कर्नाटक में जितना नाटक चुनाव से पहले हुआ, उतना ही चुनाव के दौरान हुआ और उससे भी अधिक चुनाव के बाद। दरअसल वहां का चुनावी नतीजा ही ऐसा है जिसमें हारा कोई नहीं है। सभी जीते ही हैं। सीटों की तादाद के लिहाज से भाजपा को जीत मिली है क्योंकि उसके खाते में सबसे अधिक 104 सीटें आई हैं। वोट के हिसाब से कांग्रेस जीती है क्योंकि उसे भाजपा के मुकाबले 1.8 फीसदी वोट अधिक मिले हैं। भाजपा को सूबे के 36.2 फीसदी मतदाताओं ने अपना वोट दिया है जबकि कांग्रेस की झोली में 38 फीसदी वोट हैं। इसके अलावा जीती तो वह जेडीएस भी है जिसने भाजपा और कांग्रेस के बीच हुई जोरदार कांटे की टक्कर में भी ना सिर्फ पूरी मजबूती के साथ अपना अस्तित्व कायम रखा है बल्कि कुल 37 सीटों पर कब्जा जमाते हुए दोनों राष्ट्रीय पार्टियों को बहुमत के आंकड़े से काफी पीछे ही रोक दिया है। यानि समग्रता में देखा जाये तो यह जनादेश ‘तुम्हारी भी जय-जय और हमारी भी जय-जय’ का ही है। पूरा मामला ‘ना तुम जीते ना हम हारे’ टाइप का होकर रह गया है। वैसे भी जब किसी एक को पूरी जीत मिल ही नहीं पाई है तो दूसरा उसकी जीत और अपनी हार को स्वीकार क्यों करे? ऐसे में जब कोई हार स्वीकार करने के लिये विवश ही नहीं है तो फिर यह घमासान होना तो स्वाभाविक ही है कि आखिर सरकार किसकी बने। मतदान होने तक तो तीनों ही पार्टियां एक दूसरे को हराने और निपटाने में ही जी-जान से पिली हुई थीं लेकिन जनादेश सामने आने के बाद की परिस्थितियों में तस्वीर पलट गई है। अब भाजपा का दावा है कि सरकार बनाने का पहला मौका उसे ही मिलना चाहिये क्योंकि सबसे बड़े दल के तौर पर उभरने में उसे ही सफलता मिली है और बहुमत के आंकड़े के सबसे करीब तक पहुंचने में उसे ही कामयाबी मिली है। लेकिन कांग्रेस का तर्क है कि अगर जनता ने भाजपा को सत्ता के संचालन का जनादेश दिया होता उसे अपने दम पर पूर्ण बहुमत मिल गया होता। लेकिन ऐसा तो हुआ नहीं है। बहुमत के आंकड़े से तो वह भी आठ पायदान नीचे है। ऐसे में मौजूदा विधानसभा में भाजपा के बजाय उसे सरकार बनाने का मौका मिलना चाहिये जिसे बहुमत के लिये आवश्यक तादाद में नवनिर्वाचित विधायक अपना समर्थन दें। इस लिहाज से कांग्रेस ने भाजपा की जीत का जायका बिगाड़ते हुए जेडीएस को अपना समर्थन दे दिया है जिसके नतीजे में इन दोनों दलों की संयुक्त ताकत बहुमत के आंकड़े के लिये आवश्यक आंकड़े से अधिक ही बैठती है। यानि एक ओर भाजपा ने भी सरकार बनाने के लिये कमर कस ली है और दूसरी ओर भाजपा के विजय रथ का पहिया पंचर करने के लिये कांग्रेस ने भी जेडीएस को बिना शर्त अपना समर्थन दे दिया है। दोनों ने राजभवन जाकर अपना दावा भी पेश कर दिया है और दोनों को इंतजार है सरकार बनाने के लिये राजभवन से बुलावे का। यानि गेंद चली गई है राज्यपाल वजूभाई वाला के हाथों में। उन्हें ही फैसला करना है कि किसे सरकार बनाने के लिये आमंत्रित किया जाये। निश्चित तौर पर राज्यपाल का फैसला ही अंतिम होगा जिसे चाहे-अनचाहे सबको स्वीकार भी करना ही होगा। लेकिन इस बीच बड़ा सवाल है कि आखिर इस जनादेश को निष्पक्षता व तटस्टस्था से किस रूप में समझा जा जाए। हालांकि इस बात में तो कोई शक ही नहीं है कि त्रिशंकु विधानसभा का जनादेश ऐसी ही सूरत में सामने आता है जब आम मतदाता भी विकल्प चुनने को लेकर किसी आम राय पर नहीं पहुंच पाते। उनके बीच भी असमंजस व द्वन्द्व की स्थिति रहती है। लेकिन तमाम उहापोह और असमंजस के बीच भी त्रिशंकु विधानसभा के लिए आए इस खंडित जनादेश के मायने बेहद ही स्पष्ट हैं। जनादेश को गहराई से परखा जाए तो इसका सबसे स्पष्ट मतलब यही है कि कांग्रेस को जनता ने सिरे से खारिज कर दिया है और उसे लगातार दूसरी बार सत्ता की बागडोर अपने हाथों में लेने का मौका नहीं दिया है। तभी तो सत्ता की दौड़ में उसे भाजपा से काफी नीचे के पायदान पर खड़ा होने के लिये विवश होना पड़ा है। हालांकि कांग्रेस ने चुपचाप इस जनादेश को शिरोधार्य कर लिया है। तभी तो पूरा नतीजा सामने आने से पहले ही सिद्धारमैया ने अपना त्यागपत्र राज्यपाल को सौंप दिया और कांग्रेस नेतृत्व ने भी पार्टी की सरकार बनाने की कवायदें शुरू करने से परहेज बरत लिया। वैसे यह कांग्रेस को भी बेहतर पता है कि उसके विकल्प के तौर पर जनता ने भाजपा को ही चुना है और जेडीएस को भी तीसरे पायदान पर रखते हुए स्पष्ट तौर पर विपक्ष में बैठने का ही निर्देश दिया है। यानि बहुमत के आंकड़े से दूर रह कर भी यह चुनाव भाजपा के लिये जीत की खुशखबरी लेकर ही आयी है। लेकिन सवाल है कि जब किसी एक दल या चुनाव-पूर्व गठबंधन को अपने दम पर पूर्ण बहुमत का लक्ष्य हासिल नहीं हो पाया है तो आखिर सरकार बनेगी कैसे? तभी तो कांग्रेस ने भाजपा को रोकने के लिये जेडीएस को समर्थन देने का दांव चल दिया है। यानि कर्नाटक का जो नाटक अभी सड़क पर चल रहा है वह राज्यपाल द्वारा किसी एक पक्ष को सरकार बनाने का निमंत्रण दिये जाने के बाद विधानसभा के भीतर बहुमत साबित होने तक बदस्तूर जारी रहेगा। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’
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गुरुवार, 17 मई 2018
गुरुवार, 14 दिसंबर 2017
‘एक हाथ से बजे न ताली’
‘एक हाथ से बजे न ताली’
गुजरात विधानसभा के चुनाव प्रचार पर विराम लगने के बाद अब थोड़ी शांति और आराम का समय उन सभी दलों के शीर्ष नेताओं को मिल गया है जो लंबी, थकाऊ और काफी हद तक उबाऊ चुनाव प्रचार में जी-जान से जुटे हुए थे। वाकई इस दौरान उन्हें सांस लेने की फुर्सत भी बमुश्किल ही मिल पा रही थी। आखिर मामला ही ऐसा था जिसमें एक तरफ कांग्रेस का भविष्य दांव पर था और दूसरी तरफ मोदी लहर का भविष्य। लिहाजा कांटे की टक्कर तो होनी ही थी। हालांकि चुनाव परिणाम का पलड़ा किस ओर झुकेगा इसके बारे में सबकी अपनी उम्मीदें हैं, अपने समीकरण हैं और अपने कयास हैं। स्वाभाविक तौर पर चुनावी नतीजों का बेसब्री से इंतजार भी सबको है। लेकिन चुनाव परिणाम के लिए हो रहे इंतजार के बीच एक बात तो माननी ही पड़ेगी कि टक्कर जोरदार हुई। जमकर प्रचार हुआ और दोनों ही पक्ष ने जमीन पर अपना जलवा बिखेरने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। कांग्रेस हो या भाजपा। दोनों ही दलों का पूरा शीर्ष नेतृत्व जमीन पर जमा हुआ नजर आया। पिछले 22 सालों से लगातार सूबे की सत्ता पर काबिज भाजपा को कांग्रेस ने किस कदर टक्कर दी है इसका सहज अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पिछले चुनावों तक दिल्ली से प्रचारकों का आयात करने में संकोच करने वाली गुजरात भाजपा इकाई ने इस बार संगठन से लेकर सरकार तक के तमाम चेहरों को सूबे की सियासत में झोंक दिया। कोई नाम ऐसा नहीं बचा जिसने गुजरात जाकर पसीना ना बहाया हो। जाहिर तौर पर ऐसी जोरदार टक्कर में लोगों की दिलचस्पी होनी ही थी। लेकिन दुर्भाग्य से इस पूरी सियासी रस्साकशी ने ना सिर्फ गुजरात के मतदाताओं को बल्कि देश के आम लोगों को भी बुरी तरह निराश किया। यह चुनाव सही मायने में आम लोगों से जुड़ ही नहीं पाया। आम लोगों की समस्याएं सतह पर आ ही नहीं पाई। पूरा चुनाव प्रचार ऐसे आभासी और बेमानी मसलों पर केन्द्रित हो गया जिससे आम लोगों का कोई लेना देना ही नहीं है। कायदे से तो इतनी जोरदार सियासी रस्साकशी में जन सरोकार के मसलों पर ही जोरदार बहस होनी चाहिए थी। सत्तारूढ़ पक्ष को अपने अब तक के काम-काज का लेखा-जोखा प्रस्तुत करना चाहिए था और विपक्ष को मौजूदा व्यवस्था व शासन-प्रशासन की कमियां-खामियां उजागर करते हुए अपनी ठोस भावी योजनाएं प्रस्तुत करनी चाहिए थी। लेकिन हुआ इसके उलट। ना सत्ताधारियों को अपने काम-काज का हिसाब पेश करने के लिए मजबूर किया जा सका और ना ही आम जन सरोकार के मुद्दे चुनाव में हावी हो सके। बल्कि अश्लील सीडी से शुरू हुई चुनावी गरमाहट मंदिर यात्रा के माध्यम से आगे बढ़ी और अंतिम समय में आकर अटकी गाली-गलौज व आभासी राष्ट्रवाद पर। दोनों पक्षों ने नकारात्मक चुनाव प्रचार की इंतहा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। किसी ने भी अपने उस पहलू को उजागर करके चुनाव प्रचार करने की कोशिश ही नहीं की जिससे प्रभावित होकर मतदाता उसकी ओर खिंचे चले आएं। बल्कि दोनों में इस बात की शर्त लगी दिखी कि कौन एक-दूसरे पर कितना अधिक कीचड़ उछाल सकता है। बात कभी निजी संबंधों को लेकर हुई तो कभी पहनावे को लेकर। पसंद-नापसंद पर भी कटाक्ष किए गए और मर्दानगी व नपुंसकता को भी जांच-परख का आधार बनाया गया। मेल-मुलाकातों को लेकर एक दूसरे पर निशाना साधा गया और अवकाश व पर्यटन की भी बात हो गयी। यहां तक कि कौन क्या खाकर काले से गोरा हो गया इस पर भी जोरदार चर्चा हुई। लेकिन किसी ने यह बताने की जहमत नहीं उठाई कि आम आदमी किस हाल में है। महंगाई ने किस कदर उसका जीना मुहाल किया हुआ है। विकास से रोजगार को जोड़ने में कामयाबी क्यों नहीं मिल पा रही। किसानों की बदहाली क्यों दूर नहीं हो रही। क्यों प्रधानमंत्री के गृह जिले में भी विकास का पूरा विस्तार नहीं हो पाया है। ऐसा कोई भी मुद्दा सिरे से उठ ही नहीं पाया जिससे आम आदमी सीधे तौर पर जुड़ सके। अलबत्ता राहुल गांधी ने सोशल मीडिया के माध्यम से जन सरोकार से जुड़े कुल चैदह सवाल अवश्य किये। लेकिन उन सवालों को जब कांग्रेसियों और मीडिया ने ही तवज्जो नहीं दी तो सत्तापक्ष ही क्यों इस को लेकर गंभीरता दिखाता। जब पूछनेवाला ही गंभीर ना हो तो बतानेवाले को क्या गर्ज पड़ी है गंभीरता दिखाने की। अलबत्ता इस चुनाव में शुचिता व मर्यादा की धज्जियां उड़ाने में सबने अपनी पूरी ऊर्जा झोंक दी। प्रधानमंत्री पद की गरिमा भी तार-तार हुई और इस पद की गरिमा को बचाने की सोच कहीं भी नहीं दिखी। यहां तक कि भाजपा और कांग्रेस जहां बाहर एक-दूसरे से लड़ते-भिड़ते व टकराते दिखे वहीं अंदरूनी तौर पर इन्हें अपने संगठन के भीतर आपस में भी विभिन्न स्तरों पर जूझना पड़ा। खुल कर भले कोई इसे स्वीकार ना करे लेकिन यह सर्वविदित तथ्य है कि कांग्रेस के भीतर भी राहुल को गुजरात को नाकाम करने की साजिशें जोरों पर चलती रहीं और भाजपाइयों का भी एक बड़ा तबका मोदी लहर की नाकामी में अपनी कामयाबी तलाशता दिखा। ऐसी बहुस्तरीय व बहुआयामी लड़ाई में शुचिता, प्रतिष्ठा और मर्यादा का तार-तार होना स्वाभाविक ही था। लेकिन इस तथ्य को नकारा भी नहीं जा सकता कि ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती। लिहाजा सूबे के चुनाव को इस निचले व छिछले स्तर पर ले जाने के लिए सभी बराबर के ही दोषी हैं। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’ @नवकांत ठाकुर #Navkant_Thakur
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मंगलवार, 7 मार्च 2017
संभावित खिचड़ी में रायते का जायका
संभावित खिचड़ी में रायते का जायका
खेल चल रहा है खुल्लम-खुल्ला। सब खेल रहे हैं। नेता खेल रहे हैं जनता के साथ और जनता खेल रही है नेताओं के साथ। मामला इस कदर गड्डमगड टाईप का हो गया है कि किसी की समझ में कुछ नहीं आ रहा कि कौन किसके साथ खेल-खेल रहा है। हर किसी को अपनी ही पौ-बारह होती दिखाई पड़ रही है। तभी तो सब जोश में हैं। जोश भी ऐसा कि इसमें होश के लिए कोई जगह ही नहीं बची है। चैतरफा शंखनाद से आसमान गुंजायमान है। तुरही बज रही है, ढ़ोल-नगारे बज रहे हैं। उसकी धुन पर नेता भी मदमस्त हैं और जनता भी। हर तरफ रंग ही रंग है, उमंग ही उमंग है। ‘को बड़-छोट कहत अपराधू’ की स्थिति है। आखिर हो भी क्यों ना। जब एक ही दिन और एक ही इलाके में आयोजित वजीरे-आजम के जनता दर्शन से लेकर यूपी के लड़कों की पगडंडी मार्च तक ही नहीं बल्कि तने-तंबू की छांव में आयोजित बहनजी की चैपाल तक में जनसैलाब का ऐसा उफान दिखाई दे कि तुलनात्मक तौर पर किसी एक आयोजन को सफलतम और बाकियों को दोयम साबित करने में बड़े-बड़ों के पसीने छूटने लगें तो फिर कागजी समीकरणों का ध्वस्तीकरण होना स्वाभाविक ही है। तभी तो सूबे की मौजूदा स्थिति को तयशुदा व परंपरागत फार्मूले के खांचे में फिट करते हुए शब्दों के सांचे में ढ़ालकर किसी निर्णायक स्वरूप में प्रस्तुत कर पाना उतना ही मुश्किल हो गया है जितना त्रिदेवों की तिकड़ी में से किसी एक को सर्वसम्मति से सर्वोत्तम बताना। ऐसे में सत्ता का वरण करने के लिये सात फेरों में हो रहे सप्तपदी चुनाव की अंतिम परिक्रमा संपन्न होने तक सबका जुनून सातवें आसमान पर होने को कैसे अस्वाभाविक कहा जा सकता है। उस पर तुर्रा यह कि महीना भी फागुन का है जिसमें सामान्य व हर तरह से ठीक-ठीक आदमी की मनोदशा बिल्कुल वैसी ही रहती है जैसी कार्तिक में कुत्ते, अगहन में भैंसे और चुनाव में नेताओं की होती है। यानि फागुन ने चढ़ा दिया है नीम को करेले पर। चुनाव के कारण नेता और फागुन के कारण मतदाता एक बराबर हो गए हैं। लिहाजा ना नेताओं की बात को लेकर जनता में ठोस खेमेबाजी या निर्णायक गोलबंदी हो रही है और ना ही किसी ठोस मुद्दे को लेकर नेताओं में आपसी उखाड़-पछाड़ का माहौल दिख रहा है। हर कोई अपना अलग ही सुर-ताल सुनाने में पिला है। जनता भी किसी एक की तान पर थिरकने के बजाय अपनी ढ़फली पर अपना राग आलाप रही है। हालांकि नेताओं का सुर-ताल जनता को भी आह्लादित कर रहा है और जनता के आलाप से नेता भी आशान्वित हो रहे हैं। सब मस्त हैं अपनी मस्ती में। फिजा में घुल रहे सियासी रंगों से जनता भी खुलकर खेल रही है। वह भगवा के साथ भी उतने ही प्यार से लिपट रही है जितना लाल, हरे व नीले से। इस चुनावी फागुन में जनता इस कदर होलियाई हुई है कि सियासी हुल्लड़-हुड़दंग में यह परखना बेहद मुश्किल हो रहा है कि वह किससे अंदरूनी तौर पर बिदक रही है और किसके साथ अंतरंगता के साथ चिपक रही है। नतीजन सबका दावा यही है कि इस दफा विरोधियों के अरमानों की होली जलेगी और जीत के रंग की होली तो उनकी ही मनेगी। दावा करें भी क्यों ना। वह भी तब जबकि ऐसे दावों की हवा निकालने का अचूक तर्क हर तरफ से पूरी तरह नदारद हो। तभी तो जो किसी जमात से जुड़े हैं वे तो अपने खेमे की जीत सुनिश्चित बता रहे हैं लेकिन तटस्थ व निष्पक्ष विचारों के सूरमाओं का आकलन है कि अंत में मामला खिचड़ी भी हो सकता है। खिचड़ी का यह शगूफा काफी तेजी से फैल भी रहा है। तभी तो साहेब ने भरी सभा में यह कह दिया कि जिनकी अपनी दाल नहीं गल पा रही वे चुनावी चूल्हे पर खिचड़ी पकाने में जुट गए हैं ताकि किसी और को अपनी दाल गलाने में कामयाबी ना मिल सके। वैसे भी समग्रता में देखा जाए तो हवा का रूख किसी एक के पक्ष में होने की संभावना को स्वीकार कर लेने से पूरा विश्लेषण ही रसहीन हो जाएगा। यही वजह है कि चैपाल की चर्चाओं में हवा दी जा रही है खिचड़ी की संभावना को। इस संभावना में बहुत रस भी है और चटपटा स्वाद भी। तभी तो खिचड़ी की संभावना जताने वाले अब यह भी बताने लगे हैं कि इस फागुन में किस पर किसका रंग चढ़ेगा। इस चर्चा का चकल्लस सिर्फ भगवा को लाल-हरे से दूर रख रहा है। वर्ना जितनी अटकलें नीले के भगवा से मिलने की लगाई जा रही हैं उतनी ही तिरंगे की छांव में सशक्त व सुनिश्चित भविष्य का निर्माण करने के लिए लाल-हरे के साथ नीले के जुड़ने की भी व्यक्त की जा रही हैं। लेकिन एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि अब तक जब भी किसी ने नीले को अपनाया है तो उसके हिस्से में कालिख ही आई है। जब भी कभी रंगों के घाल-मेल की परिस्थिति उत्पन्न हुई है तो इसमें वर्चस्व नीले का ही रहा है। लिहाजा खिचड़ी की सूरत में नीला रंग अपनाकर रंगा सियार बनने के अलावा शायद ही कोई दूसरा विकल्प दिखाई पड़े। खैर, किस पर किसका रंग चढ़ेगा, किसका रंग जमेगा या किसका रंग उतरेगा यह शनिवार को पता चलेगा, लेकिन इतना तय है कि अगर खिचड़ी की नौबत आई तो जमकर रायता भी फैलेगा। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @नवकांत ठाकुर #NavkantThakur
बुधवार, 1 मार्च 2017
‘भावी परिणामों पर टिकीं असीमित संभावनाएं’
‘भावी परिणामों पर टिकीं असीमित संभावनाएं’
चुनावी राजनीति के तहत होनेवाले सियासी खेल में संभावनाओं का अकाल कभी नहीं होता है। हर चुनाव के बाद नई तस्वीर उभरती है और नया सियासी समीकरण बनता है। स्वाभाविक है कि नए संतुलन की तलाश में सियासी समीकरण का चक्र इस बार भी घूमेगा। तभी तो आगामी ग्यारह मार्च को पांच राज्यों के चुनावों का नतीजा सामने आने के बाद ना सिर्फ राष्ट्रीय राजनीति में बड़े बदलावों की उम्मीद जताई जा रही है बल्कि केन्द्र की मोदी सरकार के केबिनेट में भी व्यापक फेरबदल की सुगबुगाहट साफ महसूस की जा रही है। हालांकि इन बदलावों के लिये अपेक्षित नतीजे की भी दरकार है। तभी तो अभी कोई अपने पत्ते नहीं खोलना चाहता। खोले भी क्यों? बंद मुट्ठी लाख की, खुल गयी तो खाक की। फिलहाल हर तरफ से यथास्थिति बरकरार रखने का ही प्रयास किया जा रहा है। लेकिन ताड़नेवाले भी कयामत की नजर रखते हैं। लाख छिपाने के बावजूद छिप नहीं पा रहा कि एक तरफ दिल्ली की राजनीति में एक-दूसरे को फूटी आंख नहीं सुहाने के बावजूद पंजाब का गुणा-भाग दुरूस्त करने के लिये कांग्रेस और एएपी के बीच अघोषित युद्ध विराम हो गया है जबकि दूसरी ओर महाराष्ट्र में शिवसेना भी बीएमसी के मेयर पद पर दावेदारी के मामले को लेकर जारी विचार-विमर्श प्रक्रिया को यथासंभव लंबा खींचने में जुटी है। इसके अलावा मोदी केबिनेट में संभावित बदलावों को लेकर भी राजधानी के सियासी गलियारे में तमाम अटकलों का बाजार गर्म है और कयास लगाए जा रहे हैं कि अगर चुनाव परिणाम अपेक्षा के अनुकूल रहे तो शीर्ष केबिनेट मंत्रियों की जिम्मेवारियों में बड़े बदलाव की तस्वीर शीघ्र ही दिखाई पड़ सकती है। वास्तव में इन तमाम कयासों व अटकलों को चुनाव परिणाम के बाद की स्थितियों से जोड़ कर देखा जा रहा है और माना जा रहा है कि इन परिणामों के मुताबिक सत्ता का समीकरण नयी करवट ले सकता है। मसलन पंजाब के मामले में भले ही भाजपा-अकाली गठबंधन के नेताओं ने भी यह मान लिया है कि वहां बादल सरकार की वापसी नहीं होने जा रही है लेकिन इस बात का दावा करने की स्थिति में भी कोई नहीं है कि सूबे में किसी एक पार्टी को ही पूर्ण बहुमत हासिल हो जाएगा। ऐसे में अगर त्रिशंकु विधानसभा की तस्वीर बनी तो धर्मनिरपेक्षता की अलख जगाते हुए कांग्रेस और एएपी के बीच भाजपा को सत्ता से बाहर रखने के लिये समझौता हो सकता है और इसका प्रभाव निश्चित तौर पर दिल्ली महानगरपालिका के आगामी चुनावों पर भी पड़ेगा। हालांकि कांग्रेस और एएपी को सत्ता में साझेदारी करने का मौका गोवा में भी मिल सकता है बशर्ते वहां भाजपा को बहुमत ना मिल सके। जाहिर है कि इन दोनों दलों को अगर किसी भी सूबे में भाजपा के खिलाफ एक मंच पर आने का मौका मिला तो इस गठजोड़ का विस्तार गुजरात में भी होना तय ही है जहां इस साल के आखिरी दिनों में विधानसभा का चुनाव होना है। इसके अलावा अगर पांच राज्यों के इस चुनाव में कांग्रेस को किन्हीं दो-तीन सूबों में उल्लेखनीय कामयाबी मिल गयी तो इसे मोदी सरकार की खिसकती जमीन का ही परिचायक माना जाएगा और ऐसे में भाजपा से बुरी तरह खार खाई हुई शिवसेना को भी कांग्रेस से हाथ मिलाने का आत्मविश्वास हासिल हो सकता है। वैसे भी राहुल गांधी के नेतृत्व को नकार कर राकांपा अध्यक्ष शरद पवार ने साफ जता दिया है कि कांग्रेस के साथ उनका पुराना याराना दोबारा कायम नहीं पाएगा। इसी प्रकार शिवसेना ने भी भाजपा से अलग होने की पटकथा लिखने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। लिहाजा भाजपा विरोध के वैचारिक धरातल पर इनके बीच आपसी समझौता होने की संभावना को कतई खारिज नहीं किया जा सकता है। लेकिन शर्त यह है कि कांग्रेस को यह साबित करना होगा कि वह राष्ट्रीय राजनीति में दोबारा वापसी करने की राह पर आगे बढ़ रही है। जाहिर है कि महाराष्ट्र का संभावित समीकरण यूपी के नतीजों का ही इंतजार कर रहा है जहां अगर कांग्रेस के साथ सपा का बेड़ा पार हो गया तो शिवसेना भी कांग्रेस के साथ जुड़ने में हर्गिज देरी नहीं करेगी। इसके अलावा इन चुनाव परिणामों के बाद मोदी सरकार के केबिनेट का स्वरूप भी बदल सकता है। खास तौर से गोवा वापसी के लिये अपनी हार्दिक तड़प दिखा चुके मनोहर पर्रिकर को दोबारा मुख्यमंत्री बनाकर वापस भेजे जाने और रक्षा मंत्रालय की जिम्मेवारी एक बार फिर अरूण जेटली के कांधों पर आने की अटकलें काफी जोर-शोर से लगायी जा रही हैं। ऐसे में वित्त विभाग का कामकाज पियूष गोयल को सौंपे जाने की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा रहा है। साथ ही दूर की कौड़ी के तौर पर गाहे-बगाहे यह बात भी उछल रही है कि यूपी में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने का मौका मिलने पर राजनाथ सिंह को प्रदेश की राजनीति में वापस भेजने का मौका गंवाना भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को शायद ही मंजूर हो। यानि इतना तो साफ है कि इन चुनावों का जितना प्रभाव प्रदेशिक राजनीति पर पड़ेगा उससे रत्ती भर भी कम केन्द्र की राजनीति प्रभावित नहीं होगी। लेकिन ये तमाम समीकरण फिलहाल कयासों और अटकलों पर ही आधारित हैं क्योंकि हर संभावित बदलाव के साथ यही जुड़ा हुआ है कि अगर यह होगा तो वह होगा। लिहाजा जो भी होगा वह चुनाव परिणाम की तस्वीर से ही तय होगा। वर्ना सियासत में होने को तो कुछ भी हो सकता है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर # Navkant Thakur
गुरुवार, 16 फ़रवरी 2017
‘खता किसी और की, सजा किसी और को’
‘खता किसी और की, सजा किसी और को’
पुरानी कहावत है कि ‘खेत खाय गधा और मार खाए जुलाहा।’ यह बात सियासत में जितनी सटीकता से लागू होती है उतनी अन्य क्षेत्रों में लागू नहीं होती। यानि सियासत में सिर्फ अपनी ही गलतियों का खामियाजा नहीं भुगतना पड़ता। कई बार ऐसे मामले भी सिरदर्दी का सबब बन जाते हैं जिस खता को अंजाम देने के बारे में कभी सोचा भी ना गया हो। यही हुआ था बिहार विधानसभा के चुनाव में। कहां तो भाजपा ने ही आनुपातिक तौर पर सबसे अधिक दलित, पिछड़े व आदिवासी समाज के नेताओं को प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री और मंत्री बनने का मौका दिया। देश में आरक्षण की व्यवस्था को लागू करने के लिये कमंडल से पहले मंडल की लड़ाई में पुरजोर हिस्सेदारी की और ‘एकात्म मानव दर्शन’ व ‘अंत्योदय’ सरीखे सिद्धांतों को सियासत का आधार बनाया। लेकिन आरक्षण की स्थापित अवधारणा पर पुनर्विचार की जरूरत बताकर आरएसएस प्रमुख ने ऐसी गलती कर दी जिसका भाजपा को इतना जबर्दस्त खामियाजा भुगतना पड़ा कि उसे याद करके भाजपाई रणनीतिकार आज भी सिहर उठते हैं। बिहार चुनाव के ऐन पहले संघ प्रमुख की जुबान से निकली उस बात को विरोधी महागठबंधन ने इस कदर जमकर भुनाया कि भाजपा का पूरी तरह भट्ठा ही बैठ गया। जबकि हकीकत तो यह है कि मंडल कमीशन की रिपोर्ट को लागू कराने की लड़ाई में अग्रणी भूमिका निभानेवाली भाजपा की केन्द्र या प्रदेशों की किसी सरकार ने आरक्षण व्यवस्था के साथ छेड़छाड़ करने के बारे में कभी सोचना भी गवारा नहीं किया है। लेकिन बात चुंकि पार्टी की मातृ-संस्था कहे जानेवाले संघ के मुखिया ने कही थी तो इसे इस रूप में प्रचारित किया गया मानो भाजपा की सरकार बनते ही आरक्षण व्यवस्था को समाप्त कर दिया जाएगा। जाहिर है कि संघ की उस गलती का भाजपा को खामियाजा तो भुगतना ही था। लेकिन मजाल है कि एक बार की गलती से संघियों ने कोई सीख ली हो। तभी तो मौजूदा पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव से पहले भी संघ परिवार के शीर्ष विचारकों में शुमार होनेवाले मनमोहन वैद्य ने उन्हीं बातों को दोहरा दिया जिसे बयां करके संघ प्रमुख बिहार चुनाव में पहले ही भाजपा का बंटाधार कर चुके हैं। हालांकि वैद्य के बयान की मारक क्षमता को देखते हुए ना सिर्फ संघ की ओर से औपचारिक तौर पर इसका खंडन किया गया बल्कि भाजपा ने भी उनके बयान से तत्काल ही दूरी बना ली और जल्दी ही वैद्य को भी सफाई देने के लिये सामने आना पड़ा। लेकिन बसपा सुप्रीमो मायावती ने वैद्य के इन विचारों को संघ-भाजपा की अंदरूनी सोच साबित करने में रात-दिन एक कर दिया। अब इसका असर भी दिखने लगा है क्योंकि यूपी में जिस बसपा को सभी ने समाप्त मानना शुरू कर दिया था उसने अगर सत्ता के संघर्ष को त्रिकोणीय स्वरूप दे दिया है तो निश्चित तौर पर इसमें वैद्य के विचारों की भूमिका को कतई सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता है। हालांकि भाजपा को दूसरों की गलती का खामियाजा सिर्फ यूपी में ही नहीं भुगतना पड़ रहा है बल्कि इससे कहीं अधिक मार उसे पंजाब और उत्तराखंड में झेलनी पड़ रही है जहां उसने ऐसे लोगों को अपने साथ जोड़ा हुआ है जिनकी करनी का फल उसे ही भुगतना पड़ रहा है। पंजाब की बात करें तो वहां की सत्ता में भाजपा की भूमिका तो सिर्फ छोटे सहयोगी की ही थी। लेकिन अकालियों की करतूतों के कारण ऐसी भद पिटी है कि इस दफा राजग को तीसरे स्थान पर रहना पड़े तो कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी। जाहिर है कि इसकी सबसे अधिक बदनामी केन्द्र की मोदी सरकार के अलावा भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व को ही झेलनी पड़ेगी। कोई यह तो कहेगा नहीं कि अकालियों की सरकार गिर गयी। हर कोई इसे इसी रूप में प्रचारित करेगा कि भाजपा की पकड़ से पंजाब भी निकल गया। इसी प्रकार उत्तराखंड में आज अगर भाजपा को कांग्रेस की कथित ‘वन मैन आर्मी’ से कड़ी टक्कर झेलनी पड़ी है तो इसकी इकलौती वजह है कांग्रेस के उन सूरमाओं को संगठन में शामिल करना जिन्होंने लंबे अर्से तक कांग्रेस में रहकर ऐसे-ऐसे कारनामों को अंजाम दिया कि सूबे की जनता उन्हें कतई माफ करने के मूड में नहीं दिख रही है। खास तौर से जिस केदारनाथ आपदा के मामले को लेकर भाजपा ने प्रदेश की रावत सरकार का घेराव करने की रणनीति अपनाई थी उसके असली कर्ता-धर्ता तो वे माने जाते हैं जो उस समय प्रदेश के मुख्यमंत्री थे और अब पाला बदलकर भाजपा में शामिल हो गये हैं। हालांकि भाजपा ने उन्हें टिकट देने से तो परहेज बरत लिया लेकिन उनके बेटे को टिकट से वंचित करना संभव नहीं हो सका। इसके अलावा कांग्रेस के टिकट पर विधायक चुने जाने के बाद साढ़े चार साल तक सत्ता की मलाई का लुत्फ उठानेवाले एक दर्जन से भी अधिक विधायक इस दफा भाजपा के टिकट पर चुनाव मैदान में दिखाई पड़ रहे हैं। इसीका नतीजा है कि वहां भाजपा से उन सवालों का भी जवाब मांगा जा रहा है जिस गुनाह से उसका दूर का भी वास्ता नहीं है। खैर, इस तरह के मामलों को समग्रता में देखने से इतना तो स्पष्ट हो ही जाता है कि एक बार के लिये दुश्मन की गलतियों का फायदा उठाने में भूल करके भी जीत उम्मीद की जा सकती है लेकिन हिमायतियों की गलतियों का खमियाजा भुगतने से बच पाना तो नामुमकिन ही है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर # Navkant Thakur
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शनिवार, 11 फ़रवरी 2017
‘पराई चुपड़ी पर टिकी ललचाई निगाहें’
‘पराई चुपड़ी पर टिकी ललचाई निगाहें’
बेशक बाबा फरीद कह गये हों कि ‘रूखी सूखी खाय के ठंडा पानी पी, देख पराई चुपड़ी ना ललचावे जी।’ लेकिन कोई माने तब ना। आज कल चिराग लेकर ढ़ूढ़ने से भी ऐसा कोई नहीं मिलता जो अपनी चुपड़ी से संतुष्ट हो। ऐसे में रूखी-सूखी से संतुष्ट हो जानेवाले को कौन तलाशे, क्यों तलाशे? आलम यह है कि सबकी निगाहें दूसरों की थाली पर ही टिकी हैं। जिनकी थाली में पहले से ही चुपड़ी पड़ी है वह भी दूसरों को रूखी-सूखी हजम नहीं होने देना चाहते और जिनके हिस्से में रूखी-सूखी आई है वे दूसरों की चुपड़ी में मिट्टी डालने की कोशिश कर रहे हैं। अपनी थाली से अधिक चिंता लोगों को पराई थाली की सता रही है। अपना खाना खराब हो तो हो, मगर दूसरे का जायका पहले बिगाड़ने में सभी जुटे हुए हैं। इसी का नतीजा है कि सबकी अपनी थाली लगातार बिगड़ती जा रही है। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि अपनी थाली बचाने के बजाय दूसरे की थाली का समीकरण समझने और उसके मुताबिक अपने मुनाफे का गुणा-भाग करने में ही सभी मशगूल दिख रहे हैं। इस उठापटक और खुराफाती खुरपेंच ने पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव को बेहद दिलचस्प मोड़ पर ला दिया है। इन पांच चुनावी राज्यों में से दो में कांग्रेस, दो में राजग और एक में सपा की सरकार है। लिहाजा असली मुकाबला भले ही इन दलों के बीच ही दिख रहा हो लेकिन इन तीनों में ही अपनी थाली बचाने से ज्यादा दूसरे का जायका बिगाड़ने की ऐसी होड़ मची है कि अब तीसरी थाली पर ललचाई नजरें गड़ाने के अलावा इसके पास दूसरा कोई विकल्प ही बचा है। मिसाल के तौर पर यूपी की ही बात करें तो अपने परंपरागत वोटबैंक की चिंता में कोई दुबला नहीं हो रहा। सबको चिंता सता रही है उन वोटों की जो उन्हें किसी सूरत में हासिल नहीं हो सकती। तीसरी थाली के उन पकवानों की महक ने सबको मदहोश किया हुआ है और सबको उम्मीद है कि अगर तीसरी थाली थोड़ी सी वजनदार निकल आये तो उनका खाना खराब होने से बच जायेगा। भाजपा का पूरा समीकरण अल्पसंख्यक वोटों के बंटवारे और बहुसंख्यकों के ध्रुवीकरण पर टिका है जबकि सायकिल की हैंडिल पकड़ने का हाथ को मौका दिए जाने के पीछे अल्पसंख्यकों को एकजुट करने के अलावा सवर्ण वोटबैंक में सेंध लगाने की सोच ही छिपी हुई है। लेकिन एक तरफ भाजपा की रणनीति में ऐसा पेंच फंसा है कि ना तो किसी एक पक्ष में अल्पसंख्यकों की एकजुटता उसे अपने लिये फायदेमंद दिख रही है और ना ही ऐसा हुए बगैर बहुसंख्यकों का प्रतिक्रियात्मक ध्रुवीकरण होना संभव हो पा रहा है। लिहाजा उसकी थाली का जायका अब बसपा के समीकरण पर आधारित हो गया है। अगर बसपा ने अल्पसंख्यकों में ठीक-ठाक सेंध लगा ली तो ठीक वर्ना अगले पांच साल फिर हारे को हरिनाम का ही सहारा रहेगा। दूसरी ओर सपा भी सिर्फ अपने परंपरागत वोटबैंक के सहारे चुनावी नैया पार कर पाती तो हाथ का सहारा ही क्यों लेती? उसे बेहतर पता है कि रात में राहें रौशन करने के लिये सिर्फ चांद के भरोसे नहीं रहा जा सकता। लेकिन अपनी रौशनी उसे तभी राहें दिखा सकती हैं जब भाजपा के टाॅर्च की रौशनी को आंखों पर पड़ने से रोका जाये। वर्ना आंखें चुंधिया गईं तो दिन में भी दिखना मुश्किल हो सकता है। लिहाजा उसका जायका तभी सुधर सकता है जब भाजपा की थाली में बसपा का हाथी, सूंढ़ से धूल डालने में कामयाब हो सके। यानि सबका समीकरण दूसरों का खेल बिगड़ने पर ही आधारित दिख रहा है। लेकिन अपने दम पर दूसरे का खेल बिगाड़कर अपना खेल बनाने की हैसियत में कोई नहीं है। सबको तीसरे पक्ष से मजबूत हस्तक्षेप की दरकार है। यही हाल पंजाब और गोवा का भी है जहां तीसरी ताकत की निर्णायक भूमिका पर सभी ललचाई निगाहें गड़ाए हुए हैं। इन दोनों ही सूबों में आप उसी भूमिका में है जो यूपी में बसपा की है। यानि आप का प्रदर्शन ठीक-ठाक रहे तो ही अकाली-भाजपा की आस को आधार मिल पाएगा। हालांकि दोनों सूबों में मतदान समाप्त हो चुका है लेकिन अभी सीना ठोंककर कोई यह दावा नहीं कर सकता है कि वह अपने दम पर बहुमत की बाधा को पार करने वाला है अथवा उसने विरोधी पक्ष को किस स्तर पर पटखनी देने में कामयाबी पाई है। इसकी वजह भी साफ है कि अपनी थाली को सजाने-संवारने के बजाय सभी दूसरों का जायका बिगाड़ने में ही जुटे थे ऐसे में तीसरे की थाली से अपनी बिगड़ी की भरपाई करने के अलावा किसी के पास दूसरा कोई विकल्प नहीं है। हालांकि मणिपुर और उत्तराखंड में सतही तौर पर स्थिति थोड़ी अलग अवश्य दिख रही है लेकिन गहराई से परखने पर वहां भी तीसरी थाली के प्रदर्शन से ही विजेता का चयन हो पाने की तस्वीर दिख रही है। बेशक यह तीसरी थाली अलग से नहीं सजी है बल्कि दो थालियों में हुई बंदरबांट के नतीजे में ही तीसरे का सृजन हुआ है। लेकिन अब यह तीसरी थाली मुख्य दोनों थालियों की जीत-हार तय करने की स्थिति में आ गई है। खैर, किसी और की चुपड़ी पर बाकियों की ललचाई निगाहें कितनी ही मजबूती से क्यों ना गड़ी हों लेकिन इस संभावना को कतई खारिज नहीं किया जा सकता है एक-दूसरे की थाली में मिट्टी डालने वालों को आखिर में तीसरी थाली ही गच्चा दे जाए। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’
@ नवकांत ठाकुर # Navkant Thakur
सोमवार, 24 अक्टूबर 2016
’मन-मन भावे, मूड़ हिलावे‘
’मन-मन भावे, मूड़ हिलावे‘
किसी के भी चाल-चरित्र व स्वभाव के बारे में जितनी सही व पूरी जानकारी उसके धुर विरोधी के पास होती है उतनी किसी और के पास हो ही नहीं सकती। तभी तो भाजपा को अगर सबसे सही तरीके से किसी ने जाना, समझा और पहचाना है, तो वे हैं सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव। खास तौर से ‘मुंडे-मुंडे मतिर्भिन्ना’ का दिखावा करके मतदाताओं व विरोधियों को भ्रम व असमंजस में डालने के भाजपा के जिस चरित्र के प्रति मुलायम लगातार सबको आगाह करते रहे हैं उसी का मुजाहिरा किया है भाजपा की मौजूदा कूटनीति ने। यूपी विधानसभा के चुनाव में पार्टी एक हाथ में राष्ट्रवाद के झंडे और दूसरे में विकास के एजेंडे का तो सार्वजनिक तौर पर मुजाहिरा कर रही है। लेकिन राष्ट्रवादी झंडे के भीतर सांप्रदायिक मसलों का डंडा घुसेड़ने की अपनी कोशिशों को खुलकर स्वीकार करना उसे कतई गवारा नहीं हो रहा है। शायद यही भाजपा का असली स्वभाव जिसके तहत इसके तमाम नेता अधिकांश मसलों पर कभी एक सुर में बोलना गवारा नहीं करते। दूर से सुननेवालों को ऐसा लगता है मानो पार्टी के भीतर सैद्धांतिक व वैचारिक स्तर पर भारी टकराव चल रहा है। लेकिन नजदीक से देखने पर तस्वीर बदली हुई दिखती है। इसमें मजेदार तथ्य यह है कि पार्टी में सबकी राहें बेशक अलग दिखती हों लेकिन उनकी मंजिल एक ही रहती है। अब जहां लक्ष्य को लेकर कोई मतभेद या विरोधाभास ना हो वहां राहों का भेद कोई मायने नहीं रखता। लिहाजा इनका आपसी टकराव व विरोध भी अक्सर दिखावे का ही रहता है। परस्पर मतभेद तो दिखता है लेकिन उसमें मनभेद नहीं होता। मन मिला हुआ ही रहता है। दरअसल संगठनिक स्तर पर होनेवाली इस नूराकुश्ती का मकसद सिर्फ सियासी माहौल में भ्रम की स्थिति उत्पन्न करना ही रहता है। और कुछ भी नहीं। इस भ्रम के शिकार सिर्फ मतदाता ही नहीं होते बल्कि कई दफा विरोधी भी हो जाते हैं। वे समझ ही नहीं पाते कि भाजपा के किस नेता की बात का विरोध करें और किसके बयान की अनदेखी। भ्रम के इसी कुहासे में फंसकर विरोधियों की गाड़ी अक्सर डी-रेल हो जाती है और भाजपा मैदान मार ले जाती है। ऐसा ही माहौल भाजपा ने एक बार फिर बनाने का प्रयास किया है। खास तौर से यूपी विधानसभा के चुनाव को सांप्रदायिक रंग देने के मामले को लेकर। जितने मुंह उतनी बातें। सुब्रमण्यम स्वामी तो राम मंदिर निर्माण की तारीख का भी ऐलान कर चुके हैं। जबकि राजनाथ सिंह ने औपचारिक तौर पर सरकार की विवशता का इजहार करते हुए पहले ही कह दिया है कि चुंकि राज्यसभा में मोदी सरकार को बहुमत हासिल नहीं है लिहाजा संसद से कानून बनाकर मंदिर का निर्माण कर पाना फिलहाल संभव ही नहीं है। दूसरी ओर यूपी के प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य से लेकर उमा भारती तक खम ठोंकते हुए यह कहने से परहेज नहीं बरत रहे हैं कि मंदिर तो मोदी सरकार के कार्यकाल में ही बनेगा। यानि हर किसी की जुबान पर मंदिर का नाम तो है लेकिन सुर अलग-अलग है। विनय कटियार तल्ख सुर में लाॅलीपाॅप की कड़वाहट बयान करते हैं तो महेश शर्मा कहते हैं कि जो किया जा सकता है वह तो कम से कम कर लिया जाये। इस सबसे अलग भाजपा का राष्ट्रीय संगठन मंदिर मसले को आस्था का विषय बताने से तो नहीं हिचक रहा लेकिन लगे हाथों यह समझाने से भी चुक रहा है कि यूपी में मंदिर को चुनावी मुद्दा नहीं बनाया जायेगा बल्कि पार्टी विकास और सुशासन के एजेंडे पर ही चुनाव लड़ेगी। पार्टी का साफ मत है कि मंदिर बनना तो चाहिये लेकिन इसके लिये मनामानी नहीं होनी चाहिये। या तो आम सहमति के आधार पर मंदिर निर्माण हो या फिर अदालत के आदेश पर। अब आम सहमति तो बनने से रही। जब इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा किये गये विवादित जमीन के बंटवारे के दो हिन्दू लाभार्थियों के बीच अब तक सहमति नहीं बन पायी है तो तीसरे मुस्लिम पक्षकार के साथ सहमति बने भी तो कैसे? रहा सवाल अदालत के आदेश से मंदिर निर्माण का, तो इस राह के रोड़े फिलहाल समाप्त होते नहीं दिख रहे। इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फैसला सामने आये तकरीबन दो साल का वक्त गुजर जाने के बावजूद आज तक इस मामले की फाइल सर्वोच्च न्यायालय की आलमारी में धूल ही फांक रही है। अब तक इसकी सुनवाई के लिये पीठ का गठन भी नहीं हो पाया है। पता नहीं कब पीठ का गठन होगा, कब सुनवाई होगी और कब इसका फैसला आएगा। यानि पूरा मामला अभी बदस्तूर अटका-लटका ही रहनेवाला है। इस हकीकत को जानते हुए भी अगर मंदिर मसले की लहर उठाने का प्रयास हो रहा है और कटियार की तल्खी, सरकार की नरमी और संगठन की गर्मी दिख रही है तो इसमें किसी का किसी से कोई विरोधाभास नहीं है। अंदर से सब मिले हुए ही हैं। बस ऊपर से एक दूसरे से असहमत होने का दिखावा किया जा रहा है। ताकि समाज की कट्टरवादी धारा पर भी पकड़ बनी रहे और मध्यममार्गी धारा पर भी। इसके अलावा छोड़-पकड़ की इस खींचतान में विरोधियों को भी उलझाये रखा जाये ताकि वे किसी एक बयान को पकड़कर आगे ना ले जा पायें। अब ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि ‘चित भी मेरी पट भी मेरी’ की जो दोधारी तलवार भाजपा भांज रही है उसकी चपेट इसके विरोधी आते हैं या पार्टी खुद ही लहुलुहान होती है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर # Navkant Thakur
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मंगलवार, 5 जुलाई 2016
'होगा वही जो मंजूरे मुलायम होगा....... इति सिद्धम'
‘सौ सुनार की एक लुहार की’
यूपी की राजनीति पर गौर करें तो महज एक पखवाड़े के भीतर ही तमाम स्थापित समीकरणों में जो नाटकीय परिवर्तन दिख रहा है वह वाकई बेहद दिलचस्प है। सूबे की सियासत ने इस तेजी से करवट ली है कि ना सिर्फ भाजपा को अपनी राह बदलने के लिये मजबूर होना पड़ा है बल्कि कांग्रेस को भी तुरूप के उस अंतिम इक्के को दांव पर लगाने के लिये मजबूर होना पड़ा है जिसकी विफलता के बाद पार्टी के पास कुछ नहीं बचेगा। इसके अलावा सत्तारूढ़ सपा की बात करें तो इस खेमे में भी कल तक जिनकी तूती बोलती थी वे आज लाख कोशिशों के बावजूद भी अपनी हताशा, निराशा व बौखलाहट नहीं छिपा पा रहे हैं। यानि दूसरे शब्दों में कहें तो सूबे का पूरा सियासी समीकरण ही शीर्षासन की अवस्था में आ गया है। क्या सपा, क्या भाजपा, क्या बसपा और क्या कांग्रेस। हर खेमा हतप्रभ है, हर तरफ कसमसाहट है। लेकिन इस सबका जो सूत्रधार है वह शांत है, खामोश है। वह तो यह स्वीकार करने के लिये भी तैयार नहीं है कि उसने एक झटके में वह कर दिखाया है जो पिछले साढ़े चार साल से नहीं हो सका। यानि साढ़े चार साल से चल रही सियासी सुनारों की अनवरत ठुकठुकी पर लुहारी हथौड़े की ऐसी चोट पड़ी है जिसने बड़ी जतन व मेहनत से गढ़े गये तमाम समीकरणों को एक झटके में ही पूरी तरह छिन्न-भिन्न कर के रख दिया है। तमाम स्थापित समीकरणों की शक्ल ही बदल गयी है, पहचानने लायक भी कुछ नहीं बचा है। साढ़े चार साल की अनवरत मेहनत से यह मान्यता स्थापित की गयी थी कि सूबे की सरकार का पूरा नियंत्रण शिवपाल यादव और आजम खान के हाथों में है जबकि अखिलेश यादव महज मुखौटे की भूमिका में हैं और मुलायम सिंह यादव नेपथ्य में जा चुके हैं। लेकिन यह पूरा समीकरण एक झटके में इस कदर उलट-पुलट हो गया है कि शिवपाल को मंच पर अगली पांत में बैठने के लिये भी मनाना पड़ रहा है जबकि आजम कब अपना आपा खोकर आंय-बांय बोलने लग जाएं इसके बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता। अब तो नमाजियों पर भी भड़क जाते हैं। उन्हें इफ्तारी का कायदा सिखाने लगते हैं। दूसरी ओर अखिलेश को भी अब मुखौटा नहीं कहा जा सकता है बल्कि अब वे संगठन व सरकार के ऐसे सशक्त संचालनकर्ता बन कर सामने आये हैं जो कमियों व खामियों को कतई बर्दाश्त नहीं कर सकता, भले ही वे गलतियां उनके पिता को विश्वास में लेकर ही क्यों ना अंजाम दी गयी हों। साथ ही मुलायम एक बार फिर सपा के सिरमौर की छवि को मजबूत करते हुए ऐसे महानायक के तौर पर सामने आ गये हैं जिनकी मर्जी के बिना संगठन व सरकार में कोई पत्ता भी नहीं खड़क सकता। अब ना तो अखिलेश पर जंगलराज व गुंडाराज को बढ़ावा देने का आरोप लगाया जा सकता है और ना ही सूबे की सरकार पर यादव परिवार के हावी होने की दुहाई दी जा सकती है। यानि एक झटके में ही संगठन व सरकार की छवि का ऐसा काया कल्प हो गया है जिसकी कल तक सपने में भी कोई कल्पना नहीं कर सकता था। यह सब किया है मुलायम के उस लुहारी दांव ने जिसकी कोई काट ही नहीं है। और इसके लिये नेताजी ने ना तो पाताल तोड़ा और ना ही आसमान नोंचा। उन्होंने किया सिर्फ यह कि अंसारी बंधुओं के संगठन में सम्मिलन का प्रस्ताव खारिज कर दिया, अमर सिंह को दिल के साथ ही दल में भी जगह देते हुए संसद के उच्च सदन में दाखिल करा दिया और बलराम सिंह यादव की महज पांच दिनों के भीतर ही सरकार में वापसी करा दी। इन तीन फैसलों ने पूरे परिवेश को पूरी तरह बदल कर रख दिया है। सपा में अमर की आमद के साथ ही आजम का अस्तित्व खुदमुख्तार से बदलकर पैरोकार का भी नहीं बचा। अंसारी की अगवानी कर रहे शिवपाल की संगठन व सरकार की सर्वेसर्वा की स्वीकार्यता समाप्त हो गयी जबकि इससे अखिलेश को मुखौटे की छवि से उबरकर सत्य व शुचिता को सर्वोपरि माननेवाले सशक्त नेतृत्वकर्ता के तौर पर उभरने में कामयाबी मिल गयी। साथ ही गुंडाराज को बढ़ावा देने का आरोप भी धुल गया और परिवार के दबाव में फैसले लेने की बात भी सिरे से समाप्त हो गयी। लगे हाथों बलराम की पद-प्रतिष्ठा बहाली से यह भी प्रमाणित हो गया कि संगठन व सरकार में किसी की मनमानी नहीं चल सकती, अखिलेश की भी नहीं। अलबत्ता होगा वही जो मंजूरे मुलायम होगा। इति सिद्धम। अब इस बदले माहौल में बदलना तो सबको पड़ेगा। तभी तो कल तक प्रशांत किशोर की मांग के बावजूद प्रियंका को यूपी में आगे करने की बात सुनना भी गवारा नहीं करनेवाले गांधी परिवार को अब अपनी तूणीर के इस आखिरी वाण को भी आजमाने के लिये मजबूर होना पड़ा है और भाजपा को छठी के दूध की तरह समान नागरिक संहिता व अयोध्या सरीखे उन भूले-बिसरे मसलों को भी आगे करने पर विवश होना पड़ा है जिसे हालिया दिनों तक राष्ट्रीय कार्यकारिणी में औपचारिकता के नाते भी याद नहीं किया जा रहा था। खैर, तीन फटाफट फैसलों के एक दांव से ही सिरदर्दी का सबब बने तमाम समीकरणों को सिरे से ध्वस्त कर देनेवाले मुलायम को यह तो स्वीकार करना ही होगा कि उन्होंने दुरूस्त काम करने में कुछ देरी अवश्य कर दी है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर # Navkant Thakur
बुधवार, 7 अक्टूबर 2015
‘पिता की प्रतिष्ठा में चार चांद लगाने की चुनौती’
नवकांत ठाकुर
पश्चिम चंपारण के रामनगर में जब कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी और लालू यादव के लाडले तेजस्वी यादव ने मंच साझा किया तो एकबारगी बिहार विधानसभा चुनाव की बहुआयामी तस्वीर का वह पहलू नमूंदार हो गया जिसके तहत विरासत की सियासत को आगे ले जाते हुए पिता की प्रतिष्ठा में चार चांद लगाने की चुनौती इन जैसे युवाओं के कांधे पर आ पड़ी है। हालांकि राजनीति में वंशवाद को बढ़ावा देना कितना उचित है या इसे कौन किस हद तक आगे बढ़ा रहा है इस मसले पर ‘हरि अनंत हरि कथा अनंता’ की तर्ज पर जितना कहा या सुना जाये वह कम ही है। लिहाजा फिलहाल इस विषय को छेड़ने से परहेज बरतते हुए तटस्थ भाव से बिना कोई पूर्वाग्रह पाले अगर बिहार की मौजूदा चुनावी तस्वीर का अवलोकन किया जाये तो यह स्पष्ट हो जाता है कि यह चुनाव सिर्फ सत्ता पर अधिपत्य स्थापित करने के लिये नहीं हो रहा है। इसके और भी कई आयाम हैं। कई और भी पहलू हैं। जिसमें एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इस चुनाव के माध्यम से सूबे की सियासत में पीढि़यों का निर्णायक परिवर्तन भी होना है। खास तौर से बिहार की सियासत में अब तक शीर्ष पर काबिज रहे चेहरों ने अपनी राजनीतिक विरासत अपने उत्तराधिकारियों को हस्तांतरित करने के लिये इस चुनाव को चुनने की जो पहल की है उसके नतीजे में इस बार की चुनावी जंग ने बेहद दिलचस्प रूख अख्तियार कर लिया है। सूबे की सत्ता पर तकरीबन डेढ़ दशक तक एकछत्र राज करनेवाले राजद सुप्रीमो लालू यादव से लेकर सूबे के सबसे ताकतवर दलित नेता व लोजपा के मुखिया रामविलास पासवान ही नहीं बल्कि सतह से शिखर का सफर तय करते हुए मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पर अपना कब्जा जमा चुके हम के संस्थापक जीतनराम मांझी ने भी इस बार के चुनाव में ही अपनी सियासी विरासत युवा पीढ़ी के हवाले करने की दिली ख्वाहिश का खुलकर मुजाहिरा करने में कोई संकोच नहीं किया है। इसके अलावा राष्ट्रीय राजनीति में खुद को स्थापित करते हुए परिवार की राजनीतिक विरासत को संभालने की अपनी दक्षता व सक्षमता को प्रमाणित करने लिये राहुल गांधी ने भी कहीं ना कहीं बिहार के मौजूदा चुनाव को ही चुनना बेहतर समझा है। हालांकि हकीकत यही है कि किसी भी चुनाव की तरह इस बार भी तकरीबन सभी राजनीतिक दलों में स्थापित नेताओं के भाई-भतीजों व बाल-बच्चों की बहार छायी हुई है लेकिन गौर से देखा जाये तो इस बार दिलचस्पी का केन्द्र सोनिया, लालू, पासवान व मांझी के बच्चे ही हैं जिनके सामने खुद को साबित व स्थापित करते हुए अपने वंश की विरासत में चार चांद लगाने की चुनौती भी है। इसमें पासवान के सांसद पुत्र चिराग ने लोकसभा चुनाव में ही पिता की छत्रछाया में रहते हुए अपनी पार्टी को सही दिशा देकर खुद को साबित व लोजपा को दोबारा स्थापित करने में कामयाबी हासिल कर ली है। वह चिराग का ही दबाव था जिसे स्वीकार करते हुए पासवान ने अपनी मृतप्राय हो चुकी पार्टी को राजग के साथ जोड़ा और नतीजन मोदी लहर पर सवार होकर सूबे की छह लोकसभा सीटों पर अप्रत्याशित जीत दर्ज कराने में कामयाबी हासिल की। लेकिन वह दौर हवा के रूख को भांपने का था जिसमें चिराग पूरी तरह सफल रहे। लेकिन इस बार चुनौती है आर पार की लड़ाई में सूबे की महज सोलह फीसदी सीटों पर लड़ते हुए सिरमौर बनने की। जाहिर है कि इस चुनौती को सफलतापूर्वक पार करने में अगर चिराग कामयाब हो गये तो ना सिर्फ लोजपा की बागडोर पूरी तरह उनके हाथों में आ जाएगी बल्कि पिता की प्रतिष्ठा में चार चांद लगाते हुए खुद को साबित व स्थापित करने में भी वे निर्णायक सफलता हासिल कर लेंगे। इसी प्रकार राहुल गांधी ने इस बार भी पार्टी के अध्यक्ष पद की जिम्मेवारी उठाने से परहेज बरतते हुए जिस तरह से बिहार के चुनावी रण की कमान अपने हाथों में ली है उससे एक बात तो साफ है कि जब तक अपने दम पर वे कोई बड़ा जमीनी मोर्चा फतह नहीं कर लेते तब तक वे पार्टी को नेतृत्व देने के लिये आगे नहीं आना चाह रहे हैं। ये काफी हद तक ऐसा ही है जैसे लालू ने अपने तेजस्वी को जमीनी मोर्चा फतह करने के लिये अग्रिम मोर्चे पर तैनात कर दिया है। अगर फतह हुई तो ना सिर्फ निर्विरोध तौर पर राजद उन्हें सहर्ष अपना मुखिया स्वीकार कर लेगी बल्कि सूबे में धर्मनिरपेक्ष महागठजोड़ की सरकार बनने की सूरत में उपमुख्यमंत्री पद पर उनकी ताजपोशी भी तय ही है। इसके अलावा लोगों की नजरें मांझी के बेटे संतोष सुमन पर भी टिकी हुई हैं जिन्हें बड़ी खामोशी के साथ इस बार सियासत में आगे बढ़ने का मौका मुहैया कराया गया है। जाहिर तौर पर मांझी ने अपना पूरा जीवन लगाकर अपनी जो राजनीतिक विरासत खड़ी की है उसे उम्र के चैथेपन में वे अपने उत्तराधिकारी के हवाले करना चाह ही रहे हैं। लेकिन मसला है कि पहले उनके बेटे को जनता की स्वीकार्यता मिले और उसी आधार पर पार्टी में उसके कद को विस्तार दिया जाये। यानि समग्रता में देखें तो इस बार दांव पर सिर्फ सूबे की सत्ता ही नहीं है, विरासत की सियासत को संभालने की दक्षता, सक्षमता व स्वीकार्यता साबित करने की चुनौती भी है जिसमें सफलता या असफलता का नतीजा निश्चित तौर पर बेहद दूरगामी व निर्णायक साबित होनेवाला है। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’
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गुरुवार, 17 सितंबर 2015
करवट बदल रही है बिहार की सियासत
सहयोगियों के सब्र की कड़ी परीक्षा ले रही है भाजपा
नवकांत ठाकुर
बिहार विधानसभा चुनाव के सियासी समीकरण में तब्दीलियों का सिलसिला लगातार जारी रहने के क्रम में धर्मनिरपेक्ष महामोर्चे ने नये सिरे से अपनी जमीनी कमजोरियों को दूर करने की कोशिशें तेज कर दी हैं जबकि कागजी तौर पर मजबूत स्थिति में नजर आ रहे भाजपानीत राजग के राहों की कठिनाइयां दिनोंदिन बढ़ती दिख रही है। जदयू, राजद व कांग्रेस की तिकड़ीवाले धर्मनिरपेक्ष महामोर्चे द्वारा यादव वोटबैंक में सेंध लगाने में जुटे राजद से निकाले जा चुके सीमांचल के कद्दावर सांसद पप्पू यादव की जन अधिकार पार्टी को चुनाव में हिस्सा नहीं लेने के लिये मनाने की कोशिश हो रही है। साथ ही मुस्लिम वोटबैंक की टूट को टालने के लिये असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम को धर्मनिरपेक्ष महामोर्चे में शामिल होने के लिये सहमत करने का प्रयास भी किया जा रहा है। इसके अलावा जिन निवर्तमान विधायकों को राजग में टिकट नहीं मिल पा रहा है उनको भी अपने पाले में लाने में कोई कसर नहीं छोड़ी जा रही है। दूसरी ओर भाजपानीत राजग के भीतर सतही तौर पर भले ही कोई बड़ी समस्या नहीं दिख रही हो लेकिन अंदरूनी हकीकत यही है कि चुनावी समीकरण को साधने की दिशा में उसकी समस्याएं लगातार बढ़ी दिख रही हैं। अव्वल तो सीटों के बंटवारे में राजग के तमाम घटक दलों का हित टकराने के कारण सहमति की राह तैयार करने में काफी मुश्किलें आ रही हैं और दूसरे अपनी जीत सुनिश्चित करने के बजाय सहयोगी दल की हार पक्की करने की प्रतिस्पर्धा राजग में बढ़ती ही जा रही है।
दरअसल पिछले कुछ दिनों तक कागजी समीकरण में परंपरागत वोटों के बिखराव के कारण जिस धर्मनिरपेक्ष महागठजोड़ की हालत काफी पतली नजर आ रही थी उसने अपनी इस कमजोरी को दूर करने में पूरी ताकत झोंक दी है। हालांकि अभी साफ तौर पर उसे इसका कोई ठोस या स्पष्ट फायदा हासिल नहीं हो पाया है लेकिन यादव वोटबैंक में सेंध लगा रहे पप्पू यादव को किसी भी मोर्चे में पनाह नहीं मिलने के कारण अब उनकी पार्टी अपने दम पर चुनाव लड़के फजीहत कराने के पक्ष में नहीं दिख रही है। दूसरी ओर सूबे की मुस्लिम बहुलतावाली 60 सीटों पर नजरें गड़ाए हुए ओवैसी को भी अगर ‘वोटकटवा’ व ‘भाजपा की अंदरूनी सहयोगी’ की नकारात्मक छवि से उबरना है तो उन्हें भी किसी ऐसे सशक्त सहयोगी की जरूरत होगी जिसके साथ जुड़कर सूबे की तीसरी ताकत के तौर पर वे खुद को स्थापित कर सकें। इसी जमीनी हकीकत को भांपते हुए पप्पू ने तो ओवैसी की ओर दोस्ती का हाथ आगे बढ़ा दिया है लेकिन अभी ओवैसी ही उहापोह की स्थिति में दिख रहे हैं। जाहिर है कि अगर पप्पू और ओवैसी का गठजोड़ हो गया तो धर्मनिरपेक्ष महामोर्चे का पूरा गणित ही गड़बड़ा सकता है। इसी संभावना से बचने के लिये शीर्ष राजद नेता रघुवंश प्रसाद सिंह ने ओवैसी को धर्मनिरपेक्ष महामोर्चे में शामिल होने का औपचारिक न्यौता दे दिया है जबकि सूत्रों के मुताबिक पप्पू को चुनाव से अलग रखने के लिये उनकी कांग्रेसी सांसद पत्नी रंजीता रंजन को लगाया जा चुका है। यानि व्यावहारिक रणनीतियों को अमल में लाते हुए अपनी कागजी कमजोरियों को दूर करने के लिये धर्मनिरपेक्ष महामोर्चे ने एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया है। दूसरी ओर भाजपानीत राजग में सतही तौर पर भले ही एकजुटता दिख रही हो लेकिन सूत्रों की मानें तो जीती हुई सीटों का बंटवारा नहीं करने की नीति के कारण राजग के सभी घटक दलों में भारी आक्रोश का माहौल दिख रहा है जिसका रालोसपा की ओर से इजहार भी हो गया है। साथ ही सूत्रों की मानें तो खुद को दलितों का सबसे बड़ा नेता साबित करने की जंग में ना तो लोजपा अपना वोट हम को हस्तांतरित करने के लिये तैयार है और ना ही हम अपने समर्थकों को लोजपा के पक्ष में वोट करने के लिये प्रेरित करना चाहता है। दूसरी ओर जीती हुई सीटों का बंटवारा नहीं करने की भाजपा की नीति से नाराज होकर उसके सहयोगी भी अपने प्रभावक्षेत्र का परंपरागत वोट किसी अन्य सहयोगी के उम्मीदवार को हस्तांतरित करने के मूड में नहीं दिख रहे हैं। बहरहाल जहां एक ओर धर्मनिरपेक्ष महामोर्चा अपने उखड़े-बिखरे कील-कांटों को दुरूस्त करने में जुटा हुआ है वहीं राजग का खेमा आपस में ही एक-दूसरे के धुर्रे बिखेरने में लगा हुआ है। लिहाजा तेजी से आ रहे इन बदलावों के कारण बिहार का चुनावी समीकरण अब नयी करवट लेता हुआ दिख रहा है जो अंततोगत्वा निर्णायक भी साबित हो सकता है।
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