क्रिकेटर सचिन तेंडुलकर और अभिनेत्री रेखा के अलावा देश की सबसे अमीर महिलाओं में गिनी जानेवाली अनु आगा व नेहरू-गांधी परिवार के सबसे विश्वासपात्र वकीलों में शुमार किये जानेवाले के. पराशरण का कार्यकाल पूरा होने के बाद उनके स्थान पर राज्यसभा के लिये मनोनीत किये जाने वाले नामों को देखकर तो यही लगता है कि इनको आगे लाने में ठोस सियासी समीकरणों के अलावा इस बात का भी खास ध्यान रखा गया है कि पूर्ववर्ती मनोनीत सांसदों की तरह ये निष्क्रिय ना रहें। हालांकि इन चारों के नामों पर अंतिम मुहर लागने से पहले यह विकल्प भी उपलब्ध था कि पिछली सरकार की तरह बड़े नामों व चमकदार चेहरों को आगे बढ़ाकर समाज के उच्च व अभिजात्य वर्ग की वाहवाही लूटी जा सके। बताया जाता है कि कुछ बड़े व स्वनाम धन्य लोगों को राज्यसभा के लिये मनोनीत करने पर विचार भी किया गया लेकिन आखिरकार यही तय हुआ कि ऐसे लोगों को संसद की सदस्यता दी जाये जो सदन की बैठकों में सक्रियता के साथ शामिल हों ताकि उनके अनुभव व ज्ञान का देश व समाज को लाभ मिले। साथ ही राजनीतिक व सैद्धांतिक समीकरणों का असर भी मनोनीत सांसदों की सूची पर स्पष्ट दिख रहा है क्योंकि जिन राज्यों में जिस तबके के बीच सत्तारूढ़ भाजपा को अपनी पैठ बढ़ानी व बनानी है उसका भी इन नामों के चयन में खास ध्यान रखा गया है। वास्तव में देखा जाये तो रेखा या सचिन जैसे बड़े व चमकदार नामों को संसद के लिये मनोनीत किये जाने से देश व समाज को कुछ भी हासिल नहीं हुआ। अव्वल तो इन्होंने सदन की बैठकों में नाम मात्र के लिये ही उपस्थिति दर्ज कराई और दूसरे पूरे कार्यकाल के दौरान ये लोग काफी हद तक निष्क्रिय ही बने रहे। आंकड़े बताते हैं कि छह साल के कार्यकाल के दौरान रेखा की महज पांच फीसदी जबकि सचिन सिर्फ सात फीसदी ही सदन की बैठकों में उपस्थिति दर्ज हुई। इनके पास इतनी फुर्सत ही नहीं होती थी कि सांसद के तौर पर ये सदन की बैठक में शामिल हो सकें। वह भी तब जबकि मोदी सरकार के कार्यकाल में देश व समाज के हित में सार्थक काम करने का मौका मुहैया कराते हुए संसद ने रेखा को वर्ष 2016 में फूड, कंज्यूमर अफेयर्स और पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन की समिति का और सचिन को भी उसी वर्ष इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी से जुड़ी समिति का सदस्य भी बनाया लेकिन इस अवसर का उपयोग करने की भी उन्होंने कोई जरूरत महसूस नहीं की जिसके कारण समिति में उनके योगदान का कोई ब्यौरा उपलब्ध नहीं है। इसके अलावा सांसद होने के नाते सरकार से सवाल पूछना और जनहित के विधेयक पेश करना भी उनकी जिम्मेवारी थी लेकिन रेखा ने तो दिखाने या गिनाने के लिये भी कभी कोई सवाल नहीं पूछा अलबत्ता सचिन ने जरूर पूरे छह साल में तकरीबन दो दर्जन सवाल पूछे। जाहिर है कि ऐसे में बड़े नामों व चमकदार चेहरों को सांसद के तौर पर मनोनीत करने से देश व समाज का कितना भला होता यह शायद ही किसी को अलग से बताने की जरूरत पड़े। उनके स्थान पर जिन लोगों को इस बार सरकार की सिफारिश व राष्ट्रपति की मंजूरी से राज्यसभा का सदस्य मनोनीत किया गया है उनसे यह उम्मीद करना कतई गलत नहीं होगा कि वे ना सिर्फ सदन में पूरी तरह अपनी सक्रियता दिखाएंगे बल्कि अपनी मुखर व प्रखर सोच व व्यक्तित्व का लाभ देश व समाज को भी पहुंचाएंगे। इस बार जिन चार नामों का चयन किया गया है उनमें यूपी के सोनभद्र जिले के रॉबर्ट्सगंज लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र से तीन बार सांसद रहे रामशकल जाने-माने किसान नेता व दलित विचारक हैं जबकि राकेश सिन्हा राष्ट्रवादी विचारों को मीडिया के माध्यम से प्रखरता के साथ प्रस्तुत करने के लिए जाने जाते हैं। इसी प्रकार महाराष्ट्र की सोनल मानसिंह ना सिर्फ मशहूर नृत्यांगना व पद्म विभूषण, पद्म भूषण और संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित हैं बल्कि मुखर-प्रखर वक्ता व विचारक के तौर पर भी जानी जाती हैं। इसी प्रकार ओडिशा के जाने-माने पाषाण-मूर्तिकार रघुनाथ महापात्रा के ज्ञान, दक्षता व लोकप्रियता को लेकर हर्गिज शक-सुबहा नहीं किया जा सकता है। यानि ये चारों नाम ऐसे हैं जिनसे संसद में व्यापक सक्रियता की उम्मीद करना कतई गलत नहीं होगा। साथ ही इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि इन चारों का चयन करने से सरकार को लेकर उस तबके के बीच सकारात्मक संदेश प्रसारित होगा जिसका सीधा राजनतिक लाभ भाजपा को ही मिलेगा। जहां एक ओर रामशकल को आगे लाकर यूपी के किसानों व दलितों का संसद के ऊपरी सदन में प्रतिनिधित्व दिखाया व बढ़ाया गया है वहीं भाजपा की मातृ संस्था आरएसएस के मुखर विचारक व कायस्थ समाज के बिहारी प्रतिनिधि के तौर पर राकेश सिन्हा को आगे किए जाने का राजनीतिक संदेश भी दूर तक जाना तय ही है। इसके अलावा सोनल मानसिंह का नाम महाराष्ट्र ही नहीं बल्कि पश्चिम बंगाल से लेकर दक्षिण भारत तक में मौजूद कला व संस्कृति में रूचि रखने वालों के बीच सकारात्मक संदेश देने वाला है जबकि महापात्रा की प्रसिद्धि ओडिसा में भाजपा के प्रति भावनात्मक जुड़ाव की राह तैयार करेगी। कुल मिलाकर इस बार बड़े के बजाय बेहतर नामों के चयन की जो पहल हुई है वह सियासी नजरिये से भी लाभदायक है और इनसे देश व समाज को भी भरपूर लाभ मिलने से कतई इनकार नहीं किया जा सकता। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’ @नवकांत ठाकुर #Navkant_Thakur
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