गुरुवार, 16 फ़रवरी 2017

‘खता किसी और की, सजा किसी और को’

‘खता किसी और की, सजा किसी और को’

पुरानी कहावत है कि ‘खेत खाय गधा और मार खाए जुलाहा।’ यह बात सियासत में जितनी सटीकता से लागू होती है उतनी अन्य क्षेत्रों में लागू नहीं होती। यानि सियासत में सिर्फ अपनी ही गलतियों का खामियाजा नहीं भुगतना पड़ता। कई बार ऐसे मामले भी सिरदर्दी का सबब बन जाते हैं  जिस खता को अंजाम देने के बारे में कभी सोचा भी ना गया हो। यही हुआ था बिहार विधानसभा के चुनाव में। कहां तो भाजपा ने ही आनुपातिक तौर पर सबसे अधिक दलित, पिछड़े व आदिवासी समाज के नेताओं को प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री और मंत्री बनने का मौका दिया। देश में आरक्षण की व्यवस्था को लागू करने के लिये कमंडल से पहले मंडल की लड़ाई में पुरजोर हिस्सेदारी की और ‘एकात्म मानव दर्शन’ व ‘अंत्योदय’ सरीखे सिद्धांतों को सियासत का आधार बनाया। लेकिन आरक्षण की स्थापित अवधारणा पर पुनर्विचार की जरूरत बताकर आरएसएस प्रमुख ने ऐसी गलती कर दी जिसका भाजपा को इतना जबर्दस्त खामियाजा भुगतना पड़ा कि उसे याद करके भाजपाई रणनीतिकार आज भी सिहर उठते हैं। बिहार चुनाव के ऐन पहले संघ प्रमुख की जुबान से निकली उस बात को विरोधी महागठबंधन ने इस कदर जमकर भुनाया कि भाजपा का पूरी तरह भट्ठा ही बैठ गया। जबकि हकीकत तो यह है कि मंडल कमीशन की रिपोर्ट को लागू कराने की लड़ाई में अग्रणी भूमिका निभानेवाली भाजपा की केन्द्र या प्रदेशों की किसी सरकार ने आरक्षण व्यवस्था के साथ छेड़छाड़ करने के बारे में कभी सोचना भी गवारा नहीं किया है। लेकिन बात चुंकि पार्टी की मातृ-संस्था कहे जानेवाले संघ के मुखिया ने कही थी तो इसे इस रूप में प्रचारित किया गया मानो भाजपा की सरकार बनते ही आरक्षण व्यवस्था को समाप्त कर दिया जाएगा। जाहिर है कि संघ की उस गलती का भाजपा को खामियाजा तो भुगतना ही था। लेकिन मजाल है कि एक बार की गलती से संघियों ने कोई सीख ली हो। तभी तो मौजूदा पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव से पहले भी संघ परिवार के शीर्ष विचारकों में शुमार होनेवाले मनमोहन वैद्य ने उन्हीं बातों को दोहरा दिया जिसे बयां करके संघ प्रमुख बिहार चुनाव में पहले ही भाजपा का बंटाधार कर चुके हैं। हालांकि वैद्य के बयान की मारक क्षमता को देखते हुए ना सिर्फ संघ की ओर से औपचारिक तौर पर इसका खंडन किया गया बल्कि भाजपा ने भी उनके बयान से तत्काल ही दूरी बना ली और जल्दी ही वैद्य को भी सफाई देने के लिये सामने आना पड़ा। लेकिन बसपा सुप्रीमो मायावती ने वैद्य के इन विचारों को संघ-भाजपा की अंदरूनी सोच साबित करने में रात-दिन एक कर दिया। अब इसका असर भी दिखने लगा है क्योंकि यूपी में जिस बसपा को सभी ने समाप्त मानना शुरू कर दिया था उसने अगर सत्ता के संघर्ष को त्रिकोणीय स्वरूप दे दिया है तो निश्चित तौर पर इसमें वैद्य के विचारों की भूमिका को कतई सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता है। हालांकि भाजपा को दूसरों की गलती का खामियाजा सिर्फ यूपी में ही नहीं भुगतना पड़ रहा है बल्कि इससे कहीं अधिक मार उसे पंजाब और उत्तराखंड में झेलनी पड़ रही है जहां उसने ऐसे लोगों को अपने साथ जोड़ा हुआ है जिनकी करनी का फल उसे ही भुगतना पड़ रहा है। पंजाब की बात करें तो वहां की सत्ता में भाजपा की भूमिका तो सिर्फ छोटे सहयोगी की ही थी। लेकिन अकालियों की करतूतों के कारण ऐसी भद पिटी है कि इस दफा राजग को तीसरे स्थान पर रहना पड़े तो कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी। जाहिर है कि इसकी सबसे अधिक बदनामी केन्द्र की मोदी सरकार के अलावा भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व को ही झेलनी पड़ेगी। कोई यह तो कहेगा नहीं कि अकालियों की सरकार गिर गयी। हर कोई इसे इसी रूप में प्रचारित करेगा कि भाजपा की पकड़ से पंजाब भी निकल गया। इसी प्रकार उत्तराखंड में आज अगर भाजपा को कांग्रेस की कथित ‘वन मैन आर्मी’ से कड़ी टक्कर झेलनी पड़ी है तो इसकी इकलौती वजह है कांग्रेस के उन सूरमाओं को संगठन में शामिल करना जिन्होंने लंबे अर्से तक कांग्रेस में रहकर ऐसे-ऐसे कारनामों को अंजाम दिया कि सूबे की जनता उन्हें कतई माफ करने के मूड में नहीं दिख रही है। खास तौर से जिस केदारनाथ आपदा के मामले को लेकर भाजपा ने प्रदेश की रावत सरकार का घेराव करने की रणनीति अपनाई थी उसके असली कर्ता-धर्ता तो वे माने जाते हैं जो उस समय प्रदेश के मुख्यमंत्री थे और अब पाला बदलकर भाजपा में शामिल हो गये हैं। हालांकि भाजपा ने उन्हें टिकट देने से तो परहेज बरत लिया लेकिन उनके बेटे को टिकट से वंचित करना संभव नहीं हो सका। इसके अलावा कांग्रेस के टिकट पर विधायक चुने जाने के बाद साढ़े चार साल तक सत्ता की मलाई का लुत्फ उठानेवाले एक दर्जन से भी अधिक विधायक इस दफा भाजपा के टिकट पर चुनाव मैदान में दिखाई पड़ रहे हैं। इसीका नतीजा है कि वहां भाजपा से उन सवालों का भी जवाब मांगा जा रहा है जिस गुनाह से उसका दूर का भी वास्ता नहीं है। खैर, इस तरह के मामलों को समग्रता में देखने से इतना तो स्पष्ट हो ही जाता है कि एक बार के लिये दुश्मन की गलतियों का फायदा उठाने में भूल करके भी जीत उम्मीद की जा सकती है लेकिन हिमायतियों की गलतियों का खमियाजा भुगतने से बच पाना तो नामुमकिन ही है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’  @ नवकांत ठाकुर # Navkant Thakur

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