बुधवार, 5 अगस्त 2015

‘बिना धागे की सुई से कैसे हो सिलाई......’

नवकांत ठाकुर
कपड़ा सिलने के लिये सुई का सख्त होना तो आवश्यक है लेकिन यह सख्ती  सिलाई में तभी सहायक हो सकती है जब सुई के पीछे लगा लचीला धागा कपड़े के दोनों कटे-फटे व अकड़े हुए किनारों को जकड़कर गूंथ दे। दूसरे शब्दों में कहें तो कटे-फटे किनारों को मजबूती के साथ जोड़ने के लिये सुई की सख्ती तो आवश्यक है लेकिन यह सख्ती लचीले धागे की गैरमौजूदगी में किसी काम नहीं आ सकती। सुई से तो महज सिलाई की शुरूआत ही संभव है। जोड़ने का काम तो धागा की करता है। कल्पना कीजिये कि सुई के पीछे धागा हो ही ना तो सिलाई की कोशिश का अंजाम कैसा होगा? ठीक यही हालत हो रही है केन्द्र सरकार की नीतियों के साथ भी। दरअसल मौजूदा सियासी गतिरोध व टकराव के बीच विपक्ष को अपने साथ जोड़ने की तमाम कोशिशें नाकाम रहने की असली वजह यही है कि सत्तापक्ष ने अपनी सख्त नीतियों की सुई के पीछे सुलह-समझौते का लचीला धागा पैवस्त ही नहीं किया है। नतीजन सख्ती की सुई इस मुगालते में लगातार आगे बढ़ती जा रही है कि उसके द्वारा लगाया गया टांका पूरी तरह कारगर व मजबूत रहेगा लेकिन हो यह रहा है कि सिलाई की कोशिश में सुई तो खरामा-खरामा आगे बढ़ती चली जा रही है लेकिन उसके पीछे विपक्ष के साथ सत्तापक्ष के रिश्तों का कटा हुआ हिस्सा कटे का कटा ही छूटता जा रहा है। इसी सिलसिले में पहले तो कांग्रेसशासित राज्यों में हुए घपले-घोटाले के मामलों को राष्ट्रीय स्तर पर तूल देकर विपक्ष को शर्मसार करने की भरपूर कोशिश की गयी। लेकिन जब कांग्रेस की सेहत पर इससे कोई फर्क नहीं पड़ा तो पार्टी के शीर्ष संचालक परिवार पर निजी हमला करके उसकी साख व प्रतिष्ठा को धूमिल करने की कोशिश की गयी। इसी क्रम में राहुल गांधी के खिलाफ कानूनी मुकदमा दर्ज कराने की धमकी देने के साथ ही राबर्ट वाड्रा व प्रियंका गांधी पर जमीन घोटाले का आरोप मढ़ने व उन्हें कानूनी प्रक्रिया में उलझाने की कोशिश हुई। राबर्ट के खिलाफ संसद की अवमानना का नोटिस देने से भी परहेज नहीं बरता गया। यहां तक कि कांग्रेस अध्यक्षा की ओर उंगली उठाकर सदन में उन्हें अपने दामाद के कथित करतूतों की जवाबदेही लेने के लिये मजबूर करने का प्रयास भी हुआ। लेकिन सत्तापक्ष की इन हरकतों से जब विपक्ष के गुस्से की आग में लगातार इजाफे का ही सिलसिला देखा गया तो आखिर में कांग्रेस के 44 में से 25 लोकसभा सदस्यों को कल पांच दिनों के लिये सदन से निलंबित भी कर दिया गया। हालांकि सरकार की दलील है कि कांग्रेसी सांसदों को निलंबित करने का फैसला लोकसभा अध्यक्षा सुमित्रा महाजन ने खुद ही किया है लेकिन कांग्रेस का आरोप है कि सुमित्रा ने सरकार के दबाव में यह फैसला लिया है। हालांकि लोकसभा अध्यक्ष के पद पर बैठे हुए व्यक्ति से अपेक्षा तो यही की जाती है कि वह दलगत राजनीति से अलग रहकर पूरी तरह निष्पक्ष रहेगा लेकिन एक तथ्य यह भी है कि लोकसभा अध्यक्ष के पद पर बैठे हुए व्यक्ति का वैचारिक व राजनीतिक जुड़ाव अक्सर सत्तापक्ष के साथ ही रहता है लिहाजा सरकार के दबाव व इशारे का असर उसके फैसलों व कामकाज पर दिखना लाजिमी ही है। खैर, लोकसभा अध्यक्षा के फैसलों का असर यह हुआ है कि कल तक सुषमा स्वराज, वसुंधरा राजे व शिवराज सिंह चैहान के इस्तीफे की जिद ठानने के कारण सदन में अलग-थलग पड़ती दिख रही कांग्रेस को नये सिरे से अन्य विपक्षी ताकतों के सहयोग व सहानुभूति की संजीवनी मिल गयी है। इससे कांग्रेस का उत्साह इस कदर बढ़ गया है कि उसने संसद को बाधित रखने की रणनीति में बदलाव के सैद्धांतिक फैसले को अमल में लाने से पहले ही दफन करने की राह पकड़ ली है। दूसरी ओर अपनी सख्त नीतियों के कारण पैदा हुई असहज स्थिति ने सत्तापक्ष को पूरी तरह बैकफुट पर ला दिया है। अब तो सरकार का प्रयास है कि किसी तरह कांग्रेसी सांसदों का निलंबन स्थगित हो ताकि मौजूदा बवाल व बदनामी से निजात मिल सके। दरअसल सरकार ने जब विपक्ष की जिद के जवाब में जोरदार पलटवार की नीति अपनाई थी तब उसका मानना था कि ईंट का जवाब पत्थर से मिलने पर विपक्ष दबाव में आ जाएगा और उसके साथ सुलह समझौते की राह तैयार करना आसान हो जाएगा। हालांकि शुरूआत में ऐसा हुआ भी और विपक्ष ने समझौते के लिये अपना कदम आगे बढ़ाने की पहल भी की लेकिन इससे सत्तापक्ष को लगने लगा कि अगर दबाव में अधिक इजाफा कर दिया जाये तो इस्तीफे की जिद छोड़कर जेपीसी के गठन की मांग उठाने का संकेत दे रहा विपक्ष अपनी तमाम शर्तें वापस ले लेगा और सरकार के सहूलियत की शर्तों पर संसद के संचालन में सहभागी बनना स्वीकार कर लेगा। इसी सोच के तहत ऐन मौके पर समझौते की बातें आगे बढ़ाने के बजाय सरकार ने विपक्ष पर दबाव बढ़ाने की राह पकड़ ली। नतीजन अब उसकी हालत यह हो गयी है कि ‘ना खुदा ही मिला ना विसाले सनम, ना इधर के रहे ना उधर के रहे।’ खैर, अब तक के पूरे घटनाक्रम से सबक लेते हुए अगर सत्तापक्ष ने अब भी सख्ती से समस्या सुलझाने की राह छोड़कर समझौते के लिये आवश्यक लचीलापन दिखाने की पहल नहीं की तो संसद का मौजूदा सत्र गतिरोध व हंगामे में ही जाया हो जाना पूरी तरह तय है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ 

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