बुधवार, 11 जनवरी 2017

कोई यूं बेवफा नहीं होता....

‘कुछ तो मजबूरियां होंगी मेरे सरकार की’

‘कुछ मिट्टी की और कुछ कुम्हार की, कुछ तो मजबूरियां होंगी मेरे सरकार की।’ वाकई, ‘कुछ तो मजबूरियां रही होंगी, कोई यूं बेवफा नहीं होता।’ बेवफाई भी ऐसी अव्वल दर्जे की कि जिस बीज को खुद ही बोया, उगाया, सींचा और मौसम की मार व दुश्मनों के वार बचाते हुए फर्श से उठाकर अर्श की बुलंदी पर ला खड़ा किया, उसका ही समूल नाश करने पर आमादा हो जाया जाये। कायदे से तो उस पेड़ की घनी छांव में अपने बुढ़ापे की अंतिम घड़ियां शांति व सुकून के साथ गुजारने की इच्छा होनी चाहिये थी और कहां बूढ़ापे की थकी-मांदी हड्डियां लहराते हुए कुल्हाड़ी हाथ में लेकर हरे-भरे फलदार पेड़ को जमींदोज करने की कोशिशें की जा रही हैं। यह भी नहीं सोचा जा रहा कि अगर यह पेड़ नष्ट हो गया तो अंतिम वक्त में किसका सहारा बचेगा। हालांकि जिन लोगों को ना तो किसान के हितों की कोई परवाह है और ना ही पेड़ की बुलंदी से कोई फायदा मिलने की उम्मीद है, वे तो चाहेंगे ही कि किसान को समझा-बुझाकर उसके ही हाथों उसका पेड़ कटवा दिया जाये, ताकि कुछ नहीं तो लकड़ी का तमगा ही हासिल हो। लेकिन पता नहीं किसान की अक्ल पर कैसा पत्थर पड़ गया है कि जिस पेड़ को मौजूदा बुलंदी देने में उसने अपनी पूरी उम्र खपा दी, अब उसे ही जड़ से उखाड़ने की हर मुमकिन कोशिशों में जुटा दिख रहा है। निश्चित तौर पर ऐसा कदम उठानेवाला किसान या तो अपने भले-बुरे की चिंता छोड़कर सिर्फ वर्तमान की समस्या सुलझा लेना चाहता है या फिर वह चाहकर भी अपने मन की बात पर अमल नहीं कर पा रहा है। अपने महाजन की मनमानी बर्दाश्त, स्वीकार व अंगीकार करना उसकी मजबूरी बन चुकी है। उनकी बतायी राह पर चलने के अलावा उसके पास दूसरा विकल्प ही नहीं है। वर्ना वह ऐसा हर्गिज नहीं कहता कि पेड़ से उसे कोई परेशानी नहीं है बल्कि पेड़ से लिपटी हुई उस बेल ने उसे दुखी किया हुआ है जिससे खुद को अलग करने के लिये पेड़ कतई तैयार नहीं है। दूसरी ओर पेड़ भी यह बताने से नहीं हिचक रहा है कि उसका पालक-संरक्षक इन दिनों बड़ी साजिश का शिकार हो गया है और उसका महाजन उससे ऐसे काम करवाना चाहता है जिसका नुकसान पेड़ और किसान दोनों को उठाना पड़ेगा। इसी वजह से पेड़ ने भी अपने सुरक्षा कवच को मजबूती से कस लिया है ताकि किसान के कांधे पर रखे महाजन की कुल्हाड़ी से अपनी हिफाजत कर सके। आलम यह है कि किसान और पेड़ भले ही आमने-सामने दिख रहे हों लेकिन इनके बीच इस लड़ाई की कोई बड़ी वजह दिखाई नहीं पड़ रही है। वैसे भी किसान ने पूरी जिन्दगी जिस पेड़ को सींच-पाल कर बड़ा किया वह अब अपने दम पर किसान को बुढ़ापे में शांति-सुकून की छांव ही नहीं बल्कि अपने द्वारा उपार्जित मीठा फल भी ताउम्र खिलाने में कतई कोताही नहीं बरत सकता है। तुलनात्मक तौर पर भी देखा जाये तो इस किसान के मुकाबले काफी अधिक संसाधन संपन्न व सिंचित-उपजाऊ जमीन के मालिकों का बोया बीज ऐसा बिगड़ा कि वह ना तो छांव दे पाने के काबिल बन सका और ना ही फल दे पाने के। ऐसे में ऊसर-बंजर जमीन पर सीमित संसाधनों के बूते पर बोया गया बीज अगर व्यापक छायादार और फलदार हो गया है तो किसान के लिये यह भी कम बड़े गर्व की बात नहीं है। इसके बावजूद किसान है कि महाजन के चंगुल में फंसकर पेड़ को ही काटने पर आमादा है। दूसरी तरफ पेड़ भी उस बेल का मोह छोड़ने के लिये तैयार नहीं है जो उससे लिपटकर अपना अस्तित्व कायम रखते हुए उसे यह भरोसा दिलाने की हर-मुमकिन कोशिशों में है कि अगर कटने की नौबत आयी तो पहला वार उस पर होगा उसके बाद ही कुल्हाड़ी की धार पेड़ को छू पाएगी। यानि इतना तो स्पष्ट है कि किसान संचालित हो रहा है महाजन से और पेड़ को उम्मीदें हैं खुद से लिपटी बेल से। ऐसे में सवाल है कि आखिर किसान की ऐसी कौन सी मजबूरी है कि वह सब-कुछ जानते व समझते हुए भी महाजन से अपना पीछा नहीं छुड़ा पा रहा है। अगर समस्या सिर्फ बेल से होती और महाजन की इसमें कोई भूमिका नहीं होती तो पेड़ ने किसान के एक इशारे पर ही उस बेल से खुद को अलग कर लिया होता जिसे पेड़ और किसान के आपसी रिश्ते में बाधक बताने की कोशिश हो रही है। लेकिन पेड़ को लग रहा है कि बेल का तो बहाना है, वास्तव में वह ही महाजन का निशाना है। ऐसे में वह क्यों उस बेल को खुद से अलग करे जो कुल्हाड़ी का पहला वार खुद पर झेलने के लिये पहले से ही तैयार है। यानि पेड़ की नजर से देखें तो उसकी जान का ग्राहक किसान नहीं है, बल्कि उसके महाजन हैं। जबकि किसान का नजरिया पेड़ से लिपटी बेल के प्रति पूर्वाग्रह से ग्रस्त दिख रहा है। लिहाजा बेहतर यही होगा कि पेड़ व किसान एक हो जाएं और पेड़ खुद को बेल से व किसान खुद को अपने महाजन से अलग कर ले। साहिर लुधियानवी ने कहा भी है कि ‘तार्रूफ रोग हो जाये तो उसको भूलना बेहतर, ताल्लुक बोझ बन जाये तो उसको तोड़ना अच्छा, वो अफसाना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन, उसे एक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा।’ ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर # Navkant Thakur

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