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शुक्रवार, 26 अक्टूबर 2018

‘सवाल सीबीआई की आग में राख होती साख का’

वाकई गजब की आग दहक उठी है सीबीआई सरीखी ऐसी संस्था में जो स्वायत्त है, खुद-मुख्तार है। जिसकी स्वायत्तता को बरकरार रखने के इंतजाम कागजी तौर पर इतने ठोस हैं कि सरकार भी सीबीआई के मुखिया को ना तो अपनी मर्जी से पद से हटा सकती है और ना ही उसके दो वर्ष के तयशुदा कार्यकाल की सीमा में कोई फेरबदल कर सकती है। चुंकि सीबीआई के मुखिया की नियुक्ति में प्रधानमंत्री, नेता प्रतिपक्ष और सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश शामिल होते हैं लिहाजा ये तीनों मिलकर ही इस संस्था में कोई फेरबदल कर सकते हैं। ऐसे किलानुमा स्वायत्तता की व्यवस्था के बाद अगर संस्था के दो शीर्षतम अधिकारी आपस में लड़ जाएं, दोनों एक-दूसरे को भ्रष्ट व रिश्वतखोर साबित करने में जुट जाएं और दोनों की यह लड़ाई अदालत की दहलीज तक पहुंच जाए तो मामले की असाधारण संगीनता का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। संस्था भी वह जो कि देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी हो। ऐसे में दांव पर सिर्फ उस संस्था की साख ही नहीं लगती बल्कि देश की प्रतिष्ठा और सरकार की प्रशासनिक क्षमता भी सवालों के घेरे में आ जाती है। लिहाजा जब सीबीआई के डायरेक्टर आलोक वर्मा और स्पेशल डायरेक्टर राकेश अस्थाना ने लंबे समय से जारी अपने शीतयुद्ध को सार्वजनिक तौर पर आर-पार की लड़ाई में तब्दील करने की पहलकदमी कर दी तो सरकार के लिये मूकदर्शक बन कर तमाशा देखते रहना नामुमकिन हो गया। हालांकि इन दोनों के बीच लंबे समय से जारी शीतयुद्ध की सरकार अंतिम वक्त तक अनदेखी ही करती रही। ना तो वर्मा द्वारा अस्थाना की पदोन्नति का विरोध किये जाने का गंभीरता से संज्ञान लिया गया और ना ही अस्थाना द्वारा वर्मा के खिलाफ की जाने वाली शिकायतों को कभी विशेष महत्व दिया गया। सरकार साक्षी भाव से तटस्थ और निष्पक्ष ही बनी रही। लेकिन बात जब एफआईआर दर्ज कराने और अस्थाना की गिरफ्तारी की संभावना तक पहुंच गई तब कुछ ऐसा बच ही नहीं गया जिसकी अनदेखी की जा सके। बात केवल इन दोनों की आपसी लड़ाई की नहीं बल्कि मामला सीबीआई की साख का हो गया जिस पर यह तोहमत लग रही थी कि अपराधियों से रिश्वत लेकर सीबीआई के शीर्ष अधिकारी जांच को बाधित करते हैं और मुजरिमों को राहत पहुंचाते हैं। ऐसे में यह मानना पड़ेगा कि सीमित विकल्पों के बावजूद सरकार ने जो प्रभावी कदम उठाए उससे बेहतर और कुछ भी नहीं हो सकता था। हालांकि इन दोनों की लड़ाई में कौन पीड़ित-प्रताड़ित है और कौन साजिशकर्ता मास्टरमाइंड इसका फैसला तो समुचित व निष्पक्ष जांच के बाद ही होगा। लेकिन फिलहाल सरकार के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती थी सीबीआई की साख को बरकरार रखना, संस्था के काम को प्रभावित होनेे से बचाना और निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करना। इन चुनौतियों से निपटने के लिये सरकार ने ना सिर्फ कार्रवाई में निष्पक्षता सुनिश्चित की बल्कि दोनों के साथ एक-बराबर सलूक करते हुए पूरे मामले को निर्णायक परिणति तक पहुंचाने का प्रभावी इंतजाम भी कर दिया। सरकार ने लंबी छुट्टी पर भेजा तो दोनों को भेजा। एसआईटी से दोनों की बराबर जांच कराने की बात कही गई। दोनों के कार्यालय को एक बराबर तरीके से खंगाला गया और उसमें संस्था के किसी तीसरे को घुसने की इजाजत नहीं दी गई। सीबीआई की कमान भी नंबर तीन कहे जानेवाले नागेश्वर राव को सौंपी गयी जिन्होंने दोनों द्वारा नियुक्त किये गये उनके करीबी अधिकरियों का थोक के भाव में तबादला सुनिश्चित किया। यानि समग्रता में देखें तो विवश होकर सरकार द्वारा सीबीआई में किये गये हस्तक्षेप को किसी भी लिहाज से कतई पक्षपातपूर्ण नहीं कहा जा सकता है। ऐसे में बेहतर होता कि सरकार द्वारा विवशता में उठाए गए इस कदम का एहतराम और सम्मान किया जाता। लेकिन चुनावी वर्ष होने के कारण हर मामले का राजनीतिक पहलू उभारने और सरकार की शासन व प्रशासन क्षमता पर उंगली उठाकर अपनी राजनीति चमकाने का मौका भला कोई कैसे हाथ से जाने दे सकता है। तभी तो वर्मा को सीबीआई का निदेशक बनाये जाने का विरोध करनेवाले अब उन्हें लंबी छुट्टी पर भेजे जाने का भी विरोध कर रहे हैं। विरोध कभी इस स्तर का कि वर्मा के कांधे पर बंदूक रखकर सवोच्च न्यायालय से ऐसा कारतूस हासिल करने का प्रयास किया जा रहा है जिससे सरकार की पगड़ी पर सीधा निशाना दागा जा सके। कांग्रेस तो एक कदम और आगे बढ़ गई और उसने सीबीआई की साख बचाने के लिये सरकार द्वारा उठाए गए कदमों को असंवैधानिक व नियमों के खिलाफ बताते हुए पूरे मामले को राफेल सौदे से जोड़ दिया। जबकि यह सामान्य समझ की बात है कि आखिर राफेल खरीद के मामले से सीबीआई का क्या संबंध हो सकता है? सीबीआई को जब ना तो सरकार ने और ना ही अदालत ने राफेल सौदे की जांच के लिये अधिकृत किया है तो यह कहना वाकई मजाकिया ही है कि राफेल की जांच करने का प्रयास करने के कारण वर्मा पर सरकार का नजला गिरा है। खैर इश्क, जंग और सियासत में जो ना हो जाए वह कम है। वैसे अगर एक मिनट के लिये यह मान भी लिया जाए कि सरकार ने पूरे मामले में बहुत ही गलत किया है तो समस्या गिनाने वालों को कोई ऐसा समाधान भी बताना चाहिये ताकि सीबीआई की साख भी सलामत रहे, दोषियों की पहचान भी हो और निर्दोष को प्रताड़ना से भी बचाया जा सके? ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर #Navkant_Thakur

गुरुवार, 4 अक्टूबर 2018

‘भूमि परा कर गहत अकासा’ की स्थिति में बसपा


कहते हैं कि जिसके पास खोने के लिये कुछ नहीं होता उसके सामने पाने के लिये सारा जहान होता है। यही स्थिति है बसपा सुप्रीमो मायावती की। आखिर बचा ही क्या है उनके पास खोने के लिए? लोकसभा में पिछली बार ही बसपा का पूरी तरह सफाया हो गया था। इस बार सूबे की विधानसभा में भी हाथी की सवारी करके महज 19 विधायक ही जीत दर्ज कराने में कामयाब हो पाए हैं। सच पूछा जाए तो वर्ष 2007 के चुनाव में सोशल इंजीनियरिंग के दम पर 206 सीटें जीत कर सूबे में अपनी सरकार बनाने वाली बसपा का बेड़ा तो 2012 के विधानसभा चुनाव में ही गर्क हो गया जब उसे महज 80 सीटों पर ही जीत नसीब हुई और 126 सीटें उसके हाथों से फिसल गईं। लेकिन वहां से संभलने के बजाय बसपा का हाथी चुनावी दलदल में नीचे की ओर ही धंसता चला गया और इस बार के विधानसभा चुनाव में तो उसे सिर्फ 19 सीटों से ही संतोष करना पड़ा। यानि अब बसपा के पास गंवाने के लिये कुछ नहीं बचा है। कुछ नहीं बचने का मतलब वाकई पल्ले में कुछ नहीं होना ही है क्योंकि अपने मौजूदा विधायकों की तादाद के दम पर बसपा राज्यसभा की एक भी सीट नहीं जीत सकती। लेकिन संसद या विधानसभा में सीटों की तादाद की बात अलग कर दें तो जमीन पर बसपा की स्थिति उतनी प्रतिकूल नहीं है। बीते लोकसभा चुनाव में बसपा ने भले ही एक भी सीट ना जीती हो लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर चार फीसदी से अधिक और यूपी में भी बीस फीसदी से अधिक वोट हासिल करके जनाधार के मामले में वह देश की तीसरी सबसे ताकतवर पार्टी के तौर पर सामने आई। इसी प्रकार यूपी विधानसभा के लिये पिछले साल हुए चुनाव में भी बसपा के खाते में सवा बाईस फीसदी वोट आए। यानि इस बात से कतई इनकार नहीं किया जा सकता है कि तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद बसपा का परंपरागत वोटबैंक लगातार उसके साथ पूरी तरह जुड़ा हुआ है लिहाजा पार्टी को शून्य या समाप्त मान लेना कतई उचित नहीं होगा। ऐसे में बसपा के पास दो विकल्प हैं। या तो वह महा-गठजोड़ में शामिल होकर अपनी वापसी के लिये सुरक्षित राह अपनाए जिसमें सीमित तादाद में सीटों पर लड़ने के बावजूद उसके पास सम्मानजनक संख्या में सीटें जीतने की संभावना बन सकती है। लेकिन इस विकल्प पर अमल करने के नतीजे में उसे केन्द्र की राजनीति में अग्रिम मोर्चे पर आने का लोभ-मोह छोड़ना होगा और कांग्रेस का हाथ मजबूत करने में सहभागी बनना होगा। लेकिन दूसरा विकल्प यह है कि बसपा ‘तूफानों से आंख मिलाए, सैलाबों पर वार करे, मल्लाहों का चक्कर छोड़े, तैर कर दरिया पार करे।’ फिलहाल बसपा ने दूसरे विकल्प को आजमाने की ही राह पकड़ी है ताकि अपने बाजुओं की ताकत को तौलने और जमीनी स्तर पर बह रही हवाओं की दशा-दिशा का ठोस आकलन करने के बाद ही लोकसभा चुनाव के लिये निर्णायक रणनीति बनाई जाए। इसी वजह से पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में उसने कांग्रेस से किनारा करके अपनी अलग राह पकड़ी है। खास तौर से उसे संभावना टटोलनी है मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में जहां उसने तीसरी ताकत के तौर पर उभरने का लक्ष्य निर्धारित किया है। अब तमाम संभावनाएं इस बात पर टिकी हैं कि जमीनी स्तर पर भाजपा की मजबूती यथावत बरकरार है अथवा मतदाता विकल्प की तलाश में हैं। अगर विकल्प की तलाश के प्रति मतदाताओं का रूझान सामने आया तो कांग्रेस और भाजपा के साथ समानांतर दूरी कायम करके चलना ही बसपा के लिये मुनासिब होगा। वैसे भी मतदाताओं द्वारा विकल्प की तलाश किया जाना तीसरी ताकतों के लिये बेहद शुभ संकेत होगा क्योंकि इससे लोकसभा चुनाव में खंडित जनादेश आने की संभावना प्रबल हो जाएगी। हालांकि बसपा इकलौती पार्टी नहीं है जो खंडित जनादेश का सपना देख रही है और केन्द्र में मजबूर सरकार बनने की दुआ कर रही है। बल्कि एनसीपी, तृणमूल कांग्रेस और वामपंथी दलों से लेकर टीडीपी तक की ख्वाहिश यही है कि इस बार के लोकसभा चुनाव में कांग्रेसनीत संप्रग और भाजपानीत राजग में से जो भी आगे निकले उसका सफर अधिकतम डेढ़-सौ से दौ-सौ सीटों के बीच ही ठहर जाए। ऐसी सूरत में तीसरी ताकतों को आगे आने का सुनहरा मौका मिलेगा और उसमें भी जिसकी जितनी संख्या भारी होगी उसकी उतनी ही प्रबल दावेदारी होगी सत्ता की मलाई में अधिकतम हिस्सेदारी की। इसी सोच के तहत कांग्रेस और भाजपा से अलग हटकर कई धाराएं अपनी दिशा तलाश रही हैं जिसमें मायावती से लेकर ममता बनर्जी और शरद पवार का नाम मुख्य रूप से शामिल है। चुंकि मायावती के पास फिलहाल खोने के लिये कुछ भी नहीं बचा है लिहाजा अगर वह ‘भूमि परा कर गहत अकासा’ यानि जमीन से उठकर पूरे आसमान को पकड़ने का प्रयास कर रही है तो इसमें कुछ भी गलत या अस्वाभाविक नहीं है। वैसे भी मौजूदा राजनीतिक हालातों में बसपा के पास दोबारा सोशल इंजीनियरिंग की उस रणनीति को आजमाने का मौका है जिसके दम पर उसने पिछले दशक में यूपी में अपनी पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी। अगर यह रणनीति कामयाब रही तो तीसरी सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरने का बसपा के पास इस बार बेहतरीन मौका है जिसे सिर्फ अपने अस्तित्व पर आए तात्कालिक खतरे से डर कर गंवाना किसी भी लिहाज से कतई उचित नहीं होगा। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’  @ नवकांत ठाकुर #Navkant_Thakur

सोमवार, 16 जुलाई 2018

‘बड़े की जगह पर बेहतर का चयन’

क्रिकेटर सचिन तेंडुलकर और अभिनेत्री रेखा के अलावा देश की सबसे अमीर महिलाओं में गिनी जानेवाली अनु आगा व नेहरू-गांधी परिवार के सबसे विश्वासपात्र वकीलों में शुमार किये जानेवाले के. पराशरण का कार्यकाल पूरा होने के बाद उनके स्थान पर राज्यसभा के लिये मनोनीत किये जाने वाले नामों को देखकर तो यही लगता है कि इनको आगे लाने में ठोस सियासी समीकरणों के अलावा इस बात का भी खास ध्यान रखा गया है कि पूर्ववर्ती मनोनीत सांसदों की तरह ये निष्क्रिय ना रहें। हालांकि इन चारों के नामों पर अंतिम मुहर लागने से पहले यह विकल्प भी उपलब्ध था कि पिछली सरकार की तरह बड़े नामों व चमकदार चेहरों को आगे बढ़ाकर समाज के उच्च व अभिजात्य वर्ग की वाहवाही लूटी जा सके। बताया जाता है कि कुछ बड़े व स्वनाम धन्य लोगों को राज्यसभा के लिये मनोनीत करने पर विचार भी किया गया लेकिन आखिरकार यही तय हुआ कि ऐसे लोगों को संसद की सदस्यता दी जाये जो सदन की बैठकों में सक्रियता के साथ शामिल हों ताकि उनके अनुभव व ज्ञान का देश व समाज को लाभ मिले। साथ ही राजनीतिक व सैद्धांतिक समीकरणों का असर भी मनोनीत सांसदों की सूची पर स्पष्ट दिख रहा है क्योंकि जिन राज्यों में जिस तबके के बीच सत्तारूढ़ भाजपा को अपनी पैठ बढ़ानी व बनानी है उसका भी इन नामों के चयन में खास ध्यान रखा गया है। वास्तव में देखा जाये तो रेखा या सचिन जैसे बड़े व चमकदार नामों को संसद के लिये मनोनीत किये जाने से देश व समाज को कुछ भी हासिल नहीं हुआ। अव्वल तो इन्होंने सदन की बैठकों में नाम मात्र के लिये ही उपस्थिति दर्ज कराई और दूसरे पूरे कार्यकाल के दौरान ये लोग काफी हद तक निष्क्रिय ही बने रहे। आंकड़े बताते हैं कि छह साल के कार्यकाल के दौरान रेखा की महज पांच फीसदी जबकि सचिन सिर्फ सात फीसदी ही सदन की बैठकों में उपस्थिति दर्ज हुई। इनके पास इतनी फुर्सत ही नहीं होती थी कि सांसद के तौर पर ये सदन की बैठक में शामिल हो सकें। वह भी तब जबकि मोदी सरकार के कार्यकाल में देश व समाज के हित में सार्थक काम करने का मौका मुहैया कराते हुए संसद ने रेखा को वर्ष 2016 में फूड, कंज्यूमर अफेयर्स और पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन की समिति का और सचिन को भी उसी वर्ष इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी से जुड़ी समिति का सदस्य भी बनाया लेकिन इस अवसर का उपयोग करने की भी उन्होंने कोई जरूरत महसूस नहीं की जिसके कारण समिति में उनके योगदान का कोई ब्यौरा उपलब्ध नहीं है। इसके अलावा सांसद होने के नाते सरकार से सवाल पूछना और जनहित के विधेयक पेश करना भी उनकी जिम्मेवारी थी लेकिन रेखा ने तो दिखाने या गिनाने के लिये भी कभी कोई सवाल नहीं पूछा अलबत्ता सचिन ने जरूर पूरे छह साल में तकरीबन दो दर्जन सवाल पूछे। जाहिर है कि ऐसे में बड़े नामों व चमकदार चेहरों को सांसद के तौर पर मनोनीत करने से देश व समाज का कितना भला होता यह शायद ही किसी को अलग से बताने की जरूरत पड़े। उनके स्थान पर जिन लोगों को इस बार सरकार की सिफारिश व राष्ट्रपति की मंजूरी से राज्यसभा का सदस्य मनोनीत किया गया है उनसे यह उम्मीद करना कतई गलत नहीं होगा कि वे ना सिर्फ सदन में पूरी तरह अपनी सक्रियता दिखाएंगे बल्कि अपनी मुखर व प्रखर सोच व व्यक्तित्व का लाभ देश व समाज को भी पहुंचाएंगे। इस बार जिन चार नामों का चयन किया गया है उनमें यूपी के सोनभद्र जिले के रॉबर्ट्सगंज लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र से तीन बार सांसद रहे रामशकल जाने-माने किसान नेता व दलित विचारक हैं जबकि राकेश सिन्हा राष्ट्रवादी विचारों को मीडिया के माध्यम से प्रखरता के साथ प्रस्तुत करने के लिए जाने जाते हैं। इसी प्रकार महाराष्ट्र की सोनल मानसिंह ना सिर्फ मशहूर नृत्यांगना व पद्म विभूषण, पद्म भूषण और संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित हैं बल्कि मुखर-प्रखर वक्ता व विचारक के तौर पर भी जानी जाती हैं। इसी प्रकार ओडिशा के जाने-माने पाषाण-मूर्तिकार रघुनाथ महापात्रा के ज्ञान, दक्षता व लोकप्रियता को लेकर हर्गिज शक-सुबहा नहीं किया जा सकता है। यानि ये चारों नाम ऐसे हैं जिनसे संसद में व्यापक सक्रियता की उम्मीद करना कतई गलत नहीं होगा। साथ ही इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि इन चारों का चयन करने से सरकार को लेकर उस तबके के बीच सकारात्मक संदेश प्रसारित होगा जिसका सीधा राजनतिक लाभ भाजपा को ही मिलेगा। जहां एक ओर रामशकल को आगे लाकर यूपी के किसानों व दलितों का संसद के ऊपरी सदन में प्रतिनिधित्व दिखाया व बढ़ाया गया है वहीं भाजपा की मातृ संस्था आरएसएस के मुखर विचारक व कायस्थ समाज के बिहारी प्रतिनिधि के तौर पर राकेश सिन्हा को आगे किए जाने का राजनीतिक संदेश भी दूर तक जाना तय ही है। इसके अलावा सोनल मानसिंह का नाम महाराष्ट्र ही नहीं बल्कि पश्चिम बंगाल से लेकर दक्षिण भारत तक में मौजूद कला व संस्कृति में रूचि रखने वालों के बीच सकारात्मक संदेश देने वाला है जबकि महापात्रा की प्रसिद्धि ओडिसा में भाजपा के प्रति भावनात्मक जुड़ाव की राह तैयार करेगी। कुल मिलाकर इस बार बड़े के बजाय बेहतर नामों के चयन की जो पहल हुई है वह सियासी नजरिये से भी लाभदायक है और इनसे देश व समाज को भी भरपूर लाभ मिलने से कतई इनकार नहीं किया जा सकता। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’  @नवकांत ठाकुर #Navkant_Thakur

रविवार, 20 मई 2018

‘आखिरकार बेबसी का सबब बन गयी बेसब्री’


कर्नाटक में जितना स्वाभाविक भाजपा की सरकार का बनना था उतना ही स्वाभाविक इसका बहुमत परीक्षण में असफल होना भी था। जब प्रदेश के चुनाव का नतीजा आया तो त्रिशंकु विधानसभा के लिये मिले खंडित जनादेश में बहुमत के लिये आवश्यक 112 सीटें तो किसी को नहीं मिल सकीं लेकिन कुल 104 सीटें जीत कर भाजपा सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर अवश्य उभरी। दूसरी ओर कांग्रेस को पिछली बार मिली 122 सीटों के मुकाबले इस बार सिर्फ 78 सीटों पर ही सिमट कर रह जाने के लिये मजबूर होना पड़ा जबकि बसपा-जेडीएस गठजोड़ 38 सीटों के साथ तीसरी ताकत के रूप में उभरा। हालांकि अपनी हार का गम गलत करने और भाजपा की जीत का जायका बिगाड़ने के लिये कांग्रेस ने चुनावी नतीजा सामने आने तत्काल बाद ही जेडीएस को बिना शर्त समर्थन का ऐलान करते हुए बहुमत के आंकड़े की स्पष्ट तस्वीर दिखा दी। लेकिन अव्वल को कांग्रेस ने कूटनीतिक ख़ुराफ़ात करके भाजपा को रोकने की कोशिश की थी और दूसरे भाजपा ही सबसे बड़ी ताकत के तौर पर सामने आई थी लिहाजा राज्यपाल वजूभाई वाला ने स्वाभाविक तौर पर भाजपा के सरकार गठन के दावे को स्वीकार कर लिया और बीएस येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाते हुए उन्हें विश्वासमत हासिल करने के लिये पंद्रह दिनों की मोहलत दे दी। यानि कहने का तात्पर्य यह कि ना तो राज्यपाल ने येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री नियुक्त करके कोई गलती की और ना ही भाजपा ने सरकार बनाने का दावा करके कोई अनैतिक काम किया। लेकिन एक तरफ तो भाजपा के पास बहुमत का आंकड़ा उपलब्ध नहीं था और दूसरे कांग्रेस द्वारा सुप्रीम कोर्ट में इंसाफ की गुहार लगाये जाने के बाद विश्वासमत हासिल करने के लिये मिली पंद्रह दिनों की मोहलत महज तीन दिनों में सिमट गई लिहाजा येदियुरप्पा की अल्पमत सरकार का विश्वासमत के दौरान गिरना भी स्वाभाविक ही था। ऐसे में यह कहना कतई गलत नहीं होगा कि चुनाव परिणाम सामने आने के बाद कर्नाटक में जो राजनतिक घटनाक्रम दिखा है वह बेहद स्वाभाविक भी है और सहज भी। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम को राजनीतिक नजरिये से देखा जाये तो यह सीधे तौर पर भाजपा की हार है और कांग्रेस की जीत। भाजपा जीती हुई बाजी हार गयी है और कांग्रेस ने हारे हुए गढ़ पर अपनी जीत का झंडा लहराने में कामयाबी हासिल कर ली है। निश्चित तौर पर कांग्रेस ने भाजपा की हलक में हाथ डालकर जीत के निवाले पर कब्जा जमाया है। लिहाजा कांग्रेस के लिये यह जीत बेहद खास भी है और यादगार भी। कांग्रेस को पूरा हक है कि वह इस जीत का खुलकर जश्न मनाए और जेडीएस के साथ मिलकर या तो साझेदारी की सरकार बनाए या फिर अपने समर्थन से उसकी सरकार बनवाए। लेकिन भाजपा के नजरिये से देखा जाये तो उसके लिये निश्चित तौर पर यह आत्मचिंतन का मसला है कि आखिर ऐसा हुआ क्यों? जब बहुमत का आंकड़ा उसके पास उपलब्ध ही नहीं था और कांग्रेस ने जेडीएस को बिना शर्त समर्थन देने का ऐलान करते हुए तुरूप का इक्का फेंक दिया तो उस बाजी में उलझने की बेसब्री क्यों दिखाई गई। कांग्रेस का समर्थन मिल जाने के बाद जब जेडीएस के पास बहुमत का आंकड़ा स्पष्ट दिखाई पड़ गया तो फिर राज्यपाल के पास जाकर सरकार बनाने का दावा करने की जल्दबाजी करने के बजाय पहले बहुमत का आंकड़ा जुटाने की कोशिश क्यों नहीं की गई। साथ ही सवाल तो यह भी उठेगा ही कि आखिर राज्यपाल ने विश्वासमत हासिल करने के लिये येदियुरप्पा को पंद्रह दिनों की मोहलत देने की ऐतिहासिक दरियादिली क्यों दिखाई जो सुप्रीम कोर्ट को भी हजम नहीं हुई और उसे इस अवधि को कम करने के लिये विवश होना पड़ा। खैर, अब इन तमाम मसलों पर चिंतन करने और गलतियों पर माथा पीटने के लिये भाजपा की कर्नाटक इकाई के पास पर्याप्त समय है। लेकिन पार्टी के केन्द्रीय नेतृत्व को इस पूरे प्रकरण से जो नुकसान पहुंचा है उसकी भरपाई तो नामुमकिन ही है। सच तो यह है कि चुनावी नतीजों में सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरने और बहुमत के लिये आवश्यक आंकड़े से महज सात सीटें ही कम होने के बावजूद भाजपा को जिस कदर भारी फजीहत का सामना करना पड़ा है उसकी मुख्य तौर पर तीन वजहें रही हैं। अव्वल तो लगातार जीत के सिलसिले को कर्नाटक में भी जारी रखने का भारी दबाव पार्टी ने अपने ऊपर ओढ़ लिया जिसके कारण उसे विकल्पहीनता की स्थिति का सामना करना पड़ा और दूसरे गोवा की ही तर्ज पर आनन-फानन में सरकार बनाकर विरोधियों को लाजवाब कर देने की बेसब्री भरी नीति पर कर्नाटक में भी अमल करना उसके लिये आत्मघाती साबित हुआ। इस सबके अलावा तीसरी सबसे बड़ी गलती प्रशासनिक स्तर पर हुई जिसमें विश्वासमत के लिये 15 दिनों के मोहलत को स्वीकार करने के बजाय इसे अधिकतम एक सप्ताह की समय सीमा में समेट दिया जाता तो सुप्रीम कोर्ट को भी इसमें दखल देने की जरूरत महसूस नहीं होती और इस बीच में आसानी से बहुमत जुटाने के लिये उपलब्ध विकल्पों को टाटोला जा सकता था। लेकिन कहावत है कि ‘जाके प्रभु दारूण दुख देहीं, वाकी मति पहिले हरि लेहीं।’ यही भाजपा के साथ भी हुआ है वर्ना पार्टी का वह शीर्ष नेतृत्व एक साथ इतनी आत्मघाती गलतियां कतई नहीं कर सकता था जो प्रतिकूल परिस्थितियों में जीत हासिल करने का चैम्पियन माना जाता हो। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’ @नवकांत ठाकुर #Navkant_Thakur

गुरुवार, 17 मई 2018

‘तुम्हारी भी जय-जय, हमारी भी जय-जय’


कर्नाटक में जितना नाटक चुनाव से पहले हुआ, उतना ही चुनाव के दौरान हुआ और उससे भी अधिक चुनाव के बाद। दरअसल वहां का चुनावी नतीजा ही ऐसा है जिसमें हारा कोई नहीं है। सभी जीते ही हैं। सीटों की तादाद के लिहाज से भाजपा को जीत मिली है क्योंकि उसके खाते में सबसे अधिक 104 सीटें आई हैं। वोट के हिसाब से कांग्रेस जीती है क्योंकि उसे भाजपा के मुकाबले 1.8 फीसदी वोट अधिक मिले हैं। भाजपा को सूबे के 36.2 फीसदी मतदाताओं ने अपना वोट दिया है जबकि कांग्रेस की झोली में 38 फीसदी वोट हैं। इसके अलावा जीती तो वह जेडीएस भी है जिसने भाजपा और कांग्रेस के बीच हुई जोरदार कांटे की टक्कर में भी ना सिर्फ पूरी मजबूती के साथ अपना अस्तित्व कायम रखा है बल्कि कुल 37 सीटों पर कब्जा जमाते हुए दोनों राष्ट्रीय पार्टियों को बहुमत के आंकड़े से काफी पीछे ही रोक दिया है। यानि समग्रता में देखा जाये तो यह जनादेश ‘तुम्हारी भी जय-जय और हमारी भी जय-जय’ का ही है। पूरा मामला ‘ना तुम जीते ना हम हारे’ टाइप का होकर रह गया है। वैसे भी जब किसी एक को पूरी जीत मिल ही नहीं पाई है तो दूसरा उसकी जीत और अपनी हार को स्वीकार क्यों करे? ऐसे में जब कोई हार स्वीकार करने के लिये विवश ही नहीं है तो फिर यह घमासान होना तो स्वाभाविक ही है कि आखिर सरकार किसकी बने। मतदान होने तक तो तीनों ही पार्टियां एक दूसरे को हराने और निपटाने में ही जी-जान से पिली हुई थीं लेकिन जनादेश सामने आने के बाद की परिस्थितियों में तस्वीर पलट गई है। अब भाजपा का दावा है कि सरकार बनाने का पहला मौका उसे ही मिलना चाहिये क्योंकि सबसे बड़े दल के तौर पर उभरने में उसे ही सफलता मिली है और बहुमत के आंकड़े के सबसे करीब तक पहुंचने में उसे ही कामयाबी मिली है। लेकिन कांग्रेस का तर्क है कि अगर जनता ने भाजपा को सत्ता के संचालन का जनादेश दिया होता उसे अपने दम पर पूर्ण बहुमत मिल गया होता। लेकिन ऐसा तो हुआ नहीं है। बहुमत के आंकड़े से तो वह भी आठ पायदान नीचे है। ऐसे में मौजूदा विधानसभा में भाजपा के बजाय उसे सरकार बनाने का मौका मिलना चाहिये जिसे बहुमत के लिये आवश्यक तादाद में नवनिर्वाचित विधायक अपना समर्थन दें। इस लिहाज से कांग्रेस ने भाजपा की जीत का जायका बिगाड़ते हुए जेडीएस को अपना समर्थन दे दिया है जिसके नतीजे में इन दोनों दलों की संयुक्त ताकत बहुमत के आंकड़े के लिये आवश्यक आंकड़े से अधिक ही बैठती है। यानि एक ओर भाजपा ने भी सरकार बनाने के लिये कमर कस ली है और दूसरी ओर भाजपा के विजय रथ का पहिया पंचर करने के लिये कांग्रेस ने भी जेडीएस को बिना शर्त अपना समर्थन दे दिया है। दोनों ने राजभवन जाकर अपना दावा भी पेश कर दिया है और दोनों को इंतजार है सरकार बनाने के लिये राजभवन से बुलावे का। यानि गेंद चली गई है राज्यपाल वजूभाई वाला के हाथों में। उन्हें ही फैसला करना है कि किसे सरकार बनाने के लिये आमंत्रित किया जाये। निश्चित तौर पर राज्यपाल का फैसला ही अंतिम होगा जिसे चाहे-अनचाहे सबको स्वीकार भी करना ही होगा। लेकिन इस बीच बड़ा सवाल है कि आखिर इस जनादेश को निष्पक्षता व तटस्टस्था से किस रूप में समझा जा जाए। हालांकि इस बात में तो कोई शक ही नहीं है कि त्रिशंकु विधानसभा का जनादेश ऐसी ही सूरत में सामने आता है जब आम मतदाता भी विकल्प चुनने को लेकर किसी आम राय पर नहीं पहुंच पाते। उनके बीच भी असमंजस व द्वन्द्व की स्थिति रहती है। लेकिन तमाम उहापोह और असमंजस के बीच भी त्रिशंकु विधानसभा के लिए आए इस खंडित जनादेश के मायने बेहद ही स्पष्ट हैं। जनादेश को गहराई से परखा जाए तो इसका सबसे स्पष्ट मतलब यही है कि कांग्रेस को जनता ने सिरे से खारिज कर दिया है और उसे लगातार दूसरी बार सत्ता की बागडोर अपने हाथों में लेने का मौका नहीं दिया है। तभी तो सत्ता की दौड़ में उसे भाजपा से काफी नीचे के पायदान पर खड़ा होने के लिये विवश होना पड़ा है। हालांकि कांग्रेस ने चुपचाप इस जनादेश को शिरोधार्य कर लिया है। तभी तो पूरा नतीजा सामने आने से पहले ही सिद्धारमैया ने अपना त्यागपत्र राज्यपाल को सौंप दिया और कांग्रेस नेतृत्व ने भी पार्टी की सरकार बनाने की कवायदें शुरू करने से परहेज बरत लिया। वैसे यह कांग्रेस को भी बेहतर पता है कि उसके विकल्प के तौर पर जनता ने भाजपा को ही चुना है और जेडीएस को भी तीसरे पायदान पर रखते हुए स्पष्ट तौर पर विपक्ष में बैठने का ही निर्देश दिया है। यानि बहुमत के आंकड़े से दूर रह कर भी यह चुनाव भाजपा के लिये जीत की खुशखबरी लेकर ही आयी है। लेकिन सवाल है कि जब किसी एक दल या चुनाव-पूर्व गठबंधन को अपने दम पर पूर्ण बहुमत का लक्ष्य हासिल नहीं हो पाया है तो आखिर सरकार बनेगी कैसे? तभी तो कांग्रेस ने भाजपा को रोकने के लिये जेडीएस को समर्थन देने का दांव चल दिया है। यानि कर्नाटक का जो नाटक अभी सड़क पर चल रहा है वह राज्यपाल द्वारा किसी एक पक्ष को सरकार बनाने का निमंत्रण दिये जाने के बाद विधानसभा के भीतर बहुमत साबित होने तक बदस्तूर जारी रहेगा। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’

मंगलवार, 17 अप्रैल 2018

‘अपनों को दुत्कार कर परायों से प्यार’

राजनीति में आडवाणी शब्द अब संज्ञा से बढ़कर विशेषण हो गया है। यह विशेषण विभिन्न दलों के नेताओं के साथ भी जुड़ रहा है और कई सामाजिक संगठनों के संचालकों के साथ भी। सबसे ताजा आडवाणी बने हैं डाॅ प्रवीण तोगडिया, जिन्हें दूध में गिरी हुई मक्खी की तरह विश्व हिन्दू परिषद के कार्यकारी अध्यक्ष के पक्ष से धक्के मार कर हटाया गया है। इसी प्रकार कांग्रेस ने भी जनार्दन द्विवेदी को संगठन महासचिव के पद से हटाकर आडवाणी ही बना दिया है। कहा तो यह जा रहा है कि शीघ्र ही कांग्रेस में आडवाणियों की फौज दिखाई देगी। जदयू ने शरद यादव को आडवाणी बना दिया है। लेकिन सबसे कम उम्र के स्वघोषित आडवाणी तो कुमार विश्वास ही हैं जिनसे आम आदमी पार्टी ने राजस्थान के संयोजक की जिम्मेवारी भी छीन ली है। हालांकि विश्वास के साथ यह व्यवहार होना तो तब ही तय हो गया था जब उन पर अरविंद केजरीवाल को किनारे करने के लिए पार्टी में बगावत का माहौल खड़ा करने का इल्जाम लगा था। वैसे भी सेना द्वारा पाकिस्तान में की गई सर्जिकल स्ट्राइक को सही करार देते हुए इसका सबूत मांगे जाने को गलत बताने के बाद से ही विश्वास पार्टी आलाकमान का भरोसा खो चुके थे और संगठन में विघटन के बीजारोपण का इल्जाम सामने आने के बाद उन्हें प्रबल दावेदारी के बावजूद राज्यसभा के टिकट से वंचित कर दिया गया था। बताया जाता है कि आप सुप्रीमो केजरीवाल ने उन्हें पहले ही बता दिया था कि वे उन्हें मारेंगे जरूर लेकिन शहीद नहीं बनने देंगे। ऐसा ही हुआ भी है। पहले उन्हें राज्यसभा के टिकट से वंचित किया गया और अब राजस्थान का प्रभार छीन कर उन्हें केजरीवाल ने राजनीतिक तौर पर मार भी डाला है और शहादत का संतोष भी मयस्सर नहीं होने दिया है। लेकिन इसके लिए जिन तर्कों और दलीलों की आड़ ली गई है वह ना सिर्फ हास्यास्पद बल्कि अविश्वसनीय भी है। आप की ओर से कहा गया है कि इस साल के अंत में होने वाले राजस्थान विधानसभा चुनाव को लेकर कतई जोखिम नहीं लिया जा सकता। पार्टी के मुताबिक अपनी व्यस्तताओं के कारण विश्वास राजस्थान में अपेक्षित वक्त नहीं दे पा रहे थे जिससे आप के हितों को नुकसान पहुंच रहा था। हालांकि पार्टी कुछ भी कहे लेकिन सच तो यह है कि राज्यसभा के टिकट से वंचित किए जाने और राजनीति की मुख्यधारा से हाशिये पर धकेले जाने के बाद अपनी निष्ठा और समर्पण को साबित करने के लिए विश्वास ने खुद को पूरी तरह राजस्थान में झोंक दिया था। खैर, सच पूछा जाए तो केजरीवाल ने विश्वास को अपना वही रंग दिखाया है जिसका स्वाद अन्ना हजारे पहले ही चख चुके हैं। अन्ना को चकमा देकर उनके सामाजिक आंदोलन का राजनतिकरण करने के बाद उन्होंने ना सिर्फ भूषण पिता-पुत्र, प्रो. आनंद कुमार व योगेन्द्र यादव सरीखे पार्टी के शीर्ष संस्थापकों को बेइज्जत करके संगठन से निकाला बल्कि अमानुल्ला खान को निलंबित और कपिल मिश्रा को निष्कासित करके स्पष्ट तौर पर जता दिया कि वे जिस पार्टी का संचालन कर रहे हैं उसका नाम भले ही एएपी यानि ‘आम आदमी पार्टी’ हो लेकिन उसकी रीति-नीति एएपी यानि ‘अरविंद अकेला पार्टी’ की ही रहेगी। जो भी उनके वर्चस्व को चुनौती देने की हिमाकत या अपनी मर्जी से एक कदम भी आगे बढ़ने की जुर्रत करेगा उसके लिए पार्टी में कोई जगह नहीं होगी। आप में रह कर सही बात को सही और गलत को गलत कहने का अंजाम क्या होता है उसके भुक्तभोगी विधायक देविंदर सहरावत भी हैं जिन्हें पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस कारण निलंबित कर दिया गया क्योंकि उन्होंने पार्टी की पंजाब इकाई के नेताओं पर टिकट के बदले महिलाओं के शोषण का आरोप लगाया था। इसी प्रकार का व्यवहार पंजाब में पार्टी को खड़ा करनेवाले सुच्चा सिंह के साथ भी हुआ जिन्हें प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान ही सूबे के संयोजक पद से हटा दिया गया। यानि समग्रता में देखा जाए तो केजरीवाल ने हर किसी का सिर्फ इस्तेमाल ही किया और जब बदले में कुछ देने की नौबत आई तो उसे संगठन से बाहर खदेड़ दिया। अब स्थिति यह है कि पार्टी में ऐसे लोग गिने-चुने ही बचे हैं जो शून्य से शिखर के सफर में शुरू से केजरीवाल के साथ रहे हों। लेकिन यह तय है कि अब तक जिस तरह से केजरीवाल अपने बराबर बैठने वालों को एक के बाद एक करके किनारे लगाते आए हैं उसी तर्ज पर उनका अगला बड़ा शिकार भी जल्दी ही सामने आ जाएगा। सच पूछा जाए तो काम निकाल लेने के बाद किसी को भी दूध में पड़ी हुई मक्खी की तरह उठाकर बाहर फेंक देने की कला में केजरीवाल वाकई सिद्धहस्त हो चुके हैं। खैर, अब तक तो उनकी यह कार्यशैली लगातार सफल ही साबित होती आ रही है और उन्हें इसका कोई नुकसान नहीं झेलना पड़ा है। लेकिन केजरीवाल ने अपनों को अपमानित और प्रताड़ित करने की जो राह पकड़ी हुई है उससे भले अभी तक उनका निजी तौर पर कोई बड़ा नुकसान ना हुआ हो लेकिन इसने किसी अन्य आंदोलन से बदलाव की बयार बह पाने की उम्मीदों को अवश्य ही चकनाचूर कर दिया है। अब जब भी कोई नया आंदोलन अस्तित्व में आएगा तो उसे सबसे पहले केजरीवाल द्वारा गढ़ी गई ऐसी छवि से चुनौती मिलेगी जिसके कारण आम लोग अब शायद ही किसी नए-नवेले पर भरोसा कर पाएं। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @नवकांत ठाकुर #Navkant_Thakur

गुरुवार, 5 अप्रैल 2018

‘सतह पर आने के बाद जड़ों की तलाश’


जिस दरख्त को वक्त की आंधी ने अर्श से फर्श पर पटक दिया हो उसके पास दो ही विकल्प बचते हैं। या तो वह दोबारा हिम्मत, ऊर्जा और जोश को एकत्र कर दोबारा खड़े होने के लिए कमर कसे या फिर जड़ों को कमजोर करनेवाली कमियां, खामियां और बीमारियां दुरूस्त करे ताकि मजबूत जड़ों के सहारे आसमान छूने के सफर की मजबूत शुरूआत की जा सके। इस लिहाज से देखें तो भारतीय राजनीति में कांग्रेस को इतना बुरा वक्त पहले कभी नहीं देखना पड़ा जैसा मौजूदा दौर में भुगतना पड़ रहा है। दशकों तक पूरे देश की पंचायतों, स्थानीय निकायों व प्रदेशों से लेकर पार्लियामेंट तक में जिस कांग्रेस की तूती बोलती थी उसकी अधोगति का आलम यह है कि इस समय उसकी झोली में सिर्फ तीन राज्य (पंजाब, कर्नाटक व मिजोरम) और एक केन्द्र शासित प्रदेश पुदुचेरी ही शेष है। प्रादेशिक स्तर पर गौर करें तो देश के सबसे ताकतवर सियासी सूबे उत्तर प्रदेश की विधानसभा में कांग्रेस के पास इतने विधायक भी नहीं हैं कि एक अदद राज्यसभा की सीट पर पार्टी अपना कब्जा जमा सके। पंजाब को छोड़ दें तो पूरे उत्तर व मध्य भारत में कांग्रेस का सफाया हो चुका है और दक्षिण में भी उसकी हालत महज उपस्थिति दर्ज कराने भर की ही बची है जबकि मिजोरम पर शासन के नाते नाम भर को पूर्वोत्तर में कांग्रेस का एक पांव जमा हुआ है। अलबत्ता देश के पश्चिमी सूबों में सत्ता से बेदखल होने के बावजूद मजबूत विपक्ष के नाते पार्टी ने गिनाने भर को अपनी मजबूत पकड़ अवश्य बरकरार रखी हुई है। यानि समग्रता में देखें तो पार्टी ऐसी स्थिति में पहुंच चुकी है जहां से अगर वह नहीं संभल पायी तो कांग्रेस का नाम सिर्फ किताबों में ही सिमट कर रह जाएगा। यही वजह है कि कर्नाटक के चुनाव को लेकर कांग्रेस भी जान और मान रही है कि यह उसके अस्तित्व की लड़ाई है। लेकिन कहते हैं कि राजनीति असीमित संभावनाओं को संभव कर दिखाने का ऐसा खेल है जिसमें किसी भी संभावना को किसी भी वक्त कतई खारिज नहीं किया जा सकता है। इसी आस और उम्मीद से कांग्रेस ने भी एक नयी शुरूआत करके अगले साल होने जा रहे लोकसभा चुनाव के महासंग्राम में एक बार फिर विजय पताका लहराने के लिए कमर कसना शुरू कर दिया है। हालांकि पार्टी की जो मौजूदा दुर्दशा दिख रही है काफी हद तक वैसे ही जनविरोध का सामना इसे तब भी करना पड़ा था जब आपातकाल के बाद के दौर में इंदिरा गांधी की अगुवाई वाले पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व को मतदाताओं ने खारिज कर दिया था। लेकिन उस दौर में प्रादेशिक स्तर पर मौजूद विश्वसनीयता व मजबूती की बदौलत कांग्रेस अपने बुरे वक्त से बहुत ही जल्दी उबर गई थी। लेकिन इस बार जो बुरा वक्त आया उसमें पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व को संभलने के लिए प्रदेशिक स्तर से भी सहायता नहीं मिल पाई और केन्द्र में पार्टी के हाथों से सत्ता फिसलने के बाद जमीनी स्तर पर पर भी पार्टी की कमर टूट गई। लेकिन अब इतिहास से सीख लेते हुए कांग्रेस ने राष्ट्रीय स्तर पर मजबूती से खड़े होने के लिए प्रादेशिक समीकरणों को साधने को प्राथमिकता देने की राह पकड़ी है। दरअसल प्रादेशिक स्तर पर पार्टी के बिखरने की सबसे बड़ी वजह अंदरूनी गुटबाजी और चरण-वंदन की परंपरा रही जिसके कारण नए नेतृत्व को उभरने का मौका नहीं मिल सका और पुराने नेतृत्व की खो चुकी धार व फीकी पड़ चुकी चमक का खामियाजा संगठन को शिकस्त के रूप में भुगतना पड़ा। ऐसा ही राजस्थान में भी हुआ और मध्य प्रदेश में भी। छत्तीसगढ़, हिमाचल, उत्तराखंड और महाराष्ट्र से लेकर कर्नाटक तक में पार्टी की पतली हालत की वजह कमोबेश एक जैसी ही रही। लेकिन राहुल गांधी द्वारा प्रादेशिक स्तर पर संगठन की समस्यों को सुलझाने और विभिन्न गुटों का तुष्टीकरण करने बजाय सबको किसी एक का नेतृत्व स्वीकारने के लिए मनाने-समझाने का ही नतीजा रहा कि पंजाब में पार्टी को अपने दम पर पूर्ण बहुमत हासिल करने में सफलता मिल सकी और गुजरात में भी भाजपा को सौ सीटों के भीतर सिमटने के लिए विवश होना पड़ा। गुजरात और पंजाब में कामयाबी के बाद अब अन्य प्रदेशों में भी पार्टी को इसी तरीके से दोबारा अपने पांव पर खड़ा करने की कोशिश शुरू हो गई है। इसी रणनीति के तहत कांग्रेस ने संगठन महामंत्री के पद पर जनार्दन द्विवेदी के स्थान पर अशोक गहलोत की नियुक्ति की है ताकि केन्द्रीय संगठन को प्रादेशिक भावना के अनुरूप गढ़ा जाए और प्रदेश इकाई के मतभेदों को दूर करके एक सशक्त, मजबूत, भरोसेमंद और युवा स्थानीय चेहरे को सर्वसम्मति से आगे बढ़ाने की राह आसान हो सके। यही फार्मूला जल्दी ही उत्तर प्रदेश में भी आजमाया जाएगा और मध्य प्रदेश में भी। दरअसल बीते दिनों दिल्ली में हुए कांग्रेस महाधिवेशन में मुख्य मंच को पूरे वक्त खाली रखकर केन्द्रीय नेतृत्व को भी प्रादेशिक नेतृत्व के साथ पंक्तिबद्ध करके बिठाकर स्पष्ट संकेत दे दिया गया है कि पार्टी दिल्ली के दिशा-निर्देशों से संचालित नहीं होगी बल्कि जमीन से उठनेवाली हवा ही पार्टी की दशा-दिशा और रीति-नीति तय करेगी। ऐसे में स्वाभाविक है कि जब केन्द्र में प्रदेश की भावना का ध्यान रखा जाएगा तो स्वाभाविक तौर पर प्रदेश से पार्टी के लिए शुभ समाचार ही समाने आएगा और सत्ता का सूखा समाप्त होने की संभावना बनते देर नहीं लगेगी। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’   @नवकांत ठाकुर #Navkant_Thakur

शुक्रवार, 9 मार्च 2018

‘दो-दो काटे शून्य, साथ मिले तो बाईस’

‘दो-दो काटे शून्य, साथ मिले तो बाईस’

राजनीति का गणित अलग ही होता है। हर नए समीकरण के साथ इसके परिणाम का आंकड़ा घटता-बढ़ता रहता है। सामान्य गणितीय समीकरण में तो दो और दो हमेशा चार ही होता है। लेकिन राजनीति के आंकड़े इस हद तक अप्रत्याशित होते हैं कि दो और दो को आंखें मूंद कर कतई चार नहीं माना जा सकता। वह शून्य भी हो सकता है, तीन भी, पांच भी और बाईस भी। कई बार जोड़ने के लिए रखे गए दो और दो परस्पर एक दूसरे को काट कर शून्य भी बना देते हैं और कई बार दो और दो एक साथ मिलकर बाईस भी बन जाते हैं। हालांकि कोई भी सियासी गठजोड़ अक्सर दो और दो मिलकर बाईस बनने की उम्मीदों के साथ ही किया जाता है। लेकिन यूपी का राजनीतिक समीकरण जहां एक ओर भाजपा और अपना दल के गठजोड़ को लोकसभा चुनाव में आंकड़ों का ताज पहना देता है वहीं विधानसभा के चुनाव में सपा और कांग्रेस के गठजोड़ को सियासी शून्य की ओर धकेल देता है। इसलिये किसी भी गठजोड़ के भविष्य को लेकर निर्णायक तौर पर तो पहले से कुछ भी नहीं कहा जा सकता। लेकिन दो स्वतंत्र दलों के मिलन पर होने वाले रासायनिक समीकरण को पुरानी प्रक्रियाओं और प्रतिक्रियाओं के आधार पर परखकर उसके भावी प्रदर्शन का मोटा-मोटी खाका तो खींचा ही जा सकता है। इस लिहाज से देखा जाए तो गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा सीट के लिए होने जा रहे उपचुनाव में बसपा ने सपा को अपना जो प्रायोगित समर्थन दिया है उसका अंजाम वैसा ही होने की उम्मीद अधिक दिख रही है जैसा विधानसभा के चुनाव में सपा और कांग्रेस के गठजोड़ का हुआ था। एक जैसा नतीजा आने की संभावना के पीछे इसकी वजहें भी एक जैसी ही हैं। मसलन जमीनी स्तर पर शीर्ष सपा नेता मुलायम सिंह यादव की पहचान गैर-कांग्रेसवाद की राजनीति के चैम्पियन की थी। लेकिन भाजपा के विजय रथ को रोकने के लिए सपा ने उसी कांग्रेस का हाथ थाम लिया जिसके खिलाफ उसके कार्यकर्ता दशकों से संघर्ष करते आए थे। नतीजन इस बेमेल गठजोड़ का नतीजा यह हुआ कि सपा और कांग्रेस के मतदाताओं ने अपने शीर्ष नेतृत्व के फैसले से निराश होकर भाजपा के पक्ष में गोलबंद हो जाना ही बेहतर समझा। परिणाम यह हुआ कि सपा सैंतालीस पर और कांग्रेस महज सात सीटों पर सिमट कर रह गई। अब लोकसभा उपचुनाव में भी परिस्थितियां वैसी ही दिख रही हैं। सपा और बसपा के बीच वर्ष 1995 से ही शीर्ष स्तर पर संवादहीनता, कटुता और जमीनी स्तर पर सीधी दुश्मनी का माहौल रहा है। ऐसे में अब अगर बसपा सुप्रीमो ने कथित सौदेबाजी के तहत एक राज्यसभा सीट के एवज में दो लोकसभा सीट पर समर्थन की बात कही है तो इसे जमीनी स्तर पर कार्यरूप देने के लिए दोनों दलों के उन मतदाताओं को एक मंच पर आना होगा जिनके लिए दशकों पुरानी रंजिश को एक झटके में भुला पाना नामुमकिन की हद तक मुश्किल हो सकता है। ऐसे में अगर अपने शीर्ष नेतृत्व के निर्देश से निराश होकर मतदाताओं का काफी बड़ा वर्ग भाजपा के पक्ष में गोलबंद हो जाए तो इसमें कुछ भी अस्वाभाविक नहीं कहा जाएगा। इसके अलावा सपा और कांग्रेस के एक मंच पर आने से उनका अवसरवादी चेहरा ही सामने आया था जिसे विधानसभा चुनाव में मतदाताओं ने स्वीकार नहीं किया। उसी प्रकार बसपा भी कल तक हर मामले में जिस सपा को कठघरे में खड़ा करने में कोई कसर नहीं छोड़ती थी उसके समर्थन में अचानक बहनजी का खुलकर मैदान में आ जाना मतदाताओं को किस हद तक स्वीकार्य होगा इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। रहा सवाल जातीय समीकरण का तो इसमें भी सपा और बसपा का गठजोड़ उसी प्रकार बेमेल दिख रहा है जिस प्रकार सपा और कांग्रेस की दोस्ती बेमेल साबित हुई थी। इस उपचुनाव में सपा के परंपरागत यादव और मुस्लिम मतदाता को मजबूती देने के लिए अपने दलित वोट को उसके साथ जोड़ने की बहनजी की कवायद का यह परिणाम भी सामने आ सकता है कि मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण के खिलाफ हिन्दू वोटर लामबंद हो जाएं। ऐसे में अगर चुनाव ने स्वाभाविक तौर पर सांप्रदायिक रंग पकड़ा तो बहनजी का दलित और सपा का यादव वोटबैंक किस हद तक उनके साथ जुड़ा रह पाएगा यह कहना भी मुश्किल है। वैसे भी बहनजी के परंपरागत मतदाताओं से अब तक सपा के दोनों परंपरागत समर्थक वर्ग की कभी नहीं बनी। जब भी कहीं सांप्रदायिक मामले सामने आए तो जमीनी टकराव अक्सर दलितों और मुस्लिमों के बीच ही हुआ है। जमीनी स्तर पर उनके बीच इतनी गहरी और चैड़ी खाई बनी हुई है जिसे अचानक किए गए एक फैसले से पूरी तरह पाट पाना कतई संभव नहीं हो सकता है। ऐसे में बहनजी ने भाजपा के बढ़ते प्रसार व जनाधार को देखते हुए अपने राजनीतिक अस्तित्व को बचाने के लिए सायकिल की सावारी के विकल्प को प्रायोगिक तौर पर आजमाने की जो पहलकदमी की है उसकी राहें फिलहाल तो कतई आसान नहीं दिख रही हैं। लेकिन सियासत खेल ही है असीमित संभावनाओं का। लिहाजा चुनावी नतीजा सामने आने से पहले निर्णायक तौर पर किसी नतीजे पर पहुंच जाना उचित नहीं होगा। इसलिए बेहतर यही होगा कि इस गठजोड़ के प्रदर्शन का इंतजार कर लिया जाए ताकि मतदाताओं के मूड का भी पता चल सके और आगामी दिनों के संभावित समीकरणों की तस्वीर भी साफ हो जाए। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’   @नवकांत ठाकुर  #Navkant_Thakur

शनिवार, 13 जनवरी 2018

‘उल्टी गंगा बह रही, राजनीति के घाट’    

कहने-सुनने में भले अटपटा लगे लेकिन सच यही है कि वाकई कहीं-कहीं गंगा उल्टी भी बहती है। जब आगे बढ़ने के लिए सीधी राह ना मिल रही हो तो कुछ दूर उल्टी दिशा में बह कर नई राह गंगा भी तलाशती है और राजनीति भी। यह बात और है कि जहां गंगा उल्टी बहती है वहां उसके महिमा और महात्म्य में काफी इजाफा हो जाता है जबकि सियासत उल्टी दिशा में बहने पर आलोचनाओं का शिकार होने लगती है। उसकी प्रामाणिकता व शुचिता पर सवालिया लगने लगते हैं और उल्टी धारा को दिखावा करार दिया जाने लगता है। हालांकि यह अलग बहस का विषय है कि जब उल्टी बहने पर भी गंगा के पानी की पवित्रता व गुणवत्ता पर कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ता है तो फिर राजनीति की धारा उल्टी बहने पर मैली व गंदली क्यों हो जाती है? शायद इसका कारण धारा के बहाव के मकसद में ही छिपा है। गंगा बहती है सबको तारने, उबारने व संवारने के लिए जबकि राजनीति की दिशा तय होती है वोटरों को लुभाने, रिझाने और सत्ता-व्यवस्था पर अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए। यानि सिर्फ सत्ता का स्वार्थ साधने के लिए उल्टी-सीधी राह पकड़ने के कारण राजनीति आलोचनाओं के केन्द्र में आती है जबकि परमार्थ के मकसद से आगे बढ़ने के लिए आवश्यकता के मुताबिक उल्टी दिशा में बहने से भी परहेज नहीं करना गंगा का ऐसा गुण बन जाता है जो उसकी पवित्रता, स्वीकार्यता और पूजनीयता को बेहद ऊंचे आयाम पर पहुंचा देता है। लेकिन तमाम आलोचनाओं के बावजूद राजनीति अपने रंग-ढ़ंग, दशा-दिशा, तेवर-कलेवर व रीति-नीति में जरूरत के मुताबिक रद्दोबदल करने से कभी पीछे नहीं हटती। बल्कि यूं कहा जाए तो ज्यादा सही होगा कि उल्टी गंगा बहाने में जिस संगठन या शख्सियत को जितनी महारथ हासिल रहती है वह सियासत में उतना ही अधिक सफल होता है। मिसाल के तौर पर कांग्रेस की 70 साल की सियासी सफलता के पीछे सबसे बड़ी वजह यही रही कि सैद्धांतिक तौर पर उसने अपनी वास्तविक दिशा का किसी को पता नहीं चलने दिया। जिस किसी भी कसौटी पर परखा जाता कांग्रेस उसमें ही अव्वल दिखाई देती थी। ब्राह्मण परिवार द्वारा संचालित होने के कारण बहुसंख्यकों की सबसे सगी भी कांग्रेस ही थी और धर्मनिरपेक्षता की जबर्दस्त पैरोकारी के कारण अल्पसंख्यकों के हितों की सबसे बड़ी हिमायती भी कांग्रेस ही थी। रामलला की पूजा के लिए बाबरी मस्जिद का ताला भी कांग्रेस ने ही खुलवाया और अल्पसंख्यकों को सरकारी खर्च पर हज कराने का इंतजाम भी कांग्रेस ने ही किया। आपातकाल लागू करके अभिव्यक्ति की आजादी पर पहरा भी कांग्रेस ने ही बिठाया और लोगों को शासन से सूचना हासिल करने का अधिकार भी कांग्रेस ने ही दिया। उल्टी-सीधी राह पर एक-समान गति से आगे बढ़ने में महारथ के कारण ही देश की हिन्दी-पट्टी पर भी कांग्रेस का ही कब्जा था और हिन्दी विरोधी आंदोलन की आग में दशकों तक दहकते रहे दक्षिणी राज्यों में भी कांग्रेस का ही डंका बजता था। पंचायत से लेकर पार्लियामेंट तक हर जगह बस कांग्रेस ही कांग्रेस थी। सीधी सोच वाले उसकी सीधी धारा से सम्मोहित थे जबकि उल्टी सोच वालों को साधने में उसकी ऊटपटांग कूटनीतियां कामयाब हो जाती थीं। लेकिन खेल बिगड़ा तब जब वह उल्टी-सीधी धारा के बीच संतुलन नहीं बना पाई। एंटनी कमेटी की रिपोर्ट के मुताबिक कांग्रेस के पतन का मुख्य कारण ही यही है कि अल्पसंख्यक हितैषी छवि को निखारने के चक्कर में उसका स्वरूप बहुसंख्यक विरोधी का दिखने लगा। अब बीमारी पकड़ में आ चुकी है तो इलाज भी करना ही होगा। गुजरात में मंदिरों, मठों व घाटों का चक्कर लगाते हुए खुद को पुरजोर तरीके से ब्राह्मण नेता के रूप में प्रस्तुत करके राहुल गांधी ने जो इलाज की प्रक्रिया शुरू की उसका परिणाम भी सुखद ही रहा। वोट फीसद में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई, सीटों की तादाद में भी संतोषजनक इजाफा हुआ और भाजपा को दहाई के आंकड़े में समेटने में वे कामयाब हो गए। यानि जरूरत के मुताबिक दिशा बदलते ही दशा सुधरने लगी। अब यही फार्मूला कांग्रेस कर्नाटक में भी आजमाने जा रही है जहां गुजरात माॅडल पर भाजपा के मोर्चा खोलते ही मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने पुरजोर आवाज में जता दिया कि वे भी हिन्दू ही हैं। इसी प्रकार बंगाल की 30 फीसदी अल्पसंख्यक आबादी की सर्वस्वीकार्य नेत्री बनने के लिए जिस ममता बनर्जी ने दुर्गा प्रतिमा के विसर्जन में अड़ंगा लगाया, रामनवमी का जुलूस निकालने पर त्यौरियां दिखाईं और सरस्वती पूजा के रंग में भंग डालने का भरपूर प्रयास किया वही ममता बनर्जी अब वोट बैंक का विस्तार करने के लिए उल्टी धारा में बहते हुए ब्राह्मण सम्मेलन करवाने और गऊ-दान करने की कवायदें कर रही हैं। जबकि बहुसंख्यकवाद की राजनीति को सर्वोच्च शिखर पर पहुंचाने वाली भाजपा अब पश्चिम बंगाल में अल्पसंख्यक सम्मेलन कराने जा रही है। यानि अपनी धारा के उलट बहकर मतदाताओं को रिझाने-फुसलाने की कोशिश ममता भी कर रही है और भाजपा भी। हालांकि गद्दी पर कोई भी विराजमान हो इससे सत्ता के स्वरूप और सत्ताधारियों की सोच पर कोई फर्क नहीं पड़ता। तभी तो जो आंकड़े पहले कांग्रेस प्रस्तुत करती थी वही अब भाजपा कर रही है और जो योजनाएं कांग्रेस ने इजाद की थी उन्हें ही सुधार कर भाजपा आगे बढ़ा रही है। लेकिन सियासत का अनुभव यही है कि दशा सुधारने के लिए दिशा बदलने की कूटनीति जब उल्टी पड़ती है तो बड़ी बे-भाव की पड़ती है। ‘जैसी नजर, वैस नजरिया।’  @नवकांत ठाकुर #Navkant_Thakur

बुधवार, 27 दिसंबर 2017

‘भावी चुनौतियों का तोड़ निकालने पर जोर’

‘भावी चुनौतियों का तोड़ निकालने पर जोर’


गुजरात और हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव के नतीजे सामने आ जाने और कर्नाटक के अलावा तीन पूर्वोत्तरी राज्यों के विधानसभा चुनाव का औपचारिक शंखनाद होने के बीच अगले महीने होने जा रही भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में चिंतन-मंथन का केन्द्र नवनियुक्त कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ही रहनेवाले हैं। बेशक भाजपा ने बीते दिनों हुए चुनाव में पूर्ण बहुमत के साथ अपनी सरकार बनाने में कामयाबी हासिल कर ली हो लेकिन गुजरात की सरकार बचाने के लिए भाजपा को जिस कदर नाको चने चबाने पड़े उसके मद्देनजर आगामी चुनावों में कांग्रेस की ओर से मिलनेवाली कड़ी टक्कर से निपटने की राह तलाशना ही इस बार की कार्यकारिणी बैठक का मुख्य एजेंडा रहनेवाला है। खास तौर से नवनियुक्त अध्यक्ष राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस के बदले हुए तेवर और कलेवर ने भाजपा की चिंताएं स्वाभाविक तौर पर बढ़ा दी हैं। यहां तक की गुजरात में भाजपा को दहाई के आंकड़े में सिमटने के लिए मजबूर करके राहुल ने अपनी बढ़ती लोकप्रियता व जनस्वीकार्यता भी साबित कर दी है। ऐसे में भाजपा कतई राहुल को अब हल्के में नहीं ले सकती और अगर आगामी चुनावों में उसे अपनी जीत का सिलसिला बरकरार रखना है तो इसके लिए उसे राहुल की ओर से मिल रही चुनौतियों का समय रहते कोई ठोस तोड़ निकालना ही होगा। वैसे भी पार्टी के तमाम शुभचिंतकों को बखूबी पता है कि जिस तरह से भाजपा के जनाधार में सेंध लगने की शुरूआत हो गई है उसे समय रहते नहीं रोका गया तो लोकसभा चुनाव में पिछला प्रदर्शन दोहरा पाना निहायत ही नामुमकिन हो जाएगा। गुजरात चुनाव के नतीजों ने भाजपा को किस कदर मायूस किया है इसका सहज अंदाजा इसीसे लगाया जा सकता है कि चुनावी नतीजा सामने आने के फौरन बाद मीडिया के माध्यम से देश को संदेश देने के क्रम में पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने एक बार भी यह जिक्र नहीं किया कि पिछली बार के मुकाबले इस बार उन्हें काफी कम सीटें क्यों मिली हैं। वे बार-बार वोटों में एक फीसद की बढ़ोत्तरी की दुहाई देते रहे और इसे ही बड़ी उपलब्धि बताते रहे। लेकिन अगर उनकी बात को सही माना जाए तो इस लिहाज से भी भाजपा की हार ही हुई है क्योंकि कांग्रेस के वोट में तो इस बार साढ़े चार फीसदी की वृद्धि हुई है। सच तो यह है कि बीते लोकसभा चुनाव में भाजपा को जितने वोट मिले थे उसे अगर विधानसभा वार देखा जाए तो पार्टी के खाते में 160 से अधिक सीटें आनी चाहिए थीं और इसी वजह से भाजपा ने भी 150 से अधिक सीटें जीतने का लक्ष्य सामने रखकर चुनाव लड़ा था। लेकिन गुजरात में निर्णायक साबित हुआ नोटा का वह बटन जिसने कांग्रेस की दस सीटें कम करा दीं और रही सही कसर बसपा व राकांपा सरीखी तीसरी ताकतों ने पूरी कर दी जिन्होंने तकरीबन एक दर्जन से अधिक सीटों पर गैर-भाजपाई वोटों में सेंध लगाकर कांग्रेस की उम्मीदों पर पानी फेर दिया। इस तरह भाजपा की जीत की पटकथा तैयार हुई और दहाई के अंकों में सिमट कर पार्टी किसी तरह अपनी सरकार बचाने में कामयाब हो गयी। लेकिन जिन परिस्थितियों में अपनी लाज बचाते हुए गुजरात की सत्ता पर अपनी पकड़ बरकरार रखने में भाजपा कामयाब हुई है उसके बाद स्वाभविक तौर पर भावी रीति-नीति पर चर्चा करके निष्कंटक राह तलाशने की जद्दोजहद होनी ही है। वैसे भी अमित शाह यह स्वीकार कर चुके हैं कि गुजरात के नतीजों पर स्थानीय नेतृत्व के साथ चिंतन अवश्य किया जाएगा लेकिन वे कहें या ना कहें सच यही है कि जब गुजरात के सबसे सुरक्षित माने जानेवाले गढ़ में भाजपा को लाज का संकट उत्पन्न हो सकता है तो यह निश्चित तौर पर खतरे संकेत है और इसका राष्ट्रव्यापी असर दिखने की संभावना से कतई इनकार नहीं किया जा सकता है। दूसरी तरफ कांग्रेस के नए निजाम की आक्रामकता और तेवरों ने विपक्ष का पूरा कलेवर ही बदल कर रख दिया है। गैर-भाजपाई ताकतों के बीच कांग्रेस के नेतृत्व की स्वीकार्यता को अब कहीं से भी चुनौती मिलने की उम्मीद नहीं बची है। बिखरे हुए विपक्ष का फायदा उठाते हुए भाजपा ने जो राज कायम किया है उसकी इस हकीकत को नकारा नहीं जा सकता है कि लोकसभा चुनाव में भी भाजपा को तकरीबन 32 फीसदी वोट ही मिले थे जबकि उसके खिलाफ 68 फीसदी वोट पड़े थे। लेकिन विरोधी वोटों के बंटवारे ने लोकसभा में भी भाजपा को जीत दिलाई और आज की तारीख में 19 राज्यों में उसकी प्रत्यक्ष या परोक्ष सरकार बनवा दी है। ऐसे में विपक्ष के समक्ष सिर्फ वोटों का बिखराव रोकने की चुनौती है जबकि भाजपा को अब अपने दम पर जनसमर्थन जुटा कर सत्ता पर अपनी पकड़ बरकरार रखनी है। जाहिर तौर पर असली चुनौती का वक्त अब बेहद करीब आता जा रहा है क्योंकि इस बार मौजूदा सरकार का सही मायनों में आखिरी बजट ही पेश होना है। अगले साल इसे अंतरिम बजट के तौर पर महज औपचारिकता निभाने का ही मौका मिल पाएगा। ऐसे में अब अगले एक साल की कमाई ही वह पूंजी होगी जिसके दम पर सियासी बाजार में चुनावी बहार लूटने या गांठ की दौलत लुटाने की नौबत आएगी। लिहाजा ऐसे मौके पर होनेवाले भाजपाइयों के जुटान को पिछली मेहनत की थकान से उबार कर समय रहते जमीनी स्तर पर सक्रिय करने में हासिल होनेवाली कामयाबी ही पार्टी की भावी दशा-दिशा तय करेगी। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ 
@नवकांत ठाकुर  #Navkant_Thakur

सोमवार, 23 अक्टूबर 2017

‘तेरा जाना... दिल के अरमानों का लुट जाना’

‘तेरा जाना... दिल के अरमानों का लुट जाना’


राहुल गांधी को औपचारिक तौर पर कांग्रेस की कमान सौंपे जाने की अब महज औपचारिकता ही बाकी रह गई है। पार्टी अध्यक्षा सोनिया गांधी ने भी कह दिया है कि इस औपचारिकता को यथाशीघ्र पूरा करने में अब अधिक विलंब नहीं किया जाएगा। यानि प्रतीक्षा है तो सिर्फ शुभ मुहूर्त और लग्न की। लेकिन मसला सिर्फ लग्न-मुहूर्त का होता तो गुरूदासपुर लोकसभा सीट के लिए हुए उपचुनाव के नतीजों के तत्काल बाद ही इस काम को अंजाम दे दिया गया होता। या फिर नांदेड़ के स्थानीय निकायों का नतीजा भी इस काम को अंजाम देने के लिए पर्याप्त था। लेकिन सवाल तो उस छुट्टी का है जो राहुल कब, किस लिए, कैसे और किससे मांगते हैं, यह किसी को नहीं पता। पता इतना ही चलता है कि राहुल भैया फिर चले गए छुट्टी पर। कई बार बता कर जाते हैं और कई बार बिना बताए। मगर जाते जरूर हैं। और जाने के क्रम में वे यह भी नहीं देखते हैं कि उनका जाना कांग्रेस और कांग्रेसियों के लिए कितना नुकसानदेह या फायदेमंद होगा। उनको जाना होता है और वे चल देते हैं। अपने जाने के लिए वे अक्सर जिस वक्त व माहौल को चुनते हैं उसके मद्देनजर हर कांग्रेसी के दिल से यही आवाज निकलती होगी जोे अनाड़ी फिल्म के लिए शैलेन्द्र साहब ने लिखा था कि, ‘तेरा जाना... दिल के अरमानों का लुट जाना, कोई देखे... बन के तकदीरों का मिट जाना।’ वाकई, बनने की राह पर अग्रसर होने के बाद तकदीर की रेखाएं अचानक कैसे मिट जाती हैं और दिल के अरमान कैसे लुट जाते हैं, इसके सच्चे भुक्तभोगी असल में कांग्रेसी कुनबे से प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर जुड़े लोग ही हैं। हर कांग्रेसी का दिल ही जानता है कि राहुल के अचानक छुट्टी पर चले जाने का नतीजा उनके लिए कितना नकारात्मक होता है। हालांकि परिस्थितियां जब अनुकूल थीं और विभिन्न सूबों से लेकर केन्द्र तक में कांग्रेस की सरकार थी तब उनके रहने या जाने पर ना तो किसी की खास नजर जाती थी और ना ही उससे पार्टी की सेहत पर कोई प्रभाव पड़ता था। लेकिन वर्ष 2014 में राष्ट्रीय राजनीति में पार्टी का सूपड़ा साफ होने के बाद तमाम कांग्रेसियों की अपेक्षाएं व उम्मीदें राहुल पर आकर टिक गईं। सबको उनसे किसी करिश्मे की उम्मीद थी। लेकिन राहुल तो ठहरे राहुल... उनको क्या फर्क पड़ता है कि कौन उनसे क्या चाहता है और कौन उनके बारे में क्या सोचता है। उनको तो अपने मन की करनी थी, सो वे करते रहे। इसमें सबसे दिलचस्प बात यह है कि राजनीति की मुख्य धारा में शामिल होते हुए भी अमूमन राहुल काफी हद तक सार्वजनिक जीवन के प्रति निश्चेष्ट व उदासीन ही रहते हैं। लेकिन जब उनको छुट्टी पर जाना होता है उससे कुछ दिन पहले से वे काफी सक्रिय हो जाते हैं। ऐसा लगता है मानो स्कूल का बच्चा अपनी छुट्टी का होमवर्क पूरा कर रहा हो। ताकि छुट्टी के दौरान पढ़ाई का झंझट ही ना रहे। तभी तो छुट्टी पर जाने से ठीक पहले उन्होंने मोदी सरकार को संसद से सड़क तक घेरते हुए भूमि अधिग्रहण कानून के मसले पर जमीन-आसमान एक कर दिया। ऐसा दबाव बनाया कि सरकार को प्रस्तावित कानून वापस लेने के लिए मजबूर होना पड़ा। लेकिन इस आंदोलन की शुरूआत करके राहुल कहां नदारद हो गए यह किसी को पता नहीं चला। पता सिर्फ इतना चला कि वे छुट्टी मनाने चले गए हैं। नतीजन इस पूरे आंदोलन का श्रेय व राजनीतिक लाभ कांग्रेस को मिलते-मिलते रह गया और बनती हुई तकदीर की रेखाएं अचानक मिट गईं। इसी प्रकार यूपी में खाट सभा करते-करते ही वे किधर खिसक लिए और कांग्रेस को सपा की सायकिल के कैरियर पर बिठाकर कहां निकल लिए यह किसी को पता नहीं चला। साथ ही बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान महागठबंधन के गठन में निर्णायक मध्यस्थ की भूमिका निभाने के बाद पूरे चुनाव में राहुल कहीं नहीं दिखे। माना जाता है कि काम कितना ही जरूरी क्यों ना हो लेकिन राहुल के लिए अपनी छुट्टी से जरूरी कोई काम नहीं होता। नतीजन उनके धुर विरोधी उन्हें ‘पार्ट टाईम पाॅलिटीशियन’ कहकर उनका मजाक बनाते रहते हैं और सोशल मीडिया पर भी ‘आ गए राहुल, छा गए राहुल’ का नारा अक्सर बुलंद होता रहता है। अभी गुजरात चुनाव में कांग्रेस को चमकाने और दक्षिणी सूबों में पार्टी का विस्तार करने की पुरजोर कोशिशों में जुटे राहुल का इस सप्ताह सदेह दर्शन नहीं होना भी सोशल मीडिया में खूब चर्चित हो रहा है। लोग चटखारे लेने लगे हैं कि राहुल फिर छुट्टियां मनाने चले गए हैं। हालांकि सोशल मीडिया के माध्यम से वे लगातार सक्रिय हैं और खबरों में बने हुए हैं। लेकिन उनकी वास्तविक उपस्थिति आखिरी बार पिछले सप्ताह प्रणब मुखर्जी के पुस्तक विमोचन में ही दर्ज हो सकी। लिहाजा राहुल के कद का नेता अगर अचानक कहीं ना दिखे तो उनके बारे में कयासों व अटकलों का दौर शुरू होना स्वाभाविक ही है। वह भी तब जबकि उनकी छुट्टियों का इतिहास की ऐसा रहा हो कि किसी मामले को उफान पर लाकर खुद कपूर की तरह रंगमंच से काफूर हो जाएं। खैर, राहुल की छुट्टियों को लेकर जितने मुंह उतनी बातें तो हमेशा से होती रही हैं और आगे भी होती रहेंगी। लेकिन यह राहुल को ही तय करना होगा कि अपने मजे के लिए वे कांग्रेस और कांग्रेसियों को कब तक सजा दिलाते रहेंगे। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’  @ नवकांत ठाकुर #NavkantThakur

शुक्रवार, 15 सितंबर 2017

‘खतरा, खटका या सत्य का संकेत!’

‘खतरा, खटका या सत्य का संकेत!’

कोई भी बदलाव अनायास ही नहीं होता। उसके पीछे कोई वजह जरूर होती है और उसका कुछ ना कुछ संकेत पहले से ही अवश्य दिखने लगता है। इस लिहाज से देखा जाए तो दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ के चुनाव का नतीजा काफी कुछ कहता हुआ दिख रहा है। जिस डूसू में साल 2013 से ही कांग्रेस की छात्र इकाई एनएसयूआई को जीत नसीब नहीं हो पाई थी वहां इस बार उसने अध्यक्ष के साथ ही उपाध्यक्ष पद पर भी कब्जा कर लिया है जबकि संघ के अनुषांगिक व भाजपा के सहोदर छात्र संगठन एबीवीपी के खाते में सिर्फ सचिव व संयुक्त सचिव का पद ही आया है। भले भाजपा की ओर से इस हार पर कोई निराशा नहीं व्यक्त की जा रही हो और यह बताया जा रहा हो कि जिन सीटों पर जीत हासिल हुई है उसमें जीत-हार का फासला हजारों में है जबकि जिन पदों पर हार हुई है उस पर जय-पराजय का अंतर महज सैकड़ों में है। लेकिन सिर्फ इतना कह देने भर से खतरे की उस घंटी की आवाज को दबाया नहीं जा सकता है जो दूर से आती हुई सुनाई पड़ रही है। इस आवाज को महज भ्रम भी माना जा सकता था लेकिन इससे कुछ ही दिन पहले बवाना विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में भाजपा को झेलनी पड़ी करारी शिकस्त और महज पांच दिन पूर्व जेएनयू छात्र संघ के चुनाव में अपेक्षित सफलता से महरूम रहने की हकीकत से यह स्पष्ट हो जाता है कि खतरे की घंटी की आवाज कोई भ्रम नहीं है बल्कि वह सच में सियासी फिजा में गूंज रही है। भाजपा का प्रदर्शन मध्य प्रदेश के स्थानीय निकायों के चुनावों में भी उस स्तर का नहीं रहा जैसी उसे उम्मीद थी और पंजाब विधानसभा चुनाव में भी नतीजा उसके खिलाफ ही रहा था। यानि ‘पार्लियामेंट से लेकर पंचायत तक’ हर स्तर पर जीत का परचम लहराने और कांग्रेस मुक्त भारत बनाने का जो अभियान भाजपा ने छेड़ा था उसकी सफलता का ग्राफ ढ़लान की ओर बढ़ने की अटकलों को सिरे से खारिज कर देना निहायत ही मुश्किल होता जा रहा है। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह दिख रही है युवाओं के बीच भाजपा की लोकप्रियता में उत्तरोत्तर कमी आना। भाजपा के राष्ट्रवाद का खुमार का असर कम होने की एक बड़ी वजह युवाओं के सपने पूरे नहीं हो पाने को भी माना जा सकता है जिसके कारण प्रधानमंत्री मोदी की मीठी बातें अब उन्हें इस हद तक लुभा नहीं पा रही हैं कि वे भाजपा का जुनून की हद तक समर्थन करें। बेशक इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता है कि पिछले कई दशकों के बाद भारत को सशक्त, सक्षम व बेहतर नेतृत्व मिला है लेकिन इस सरकार ने जितने बेहतरीन प्रदर्शन की आशाएं जगाई थी उन अपेक्षाओं को पूरी तरह पूरा करने में यह सफल नहीं हो पाई है। खास तौर से युवाओं से जुड़े मसलों पर सरकार का प्रदर्शन निहायत औसत रहा है जिसके नतीजे में युवा मतदाताओं का काफी बड़ा वर्ग अब मोदी सरकार के करिश्माई नेतृत्व को लेकर निराश होता जा रहा है। अव्वल तो शिक्षा की सुलभता और गुणवत्ता के मामले में किसी ठोस सुधार की पहल होती हुई नहीं दिखी है और दूसरे शिक्षण-प्रशिक्षण के बाद रोजगार की दुर्लभता बदस्तूर बरकरार है। ऐसे में युवाओं का ना सिर्फ अपने भविष्य को लेकर चिंतित व निराश होना स्वाभाविक है बल्कि मोदी सरकार द्वारा दिखाए गए सपनों के पूरा हो पाने को लेकर निराशा में इजाफा होना भी लाजिमी ही है। जाहिर है कि इस सबका सीधा व प्रत्यक्ष असर चुनावों में ही दिखता है और छात्र संघों के चुनाव का नतीजा तो हमेशा से ही भविष्य का संकेत देता आया है। खास तौर से दिल्ली विश्वविद्यालय का कैंपस तो देश के सियासी भविष्य का संकेत देने के लिए पहले से ही विख्यात है। ऐसे में भाजपा को यह चिंता तो करनी ही होगी कि सियासी समुद्र में सफलता से दौड़ रही उसकी नाव में जो छेद होते दिख रहे हैं उसे समय रहते बंद किया जाए और हार के कारणों पर विचार करके उन कमियों व खामियों को सुधारने पर अपना ध्यान केन्द्रित किया जाए जिसके कारण उसकी बातें जादू जैसा असर नहीं दिखा पा रही है। बेशक ममता बनर्जी और शरद पवार सरीखे नेताओं का मानना हो कि जब तक मोदी के मुकाबले राहुल गांधी का चेहरा आगे बढ़ाया जाता रहेगा तब तक भाजपा के विजय रथ को लगातार आगे बढ़ने से कतई नहीं रोका जा सकता है। लेकिन इतिहास पर गौर करें तो राहुल अकेले ऐसे शीर्ष कांग्रेसी नेता नहीं हैं जिसे बेवकूफ व कमजोर माना गया हो बल्कि एक समय गूंगी गुडिया बताकर इंदिरा गांधी का भी मजाक उड़ाया जाता था और राजीव गांधी के व्यक्तित्व व विचारों को यह कह कर गंभीरता से नहीं लिया जाता था कि उन्हें व्यावहारिक बातों की कोई जानकारी ही नहीं है। लिहाजा मौजूदा वक्त में अगर राहुल को पप्पू कहकर दुष्प्रचारित किया जा रहा है तो इसे इतिहास द्वारा खुद को दोहराए जाने की नजर से भी देखा जा सकता है। लेकिन वक्त के साथ इंदिरा-राजीव की छवि भी बदली और राहुल की भी बदल सकती है। ऐसे में राहुल के प्रति अगर लोगों की संवेदना जाग गई और उनकी मासूमियत और इमानदारी पर मतदाताओं ने ममता दिखा दी तो भाजपा को सत्ता छोड़कर भागने के लिए भी मजबूर होना पड़ सकता है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’  @नवकांत ठाकुर #Navkantthakur

मंगलवार, 7 मार्च 2017

संभावित खिचड़ी में रायते का जायका

संभावित खिचड़ी में रायते का जायका


खेल चल रहा है खुल्लम-खुल्ला। सब खेल रहे हैं। नेता खेल रहे हैं जनता के साथ और जनता खेल रही है नेताओं के साथ। मामला इस कदर गड्डमगड टाईप का हो गया है कि किसी की समझ में कुछ नहीं आ रहा कि कौन किसके साथ खेल-खेल रहा है। हर किसी को अपनी ही पौ-बारह होती दिखाई पड़ रही है। तभी तो सब जोश में हैं। जोश भी ऐसा कि इसमें होश के लिए कोई जगह ही नहीं बची है। चैतरफा शंखनाद से आसमान गुंजायमान है। तुरही बज रही है, ढ़ोल-नगारे बज रहे हैं। उसकी धुन पर नेता भी मदमस्त हैं और जनता भी। हर तरफ रंग ही रंग है, उमंग ही उमंग है। ‘को बड़-छोट कहत अपराधू’ की स्थिति है। आखिर हो भी क्यों ना। जब एक ही दिन और एक ही इलाके में आयोजित वजीरे-आजम के जनता दर्शन से लेकर यूपी के लड़कों की पगडंडी मार्च तक ही नहीं बल्कि तने-तंबू की छांव में आयोजित बहनजी की चैपाल तक में जनसैलाब का ऐसा उफान दिखाई दे कि तुलनात्मक तौर पर किसी एक आयोजन को सफलतम और बाकियों को दोयम साबित करने में बड़े-बड़ों के पसीने छूटने लगें तो फिर कागजी समीकरणों का ध्वस्तीकरण होना स्वाभाविक ही है। तभी तो सूबे की मौजूदा स्थिति को तयशुदा व परंपरागत फार्मूले के खांचे में फिट करते हुए शब्दों के सांचे में ढ़ालकर किसी निर्णायक स्वरूप में प्रस्तुत कर पाना उतना ही मुश्किल हो गया है जितना त्रिदेवों की तिकड़ी में से किसी एक को सर्वसम्मति से सर्वोत्तम बताना। ऐसे में सत्ता का वरण करने के लिये सात फेरों में हो रहे सप्तपदी चुनाव की अंतिम परिक्रमा संपन्न होने तक सबका जुनून सातवें आसमान पर होने को कैसे अस्वाभाविक कहा जा सकता है। उस पर तुर्रा यह कि महीना भी फागुन का है जिसमें सामान्य व हर तरह से ठीक-ठीक आदमी की मनोदशा बिल्कुल वैसी ही रहती है जैसी कार्तिक में कुत्ते, अगहन में भैंसे और चुनाव में नेताओं की होती है। यानि फागुन ने चढ़ा दिया है नीम को करेले पर। चुनाव के कारण नेता और फागुन के कारण मतदाता एक बराबर हो गए हैं। लिहाजा ना नेताओं की बात को लेकर जनता में ठोस खेमेबाजी या निर्णायक गोलबंदी हो रही है और ना ही किसी ठोस मुद्दे को लेकर नेताओं में आपसी उखाड़-पछाड़ का माहौल दिख रहा है। हर कोई अपना अलग ही सुर-ताल सुनाने में पिला है। जनता भी किसी एक की तान पर थिरकने के बजाय अपनी ढ़फली पर अपना राग आलाप रही है। हालांकि नेताओं का सुर-ताल जनता को भी आह्लादित कर रहा है और जनता के आलाप से नेता भी आशान्वित हो रहे हैं। सब मस्त हैं अपनी मस्ती में। फिजा में घुल रहे सियासी रंगों से जनता भी खुलकर खेल रही है। वह भगवा के साथ भी उतने ही प्यार से लिपट रही है जितना लाल, हरे व नीले से। इस चुनावी फागुन में जनता इस कदर होलियाई हुई है कि सियासी हुल्लड़-हुड़दंग में यह परखना बेहद मुश्किल हो रहा है कि वह किससे अंदरूनी तौर पर बिदक रही है और किसके साथ अंतरंगता के साथ चिपक रही है। नतीजन सबका दावा यही है कि इस दफा विरोधियों के अरमानों की होली जलेगी और जीत के रंग की होली तो उनकी ही मनेगी। दावा करें भी क्यों ना। वह भी तब जबकि ऐसे दावों की हवा निकालने का अचूक तर्क हर तरफ से पूरी तरह नदारद हो। तभी तो जो किसी जमात से जुड़े हैं वे तो अपने खेमे की जीत सुनिश्चित बता रहे हैं लेकिन तटस्थ व निष्पक्ष विचारों के सूरमाओं का आकलन है कि अंत में मामला खिचड़ी भी हो सकता है। खिचड़ी का यह शगूफा काफी तेजी से फैल भी रहा है। तभी तो साहेब ने भरी सभा में यह कह दिया कि जिनकी अपनी दाल नहीं गल पा रही वे चुनावी चूल्हे पर खिचड़ी पकाने में जुट गए हैं ताकि किसी और को अपनी दाल गलाने में कामयाबी ना मिल सके। वैसे भी समग्रता में देखा जाए तो हवा का रूख किसी एक के पक्ष में होने की संभावना को स्वीकार कर लेने से पूरा विश्लेषण ही रसहीन हो जाएगा। यही वजह है कि चैपाल की चर्चाओं में हवा दी जा रही है खिचड़ी की संभावना को। इस संभावना में बहुत रस भी है और चटपटा स्वाद भी। तभी तो खिचड़ी की संभावना जताने वाले अब यह भी बताने लगे हैं कि इस फागुन में किस पर किसका रंग चढ़ेगा। इस चर्चा का चकल्लस सिर्फ भगवा को लाल-हरे से दूर रख रहा है। वर्ना जितनी अटकलें नीले के भगवा से मिलने की लगाई जा रही हैं उतनी ही तिरंगे की छांव में सशक्त व सुनिश्चित भविष्य का निर्माण करने के लिए लाल-हरे के साथ नीले के जुड़ने की भी व्यक्त की जा रही हैं। लेकिन एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि अब तक जब भी किसी ने नीले को अपनाया है तो उसके हिस्से में कालिख ही आई है। जब भी कभी रंगों के घाल-मेल की परिस्थिति उत्पन्न हुई है तो इसमें वर्चस्व नीले का ही रहा है। लिहाजा खिचड़ी की सूरत में नीला रंग अपनाकर रंगा सियार बनने के अलावा शायद ही कोई दूसरा विकल्प दिखाई पड़े। खैर, किस पर किसका रंग चढ़ेगा, किसका रंग जमेगा या किसका रंग उतरेगा यह शनिवार को पता चलेगा, लेकिन इतना तय है कि अगर खिचड़ी की नौबत आई तो जमकर रायता भी फैलेगा। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @नवकांत ठाकुर #NavkantThakur

बुधवार, 1 मार्च 2017

‘भावी परिणामों पर टिकीं असीमित संभावनाएं’

‘भावी परिणामों पर टिकीं असीमित संभावनाएं’


चुनावी राजनीति के तहत होनेवाले सियासी खेल में संभावनाओं का अकाल कभी नहीं होता है। हर चुनाव के बाद नई तस्वीर उभरती है और नया सियासी समीकरण बनता है। स्वाभाविक है कि नए संतुलन की तलाश में सियासी समीकरण का चक्र इस बार भी घूमेगा। तभी तो आगामी ग्यारह मार्च को पांच राज्यों के चुनावों का नतीजा सामने आने के बाद ना सिर्फ राष्ट्रीय राजनीति में बड़े बदलावों की उम्मीद जताई जा रही है बल्कि केन्द्र की मोदी सरकार के केबिनेट में भी व्यापक फेरबदल की सुगबुगाहट साफ महसूस की जा रही है। हालांकि इन बदलावों के लिये अपेक्षित नतीजे की भी दरकार है। तभी तो अभी कोई अपने पत्ते नहीं खोलना चाहता। खोले भी क्यों? बंद मुट्ठी लाख की, खुल गयी तो खाक की। फिलहाल हर तरफ से यथास्थिति बरकरार रखने का ही प्रयास किया जा रहा है। लेकिन ताड़नेवाले भी कयामत की नजर रखते हैं। लाख छिपाने के बावजूद छिप नहीं पा रहा कि एक तरफ दिल्ली की राजनीति में एक-दूसरे को फूटी आंख नहीं सुहाने के बावजूद पंजाब का गुणा-भाग दुरूस्त करने के लिये कांग्रेस और एएपी के बीच अघोषित युद्ध विराम हो गया है जबकि दूसरी ओर महाराष्ट्र में शिवसेना भी बीएमसी के मेयर पद पर दावेदारी के मामले को लेकर जारी विचार-विमर्श प्रक्रिया को यथासंभव लंबा खींचने में जुटी है। इसके अलावा मोदी केबिनेट में संभावित बदलावों को लेकर भी राजधानी के सियासी गलियारे में तमाम अटकलों का बाजार गर्म है और कयास लगाए जा रहे हैं कि अगर चुनाव परिणाम अपेक्षा के अनुकूल रहे तो शीर्ष केबिनेट मंत्रियों की जिम्मेवारियों में बड़े बदलाव की तस्वीर शीघ्र ही दिखाई पड़ सकती है। वास्तव में इन तमाम कयासों व अटकलों को चुनाव परिणाम के बाद की स्थितियों से जोड़ कर देखा जा रहा है और माना जा रहा है कि इन परिणामों के मुताबिक सत्ता का समीकरण नयी करवट ले सकता है। मसलन पंजाब के मामले में भले ही भाजपा-अकाली गठबंधन के नेताओं ने भी यह मान लिया है कि वहां बादल सरकार की वापसी नहीं होने जा रही है लेकिन इस बात का दावा करने की स्थिति में भी कोई नहीं है कि सूबे में किसी एक पार्टी को ही पूर्ण बहुमत हासिल हो जाएगा। ऐसे में अगर त्रिशंकु विधानसभा की तस्वीर बनी तो धर्मनिरपेक्षता की अलख जगाते हुए कांग्रेस और एएपी के बीच भाजपा को सत्ता से बाहर रखने के लिये समझौता हो सकता है और इसका प्रभाव निश्चित तौर पर दिल्ली महानगरपालिका के आगामी चुनावों पर भी पड़ेगा। हालांकि कांग्रेस और एएपी को सत्ता में साझेदारी करने का मौका गोवा में भी मिल सकता है बशर्ते वहां भाजपा को बहुमत ना मिल सके। जाहिर है कि इन दोनों दलों को अगर किसी भी सूबे में भाजपा के खिलाफ एक मंच पर आने का मौका मिला तो इस गठजोड़ का विस्तार गुजरात में भी होना तय ही है जहां इस साल के आखिरी दिनों में विधानसभा का चुनाव होना है। इसके अलावा अगर पांच राज्यों के इस चुनाव में कांग्रेस को किन्हीं दो-तीन सूबों में उल्लेखनीय कामयाबी मिल गयी तो इसे मोदी सरकार की खिसकती जमीन का ही परिचायक माना जाएगा और ऐसे में भाजपा से बुरी तरह खार खाई हुई शिवसेना को भी कांग्रेस से हाथ मिलाने का आत्मविश्वास हासिल हो सकता है। वैसे भी राहुल गांधी के नेतृत्व को नकार कर राकांपा अध्यक्ष शरद पवार ने साफ जता दिया है कि कांग्रेस के साथ उनका पुराना याराना दोबारा कायम नहीं पाएगा। इसी प्रकार शिवसेना ने भी भाजपा से अलग होने की पटकथा लिखने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। लिहाजा भाजपा विरोध के वैचारिक धरातल पर इनके बीच आपसी समझौता होने की संभावना को कतई खारिज नहीं किया जा सकता है। लेकिन शर्त यह है कि कांग्रेस को यह साबित करना होगा कि वह राष्ट्रीय राजनीति में दोबारा वापसी करने की राह पर आगे बढ़ रही है। जाहिर है कि महाराष्ट्र का संभावित समीकरण यूपी के नतीजों का ही इंतजार कर रहा है जहां अगर कांग्रेस के साथ सपा का बेड़ा पार हो गया तो शिवसेना भी कांग्रेस के साथ जुड़ने में हर्गिज देरी नहीं करेगी। इसके अलावा इन चुनाव परिणामों के बाद मोदी सरकार के केबिनेट का स्वरूप भी बदल सकता है। खास तौर से गोवा वापसी के लिये अपनी हार्दिक तड़प दिखा चुके मनोहर पर्रिकर को दोबारा मुख्यमंत्री बनाकर वापस भेजे जाने और रक्षा मंत्रालय की जिम्मेवारी एक बार फिर अरूण जेटली के कांधों पर आने की अटकलें काफी जोर-शोर से लगायी जा रही हैं। ऐसे में वित्त विभाग का कामकाज पियूष गोयल को सौंपे जाने की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा रहा है। साथ ही दूर की कौड़ी के तौर पर गाहे-बगाहे यह बात भी उछल रही है कि यूपी में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने का मौका मिलने पर राजनाथ सिंह को प्रदेश की राजनीति में वापस भेजने का मौका गंवाना भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को शायद ही मंजूर हो। यानि इतना तो साफ है कि इन चुनावों का जितना प्रभाव प्रदेशिक राजनीति पर पड़ेगा उससे रत्ती भर भी कम केन्द्र की राजनीति प्रभावित नहीं होगी। लेकिन ये तमाम समीकरण फिलहाल कयासों और अटकलों पर ही आधारित हैं क्योंकि हर संभावित बदलाव के साथ यही जुड़ा हुआ है कि अगर यह होगा तो वह होगा। लिहाजा जो भी होगा वह चुनाव परिणाम की तस्वीर से ही तय होगा। वर्ना सियासत में होने को तो कुछ भी हो सकता है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर # Navkant Thakur

सोमवार, 21 नवंबर 2016

‘सियासी सामंजस्य पर भारी नेतृत्व की दावेदारी’

‘सियासी सामंजस्य पर भारी नेतृत्व की दावेदारी’

नोटबंदी के बाद देश में पैदा हुए राजनीतिक हालातों को सतही तौर पर देखा जाये तो आम लोगों को भुगतनी पड़ रही परेशानियों की आड़ लेकर केन्द्र की मोदी सरकार पर चैतरफा सियासी वार का सिलसिला लगातार जारी है। तमाम विरोधियों ने संसद से लेकर सड़क तक भारी कोहराम मचाया हुआ है। कोई नोटबंदी का फैसला वापस लिये जाने की मांग कर रहा है तो कोई इसे लागू करने की मियाद बढ़ाने की वकालत कर रहा है। कोई इस पूरे खेल में भारी घोटाले की बात कह कर संयुक्त संसदीय समिति से इसकी जांच कराने की अपील कर रहा है तो कोई इसकी तुलना उरी में हुए आतंकी हमले से करते हुए आक्रोश जता रहा है कि जितने जवान उरी में शहीद हुए उससे दोगुनी तादाद में आम लोगों को सरकार के इस फैसले के कारण अपनी जान गंवानी पड़ी है। यानि दूसरे शब्दों में कहें तो विपक्षी दलों को मोदी सरकार का यह फैसला कतई रास नहीं आया है लिहाजा वे खुलकर इसकी मुखालपत करने से भी नहीं हिचक रहे हैं। यहां तक कि सरकार के भीतर भी असंतोष का भाव स्पष्ट दिख रहा है लेकिन गनीमत है कि सत्ता के साझीदारों ने भावी राजनीतिक लाभ के लोभ में अपनी जुबान बंद रखना ही बेहतर समझा है। हालांकि शिवसेना को अपवाद के तौर पर अवश्य गिना जा सकता है जो केन्द्र से लेकर महाराष्ट्र तक की सत्ता में साझेदारी के बावजूद खुल कर सरकार के फैसले का विरोध करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा है। यानि पीड़ित सभी हैं। बिलबिलाहट हर तरफ है। लेकिन पूरे मामले का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि सैद्धांतिक तौर पर सरकार के फैसले का पुरजोर विरोध करनेवाली पार्टियां एकजुट होकर अपनी बात रखने के प्रति जरा भी दिलचस्पी नहीं दिखा रही हैं। हालांकि राष्ट्रीय स्तर पर सरकार के इस फैसले के खिलाफ विपक्षी खेमे को लामबंद करने का प्रयास कांग्रेस से लेकर तृणमूल कांग्रेस ने भी किया लेकिन ना तो तृणमूल सुप्रीमो ममता बनर्जी की अगुवाई में सरकार की मुखालफत करने के लिये सहमति बन पायी और ना ही कांग्रेस को आगे रहने का मौका देने के प्रस्ताव पर आम सहमति की मुहर लग सकी। ममता ने बीती को बिसार कर वामदलों को भी अपने साथ जुड़ने का आग्रह किया लेकिन वामपंथियों को यह प्रस्ताव रास नहीं आया। हालांकि अप्रत्याशित तौर पर शिवसेना ने अवश्य ममता की अगुवाई में राष्ट्रपति भवन तक हुए विरोध मार्च में हिस्सेदारी की लेकिन उसके पास दूसरा कोई विकल्प भी नहीं था। कांग्रेस उसे वैसे भी अपने साथ जोड़ना गवारा नहीं कर सकती और बाकी कोई अन्य ऐसा खेमा अस्तित्व में ही नहीं आया था जिसने सरकार के खिलाफ खुलकर मैदान में उतरने की रणनीति अमल में लायी हो। काफी हद तक शिवसेना सरीखी हालत ही दिल्ली में सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी की भी रही जिसका एकसूत्रीय एजेंडा प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ मुखर दिखना ही रहता है। लेकिन कांग्रेस के साथ समानांतर दूरी बनाये रखना भी उसके लिये आवश्यक है वर्ना मोदी के खिलाफ बनारस में लोकसभा चुनाव लड़के अरविंद केजरीवाल ने जिन सियासी संभावनाओं का बीजारोपण किया था उसका भविष्य में कुछ परिणाम दे पाने की उम्मीद भी समाप्त हो जाएगी। साथ ही अगामी विधानसभा चुनावों का समीकरण भी विपक्षी एकता की राह में बाधक के तौर पर ही सामने आया है क्योंकि कांग्रेस के नवगठित खेमे से अगर सपा-बसपा ने दूरी बनाये रखी है तो इसकी काफी बड़ी वजह यूपी की जमीनी लड़ाई भी है। यानि विपक्षी खेमे के पूरे गुणा-भाग पर समग्रता पूर्वक निगाह डाली जाये तो इस बात में कोई संदेह नहीं रह जाता है कि चुनावी तकाजों ने सैद्धांतिक सियासी एकता की राह में नेतृत्व को लेकर गतिरोध उत्पन्न कर दिया है और कोई भी दल आसानी से किसी अन्य का नेतृत्व स्वीकार करने के लिये कतई तैयार नहीं दिख रहा है। हालांकि सैद्धांतिक तौर पर इस बात से सभी सहमत हैं कि भाजपा के विजय रथ को रोकने के लिये राष्ट्रीय स्तर पर एक मजबूत महागठजोड़ की जरूरत है क्योंकि विरोधी वोटों के बिखराव के कारण ही महज 32 फीसदी वोट पाने के बावजूद पिछले लोकसभा चुनाव में अपने दम पर पूर्ण बहुमत अर्जित करने में भाजपा को कामयाबी मिल गयी थी। लेकिन मसला नेतृत्व को लेकर अटक रहा है। पिछली दफा समाजवादी कुनबे को इकट्ठा करके सपा ने नये गठजोड़ का बीजारोपण भी किया तो बाकियों की महत्वाकांक्षा की तपिश ने उस बीज का ही नाश कर दिया। अब एक बार फिर कांग्रेस ने गैर-भाजपाई गठजोड़ की धुरी के तौर पर खुद को प्रस्तुत किया तो वामदलों सहित गिनती गिनाने के लिये कुल ग्यारह दलों ने उसकी बैठक में शिरकत अवश्य की लेकिन संसद की दहलीज के भीतर आते-आते ‘बिछड़े सभी बारी-बारी’ की स्थिति बन गयी। वहीं नये गठजोड़ के संभावित नेतृत्वकर्ताओं की सूची के कई बड़े नामों ने नोटबंदी के मसले को अपनी संभावना मजबूत करने के हथियार के तौर पर आजमाने से परहेज बरतते हुए सरकार के कदम का समर्थन करना ही मुनासिब समझा। यानि नेतृत्व के अभाव ने सियासी सामंजस्य का माहौल बनने ही नहीं दिया जिसके नतीजे में नोटबंदी के हथियार का वार अब सरकार का बाल बांका करने में भी बेकार साबित होता ही दिख रहा है। लेकिन कहते हैं कि आवश्यकता ही आविष्कार की जननी होती है। लिहाजा गैर-भाजपाई गठजोड़ की आवश्यकता के लिये किसी सर्वमान्य नेतृत्वकर्ता के आविष्कार की संभावना बदस्तूर बरकरार है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’  @ नवकांत ठाकुर # Navkant Thakur 

सोमवार, 24 अक्टूबर 2016

’मन-मन भावे, मूड़ हिलावे‘

’मन-मन भावे, मूड़ हिलावे‘


किसी के भी चाल-चरित्र व स्वभाव के बारे में जितनी सही व पूरी जानकारी उसके धुर विरोधी के पास होती है उतनी किसी और के पास हो ही नहीं सकती। तभी तो भाजपा को अगर सबसे सही तरीके से किसी ने जाना, समझा और पहचाना है, तो वे हैं सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव। खास तौर से ‘मुंडे-मुंडे मतिर्भिन्ना’ का दिखावा करके मतदाताओं व विरोधियों को भ्रम व असमंजस में डालने के भाजपा के जिस चरित्र के प्रति मुलायम लगातार सबको आगाह करते रहे हैं उसी का मुजाहिरा किया है भाजपा की मौजूदा कूटनीति ने। यूपी विधानसभा के चुनाव में पार्टी एक हाथ में राष्ट्रवाद के झंडे और दूसरे में विकास के एजेंडे का तो सार्वजनिक तौर पर मुजाहिरा कर रही है। लेकिन राष्ट्रवादी झंडे के भीतर सांप्रदायिक मसलों का डंडा घुसेड़ने की अपनी कोशिशों को खुलकर स्वीकार करना उसे कतई गवारा नहीं हो रहा है। शायद यही भाजपा का असली स्वभाव जिसके तहत इसके तमाम नेता अधिकांश मसलों पर कभी एक सुर में बोलना गवारा नहीं करते। दूर से सुननेवालों को ऐसा लगता है मानो पार्टी के भीतर सैद्धांतिक व वैचारिक स्तर पर भारी टकराव चल रहा है। लेकिन नजदीक से देखने पर तस्वीर बदली हुई दिखती है। इसमें मजेदार तथ्य यह है कि पार्टी में सबकी राहें बेशक अलग दिखती हों लेकिन उनकी मंजिल एक ही रहती है। अब जहां लक्ष्य को लेकर कोई मतभेद या विरोधाभास ना हो वहां राहों का भेद कोई मायने नहीं रखता। लिहाजा इनका आपसी टकराव व विरोध भी अक्सर दिखावे का ही रहता है। परस्पर मतभेद तो दिखता है लेकिन उसमें मनभेद नहीं होता। मन मिला हुआ ही रहता है। दरअसल संगठनिक स्तर पर होनेवाली इस नूराकुश्ती का मकसद सिर्फ सियासी माहौल में भ्रम की स्थिति उत्पन्न करना ही रहता है। और कुछ भी नहीं। इस भ्रम के शिकार सिर्फ मतदाता ही नहीं होते बल्कि कई दफा विरोधी भी हो जाते हैं। वे समझ ही नहीं पाते कि भाजपा के किस नेता की बात का विरोध करें और किसके बयान की अनदेखी। भ्रम के इसी कुहासे में फंसकर विरोधियों की गाड़ी अक्सर डी-रेल हो जाती है और भाजपा मैदान मार ले जाती है। ऐसा ही माहौल भाजपा ने एक बार फिर बनाने का प्रयास किया है। खास तौर से यूपी विधानसभा के चुनाव को सांप्रदायिक रंग देने के मामले को लेकर। जितने मुंह उतनी बातें। सुब्रमण्यम स्वामी तो राम मंदिर निर्माण की तारीख का भी ऐलान कर चुके हैं। जबकि राजनाथ सिंह ने औपचारिक तौर पर सरकार की विवशता का इजहार करते हुए पहले ही कह दिया है कि चुंकि राज्यसभा में मोदी सरकार को बहुमत हासिल नहीं है लिहाजा संसद से कानून बनाकर मंदिर का निर्माण कर पाना फिलहाल संभव ही नहीं है। दूसरी ओर यूपी के प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य से लेकर उमा भारती तक खम ठोंकते हुए यह कहने से परहेज नहीं बरत रहे हैं कि मंदिर तो मोदी सरकार के कार्यकाल में ही बनेगा। यानि हर किसी की जुबान पर मंदिर का नाम तो है लेकिन सुर अलग-अलग है। विनय कटियार तल्ख सुर में लाॅलीपाॅप की कड़वाहट बयान करते हैं तो महेश शर्मा कहते हैं कि जो किया जा सकता है वह तो कम से कम कर लिया जाये। इस सबसे अलग भाजपा का राष्ट्रीय संगठन मंदिर मसले को आस्था का विषय बताने से तो नहीं हिचक रहा लेकिन लगे हाथों यह समझाने से भी चुक रहा है कि यूपी में मंदिर को चुनावी मुद्दा नहीं बनाया जायेगा बल्कि पार्टी विकास और सुशासन के एजेंडे पर ही चुनाव लड़ेगी। पार्टी का साफ मत है कि मंदिर बनना तो चाहिये लेकिन इसके लिये मनामानी नहीं होनी चाहिये। या तो आम सहमति के आधार पर मंदिर निर्माण हो या फिर अदालत के आदेश पर। अब आम सहमति तो बनने से रही। जब इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा किये गये विवादित जमीन के बंटवारे के दो हिन्दू लाभार्थियों के बीच अब तक सहमति नहीं बन पायी है तो तीसरे मुस्लिम पक्षकार के साथ सहमति बने भी तो कैसे? रहा सवाल अदालत के आदेश से मंदिर निर्माण का, तो इस राह के रोड़े फिलहाल समाप्त होते नहीं दिख रहे। इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फैसला सामने आये तकरीबन दो साल का वक्त गुजर जाने के बावजूद आज तक इस मामले की फाइल सर्वोच्च न्यायालय की आलमारी में धूल ही फांक रही है। अब तक इसकी सुनवाई के लिये पीठ का गठन भी नहीं हो पाया है। पता नहीं कब पीठ का गठन होगा, कब सुनवाई होगी और कब इसका फैसला आएगा। यानि पूरा मामला अभी बदस्तूर अटका-लटका ही रहनेवाला है। इस हकीकत को जानते हुए भी अगर मंदिर मसले की लहर उठाने का प्रयास हो रहा है और कटियार की तल्खी, सरकार की नरमी और संगठन की गर्मी दिख रही है तो इसमें किसी का किसी से कोई विरोधाभास नहीं है। अंदर से सब मिले हुए ही हैं। बस ऊपर से एक दूसरे से असहमत होने का दिखावा किया जा रहा है। ताकि समाज की कट्टरवादी धारा पर भी पकड़ बनी रहे और मध्यममार्गी धारा पर भी। इसके अलावा छोड़-पकड़ की इस खींचतान में विरोधियों को भी उलझाये रखा जाये ताकि वे किसी एक बयान को पकड़कर आगे ना ले जा पायें। अब ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि ‘चित भी मेरी पट भी मेरी’ की जो दोधारी तलवार भाजपा भांज रही है उसकी चपेट इसके विरोधी आते हैं या पार्टी खुद ही लहुलुहान होती है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’  @ नवकांत ठाकुर # Navkant Thakur

मंगलवार, 16 अगस्त 2016

जहां सुमति तहां संपति नाना....

जहां सुमति तहां संपति नाना....


गोस्वामी तुलसीदासजी ने रामचरितमानस में लिखा है कि ‘सुमति कुमति सबके उर रहहीं, नाथ पुरान निगम अस कहहीं, जहां सुमति तहां संपति नाना, जहां कुमति तहां विपति निदाना।’ वाकई सुमति और कुमति तो एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। लेकिन अगर कुमति हावी हो जाये तो बनता हुआ काम भी बिगड़ जाता है जबकि सुमति के सहारे बिगड़े हुए काम को भी आसानी से सफल किया जा सकता है। तभी तो जब तक देशहित पर दलगत राजनीति हावी रही तब तक संसद से लेकर सड़क तक बवाल कटता रहा। लेकिन सुमति का साम्राज्य स्थापित होते ही गाड़ी पटरी पर लौट आई। भारतीय संसद ने सर्वसम्मति से निर्विरोध फैसले लेने की ऐसी ताकत का मुजाहिरा किया कि समूचा विश्व चमत्कृत हो उठा। अमेरिका सरीखे विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र को भी औपचारिक तौर पर इसकी सराहना करनी पड़ी। हालांकि अमेरिका ने तो सिर्फ जीएसटी के सर्वसम्मति से पारित होने पर ही भारत की सराहना की है जबकि हकीकत तो यह है कि इस मानसून सत्र में भारतीय संसद ने उन तमाम मसलों पर एकमतता व सर्वसम्मति का मुजाहिरा किया है जिसके बारे में माना जा रहा था कि जब भी ये मसले सदन में उठेंगे तो सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच भारी तकरार व टकराव का माहौल दिखेगा। लेकिन देश के तमाम राजनीतिक दलों ने एक बार फिर दुनियां को यह बता दिया है कि मिल बैठकर, एक दूसरे की बात समझ कर और सच को स्वीकार करके साथ मिलकर आगे बढ़ने का नाम ही लोकतंत्र है। हालांकि लोकतंत्र में विचार-प्रचार और संवाद-विवाद की गुंजाइश हमेशा बनी रहती है। लेकिन सच यही है कि व्यवस्था सिर्फ सत्ता से नहीं चलती। व्यवस्था चलती है सर्वसम्मति से, सबको साथ लेकर। किसी भी मामले में सर्वसम्मति बनाकर ही आगे बढ़ने के सिद्धांत को इस दफा सरकार ने भी व्यावहारिक तौर पर अपनाया और इसमें विपक्ष ने भी पूरा सहयोग किया। इसीका नतीजा रहा कि लोकसभा में तकरीबन 110 फीसदी काम हुआ जबकि राज्यसभा में भी लगभग 99 फीसदी कार्य पूरा हुआ। सत्तापक्ष और प्रतिपक्ष के बीच स्वस्थ तालमेल का ही नतीजा रहा कि लोकसभा से 15 बिल पारित हुए जबकि राज्यसभा से पारित होने वाले विधेयकों की संख्या 14 रही। इसके अलावा चर्चाएं भी हुई और ध्यानाकर्षण प्रस्तावों पर भी बहस हुई। महंगाई पर चर्चा हुई, दलित उत्पीड़न पर चर्चा हुई और जम्मू कश्मीर की मौजूदा स्थिति को लेकर भी चर्चा हुई। हर मसले पर आम सहमति का माहौल ही नहीं बना बल्कि सर्वसम्मति से प्रस्ताव भी पारित किया गया। चर्चा के नाम पर खर्चा-पानी लेकर चढ़-बैठने से विपक्ष ने भी परहेज बरता और सत्तापक्ष की ओर से भी हेकड़ी या मनमानी का मुजाहिरा नहीं किया गया। नतीजन पिछले कई सालों से जो संसद जंग का मैदान बनी हुई थी वह इस दफा सर्वसम्मति के माहौल में सुचारु तरीके से अपने काम को अंजाम देती हुई दिखी। जिस जीएसटी विधेयक को लेकर पिछले एक दशक से वैचारिक व सैद्धांतिक टकराव चल रहा था वह संसद के दोनों सदनों में सर्वसम्मति से पारित हुआ और इसके विरोध में एक भी वोट नहीं पड़ा। यहां तक कि दलितों पर हो रहे अत्याचार के मामले को लेकर हुई चर्चा के बारे में भी संभावित टकराव को लेकर जितने भी कयास लगाए जा रहे थे वे सभी गलत साबित हुए और ना सिर्फ इस पर संसद में स्वस्थ चर्चा हुई बल्कि सर्वसम्मति के साथ प्रस्ताव पारित करके सदन ने बेहद सख्त लहजे में सभी सूबों को स्पष्ट शब्दों में कह दिया कि दलितों की रक्षा और सुरक्षा से कतई समझौता नहीं किया जाना चाहिये। सर्वसम्मति का ऐसा ही माहौल महंगाई पर हुई चर्चा के दौरान भी दिखा। सरकार ने स्वीकार किया कि दाल सहित कुछ खाद्य वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि अवश्य हुई है लेकिन इसे थामने के लिए वह प्रयत्नशील है। सरकार के आश्वासन पर विपक्ष ने भी भरोसा जताया और इस मामले में भी संसद में पूरी आम सहमति का माहौल देखा गया। इसी प्रकार जम्मू कश्मीर के मौजूदा हालातों को लेकर हुई चर्चा में भी पूरी तरह आम सहमति देखी गई और सहमति भी ऐसी कि घरेलू राजनीति में एक दूसरे के कट्टर विरोधी माने जानेवाले सपा के रामगोपाल यादव ने जब पाकिस्तान से सिर्फ गुलाम कश्मीर के मसले पर ही वार्ता किये जाने की बात कही तो राजनीतिक पंडितों ने यहां तक कह दिया कि सपा ने भाजपा की लाइन पकड़ ली है। लेकिन सच तो यह है कि किसी ने किसी की लाइन नहीं पकड़ी है। सबकी अपनी-अपनी लाइन है और किसी की भी लाइन देश के हितों के खिलाफ नहीं हो सकती। यानि बात जब देश की आती है तो भारतीयता की भावना कितनी प्रबल हो जाती है यही दिखाया है हमारी संसद ने और हमारे सांसदों ने। वैसे भी बात जब देश के आन, बान, शान, विकास, सुरक्षा व अखंडता की हो तब अपेक्षित है कि संसद से ऐसा ही सुर निकले जैसा मौजूदा सत्र में निकला है। लिहाजा संसद में इस तरह के माहौल की खुले दिल से सराहना करने में कतई कोताही नहीं बरती जानी चाहिए और आगे भी प्रयत्नशील रहना चाहिए कि संसद देश के विकास में रोड़े अटकाती हुई ना दिखे बल्कि विकास में अपना योगदान करती हुई दिखे। वैसे भी घरेलू राजनीति अपनी जगह है, सत्ता की खींचतान और सैद्धांतिक विरोधाभास अपनी जगह। लेकिन इसे देशहित पर हावी होने की इजाजत तो कतई नहीं दी जा सकती। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर # Navkant Thakur

सोमवार, 18 जुलाई 2016

‘मेहनत किसी और की मुनाफा किसी और का’

‘मेहनत किसी और की मुनाफा किसी और का’


सैद्धांतिक तौर पर भले ही यह न्यायोचित ना हो लेकिन व्यावहारिक तौर पर अक्सर ऐसा ही होता है कि मेहनत करे कोई और मुनाफा कूटे कोई और। जीवन का शायद ही ऐसा कोई क्षेत्र हो जहां मेहनत करनेवाले को मजदूरी के अलावा मुनाफा भी नसीब होता हो। वर्ना आर्थिक तौर पर यह होता है कि खून-पसीना एक करके फसल उगानेवाले किसान को लागत की वसूली के भी लाले पड़े रहते हैं जबकि बाजार के बिचैलियों की तिजोरी में हमेशा मुनाफे की बहार ही दिखती है। सामाजिक तौर पर भी मां का दूध व बाप का खून पीकर जवान होनेवाले फलदार पौधे को कंद-मूल सहित स्वजातीय गैर-गोत्रीय को दान कर दिये जाने की ही परंपरा है। धार्मिक परंपरा में भी यजमान की पूरे साल की कमाई का मोटा हिस्सा कर्मकांड, धार्मिक आयोजनों व दान-दक्षिणा के नाम पर पंडे-पुरोहितों की ही भेंट चढ़ जाता है। यहां तक कि राजनीति में भी अक्सर यही देखा जाता है कि मेहनत किसी और की रहती है जबकि मुनाफा किसी अन्य के हिस्से में चला जाता है। यह सिर्फ अंदरूनी तौर पर सियासी संगठनों के भीतर ही नहीं होता बल्कि बहुदलीय चुनावी प्रतिस्पर्धा में भी अक्सर ऐसा ही होता है। तभी तो उत्तर प्रदेश के पिछले विधानसभा चुनाव में बहनजी की सरकार को जनता की अदालत के कठघरे में खड़ा करने का काम तो सपा के अलावा भाजपा व कांग्रेस ने भी पूरी शिद्दत के साथ किया था लेकिन जब चुनावी नतीजा आया तो सत्ता के मुनाफे की मलाई में ना तो हाथ डल सका और ना ही फूल। पूरे मुनाफे से लकदक हो गयी वह सायकिल जिसके तमाम कल-पुर्जों के बीच अब तक पूरा तालमेल नहीं बन पाने के कारण बकौल अखिलेश यादव कभी यह पांच सूबेदारों की सरकार कही जाती है तो कभी साढ़े तीन मुख्यमंत्रियों की। इस बार भी यूपी की राजनीति में औरों की मेहनत का मुनाफा किसी और के खाते में जाने के आसार ही प्रबल दिख रहे हैं। हालांकि मेहनत तो सभी जी-जान से कर रहे हैं और चैथे पायदान पर खड़ी बतायी जा रही कांग्रेस ने भी जिस तरह से चुनावी समर में जोरदार शंखनाद किया है उसके मद्देनजर वह भी अपनी संभावनाएं कतई समाप्त नहीं मान रही है। लेकिन अब तक सामने आए समीकरणों की पड़ताल करने से जो तस्वीर उभर रही है उसमें ना सिर्फ कांग्रेस की मेहनत का फायदा भी सपा को ही मिलने की संभावना दिख रही है बल्कि बसपा व भाजपा के बीच भी एक-दूसरे की फसल पर कब्जा जमाने की लड़ाई ही छिड़ी नजर आ रही है। वास्तव में देखा जाये तो भले ही अब तक बहुकोणीय मुकाबले में सपा की सायकिल सबसे तेज गति से आगे बढ़ती दिख रही हो लेकिन भाजपा के कमल की सुगंध भी काफी तेजी से फैलती दिख रही थी और बसपा का हाथी भी अटकते-भटकते व लड़खड़ाते हुए अपनी लय में आने की कोशिशों में जुटा नजर आ रहा था। यानि तस्वीर ऐसी बन रही थी कि बसपा व भाजपा की जी-तोड़ मेहनत का एकमुश्त मुनाफा इन दोनों में से किसी एक के खाते में आनेवाला था जो सपा को सीधी टक्कर देकर आगे निकल सकता था। लेकिन अब कांग्रेस ने जो कूटनीति आजमाई है उससे समाजवादी खेमे में अगर आशाओं का नया संचार होता दिख रहा है तो इसमें कुछ भी अस्वाभाविक नहीं कहा जा सकता है। वास्तव में देखा जाये शीला दीक्षित का चेहरा और राज बब्बर की ऊर्जा को आगे करके कांग्रेस ने उन सपा विरोधी वोटों में बड़ी सेंध लगाने के लिये कमर कस ली है जिसे पूरी तरह अपने पक्ष में एकजुट करने के लिये बसपा व भाजपा ने एड़ी-चोटी का जोर लगाया हुआ है। अब अगर विकास व सुशासन के एजेंडे पर भी चुनाव होता है तो अखिलेश का विकल्प तलाशनेवालों की जमात मायावती के अलावा शीला सरीखे ऐसे सख्त व सफल प्रशासक के बीच अवश्य विभाजित होगी जिन्होंने पंद्रह साल के शासनकाल में दिल्ली का कायापलट करके रख दिया। इसी प्रकार अगर चुनाव में जातीय लहर हावी हुई तो सूबे के जिस ब्राह्मण मतदाताओं के समर्थन से पहले बहनजी ने सोशल इंजीनियरिंग की क्रांति की थी और बाद में सपा भी दो-तिहाई बहुमत के आंकड़े के करीब तक पहुंची थी उस वोटबैंक को अगर दशकों बाद अपने समाज का मुख्यमंत्री चुनने का विकल्प मिल रहा है तो स्वाभाविक तौर पर उसकी संवेदना व सद्भावना कांग्रेस से ही जुड़ेगी और ऐसे में ब्राह्मण मतदाताओं की काफी बड़ी जमात अगर कांग्रेस की झोली में अपना वोट डाल दे तो इसे कतई अस्वाभाविक नहीं माना जाएगा। साथ ही सूबे के उन अल्पसंख्यकों को भी गुलामनबी आजाद, राज बब्बर व इमरान मसूद की तिकड़ी कांग्रेस के पक्ष में लाने की पूरी क्षमता रखती है जो सपा से बिदकने के बाद विकल्प की तलाश में हैं। यानि समग्रता में देखें तो सतही तौर पर कांग्रेस की पूरी मेहनत अपने खोये जनाधार को दोबारा हासिल करने और अपने वजूद को जमीनी स्तर पर मजबूत करने की दिशा में नजर आ रही हो लेकिन इसकी उसे कितनी मजदूरी मिल पाएगी इसके बारे में अभी से ठोस अंदाजा लगा पाना तो बेहद मुश्किल है। लेकिन सत्ताविरोधी वोटों को छिन्न-भिन्न करते हुए इसके काफी बड़े हिस्से पर अपना कब्जा जमाने के लिये की जा रही कांग्रेस की पूरी कसरत का असली मुनाफा सीधे तौर पर सपा को मिलने की संभावना से कतई इनकार नहीं किया जा सकता है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’    @ नवकांत ठाकुर # Navkant Thakur

बुधवार, 29 जून 2016

कही-सुनी पे बहुत एतबार करने लगे.....

कही-सुनी पे बहुत एतबार करने लगे.....   


‘कही-सुनी पे बहुत एतबार करने लगे, मेरे ही लोग मुझे संगसार करने लगे, कोई इशारा दिलासा न कोई वादा मगर, जब आई शाम मेरा इंतजार करने लगे।’ कायदे से देखें तो वसीम बरेलवी की यह गजल इन दिनों स्वामी प्रसाद मौर्य की वास्तविक हालत को बयान करती हुई महसूस होती है। वाकई इनके बारे में कही-सुनी बहुत सी बातें अफवाहों व अटकलों की शक्ल में सियासी महफिलों में तैरती फिरती हैं। लेकिन ना तो इन्होंने अब तक खुलकर कुछ कहा है और ना ही इनके लिये किसी ने अपना दरवाजा बंद किया है। अलबत्ता भले ही इन्होंने किसी से कोई वादा ना किया हो लेकिन इनके इंतजार में सभी पलक पांवड़े बिछाए दिख रहे हैं। सतही तौर पर देखने से तो यही लगता है कि बसपा छोड़ने के बाद मौर्य के सामने विकल्पों का पूरा आसमान अपनी बांहें फैलाए खड़ा है। ये जिधर का भी रूख करें इनके लिये उधर ही तोरणद्वार व  वंदनवार सजाये जाने की पूरी तैयारी है। हर कोई लालायित है इन्हें गले लगाने के लिये। इनके इंतजार में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव भी पलकें बिछाये खड़े हैं और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह भी इनकी राहों में बांहें फैलाये हुए हैं। यानि दूसरे शब्दों में कहें तो हर रास्ता इनके ही इंतजार में दिख रहा है। अब इन्हें ही तय करना है कि किधर जाना है। लिहाजा विकल्पों की बहुलता के कारण कायदे से तो इनका अगला कदम बेहद आसान होना चाहिये था। लेकिन गहराई से देखें तो पूरा माहौल उतना खुशनुमा कतई नहीं है जितना सतह पर दिख रहा है। बल्कि हकीकत तो यह है कि विकल्पों की बहुलता ने ही इनकी राहें बुरी तरह दुश्वार कर दी हैं। तभी तो इन्होंने सबसे पहला काम किया विकल्पों को सीमित करने का। इसी क्रम में सबसे पहले इन्होंने सपा की ओर जानेवाले रास्ते का दरवाजा खुद ही बंद कर लिया। इन्होंने सपा से अपनी दूरी दिखाने के लिये उसपर तीखा हमला बोल दिया। कहा कि सपा के विषय में उनकी राय नहीं बदली है। वह उसे गुण्डों और माफियाओं की पार्टी ही मानते हैं और मुलायम सिंह यादव के परिवारवाद के विरोधी वे पहले भी थे और आगे भी रहेंगे। शायद यह तल्खी दिखाना मौर्य की मजबूरी भी रही होगी क्योंकि जो व्यक्ति बसपा में कई वर्षों तक मायावती के बाद नम्बर दो की हैसियत में रहा हो, उसके लिए अचानक ही सपा में शामिल हो जाना अव्यावहारिक और असहजतापूर्ण हो सकता है। इस तथ्य को सपा नेता समझ नहीं सके अन्यथा वह जल्दबाजी न दिखाते। ना आजम खान आनन-फानन में मौर्य को सपा में शामिल होने का न्यौता देकर चट मंगनी और पट ब्याह कराने की कोशिश करते और ना ही मौर्य को गठजोड़ की संभावनाएं टटोलने से पहले ही अलगाव का एलान करने के लिये मजबूर होना पड़ता। खैर, जो हो गया वह बदल तो नहीं सकता। अलबत्ता उसके असर को तो भुगतना ही होगा। अब इसका नतीजा यह हुआ है कि फिलहाल सपा की ओर खुलनेवाला दरवाजा मौर्य के लिये बंद हो गया है और अपनी ओर से मौर्य ने ही उस पर सांकल चढ़ा दी है जबकि दरवाजे के दूसरी तरफ शिवपाल यादव टेक लगाकर खड़े हो गये हैं ताकि वह दरवाजा खुल ही ना सके। हालांकि इन्होंने अपनी ओर से भले ही सपा की ओर खुलनेवाले दरवाजे पर कुंडी चढ़ा दी हो लेकिन सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव के साथ इनके पुराने रिश्तों की दुहाई देते हुए अखिलेश यादव ने आज भी इनके लिये रास्तों में फूल बरसाना जारी रखा हुआ है। लेकिन सवाल है कि विपक्ष के नेता पद से हटते ही सत्तापक्ष का दामन थाम लेने का मतदाताओं का जो असर पड़ेगा उससे इनकी विश्वसनीयता तो सवालों के घेरे में आ ही जाएगी। ऐसे में अब फिलहाल मौर्य के सामने अपनी अलग पार्टी बनाने के अलावा भाजपा में शामिल होने का ही विकल्प बचा है। बसपा में इनकी वापसी अब नामुमकिन है और कांग्रेस में तो फिलहाल शायद ही कोई महत्वाकांक्षी नेता शामिल होना पसंद करे। लेकिन मसला है कि अपनी अलग पार्टी बनाने के विकल्प में भी बहुत जोखिम है क्योंकि अगर जनता ने नकार दिया तो सियासत में अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा। यानि सुरक्षित विकल्प तो इनके सामने अब भाजपा का ही है लेकिन मसला है कि पिछले चुनाव में बसपा से आये बाबूसिंह कुशवाहा को महज चैबीस घंटे के लिये संगठन में शामिल कराने का बेहद बुरा खामियाजा भुगत चुकी भाजपा में इस दफा मौर्य के मसले पर पहले आम सहमति तो बने। तभी तो भाजपा में दबी जुबान से मौर्य के बारे में बातें तो कई तरह की हो रही हैं लेकिन खुलकर कोई कुछ नहीं कह रहा। वैसे यदि जातीय समीकरण की बात करें तो भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद भी मौर्य समाज से ही आते हैं जिनकी छवि पूरी तरह बेदाग है। जबकि मायावती सरकार के कार्यकाल में स्वामी प्रसाद भी भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे थे। लिहाजा भाजपा भी इन्हें अपने संगठन में शामिल करने से पहले सौ-बार सोचेगी और उसके बाद ही कोई अंतिम फैसला लेगी। बहरहाल मौजूदा हालातों में मौर्य के बारे में अभी सिर्फ अटकलें ही लगायी जा सकती हैं। लेकिन सवाल है कि अगर अटकलों का दौर ही चलता रहा और ये समय रहते अपने लिये कोई ठौर-ठिकाना तलाशने में कामयाब नहीं हो सके तो चुनावी तपिश का मौसम इनके सियासी सफर की बड़ी रूकावट भी बन सकता है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @नवकांत ठाकुर #Navkant Thakur

बुधवार, 22 जून 2016

सियासी ‘साॅल्यूशन’ के लिये ‘कन्फ्यूजन’ की कूटनीति

सियासी ‘साॅल्यूशन’ के लिये ‘कन्फ्यूजन’ की कूटनीति  

वकालत के पेशे का सबसे प्रचलित पैंतरा है ‘कन्फ्यूजन’। बचाव पक्ष के वकील को जब लगने लगता है कि सबूतों व गवाहों के मकड़जाल से अपने मुवक्किल को बचा पाना मुश्किल हो सकता है और आरोपी को निर्दोष मानने के लिये जज को सहमत कर पाना संभव नहीं है तो वह अपने तर्कों व दलीलों के दम पर अदालत को कन्फ्यूज करने में ही अपनी पूरी ताकत झोंक देता है ताकि आरोपी को संदेह का लाभ दिलाया जा सके। वकीलों द्वारा अदालत में अपनाये जानेवाले इस पैंतरे का इन दिनों सियासत में भी काफी बोलबाला दिख रहा है। जिसे देखिये वही मतदाताओं को कन्फ्यूज यानि भ्रमित करने में जुटा हुआ है। खास तौर से उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के मद्देनजर तमाम पार्टियां इसी जुगत में दिख रही हैं कि विरोधी पक्ष के प्रति मतदाताओं के बीच भ्रम व संशय का माहौल बना दिया जाये। तभी तो भाजपा यह प्रचारित कर रही है कि सपा व बसपा के बीच अंदरूनी सांठगांठ है जबकि बसपा का कहना है कि सपा और भाजपा आपस में मिले हुए हैं। उधर सपा के मुताबिक चुंकि बसपा और भाजपा के बीच पहले भी गठजोड़ हो चुका है लिहाजा आगे चलकर भी वे दोनों एकसाथ आने में संकोच नहीं करेंगे जबकि कांग्रेस अभी से मानकर चल रही है कि उसे सूबे की सियासत से बाहर रखने के लिये सपा, भाजपा और बसपा के बीच अंदरखाने परस्पर सहमति बनी हुई है और इसी के नतीजे में ना तो सपा उसके साथ गठजोड़ करने के लिये सहमत हो रही है और ना ही बसपा। यानि सभी दलों का जोर यही साबित करने पर है कि कौन किसके साथ मिला हुआ है और किसकी किसके साथ अंदरूनी सांठगांठ है। जाहिर है कि यह चुनावी पैंतरा मतदाताओं को भ्रमित करने के लिये ही अपनाया जा रहा है जिसमें वास्तविक सच्चाई भले ना हो लेकिन उसका काल्पनिक भौकाल बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी जा रही है। इन दिनों यूपी की तमाम सुर्खियां मतदाताओं को भ्रमित करनेवाली ही दिख रही हैं। मसलन कैराना के मामले को ही लें तो भाजपा के मुताबिक वहां की हालत ठीक वैसी ही है जैसी नब्बे के दशक में कश्मीर की थी। जबकि सूबे में सत्तारूढ़ सपा का कहना है कि कैराना के मामले को सियासी लाभ के लिये बेवजह ही बखेड़े का सबब बनाया जा रहा है जबकि हकीकत में वहां स्थानीय स्तर पर कोई समस्या ही नहीं है। सपा के मुताबिक वहां पूरी तरह रामराज का माहौल है जबकि भाजपा उसे जंगलराज का प्रतीक साबित करने में जुटी हुई है। अब किसकी बात में कितना दूध और किसकी दलीलों में कितना पानी मिला हुआ है यह पता करने के चक्कर में सूबे के उन मतदाताओं का मिजाज घनचक्कर होना तो लाजिमी ही है जिन्होंने कल तक कैराना का नाम भी नहीं सुना था। खैर मतदाताओं का मिजाज तो इस बात को लेकर उखड़ना भी स्वाभाविक है कि कहने को तो सपा और भाजपा दोनों ने यही प्रण किया हुआ है कि इस बार का चुनावी मुद्दा विकास व सुशासन पर ही केन्द्रित रखा जाएगा लेकिन दोनों ही ओर से सांप्रदायिक व जातिगत ध्रुवीकरण की कोशिशों में कोई कसर नहीं छोड़ी जा रही है। कभी एक तरफ के कुछ नेता ‘रामलला हम आएंगे, दिसंबर में मंदिर बनाएंगे’ का नारा बुलंद कर रहे हैं तो दूसरी तरफ घोषित अपराधियों को संगठन में शामिल करके अल्पसंख्यक वोटों की एकजुटता सुनिश्चित करने की कोशिश की जा रही है। चुनाव के बाद भाजपा और बसपा के एकसाथ आने की संभावना जताकर अल्पसंख्यकों को डराने की कूटनीति आजमायी जा रही है तो इसके जवाब में अपना वजूद बचाने के लिये बहुसंख्यकों को एकजुट होने का महत्व समझाया जा रहा है। अब इस बेमानी बहस से गूंज रहे चुनावी नक्कारखाने में विकास व सुशासन की तूती कहां गुम होती जा रही है यह किसी को पता नहीं चल पा रहा है। ऐसे में चुनावी मुद्दों व वायदों के आधार पर पार्टियों को परखनेवाले मतदताओं का भ्रमित होना लाजिमी ही है। इसी प्रकार जब सूबे की सरकार कह रही है कि पिछले साल के बाढ़-सुखाड़ का पैसा उसे अब तक केन्द्र से नहीं मिला है जबकि प्रधानमंत्री सार्वजनिक सभा में आरोप लगा रहे हैं कि केन्द्र से मिलनेवाली सालाना एक लाख करोड़ की रकम प्रदेश सरकार की तिकड़मी योजनाओं में उलझकर फाइलों में ही गायब हो जा रही है तो ऐसे में मतदाताओं का भ्रमित होना तो स्वाभाविक ही है। यहां तक कि मतदाताओं को कन्फ्यूज करने की कूटनीति अपनाने में वह कांग्रेस भी कोई कसर नहीं छोड़ रही है जिसके लिये इस चुनाव को अस्तित्व की लड़ाई के तौर पर देखा जा रहा है। तभी तो कभी उसके नेता यह शगूफा छोड़ते हैं कि सूबे में राहुल के बजाय प्रियंका को आगे रखा जाएगा तो कभी यह सुर्रा छोड़ दिया जाता है कि वरूण गांधी को कांग्रेस में शामिल कराके उनकी अगुवाई में चुनाव लड़ा जा सकता है। अब इस तरह की ऊटपटांग बातें करके मतदाताओं को भ्रमित करने की कोशिशों में जुटे राजनीतिक दलों को कौन समझाए की इन हवाई बातों से अखबारों की सुर्खियां तो बटोरी जा सकती है मगर इससे वोट मिलना मुश्किल ही है। वैसे भी मतदाता मासूम भले ही हो वह मूर्ख कतई नहीं है वर्ना देश में जड़े जमा चुकी त्रिशंकु सदन की अवधारणा को अफसानों में ही अपना अस्तित्व तलाशने के विवश नहीं होना पड़ता। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’  @ नवकांत ठाकुर