बुधवार, 12 अगस्त 2015

‘खुद पर ही बरसता है क्यों खुद का गुस्सा’

नवकांत ठाकुर
‘फूल बरसे कहीं शबनम कहीं गौहर बरसे, और इस दिल की तरफ बरसे तो पत्थर बरसे, हम से मजबूर का गुस्सा भी अजब बादल है, अपने ही दिल से उठे अपने ही दिल पर बरसे।’ वाकई बशीर बद्र साहब की लिखी इन पंक्तियों का हर शब्द केन्द्र में सत्तारूढ़ भाजपा की सोच व मानसिक स्थिति को प्रतिबिंबित करता हुआ ही प्रतीत होता है। हकीकत तो यही है कि संसद के मौजूदा मानसून सत्र को सुचारू ढंग से संचालित करने व विभिन्न बहुप्रतीक्षित विधेयकों को सदन से पारित कराने में हाथ आयी नाकामी के मद्देनजर भगवाखेमे में आक्रोश व गुस्से की लहर दौड़ना तो स्वाभाविक ही है। तभी तो रोजाना के राजनीतिक मसलों के प्रति बेहद तटस्थ व निरपेक्ष नजर आनेवाले लालकृष्ण आडवाणी सरीखे भाजपा के शीर्षतम मार्गदर्शक पर भी तिमिलाहट व कसमसाहट का भाव आज इस कदर हावी दिखाई दिया कि उन्होंने संसदीय कार्यमंत्री वेंकैया नायडू के माध्यम से लोकसभा अध्यक्षा सुमित्रा महाजन को यह संदेश दिलाने में कोताही नहीं बरती कि सदन में जारी बवाल के प्रति उन्हें अपने सख्त रूख पर डटे रहना चाहिये। साथ ही सदन में जारी हंगामे के बीच आडवाणी का उदास व निराश होकर डबडबाई आंखों के साथ बाहर निकल आना भी यही दिखाता है कि संसद के मौजूदा हालातों ने सत्ताधारी खेमे को बुरी तरह विचलित कर दिया है। साथ ही संसद में जारी गतिरोध के सिलसिले ने जिस तरह से सरकार के हाथ-पांव बांध दिये हैं उसकी बेचैनी व छटपटाहट से भगवाखेमे के सब्र का बांध टूटने का ही नतीजा है कि आज सदन के वेल में आकर बैनर-पोस्टर लहराते हुए हंगामा मचा रहे विपक्षी सांसदों के बीच घुसकर बेहद आक्रोशित लहजे में कांग्रेस के शीर्ष नेताओं को ललकारने से उमा भारती भी खुद को नहीं रोक पायीं। वास्तव में अब मौजूदा मानसून सत्र के समाप्त होने में महज दो दिन का वक्त ही बाकी बच गया है और इस बात के आसार दूर-दूर तक नहीं दिखाई दे रहे हैं कि अंतिम दो दिनों में भी सदन में कोई ठोस कामकाज हो पाएगा। कहां तो सरकार को प्राथमिकता के तहत अगले वित्तीय वर्ष से देश में वस्तु व सेवाकर अधिनियम (जीएसटी) को लागू करने के लिये आवश्यक 122वें संविधान संशोधन को राज्यसभा से पारित कराना था, भूमि अधिग्रहण विधेयक में संशोधन के प्रारूप पर आमसहमति बनानी थी और रियल एस्टेट विधेयक पर संसद के सहमति की मुहर लगवानी थी। लेकिन विपक्ष ने ऐसा गतिरोध बनाया हुआ है कि किसी मसले पर कायदे से चर्चा कराने या ज्वलंत मसलों पर संबंधित मंत्रियों को विस्तार से अपना औपचारिक बयान प्रस्तुत करने में भी कामयाबी नहीं मिल पा रही है। हालांकि सरकार की ओर से लगातार ‘साम, दाम, दंड व भेद’ सरीखे तमाम हथकंडे अपनाए गये लेकिन ‘मर्ज बढ़ता गया ज्यों-ज्यों दवा की।’ इसीका नतीजा है कि राज्यसभा में सबसे अधिक संख्याबल के दम पर कांग्रेस ने कोई कामकाज नहीं होने दिया है जबकि लोकसभा में भी सबसे बड़ा विपक्षी दल होने के नाते उसने सरकार की नाक में दम किया हुआ है। ऐसे में समस्या है कि सरकार करे भी तो क्या करे। बाकी विधेयकों को तो आगामी शीत सत्र के लिये भी टाला जा सकता है लेकिन अगर जीएसटी को अगले सत्र के लिये टालने की नौबत आयी तो अगले वित्तीय वर्ष से देश में इसे लागू करना नामुमकिन की हद तक मुश्किल हो जाएगा। इसका सीधा असर देश के अर्थव्यवस्था की रफ्तार पर पड़ना पूरी तरह है क्योंकि मौजूदा हालातों में रिजर्व बैंक ने देश की जीडीपी तकरीबन साढे सात फीसदी रहने का जो अनुमान व्यक्त किया है उसमें जीएसटी के लागू होने पर न्यूनतम ढाई फीसदी की वृद्धि होना तय है। लेकिन वह तभी संभव है जब पहले तो संसद के दोनों सदनों में दो तिहाई समर्थन से इसे पारित कराया जाए और उसके बाद देश की कम से कम 15 विधानसभा भी इस पर अपनी सहमति की मुहर लगाए। हालांकि कहने को तो वित्तमंत्री ने कह दिया है कि अगर कांग्रेस ने इसे अगले दो दिनों में पारित करने में सहयोग नहीं किया तो सरकार के पास इसे सदन से पारित कराने के और भी रास्ते हैं जिसमें संसद की विशेष बैठक बुलाया जाना भी शामिल है। लेकिन हकीकत यही है कि यह केवल कहने की ही बात है जो तिलमिलाहट की हालत में वित्तमंत्री ने कह दिया है वर्ना जिस विपक्ष ने पूरे सत्र में इसे पारित नहीं होने दिया है वह विशेष बैठक में इसे पारित करने में सरकार का सहयोग करगी, इसका क्या गारंटी है। लेकिन मसला है कि सरकार इसमें चाह कर भी कुछ नहीं कर सकती। सिवाय तिलमिलाने, छटपटाने व बिलबिलाने के। यही तिलमिलाहट व छटपटाहट ऐसे गुस्से के तौर पर सामने आ रही है जिसमें ना सिर्फ प्रधानमंत्री खुद भी कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को देश के विकास में अवरोधक बता रहे हैं बल्कि वेंकैया नायडू व अरूण जेटली से लेकर सत्तापक्ष के तमाम वरिष्ठ-कनिष्ठ नेतागण कांग्रेस के शीर्ष संचालक परिवार को अपने सीधे निशाने पर लेने से परहेज नहीं बरत रहे हैं। खैर, तयशुदा योजनाएं पूरी नहीं हो पाने और चाह कर भी कुछ नहीं कर पाने की तिलमिलाहट से आक्रोश व गुस्से का पनपना तो स्वाभाविक ही है लेकिन हकीकत यही है कि अपनी ही नाकामियों के नतीजे में पनपे इस गुस्से का नुकसान तो खुद को ही झेलना पड़ेगा, किसी और की सेहत पर इससे कोई फर्क नहीं पड़नेवाला। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’  

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