‘अब सियासत में राय बुजुर्गों से नहीं ली जाती’
जवानी के दिनों में मुनव्वर राणा साहब ने भी यही लिखा था कि ‘इश्क में राय बुजुर्गों से नहीं ली जाती, आग बुझते हुए चूल्हों से नहीं ली जाती, इतना मोहताज न कर चश्मे-बसीरत मुझको, रोज इम्दाद चरागों से नहीं ली जाती।’ लिहाजा अगर आज के दौर में बुजुर्गों को हाशिए पर भी जगह मिलनी मुश्किल होती जा रही है तो इसके लिये उबलते जोशो-खूं वाली पीढ़ी को ही तो इकलौता दोषी नहीं ठहराया जा सकता। कहीं ना कहीं गलतियां तो कई मोर्चों पर हुई हैं जिसका परिणाम इस संवेदनहीनता के तौर पर सामने आ रहा है। वर्ना सनातन सत्य की तरह समाज के हर तबके के बुजुर्गों की हालत एक जैसी कतई नहीं होती। लेकिन बुजुर्गों को अगर सबसे अधिक उपेक्षा किसी एक क्षेत्र में झेलनी पड़ रही है तो वह सियासत ही है। सियासत में तो बजुर्गों को इस लायक भी नहीं समझा जाता कि वक्त-बेवक्त उनकी खोज-खबर ले ली जाये। अगर हालचाल जानने की पहल भी की जाती है तो बकायदा मीडिया का काफिला साथ लेकर ताकि यह संदेश दिया जा सके कि बुजुर्गों का कितना ध्यान रखा जा रहा है। यानि खाट पर पड़े अंतिम घड़ियां गिन रहे बुजुर्ग का भी अपनी सियासत चमकाने के लिये तो इस्तेमाल किया जाता है लेकिन उनके चेहरे की चमक बढ़ाने का प्रयास करना किसी को गवारा नहीं होता। और इस मामले में हर सियासी दल का रिकार्ड काफी हद तक एक जैसा ही है। मिसाल के तौर पर जार्ज फर्नांडीज, अटल बिहारी वाजपेयी, जसवंत सिंह, जगन्नाथ मिश्र, वीएस अच्युतानंदन, कैलाश जोशी और प्रियरंजन दासमुंशी सरीखे जिन नेताओं की भारतीय राजनीति में कभी तूती बोलती थी वे आज कहां और किस हाल में हैं इसकी सुध लेना भी गवारा नहीं किया जा रहा है। खैर, ये तो ऐसे नाम हैं जिनके चाहनेवालों को सिर्फ इतने से ही सुकून मिल रहा है कि ये जीवित हैं और इनकी सांसें चल रही हैं। वर्ना अब ये लोग इस स्थिति में बचे ही नहीं हैं कि दोबारा अपने पैरों पर खड़े होकर सत्ता के गलियारों में चहलकदमी भी कर सकें। लेकिन सियासत ने तो उनको भी किनारे लगाने से गुरेज नहीं किया है जो ना सिर्फ स्वस्थ और सक्षम हैं बल्कि आज भी उनकी जुबान से फिसली हुई बातें मीडिया की सुर्खियों में छा जाने की क्षमता रखती है। इनके साथ ऐसा बर्ताव हो रहा है मानो इनका सक्षम होना ही बाकियों के लिये सिरदर्दी हो। तभी तो कभी लालकृष्ण आडवाणी को सार्वजनिक तौर पर अपने दर्द का इजहार करते हुए यह गुहार लगाने के लिये मजबूर होना पड़ता है कि मौजूदा माहौल को बर्दाश्त करने से बेहतर है कि संसद की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया जाये। कभी मुलायम सिंह यादव को भावुक होकर यह अपील करनी पड़ती है कि उनके हाथ से सपा की बागडोर ना छीनी जाये। यहां तक कि उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री रह चुके कद्दावर कांग्रेसी नेता नारायण दत्त तिवारी को अगर उम्र के दसवें दशक में धुर विरोधी भाजपा के करीब जाने के लिये मजबूर होना पड़ रहा है तो निश्चित तौर पर इसके पीछे कहीं ना कहीं उस उपेक्षा का ही दंश है जो उन्हें संगठन के भीतर झेलना पड़ रहा है। हालांकि अपनों से मिला दर्द तो ऐसा ही होता है जिसे चुपचाप सहने के अलावा दूसरा कोई विकल्प ही नहीं होता। तभी तो मार्गदर्शक के नाम पर मूकदर्शक बना दिये गये आडवाणी व डाॅ जोशी सरीखे नेताओं ने अब तक इस बात की भी शिकायत नहीं की है कि ढ़ाई साल पहले गठित किये गये मार्गदर्शक मंडल की आज तक एक भी औपचारिक बैठक क्यों नहीं बुलाई गई है। लेकिन तिवारी सरीखे जुझारू नेता की जिजिविषा को सलाम करना होगा कि आज भी वे अपनी बात जुबानी तौर पर कहने के बजाय ऐसा कुछ करके दिखा देते हैं कि बिना कहे ही उनकी बात से खलबली मच जाती है। तभी तो तिवारी का अमित शाह के निवास पर जाना ही ही इतनी बड़ी खबर बन गया कि उस पर औपचारिक तौर पर अपनी प्रतिक्रिया देने के लिये कांग्रेस के राष्ट्रीय नेतृत्व को भी मजबूर होना पड़ा। लेकिन तिवारी ने अपनी जुबान से फिर भी कुछ नहीं कहा। अलबत्ता उनकी संगठन में हो रही उपेक्षा को बयां किया उनके उस पुत्र ने जिसका भविष्य संवारने के लिये वे शाह के घर की चैखट पर पहुंचे थे। बताया गया कि जो तिवारी किसी समय यूपी व उत्तराखंड की सियासी धुरी हुआ करते थे, उन्हें आज की पीढी के नेता मांगने पर भी मिलने का वक्त देना गवारा नहीं कर रहे हैं। जाहिर है कि ऐसी फजीहत झेलने के बाद अगर तिवारी सरीखे नेता को संगठन का दामन छोड़ने के लिये विवश होना पड़ता है तो यह उनकी या उनके उम्र की तौहीन नहीं है बल्कि यह परिचायक है उस नैतिक स्खलन का जिसका मुजाहिरा इन दिनों हर तरफ खुलेआम किया जा रहा है। लेकिन बुजुर्गों के साथ ऐसा उपेक्षापूर्ण व्यवहार करनेवाले शायद यह भूल रहे हैं कि कल को उन्हें भी इस उम्र में आना है और तब उनके साथ ऐसा व्यवहार होगा तो वे कैसे इसे झेल पाएंगे। लिहाजा बलिया जनपद स्थित छब्बी गांव निवासी ओमप्रकाश यती के लिखे शेर में कुछ हेर-फेर करके आज यह याद रखने की जरूरत है कि ‘ये जंगल कट गये तो किसके साए में गुजर होगी, हमेशा इन बुजुर्गों को अपने साथ रहने दो।’ ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर # Navkant Thakur
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