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शुक्रवार, 10 अगस्त 2018

‘गुंथे फूल सबके मन भाए, बिखरे हुए करें हाय-हाय’

अनेकता में एकता की जो अवधारणा है उसमें विवधता के बावजूद खूबसूरती में तभी इजाफा होता है जब एकता के धागे में तमाम तरह के फूल परस्पर मजबूती से गुंथे-जुड़े हों। वर्ना बिखरे हुए फूलों की पंखुड़ियां तो न्यौछावर करने के काम ही आती हैं। हालांकि माला बनने के क्रम में भी फूलों की स्वतंत्र सत्ता बरकरार ही रहती है लेकिन अलग-अलग रंग, रूप व गंध का होने के बावजूद जिन फूलों ने सहमति व विश्वास के धागे में बंधना स्वीकार कर लिया हो उनकी ही माला के तौर पर पूछ होती है। राजनीतिक व सामाजिक स्तर पर भी तमाम जातियों व उपजातियों में बंटे होने के बावजूद जिन वर्गों ने परस्पर एकता की डोर को जितनी मजबूती से थामना स्वीकार किया उनकी उतनी ही अधिक कद्र होती है। लेकिन जो आत्ममुग्धता के दायरे से निकल कर दूसरे को अपनाने और किसी अन्य के साथ जुड़ने के लिये आगे नहीं आते उन्हें कोई नहीं पूछता। वे हाशिये पर रहते हुए दूसरों की खुशी व तरक्की को देखकर आहें ही भरते रह जाते हैं। ऐसा ही हो रहा है इन दिनों उन अगड़ी जातियों के साथ जो इस सप्ताह संसद में ओबीसी और अनुसूचित जातियों व जनजातियों के कल्याण के लिये बनाए गए कानूनों को देख कर जल-भुन व कुढ़ रहे हैं। हालांकि सोशल मीडिया पर जलन के धुएं का फैलाव देख कर व विवशता भरी गुहार सुनकर एकबारगी किसी का भी दिल पसीज सकता है। लेकिन व्यावहारिक तौर पर देखा जाये तो अपनी इस दशा व मौजूदा हालातों के लिये ये किसी और को कतई जिम्मेवार नहीं ठहरा सकते। आज अगर पिछड़ों और दलितों के हितों की रक्षा के लिये तमाम राजनीतिक दल एक साथ आगे आए हैं और हर कोई इन्हें लुभाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा है तो इसकी कई वजहों में से एक बड़ा कारण इनकी वह एकता है जो सभी राजनीतिक दलों को ललचाता भी है और डराता भी है। बेशक दलित, आदिवासी और पिछड़े ही नहीं बल्कि मुसलमान भी अंदरूनी तौर पर तमाम उपजातियों व फिरकों में बंटे हुए हों लेकिन बात जब जाति के स्वाभिमान की आती है तो ये सभी एकजुट हो जाते हैं। ऐसी एकजुटता अगड़ों यानि कथित सवर्णों में कहीं नहीं दिखती। आदिवासी समाज जब सड़क पर उतरता है तब वह संथाल, गोंड, मुंडा, माहली, बोडो, मीणा, खासी, सहरिया, गरासिया, उरांव, बिरहोर या मावची वगैरह के रूप में अलग-पृथक नहीं दिखता बल्कि समग्रता में आदिवासी शक्ति दिखाई पड़ती है। इसी प्रकार विभिन्न अनुसूचित जातियों के बीच आपस में सामाजिक स्तर पर तमाम दूरियों के बावजूद हक व अधिकारों पर अतिक्रमण की नौबत आने पर 16.6 फीसदी दलित आबादी एकजुट नजर आती है। लेकिन अगड़ों की बात करें तो इनके बीच शायद ही कभी ऐसी एकजुटता दिखती हो। सभी अगड़ी जातियों के एकजुट होने की बात तो बहुत दूर की है अलबत्ता ये आपस में भी एक-दूसरे के साथ मिल जुलकर आगे आने के लिये सहमत नहीं होते। खुद को अगड़ों का अगुवा कहनेवाले ब्राह्मणों की ही बात करें तो इनमें कोई गौड़ है तो कोई द्रविड़। गौड़ में भी कान्यकुब्ज, शाकलद्वीपीय, मैथिल, सरयूपाणी, सारस्वत, चितपावन, झिझौतिया, गालव, अनाविल व महियाल सरीखे दर्जनों प्रकार के ब्राह्मण हैं। इतना ही नहीं बल्कि आगे इनमें भी कई भेद, विभेद, मतभेद और विच्छेद हैं। मैथिल ब्राह्मण की बात करें तो इनमें कोई श्रोत्रिय है तो कोई भलमानुस, कोई जयवार तो कोई करमहे, सुगरगणे वगैरह। अंतिम संस्कार करानेवाले महाब्राह्मण वैसे ही समाज से अलग-विलग रहते हैं। लेकिन बाकियों में भी कोई किसी को अपने बराबर का नहीं मानता। सब एक-दूसरे से ऊपर ही हैं और बेहतर में भी बेहतरीन हैं। आत्ममुग्धता की यही स्थिति राजपूतों की भी है और कायस्थों व भूमिहारों में भी। नतीजन कुल 23.4 फीसदी आबादी के बावजूद आरक्षण के लाभ से अलग-थलग पड़ी अगड़ी जातियों के हितों की रक्षा की बात कहीं नहीं सुनी जाती। नतीजन इस वर्ग के बीच असंतोष, तकलीफ और काफी हद तक जलन व आक्रोश का भाव पैदा होना स्वाभाविक ही है। फिलहाल इनके दुख की वजह है कि संसद से ओबीसी और एससी-एसटी को तो अधिकतम सम्मान और अधिकार मिल रहा है, लेकिन इन्हें कोई टके का भाव भी नहीं दे रहा। ना सत्ता पक्ष और ना ही विपक्ष। ओबीसी आयोग बनाने के लिए भी संसद में आम सहमति बन जाती है और एससी-एसटी उत्पीड़न निरोधक कानून को कठोर करने के मामले में भी संसद में सर्वसम्मति का माहौल बन जाता है। लेकिन अगड़ों के लिये अलग से कुछ करना किसी को जरूरी महसूस नहीं होता। ऐसे में सवाल है कि आखिर अगड़ों को ऐसी नौबत क्यों झेलनी पड़ रही है? हालांकि कहने को कोई कुछ भी कहे लेकिन सच यही है कि इस नौबत की जड़ें अतीत में उतनी गहराई तक नहीं धंसी हैं जितनी वर्तमान के साथ जुड़ी हुई हैं। जिन परिस्थितियों के कारण दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों के हितों की रक्षा के लिये विशेष संवैधानिक व्यवस्था की गई थी वे व्यावहारिक स्तर पर भले ही कुछ हद तक बदली हों लेकिन सैद्धांतिक, वैचारिक, मानसिक व सामाजिक स्तर पर यथावत बरकरार हैं। लिहाजा जब तक अगड़ों में श्रेष्ठता व विशिष्ठता का अहंकार, आपसी भेद-विभेद व मतभेद और बाकियों के प्रति दुर्भावना का भाव बरकरार रहेगा तब तक इनके लिये हाशिये से ऊपर उठना और सियासी स्तर पर कद्र व विशेष पूछ हासिल कर पाना नामुमकिन की हद तक मुश्किल ही बना रहेगा। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’ @नवकांत ठाकुर

सोमवार, 23 जुलाई 2018

‘नुक्स है कुछ मेरे बयान में क्या...???’




अमरोहा में जन्मे उर्दू के महान शायर जाॅन एलिया भले ही हिन्दुस्तान के बंटवारे के बाद पाकिस्तान में रह-बस गए लेकिन उनकी कलम से एक ऐसी गजल निकली जो पूरी तरह कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के दिल की आवाज बनने के काबिल है। जाॅन लिखते हैं कि- ‘‘उम्र गुजरेगी इम्तहान में क्या? अब भी हूं मै तेरी अमान में क्या? मेरी हर बात बेअसर ही रही, नुक्स है कुछ मेरे बयान में क्या? मुझको तो कोई टोकता भी नहीं, यही होता है खानदान मे क्या? बोलते क्यो नहीं मेरे अपने, आबले पड़ गये जबान में क्या?’’ राहुल वाकई बीते लंबे समय से इसी मसले से जूझ रहे हैं। वर्ना ऐसा कैसे हो सकता कि कोई जान-बूझकर ऐसी बातें और हरकतें करे जिससे उसकी किरकिरी हो, फजीहत हो। लिहाजा लग यही रहा है कि अव्वल तो राहुल को यह पता नहीं चल रहा कि उनसे क्या गलती हो रही है और दूसरे जिन लोगों पर फीडबैक पहुंचाने और सही सलाह देने की जिम्मेवारी है वे अपने कर्तव्य को इमानदारी से अंजाम नहीं दे रहे हैं। नतीजन उनकी जायज व वाजिब बातें भी उनकी हरकतों व गलतियों के बोझ तले दम तोड़ रही हैं। ऐसी ही तस्वीर दिखी लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान भी। यूं तो राहुल ने कितना सच बोला और किस हद तक झूठ का सहारा लिया इस पर अलग से बहस हो सकती है। लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती कि उनका भाषण काफी नपा-तुला, ओजस्वी, आक्रामक और धारदार था। अपने संबोधन को भावनात्मक रूप देते हुए युवाओं, महिलाओं, दलितों व अल्पसंख्यकों को संदेश देने में भी वे सफल रहे। मोदी सरकार की रीति-नीति पर प्रहार करते हुए यह साबित करने की कोशिश भी कामयाब रही कि किस तरह सरकार चुनिंदा उद्योगपतियों को भरपूर लाभ पहुंचाने के लिये आम लोगों की जेब से पैसा निचोड़ रही है। यानि कुल मिलाकर उनका भाषण ठीक वैसा ही था जिसकी मुख्य विपक्षी दल के शीर्ष नेता से अपेक्षा रहती है। लेकिन पूरा गुड़ गोबर हो गया उनकी हरकतों से। उन्होंने कुछ ऐसी हरकतें कर दीं जिसे कतई मर्यादित, संसदीय, अपेक्षित या अनुकरणीय नहीं कह सकते। तभी उनका भाषण हाशिये पर रह गया और हरकतों के कारण उनकी जमकर आलोचना हो रही है। पहली गलती यह हुई कि जब उन्होंने राफेल विमान सौदे को लेकर रक्षामंत्री निर्मला सीतारमण पर गलतबयानी का आरोप लगाया तब अपनी सफाई देने के लिये तुरंत निर्मला खड़ी हुईं लेकिन राहुल ने उन्हें बोलने का मौका ना देते हुए अपना भाषण लगातार जारी रखा। जबकि परंपरा है कि अगर संसद में कोई मंत्री कुछ कहने के लिये खड़ा होता है तो उस समय बोल रहा सदस्य तत्काल चुप होकर बैठ जाता है। लेकिन राहुल ने ऐसा नहीं किया। हालांकि इसके लिये लोकसभा अध्यक्षा ने राहुल को सभ्य भाषा में मर्यादा और परंपरा की याद भी दिलाई लेकिन राहुल की कानों पर जूं तक नहीं रेंगी। इसके बाद दूसरी गलती उन्होंने अकाली दल की सांसद व केन्द्रीय मंत्री हरसिमरत कौर बादल के बारे यह कहके कर दी कि भाषण में व्यवधान के दौरान जब सदन की कार्रवाई कुछ मिनटों के लिये स्थगित हुई तब वे उनकी ओर मुस्कुराते हुए देख रही थीं। जाहिर है कि किसी महिला के लिये ऐसी बात कहना हर लिहाज से बेहद गलत व अमर्यादित आचरण ही कहा जाएगा। तभी बिफरते हुए हरसिमरत ने उनसे पूछ लिया कि आज वे कौन सा नशा करके आए हैं? इसके बाद सबसे बड़ी गलती राहुल ने प्रधानमंत्री मोदी के गले लगने के बहाने उनके गले पड़कर की। गले लगना तो तब कहेंगे जब दो लोग एक साथ गले मिलने के लिये अपनी बांहें फैलाएं। लेकिन जब किसी बैठे हुए आदमी के पास जाकर कोई अचानक उसके गले में बांहों का फंदा डालकर उससे चिपट जाए तो इसे गले पड़ना कहा जाएगा। वैसे भी संसद के भीतर इस तरह के आचरण को कतई सामान्य, शिष्ट या संसदीय नहीं माना जा सकता। तभी इसके लिये लोकसभा अध्यक्षा की ओर कड़ी बात भी कही गई और हरसिमरत को भी यह कहने का मौका मिल गया कि यह मुन्नाभाई का मंच नहीं है जहां पप्पी-झप्पी डाली जाए। राहुल की इस हरकत को राजनाथ सिंह ने भी चिपको आंदोलन का नाम देकर चुटकी लेने में कसर नहीं छोड़ी। लेकिन सबसे आखिर में राहुल ने बेहद ही बचकाने तरीके से आंख मारकर यह जताने की जो कोशिश की कि मानो ऐसी हरकतें करके उन्होंने कोई बड़ा मैदान मार लिया हो वह सबसे अफसोसनाक था। इसका सीधा सा मतलब है कि उन्हें अपनी हरकतों का कोई अफसोस नहीं है और वे कतई यह नहीं मान सकते हैं कि उनसे कोई गलती हुई है। हालांकि लोकसभा अध्यक्षा ने बाद में राहुल को अपने बेटे जैसा बताते हुए उनकी गलतियों को बचपना समझ कर अनदेखा करने की पहल अवश्य की लेकिन यह बचपना था, मासूमियत थी, सरासर बदमाशी या आत्ममुग्धता की निशानी? आत्ममुग्धता इसलिये क्योंकि तमाम गलतियों के बाद राहुल की जुबान से साॅरी का एक छोटा सा औपचारिक अल्फाज भी नहीं निकला। बल्कि वे अपनी हरकतों पर अभीभूत होकर अपने पक्ष के सांसदों की ओर देखकर आंख मारते नजर आए। इस पूरे प्रकरण से हुआ यह है कि विरोधियों द्वारा उनकी पप्पू की जो छवि बनायी जाती रही है उसे इन्होंने खुद ही पूरी मजबूती से स्वीकार व अंगीकार कर लिया है जिसके लिये सिर्फ अफसोस ही जताया जा सकता है। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर #Navkant_Thakur

मंगलवार, 16 अगस्त 2016

जहां सुमति तहां संपति नाना....

जहां सुमति तहां संपति नाना....


गोस्वामी तुलसीदासजी ने रामचरितमानस में लिखा है कि ‘सुमति कुमति सबके उर रहहीं, नाथ पुरान निगम अस कहहीं, जहां सुमति तहां संपति नाना, जहां कुमति तहां विपति निदाना।’ वाकई सुमति और कुमति तो एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। लेकिन अगर कुमति हावी हो जाये तो बनता हुआ काम भी बिगड़ जाता है जबकि सुमति के सहारे बिगड़े हुए काम को भी आसानी से सफल किया जा सकता है। तभी तो जब तक देशहित पर दलगत राजनीति हावी रही तब तक संसद से लेकर सड़क तक बवाल कटता रहा। लेकिन सुमति का साम्राज्य स्थापित होते ही गाड़ी पटरी पर लौट आई। भारतीय संसद ने सर्वसम्मति से निर्विरोध फैसले लेने की ऐसी ताकत का मुजाहिरा किया कि समूचा विश्व चमत्कृत हो उठा। अमेरिका सरीखे विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र को भी औपचारिक तौर पर इसकी सराहना करनी पड़ी। हालांकि अमेरिका ने तो सिर्फ जीएसटी के सर्वसम्मति से पारित होने पर ही भारत की सराहना की है जबकि हकीकत तो यह है कि इस मानसून सत्र में भारतीय संसद ने उन तमाम मसलों पर एकमतता व सर्वसम्मति का मुजाहिरा किया है जिसके बारे में माना जा रहा था कि जब भी ये मसले सदन में उठेंगे तो सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच भारी तकरार व टकराव का माहौल दिखेगा। लेकिन देश के तमाम राजनीतिक दलों ने एक बार फिर दुनियां को यह बता दिया है कि मिल बैठकर, एक दूसरे की बात समझ कर और सच को स्वीकार करके साथ मिलकर आगे बढ़ने का नाम ही लोकतंत्र है। हालांकि लोकतंत्र में विचार-प्रचार और संवाद-विवाद की गुंजाइश हमेशा बनी रहती है। लेकिन सच यही है कि व्यवस्था सिर्फ सत्ता से नहीं चलती। व्यवस्था चलती है सर्वसम्मति से, सबको साथ लेकर। किसी भी मामले में सर्वसम्मति बनाकर ही आगे बढ़ने के सिद्धांत को इस दफा सरकार ने भी व्यावहारिक तौर पर अपनाया और इसमें विपक्ष ने भी पूरा सहयोग किया। इसीका नतीजा रहा कि लोकसभा में तकरीबन 110 फीसदी काम हुआ जबकि राज्यसभा में भी लगभग 99 फीसदी कार्य पूरा हुआ। सत्तापक्ष और प्रतिपक्ष के बीच स्वस्थ तालमेल का ही नतीजा रहा कि लोकसभा से 15 बिल पारित हुए जबकि राज्यसभा से पारित होने वाले विधेयकों की संख्या 14 रही। इसके अलावा चर्चाएं भी हुई और ध्यानाकर्षण प्रस्तावों पर भी बहस हुई। महंगाई पर चर्चा हुई, दलित उत्पीड़न पर चर्चा हुई और जम्मू कश्मीर की मौजूदा स्थिति को लेकर भी चर्चा हुई। हर मसले पर आम सहमति का माहौल ही नहीं बना बल्कि सर्वसम्मति से प्रस्ताव भी पारित किया गया। चर्चा के नाम पर खर्चा-पानी लेकर चढ़-बैठने से विपक्ष ने भी परहेज बरता और सत्तापक्ष की ओर से भी हेकड़ी या मनमानी का मुजाहिरा नहीं किया गया। नतीजन पिछले कई सालों से जो संसद जंग का मैदान बनी हुई थी वह इस दफा सर्वसम्मति के माहौल में सुचारु तरीके से अपने काम को अंजाम देती हुई दिखी। जिस जीएसटी विधेयक को लेकर पिछले एक दशक से वैचारिक व सैद्धांतिक टकराव चल रहा था वह संसद के दोनों सदनों में सर्वसम्मति से पारित हुआ और इसके विरोध में एक भी वोट नहीं पड़ा। यहां तक कि दलितों पर हो रहे अत्याचार के मामले को लेकर हुई चर्चा के बारे में भी संभावित टकराव को लेकर जितने भी कयास लगाए जा रहे थे वे सभी गलत साबित हुए और ना सिर्फ इस पर संसद में स्वस्थ चर्चा हुई बल्कि सर्वसम्मति के साथ प्रस्ताव पारित करके सदन ने बेहद सख्त लहजे में सभी सूबों को स्पष्ट शब्दों में कह दिया कि दलितों की रक्षा और सुरक्षा से कतई समझौता नहीं किया जाना चाहिये। सर्वसम्मति का ऐसा ही माहौल महंगाई पर हुई चर्चा के दौरान भी दिखा। सरकार ने स्वीकार किया कि दाल सहित कुछ खाद्य वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि अवश्य हुई है लेकिन इसे थामने के लिए वह प्रयत्नशील है। सरकार के आश्वासन पर विपक्ष ने भी भरोसा जताया और इस मामले में भी संसद में पूरी आम सहमति का माहौल देखा गया। इसी प्रकार जम्मू कश्मीर के मौजूदा हालातों को लेकर हुई चर्चा में भी पूरी तरह आम सहमति देखी गई और सहमति भी ऐसी कि घरेलू राजनीति में एक दूसरे के कट्टर विरोधी माने जानेवाले सपा के रामगोपाल यादव ने जब पाकिस्तान से सिर्फ गुलाम कश्मीर के मसले पर ही वार्ता किये जाने की बात कही तो राजनीतिक पंडितों ने यहां तक कह दिया कि सपा ने भाजपा की लाइन पकड़ ली है। लेकिन सच तो यह है कि किसी ने किसी की लाइन नहीं पकड़ी है। सबकी अपनी-अपनी लाइन है और किसी की भी लाइन देश के हितों के खिलाफ नहीं हो सकती। यानि बात जब देश की आती है तो भारतीयता की भावना कितनी प्रबल हो जाती है यही दिखाया है हमारी संसद ने और हमारे सांसदों ने। वैसे भी बात जब देश के आन, बान, शान, विकास, सुरक्षा व अखंडता की हो तब अपेक्षित है कि संसद से ऐसा ही सुर निकले जैसा मौजूदा सत्र में निकला है। लिहाजा संसद में इस तरह के माहौल की खुले दिल से सराहना करने में कतई कोताही नहीं बरती जानी चाहिए और आगे भी प्रयत्नशील रहना चाहिए कि संसद देश के विकास में रोड़े अटकाती हुई ना दिखे बल्कि विकास में अपना योगदान करती हुई दिखे। वैसे भी घरेलू राजनीति अपनी जगह है, सत्ता की खींचतान और सैद्धांतिक विरोधाभास अपनी जगह। लेकिन इसे देशहित पर हावी होने की इजाजत तो कतई नहीं दी जा सकती। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर # Navkant Thakur

बुधवार, 12 अगस्त 2015

‘खुद पर ही बरसता है क्यों खुद का गुस्सा’

नवकांत ठाकुर
‘फूल बरसे कहीं शबनम कहीं गौहर बरसे, और इस दिल की तरफ बरसे तो पत्थर बरसे, हम से मजबूर का गुस्सा भी अजब बादल है, अपने ही दिल से उठे अपने ही दिल पर बरसे।’ वाकई बशीर बद्र साहब की लिखी इन पंक्तियों का हर शब्द केन्द्र में सत्तारूढ़ भाजपा की सोच व मानसिक स्थिति को प्रतिबिंबित करता हुआ ही प्रतीत होता है। हकीकत तो यही है कि संसद के मौजूदा मानसून सत्र को सुचारू ढंग से संचालित करने व विभिन्न बहुप्रतीक्षित विधेयकों को सदन से पारित कराने में हाथ आयी नाकामी के मद्देनजर भगवाखेमे में आक्रोश व गुस्से की लहर दौड़ना तो स्वाभाविक ही है। तभी तो रोजाना के राजनीतिक मसलों के प्रति बेहद तटस्थ व निरपेक्ष नजर आनेवाले लालकृष्ण आडवाणी सरीखे भाजपा के शीर्षतम मार्गदर्शक पर भी तिमिलाहट व कसमसाहट का भाव आज इस कदर हावी दिखाई दिया कि उन्होंने संसदीय कार्यमंत्री वेंकैया नायडू के माध्यम से लोकसभा अध्यक्षा सुमित्रा महाजन को यह संदेश दिलाने में कोताही नहीं बरती कि सदन में जारी बवाल के प्रति उन्हें अपने सख्त रूख पर डटे रहना चाहिये। साथ ही सदन में जारी हंगामे के बीच आडवाणी का उदास व निराश होकर डबडबाई आंखों के साथ बाहर निकल आना भी यही दिखाता है कि संसद के मौजूदा हालातों ने सत्ताधारी खेमे को बुरी तरह विचलित कर दिया है। साथ ही संसद में जारी गतिरोध के सिलसिले ने जिस तरह से सरकार के हाथ-पांव बांध दिये हैं उसकी बेचैनी व छटपटाहट से भगवाखेमे के सब्र का बांध टूटने का ही नतीजा है कि आज सदन के वेल में आकर बैनर-पोस्टर लहराते हुए हंगामा मचा रहे विपक्षी सांसदों के बीच घुसकर बेहद आक्रोशित लहजे में कांग्रेस के शीर्ष नेताओं को ललकारने से उमा भारती भी खुद को नहीं रोक पायीं। वास्तव में अब मौजूदा मानसून सत्र के समाप्त होने में महज दो दिन का वक्त ही बाकी बच गया है और इस बात के आसार दूर-दूर तक नहीं दिखाई दे रहे हैं कि अंतिम दो दिनों में भी सदन में कोई ठोस कामकाज हो पाएगा। कहां तो सरकार को प्राथमिकता के तहत अगले वित्तीय वर्ष से देश में वस्तु व सेवाकर अधिनियम (जीएसटी) को लागू करने के लिये आवश्यक 122वें संविधान संशोधन को राज्यसभा से पारित कराना था, भूमि अधिग्रहण विधेयक में संशोधन के प्रारूप पर आमसहमति बनानी थी और रियल एस्टेट विधेयक पर संसद के सहमति की मुहर लगवानी थी। लेकिन विपक्ष ने ऐसा गतिरोध बनाया हुआ है कि किसी मसले पर कायदे से चर्चा कराने या ज्वलंत मसलों पर संबंधित मंत्रियों को विस्तार से अपना औपचारिक बयान प्रस्तुत करने में भी कामयाबी नहीं मिल पा रही है। हालांकि सरकार की ओर से लगातार ‘साम, दाम, दंड व भेद’ सरीखे तमाम हथकंडे अपनाए गये लेकिन ‘मर्ज बढ़ता गया ज्यों-ज्यों दवा की।’ इसीका नतीजा है कि राज्यसभा में सबसे अधिक संख्याबल के दम पर कांग्रेस ने कोई कामकाज नहीं होने दिया है जबकि लोकसभा में भी सबसे बड़ा विपक्षी दल होने के नाते उसने सरकार की नाक में दम किया हुआ है। ऐसे में समस्या है कि सरकार करे भी तो क्या करे। बाकी विधेयकों को तो आगामी शीत सत्र के लिये भी टाला जा सकता है लेकिन अगर जीएसटी को अगले सत्र के लिये टालने की नौबत आयी तो अगले वित्तीय वर्ष से देश में इसे लागू करना नामुमकिन की हद तक मुश्किल हो जाएगा। इसका सीधा असर देश के अर्थव्यवस्था की रफ्तार पर पड़ना पूरी तरह है क्योंकि मौजूदा हालातों में रिजर्व बैंक ने देश की जीडीपी तकरीबन साढे सात फीसदी रहने का जो अनुमान व्यक्त किया है उसमें जीएसटी के लागू होने पर न्यूनतम ढाई फीसदी की वृद्धि होना तय है। लेकिन वह तभी संभव है जब पहले तो संसद के दोनों सदनों में दो तिहाई समर्थन से इसे पारित कराया जाए और उसके बाद देश की कम से कम 15 विधानसभा भी इस पर अपनी सहमति की मुहर लगाए। हालांकि कहने को तो वित्तमंत्री ने कह दिया है कि अगर कांग्रेस ने इसे अगले दो दिनों में पारित करने में सहयोग नहीं किया तो सरकार के पास इसे सदन से पारित कराने के और भी रास्ते हैं जिसमें संसद की विशेष बैठक बुलाया जाना भी शामिल है। लेकिन हकीकत यही है कि यह केवल कहने की ही बात है जो तिलमिलाहट की हालत में वित्तमंत्री ने कह दिया है वर्ना जिस विपक्ष ने पूरे सत्र में इसे पारित नहीं होने दिया है वह विशेष बैठक में इसे पारित करने में सरकार का सहयोग करगी, इसका क्या गारंटी है। लेकिन मसला है कि सरकार इसमें चाह कर भी कुछ नहीं कर सकती। सिवाय तिलमिलाने, छटपटाने व बिलबिलाने के। यही तिलमिलाहट व छटपटाहट ऐसे गुस्से के तौर पर सामने आ रही है जिसमें ना सिर्फ प्रधानमंत्री खुद भी कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को देश के विकास में अवरोधक बता रहे हैं बल्कि वेंकैया नायडू व अरूण जेटली से लेकर सत्तापक्ष के तमाम वरिष्ठ-कनिष्ठ नेतागण कांग्रेस के शीर्ष संचालक परिवार को अपने सीधे निशाने पर लेने से परहेज नहीं बरत रहे हैं। खैर, तयशुदा योजनाएं पूरी नहीं हो पाने और चाह कर भी कुछ नहीं कर पाने की तिलमिलाहट से आक्रोश व गुस्से का पनपना तो स्वाभाविक ही है लेकिन हकीकत यही है कि अपनी ही नाकामियों के नतीजे में पनपे इस गुस्से का नुकसान तो खुद को ही झेलना पड़ेगा, किसी और की सेहत पर इससे कोई फर्क नहीं पड़नेवाला। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’  

मंगलवार, 4 अगस्त 2015

‘चंद कदमों की चहलकदमी बनाम मीलों लंबा फासला’

नवकांत ठाकुर
इन दिनों देश की सियासत ऐसे मोड़ पर पहुंच चुकी है जिसमें सत्तापक्ष व विपक्ष के बीच जारी टकराव के बीच सहमति का फार्मूला निकालना बेहद मुश्किल हो चला है। हालांकि सैद्धांतिक तौर पर दोनों ही पक्ष मौजूदा गतिरोध को समाप्त करने की राह निकालने के लिये सहमत दिख रहे हैं लेकिन मसला यह है कि इन दोनों के बीच की खाई इतनी चैड़ी हो चुकी है कि उसे महज मुट्ठी से मिट्टी डालकर पाटने की तो उम्मीद भी नहीं की जा सकती। आलम यह है कि सफर तय करना है मीलों का लेकिन शुरूआत हो रही है कदमों की चहलकदमी से। लिहाजा मंजिल लगातार नजरों से ओझल ही बनी हुई है। दरअसल दोनों में से कोई भी पक्ष इतना लंबा सफर तय करने का सब्र दिखाना गवारा ही नहीं कर रहा है। ऐसे में चंद कदम आगे बढ़ने के बाद दोनों को ही सहमति की मंजिल दूर-दूर तक नजर नहीं नहीं दिख रही जिसके कारण वे दूबारा अपनी पुरानी जिद के खूंटे पर वापस लौटना ही बेहतर समझ रहे हैं। नतीजन संसद में जारी गतिरोध का हल तलाशने के लिये खुले मन से कोई फार्मूला निकालने का प्रयास आज भी परवान नहीं चढ़ पाया। उम्मीद तो थी कि जिस तरह से कांग्रेस ने शुक्रवार को ही सांकेतिक लहजे में जता दिया था कि अगर उसकी मांगों पर गंभीरता दिखाते हुए प्रधानमंत्री खुद ही पहल करके ललित गेट व व्यापम के मसले पर कोई ठोस कार्रवाई व पहलकदमी की घोषणा कर दें तो वह सहमति के माहौल में संसद को सुचारू ढंग से संचालित करने में सरकार का सहयोग करने से कतई गुरेज नहीं करेगी। इसी प्रकार सत्तारूढ़ भाजपा ने भी विपक्ष के खिलाफ अपने आक्रामक रूख में नरमी लाते हुए संसद में जारी गतिरोध का हल तलाशने के लिये कांग्रेस के साथ सहमति का फार्मूला निकालने के प्रति पूरी गंभीरता का मुजाहिरा किया था। इसी क्रम में संसदीय कार्यमंत्री वेंकैया नायडू ने तो यहां तक कह दिया कि कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के साथ बातचीत करके संसद में जारी गतिरोध का कोई तोड़ अवश्य निकाल लिया जाएगा। लिहाजा उम्मीद बंध चली थी कि आज की सर्वदलीय बैठक में सत्तापक्ष व विपक्ष के बीच समझौते के किसी फार्मूले पर बात अवश्य आगे बढ़ेगी जिसके नतीजे में संसद में बारह दिनों से जारी गतिरोध का सिलसिला जल्दी ही समाप्त हो जाएगा। लेकिन मसला यह फंस गया है कि इन दोनों पक्षों के बीच असहमति व आपसी विरोध की खाई इतनी गहरी हो चुकी है कि इसके बीच सहमति व समझौते का कोई पुल बनाने का फार्मूला किसी की समझ में ही नहीं आ रहा है। विपक्ष ने ललित गेट व व्यापम की जांच के लिये जेपीसी गठित किये जाने व प्रधानमंत्री द्वारा इसकी औपचारिक घोषणा किये जाने का जो फार्मूला पेश किया उसे स्वीकार करना सत्ता पक्ष को गवारा ही नहीं हो रहा है। दूसरी ओर सरकार की ओर से वेंकैया ने किसी भी मसले पर किसी भी नियम के तहत चर्चा कराये जाने की स्वीकृति देने के अलावा उस चर्चा में प्रधानमंत्री द्वारा हस्तक्षेप करके औपचारिक बयान दिये जाने का जो फार्मूला प्रस्तुत किया वह कांग्रेस को महज झुनझुने सरीखा ही महसूस हो रहा है जिसे स्वीकार करके शांत हो जाना उसे कतई गवारा नहीं है। यानि विपक्ष ने सुषमा स्वराज, वसुंधरा राजे और शिवराज सिंह के इस्तीफे की जिद ठानकर संसद को बाधित रखने की जो रणनीति अपनाई हुई है और उसके मुकाबले सत्तापक्ष की ओर से भी जिस तरह से ईंट का जवाब पत्थर से देने की पहलकदमी की जा रही है उन दोनों रणनीतियों में सीधा जमीन-आसमान का अंतर है लिहाजा अब वे दोनों चाह कर भी इस लंबी दूरी के बीच सहमति के मध्यबिन्दु तक की यात्रा करने की राह नहीं निकाल पा रहे हैं। हालांकि कांग्रेस की ओर से अगर सोनिया गांधी व राहुल गांधी और सत्तापक्ष की ओर से इसके पुराने अनुभवी बुजुर्ग नेताओं की टोली आमने-सामने बैठकर कोई हल निकालना चाहे तो ऐसा कोई मसला ही नहीं है जिसका बातचीत से समाधान ना निकल सके। लेकिन दिक्कत है कि ना तो भाजपा के मौजूदा निजाम की सीधी बातचीत कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व से हो रही है और ना ही गांधी परिवार के लिये इन्होंने इतनी राह छोड़ी है कि वह सत्तापक्ष की कथित युवातुर्क टोली के साथ धैर्य, विश्वास व परस्पर सम्मान के माहौल में वार्ता प्रक्रिया आरंभ करने की पहल कर सकें। लिहाजा बात हो भी रही है तो भाजपा की दूसरी पीढ़ी के साथ कांग्रेस के दोयम दर्जे के रणनीतिकारों की जिनको कोई अंतिम फैसला लेने की इजाजत ही नहीं है। ऐसे में अव्वल तो जब तक दोनों पक्षों के ऐसे लोग आमने-सामने बैठकर समझौते के किसी मसौदे पर सहमति बनाने की पहल नहीं करते हैं जिन्हें पार्टी की ओर से कोई निर्णय लेने का पूरा अख्तियार हो तब तक मौजूदा गतिरोध का कोई हल निकल पाने की उम्मीद भी नहीं की जा सकती। साथ ही मौजूदा गतिरोध के बीच समझौते के किसी फार्मूले तक पहुंचने के लिये दोनों पक्ष को अपनी जिद की लकीर छोड़कर लंबा सफर तय करने के लिये सहमत होना पड़ेगा। इसमें अगर एक भी पक्ष खुले मन से पूर्वाग्रह दिखाए या जिद ठाने बगैर समझौते के लिये आवश्यक लंबा सफर तय करने के प्रति हिचक दिखाने की कोशिश भी करेगा तो ऐसे में मौजूदा गतिरोध का हल निकल पाने की उम्मीद यथावत धूमिल ही रहेगी। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’   

सोमवार, 3 अगस्त 2015

‘सहमति के चूल्हे में साझा समस्याओं का जलावन’

नवकांत ठाकुर
संसद में जारी गतिरोध की बर्फ पिघलाने के लिये सहमति का चूल्हा सुलगाने के प्रति सत्तापक्ष व विपक्ष के बीच जो सैद्धांतिक सहमति बनती दिख रही है उसके लिये अब साझा समस्याओं के जलावन की तलाश काफी तेज हो गयी है। वैसे भी दोनों पक्षों को अब बेहतर समझ में आ गया है कि मौजूदा गतिरोध को दूर करने के लिये अपनी जिद का खूंटा तोड़कर आगे बढ़ने के अलावा दूसरा कोई विकल्प ही नहीं है। हालांकि सहमति का मिलाप तभी संभव है जब किसी के भी हितों के क्षेत्र में दूसरा पक्ष अतिक्रमण ना करे और दोनों ही पक्ष परस्पर गले मिलने के लिये अपने जिद की सरहद से बाहर निकल कर बराबर आगे बढ़ें। इसमें अब तक जो फार्मूला सामने आया है उसके तहत कांग्रेस ने संकेत दिया है कि अगर प्रधानमंत्री की ओर से व्यापम व ललित गेट की जांच के लिये संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के गठन की घोषणा कर दी जाये तो संसद में जारी गतिरोध का समाधान आसानी से निकल सकता है। दूसरी ओर सत्तापक्ष की ओर से संकेत दिया जा रहा है कि सदन में किसी भी नियम के तहत किसी भी मसले पर चर्चा कराने के एवज में संसद को सुचारू ढंग से चलाने के लिये विपक्ष अपनी सहमति दे तो उस चर्चा के लिये अपनी सहमति देने में सरकार कतई देर नहीं करेगी। यानि बात इतनी तो बढ़ ही गयी है कि विपक्ष ने सुषमा स्वराज, वसुंधरा राजे व शिवराज सिंह चैहान के इस्तीफे की जिद छोड़कर जेपीसी की जांच से ही संतुष्ट हो जाने पर अपनी सहमति दे दी है जबकि सत्तापक्ष ने मतदान के नियम के तहत भी सदन में किसी भी मसले पर चर्चा कराने के प्रति हामी भर दी है। लिहाजा अब समझौते की पटकथा इन्हीं दोनों फार्मूलों के बीच से निकलना लगभग तय है। इसमें एक बात तो साफ है कि राज्यसभा में विपक्ष के नेता गुलाम नबी आजाद के मुताबिक सरकार को केवल कोरी चर्चा व सूखी बहस के एवज में ही मौजूदा गतिरोध से निजात नहीं मिल सकती है बल्कि इसके लिये उसे किसी ठोस कार्रवाई की प्रस्तावना देनी पड़ेगी जबकि सत्तापक्ष की मानें तो व्यापम व ललित गेट के मसले की जेपीसी से जांच कराने का कोई औचित्य ही नहीं है। संसदीय कार्यमंत्री वेंकैया नायडू के मुताबिक व्यापम की जांच सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर सीबीआई को सुपुर्द कर दिये जाने के बाद अब अलग से इसके लिये जेपीसी गठित करने का कोई मतलब ही नहीं है। इसी प्रकार ललित मोदी को मदद पहुंचाने के मामले में सुषमा स्वराज व वसुंधरा राजे की संलिप्तता की जांच के लिये भी जेपीसी का गठन करना संभव नहीं है क्योंकि अव्वल तो सुषमा ने ललित मोदी को यात्रा दस्तावेज उपलब्ध कराने में सीधे तौर पर कोई मदद नहीं की थी बल्कि उन्होंने ब्रिटेन की सरकार को केवल इतना ही कहा था कि अगर नियम कायदों का अनुपालन करते हुए उसे यात्रा करने की इजाजत दी जाती है तो इससे भारत व ब्रिटेन के संबंधों पर कोई असर नहीं पड़ेगा। साथ ही सुषमा ने यह बात इंसानियत के नाते केवल इस वजह से कही थी क्योंकि पत्नी के कैंसर का इलाज कराने के लिये मोदी के लिये ब्रिटेन से बाहर जाना अनिवार्य हो गया था। इसी प्रकार वसुंधरा द्वारा मोदी को पहुंचाई गयी मदद के मामले की जांच भी जेपीसी नहीं कर सकती क्योंकि नियम के तहत या तो सरकारी पैसे के दुरूपयोग व गबन की जांच के लिये या फिर किसी संवैधानिक पद पर बैठे हुए व्यक्ति द्वारा की गयी असंवैधानिक, अनैतिक व गैरकानूनी आचरण की पड़ताल के लिये ही जेपीसी का गठन हो सकता है जबकि जिस दौरान वसुंधरा द्वारा मोदी को मदद पहुंचाए जाने की बात सामने आयी है उस वक्त ना तो वह किसी संवैधानिक पद पर थी और ना ही उन्होंने कानून या संविधान के दायरे का उल्लंघन किया है। यानि समग्रता में देखें तो ना तो सुषमा, वसुंधरा व शिवराज के मामले की जांच के लिये जेपीसी का गठन करना सरकार को गवारा है और ना ही केवल कोरी चर्चा का आश्वासन पाकर विपक्ष अपनी जिद से पीछे हटने के लिये तैयार है। ऐसे में सहमति का फार्मूला इन दोनों से अलग ही बनना है जिसमें यह सहमति भी बन सकती है कि ललित मोदी द्वारा अंजाम दिये गये मनी लाॅन्ड्रिंग की प्रवर्तन निदेशालय द्वारा की जा रही जांच को आगे बढ़ाते हुए उसे जेपीसी के हवाले कर दिया जाये। वैसे भी मोदी ने जितना नुकसान भाजपा की छवि को पहुंचाया है उतना ही उसके बयानों से कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की छवि को भी आघात पहुंचा है। लिहाजा उसके खिलाफ जेपीसी की मांग स्वीकृत हो जाने से कांग्रेस के अहम की भी संतुष्टि हो जाएगी क्योंकि उसको मदद पहुंचाने के कारण ही सुषमा व वसुंधरा के इस्तीफे की मांग उठायी जा रही थी जबकि मोदी को जांच के जाल में फांसकर उसे उसके करतूतों की सजा दिलाने से सत्तापक्ष का बदला भी पूरा हो जाएगा। खैर, अभी साझा सरोकार के ऐसे कई और भी फार्मूले सामने आ सकते हैं। लेकिन मसला यह है कि यथाशीघ्र किसी फार्मूले पर आम सहमति बनाने की तत्परता नहीं दिखाये जाने के नतीजे में अगर मौजूदा मानसून सत्र हंगामे की भेट चढ़ने की नौबत आयी तो इसका नकारात्मक प्रभाव सरकार के कामकाज, विपक्ष की छवि व देश के विकास पर एक समान ही पड़ेगा। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’  

शनिवार, 1 अगस्त 2015

‘अब सहमति के राह की दरकार है सभी को’

नवकांत ठाकुर
कहते हैं कि सियासत में समझौते व आम सहमति की गुंजाइश हमेशा बनी रहती है। पेंच कैसा भी क्यों ना फंसा हो, बातचीत से हर मुश्किल का हल निकल ही आता है। बशर्ते कि सभी पक्ष अपनी जिद छोड़कर सहमति की राह निकालने के लिये इमानदारी से तत्पर हों। यानि सहमति की राह तभी निकल सकती है जब सभी पक्ष अपनी जिद से पीछे हटने का विकल्प खुला रखें। वर्ना जिद पर अड़कर बातचीत का दरवाजा बंद कर लिये जाने का नतीजा वैसा ही होता है जैसा इन दिनों देश की मौजूदा राजनीति में देखा जा रहा है। दरअसल पिछले दो सप्ताह से संसद में जारी गतिरोध के सिलसिले की इकलौती वजह सत्तापक्ष व विपक्ष की वह जिद ही है जिससे रत्तीभर भी पीछे हटना किसी को गवारा नहीं था। कांग्रेस की जिद थी कि ललित गेट के मामले में सुषमा स्वराज व वसुंधरा राजे को और व्यापम विवाद में शिवराज सिंह चैहान के खिलाफ ठोस व कड़ी कार्रवाई होने तक वह संसद को हर्गिज नहीं चलने देगी जबकि सरकार की जिद थी कि वह विपक्ष के दबाव में कोई कार्रवाई नहीं करेगी। जहां एक ओर कांग्रेस ने सरकार के खिलाफ संसद से लेकर सड़क तक व्यापक विरोध का मोर्चा खोल दिया था वहीं सत्तापक्ष ने भी पलटवार करते हुए कांग्रेस के शीर्ष संचालक परिवार के सदस्यों के खिलाफ निजी हमला करना व कांग्रेसशासित राज्यों में हुए घपले-घोटाले के मामलों को राष्ट्रीय स्तर पर तूल देना आरंभ कर दिया था। लेकिन ताजा सूरतेहाल के तहत इस टकराव को लंबे समय तक जारी रखना ना तो सत्ता पक्ष को मुनासिब महसूस हो रहा है और ना ही विपक्ष को। सरकार की मजबूरी है कि अगले साल से देश में ‘वस्तु व सेवाकर अधिनियम’ (जीएसटी) लागू करने के लिये मौजूदा सत्र में ही इसके लिये आवश्यक संविधान संशोधन को राज्यसभा से पारित कराना उसके लिये बेहद अनिवार्य है। साथ ही संसदीय कार्यमंत्री वेंकैया नायडू के मुताबिक सरकार ने मौजूदा सत्र में ही जुवेनाइल जस्टिस, रियल इस्टेट, व्हिसल ब्लोअर व निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट से संबंधित विधेयकों को भी सर्वोच्च प्राथमिकता के तहत संसद से पारित कराने का लक्ष्य तय किया हुआ है। जाहिर है कि ये सभी विधेयक तभी पारित हो सकते हैं जब संसद का कामकाज सुचारू ढंग से संचालित होना आरंभ हो। दूसरी ओर विपक्ष भी सुषमा, वसुंधरा व शिवराज के इस्तीफे की जिद पर डटे रहकर संसद में जारी गतिरोध को बरकरार रखने में अब काफी असहजता महसूस कर रही है। अव्वल तो इस रणनीति में कांग्रेस को बाकी विपक्षी दलों का सहयोग नहीं मिल रहा है और दूसरे सूत्रों की मानें तो पार्टी के मुख्यमंत्रियों ने भी जीएसटी को पारित कराने की राह निकालने के लिये संगठन पर दबाव बनाया हुआ है। इसके अलावा संसद में जारी गतिरोध के कारण विभिन्न राज्यों में आयी बाढ़, से लेकर किसानों की समस्या, राष्ट्रीय सुरक्षा व महंगाई सहित तमाम ज्वलंत मसलों की आवाज संसद की देहरी के भीतर दाखिल नहीं हो पाने का ठीकरा अपने सिर पर फोड़े जाने की संभावना ने कांग्रेस को बुरी तरह परेशान किया हुआ है। यानि समग्रता में देखें तो संसद को बाधित रखने के लिये भले ही विपक्ष के अलावा सत्ता पक्ष की जिद भी बराबर की दोषी क्यों ना हो लेकिन जिद की सरहदों के बीच आम सहमति की धारा बहाने के अलावा दोनों पक्षों के लिये अब कोई दूसरा विकल्प ही नहीं बचा है। यही वजह है कि जहां एक ओर सरकार ने आगामी सोमवार को संसद में जारी गतिरोध को समाप्त करने की राह तलाशने के लिये औपचारिक तौर पर सर्वदलीय बैठक आयोजित करने का फैसला किया है वहीं दूसरी ओर कांग्रेस ने भी अपनी जिद से एक कदम पीछे हटते हुए कहा है कि अगर प्रधानमंत्री की ओर से ललित गेट व व्यापम के मसले पर कोई ठोस प्रस्ताव प्रस्तुत किया जाता है तो वह संसद में जारी गतिरोध को बातचीत के माध्यम से दूर करने के लिये पूरी तरह तैयार है। यानि बिना औपचारिक बातचीत के ही इतनी बात तो बन ही गयी है कि अव्वल तो विपक्ष ने सुषमा, वसुंधरा व शिवराज के इस्तीफे की मांग को ठंडे बस्ते में डालने का मन बना लिया है वहीं दूसरी ओर सरकार ने भी मौजूदा सत्र में ही विवादित भूमि अधिग्रहण विधेयक को सदन से पारित कराने की जिद छोड़ने का संकेत दे दिया है। हालांकि विपक्ष ने ललित गेट व व्यापम के मसले की जांच के लिये संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) गठित किये जाने की मांग अवश्य बुलंद की है लेकिन फिलहाल संवैधानिक व्यवस्थाओं व संसदीय परंपराओं की आड़ लेकर इस मांग को भी स्वीकार करने से सरकार फिलहाल इनकार करती हुई ही दिख रही है। खैर, राहत की बात यही है कि दोनों ही पक्ष अब मौजूदा मानसून सत्र के बचे-खुचे वक्त में अधिक से अधिक कामकाज निपटाने के लिये सहमत होते दिख रहे हैं। लिहाजा जब संसद को सुचारू ढंग से चलाने पर सैद्धांतिक सहमति बन ही रही है तो लाजिमी तौर पर इसका कोई ना कोई बहाना यानि आम सहमति की राह भी निकल ही आएगी। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम से अगर सत्ता पक्ष ने ‘लोहे को लोहे से काटने’ के सिद्धांत की व्यावहारिक निरर्थकता और विपक्ष ने ‘मांग उतनी करो जो मुनासिब भी हो’ की सीख नहीं ली तो दोनों को भविष्य में भी मौजूदा परेशानी का दोबारा सामना करने के लिये तैयार रहना ही होगा। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’

शुक्रवार, 31 जुलाई 2015

‘दोष किसी और का है दोषी कोई और’

नवकांत ठाकुर
संसद के मौजूदा मानसून सत्र का दूसरा हफ्ता भी हंगामे और बवाल की भेंट चढ़ने के बाद यह सवाल उठना लाजिमी ही है कि आखिर इसका दोष किस पर डाला जाये। लगातार दो सप्ताह से संसद नहीं चल पाने की वजहों पर गौर करें तो इसके लिये सीधे तौर पर विपक्ष को जिम्मेवार ठहरा देना तो बेहद आसान है लेकिन सवाल है कि विपक्ष ने जिन मसलों को तूल देते हुए संसद को बाधित करने का पहले से ही ऐलान किया हुआ था उस पर उसे मनाने, समझाने व सहमति की राह तलाशने के बजाय सत्तापक्ष द्वारा जिस तरह से उसे लगातार उकसाने का प्रयास किया जा रहा है उसे किस रूप में देखा जाये। एक मिनट के लिये अगर यह मान भी लिया जाये कि कांग्रेस ने देश के विकास को बाधित करने और केन्द्र सरकार को नाकारा व निकम्मा साबित करने की सियासी साजिश के तहत निराधार तथ्यों को तूल देते हुए संसद में गतिरोध, हंगामे व बवाल का सिलसिला जारी रखा हुआ है, फिर भी यह बात समझ से परे है कि सत्तापक्ष भी लगातार संसद में जारी बवाल की आग में उकसावे का प्रेट्रोल डालता हुआ क्यों दिखाई पड़ रहा है। दरअसल जिस तरह से सत्तापक्ष ने विरोध व गतिरोध की चिंगारी पर अपने आक्रोश व उकसावे की आग बरसाने का सिलसिला जारी रखा हुआ है उससे तो कतई नहीं लगता है कि वह वास्तव में संसद को सुचारू ढंग से चलाने के प्रति जरा भी गंभीर है। माना कि कांग्रेस ने जिद ठानी हुई है कि जब तक ललित गेट मामले में सुषमा स्वराज व वसुंधरा राजे का और व्यापम घोटाले में शिवराज सिंह चैहान का इस्तीफा नहीं हो जाता है तब तक वह कतई संसद को सुचारू ढंग से संचालित करने में सहभागी नहीं बनेगी। लेकिन इस मसले पर बाकी विपक्षी दलों ने अब तक ऐसी किसी ठोस जिद का तो मुजाहिरा ही नहीं किया है। अलबत्ता जनता परिवार के घटक दल तो संसद के संचालन में सरकार का सहयोग करने के लिये पूरी तरह तैयार हैं। इसी प्रकार वामपंथी दलों ने भी संसद में जारी गतिरोध पर अपना आक्रोश जताने में कोई कोताही नहीं बरती है। साथ ही बीजद व अन्ना द्रमुक सरीखे गुटनिरपेक्ष दलों ने भी संसद को बाधित रखे जाने पर अपनी चिंता ही जाहिर की है और राकांपा व द्रमुक सरीखे संप्रग के घटक दलों को भी संसद में जारी गतिरोध कतई रास नहीं आ रहा है। इन तथ्यों से इतना तो स्पष्ट है कि संसद बाधित रखने में कांग्रेस का सहयोग करना किसी भी रसूखदार दल को कतई गवारा नहीं हो रहा है। लिहाजा गैरकांग्रेसी विपक्ष को विश्वास में लेकर सरकार के लिये संसद में कांग्रेस को अलग-थलग करना काफी आसान हो सकता था। लेकिन अब तक ना तो विपक्षी दलों के साथ सर्वदलीय बैठक आयोजित करने की पहल हुई है और ना ही कांग्रेस के साथ सहमति की राह निकालने का कोई ठोस प्रयास हुआ है। उल्टे पिछले सप्ताह संसदीय कार्यमंत्रालय ने अपनी ओर से जब अनौपचारिक तौर पर सर्वदलीय बैठक आयोजित करने की योजना बनायी तो उसी दिन संसद के भीतर सत्तापक्ष के सांसदों ने राॅबर्ट वाड्रा की आड़ लेकर जिस तरह से सोनिया गांधी पर निजी हमला कर दिया जिससे आहत होकर कांग्रेस ने बैठक में शिरकत करने से इनकार कर दिया नतीजन बैठक हो ही नहीं सकी। हालांकि तय वक्त पर वामदलों के नेताओं से लेकर कई अन्य विपक्षी दलों के नेता भी बैठक के लिये एकत्र हो चुके थे लेकिन सरकार ने कांग्रेस को अलग छोड़कर बाकी विपक्षी दलों के साथ बातचीत करना उचित नहीं समझा। इसी प्रकार आज भी लोकसभा अध्यक्षा सुमित्रा महाजन द्वारा बुलाई गई बैठक से ऐन पहले वित्तमंत्री अरूण जेटली द्वारा बेहद आक्रामक लहजे में कांग्रेस पर ‘तुच्छ, नकारात्मक व गैर जिम्मेदाराना’ राजनीति करने का आरोप लगाने की पहल किये जाने के साथ ही इस बैठक में भी गतिरोध समाप्त होने की कोई राह निकलने की उम्मीद सिरे से समाप्त हो गई। वैसे भी वरिष्ठ कांग्रेसी नेता आनंद शर्मा की मानें तो आज संसद की बैठक शुरू होने से पहले ही सरकार ने विपक्ष को आश्वस्त कर दिया था कि चुंकि सभी दलों के अधिकांश शीर्ष नेता पूर्व राष्ट्रपति डाॅ एपीजे अब्दुल कलाम को अंतिम विदाई देने के लिये रामेश्वरम गये हुए हैं लिहाजा पंजाब में हुए आतंकी हमले के मसले पर ना तो गृहमंत्री द्वारा संसद में बयान दिया जाएगा और ना ही आंतरिक सुरक्षा के मसले पर चर्चा कराई जाएगी। लेकिन इस वायदे से मुकरते हुए अचानक ही पहले तो गृहमंत्री का बयान करा दिया गया और जब इस पर विपक्ष ने हंगामा खड़ा किया तो उस पर सियासी स्वार्थ के लिये राष्ट्रीय सुरक्षा की अनदेखी करने की तोहमत लगा दी गयी। जाहिर है कि इस तरह के उकसावे की कूटनीति का तो यही मतलब निकाला जाएगा कि अब सरकार भी नहीं चाह रही है कि संसद की कार्रवाई सुचारू ढंग से संचालित हो सके। इससे विपक्ष पर नकारात्मक राजनीति करने का आरोप लगाते हुए उसे सार्वजनिक तौर पर बदनाम करना सरकार के लिये काफी आसान हो जाएगा। बहरहाल समग्रता में देखा जाये तो संसद को बाधित रखने के लिये भले ही विपक्ष को ही दोषी ठहराया जा रहा हो लेकिन हकीकत यही है कि इसके लिये जितनी दोषी विपक्ष की सियासी जिद है उससे जरा भी कम सत्ता पक्ष की उकसावे की कूटनीति भी नहीं है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ 

शुक्रवार, 24 जुलाई 2015

‘क्या बने बात जहां बात बनाए न बने’

नवकांत ठाकुर
‘नुक्ताचीं है गमे-दिल उसको सुनाए न बने, क्या बने बात जहां बात बनाए न बने, बोझ वो सर से गिरा है कि उठाए न बने, काम वो आन पड़ा है कि बनाए न बने।’ वाकई दीवाने गालिब में संकलित मिर्जा गालिब की कलम से निकली यह गजल मौजूदा सियासी उलझनों के मद्देनजर बेहद प्रासंगिक दिखाई पड़ती है। राष्ट्रीय राजनीति की हालत ऐसी ही है कि बिगड़ी हुई बात बनने की कोई राह निकलती नहीं दिख रही है। वैसे राह भी तब निकले जब बातों का सिलसिला शुरू हो। यहां तो कोई भी पक्ष आमने-सामने बैठकर मौजूदा मुश्किलों का आम सहमति से कोई हल तलाशने के लिये तैयार ही नहीं है। एक ओर कांग्रेस की जिद है कि सुषमा स्वराज, शिवराज सिंह चैहान और वसुंधरा राजे को उनके पद से हटाए जाने से पहले वह सत्ताधारी पक्ष के साथ कतई सहयोग या संवाद नहीं करेगी जबकि सत्तारूढ़ भगवा खेमा किसी भी हालत में एक इंच भी झुकने के लिये तैयार नहीं है। आलम यह है कि कांग्रेस द्वारा संसद से लेकर सड़क तक खोले गये मोर्चे के जवाब में भाजपा ने भी अपने बचाव में विरोधी पक्ष पर पलटवार करते हुए जोरदार आक्रमण करने की ही राह पकड़ ली है। तभी तो ना सिर्फ कांग्रेस शासित सूबों में हुए घपले-घोटाले, भ्रष्टाचार व वित्तीय अनियमितताओं के मामलों को राष्ट्रीय स्तर पर जोरदार तरीके से उजागर करने का सिलसिला शुरू कर दिया है बल्कि कांग्रेस के शीर्ष परिवार के सदस्यों पर निजी हमले करने से भी परहेज नहीं बरता जा रहा है। हालांकि सत्तापक्ष व मुख्य विपक्ष द्वारा बढ़-चढ़कर एक दूसरे के खिलाफ किये जा रहे आक्रामक हमलों के कारण ठप्प पड़ी संसद को सुचारू ढ़ंग से संचालित कराने की राह निकालने के लिये गैर-कांग्रेसी विपक्षी दल खासी मशक्कत करते दिख रहे हैं लेकिन उनके द्वारा सुझाये गये फार्मूलों पर भी कोई बात बनती नहीं दिख रही है। मसला यह है कि बात तो तब बने जब दोनों पक्ष बातचीत के लिये सहमत हों। यहां तो इन दोनों को बातचीत के लिये आमने-सामने बिठाना भी टेढ़ी खीर बनी हुई है। आज की ही बात करें तो सुबह के वक्त सभी राजनीतिक दलों के बीच इस बात पर आम सहमति बन गयी थी कि दोपहर में अनौपचारिक तौर पर एक सर्वदलीय बैठक आयोजित होगी जिसमें संसद में जारी मौजूदा गतिरोध का कोई सर्वसम्मत तोड़ निकालने का प्रयास किया जाएगा। सूत्र बताते हैं कि कांग्रेस के वरिष्ठ रणनीतिकारों ने भी इस बैठक में शिरकत करने के लिये हामी भर दी थी। यानि मामला पटरी पर आता दिखने लगा था। लेकिन सुबह के वक्त जब संसद की कार्यवाही शुरू हुई तो सत्तापक्ष के सांसदों ने ना सिर्फ कांग्रेस के खिलाफ जमकर नारेबाजी की बल्कि पार्टी अध्यक्षा सोनिया गांधी के इकलौते दामाद राॅबर्ट वाड्रा द्वारा किये गये कथित जमीन घोटाले के मामले को तूल देते हुए संसद में बैनर-पोस्टर भी लहराए। यहां तक कि वाड्रा द्वारा संसद में अपने खिलाफ उठाए जा रहे मसले को तुच्छ राजनीति बताए जाने को संसद की अवमानना करार देते हुए बीकानेर के भाजपाई सांसद अर्जुन मेघवाल ने विशेषाधिकार हनन का नोटिस भी दे दिया। नतीजन सत्तापक्ष के सांसदों की इन हरकतों खिन्न होकर कांग्रेसी रणनीतिकारों ने सर्वदलीय बैठक में शिरकत करने से ही इनकार कर दिया जिसके कारण बात बनाने के लिये आरंभ किये जा रहे बातचीत के सिलसिले की शुरूआत ही नहीं हो सकी। हालांकि सूत्र बताते हैं कि इस पूरे घटनाक्रम से गैर-कांग्रेसी दलों के बीच भारी निराशा का माहौल अवश्य बना है क्योंकि आज की बैठक के पूर्व ही वाममोर्चे से लेकर सपा व तृणमूल सरीखे दलों ने भी सरकार को इस बात की सहमति दे दी थी कि संसद जारी गतिरोध को दूर करने के लिये वह कांग्रेस के साथ जो भी समझौता करेगी उसे तहेदिल से स्वीकार करने में वे कतई कोताही नहीं बरतेंगे। लेकिन जब बैठक ही नहीं हो पा रही है तो सहमति की कोई राह निकलने का सवाल ही कहां है। पहली आवश्यकता तो इन दोनों पक्षों को बातचीत के लिये आमने-सामने बिठाने की है। बात होगी तो बात बनने की कोई सूरत निकलेगी लेकिन बात ही नहीं होगी तो बात बनेगी कैसे। खैर, सूत्र बताते हैं कि गैर-कांग्रेसी विपक्ष ने दोनों पक्षों के सामने यह फार्मूला भी पेश किया है कि जिन तीन नेताओं को पद से हटाने की कांग्रेस ने जिद ठानी हुई है उन पर लग रहे आरोपों की जांच के लिये एक संसदीय समिति का गठन कर दिया जाये। लेकिन फिलहाल यह फार्मूला ना तो कांग्रेस को रास आ रहा है और ना ही भाजपा इस पर अमल करने के लिये सहमत दिख रही है। खैर, आज की बैठक स्थगित हो जाने या गैर-कांग्रेसी विपक्ष द्वारा पेश किये जा रहे फार्मूलों पर कोई आम राय नहीं बन पाने के मामले को देखते हुए यह निष्कर्ष निकाल लेना तो जल्दबाजी होगी कि मौजूदा सत्र सुचारू ढ़ंग से संचालित ही नहीं हो पाएगा लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में मतभेदों को सुलझाने का इकलौता रास्ता बातचीत का ही होने के कारण यह तो तय है कि फिलहाल मुलाकात या बात करने से भी इनकार कर रहे दोनों ही पक्षों को कभी ना कभी बातचीत के लिये आमने-सामने बैठना ही होगा। लेकिन बातचीत का दरवाजा खोलने में जितनी देर की जाएगी उसका देश को उतना ही नुकसान झेलना पड़ेगा और इसकी पूरी जिम्मेवारी अपनी-अपनी जिद पर अड़े इन दोनों पक्षों की ही होगी। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’   

मंगलवार, 21 जुलाई 2015

‘साम दान भय भेद का कुछ तो दिखे परिणाम’

विरोधियों से अपनी बात मनवाने के लिये सत्ताधारियों द्वारा अक्सर जिन चार उपायों को अमल में लाये जाने का रामचरित मानस में तुलसीदास ने जिक्र किया है वे हैं साम, दान, भय और भेद। इसमें ‘साम’ का मतलब है समझाना, सम्मान देना व सहमति से संतुलन की राह निकालना। ‘दाम’ का अर्थ है सौदेबाजी, लेन-देन या खरीद-फरोख्त की राह अपनाना। ‘भय’ से तात्पर्य है विरोधी पक्ष को उसकी कमजोरियों व अपनी ताकत का एहसास कराके डराना। और भेद का मतलब है रहस्यात्मक रणनीति व कूटनीति का प्रयोग करते हुए विरोधी पक्ष में फूट डालकर उसे मजबूर, कमजोर व विवश कर देना। कायदे से देखा जाये तो ताजा राजनीतिक माहौल में केन्द्र सरकार भी कल से शुरू हो रहे संसद के मानसून सत्र में संभावित गतिरोध, भिड़ंत व टकराव की स्थिति को टालते हुए संसद को सुचारू ढ़ंग से चलाने के लिये इन चारों उपायों का एक साथ ही प्रयोग करती दिख रही है। दरअसल मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने पहले से ही स्पष्ट कर दिया है कि व्यापम घोटाले के आरोपों में घिरे शिवराज सिंह चैहान और ललित मोदी के मामले में फंसी सुषमा स्वराज व वसुंधरा राजे को उनके पद से हटाए जाने के बाद ही वह संसद को सुचारू ढंग से संचालित करने में सरकार का सहयोग करेगी। साथ ही उसने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि वह वर्ष 2013 में बने भूमि अधिग्रहण कानून में एक शब्द भी संशोधन करने की सरकार को हर्गिज इजाजत नहीं देगी। जाहिर है कि कांग्रेस की इस जिद को देखते हुए संसद का मानसून सत्र पूरी तरह हंगामे की भेंट चढ़ना लाजिमी ही है। लेकिन जहां तक सरकार का सवाल है तो उसकी पूरी कोशिश है कि किसी भी तरह तमाम राजनीतिक दलों के बीच जारी नीतिगत, वैचारिक व सैद्धांतिक गतिरोध को दूर करते हुए संसद को सुचारू ढंग से संचालित करके संसद के सत्र को अधिकतम परिणामदायक बनाया जाये। यही वजह है कि अपने सहयोगियों को मजबूती के साथ अपने पक्ष में खड़ा करने के लिये राजग गठबंधन के घटक दलों को पहली बार औपचारिक तौर पर एकसाथ रात्रिभोज के बहाने बातचीत करने के लिये प्रधानमंत्री ने अपने निवास पर आमंत्रित करने की पहल की। साथ ही विरोधियों को मनाने के लिये ‘साम’ नीति के तहत समझाने की राह अख्तियार करते हुए भूमि अधिग्रहण विधेयक के मसले पर बातचीत करने के लिये पहले भी आमंत्रित किया गया जिसमें शिरकत करने से कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों ने तो साफ तौर पर इनकार कर दिया अलबत्ता भाजपा व उसके साथी दलों के मुख्यमंत्रियों के अलावा बिहार व दिल्ली के सूबेदारों सहित कुछ सोलह प्रदेशों के साथ बातचीत भी हुई। साथ ही संसदीय कार्यमंत्री वेंकैया नायडू ने और लोकसभा अध्यक्षा सुमित्रा महाजन ने सर्वदलीय बैठक बुलाकर तमाम विवादास्पद मसलों पर सभी दलों को समझाने व मनाने की पहल भी की। इस ‘साम’ नीति के नतीजे में कथित तौर पर सपा व बसपा सहित जनता परिवार के घटक दलों सहित अधिकांश राजनीतिक दलों ने तमाम विवादास्पद व उलझाऊ मसलों पर बातचीत के माध्यम से सहमति की राह निकालने व संसद को सुचारू ढंग से संचालित करने पर अपनी सहमति दे दी है। लेकिन कांग्रेस बदस्तूर संसद में गतिरोध का माहौल बनाने की जिद पर अड़ी दिख रही है। हालांकि सूत्रों की मानें तो कांग्रेस को झुकाने व उसे पीछे हटने पर मजबूर करने के लिये ‘दान’ नीति के तहत यह प्रस्ताव भी दे दिया गया है कि अगर वह बाकी मसलों पर अपनी जिद छोड़ दे तो मौजूदा सत्र में भूमि विधेयक को पारित कराने से परहेज बरत लिया जाएगा ताकि बाकी संसदीय कामकाज सुचारू ढंग से संचालित हो सके और जीएसटी व नाबालिग श्रमिकों से जुड़े महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित कराने की राह निकल सके। साथ ही कांग्रेस के खिलाफ ‘भय’ की नीति का प्रयोग करते हुए भाजपा ने स्पष्ट कर दिया है अगर उसने गतिरोध व टकराव का सिलसिला बदस्तूर जारी रखा तो ऐसे में उसके शीर्ष संचालक परिवार के दामाद राबर्ट वाड्रा द्वारा राजस्थान व हरियाणा में कथित तौर पर अंजाम दिये जमीन घोटाले, प्रियंका गांधी द्वारा शिमला में की गयी जमीन की कथित हेराफेरी व सोनिया गांधी की सगी बहन द्वारा ललित मोदी से 500 करोड़ की रिश्वत मांगे जाने के मामले को देशभर में बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनाने और विदेशी कंपनी से घूस लेने के मामले में अमेरिकी अदालत में साबित हो चुकी गोवा की पूर्ववर्ती सरकार के मंत्रियों संलिप्तता के मसले की सीबीआई से जांच कराने से भी परहेज नहीं बरता जाएगा। इसके अलावा ‘भेद’ की नीति के तहत कांग्रेस को संसद से लेकर सड़क तक पूरी तरह अलग-थलग करने व अन्य विपक्षी व तटस्थ दलों के साथ बातचीत के माध्यम से तमाम विवादास्पद मसलों पर आम सहमति की राह निकालने की कोशिशें भी जोरों पर जारी है। यानि समग्रता में देखा जाये तो सरकार ने विपक्ष पर ‘साम दान भय भेद’ के सभी हथियारों का एक साथ ही प्रयोग कर दिया है लेकिन मसला यह है कि इन तमाम हथकंडों को अमल में लाये जाने के बावजूद जिस तरह से कांग्रेस के आक्रोश व आक्रामकता में जरा भी कमी नहीं दिख रही है उसके मद्देनजर अगर सरकार ने समय रहते किसी अन्य उपाय से इस मसले को हल करने की पहल नहीं की तो कल से आरंभ हो रहे संसद के मानसून सत्र में कुछ सकारात्मक परिणाम हासिल करने की उम्मीदें शायद ही परवान चढ़ सकें। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ 

बुधवार, 15 जुलाई 2015

‘सियासी सच्चाईयों को बेपर्दा करती इफ्तारी’

‘सियासत में जरूरी है रवादारी समझता है, वो रोजा तो नहीं रखता मगर इफ्तारी समझता है।’ वाकई अपने इस शेर के माध्यम से राहत इंदौरी साहब ने सियासी रवादारी की उस तल्ख हकीकत को ही उजागर किया है जिसे स्वीकार करना शायद ही कोई गवारा करता हो। सियासत में रोजा, जकात व नमाज सरीखे इंसान के मूलभूत दीनी फर्ज को भले ही कोई खास अहमियत नहीं दी जाती हो लेकिन यहां रोजेदारों का बड़ा महत्व है। क्योंकि रोजेदारों की आड़ में सियासी कूटनीतियों को परवान चढ़ाने का हथियार बनता है इफ्तार। तभी तो एक ओर विपक्ष को एकजुट करने के लिये सोनिया गांधी की ओर से इफ्तार की दावत दी जाती है तो दूसरी ओर अपनी छवि सुधारने के लिये आरएसएस भी इफ्तार का आयोजन करने से नहीं हिचकता है। दिल्ली की राजनीति में अपनी सियासी स्वीकार्यता बढ़ाने के लिये अरविंद केजरीवाल इफ्तार के लिये दस्तरखान बिछाते हैं तो बिहार में एनडीए की एकजुटता प्रदर्शित करने के लिये रामविलास पासवान के निवास पर इफ्तार का आयोजन होता है। यहां तक कि सियासत में कई दफा इफ्तार का आयोजन करने से परहेज बरत कर भी अपने साथियों व समर्थकों के बीच विशेष संदेश प्रसारित करने से परहेज नहीं बरता जाता। तभी तो पिछले दिनों जोर-शोर से यह संकेत प्रसारित करा दिया गया कि इस बार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ओर से कश्मीर में इफ्तार की दावत का आयोजन किया जाएगा। जाहिर है कि यह संदेश सामने आने के बाद मोदी सरकार के ‘सबका साथ सबका विकास’ के नारे को काफी मजबूती मिली लेकिन बाद में इस आयोजन के नतीजे में देश के बहुसंख्यक समुदाय की भावनाएं आहत होने के खतरे को देखते हुए बड़ी खामोशी व चतुराई से इस प्रस्ताव को बर्फ से लगा दिया गया। खैर, प्रधानमंत्री ने भले ही इफ्तारी के आयोजन से परहेज बरत लिया हो लेकिन सरकारी स्तर पर इस आयोजन की सफलता से जितना फायदा नहीं मिलता उससे कहीं अधिक लाभ भाजपा को विरोधी खेमे द्वारा आयोजित इफ्तारी के आयोजन की विफलता से हासिल हो गया है। सरकारी स्तर पर यह आयोजन होता तो स्वाभाविक तौर पर इसका मकसद विपक्षी एकता में सेंध लगाना और सरकार की स्वीकार्यता में इजाफा करना ही होता। लेकिन इसके नतीजे में देश के उस बहुसंख्यक समुदाय की भावनाएं आहत होने का भी खतरा था जिसका समर्थन हासिल करने के लिये लोकसभा चुनाव से पहले तक मोदी सार्वजनिक तौर पर खुद को हिन्दू राष्ट्रवादी राजनेता बताते नहीं थकते थे। खैर, बिहार में राजग के घटक रामविलास को आगे करके भाजपा ने इस मामले में एक तीर से दो शिकार कर लिया। अव्वल तो रामविलास द्वारा आयोजित इफ्तार के आयोजन में सूबे के तमाम शीर्ष नेताओं को मेहमान से बढ़कर मेजबान बनाकर भेजने की पहल करके पार्टी ने ‘सबका साथ सबका विकास’ के प्रति अपनी प्रतिबद्धता भी प्रदर्शित कर दी और आगामी चुनाव में राजग की एकजुटता का भी संदेश प्रसारित कर दिया। लेकिन भगवा खेमे को सबसे बड़ी राहत की सांस मुहैया करायी है विरोधियों की इफ्तारी कूटनीति की विफलता ने। खास तौर से पहले तो अरविंद केजरीवाल की दावत में दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के शिरकत करने के मसले को लेकर कांग्रेस के भीतर हुई सांगठनिक स्तर की भिड़ंत के कारण भाजपा के हित में यह संदेश प्रसारित हो गया कि सूबे की एएपी सरकार के साथ कांग्रेस का एक खेमा दोस्ती भी निभा रहा है और दूसरा दुश्मनी का भी दिखावा कर रहा है। यानि दिल्ली की सूबाई राजनीति में जमीनी स्तर पर मुख्य विपक्षी दल की भूमिका हथियाने की कांग्रेस की कोशिशों को इस पूरे प्रकरण से काफी हद तक पलीता लग गया जो भाजपा के लिये सुखकारी ही माना जाएगा। साथ ही बिहार में लालू व नीतीश द्वारा अपनी ताकत का मुजाहिरा करने के लिये अलग-अलग आयोजित किये गये इफ्तार के आयोजन का मामला भी भाजपा के लिये फायदेमंद ही रहा क्योंकि अव्वल तो इससे बिहार में धर्मनिरपेक्ष महागठजोड़ में जारी अंदरूनी टकराव व वर्चस्व की लड़ाई का पूरा सच सार्वजनिक हो गया और दूसरे विरोधी खेमे में एकमतता के अभाव का सकारात्मक लिटमस टेस्ट भी भाजपा के लिये राहत की खबर के तौर पर ही सामने आया। लेकिन भगवा खेमे को सबसे अधिक खुशी दी है कांग्रेस अध्यक्षा द्वारा विपक्षी एकजुटता के लिये पांच सितारा होटल में आयोजित इफ्तारी दावत की विफलता ने। सोनिया द्वारा बिछाये गये सियासी दस्तरखान पर तृणमूल ने ऐसा रायता फैलाया कि ना तो पूरे तौर पर वह खुद इसमें शामिल हुई और ना ही वामपंथी दलों के सामने वहां मौजूदगी दर्ज कराने का विकल्प खुला रहने दिया। साथ ही महज सवा घंटे में ही समाप्त कर दी गयी इस इफ्तार की दावत से मिले इस संदेश ने भगवा खेमे की बांछें खिला दी हैं कि सपा-बसपा, वाममोर्चा-तृणमूल, द्रमुक-अन्ना द्रमुक और राजद-जदयू सरीखे सनातन विरोधियों को जब दीनी आड़ में आयोजित गैरसियासी दस्तरखान पर एक साथ बिठा पाना कांग्रेस के लिये संभव नहीं हो पाया है तब संसद की सियासी जंग में वह कैसे इन सबों को सरकार के खिलाफ अपने मोर्चे में एकजुट कर पाएगी। खैर, इफ्तार की आड़ में अपनी जमीनी ताकत तौलने व सियासी समीकरण साधने के सभी दलों के प्रयासों के बीच इससे जाहिर होनेवाले संकेतों को ही अंतिम मान लेना उचित नहीं होगा क्योंकि असीमित संभावनाओं का खेल कही जानेवाली सियासत का ऊंट कब किस करवट बैठ जाये इसका कोई भरोसा नहीं किया जा सकता है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’    

शुक्रवार, 10 जुलाई 2015

‘क्या हासिल पीछे हटने से, आगे बढ़ो प्रहार करो’
नवकांत ठाकुर
ईद के सिवैयों की मिठास के साथ आरंभ होने जा रहे संसद के मानसून सत्र का जायका बेहद तीखा रहने का एलान तो विपक्ष ने पहले ही कर दिया है। मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने बेलाग लहजे में काफी पहले ही बता दिया था कि अगर सरकार ने प्रवर्तन निदेशालय द्वारा भगोड़ा घोषित किये जा चुके ललित मोदी की मदद करने के आरोपों में घिरी विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को उनके पद से नहीं हटाया तो वह संसद के सत्र को हर्गिज सुचारू ढंग से संचालित नहीं होने देगी। साथ ही व्यापम विवाद को लेकर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान को भी पद से हटाये जाने की जिद पर अड़े विपक्ष द्वारा इस मामले को लेकर भी संसद में जोरदार बवाल काटे जाने की पूरी संभावना है। इसके अलावा सरकार ने भूमि अधिग्रहण विधेयक के संशोधित प्रारूप को सदन से पारित कराने की जो जिद ठानी हुई है उससे भी विपक्ष को संसद में बवाल काटने का भरपूर मौका मुहैया होता दिख रहा है। साथ ही खाद्य पदार्थों की आसमान छू रही महंगाई से लेकर राष्ट्रीय सुरक्षा, मौसमी बाढ़-सुखाड़ व किसानों की समस्या सरीखे विभिन्न सदाबहार मामलों के तीर तो सरकार पर हमला करने के लिये विपक्ष की तूणीर में हमेशा ही पड़े रहते हैं। यानि अगर मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के मौजूदा तेवरों व तैयारियों को देखा जाये तो इस बार वह संसद को सुचारू ढंग से संचालित करने में सरकार का सहयोग करने के लिये कतई तैयार नहीं दिख रही है। हालांकि इसके लिये बाकी विपक्षी दलों को भी अपने साथ जोड़ने के प्रति कांग्रेस की ओर से अभी तक कोई औपचारिक प्रयास नहीं किया गया है लेकिन पार्टी का मानना है कि मौजूदा हालातों में बाकी विपक्षी दलों को अपने साथ जोउ़ने के लिये उसे विशेष परिश्रम करने की कोई जरूरत नहीं पड़ेगी बल्कि तमाम विरोधी दल खुद ही इन मामलों को लेकर उसके सुर में अपना सुर मिलाने के लिये आगे आ जाएंगे। अब कांग्रेस की यह अपेक्षाएं किस हद तक पूरी हो पाएंगी यह तो वक्त आने पर ही पता चलेगा लेकिन उसके इन हमलावर तेवरों को देखते हुए सरकार के संचालकों द्वारा जो  जवाबी रणनीति अपनाए जाने का संकेत मिल रहा है उसके तहत विपक्ष की ओर से होनेवाले हमलों का जोरदार प्रतिवाद करने की तैयारियां अभी से तेज कर दी गयी हैं। सूत्रों की मानें तो विपक्ष की घेरेबंदी से बचने के लिये किलाबंदी करके अपना बचाव करने के विकल्प को अमल में लाने के बजाय इस बार सरकारी खेमा भी ईंट का जवाब पत्थर से देने की पूरी तैयारी कर रहा है। इसी सिलसिले में एक ओर तो कांग्रेस को अलग थलग करके विपक्षी घेरेबंदी को कमजोर करने की रणनीति अपनायी जा रही है और दूसरी ओर कांग्रेस के हथियारों की धार को भोथरा करके उसकी ताकत कामजोर करने का भी प्रयास किया जा रहा है। साथ ही गैरकांग्रेसी विपक्षियों की कमजोरियों को हथियार बनाकर उनका अंदरूनी सहयोग व समर्थन हासिल करने की योजना भी बनायी जा रही है। इसी सिलसिले में जनता परिवार को शिकंजे में लेने के लिये सपा की कमजोरियों पर अपनी मजबूत पकड़ बनाने के मकसद से भाजपा ने राष्ट्रीय नेताओं की एक टोली को उत्तर प्रदेश भेजने की योजना बनायी है जो शाहजहांपुर में हुए पत्रकार जगेन्द्र की हत्या के मामले और बाराबंकी में थाने के भीतर महिला को जलाकर मार दिये जाने के मामले की पड़ताल करके संसद सत्र शुरू होने से पहले ही अपनी विस्तृत रिपोर्ट पार्टी अध्यक्ष को सौंप देगी। इसके अलावा व्यापम के मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सीबीआई जांच की अर्जी पर सकारात्मक फैसला सुनाए जाने का स्वागत करके भाजपा ने इस मसले का कांग्रेसी हथियार अभी से कुंद कर दिया है। रहा सवाल ललित मोदी से जुड़े मसलों का तो इस मामले में भी पार्टी ने हमलावर तेवर अख्तियार करते हुए तय किया है कि अगर कांग्रेस ने ललित के भाजपा कनेक्शन को तूल देकर संसद में हंगामा मचाने की पहल की तो इसके जवाब में ललित द्वारा किये गये कांग्रेस के शीर्ष परिवार से जुड़े खुलासों को लेकर उसे सवालों के कठघरे में खड़ा करने से कतई परहेज नहीं बरता जाएगा। इसके अलावा भूमि अधिग्रहण विधेयक के मामले में राज्यसभा की प्रवर समिति द्वारा प्रस्तुत की गयी सिफारिशों को स्वीकार कर लिये जाने के बाद भी अगर कांग्रेस ने इसे पारित करने में सहयोग नहीं किया तो पहली कोशिश तो सभी गैरकांग्रेसी दलों को अपने साथ जोड़कर इसे सदन से पारित कराने की ही होगी जिसके लिये किसी भी हथकंडे को अमल में लाने से कतई संकोच नहीं किया जाएगा। लेकिन अगर फिर भी बात नहीं बनी और इसे राज्यसभा का समर्थन नहीं मिल सका तो इस मामले में भी अब चुप बैठने के बजाय संसद का संयुक्त सत्र बुलाकर विधेयक को पारित कराने के विकल्प पर यथाशीघ्र अमल कर लिया जाएगा। यानि समग्रता में देखा जाये तो इस बार का मानसून सत्र बेहद जोरदार टकराव का गवाह बनने जा रहा है जिसमें कोई भी पक्ष जरा भी पीछे हटने के लिये तैयार नहीं दिख रहा है। बहरहाल, हमले के जवाब में आक्रमण की रणनीति अपनाये जाने को तो कतई गलत नहीं कहा जा सकता है लेकिन विपक्ष को विश्वास में लेकर संसद को सुचारू ढ़ंग से संचालित करने परंपरा के बदस्तूर क्षरण को कैसे सही कहा जा सकता है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’