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मंगलवार, 2 मई 2017

‘फिर ये एहसान कि हम छोड़ के जाते भी नहीं’

‘फिर ये एहसान कि हम छोड़ के जाते भी नहीं’


‘जिनको मतलब नहीं रहता वे सताते भी नहीं, जान प्यारी भी नहीं जान से जाते भी नहीं, मुंतजिर हैं दमे-रूखसत कि ये मर जाए तो जाएं, फिर ये एहसान कि हम छोड़ के जाते भी नहीं।’ इन चंद पंक्तियांे को मौजूदा सियासी हालातों के साथ जोड़कर देखें तो ऐसा लगता है मानो दाग देहलवी साहब ने अपनी लेखनी से उन बुजुर्गों की अंदरूनी फितरत ही बताई है जो ना खुद सुकून से जीने के ख्वाहिशमंद हैं और ना दूसरों को चैन से जीने देना चाहते हैं। उनकी नजर में दुनियां की पूरी व्यवस्था के केन्द्र में वे ही हैं और जो वे सोचते हैं सिर्फ वही सही है, बाकी सब गलत। अपनी सोच-समझ से अलग वे ना तो कुछ सुनने-समझने की जहमत उठाना गवारा करते हैं और ना किसी भी सूरत में यह मानने के लिए राजी होते हैं कि उनकी बात नहीं मानने वाला भी सही हो सकता है। मिसाल के तौर पर अन्ना हजारे को ही देखें तो पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों से लेकर दिल्ली नगर निगम का चुनाव परिणाम सामने आने तक उन्होंने अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी को जिस तरह से लगातार अपने सीधे निशाने पर रखा है उससे निश्चित तौर पर खुद को ‘दूसरा गांधी’ बताने के उनके दावे का खोखलापन की जाहिर हुआ है। माना कि अरविंद ने जन-लोकपाल आंदोलन के मंच को राजनीति के लिए अपना आधार बनाने के क्रम में अन्ना की सौ फीसदी सहमति लेना जरूरी नहीं समझा, लेकिन इस तथ्य को भी तो भुलाया नहीं जा सकता है कि जन-लोकपाल आंदोलन के वास्तविक सूत्रधार अरविंद ही थे और उन्होंने ही आंदोलन को प्रभावी बनाने के लिए इसकी मशाल अन्ना के हाथों में सौंपी थी। यानि अन्ना को जिस अरविंद ने अपने आंदोलन के नेतृत्व की बागडोर सौंपी उस पर अगर अन्ना यह इल्जाम लगा रहे हैं कि उन्होंने राजनीतिक लाभ के लिए उनके आंदोलन का मंच ‘हाईजैक’ कर लिया तो इससे अधिक हास्यास्पद बात कोई दूसरी नहीं हो सकती। वास्तव में अन्ना ने तो खुद ही अपने आप को इस्तेमाल करने का मौका अरविंद को उपलब्ध कराया और जब तक अरविंद की राह से वे सहमत रहे तब तक उनका साथ बना रहा लेकिन जब अरविंद ने आंदोलन को सियासत का माध्यम बना लिया तो वे उससे अलग हो गए। यानि अरविंद के फैसले से असहमत होकर जब अन्ना ने उस मंच से खुद को अलग कर लिया तब उन्हें अरविंद के मामलों से कोई मतलब भी नहीं रखना चाहिए था। लेकिन ऐसा ना करके अन्ना ने अरविंद के जले पर नमक छिड़कने का कोई भी मौका आज तक अपने हाथों ने जाने नहीं दिया है। नतीजन अगर केजरीवाल के सबसे करीबी सहयोगी मनीष सिसोदिया का सब्र कथित तौर पर जवाब दे गया और उन्होंने अन्ना को धोखेबाज से लेकर भाजपा का एजेंट तक बतानेवाले ट्वीट को रि-ट्वीट कर दिया तो इसके लिए उन्हें कतई गलत नहीं कहा जा सकता है। हालांकि सियासी नफा-नुकसान को तौलने के बाद मनीष ने अपना एकाउंट हैक कर लिए जाने की दलील देते हुए अन्ना की शान में कतई गुस्ताखी नहीं करने का संकल्प भी दोहराया है लेकिन सच यही है कि जिस तरह से लगातार अन्ना ने केजरीवाल की छवि खराब करने और उन्हें धोखेबाज, लालची व तानाशाह साबित करने का प्रयास जारी रखा है उसके मद्देनजर अगर केजरीवाल का कोई समर्थक अन्ना पर निशाना साधे तो इसकी जिम्मेवारी निश्चित तौर पर अन्ना की ही मानी जाएगी। वास्तव में देखा जाए तो अक्सर समाज में इस बात की बड़ी चर्चा होती है कि बुजुर्गों को वह सम्मान और स्थान नहीं मिल पा रहा है जिसके वह हकदार हैं। हालांकि यह चर्चा कोई नई नहीं है बल्कि पीढ़ियों के बीच मतभेद व टकराव का सिलसिला सनातन काल से बदस्तूर जारी है जिसमें बुजुर्गों को सही और नयी पीढ़ी को गलत ठहराने की परंपरा भी लगातार चलती आ रही है। लेकिन सवाल है कि ऐसे बुजुर्गों को गलत क्यों ना कहा जाए जो नई पीढ़ी की सोच के साथ तालमेल बिठाते हुए उसके अनुरूप ढ़लने की कोशिश करने के बजाय अपनी पुरानी सोच के हिसाब से मौजूदा दौर को हांकने की कोशिशों में जुटे रहते हैं। खुद के हितों को सर्वोपरि मनवाने की जिद छोड़कर अगर अन्ना ने केजरीवाल को कल्पना के अनुरूप उड़ान भरने की छूट देते हुए सफलता का आशिर्वाद दिया होता तो उन्हें दिल्ली सरकार की ओर से निश्चित तौर पर वैसा ही स्थान व सम्मान मिलता जैसा पंडित नेहरू की सरकार ने महात्मा गांधी को दिया था। लेकिन जब केजरीवाल के लिए अन्ना गांधी नहीं बन पाए तो स्वाभाविक तौर पर अन्ना के लिए केजरीवाल भी नेहरू नहीं बन सकते। ऐसा ही मामला लालकृष्ण आडवाणी के साथ भी देखा जा रहा है जो नरेन्द्र मोदी के लिए गांधी नहीं बन पाए नतीजन उनकी हालत भी अन्ना से बेहतर होने की उम्मीद करना व्यर्थ ही है। हालांकि मुलायम सिंह यादव अवश्य अखिलेश यादव के लिए शुरूआती दौर में गांधी बनकर सामने आए लेकिन बाद में उन्होंने भी वही राह पकड़ ली जो अन्ना ने पकड़ी हुई है। नतीजन पुत्र होने के नाते अखिलेश के ना चाहते हुए भी उनकी हालत अन्ना जैसी हो ही गयी है। यानि समग्रता में देखें तो नई पीढ़ी नाहक ही पहले भी बदनाम थी और आज भी है, जबकि अपनी दुर्गति व बेकद्री की पूरी जिम्मेवारी अन्ना सरीखे बुजुर्गों की ही है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’  @ नवकांत ठाकुर #NavkantThakur

सोमवार, 23 जनवरी 2017

‘अब सियासत में राय बुजुर्गों से नहीं ली जाती’

‘अब सियासत में राय बुजुर्गों से नहीं ली जाती’


जवानी के दिनों में मुनव्वर राणा साहब ने भी यही लिखा था कि ‘इश्क में राय बुजुर्गों से नहीं ली जाती, आग बुझते हुए चूल्हों से नहीं ली जाती, इतना मोहताज न कर चश्मे-बसीरत मुझको, रोज इम्दाद चरागों से नहीं ली जाती।’ लिहाजा अगर आज के दौर में बुजुर्गों को हाशिए पर भी जगह मिलनी मुश्किल होती जा रही है तो इसके लिये उबलते जोशो-खूं वाली पीढ़ी को ही तो इकलौता दोषी नहीं ठहराया जा सकता। कहीं ना कहीं गलतियां तो कई मोर्चों पर हुई हैं जिसका परिणाम इस संवेदनहीनता के तौर पर सामने आ रहा है। वर्ना सनातन सत्य की तरह समाज के हर तबके के बुजुर्गों की हालत एक जैसी कतई नहीं होती। लेकिन बुजुर्गों को अगर सबसे अधिक उपेक्षा किसी एक क्षेत्र में झेलनी पड़ रही है तो वह सियासत ही है। सियासत में तो बजुर्गों को इस लायक भी नहीं समझा जाता कि वक्त-बेवक्त उनकी खोज-खबर ले ली जाये। अगर हालचाल जानने की पहल भी की जाती है तो बकायदा मीडिया का काफिला साथ लेकर ताकि यह संदेश दिया जा सके कि बुजुर्गों का कितना ध्यान रखा जा रहा है। यानि खाट पर पड़े अंतिम घड़ियां गिन रहे बुजुर्ग का भी अपनी सियासत चमकाने के लिये तो इस्तेमाल किया जाता है लेकिन उनके चेहरे की चमक बढ़ाने का प्रयास करना किसी को गवारा नहीं होता। और इस मामले में हर सियासी दल का रिकार्ड काफी हद तक एक जैसा ही है। मिसाल के तौर पर जार्ज फर्नांडीज, अटल बिहारी वाजपेयी, जसवंत सिंह, जगन्नाथ मिश्र, वीएस अच्युतानंदन, कैलाश जोशी और प्रियरंजन दासमुंशी सरीखे जिन नेताओं की भारतीय राजनीति में कभी तूती बोलती थी वे आज कहां और किस हाल में हैं इसकी सुध लेना भी गवारा नहीं किया जा रहा है। खैर, ये तो ऐसे नाम हैं जिनके चाहनेवालों को सिर्फ इतने से ही सुकून मिल रहा है कि ये जीवित हैं और इनकी सांसें चल रही हैं। वर्ना अब ये लोग इस स्थिति में बचे ही नहीं हैं कि दोबारा अपने पैरों पर खड़े होकर सत्ता के गलियारों में चहलकदमी भी कर सकें। लेकिन सियासत ने तो उनको भी किनारे लगाने से गुरेज नहीं किया है जो ना सिर्फ स्वस्थ और सक्षम हैं बल्कि आज भी उनकी जुबान से फिसली हुई बातें मीडिया की सुर्खियों में छा जाने की क्षमता रखती है। इनके साथ ऐसा बर्ताव हो रहा है मानो इनका सक्षम होना ही बाकियों के लिये सिरदर्दी हो। तभी तो कभी लालकृष्ण आडवाणी को सार्वजनिक तौर पर अपने दर्द का इजहार करते हुए यह गुहार लगाने के लिये मजबूर होना पड़ता है कि मौजूदा माहौल को बर्दाश्त करने से बेहतर है कि संसद की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया जाये। कभी मुलायम सिंह यादव को भावुक होकर यह अपील करनी पड़ती है कि उनके हाथ से सपा की बागडोर ना छीनी जाये। यहां तक कि उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री रह चुके कद्दावर कांग्रेसी नेता नारायण दत्त तिवारी को अगर उम्र के दसवें दशक में धुर विरोधी भाजपा के करीब जाने के लिये मजबूर होना पड़ रहा है तो निश्चित तौर पर इसके पीछे कहीं ना कहीं उस उपेक्षा का ही दंश है जो उन्हें संगठन के भीतर झेलना पड़ रहा है। हालांकि अपनों से मिला दर्द तो ऐसा ही होता है जिसे चुपचाप सहने के अलावा दूसरा कोई विकल्प ही नहीं होता। तभी तो मार्गदर्शक के नाम पर मूकदर्शक बना दिये गये आडवाणी व डाॅ जोशी सरीखे नेताओं ने अब तक इस बात की भी शिकायत नहीं की है कि ढ़ाई साल पहले गठित किये गये मार्गदर्शक मंडल की आज तक एक भी औपचारिक बैठक क्यों नहीं बुलाई गई है। लेकिन तिवारी सरीखे जुझारू नेता की जिजिविषा को सलाम करना होगा कि आज भी वे अपनी बात जुबानी तौर पर कहने के बजाय ऐसा कुछ करके दिखा देते हैं कि बिना कहे ही उनकी बात से खलबली मच जाती है। तभी तो तिवारी का अमित शाह के निवास पर जाना ही ही इतनी बड़ी खबर बन गया कि उस पर औपचारिक तौर पर अपनी प्रतिक्रिया देने के लिये कांग्रेस के राष्ट्रीय नेतृत्व को भी मजबूर होना पड़ा। लेकिन तिवारी ने अपनी जुबान से फिर भी कुछ नहीं कहा। अलबत्ता उनकी संगठन में हो रही उपेक्षा को बयां किया उनके उस पुत्र ने जिसका भविष्य संवारने के लिये वे शाह के घर की चैखट पर पहुंचे थे। बताया गया कि जो तिवारी किसी समय यूपी व उत्तराखंड की सियासी धुरी हुआ करते थे, उन्हें आज की पीढी के नेता मांगने पर भी मिलने का वक्त देना गवारा नहीं कर रहे हैं। जाहिर है कि ऐसी फजीहत झेलने के बाद अगर तिवारी सरीखे नेता को संगठन का दामन छोड़ने के लिये विवश होना पड़ता है तो यह उनकी या उनके उम्र की तौहीन नहीं है बल्कि यह परिचायक है उस नैतिक स्खलन का जिसका मुजाहिरा इन दिनों हर तरफ खुलेआम किया जा रहा है। लेकिन बुजुर्गों के साथ ऐसा उपेक्षापूर्ण व्यवहार करनेवाले शायद यह भूल रहे हैं कि कल को उन्हें भी इस उम्र में आना है और तब उनके साथ ऐसा व्यवहार होगा तो वे कैसे इसे झेल पाएंगे। लिहाजा बलिया जनपद स्थित छब्बी गांव निवासी ओमप्रकाश यती के लिखे शेर में कुछ हेर-फेर करके आज यह याद रखने की जरूरत है कि ‘ये जंगल कट गये तो किसके साए में गुजर होगी, हमेशा इन बुजुर्गों को अपने साथ रहने दो।’ ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर # Navkant Thakur

बुधवार, 7 अक्टूबर 2015

‘पिता की प्रतिष्ठा में चार चांद लगाने की चुनौती’

नवकांत ठाकुर
पश्चिम चंपारण के रामनगर में जब कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी और लालू यादव के लाडले तेजस्वी यादव ने मंच साझा किया तो एकबारगी बिहार विधानसभा चुनाव की बहुआयामी तस्वीर का वह पहलू नमूंदार हो गया जिसके तहत विरासत की सियासत को आगे ले जाते हुए पिता की प्रतिष्ठा में चार चांद लगाने की चुनौती इन जैसे युवाओं के कांधे पर आ पड़ी है। हालांकि राजनीति में वंशवाद को बढ़ावा देना कितना उचित है या इसे कौन किस हद तक आगे बढ़ा रहा है इस मसले पर ‘हरि अनंत हरि कथा अनंता’ की तर्ज पर जितना कहा या सुना जाये वह कम ही है। लिहाजा फिलहाल इस विषय को छेड़ने से परहेज बरतते हुए तटस्थ भाव से बिना कोई पूर्वाग्रह पाले अगर बिहार की मौजूदा चुनावी तस्वीर का अवलोकन किया जाये तो यह स्पष्ट हो जाता है कि यह चुनाव सिर्फ सत्ता पर अधिपत्य स्थापित करने के लिये नहीं हो रहा है। इसके और भी कई आयाम हैं। कई और भी पहलू हैं। जिसमें एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इस चुनाव के माध्यम से सूबे की सियासत में पीढि़यों का निर्णायक परिवर्तन भी होना है। खास तौर से बिहार की सियासत में अब तक शीर्ष पर काबिज रहे चेहरों ने अपनी राजनीतिक विरासत अपने उत्तराधिकारियों को हस्तांतरित करने के लिये इस चुनाव को चुनने की जो पहल की है उसके नतीजे में इस बार की चुनावी जंग ने बेहद दिलचस्प रूख अख्तियार कर लिया है। सूबे की सत्ता पर तकरीबन डेढ़ दशक तक एकछत्र राज करनेवाले राजद सुप्रीमो लालू यादव से लेकर सूबे के सबसे ताकतवर दलित नेता व लोजपा के मुखिया रामविलास पासवान ही नहीं बल्कि सतह से शिखर का सफर तय करते हुए मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पर अपना कब्जा जमा चुके हम के संस्थापक जीतनराम मांझी ने भी इस बार के चुनाव में ही अपनी सियासी विरासत युवा पीढ़ी के हवाले करने की दिली ख्वाहिश का खुलकर मुजाहिरा करने में कोई संकोच नहीं किया है। इसके अलावा राष्ट्रीय राजनीति में खुद को स्थापित करते हुए परिवार की राजनीतिक विरासत को संभालने की अपनी दक्षता व सक्षमता को प्रमाणित करने लिये राहुल गांधी ने भी कहीं ना कहीं बिहार के मौजूदा चुनाव को ही चुनना बेहतर समझा है। हालांकि हकीकत यही है कि किसी भी चुनाव की तरह इस बार भी तकरीबन सभी राजनीतिक दलों में स्थापित नेताओं के भाई-भतीजों व बाल-बच्चों की बहार छायी हुई है लेकिन गौर से देखा जाये तो इस बार दिलचस्पी का केन्द्र सोनिया, लालू, पासवान व मांझी के बच्चे ही हैं जिनके सामने खुद को साबित व स्थापित करते हुए अपने वंश की विरासत में चार चांद लगाने की चुनौती भी है। इसमें पासवान के सांसद पुत्र चिराग ने लोकसभा चुनाव में ही पिता की छत्रछाया में रहते हुए अपनी पार्टी को सही दिशा देकर खुद को साबित व लोजपा को दोबारा स्थापित करने में कामयाबी हासिल कर ली है। वह चिराग का ही दबाव था जिसे स्वीकार करते हुए पासवान ने अपनी मृतप्राय हो चुकी पार्टी को राजग के साथ जोड़ा और नतीजन मोदी लहर पर सवार होकर सूबे की छह लोकसभा सीटों पर अप्रत्याशित जीत दर्ज कराने में कामयाबी हासिल की। लेकिन वह दौर हवा के रूख को भांपने का था जिसमें चिराग पूरी तरह सफल रहे। लेकिन इस बार चुनौती है आर पार की लड़ाई में सूबे की महज सोलह फीसदी सीटों पर लड़ते हुए सिरमौर बनने की। जाहिर है कि इस चुनौती को सफलतापूर्वक पार करने में अगर चिराग कामयाब हो गये तो ना सिर्फ लोजपा की बागडोर पूरी तरह उनके हाथों में आ जाएगी बल्कि पिता की प्रतिष्ठा में चार चांद लगाते हुए खुद को साबित व स्थापित करने में भी वे निर्णायक सफलता हासिल कर लेंगे। इसी प्रकार राहुल गांधी ने इस बार भी पार्टी के अध्यक्ष पद की जिम्मेवारी उठाने से परहेज बरतते हुए जिस तरह से बिहार के चुनावी रण की कमान अपने हाथों में ली है उससे एक बात तो साफ है कि जब तक अपने दम पर वे कोई बड़ा जमीनी मोर्चा फतह नहीं कर लेते तब तक वे पार्टी को नेतृत्व देने के लिये आगे नहीं आना चाह रहे हैं। ये काफी हद तक ऐसा ही है जैसे लालू ने अपने तेजस्वी को जमीनी मोर्चा फतह करने के लिये अग्रिम मोर्चे पर तैनात कर दिया है। अगर फतह हुई तो ना सिर्फ निर्विरोध तौर पर राजद उन्हें सहर्ष अपना मुखिया स्वीकार कर लेगी बल्कि सूबे में धर्मनिरपेक्ष महागठजोड़ की सरकार बनने की सूरत में उपमुख्यमंत्री पद पर उनकी ताजपोशी भी तय ही है। इसके अलावा लोगों की नजरें मांझी के बेटे संतोष सुमन पर भी टिकी हुई हैं जिन्हें बड़ी खामोशी के साथ इस बार सियासत में आगे बढ़ने का मौका मुहैया कराया गया है। जाहिर तौर पर मांझी ने अपना पूरा जीवन लगाकर अपनी जो राजनीतिक विरासत खड़ी की है उसे उम्र के चैथेपन में वे अपने उत्तराधिकारी के हवाले करना चाह ही रहे हैं। लेकिन मसला है कि पहले उनके बेटे को जनता की स्वीकार्यता मिले और उसी आधार पर पार्टी में उसके कद को विस्तार दिया जाये। यानि समग्रता में देखें तो इस बार दांव पर सिर्फ सूबे की सत्ता ही नहीं है, विरासत की सियासत को संभालने की दक्षता, सक्षमता व स्वीकार्यता साबित करने की चुनौती भी है जिसमें सफलता या असफलता का नतीजा निश्चित तौर पर बेहद दूरगामी व निर्णायक साबित होनेवाला है। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’ 

बुधवार, 22 जुलाई 2015

‘ज्यादा हों जो उम्मीदें तो बच्चे टूट जाते हैं’

‘जरा सी चोट को महसूस करके टूट जाते हैं, सलामत आईने रहते हैं चेहरे टूट जाते हैं, गुजारिश अब बुजुर्गों से यही करना मुनासिब है, ज्यादा हों जो उम्मीदें तो बच्चे टूट जाते हैं।’ कायदे से देखा जाये तो भारतीय प्रशासनिक सेवा में उत्तर प्रदेश संवर्ग में कार्यरत पवन कुमार द्वारा लिखी गयी यह गजल मौजूदा सियासी माहौल के मद्देनजर केन्द्र में सत्तारूढ़ भाजपा के उन शीर्ष बुजुर्ग नेताओं को ही संबोधित दिखाई देती है जो अपनी पूरी उम्र सक्रिय सियासत में गुजार देने के बाद अब चैथेपन की अवस्था में भी ना तो सत्ता का मोह त्याग पा रहे हैं और ना ही नयी पीढ़ी को अपने मनमुताबिक काम करने की स्वतंत्रता देना गवारा कर रहे हैं। हालांकि बुजुर्गों से अपेक्षा यही रहती है कि वे अपनी विरासत के उत्तराधिकारियों पर ना सिर्फ अपने अनुभवों की बौछार करें बल्कि जीवन पथ पर बच्चों का भरपूर उत्साहवर्धन भी करें ताकि वह पूरे उत्साह के साथ अपनी ऊर्जा, दक्षता व कार्यकुशलता का भरपूर इस्तेमाल करते हुए परिवार व खानदान का नाम रौशन कर सके। लेकिन आम तौर पर सियासत में यही देखा जाता है कि कोई भी बुजुर्ग तब तक नयी पीढ़ी को पूरी तरह अपनी विरासत सौंपना गवारा नहीं करता है जब तक या तो वह पूरी तरह अक्षम नहीं हो जाता या फिर उसका जनाजा नहीं उठ जाता। ऐसे में अगर नयी पीढ़ी आगे बढ़कर नेतृत्व की बागडोर अपने हाथों में लेने व बुजुर्गों को किनारे लगाने की पहल ना करे तो और क्या करे? हालांकि यह और बात है कि जिन बुजुर्गों को किनारे लगाया जाता है वे अक्सर इस बदलाव को हजम नहीं कर पाते हैं और नतीजे में आगे आ रही नयी पीढ़ी के खिलाफ अनर्गल विषवमन करना शुरू कर देते हैं। बेशक यह उनके आंतरिक आक्रोश की अभिव्यक्ति ही होती है जिसका नयी पीढ़ी की दक्षता, क्षमता व कार्यकुशलता से कोई लेना देना नहीं होता लेकिन उनकी इन हरकतों के कारण ना सिर्फ विरोधियों को बैठे-बिठाये आलोचना व निन्दा करने का भरपूर मसाला मिल जाता है बल्कि नेतृत्व की बागडोर संभालनेवाली युवा पीढ़ी के भी उत्साह, आत्मविश्वास व आत्मसम्मान को गहरा धक्का लगता है। वैसे भी सामाजिक तौर पर बुजुर्गों का दोष देखने की परंपरा तो हमारे देश में कभी रही ही नहीं है। वे भले जैसा भी बर्ताव करें लेकिन युवाओं से यही अपेक्षा की जाती है वह उनको तहेदिल से आदरणीय, पूजनीय व अनुकरणीय ही माने। लेकिन सवाल है कि जब पूरा सम्मान व समुचित स्थान देने के के बाद भी बुजुर्गों की ओर से युवाओं की राहों में कांटे ही बिछाये जायें, उसे बेवजह जलील ही किया जाये, सार्वजनिक तौर पर उसको आलोचना ही झेलनी पड़े तो आखिर वह करे भी तो क्या करे? जदयू ने जब अपने वरिष्ठ नेता जार्ज फर्नांडीज को लोकसभा की राजनीति छोड़कर राज्यसभा में मार्गदर्शक की भूमिका निभाने के लिये सहमत करना चाहा तो वे हत्थे से उखड़ गये। पार्टी से बगावत करके स्वतंत्र उम्मीदवार के तौर पर मुजप्फरपुर से चुनाव लड़ने चले गये। बाद में चुनावी हार भी हुई और जदयू में दुबारा समुचित स्थान भी नहीं मिल सका। इसी प्रकार भाजपा में भी वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में हुई करारी हार के बाद आरएसएस की पहलकदमी पर आमसहमति से यह तय हुआ कि 75 वर्ष की उम्र पार कर चुके बुजुर्गों को ना तो कोई पद दिया जाएगा और ना ही सक्रिय राजनीति में उन्हें हिस्सेदारी दी जाएगी। इसी फैसले के तहत लालकृष्ण आडवाणी, डाॅ मुरली मनोहर जोशी, वीके मल्होत्रा, यशवंत सिन्हा, कैलाश जोशी व जसवंत सिंह से लेकर शांता कुमार सरीखे दर्जनों शीर्ष वरिष्ठ नेताओं को सम्मान सहित सक्रिय राजनीति से अलग करने की प्रक्रिया आरंभ हुई। लेकिन इन बुजुर्गों ने अभी तक अपनी मौजूदा वरिष्ठता को स्वीकार करते हुए संगठन के लिये शुभचिंतक व मार्गदर्शक की भूमिका को सहर्ष स्वीकार करना गवारा नहीं किया है। इसे उनके दिल की भड़ास कहें, उनका राजनीतिक प्रपंच कहें या उनके अंदरूनी आक्रोश की अभिव्यक्ति। अक्सर वे संगठन व सरकार के शीर्ष संचालकों की सिरदर्दी में इजाफा करते ही दिखाई पड़ रहे हैं। कभी आडवाणी सार्वजनिक तौर पर पार्टी के मौजूदा निजाम को तानाशाही सोचवाला करार देते हुए देश में दुबारा आपातकाल लागू होने की संभावना पर बल देते दिखाई पड़ते हैं तो कभी केन्द्र सरकार के कामकाज पर प्रत्यक्ष व परोक्ष तौर पर डाॅ जोशी की उंगली उठ जाती है। कभी यशवंत सिन्हा ऐसा बयान दे देते हैं जिसके कारण पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को फजीहत झेलनी पड़ती है तो कभी शांता कुमार का लेटर बम फूट पड़ता है। वाकई अगर इन बुजुर्गों को ऐसा लगता है कि उनके द्वारा स्थापित व पालित-पोषित संगठन को नया नेतृत्ववर्ग किसी गलत दिशा में ले जा रहा है तो उन्हें पूरा हक है कि वे पार्टी के किसी भी नेता को अपने पास बुलाकर एकांत में उसे उचित सलाह व मार्गदर्शन दें। लेकिन सार्वजनिक तौर पर बयानबाजी करने व संगठन व सरकार की किरकिरी कराने के प्रयासों को बुजुर्गों की इमानदार सोच, भलमनसाहत व उदार विचारों की अभिव्यक्ति का नाम कैसे दिया जा सकता है। खैर, मान्यता तो यही है कि बुजुर्गों की गालियों से भी युवाओं के आयु, विद्या, यश व बल में वृद्धि ही होती है लेकिन विचारणीय तथ्य यह है कि सफल, सक्षम व समर्थ उत्तराधिकारियों को बेवजह नाराज करके उनसे अपना हित पूरा कराने का कोई प्रयास कैसे सफल हो सकता है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’