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सोमवार, 15 अक्टूबर 2018

‘देने में दिक्कत मगर लेने को लालायित’

कहते हैं कि समूचा संसार लेन-देन पर ही टिका हुआ है। ग्रंथों में पुनर्जन्म और कर्म-फल का जो सिद्धांत बताया गया है वह भी व्यवहारिक तौर पर लेन-देन से ही जुड़ा हुआ है। लिहाजा बात चाहे व्यक्ति की हो या प्रकृति की। लेन-देन में संतुलन बनाए रखना आवश्यक भी है, अपेक्षित भी और अनिवार्य भी। लेकिन प्रकृति के इस सनातन सत्य को झुठलाने में जुटे हैं दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल। वे सिर्फ लेना चाहते हैं, लेकिन बदले में कुछ देना उन्हें कतई गवारा नहीं होता। हालांकि यह इंसानी फितरत है कि जहां से उसे पाने की उम्मीद होती है वहां पूरी झोली खोलकर बैठ जाता है लेकिन जब देने की बारी आती है तो जेब में बटुआ इस बुरी तरह अटक जाता है कि निकाले नहीं निकलता। लेकिन फिर भी लोग कुछ पाने के लिये कुछ ना कुछ देते ही हैं। बेशक मन मसोसकर, पूरी तरह जांच परख कर और जमकर मोल-भाव करने के बाद ही सही। लेकिन केजरीवाल की रीत उल्टी है। उनकी नीति तो यही दिखाई पड़ती है कि अव्वल तो किसी को कुछ नहीं देना और जिससे कुछ पाना है उसे तो निश्चत ही कुछ भी नहीं देना। मिसाल के तौर पर केजरीवाल साहब अपनी आम आदमी पार्टी का राष्ट्रीय स्तर पर प्रसार करने के लिये बुरी तरह लालायित हैं। खास तौर से उत्तर प्रदेश पर उनकी पैनी नजरें गड़ी हुई हैं। हो भी क्यों ना। आखिर लोकसभा का चुनाव लड़ने वे भी तो पहुंचे ही थे वाराणसी। लेकिन उसमें मिली हार की टीस आज भी कहीं ना कहीं उनके दिल को कचोट रही होगी। तभी अब वे संभल कर काम कर रहे हैं। फिलहाल उनकी पार्टी की सक्रियता दिल्ली से सटे पश्चिमी यूपी के इलाकों में अधिक देखी जा रही है। इनकी दिली-ख्वाहिश है कि दिल्ली वालों की तरह इस इलाके के लोग भी इन्हें ही अपना नेता मानें और इनकी ही पार्टी के पक्ष में मतदान करें। लेकिन इसके बदले में वे यहां के लोगों को कुछ भी नहीं देना चाहते। यहां तक कि इन इलाकों के लोगों को पहले से ही दिल्ली में पढ़ाई और दवाई की जो सहूलियत मिली हुई उस पर भी इन्होंने अंकुश लगा दिया। बकायदा सरकारी आदेश जारी कर दिया गया कि दिल्ली सरकार के अस्पतालों में दिल्ली के मतदाताओं को ही इलाज में प्राथमिकता दी जाए और इसके अलावा किसी को भी मुफ्त जांच, दवा या भर्ती की सहूलियत ना दी जाए। चुंकि यह आदेश यूपी से सटे दिल्ली के कड़कड़डूमा इलाके में स्थित गुरू तेगबहादुर अस्पताल में भी लागू हुआ जिसकी सीधी मार पश्चिमी यूपी के लोगों पर ही पड़ी क्योंकि उनके पास दिल्ली का मतदाता पहचान पत्र नहीं होने के कारण पहले से चल रहा इलाज भी रोक दिया गया। खैर, गनीमत रही कि अब दिल्ली उच्च न्यायालय ने राजधानी को मिनी इंडिया का नाम देते हुए यहां इस तरह के तुगलकी फरमानों को लागू करने से इनकार कर दिया है। लेकिन अदालत के इस इनकार के बावजूद केजरीवाल सरकार यूपी के लोगों को चिकित्सा की सहूलियत से वंचित करने के लिये अब सुप्रीम कोर्ट का रूख करने की बात कह रही है। यानि यूपी के लोगों से उन्हें अपेक्षाएं तो भरपूर हैं लेकिन स्वेच्छा से सुई के नोंक बराबर सहूलियत देना भी गवारा नहीं है। खैर, उनके इस कदम को दिल्ली वालों के हित में बताकर मामले के दूसरे पहलू को उजागर किया जा सकता है। लेकिन वह भी तब किया जा सकता था जब वे दिल्ली के लोगों को ही सरकारी खजाने से कुछ सहूलियत देना गवारा करते। इस लिहाज से देखें तो केजरीवाल की रीति-नीति की कलई तेल के खेल में पूरी तरह खुल गई है। दरअसल बीते दिनों दिल्ली, यूपी, पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ की एक संयुक्त बैठक हुई जिसमें तय हुआ कि इन पांचो जगह डीजल-पेट्रोल की कीमतें एक समान की जाएंगी ताकि आम लोगों को राहत मिल सके। लेकिन जब केन्द्र सरकार ने डीजल-पेट्रोल की कीमतों में ढ़ाई रूपए की कटौती करते हुए राज्य सरकारों से भी ढ़ाई रूपये की कमी करने की गुजारिश की तो बाकी राज्यों ने तो लोगों को पांच रूपये प्रति लीटर की राहत दे दी लेकिन केजरीवाल सरकार ने अपनी ओर से लोगों को राहत देने के बजाय ऐसा शगूफा छोड़ दिया जिससे लगे कि वह आम लोगों को राहत दिलाने के लिये बुरी तरह परेशान है। केजरीवाल ने केन्द्र की ओर से की ढ़ाई रूपये की कटौती को नाकाफी बताते हुए मांग कर दी कि उसे कम से कम दस रूपये प्रति लीटर की कटौती करनी चाहिये। अपनी ओर से वैट में कटौती करने के बजाय वे चारों ओर ढ़ोल बजाते फिर रहे हैं कि केन्द्र ने लोगों को बेवकूफ बनाया है वर्ना अगर वाकई उसे लोगों की परवाह होती तो वह ढ़ाई के बजाय दस रूपये की कटौती करता। यानि देना कुछ नहीं और गाल बजाना जोर-शोर से। देने के नाम पर तो उनके हाथ तो दिल्ली के उन सफाई कर्मचारियों का वेतन भी आसानी से नहीं निकलता जिनकी पहचान यानि झाड़ू को इन्होंने अपनी पार्टी का चुनाव निशान बनाया हुआ है। नतीजन आए दिन यहां कूड़ा-कचरा उठानेवालों की हड़ताल होती रहती है और पूरी राजधानी सड़ांध मारते कूड़े का ढ़ेर दिखाई पड़ती है। लेकिन मसला है कि केजरीवाल को समझाए कौन? क्योंकि वह ऐसे समुदाय से आते हैं जो किसी को गाली देने से पहले भी सौ-बार सोचता है कि- देना क्यूं?  ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर #Navkant_Thakur

सोमवार, 22 जनवरी 2018

‘हाय, आप ने यह क्यों किया...??’

‘हाय, आप ने यह क्यों किया...??’    


इन दिनों लावारिस फिल्म का वह गाना जब भी याद आता है तो दिल्ली में सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी यानि आप का ही खयाल आता है कि, आप का क्या होगा, जनाबे आली...। जिन 21 विधायकों को आप नेे संसदीय सचिव के पद पर नियुक्त किया था उनमें से एक ने पंजाब चुनाव से पहले खुद ही इस्तीफा दे दिया और उस सीट पर हुए उप-चुनाव में भाजपा के सहयोग से अकाली दल ने जीत दर्ज करा ली। बाकी बचे बीस विधायकों की विधानसभा से सदस्यता रद्द किए जाने का प्रस्ताव चुनाव आयोग द्वारा राष्ट्रपति के पास भेज दिए जाने के बाद अब इन माननीयों की कुर्सी जमींदोज होने की महज औपचारिकता ही बाकी बची है। अदालत ने भी चुनाव आयोग की सिफारिश पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया है। ऐसे में ये बीस भी अब निपटे हुए ही माने जा रहे हैं। हालांकि बीस विधायकों का समर्थन हट जाने के बावजूद दिल्ली में आप की सरकार को फिलहाल कोई खतरा नहीं दिख रहा क्योंकि सूबे की सत्तर सदस्यीय विधानसभा में बहुमत का आंकड़ा छत्तीस का है जबकि इन बीस विधायकों को अलग भी कर दें तो विधानसभा में आप के 46 विधायक बचते हैं। लेकिन बड़ा सवाल है कि आखिर ऐसी नौबत ही क्यों आई कि पार्टी को अपने बीस विधायक कुर्बान कराने पड़े। वह भी लाभ के पद की बंदरबांट के कारण। जाहिर है सवाल तो उठेंगे ही। अपने विधायकों को संतुष्ट करने के लिए चोर दरवाजे से सत्ता की मलाई में हिस्सेदारी देने की जो रणनीति अपनाई गई वह दिल्लीवालों के लिए आप से तो कतई अपेक्षित नहीं थी। क्योंकि यह वही आप है जिसने अलग तरह की राजनीति करने का वायदा करके सार्वजनिक जीवन में पदार्पण किया था। बात-बात में जनादेश लेने, हर काम पारदर्शिता से करने, जनता की सहभागिता से सरकार ही नहीं बल्कि संगठन भी चलाने, सत्ता मिलने पर सरकारी बंगला, गाड़ी व अन्य सुख-सुविधाएं नहीं लेने, साप्ताहिक तौर पर जनता दरबार लगाने, जनता को राजा बनाने और खुद सेवक बनकर काम करने सरीखे ना जाने कितने ऐसे वायदे किए थे अरविंद केजरीवाल ने। उस वक्त जब उन्होंने अन्ना हजारे के जनलोकपाल आंदोलन की जमीन कब्जा करके आप का गठन करते हुए सक्रिय राजनीति में कदम रखा था। ऐसे में स्वाभाविक है कि जिन लोगों ने केजरीवाल की उन बातों पर भरोसा करके उनके साथ जुड़ने या उन्हें अपना सहयोग व समर्थन देने की पहल की थी वे आज ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। अपेक्षाओं की उपेक्षा का सवाल पिछले दिनों तब भी उठा था जब आप ने उन लोगों को राज्यसभा का टिकट नहीं दिया जो वाकई इसके हकदार थे। आप ने अपने जिन तीन उम्मीदवारों को राज्यसभा में भेजा है उस सूची का सबसे पहला नाम ही केजरीवाल के पुराने सखा कहे जाने वाले उन संजय सिंह का है जिन पर पंजाब विधानसभा चुनाव के समय पैसे लेने से लेकर तमाम तरह के गंभीर आरोप लगे जिसके चलते पार्टी ने उन्हे बीच अभियान में प्रदेश इंचार्ज के पद से किनारे कर दिया था। दूसरा नाम दिल्ली के एक बड़े व्यवसायी सुशील गुप्ता का है जो पिछले कुछ माह तक कांग्रेस में थे और वर्ष 2013 में मोतीनगर से कांग्रेस के टिकट पर विधानसभा का चुनाव भी लड़ चुके हैं। इसी प्रकार तीसरा नाम चार्टर्ड एकाउंटेंट नारायण दास गुप्ता का है जो अब तक आम आदमी पार्टी की खाता-बही संभालते रहे हैं और पार्टी पर चंदे व फंड की गडबड़ियों के जितने भी आरोप लगे उस सबका कर्ता-धर्ता उन्हें ही बताया जाता है। यानि तीनों नाम ऐसे ही सामने आए जिससे पार्टी की नीति और नीयत को लेकर जिनके विश्वास को गहरा सदमा लगा उनमें आप के कई विधायक, वरिष्ठ-कनिष्ठ जमीनी नेताओं की बहुत बड़ी जमात और पार्टी से खदेड़े जा चुके संस्थापकों के अलावा दिल्ली की वह जनता भी है जिसने बदलाव, सुधार व बेहतरी की आशा में बड़ी उम्मीदों के साथ प्रदेश की 70 में से 67 सीटों पर केजरीवाल के प्रत्याशियों को जीत दिलाई थी। वह भी तब जबकि उससे कुछ माह पूर्व हुए मतदान में त्रिशंकु विधानसभा का गठन होने के बाद महज 49 दिन तक कांग्रेस के समर्थन से सरकार चलाने में ही केजरीवाल की सांस फूल गई थी और उन्होंने दिल्ली का भविष्य दांव पर लगाकर मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। लेकिन लोकसभा चुनाव में वाराणसी की जनता द्वारा खारिज किए जाने के बाद दोबारा केजरीवाल दिल्ली वापस लौटे और यहां की गलियों में घूम-घूमकर लोगों से सार्वजनिक तौर पर माफी मांगी। लोकलुभावन वायदों की झड़ी भी लगाई और ऐसा प्रचारित किया मानो अब अगर उन्हें दिल्ली की जनता ने दोबारा मौका दिया तो वे प्रदेश में रामराज ला देंगे। ऐसा रामराज जहां जनता होगी मालिक और सेवक होंगे नेता। लेकिन सत्ता का स्वाद चखते ही आप के तेवर और कलेवर में ऐसा परिवर्तन आया कि लोग ठगे से रह गए। संवैधानिक तौर पर जितनी कुर्सी बांट सकते थे उसके अलावा भी तमाम ओहदों व पदों की बंदरबांट हुई और जब कुछ नहीं सूझा तो 21 विधायकों को संसदीय सचिव ही बना दिया। अब दलील दे रहे हैं कि संसदीय सचिवों ने कोई कमाई नहीं की। लेकिन सवाल है कि अगर कोई आदमी किसी मकान में अवैध तरीके से घुसने के बाद पकड़ा जाए तो क्या उसे इसलिए बच निकलने का मौका दिया जा सकता है क्योंकि उसने चोरी नहीं की है। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’ @नवकांत ठाकुर #Navkant_Thakur

शुक्रवार, 28 अप्रैल 2017

‘परिणाम के कारणों को टटोलने की जरूरत’

‘परिणाम के कारणों को टटोलने की जरूरत’

बिना किसी कारण के कोई परिणाम सामने नहीं आता और हर परिणाम के पीछे कोई ना कोई कारण अवश्य छिपा होता है। यह और बात है कि अक्सर परिणाम के पीछे छिपे असली कारण को स्वीकार करने की हिम्मत बहुत कम लोग ही दिखा पाते हैं। मिसाल के तौर पर दिल्ली के तीनों नगर निगम के चुनावों का जो नतीजा सामने आया है उसके असली कारण को स्वीकार करने के बजाय आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं से लेकर जमीनी कार्यकर्ताओं की टोली अलग सुर में अपनी रामायण बांच रही हो लेकिन आम दिल्लीवासियों को इसमें कुछ भी अप्रत्याशित, अस्वाभाविक या अनपेक्षित नहीं लगा है। दूसरे शब्दों में कहें तो अगर आम आदमी पार्टी को वाकई इस परिणाम का असली कारण समझ में नहीं आ रहा है तो इससे एक बात तो स्पष्ट है कि उसका जमीन से जुड़ाव नहीं रह गया है। निश्चित तौर पर यह संवादहीनता की स्थिति ही कही जाएगी जिसमें ना तो लोगों की बातें पार्टी समझ पा रही है और ना ही पार्टी की बातें लोगों की समझ में आ रही है। नतीजन लोगों को लग रहा है कि पार्टी की नजर में उनकी सोच और संवेदना की कोई अहमियत नहीं है लिहाजा स्वाभाविक तौर पर दिल्लीवालों ने पार्टी को स्वीकार करने से इनकार कर दिया है। वर्ना ऐसा भी नहीं है कि इस पार्टी की सरकार ने दो साल में कोई काम ही ना किया हो। ‘बिजली का बिल हाफ और पानी का बिल माफ’ करने का चुनावी वायदा इसने पहले ही पूरा कर दिया है। मोहल्ला क्लीनिक के कारण स्वास्थ्य व चिकित्सा सुविधाओं में आए क्रांतिकारी परिवर्तन की यशगाथा कई विकसित देशों की मीडिया भी गा रही है। इसके अलावा पेयजल की आपूर्ति का दायरा बढ़ाने से लेकर जगह-जगह मुफ्त पेयजल की मशीनें भी लगाई गई हैं। भले ही मुफ्त वाई-फाई उपलब्ध कराने के चुनावी वायदे को पूरा करने और सार्वजनिक परिवहन की बिगड़ती स्थिति को सुधारने की दिशा में ‘बातें भरपूर और काम नदारद’ की हो लेकिन सरकारी स्कूलों की स्थिति में काफी सुधार हुआ है। यानि समग्रता में देखें तो बेशक प्रचंड बहुमत के साथ जुड़ी हुई भारी जन-अपेक्षाओं को पूरा करने में सरकार को कामयाबी नहीं मिली हो लेकिन ऐसा भी नहीं है कि सत्ता संभालने के बाद सरकार ने कोई काम ही नहीं किया है। जाहिर है कि अभी अपने वायदों को पूरा करने के लिए केजरीवाल सरकार के पास तीन साल का वक्त बाकी है और उम्मीद की जा सकती है कि काम-काज की मौजूदा रीति-नीति आगे भी जारी रहेगी और नित नए क्षेत्रों में लोगों को राहत मुहैया कराने में भी सरकार कतई कोताही नहीं बरतेगी। लेकिन मसला है कि इन तमाम हकीकतों के बावजूद अगर तीनों ही निगमों में पार्टी को काफी बड़े अंतर से दूसरे नंबर पर रहने के लिए मजबूर होना पड़ा है और वह भाजपा को टक्कर देने की स्थिति में भी कहीं दिखाई नहीं पड़ी है तो इसकी कोई तो वजह अवश्य होगी। जरूरी नहीं है कि किसी एक वजह से ही जनता ने केजरीवाल के नेतृत्व को नकारने की पहल की है बल्कि इसकी कई वजहें अवश्य हैं जिसके कारण ‘काम का दाम’ इस सरकार को नहीं मिल पाया है। वाकई कहीं ना कहीं यह सरकार जमीन से कट सी गई है और आम लोगों की सरकार देने का जो वायदा किया गया था उसे पूरा करने के बजाय सरकार के शीर्ष संचालकों ने इस तरह की कार्यशैली अपनाई जिससे तानाशाही का आभास होने लगा। पहले तो संगठन में जिस तरह से प्रशांत भूषण और योगेन्द्र यादव सरीखे संस्थापक सदस्यों को बुरी तरह बेआबरू करके दूध की मक्खी की तरह निकाल फेंका गया उससे लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति आप की बेपरवाही का ही संदेश गया। उसके बाद अपने कार्यक्षेत्र के दायरे को बढ़ाने के लिए केन्द्र सरकार व उपराज्यपाल के साथ रोजाना की लड़ाई ठाने जाने से यही संदेश गया कि इन्हें जो जिम्मेवारी मिली है उसे पूरा करने से बचने का बहाना तलाशा जा रहा है। रही-सही कसर ऊटपटांग बयानबाजी ने निकाल दी और जनभागीदारी की नीति का विसर्जन करके सरकार ने खुद को एक ऐसी कोठरी में बंद कर लिया जहां तक लोगों की सीधी नजर पहुंच ही नहीं पा रही थी। जो पैसा दिल्ली के विकास पर खर्च होना चाहिए था उसे पार्टी के प्रचार पर खर्च किया जाना, जनता से जुड़ने की हर राह को अपनी ओर से बंद कर लेना, सत्ता संचालन की नीतियों का निर्धारण करने के क्रम में वैधानिक व्यवस्थाओं की अनदेखी करना, संवाद के बजाय विवाद खड़ा करके अपनी बात लोगों तक पहुंचाने की कोशिश करना, पार्टी का विस्तार करने के लिए दिल्लीवासियों का दिल तोड़कर अन्य सूबों में अपनी पूरी ताकत झोंकना, नियुक्ति व स्थानांतरण की प्रक्रिया में मनमाने फैसले करते हुए पारदर्शिता व संवैधानिकता की अपेक्षाओं को अंगूठा दिखाना और अपनी ही कही बात से आपियों का बार-बार पलटना दिल्लीवासियों को इस कदर नागवार गुजरा कि उन्हें ठगे जाने का एहसास हो चला। नतीजन जनता द्वारा पार्टी को नकारा जाना तो पहले ही तय हो चुका था और इसकी झलक राजौरी गार्डन विधानसभा के उपचुनाव में ही दिख गयी थी। खैर, सियासत में कोई हार या जीत अंतिम नहीं होती और असीमित संभावनाओं का खेल ही राजनीति है। लिहाजा आवश्यकता है अपनी कमियों, खामियों व गलतियों को पहचान कर उनमें सुधार लाने की ताकि भविष्य को बेहतर किया जा सके। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर #Navkant Thakur

गुरुवार, 24 दिसंबर 2015

‘जाके प्रभु दारूण दुख देहीं, वाकी मति पहिले हर लेहीं’

‘मतिभ्रम तोर प्रगट मैं जाना’

नवकांत ठाकुर
कहते हैं कि ‘जाके प्रभु दारूण दुख देहीं, वाकी मति पहिले हर लेहीं।’ तभी तो बुरा वक्त आने पर खुद से ही ऐसी गलतियां होनी शुरू हो जाती हैं जिसका परिणाम बेहद ही नकारात्मक निकलता है। मिसाल के तौर पर इन दिनों अपनों से लेकर परायों तक के निशाने पर आये दिख रहे अरूण जेटली सरीखे मौजूदा दौर के चाणक्य कहे जानेवाले नेता ने भी विपरीत व असहज स्थिति में उलझने के बाद एक के बाद लगातार इतनी गलतियां कर दी हैं कि इसे अपने पैर पर खुद कुल्हारी मारना ही माना जाएगा। बीते कई सालों से जिन आरोपों के पुलिंदे को हथियार के तौर पर इस्तेमाल करते हुए कीर्ति आजाद द्वारा लगातार किये जा रहे हमलों से जेटली का बाल भी बांका नहीं हो रहा था उन्ही आरोपों की चंद चिंदियां अरविंद केजरीवाल के दल एएपी द्वारा सार्वजनिक तौर पर उड़ाये जाने के बाद से ही परिस्थितियों ने ऐसी पलटी मारी है कि अब सियासी हलकों में उनकी इमानदारी व शुचिता पर गंभीर सवालिया निशान लगने शुरू हो गये हैं। कोई उनके खिलाफ लगाये जा रहे आरोपों की संयुक्त संसदीय समिति से जांच कराये जाने की मांग कर रहा है तो कोई उन्हें निर्दोष साबित होने तक अपने पद का परित्याग करने की सलाह दे रहा है। एएपी ने दिल्ली की सत्ता का इस्तेमाल करते हुए आरोपों की जांच के लिये आयोग गठित कर दिया है वहीं दूसरी ओर बकौल प्रधानमंत्री, कांग्रेस ने इस मसले को तूल देकर सरकार की छवि पर भ्रष्टाचार की कालिख चस्पां करने का अभियान छेड़ दिया है। इसमें संगठन व सरकार ने औपचारिक तौर पर जेटली के पक्ष में अपनी आवाज बुलंद करने में कोई कोताही नहीं बरती है और संसद के शीतसत्र का अवसान होने के फौरन बाद ही कीर्ति को पार्टी विरोधी गतिविधियों के लिये संगठन से निलंबित करते हुए उन्हें चैदह दिनों के भीतर इस बात का जवाब देने के लिये कहा गया है कि क्यों ना उन्हें पार्टी से निष्कासित कर दिया जाये। यानि संगठन ने कीर्ति पर सख्ती की तलवार चला दी है और जेटली ने भी खुद पर भ्रष्टाचार की कालिख उछालनेवालों पर दस करोड़ रूपये की मानहानि का दावा अदालत में दायर कर दिया है। जाहिर है कि इन तथ्यों के नजरिये से देखा जाये तो ना सिर्फ सरकार से लेकर संगठन तक ने जेटली के पक्ष में मजबूत किलेबंदी कर दी है बल्कि विरोधियों को अदालत में घसीटकर जेटली ने अपनी नैतिक व व्यावहारिक शुचिता प्रमाणित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। लेकिन मसला यह है कि सियासत सिर्फ तथ्यों पर निर्भर नहीं होती। इसमें छवि का बड़ा महत्व होता है। मोदी सरीखे नेता अपने पूरे चुनावी अभियान में एक बार भी जयश्रीराम का नारा नहीं लगाने के बावजूद हिन्दू हृदय सम्राट माने जाते हैं जबकि राम मंदिर आंदोलन में अग्रणी भूमिका निभानेवाले लालकृष्ण आडवाणी को 2009 के लोकसभा चुनाव में बहुसंख्यकों ने सिरे से नकार देना ही बेहतर समझा। मौजूदा मामले में भी जब तक जेटली ने खुद पर लग रहे आरोपों को गंभीरता से नहीं लिया तब तक कीर्ति के आरोप भी बासी लग रहे थे और ‘मारो और भागो’ की सियासत करनेवाले केजरीवाल को भी इस मामले में अधिक गंभीरता से नहीं लिया जा रहा था। लेकिन जैसे ही जेटली ने जुलूस के साथ जाकर आरोप लगानेवालों पर अदालत में मानहानि का दावा किया वैसे ही यह पूरा मामला समूचे देश में चर्चा का विषय बन गया। यहां तक कि भाजपा संगठन के भीतर भी इस मामले के उछलने से कईयों का दिल बाग-बाग हो गया। तभी तो जब संसद में जेटली के खिलाफ औपचारिक तौर पर अपनी बात रखने के लिये कीर्ति ने शून्यकाल में अपने दिल की बात कहने के हक का इस्तेमाल किया तो उस दौरान पार्टी के किसी सांसद ने दिखावे के लिये भी उनको रोकना या टोकना जरूरी नहीं समझा। अब आलम यह है कि जेटली की नैतिकता, शुचिता व इमानदारी पर सवाल उठने शुरू हो गये हैं। कोई भी यह मानने के लिये तैयार नहीं है कि उनके डीडीसीए का अध्यक्ष रहते हुए 140 करोड़ की लागत से तैयार हुए विश्वस्तरीय फिरोजशाह कोटला स्टेडियम के निर्माण में कोई घपला-घोटाला नहीं हुआ है। यानि तथ्यों के आधार पर जेटली भले ही खुद को मजबूत मान रहे हों लेकिन उनकी छवि पर तो बट्टा लगा ही है। अब बाकी मुद्दे गौण हैं और जेटली की शुचिता पर राष्ट्रीय बहस जारी है। पार्टी में भी अब यह बहस तो शुरू होगी ही कि क्या किसी नेता पर सिर्फ इसलिये उंगली नहीं उठायी जा सकती क्योंकि वह अपने दल का है? राष्ट्रहित को तरजीह देते हुए उसके खिलाफ उपलब्ध भ्रष्टाचार से जुड़े तथ्यों को सार्वजनिक करने पर अगर पार्टी से निलंबन व निष्कासन का सामना करना पड़े तो ‘राष्ट्र प्रथम, संगठन दोयम और स्वयं निम्नतम’ के नारे का दिखावा क्यों? यानि इस मामले में जितने भी कदम उठाये गये उनका असर अब यह हुआ है कि अव्वल तो भ्रष्टाचार में जेटली की संलिप्तता का मसला हर खासोआम की जुबान पर चढ़ गया है और दूसरे संगठन में वैचारिक व सैद्धांतिक स्तर पर नयी बहस व टकराव की स्थिति पैदा हो गयी है। दूसरे शब्दों में कहें तो कीर्ति को संगठन से भले ही निकाल दिया जाये लेकिन संगठन व सरकार की छवि पर लगा दाग अब लगातार पुख्ता ही होता जाएगा और जेटली के लिये स्थितियां दिनोंदिन असहज ही होती चली जाएंगी। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’

बुधवार, 2 दिसंबर 2015

‘गले क्या मिले, गले ही पड़ गये’

नवकांत ठाकुर
बशीर बद्र साहब फरमाते हैं कि ‘कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से, ये नये मिजाज का शहर है जरा फासले से मिला करो।’ यानि तपाक से किसी के भी गले लग जाने की फितरत वालों से जहां आम तौर पर लोग हाथ मिलाना भी मुनासिब नहीं समझते हों वहां अगर कोई गले लगने के बहाने किसी के गले पड़ जाये तो सामने वाले की स्थिति कितनी विचित्र हो सकती है इसकी सबसे बेहतरीन व ताजा मिसाल अरविंद केजरीवाल ही हैं। कहां तो ये यह सोचकर बिहार गये थे कि प्रादेशिक व राष्ट्रीय स्तर पर कायम हो रही गैरभाजपावादी सियासी मोर्चाबंदी में हिस्सेदारी करेंगे, अल्पसंख्यक समुदाय के स्थापित हितैषियों संग मंच साझा करके अपने वोटबैंक का भरोसा बरकरार रखेंगे, सूबाई स्तर पर सहयोगियों की तादाद में इजाफा करके राष्ट्रीय राजनीति में अपना वजूद-वकार मजबूत करेंगे, भाजपा विरोधी अभियान में बोली से सियासी गोली दागनेवाली टोली से मिल रहे अनवरत सहयोग के लिये उसका शुक्रिया अदा करेंगे और दिल्ली की अपनी सरकार को हल्के में नहीं लेने की केन्द्र को नसीहत भी देंगे। यानि अरमान तो बहुत पाले थे केजरीवाल ने लेकिन हुआ यूं कि लालू के साथ मंच पर गलबहियां करके ऐसे फंसे कि ना इधर के बचे ना उधर के रहे। भगवा खेमे ने उस गलबहियां की बड़ी-बड़ी तस्वीरों का बैनर-पोस्टर लगवाकर केजरीवाल की भ्रष्टाचार विरोधी साख पर सवालिया निशान लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। कांग्रेस ने भी मौके पर चैका ठोंकते हुए उनकी भ्रष्टाचार विरोधी सियासत को दिखावा साबित करना शुरू कर दिया। रही सही कसर पूरी करते हुए अन्ना आंदोलन के वे पुराने साथी भी जमकर जहर उगलने में जुट गये जिन्हें दिल्ली की सियासत पर केजरीवाल का कब्जा होने के बाद से सिर्फ रूसवाई की हाथ आयी है।  जाहिर है कि अपनी साख पर हो रहे इस चैतरफा हमले का माकूल जवाब तो इन्हें देना ही था। लेकिन जवाब देने की हड़बड़ी में वे यह कहकर और भी ज्यादा गड़बड़ी कर बैठे कि वे तो सिर्फ गैरभाजपाई गठजोड़ के प्रति समर्थन व्यक्त करने बिहार गये थे अलबत्ता लालू ने ही ना सिर्फ उन्हें गले लगा लिया बल्कि सियासी लड़ाई में एकजुटता दिखाने के लिये अपने साथ हाथ भी उठवा लिया जबकि वे तो लालू से हाथ भी नहीं मिलाना चाहते थे। अब ऐसी बात सुनकर इनके प्रति लालू का मन खट्टा होना तो स्वाभाविक ही है। नतीजन इनकी हालत यही हो गयी है कि ‘ना खुदा ही मिला ना विसाले सनम, ना इधर के रहे ना उधर के रहे।’ इस पर चुटकी लेते हुए अन्ना ने भी कह दिया है कि वह तो अच्छा हुआ कि केजरीवाल से उनका नाता पहले ही टूट गया वर्ना लालू के साथ इनकी गलबहियांवाली तस्वीर से उनकी साख पर भी बट्टा लग जाता। यानि देश की मौजूदा सियासी तस्वीर में एक बार फिर केजरीवाल पूरी तरह अकेले पड़ गये हैं। हालांकि लालू से इनका गले मिलना या लालू का इनके गले पड़ना, बात वही है कि चाकू तरबूज पर गिरे या तरबूज चाकू पर। गलबहियां प्रकरण में नुकसान केजरीवाल का ही होना था जो हुआ भी। हालांकि लालू के साथ गलबहियां की तस्वीर प्रचारित-प्रकाशित होने के कारण उठे तूफान को वे यह कहकर भी रफा-दफा कर सकते थे कि लालू की बिटिया और मुलायम सिंह यादव के पौत्र की शादी में शिरकत करते हुए नरेन्द्र मोदी ने जो शिष्टाचार निभाया वही दस्तूर निभाने के लिये ये भी लालू से गले मिल लिये। लेकिन विरोधियों की चैतरफा घेरेबंदी से बौखलाकर लालू के साथ अपनी वैचारिक, सैद्धांतिक व राजनीतिक दूरी का प्रदर्शन करने के क्रम में इन्होंने ऐसी बात कह दी जिसके नतीजे में हुए नुकसान को तो विध्वंस का नाम देना ही ज्यादा सही होगा। दूसरी ओर लालू ने केजरीवाल के साथ जैसी राजनीति की है वह तो सीधे तौर पर कूटनीतिक साजिश ही मानी जाएगी जिसके तहत दिल्ली में कांग्रेस की फसल काटनेवाले केजरीवाल की सैद्धांतिक व वैचारिक जड़ पर प्रहार करके उन्होंने राहुल गांधी का दिल जीतने की रणनीति बनायी थी। सूत्र बताते हैं कि अपने दोनों बेटों को सूबाई स्तर पर सियासत में स्थापित करने के बाद अब वे लोकसभा चुनाव में गच्चा खा चुकी अपनी बिटिया को कांग्रेस के सहयोग से राष्ट्रीय राजनीति में दाखिल कराने का ख्वाब बुन रहे हैं। जाहिर तौर पर अपनी कूटनीति में लालू पूरी तरह कामयाब रहे हैं जबकि केजरीवाल को इसका भारी नुकसान झेलना पड़ा है। खैर, समग्रता में देखा जाये तो इस पूरे घटनाक्रम से यह तो साबित हो ही गया है कि लगातार दो दफा दिल्ली के मतदाताओं का विश्वास जीतने में कामयाब रहने के बावजूद कूटनीतिक सियासत की शह-मात के खेल में केजरीवाल आज भी पूरी तरह कच्चे ही हैं। बहरहाल लालू से दूरी दिखाने के चक्कर में अपेक्षित व परंपरागत सियासी जुमला उछालने के बजाय सख्त बयान देकर केजरीवाल ने अपने समर्थकों को यह संदेश तो दे ही दिया है कि अगर सियासी तौर पर कभी कोई गलती हो जाये तो उस पर लीपापोती करने के बजाय साफ तौर पर सच को स्वीकारने में कतई हिचक नहीं दिखायी जानी चाहिये। हालांकि ऐसी सियासत से स्वाभाविक तौर पर तात्कालिक नुकसान, परेशानी व जगहंसाई अवश्य झेलनी पड़ती है लेकिन दूरगामी तौर पर इससे ना सिर्फ अपने समर्थकों के विश्वास को बरकरार रखा जा सकता है बल्कि विरोधियों की तमाम साजिशों से बच निकलकर अपनी ठोस छवि की चमक में इजाफा भी किया जा सकता है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’