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शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2016

‘सियासत में सुरक्षा बनाम सुरक्षा की सियासत’

‘सियासत में सुरक्षा बनाम सुरक्षा की सियासत’

सियासत में सुरक्षा की बात हो या सुरक्षा के सियासत की। यह मसला तो सदाबहार है। कभी किसी की सुरक्षा में कटौती हो जाये तो सियासत शुरू। कभी संघ प्रमुख मोहन भागवत सरीखे लोगों की सुरक्षा व्यवस्था मजबूत की जाये तो उस पर भी सियासत। सुरक्षा घेरा सियासी सवालों का सबब बनता ही रहता है। यह मसला निर्धारित अंतराल पर देश के अलग-अलग कोनों से इतनी दफा उठता रहता है कि अब इसे आम तौर पर कोई भी ज्यादा गंभीरता से नहीं लेता। सुरक्षा के मसले पर जब भी हायतौबा मचती है तो मान लिया जाता है कि यह सियासत चमकाने की ही कोशिश है। लेकिन असली मुश्किल तब पेश आती है जब सियासत में मौजूद खतरों के मद्देनजर सुरक्षा को स्वीकार करने के बजाय बड़े नेतागण अपनी सियासी जरूरतों को पूरा करने के लिये सुरक्षा घेरे के प्रति बेपरवाही बरतना शुरू कर देते हैं। इस मामले में सबसे पहला नाम प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का ही आता है जो सबसे अधिक खतरे में होने के बावजूद सुरक्षा घेरे को तोड़ने का रिकार्ड बनाने की ओर अग्रसर हैं। आज भले ही समूचे देश को मायूस करते हुए सियाचीन के शेर लांस नायक हनुमनथप्पा कोप्पड़ ने चिरनिद्र को अंगीकार कर लिया है, लेकिन छह दिनों तक बर्फ की 25 फीट मोटी परत के नीचे से दबे रहने के बाद भी उनके जिन्दा निकल आने और दिल्ली स्थित सेना के आरआर अस्पताल में उन्हें दाखिल कराये जाने की खबर प्रधानमंत्री को जैसी ही पता चली तो वे फौरन वहां जाने के लिये लपक लिये। जितनी शीघ्रता से उन्होंने वहां की दौड़ लगायी उतने कम समय में ना तो रास्ते को महफूज करना संभव था और ना ही उनके रूट को परंपरागत तरीके से अभेद्य बनाया जा सकता था। लेकिन सुरक्षा के प्रति लापरवाही की पराकाष्ठा का मुजाहिरा करते हुए वे दनदनाते हुए हनुमनथप्पा को देखने के लिये निकल पड़े। यह तो गनीमत रही कि सुरक्षा काफिला उनका अनुसरण कर रहा था और उनकी यात्रा निर्विघ्न समाप्त हो गयी वर्ना ऐसी लापरवाही का क्या अंजाम हो सकता है इससे शायद ही कोई अनजान हो। खैर, यह तो महज बानगी ही है मोदी द्वारा सुरक्षा घेरे के प्रति बेपरवाही बरते जाने की। अलबत्ता उनकी ऐसी हरकतें तो तभी से जारी हैं जब वे प्रधानमंत्री पद के दावेदार के तौर पर पूरे देश में धुंआधार चुनाव प्रचार कर रहे थे। उन दिनों पटना के गांधी मैदान में हुई जनसभा को संबोधित करने के लिये उन्होंने जिस तरह से तमाम सुरक्षा सलाहों की अनदेखी करते हुए लगातार हो रहे बम धमाके के बीच ‘सबका साथ सबका विकास’ के नारे को पहली दफा खुलकर बुलंद करने की पहल की थी, उसके साक्षी रहे लोगों को आज भी जब उस दिन का मंजर याद आता है तो उनके रौंगटे खड़े हो जाते हैं। तब से लेकर अब तक मोदी ने सुरक्षा से खिलवाड़ करने का सिलसिला लगातार जारी रखा हुआ है। भाजपा मुख्यालय में आयोजित हुए दीपावली मिलन के पिछले दो आयोजनों में पत्रकारों को अपने साथ सेल्फी खींचने का मौका देने के लिये वे जिस कदर खचाखच भरे पंडाल में भीड़ के बीच कूद पड़ते हैं उसका नतीजा किस कदर खतरनाक हो सकता है यह बात किसी से छिपी हुई नहीं है। स्वतंत्रता दिवस के समारोह से लेकर गणतंत्रता दिवस की परेड तक के आयोजन में लोगों से हाथ मिलाने, बच्चों को दुलारने और आम लोगों को अपनत्व का एहसास कराने के लिये सुरक्षा घेरे को तोड़कर भीड़ के करीब चले जाना इनका शगल बन गया है। भले राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोवाल सार्वजनिक तौर पर उनसे ऐसा नहीं करने की लाख अपील करते फिरें लेकिन इनकी कानों पर जूं तक नहीं रेंगती है। विदेश यात्रा से लौटने के क्रम में सड़क पर मौजूद समर्थकों से अचानक गाड़ी रोककर मिलना-जुलना, विदेश दौरे में भी आस्ट्रेलिया से लेकर खाड़ी तक में अपना संबोधन सुनने आये लोगों से हाथ मिलाने पहुंच जाना, संसद की कैंटीन के खाने का स्वाद लेने के लिये अचानक वहां आ धमकना, प्रधानमंत्री के तौर पर सियाचीन जाने की योजना को सुरक्षा तंत्र से अंतिम समय तक छिपाये रखना और रन फाॅर युनिटी सरीखे सार्वजनिक दौड़ के आयोजन में भीड़ का हिस्सा बनने की कोशिश करना इनकी पहचान बनती जा रही है। अब इसके लिये सुरक्षा व खुफिया तंत्र हलकान होता है तो होता रहे, इनकी बला से। इन्होंने तो मानो सुरक्षा की परवाह नहीं करने की कसम खा रखी है। वैसे मोदी अकेले नहीं हैं जो सुरक्षा घेरे से बेपरवाह होकर अक्सर भीड़ का हिस्सा बन जाना पसंद करते हों। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल तो आवश्यक सुरक्षा लेने से ही इनकार कर देते हैं। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी को भी अपनी सुरक्षा में तैनात दस्ते को चकमा देकर चंपत हो जाने में महारथ हासिल है। अब इन नेताओं को कौन समझाये कि सुरक्षा सलाहों की अनदेखी के नतीजे में ही देश को ना सिर्फ महात्मा गांधी की हत्या का दंश भुगतना पड़ा बल्कि अगर इंदिरा गांधी ने अपनी निजी सुरक्षा में फेरबदल करने और राजीव गांधी ने भीड़ से निर्धारित दूरी बनाकर रहने की ठोस खुफिया सलाहों को मान लिया होता तो उनसे असमय जुदाई का दुख देश को नहीं भुगतना पड़ता। खैर, सियासत में लोगों से मिलने-जुलने और उन्हें अपनेपन का एहसास कराने की भी अपनी अहमियत है लेकिन इसके लिये सुरक्षा से खिलवाड़ किये जाने को कैसे जायज ठहराया जा सकता है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’   @ नवकांत ठाकुर

सोमवार, 23 नवंबर 2015

‘बैठे-बैठे दिन बदलेंगे इसके भरोसे मत रहना’

नवकांत ठाकुर
‘साया बनकर साथ चलेंगे इसके भरोसे मत रहना, अपने हमेशा अपने रहेंगे इसके भरोसे मत रहना, सूरज की मानिंद सफर पर रोज निकलना पड़ता है, बैठे-बैठे दिन बदलेंगे इसके भरोसे मत रहना।’ मौजूदा दौर के सियासी समीकरणों को जहन में रखते हुए देखें तो हस्तीमल हस्ती द्वारा लिखी गयी इस गजल का हर मिसरा कांग्रेस को ही संबोधित किया गया महसूस होता है। वाकई इन दिनों कांग्रेस की हालत बेहद अजीब हो गयी है। कहां तो इसे केन्द्र से लेकर सूबायी स्तर तक पनप रहे सियासी दलों के भाजपा विरोधी महामिलाप के केन्द्र में होना चाहिये था लेकिन स्थिति यह है कि उसे इन महामिलापों की मजबूत नाकेबंदी से हासिल चुनावी सफलता में मामूली सी हिस्सेदारी हासिल करके ही संतुष्ट रह जाने के लिये मजबूर होना पड़ रहा है। उसमें भी दुर्गति की पराकाष्ठा यह है कि यूपी सरीखे सूबे में जारी महामिलाप की कवायदों में सम्मानजनक साझेदारी के बजाय हासिल हो रहे दुत्कार के जहर को भी चुपचाप बर्दाश्त करने के अलावा उसे कोई दूसरी राह ही नजर नहीं आ रही है। सच पूछा जाये तो संसद से लेकर सड़क तक ही नहीं बल्कि क्षेत्रीय दलों की मजबूत मौजूदगी से महरूम कुछ गिने-चुने सूबों के अलावा तमाम प्रदेशों में कांग्रेस को कमोबेश ऐसी ही स्थिति का सामना करना पड़ रहा है। जिस बिहार में हासिल जीत के दम पर पार्टी में नयी संजीवनी का संचार हुआ है वहां भी अव्वल तो उसे राजद व जदयू के बीच हुई कड़ी सौदेबाजी में बची हुई सीटों का प्रसाद ही चुपचाप सहन करना पड़ा और उसके कोटे की अधिकांश सीटों पर लालू के कितने ‘लाल’ लड़े वह भी सर्वविदित ही है। यहां तक कि चुनाव प्रचार में भी राजद-जदयू के शीर्ष नेतृत्व ने कांग्रेस के साथ निर्धारित दूरी बदस्तूर कायम रखी और नितीश कुमार के शपथग्रहण समारोह को जिस तरह से राष्ट्रीय राजनीति में प्रधानमंत्री पद के नये दावेदार की ताजपोशी का स्वरूप दिया गया उसका खामोश साक्षी बनने के अलावा अगर राहुल गांधी के पास कोई दूसरा विकल्प नहीं था तो इसे राष्ट्रीय राजनीति की उस नयी करवट का संकेत ही माना जाएगा जिसमें कांग्रेस की प्रसंगिकता हाशिये की ओर अग्रसर दिख रही है। बिहार चुनाव में जीत का डंका बजाने के फौरन बाद पहली प्रतिक्रिया में जब लालू ने बनारस आकर नरेन्द्र मोदी के कामकाज के दावों की पोल-पट्टी खोलने का ऐलान किया तो सपा के शीर्ष संचालक परिवार ने छूटते ही यह स्पष्ट कर दिया कि काशी में अपने समधी के स्वागत में कोई कसर नहीं छोड़ी जाएगी। यानि सपा की समस्या किसी अन्य भाजपाविरोधी दल से नहीं है। परेशानी है तो सिर्फ कांग्रेस से ही है क्योंकि उसे बेहतर पता है कि अगर कांग्रेस को दुबारा पनपने का मौका दिया गया तो भविष्य में वह उसकी जमीन पर ही अपना झंडा गाड़ेगी। तभी तो मुलायम ने पूरी सख्ती के साथ यह एलान कर दिया है कि ना तो वे खुद कांग्रेस के साथ कोई राब्ता रखेंगे और ना ही किसी ऐसे के साथ सियासी सहचर्य कायम करेंगे जिसने अर्श की ओर उठने के लिये कांग्रेस को अपना कांधा उपलब्ध कराया हो। खैर, बिहार में तो अपने वजूद की लड़ाई लड़ रहे दलों की तिकड़ी में कांग्रेस को शामिल कर लिया गया जबकि यूपी में भी बहनजी के हाथी की पूंछ पकड़के वैतरणी पार करने का विकल्प उसके लिये खुला हुआ है लेकिन अगले साल होने जा रहे पांच राज्यों के चुनाव में ना तो पश्चिम बंगाल में उसे कोई अपने साथ जोड़ने के लिये तैयार है और ना ही तमिलनाडु या केरल में। यहां तक कि असम में अल्पसंख्यक मतदाताओं का नेतृत्व करनेवाले बदरूद्दीन अजमल की एआईयूडीएफ से गठजोड़ करने में भी कांग्रेस को कई ऐसे समझौते करने पड़ सकते हैं जिस पर सिर्फ अफसोस ही जताया जा सकता है। यानि सतही तौर पर संसदीय सियासत में भले ही कांग्रेस काफी मजबूत नजर आ रही हो लेकिन अगर वह जमीन पर भाजपा विरोधी ताकतों का गुरूत्व केन्द्र बनने के बजाय अपने वजूद व वकार को पुनर्स्थापित करने के लिये स्थानीय व क्षेत्रीय दलों की कृपा की मंुहताज हो रही है तो निश्चित ही इस मामले की गंभीरता को कम करके आंकना कतई सही नहीं होगा। वह भी तब जबकि भाजपा की राह रोकने के लिये उसने किसी भी दल के साथ गठजोड़ करने का विकल्प पूरी तरह खुला रखा हुआ है। यानि समग्रता में देखा जाये तो अब लड़ाई सिर्फ ऐसे मोर्चे पर नहीं चल रही है जहां विरोधियों के बिखराव व टकराव के बीच महज 32 फीसदी वोटों के दम पर ही संसद में बहुमत जुटा लेनेवाली भाजपा के खिलाफ सब एकजुट हो रहे हैं बल्कि अब भाजपा व नरेन्द्र मोदी का विकल्प नहीं बन पाने के खामियाजे में कांग्रेस को ऐसे ध्रुवीकरण में हिस्सेदारी करनी पड़ रही है जहां उसकी स्थिति अवांक्षित रहबर की दिख रही है। हालांकि सूबायी सियासत में कमजोर निजी पैठ के बावजूद राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक विस्तार, प्रसार व फैलाव के दम पर केन्द्र में मजबूत मौजूदगी तो कांग्रेस की हर हालत में रहेगी बशर्ते राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा का कोई नया विकल्प ना उभरे। लेकिन समस्या की जड़ में जाकर जूझने के बजाय प्रादेशिक स्तर पर परजीवी बनकर फलक के पताके का कलेवर बदलने की जद्दोजहद में ही उलझे रहने के नतीजे में भविष्य की चुनौतियों से निपटने में कांग्रेस को कितनी कामयाबी मिल पाएगी यह सवाल तो उठता ही है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ 

मंगलवार, 25 अगस्त 2015

भाजपा नेतृत्व के निशाने पर आए शत्रुघ्न 

बिहार चुनाव के बाद होगी अनुशासनात्मक कार्रवाई

नवकांत ठाकुर

संगठन व सरकार में सम्मानजनक स्थान नहीं मिलने की टीस का मुजाहिरा करते हुए शत्रुघ्न सिन्हा ने इन दिनों अपने बागी तेवरों व विवादास्पद बयानों से भाजपा के लिये जिस कदर असहज स्थिति उत्पन्न की हुई है इसके नतीजे में वे पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के सीधे निशाने पर आ गये हैं। हालांकि पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने बिहार विधानसभा चुनाव के मद्देनजर फिलहाल उनके मामले में संयम बरतना ही बेहतर समझा है लिहाजा उनके किसी भी बयान पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी जा रही है। लेकिन पार्टी नेत्त्व ने साफ कर दिया है कि उनकी मौजूदा हरकतों को कतई बर्दाश्त नहीं किया जा सकता है और चुनाव समाप्त होने के फौरन बाद इन तमाम मसलों को लेकर उनके खिलाफ ठोस व कड़ी कार्रवाई करने में कतई कोताही नहीं बरती जाएगी। 
वास्तव में देखा जाये तो केन्द्र में भाजपा की सरकार बनने के कुछ ही अर्से के बाद से शत्रुघ्न ने अपने बागी तेवरों का मुजाहिरा करना आरंभ कर दिया था। इसी सिलसिले में उन्होंने पार्टी के हर उस नेता की तरफदारी करने में कोई कसर नहीं छोड़ी जिसने पार्टी लाईन के बाहर जाकर बयानबाजी की हो। मामला चाहे पार्टी के बुजुर्ग नेताओं को संगठन व सरकार से अलग करके मार्गदर्शक बना दिये जाने का हो या फिर दरभंगा के सांसद कीर्ति आजाद द्वारा ललित मोदी विवाद में सुषमा स्वराज का नाम सामने आने के लिये पार्टी की आस्तीन में छिपे सांपों की ओर इशारा किये जाने का। हर मामले में शत्रुघ्न ने सार्वजनिक तौर पर पार्टी नेतृत्व के फैसलों के खिलाफ ही अपना विचार व्यक्त किया। यहां तक कि बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार व दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल सरीखे भाजपा के धुर विरोधियों का भी दिल खोलकर गुणगान करने में उन्होंने कभी कोताही नहीं बरती। एक ओर भाजपा ने बिहार में लगातार नितीश के खिलाफ मोर्चा खोला हुआ है जबकि शत्रुघ्न सार्वजनिक तौर पर नितीश की तारीफ में कसीदे काढ़ते नहीं थक रहे हैं। भाजपा के किसी जमीनी कार्यक्रम में शिरकत करना भले ही वे जरूरी ना समझते हों लेकिन नितीश के हर बुलावे पर दौड़ते हुए चले जाना उनकी आदत में शुमार हो गया है। यहां तक कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा नितीश को विश्वासघाती डीएनए वाला नेता बताये जाने का पुरजोर विरोध करने में भी शत्रुघ्न ने कोई कसर नहीं छोड़ी। बताया जाता है कि शत्रुघ्न के इस मित्रवत व्यवहार से अभिभूत होकर उनके पिता के नाम पर पटना के एक अस्पताल का नामकरण करने के बाद अब नितीश ने आगामी चुनाव में उनकी पत्नी को अपनी पार्टी से टिकट देने का भी फैसला कर लिया है। जाहिर तौर पर शत्रुघ्न की इन तमाम हरकतों व नितीश के साथ जारी उनकी सियासी जुगलबंदी से पार्टी के शीर्ष नेतृत्व का नाराज होना स्वाभाविक ही है। लेकिन अब सीधे तौर पर पार्टी लाईन से बाहर जाते हुए उन्होंने जिस तरह से बिहार में चुनाव से पहले ही मुख्यमंत्री पद के प्रत्याशी का नाम घोषित किये जाने की मांग करते हुए लोजपा अध्यक्ष रामविलास पासवान को राजग की ओर से मुख्यमंत्री पद का दावेदार बनाये जाने का विचार व्यक्त कर दिया है उससे पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के सब्र की इंतहा हो गयी है। यही वजह है कि भाजपा के एक शीर्ष रणनीतिकार ने नाम नहीं छापे जाने की शर्त पर बेलाग लहजे में यह बताने में कोई कोताही नहीं बरती है कि पार्टी ने बिहार चुनाव से फारिग होने के फौरन बाद पहली फुर्सत में शत्रुघ्न को सबक सिखाने का पक्का मन बना लिया है। उन्होंने बताया कि इस समय शत्रुघ्न के खिलाफ कोई भी कार्रवाई करने का बिहार के चुनाव पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने की आशंका के मद्देनजर फिलहाल उनके बयानों व हरकतों की अनदेखी करने का ही फैसला किया गया है और उनकी किसी भी बात का किसी भी स्तर से कोई भी जवाब नहीं देने की रणनीति अपनायी गयी है। लेकिन चुनाव सम्पन्न होने के बाद उन्हें अपनी हर हरकत का समुचित जवाब व हिसाब देना ही होगा।  

बुधवार, 19 अगस्त 2015

‘नाव पर गाड़ी है या गाड़ी पर नाव......?’

नवकांत ठाकुर
इन दिनों यह पता करना बेहद मुश्किल हो गया है कि मीडिया का अनुसरण नेता कर रहे हैं या नेताओं का अनुसरण मीडिया। नाव पर गाड़ी है या गाड़ी पर नाव। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से जब उनके गठबंधन के सहयोगी लालू यादव से जुड़े सवाल पर प्रतिक्रिया मांगी जाती है तो वे पूरे मामले से ही अनभिज्ञता जाहिर करते हुए बेहद भोलेपन के साथ यह दलील देते हैं कि जब तक मीडिया नहीं बताएगा तब तक वे किसी भी मामले के बारे में कैसे जान सकते हैं। यानि सुशासन बाबू के नाम से प्रसिद्ध नितीश को यह स्वीकार करने से कोई परहेज नहीं हैं कि उनकी सियासत मीडिया का अनुसरण करते हुए ही आगे बढ़ रही है। दूसरी ओर मीडिया से तो वैसे भी यही अपेक्षा की जाती है कि वह नेताओं का अनुसरण करते हुए ना सिर्फ उन पर बारीकी से नजर रखे बल्कि उनकी पूरी हकीकत बिना किसी लाग लपेट के ज्यों का त्यों सार्वजनिक कर दे। इस लिहाज से देखा जाये तो मीडिया का काम ही है नेताओं का अनुसरण करना। लेकिन नितीश सरीखे नेता जब अपनी सियासी गाड़ी को मीडिया के नाव पर लाद कर चुनावी भवसागर पार करने की मुहिम में जुट जाते हैं तो यह पता करना मुश्किल हो जाता है कि आखिर कौन किसकी सवारी कर रहा है या कौन किसका अनुसरण कर रहा है। खैर, मसला यह नहीं है कि कौन किसकी सवारी कर रहा है बल्कि सवाल तो यह है कि सवारी का सवार सही दिशा में आगे बढ़ रहा है या नहीं। अगर रास्ता सही मंजिल की ओर जा रहा हो तो सवार या सवारी का मसला गौण हो जाता है लेकिन जब मंजिल कहीं और हो और राहेगुजर किसी और ही दिशा की ओर ले जा रहा हो फिर तो सवार और सवारी का सवाल उठना लाजिमी ही है। इस कसौटी पर परखा जाये तो इन दिनों जहां एक ओर मीडिया का जमीन से जुड़ाव लगातार कमजोर होता दिख रहा है वहीं नेताओं की भी मीडिया पर निर्भरता लगातार बढ़ती जा रही है। नेताओं का जनता से सीधा जुड़ाव कमजोर पड़ने का ही नतीजा है कि जिस व्यापम घोटाले को तूल देकर संसद से सड़क तक कांग्रेस ने भारी कोहराम मचाया हुआ था उसी मसले की आंधी के बीच हुए मध्य प्रदेश के जिन दस स्थानीय निकायों के चुनाव परिणाम सामने आये हैं उनमें से उसे महज एक ही जीत नसीब हुई है। जबकि पहले इनमें से छह निकायों पर कांग्रेस का ही कब्जा था। जाहिर है कि अगर व्यापम की जमीन इस कदर बंजर साबित होने के बारे में कांग्रेस को पहले से अंदाजा होता तो वह हर्गिज इस मसले को राष्ट्रीय स्तर पर इतने जोर-शोर से तूल नहीं देती। इसी प्रकार भाजपा का भी जमीन से जुड़ाव कमजोर होने का ही नतीजा है कि भूमि अधिग्रहण विधेयक में संशोधन के प्रस्ताव का जो प्रारूप इसने पेश किया उसके प्रति समूचे देश में भारी प्रतिक्रिया होने के बावजूद वह उसे मनचाहे स्वरूप में संसद से पारित कराने की जिद पर लगातार अड़ी रही। हालांकि विरोधियों, सहोदरों व साथियों द्वारा समाझाए जाने के बाद उसे समय रहते यह एहसास हो गया कि इस मामले में मनमानी का जमीनी स्तर पर भारी खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। तभी तो जहां एक ओर सर्वसम्मति कायम करने की आड़ लेकर उसने विधेयक के प्रारूप में व्यापक बदलाव का फैसला कर लिया है वहीं दूसरी ओर इस पूरे मामले को बिहार विधानसभा चुनाव तक के लिये ठंडे बस्ते के हवाले करने से भी परहेज नहीं बरता गया है ताकि इसका चुनावी नुकसान झेलने से बचा जा सके। इन तमाम मसलों को समग्रता में देखा जाये तो ना तो राजनीतिक दलों व नेताओं ने इन दिनों किसी भी मसले के जमीनी असर का आंकलन करने की जहमत उठायी है और ना ही मीडिया ने जमीनी तौर पर मुआयना करके विवादास्पद मसलों के प्रति आम लोगों की भावना को सही तरीके से उजागर करना जरूरी समझा है। ऐसे में सियासी पार्टियों द्वारा जनभावना के विपरीत खड़ा किये गये तूफान को ही मीडिया भी हवा देती रही और जमीनी परिणाम के प्रति दोनों एक दूसरे पर ही निर्भर रहे। इसका खामियाजा कांग्रेस को मध्य प्रदेश में भुगतना पड़ा है जबकि भाजपा को भी भूमि विधेयक के मसले पर नीचा देखना पड़ा है। अब ऐसी ही हरकत बिहार में नितीश भी करते दिख रहे हैं। भाजपा की उड़ाई अफवाह को तूल देकर मीडिया ने लालू की छवि जंगलराज के महानायक की बना दी तो नितीश ने भी उनके साथ अपनी छवि को जोड़ने से परहेज बरत लिया। आलम यह है कि लालू के समर्थकों का वोट तो नितीश को चाहिये लेकिन लालू की छवि का लोड उठाने के लिये वे कतई तैयार नहीं हैं। नतीजन दोनों के रिश्तों का रायता अब सड़क पर फैलना शुरू हो गया है। खैर, अपेक्षित तो यही है कि नेता और मीडिया दोनों ही जमीनी जुड़ाव को लगातार मजबूत करके आगे बढ़ें और कोई भी एक दूसरे के झांसे में ना आए। लेकिन इन दिनों जिस तरह से जमीनी हकीकतों को नजरअंदाज करके दोनों की परस्पर एक दूसरे पर निर्भरता में लगातार इजाफा देखा जा रहा है उसका नकारात्मक परिणाम मीडिया की विश्वसनीयता पर तो पड़ ही रहा है परंतु असली खामियाजा तो नेताओं को ही झेलना पड़ेगा जिनका अस्तित्व ही हर चुनाव में दांव पर रहता है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’