौर में इंदिरा गांधी की अगुवाई वाले पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व को मतदाताओं ने खारिज कर दिया था। लेकिन उस दौर में प्रादेशिक स्तर पर मौजूद विश्वसनीयता व मजबूती की बदौलत कांग्रेस अपने बुरे वक्त से बहुत ही जल्दी उबर गई थी। लेकिन इस बार जो बुरा वक्त आया उसमें पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व को संभलने के लिए प्रदेशिक स्तर से भी सहायता नहीं मिल पाई और केन्द्र में पार्टी के हाथों से सत्ता फिसलने के बाद जमीनी स्तर पर पर भी पार्टी की कमर टूट गई। लेकिन अब इतिहास से सीख लेते हुए कांग्रेस ने राष्ट्रीय स्तर पर मजबूती से खड़े होने के लिए प्रादेशिक समीकरणों को साधने को प्राथमिकता देने की राह पकड़ी है। दरअसल प्रादेशिक स्तर पर पार्टी के बिखरने की सबसे बड़ी वजह अंदरूनी गुटबाजी और चरण-वंदन की परंपरा रही जिसके कारण नए नेतृत्व को उभरने का मौका नहीं मिल सका और पुराने नेतृत्व की खो चुकी धार व फीकी पड़ चुकी चमक का खामियाजा संगठन को शिकस्त के रूप में भुगतना पड़ा। ऐसा ही राजस्थान में भी हुआ और मध्य प्रदेश में भी। छत्तीसगढ़, हिमाचल, उत्तराखंड और महाराष्ट्र से लेकर कर्नाटक तक में पार्टी की पतली हालत की वजह कमोबेश एक जैसी ही रही। लेकिन राहुल गांधी द्वारा प्रादेशिक स्तर पर संगठन की समस्यों को सुलझाने और विभिन्न गुटों का तुष्टीकरण करने बजाय सबको किसी एक का नेतृत्व स्वीकारने के लिए मनाने-समझाने का ही नतीजा रहा कि पंजाब में पार्टी को अपने दम पर पूर्ण बहुमत हासिल करने में सफलता मिल सकी और गुजरात में भी भाजपा को सौ सीटों के भीतर सिमटने के लिए विवश होना पड़ा। गुजरात और पंजाब में कामयाबी के बाद अब अन्य प्रदेशों में भी पार्टी को इसी तरीके से दोबारा अपने पांव पर खड़ा करने की कोशिश शुरू हो गई है। इसी रणनीति के तहत कांग्रेस ने संगठन महामंत्री के पद पर जनार्दन द्विवेदी के स्थान पर अशोक गहलोत की नियुक्ति की है ताकि केन्द्रीय संगठन को प्रादेशिक भावना के अनुरूप गढ़ा जाए और प्रदेश इकाई के मतभेदों को दूर करके एक सशक्त, मजबूत, भरोसेमंद और युवा स्थानीय चेहरे को सर्वसम्मति से आगे बढ़ाने की राह आसान हो सके। यही फार्मूला जल्दी ही उत्तर प्रदेश में भी आजमाया जाएगा और मध्य प्रदेश में भी। दरअसल बीते दिनों दिल्ली में हुए कांग्रेस महाधिवेशन में मुख्य मंच को पूरे वक्त खाली रखकर केन्द्रीय नेतृत्व को भी प्रादेशिक नेतृत्व के साथ पंक्तिबद्ध करके बिठाकर स्पष्ट संकेत दे दिया गया है कि पार्टी दिल्ली के दिशा-निर्देशों से संचालित नहीं होगी बल्कि जमीन से उठनेवाली हवा ही पार्टी की दशा-दिशा और रीति-नीति तय करेगी। ऐसे में स्वाभाविक है कि जब केन्द्र में प्रदेश की भावना का ध्यान रखा जाएगा तो स्वाभाविक तौर पर प्रदेश से पार्टी के लिए शुभ समाचार ही समाने आएगा और सत्ता का सूखा समाप्त होने की संभावना बनते देर नहीं लगेगी। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @नवकांत ठाकुर #Navkant_Thakur
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सोमवार, 23 अक्टूबर 2017
‘तेरा जाना... दिल के अरमानों का लुट जाना’
‘तेरा जाना... दिल के अरमानों का लुट जाना’
राहुल गांधी को औपचारिक तौर पर कांग्रेस की कमान सौंपे जाने की अब महज औपचारिकता ही बाकी रह गई है। पार्टी अध्यक्षा सोनिया गांधी ने भी कह दिया है कि इस औपचारिकता को यथाशीघ्र पूरा करने में अब अधिक विलंब नहीं किया जाएगा। यानि प्रतीक्षा है तो सिर्फ शुभ मुहूर्त और लग्न की। लेकिन मसला सिर्फ लग्न-मुहूर्त का होता तो गुरूदासपुर लोकसभा सीट के लिए हुए उपचुनाव के नतीजों के तत्काल बाद ही इस काम को अंजाम दे दिया गया होता। या फिर नांदेड़ के स्थानीय निकायों का नतीजा भी इस काम को अंजाम देने के लिए पर्याप्त था। लेकिन सवाल तो उस छुट्टी का है जो राहुल कब, किस लिए, कैसे और किससे मांगते हैं, यह किसी को नहीं पता। पता इतना ही चलता है कि राहुल भैया फिर चले गए छुट्टी पर। कई बार बता कर जाते हैं और कई बार बिना बताए। मगर जाते जरूर हैं। और जाने के क्रम में वे यह भी नहीं देखते हैं कि उनका जाना कांग्रेस और कांग्रेसियों के लिए कितना नुकसानदेह या फायदेमंद होगा। उनको जाना होता है और वे चल देते हैं। अपने जाने के लिए वे अक्सर जिस वक्त व माहौल को चुनते हैं उसके मद्देनजर हर कांग्रेसी के दिल से यही आवाज निकलती होगी जोे अनाड़ी फिल्म के लिए शैलेन्द्र साहब ने लिखा था कि, ‘तेरा जाना... दिल के अरमानों का लुट जाना, कोई देखे... बन के तकदीरों का मिट जाना।’ वाकई, बनने की राह पर अग्रसर होने के बाद तकदीर की रेखाएं अचानक कैसे मिट जाती हैं और दिल के अरमान कैसे लुट जाते हैं, इसके सच्चे भुक्तभोगी असल में कांग्रेसी कुनबे से प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर जुड़े लोग ही हैं। हर कांग्रेसी का दिल ही जानता है कि राहुल के अचानक छुट्टी पर चले जाने का नतीजा उनके लिए कितना नकारात्मक होता है। हालांकि परिस्थितियां जब अनुकूल थीं और विभिन्न सूबों से लेकर केन्द्र तक में कांग्रेस की सरकार थी तब उनके रहने या जाने पर ना तो किसी की खास नजर जाती थी और ना ही उससे पार्टी की सेहत पर कोई प्रभाव पड़ता था। लेकिन वर्ष 2014 में राष्ट्रीय राजनीति में पार्टी का सूपड़ा साफ होने के बाद तमाम कांग्रेसियों की अपेक्षाएं व उम्मीदें राहुल पर आकर टिक गईं। सबको उनसे किसी करिश्मे की उम्मीद थी। लेकिन राहुल तो ठहरे राहुल... उनको क्या फर्क पड़ता है कि कौन उनसे क्या चाहता है और कौन उनके बारे में क्या सोचता है। उनको तो अपने मन की करनी थी, सो वे करते रहे। इसमें सबसे दिलचस्प बात यह है कि राजनीति की मुख्य धारा में शामिल होते हुए भी अमूमन राहुल काफी हद तक सार्वजनिक जीवन के प्रति निश्चेष्ट व उदासीन ही रहते हैं। लेकिन जब उनको छुट्टी पर जाना होता है उससे कुछ दिन पहले से वे काफी सक्रिय हो जाते हैं। ऐसा लगता है मानो स्कूल का बच्चा अपनी छुट्टी का होमवर्क पूरा कर रहा हो। ताकि छुट्टी के दौरान पढ़ाई का झंझट ही ना रहे। तभी तो छुट्टी पर जाने से ठीक पहले उन्होंने मोदी सरकार को संसद से सड़क तक घेरते हुए भूमि अधिग्रहण कानून के मसले पर जमीन-आसमान एक कर दिया। ऐसा दबाव बनाया कि सरकार को प्रस्तावित कानून वापस लेने के लिए मजबूर होना पड़ा। लेकिन इस आंदोलन की शुरूआत करके राहुल कहां नदारद हो गए यह किसी को पता नहीं चला। पता सिर्फ इतना चला कि वे छुट्टी मनाने चले गए हैं। नतीजन इस पूरे आंदोलन का श्रेय व राजनीतिक लाभ कांग्रेस को मिलते-मिलते रह गया और बनती हुई तकदीर की रेखाएं अचानक मिट गईं। इसी प्रकार यूपी में खाट सभा करते-करते ही वे किधर खिसक लिए और कांग्रेस को सपा की सायकिल के कैरियर पर बिठाकर कहां निकल लिए यह किसी को पता नहीं चला। साथ ही बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान महागठबंधन के गठन में निर्णायक मध्यस्थ की भूमिका निभाने के बाद पूरे चुनाव में राहुल कहीं नहीं दिखे। माना जाता है कि काम कितना ही जरूरी क्यों ना हो लेकिन राहुल के लिए अपनी छुट्टी से जरूरी कोई काम नहीं होता। नतीजन उनके धुर विरोधी उन्हें ‘पार्ट टाईम पाॅलिटीशियन’ कहकर उनका मजाक बनाते रहते हैं और सोशल मीडिया पर भी ‘आ गए राहुल, छा गए राहुल’ का नारा अक्सर बुलंद होता रहता है। अभी गुजरात चुनाव में कांग्रेस को चमकाने और दक्षिणी सूबों में पार्टी का विस्तार करने की पुरजोर कोशिशों में जुटे राहुल का इस सप्ताह सदेह दर्शन नहीं होना भी सोशल मीडिया में खूब चर्चित हो रहा है। लोग चटखारे लेने लगे हैं कि राहुल फिर छुट्टियां मनाने चले गए हैं। हालांकि सोशल मीडिया के माध्यम से वे लगातार सक्रिय हैं और खबरों में बने हुए हैं। लेकिन उनकी वास्तविक उपस्थिति आखिरी बार पिछले सप्ताह प्रणब मुखर्जी के पुस्तक विमोचन में ही दर्ज हो सकी। लिहाजा राहुल के कद का नेता अगर अचानक कहीं ना दिखे तो उनके बारे में कयासों व अटकलों का दौर शुरू होना स्वाभाविक ही है। वह भी तब जबकि उनकी छुट्टियों का इतिहास की ऐसा रहा हो कि किसी मामले को उफान पर लाकर खुद कपूर की तरह रंगमंच से काफूर हो जाएं। खैर, राहुल की छुट्टियों को लेकर जितने मुंह उतनी बातें तो हमेशा से होती रही हैं और आगे भी होती रहेंगी। लेकिन यह राहुल को ही तय करना होगा कि अपने मजे के लिए वे कांग्रेस और कांग्रेसियों को कब तक सजा दिलाते रहेंगे। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर #NavkantThakur
शुक्रवार, 10 जून 2016
‘बिनु भय स्वार्थ नहिं प्रीति की रीति’
सरपट भगदड़ की होड़
गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस में लिखा है कि ‘सुर नर मुनि सब कै यह रीती, स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती।’ साथ ही उन्होंने यह भी बताया है कि ‘भय बिनु होय न प्रीति।’ यानि प्रीति, मित्रता या एकजुटता के लिये आवश्यक है कि परस्पर स्वार्थ भी हो और भय भी। दोनों हो तो सर्वोत्तम अथवा कम से कम कोई एक तो हो। लेकिन जहां दोनों का ही अभाव हो वहां कैसे टिकेगी मित्रता और कैसे दिखेगी एकजुटता। वहां तो टकराव होगा, टूट होगी और बिखराव होगा। ठीक वैसे ही जैसा कांग्रेस में शुरू होता दिख रहा है। कभी अरूणाचल के विधायक बगावत कर रहे हैं तो कभी उत्तराखंड के। कभी त्रिपुरा के विधायक दल में फूट पड़ती है तो कभी मणिपुर के विधायक दल की एकता दरकती है। कभी छत्तीसगढ़ में जोगी परिवार पार्टी से अपना नाता तोड़ता दिख रहा है तो कभी महाराष्ट्र में गुरूदास कामथ सरीखे शीर्ष छत्रप संगठन को अलविदा कहते दिख रहे हैं। यह सिर्फ सूबाई स्तर पर ही नहीं हो रहा बल्कि केन्द्रीय स्तर पर भी असंतुष्टों की कतार लगातार लंबी होती दिख रही है और इस बात की संभावना से कतई इनकार नहीं किया जा सकता है कि पार्टी के शीर्ष नेतृत्व की एक भी मनमानी पहल अब पार्टी में भारी विस्फोट का सबब बन सकती है। गनीमत है कि इस विस्फोटक परिस्थिति से पार्टी का शीर्ष नेतृत्व यानि गांधी परिवार भी अच्छी तरह परिचित है। तभी तो हर शिकस्त के बाद सर्जरी की बात तो होती है लेकिन यह बात महज बतकही बनकर रह जाती है। आखिर सर्जरी करें तो कैसे? राहुल को आगे लाये तो बुजुर्ग नाराज। प्रियंका को आगे लाये तो अब तक की सारी मेहनत पानी में। सोनिया को ही बरकरार रखते हुए राहुल को हाशिये पर भेजें तो भविष्य अंधकारमय। इसके अलावा अन्य कोई विकल्प ही नहीं है जिस पर विचार भी किया जा सके। ऐसे में आखिर करें तो क्या करें? यही वजह है कि कहने-सुनने में तो हमेशा ही कई हवा-हवाई बातें आती रहती हैं, लेकिन वास्तविकता में जो जैसे चल रहा है उसे यथावत चलने दिया जा रहा है। इसमें मसला है कि चल तो सब कुछ रहा है, मगर उल्टी दिशा में। बढ़ना था आसमान की ओर जबकि जा रहे हैं पाताल की गर्त में। संगठन के सिमटने की रफ्तार दिन दूनी रात चौगुनी होती जा रही है। कहीं से कोई सहारा मिलता नहीं दिख रहा। पार्टी की पकड़ देश के महज पांच फीसदी भू-भाग पर सिमट कर रह गयी है। ऐसे में स्वाभाविक है कि शीर्ष नेतृत्व का भय आखिर किसी को हो भी तो क्यों। यानि भय के आधार पर फिलहाल पार्टी में एकजुटता की उम्मीद करना व्यर्थ ही है। अब बचा स्वार्थ का आधार। तो इस पहलू को टटोलें तो जिसकी उम्मीदें कायम हैं वह टिका हुआ है पार्टी में और जिसकी उम्मीदों पर पूर्णविराम लग रहा है वह अपना रास्ता अलग कर ले रहा है। छत्तीसगढ़ में अगर जोगी परिवार ने पार्टी को अलविदा कहने की पहलकदमी की है तो उसकी साफ सी वजह है कि पार्टी ने अमित जोगी को पहले ही बाहर का दरवाजा दिखा दिया था जबकि अजीत जोगी को भी पार्टी से बाहर निकालने की तैयारियां पूरी हो चुकी थीं। यानि जोगी परिवार समझ गया कि अब हाथ का साथ पकड़े रहने से उसका कोई स्वार्थ सिद्ध नहीं होनेवाला। तो वे चल पड़े अपने रास्ते। इसी प्रकार उत्तराखंड में भी जब विजय बहुगुणा को राज्यसभा की सीट नहीं मिली और सूबे की सत्ता से भी उन्हें दूध की मक्खी की तरह निकाल फेंका गया तो उन्होंने भी तमाम संगी-साथियों के साथ पार्टी का दामन छोड़कर अपनी राहें अलग कर लेना ही बेहतर समझा। यही सिलसिला महाराष्ट्र में भी दिख रहा है जहां राज्यसभा की सीट पर गुरूदास कामथ की दावेदारी की अनदेखी करते हुए उनके धुर विरोधी माने जानेवाले पी चिदंबरम को उच्च सदन का टिकट दे दिया गया। साथ ही संगठन में भी उनकी कोई पूछ नहीं रही और रही सही कसर राहुल के युवा प्रेम में आगे बढ़ाये जा रहे संजय निरूपम की बातों व हरकतों ने पूरी कर दी। लिहाजा अब कामथ भले ही पार्टी छोड़ने के अपने फैसले के पीछे हजारों दलीलें गिना रहे हों लेकिन सच तो यही है कि संगठन से स्वार्थपूर्ति का हर दरवाजा बंद हो जाने के बाद उनके पास यह कदम उठाने के अलावा कोई विकल्प ही नहीं बचा। ऐसी ही नौबत दिख रही है उत्तर-पूर्वी सूबों में भी जहां भाजपा के बढ़ते कदमों और कांग्रेस के समाप्त होते जनाधार ने पार्टी से स्वार्थसिद्ध होने की संभावनाएं बेहद क्षीण कर दी हैं। इसी का नतीजा है कि उधर भी पार्टी में भारी भगदड़ का माहौल दिख रहा है और अब त्रिपुरा और अरूणाचल में भी असम की स्याही से नया इतिहास लिखे जाने की संभावना प्रबल दिख रही है। इन समस्याओं से निजात पाने का उपाय तलाशने के लिये राहुल भले ही मार्गदर्शक मंडल बनाने की बात कह रहे हों लेकिन जिसे भी मार्गदर्शक बनाया जाएगा उसके भविष्य पर तो ताला ही लगेगा। ऐसे में वह पार्टी में कब तक टिकेगा इसकी कल्पना की जा सकती है। लिहाजा जरूरत है शीर्ष स्तर पर सर्जरी की और भविष्य की चुनौतियों के मद्देनजर ठोस पहलकदमी की। वर्ना भगदड़ के सिलसिले की यह शुरूआत पार्टी को कहां ले जाएगी यह शायद ही किसी को अलग से बताने की जरूरत हो। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @नवकांत ठाकुर # Navkant Thakur
शुक्रवार, 27 मई 2016
सियासत में सकारात्मकता की जरूरत
‘धैर्य व धर्म के प्रदर्शन की जरूरत’
किसी भी इंसान की प्रकृति व प्रवृति की सही परख तभी संभव है जब वह बुरी तरह परेशानियों में घिरा हो। परेशानी व समस्याओं में उलझा इंसान अधिक देर तक बनावटी व्यवहार नहीं कर सकता। तभी तो कहा भी गया है कि ‘आपतकाल परखिये चारी, धीरज धर्म मित्र और नारी।’ यानि धैर्य व धर्म की वास्तविक कसौटी परेशानियां व विपत्तियां ही होती हैं और जीवन में सफलता के लिये तो शिरडी के सांई ने भी श्रद्धा व सबुरी का ही संदेश दिया है। परेशानी छोटी हो बड़ी अथवा तात्कालिक हो या दीर्घकालिक, वह इंसान की परख करा ही देती है। मसलन छोटी सी ठेस लगने पर अचानक जुबान से निकलनेवाले अल्फाज से ही यह जाना जा सकता है कि इंसान किस प्रवृति व प्रकृति का है। क्योंकि ठेस लगते ही कराह के साथ किसी की जुबान से मोटी सी गाली निकलती है जबकि किसी की जुबान पर माता-पिता या परमात्मा का नाम आ जाता है। ऐसे में छोटी सी ठेस लगने पर मोटी सी गाली उगलनेवाले इंसान को नियति किस ओर ले जाएगी यह शायद ही किसी को अलग से बताने की जरूरत हो। लिहाजा अगर इस बात का आकलन करना हो कि मौजूदा वक्त में बुरी तरह उलझन, परेशानी व विपत्ति के मकड़जाल में फंसा हुआ इंसान आगामी दिनों में किस हद तक सफलता हासिल कर पाएगा तो निगाह इस बात पर दौड़ानी चाहिये कि उसकी मौजूदा सोच सकारात्मक है या नहीं। यही बात राजनीति में भी लागू होती है। यहां भी सफलता के लिये सकारात्मक सोच व समुचित व्यवहार निहायत ही आवश्यक है। नकारात्मक राजनीति के सहारे अव्वल तो सफलता हासिल ही नहीं हो सकती और किस्मत से हो भी जाये तो इसे लंबे समय तक कायम रख पाना तो नामुमकिन ही है। तभी तो आम तौर पर यह देखा जाता है कि चुनावी जनादेश अक्सर उसके पक्ष में ही आता है जिसने विकास व सुधार की सकारात्मक बातों पर ही अपने चुनाव अभियान को केन्द्रित रखा हो। यही लोकसभा चुनाव में हुआ था और यही तमाम विधानसभा चुनावों में हुआ है। यहां तक कि दिल्ली विधानसभा चुनाव के जिस जनादेश को सतही तौर पर नकारात्मक राजनीति की जीत के नजरिये से देखा जाता है उसकी भी गहराई से पड़ताल करें तो यही नजर आता है कि सूबे के मतदाताओं ने जनोन्मुख, पारदर्शी व भ्रष्टाचारमुक्त शासन के वायदे पर भरोसा जताया है। कहने का तात्पर्य है कि राजनीति में सकारात्मक नीति व नीयत के साथ ही सकारात्मक परिणाम हासिल किया जा सकता है। वर्ना नकारात्मक राजनीति का खामियाजा कितना बुरा हो सकता है यह कांग्रेस के मौजूदा हालत खुद ही बयान कर रहे हैं। लेकिन या तो कांग्रेस के रणनीतिकारों को सकारात्मक राजनीति का महत्व समझ में नहीं आ रहा है या फिर वे इसकी अनदेखी करना ही बेहतर समझ रहे हैं। तभी तो लगातार व सिलसिलेवार चुनावी शिकस्त के बावजूद वे इससे सबक लेकर अपनी सियासी सोच में तब्दीली लाना गवारा नहीं कर रहे हैं। मसला चाहे आतंकवाद को सांप्रदायिक रंग देने का हो या फिर विपक्षी दल की हैसियत से देशहित व जनहित में रचनात्मक भूमिका निभाने की हो। हर मामले में या तो नकारात्मकता हावी है या फिर असमंजस की स्थिति। तभी तो बाटला हाऊस मुठभेड़ को जायज व फर्जी बताये जाने को लेकर तत्कालीन गृहमंत्री शिवराज पाटिल के साथ दिग्विजय सिंह सरीखे नेताओं की टोली आपस में ही जूतम-पैजार में उलझी हुई है जबकि पार्टी असमंजस की स्थिति में है। वह किसी भी पक्ष को ना तो सही बता पा रही है और ना ही किसी पक्ष से पल्ला झाड़ पा रही है। वह भी तब जबकि मौका ए वारदात से फरार होने के बाद दहशतगर्दी का पर्याय माने जानेवाले संगठन आईएस में शामिल हो चुके दो आतंकियों का वह वीडियो भी सामने आ चुका है जिसमें वे बाटला मामले में संलिप्तता स्वीकार करते हुए हिन्दुस्तान से इसका बदला लेने की कसम खाते दिख रहे हैं। ऐसे में तो अब इस मुठभेड़ को लेकर उठनेवाले सवाल बंद ही हो जाने चाहिये थे लेकिन अगर ऐसा होता नहीं दिख रहा है तो इसे हठधर्मिता व नकारात्मकता की राजनीति का ही नाम दिया जा सकता है। इसी प्रकार केन्द्र की मोदी सरकार को एक ओर हर मोर्चे पर नाकाम बताना और दूसरी ओर संसद में रत्तीभर सहयोग करना भी गवारा नहीं करना तो यही दर्शाता है कि कांग्रेस की मौजूदा सियासी सोच कतई सकारात्मक नहीं है। वर्ना वह कम से कम उस जीएसटी को तो हर्गिज नहीं लटकाती जिसका प्रारूप उसकी ही सरकार ने तैयार किया था। आज भी मोदी सरकार की जिन योजनाओं का श्रेय लेने के लिये कांग्रेस उसे अपनी परिकल्पना बता रही है, उसमें भी उसे यह तो मानना ही पड़ेगा कि मौजूदा सरकार ने सकारात्मक सोच के साथ ही उन योजनाओं को आगे बढ़ाया है। वर्ना मनरेगा घोटालों की भेंट चढ़ रहा था जबकि आधार को संवैधानिक जमीन ही उपलब्ध नहीं कराया गया था। खैर, सरकार की कमियों व खामियों की ओर लोगों का ध्यान खींचना तो विपक्ष से अपेक्षित ही है लेकिन इसमें सोच की सकारात्मकता निहायत ही आवश्यक है। सकारात्मक सोच, नीति व नीयत के साथ ही लोगों का विश्वास व सहानुभूति अर्जित कर पाना संभव हो सकता है। वर्ना नकारात्मक सोच का परिणाम तो विध्वंसात्मक ही होता है। लिहाजा कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को पार्टी के बेहतर भविष्य के लिये अपनी मौजूदा नीतियों पर पुनर्विचार तो करना ही होगा। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर # Navkant Thakur
गुरुवार, 26 मई 2016
‘विरासत की सियासत में काबिलियत की जरूरत’
‘विरासत की सियासत में काबिलियत की जरूरत’
‘पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में भले ही अलग-अलग पार्टियों की जीत हुई हो लेकिन हार तो हर जगह कांग्रेस की ही हुई है।’ यह कहते हुए फूले नहीं समा रहे हैं भाजपा अध्यक्ष अमित शाह। अब शाह की यह बात कांग्रेस को भले ही जले पर नमक सरीखी जलन व चुभन दे रही हो लेकिन बात में दम तो है ही। कायदे से देखा जाये तो मौजूदा हार को स्वीकार करते हुए कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी ने एक बार की हार से दुनियां समाप्त नहीं होने की जो दलील दी है इसके अलावा वे कह भी क्या सकती हैं? पार्टी के नेताओं व कार्यकर्ताओं को यह दिलासा दिया जाना भी स्वाभाविक है कि आनेवाला भविष्य कांग्रेस का ही है और जल्दी ही पार्टी की जीत का सिलसिला फिर शुरू हो जाएगा। लेकिन मसला है कि अगर हार के कारणों पर विचार करते हुए मौजूदा चुनौतियों व जरूरतों के प्रति बदस्तूर शुतुमुर्गी रवैया अपनाने का सिलसिला जारी रखा जाएगा तो पार्टी की गाड़ी जीत की पटरी पर लौटेगी कैसे? इसके लिये आवश्यकता तो है अपनी कमजोरियों को पहचानने और उसमें सुधार लाने की। लेकिन इस दिशा में गंभीरता से विचार करने से यथावत परहेज बरते जाने का मतलब तो यही है कि बीमारी का एहसास तो सबको है लेकिन उसे स्वीकार करके उसमें सुधार करने की हिम्मत किसी में नहीं है। खास तौर से कट्टर कांग्रेसियों की जमात भले इस सच को स्वीकार करने की जहमत नहीं उठा रही हो लेकिन हकीकत यही है कि कांग्रेस में जब से राहुल गांधी का युग आरंभ हुआ है तब से पार्टी की सफलता का ग्राफ लगातार ढ़लान पर ही लुढ़कता जा रहा है। यहां तक कि पिछले दो सालों में हुए ग्यारह राज्यों के विधानसभा चुनावों में अपने कब्जेवाले छह राज्य कांग्रेस को गंवाने पड़े हैं और फिलहाल इसके पास कर्नाटक के अलावा कुछ गिने-चुने पर्वतीय सूबे ही बचे हुए हैं। खैर, इस सच को तो कतई नहीं झुठलाया जा सकता है कि विरासत में सियासत की सर्वोच्च कुर्सी तो मिल सकती है लेकिन उसकी हिफाजत करने की काबिलियत किसी को भी विरासत में नहीं मिलती है। वह तो खुद के अनुभव से ही आती है। लिहाजा अनुभवों से सबक लेने की जरूरत कांग्रेस में अगर किसी को है तो सिर्फ राहुल गांधी को ही है। क्योंकि सोनिया की सियासी काबिलियत तो जगजाहिर है। ये वही सोनिया हैं जिन्होंने नब्बे के दशक में डूबने के कगार पर खड़ी कांग्रेस की कमान संभालने के बाद अपनी योग्यता, क्षमता व कुशलता के दम पर ना सिर्फ केन्द्र में लगातार दस सालों तक संप्रग की सरकार चलवायी बल्कि देश के सत्रह राज्यों में पार्टी को शानदार सफलता दिलायी। इसी प्रकार कांग्रेस के शीर्ष रणनीतिकारों में शुमार होनेवाले पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के सामने भी अपनी योग्यता व क्षमता साबित करने की चुनौती नहीं है क्योंकि ये उन्हीं नेताओं की जमात है जो इंदिरा व राजीव से लेकर सोनिया तक जमाने में भी कांग्रेस का परचम लहराने में निर्णायक भूमिका निभाती रही है। जबकि राहुल की बात करें तो उनके सामने चुनौती है खुद को साबित करने की। क्योंकि अब सवाल उनके चाल-चलन से लेकर आचरण तक पर भी उठने लगे हैं। डूसू अध्यक्ष व कांग्रेस की राष्ट्रीय सचिव रह चुकीं अलका लांबा को यह कहते हुए कांग्रेस का हाथ छोड़कर एएपी का झाड़ू थामना पड़ा कि दो वर्षों में राहुल ने एक बार भी उन्हें मुलाकात का समय नहीं दिया। ऐसा ही इल्जाम असम में भाजपा की जीत के नायक रहे हेमंत विश्वशर्मा भी लगा रहे हैं कि कांग्रेस में रहते हुए सूबे की समस्याओं को लेकर जब वे राहुल से मिलने गये तो पूरी बैठक के दौरान राहुल लगातार अपने कुत्ते के साथ ही खेलते रहे। हेमंत के मुताबिक पार्टी के जमीनी नेताओं व कार्यकर्ताओं के साथ राहुल का व्यवहार ऐसा रहता है जैसा किसी घमंडी मालिक का अपने निरीह नौकर के साथ होता है। इसी प्रकार उत्तराखंड के बागी कांग्रेसी विधायकों का भी कहना है कि अगर राहुल ने उन्हें मिल-बैठकर मसले को सुलझाने को मौका दिया होता तो उन्हें पार्टी छोड़ने के लिये हर्गिज मजबूर नहीं होना पड़ता। हालांकि ऐसी बातें वे लोग कर रहे हैं जो पार्टी छोड़कर जा चुके हैं। लेकिन इससे अलग भी देखें तो राहुल जब चाहे बिना किसी को बताये छुट्टी मनाने के लिये अज्ञात स्थान पर चले जाते हैं। संसद में भी उनकी भूमिका युवराज सरीखी ही रहती है, मतदाताओं के प्रतिनिधि की छवि उनमें शायद ही किसी को कभी दिखी हो। तभी तो शशि थरूर को भी संकेतों में यह कहना पड़ा है कि ‘पार्ट टाईम पॉलिटिक्स’ करके मौजूदा चुनौतियों का सामना नहीं किया जा सकता बल्कि पांच साल तक लगातार जमीन पर पसीना बहाने के बाद ही चुनावी सफलता का प्रतिफल पाने की कल्पना की जा सकती है। बहरहाल, सच तो यही है कि आज भले ही पार्टी के भीतर से कोई मुखर होकर राहुल के चाल, चलन व आचरण में बदलाव की जरूरत पर एक शब्द भी नहीं बोल रहा हो लेकिन समय की मांग तो यही है कि उन्हें खुद में बदलाव लाना ही होगा। विरासत की सियासत को वे जिस आसान, सहज व मनमाने ढंग से संचालित करने की कोशिश कर रहे हैं उसमें उन्हें तब्दीली लानी ही होगी वर्ना कांग्रेस की दुर्गति का सिलसिला अभी और भी आगे तक जारी रहने की संभावना को कतई नकारा नहीं जा सकता है। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर # Navkant Thakur
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गुरुवार, 31 मार्च 2016
‘नाच ना जाने आंगन टेढ़ा’
‘नाच ना जाने आंगन टेढ़ा’
पहले अरूणाचल प्रदेश फिर उत्तराखंड और अब मणिपुर। कतार में हिमाचल भी है और कर्नाटक भी। कहने को तो ये सभी अलग प्रदेश हैं लेकिन इन सभी कांग्रेसशासित सूबों की अंदरूनी कहानी काफी हद तक एक सी ही है। हर जगह नेतृत्व के खिलाफ बगावत की चिंगारी अंदर से ही उभरती दिख रही है। बहुत मुमकिन है कि उस चिंगारी को बाहर से हवा दी जा रही होगी। लेकिन आग जब अंदर से ही सुलग रही हो तो बाहरवालों को क्या दोष देना। बाहरवाले तो चाहेंगे ही कि घर टूटे ताकि उन्हें मलाई काटने का मौका मिल सके। इसी का नाम तो सियासत है, जिसमें इन दिनों कांग्रेस की स्थिति काफी हद तक दयनीय हो चली है। अरूणाचल में भी अपनी ही सरकार के खिलाफ बगावत का बिगुल कांग्रेसी विधायकों ने ही बजाया और उत्तराखंड में भी उसकी ही पुनरावृति हुई। अब मणिपुर भी उसी राह पर बढ़ता दिख रहा है। लेकिन कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व यह जताने में जुटा हुआ है मानो उसकी सरकारों को असंवैधानिक तरीके से सियासी विद्वेष की भावना के तहत अपदस्थ करने की कोशिश की जा रही है ताकि कांग्रेसमुक्त भारत के सपने को साकार किया जा सके। ऐसे में लाख टके का सवाल है कि आखिर दूसरों को दोष देने के बजाय आत्मचिंतन क्यों नहीं किया जा रहा? इस दिशा में विचार क्यों नहीं हो रहा कि एक के बाद हर सूबे में पार्टी के अपने ही विधायक बगावत की राह पकड़ने के लिये क्यों मजबूर हो रहे हैं। हालांकि ऐसे मामलों में राजनीतिक लाभ के लिये संवेदना की सियासत करना मजबूरी भी है और इसके अलावा कोई विकल्प भी नहीं है। लेकिन बंद दरवाजे के भीतर अगर बीमारी की पहचान करके उसका समुचित इलाज तलाशने की कोशिश नहीं की गयी तो यही नासूर जो उत्तराखंड के बाद अब मणिपुर में पनपता दिख रहा है वह आगे चलकर कर्नाटक को भी चपेट में ले सकता है और बाकी अन्य चार उन सूबों को भी जहां कांग्रेस की सरकार है। दरअसल पार्टी के भीतर जब एक ओर शीर्ष व कनिष्ठ स्तर के बीच संवादहीनता की स्थिति बन जाये और दूसरी ओर शीर्षतम स्तर पर वर्चस्व के टकराव व नीतिगत मसलों पर विरोधाभासी फरमान जारी होने की परंपरा शुरू हो जाये तो संगठन में टूट-फूट, बिखराव व टकराव की स्थिति उत्पन्न होना स्वाभाविक ही है। जब अरूणाचल प्रदेश में पार्टी के विधायक दल में टूट की स्थिति बनी तो मामले को सुलझाने व बातचीत करके सुलह-सहमति की राह तलाशने के बजाय अगर पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष राष्ट्रपति के पास जाकर सरकार बचाने की गुहार लगाने लगे तो लाजिमी है कि बागियों के पास संगठन से विद्रोह करने के अलावा कोई विकल्प ही नहीं बचेगा। यही मामला उत्तराखंड में भी देखा गया जहां बागियों को मनाने या उनकी बात सुनने की भी जहमत भी नहीं उठायी गयी और बहुमत का विश्वास खो चुके मुख्यमंत्री को सरकार बचाने के लिये कुछ भी कर गुजरने की पूरी छूट दे दी गयी। तभी तो वह स्टिंग भी सामने आया जिसमें सरकार बचाने के लिये रावत साहब अपने ही दल के विधायकों की बोली लगाते नजर आये। अब ऐसा ही कुछ मणिपुर में भी हो रहा है जहां कांग्रेस के 47 में से 25 विधायकों ने मुख्यमंत्री इबोबी सिंह के खिलाफ बगावत का बिगुल बजा दिया है और उन्हें पद से हटाने की मांग पर अड़ गये हैं। जाहिर तौर पर वहां भी इबोबी के खिलाफ मोर्चा खोलनेवालों की वैसी ही कुछ मांग है जैसी अरूणाचल व उत्तराखंड के बागियों की थी। वहां भी तो पहले पार्टी के भीतर ही इंसाफ मांगने की कोशिश हुई और मुख्यमंत्री की मनमानी नीतियों के खिलाफ आलाकमान के सामने गुहार लगाने का प्रयास किया गया। लेकिन जब ना तो शीर्ष नेतृत्व से कोई तवज्जो मिली और ना ही सूबे की सियासत में सुधार होने की गुंजाइश बची तब थक-हारकर बागियों को आर-पार की निर्णायक लड़ाई छेड़ने के लिये विवश होना पड़ा। ऐसे में इतना तो स्पष्ट है कि अगर एक के बाद तमाम प्रदेशों में स्थापित नेतृत्व के खिलाफ विरोध व विद्रोह का दावानल एक सरीखा ही सुलग रहा है और उसका इलाज करने में भी हर जगह एक ही रणनीति अपनाई जा रही है तो निश्चित तौर पर संगठन में शीर्ष स्तर पर कुछ तो गड़बड़ है जिसे या तो समझा नहीं जा रहा है या फिर समझने के बावजूद नहीं समझने का प्रयास किया जा रहा है। अगर शीर्ष स्तर पर मामले को संभालने का शिद्दत से प्रयास होता तो कोई कारण ही नहीं है कि हरक सिंह रावत व विजय बहुगुणा सरीखे ऐसे नेताओं को अपनी ही पार्टी से अलग होकर अनिश्चितता की सियासी राह पर आगे बढ़ना पड़ता जिन्होंने सूबे में पार्टी को स्थापित करने के लिये अपनी पूरी उम्र खपा दी। ऐसे में आवश्यकता तो यह है कि बागियों को दुश्मन मानने के बजाय उनकी समस्याओं को समझा जाये, उनकी परेशानियों को दूर किया जाये और संगठन में समन्वय, सहभागिता व सहचर्य का माहौल मजबूत किया जाये। लेकिन विचित्र बात है कि पार्टी का शीर्ष नेतृत्व सांगठनिक स्तर पर सामने आ रही अंदरूनी समस्याओं का ठीकरा विरोधियों पर फोड़कर खुद को दीन-हीन दिखाने व लोगों की संवेदना हासिल करने की रणनीति पर अमल करता दिख रहा है। जबकि सच तो यह है कि दूसरों को दोषी ठहराकर आंगन को ही टेढ़ा बताने से दूरगामी तौर पर कुछ भी हासिल नहीं होनेवाला है। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’ @नवकांत ठाकुर #NavkantThakur
शुक्रवार, 1 जनवरी 2016
भले देर से आये लेकिन दुरूस्त आएगी, आपदा आयी है तो राहत भी आएगी
‘आफत की आमद और राहत का तोहफा’
नवकांत ठाकुर
आफत-आपदा जब भी आती है। जहां भी आती है। उसके साथ जुड़ी होती है राहत की खबर भी। या यूं कहें कि आपदा आयी है तो राहत भी आएगी ही। भले देर से आये लेकिन दुरूस्त आएगी। यह फार्मूला सिर्फ प्राकृतिक आपदा पर ही लागू नहीं होता, सियासी आफत में भी अक्सर ऐसा ही होता है। मसलन इन दिनों देश के जिन शीर्ष नेताओं पर सबसे जबर्दस्त सियासी आफत आयी हुई है उनमें हेराल्ड केस में फंसे गांधी परिवार से लेकर डीडीसीए घोटाले के आरोपों में उलझे अरूण जेटली भी शामिल हैं। साथ ही आपदाग्रस्त नेताओं की सूची में विधानसभा सीट की सौदेबाजी से लेकर राशन घोटाले सरीखे तमाम आरोपों की मार झेल रहे छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह भी हैं और ‘गाली कप्तान को तो गाली भी कप्तान को’ सरीखी दलीलों के तहत दिल्ली के बाद बिहार विधानसभा चुनाव में भी पार्टी की लुटिया डुबोने के लिये जिम्मेवार माने जा रहे अमित शाह भी। हालांकि इन नेताओं पर आयी सियासी आफत की खबरें तो लगातार सुर्खियों में बनी ही हुई हैं। लेकिन आफत के कारण उन्हें हासिल हो रही राहत के बारे में बहुत कम चर्चा हो रही है। बिल्कुल ना के बराबर। जबकि हकीकत तो यह है कि सियासी आफत के मुकाबले उन राहतों की अहमियत भी कतई कम नहीं है जो इस आफत के कारण ही इन नेताओं को मयस्सर हो रही हैं। मसलन हेराल्ड के मुकदमे में उलझने के बाद से सोनिया व राहुल को जितनी सिरदर्दियों का सामना करना पड़ रहा है वह जगजाहिर ही है। लेकिन इस परेशानी के कारण जमीनी स्तर पर उन्हें व उनकी पार्टी को कितना फायदा मिल रहा है इसकी झलक गुजरात व मध्यप्रदेश के बाद आज सामने आये छत्तीसगढ़ के स्थानीय निकायों के चुनावी नतीजों में भी देखा जा सकता है जहां तीसरे कार्यकाल के बाद अब भाजपा की चूलें हिलती हुई दिखने लगी हैं। तीनों ही सूबों में भाजपा का यह लगातार तीसरा कार्यकाल है। अपनी तरफ से उसने कांग्रेस मुक्त भारत अभियान की शुरूआत यहीं से की थी। लेकिन हालिया दिनों में हुए इन सूबों के स्थानीय निकाय के चुनावों में कांग्रेस ने जिस मजबूती के साथ अपना झंडा गाड़ा है और भाजपा का सफाया होने की शुरूआत हुई है उसमें हेराल्ड केस सरीखे उन मामलों की भूमिका को हर्गिज नकारा नहीं जा सकता है जिसके सामने आने के बाद से गांधी परिवार के प्रति सहानुभूति के बयार की धीमी मगर मजबूत शुरूआत का वातावरण बनने लगा है। ऐसी ही राहत की खबर वित्तमंत्री जेटली के लिये भी है जिनका नाम डीडीसीए के मामले में उछलने के कारण केन्द्रीय मंत्रिमंडल से उनको हटाये जाने की जोरदार मांग उठ रही है। सूत्र बताते हैं कि मकर संक्रांति के बाद केन्द्रीय मंत्रिमंडल में फेरबदल की पूरी योजना तैयार हो गयी थी और इसमें जेटली से सूचना व प्रसारण मंत्रालय वापस ले लिये जाने की तैयारी थी जिस पर वे वित्त मंत्रालय की व्यस्तताओं के कारण कथित तौर पर पूरा ध्यान नहीं दे पा रहे हैं। लेकिन डीडीसीए के मामले के तूल पकड़ने के बाद अब जेटली के कार्यभार के साथ छेड़छाड़ की संभावना भी समाप्त हो गयी है क्योंकि ऐसा करने से यही संदेश प्रसारित होगा कि डीडीसीए के आरोपों में फंसने के कारण ही उनके पर कतरे गये हैं। इसी प्रकार आफत के साथ राहत की खबर रमन सिंह के लिये भी आयी है जिनसे छत्तीसगढ़ की एकछत्र सूबेदारी छिनने की संभावना काफी प्रबल दिख रही थी और उन्हें संभावित मंत्रिमंडल विस्तार में केन्द्र की राजनीति में लाने की योजना बनायी जा रही थी। लेकिन अचानक ही विधानसभा सीट फिक्सिंग के विवाद में उनके दामाद की कथित भूमिका के कारण सीधे तौर पर उनका नाम जुड़ने और चुनाव आयोग द्वारा पूरे मामले की जांच शुरू कर दिये जाने के बाद अब उनके कार्यभार में भी बदलाव की संभावनाएं सिरे से समाप्त हो गयी हैं। खैर, आफत के साथ सबसे बड़ी राहत भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को ही मिलती दिख रही है जिन्हें बिहार की हार का जिम्मेवार मानते हुए संघ व संगठन के भीतर यह बहस जोर पकड़ने लगी थी कि क्यों ना राष्ट्रीय राजनीति से उनकी छुट्टी कर दी जाये और गुजरात की राजनीति में वापस भेज दिया जाये। अगर ऐसा होता तो शाह के लिये इससे अधिक दुर्भाग्य की बात कुछ और नहीं हो सकती थी क्योंकि इतिहास में औपचारिक तौर पर भाजपा अध्यक्ष के रूप में उनका नाम भी नहीं जुड़ पाता। अभी तो वे राजनाथ सिंह के बचे हुए कार्यकाल को ही पूरा कर रहे हैं, उनका अपना औपचारिक स्वतंत्र कार्यकाल तो शुरू भी नहीं हुआ है। लेकिन भला हो आगामी दिनों में होने जा रहे उन पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव का जिसमें पार्टी के लिये हार का वरण करने के अलावा कोई दूसरा विकल्प ही नहीं हैं। हार के इस सिलसिले को सामने देखकर वे लोग कतई अध्यक्ष पद की जिम्मेवारी उठाने का हौसला नहीं दिखा रहे हैं जिनको संघ व संगठन से लेकर सरकार तक का विश्वास हासिल है। लिहाजा सिलसिलेवार पराजय की आफत ने शाह के लिये अध्यक्ष पद पर बरकरार रहने की राहत मुहैया करा दी है। खैर, आफत के कारण मिलनेवाली इन राहत की खबरों के बीच इस तथ्य की अनदेखी हर्गिज नहीं की जानी चाहिये कि ऐसी राहतें तात्कालिक ही होती हैं और आफत टलते ही राहत का सिलसिला समाप्त होने का जोखिम हमेशा बना रहता है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’
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