‘सहमति के चूल्हे में साझा समस्याओं का जलावन’
नवकांत ठाकुर
संसद में जारी गतिरोध की बर्फ पिघलाने के लिये सहमति का चूल्हा सुलगाने के प्रति सत्तापक्ष व विपक्ष के बीच जो सैद्धांतिक सहमति बनती दिख रही है उसके लिये अब साझा समस्याओं के जलावन की तलाश काफी तेज हो गयी है। वैसे भी दोनों पक्षों को अब बेहतर समझ में आ गया है कि मौजूदा गतिरोध को दूर करने के लिये अपनी जिद का खूंटा तोड़कर आगे बढ़ने के अलावा दूसरा कोई विकल्प ही नहीं है। हालांकि सहमति का मिलाप तभी संभव है जब किसी के भी हितों के क्षेत्र में दूसरा पक्ष अतिक्रमण ना करे और दोनों ही पक्ष परस्पर गले मिलने के लिये अपने जिद की सरहद से बाहर निकल कर बराबर आगे बढ़ें। इसमें अब तक जो फार्मूला सामने आया है उसके तहत कांग्रेस ने संकेत दिया है कि अगर प्रधानमंत्री की ओर से व्यापम व ललित गेट की जांच के लिये संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के गठन की घोषणा कर दी जाये तो संसद में जारी गतिरोध का समाधान आसानी से निकल सकता है। दूसरी ओर सत्तापक्ष की ओर से संकेत दिया जा रहा है कि सदन में किसी भी नियम के तहत किसी भी मसले पर चर्चा कराने के एवज में संसद को सुचारू ढंग से चलाने के लिये विपक्ष अपनी सहमति दे तो उस चर्चा के लिये अपनी सहमति देने में सरकार कतई देर नहीं करेगी। यानि बात इतनी तो बढ़ ही गयी है कि विपक्ष ने सुषमा स्वराज, वसुंधरा राजे व शिवराज सिंह चैहान के इस्तीफे की जिद छोड़कर जेपीसी की जांच से ही संतुष्ट हो जाने पर अपनी सहमति दे दी है जबकि सत्तापक्ष ने मतदान के नियम के तहत भी सदन में किसी भी मसले पर चर्चा कराने के प्रति हामी भर दी है। लिहाजा अब समझौते की पटकथा इन्हीं दोनों फार्मूलों के बीच से निकलना लगभग तय है। इसमें एक बात तो साफ है कि राज्यसभा में विपक्ष के नेता गुलाम नबी आजाद के मुताबिक सरकार को केवल कोरी चर्चा व सूखी बहस के एवज में ही मौजूदा गतिरोध से निजात नहीं मिल सकती है बल्कि इसके लिये उसे किसी ठोस कार्रवाई की प्रस्तावना देनी पड़ेगी जबकि सत्तापक्ष की मानें तो व्यापम व ललित गेट के मसले की जेपीसी से जांच कराने का कोई औचित्य ही नहीं है। संसदीय कार्यमंत्री वेंकैया नायडू के मुताबिक व्यापम की जांच सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर सीबीआई को सुपुर्द कर दिये जाने के बाद अब अलग से इसके लिये जेपीसी गठित करने का कोई मतलब ही नहीं है। इसी प्रकार ललित मोदी को मदद पहुंचाने के मामले में सुषमा स्वराज व वसुंधरा राजे की संलिप्तता की जांच के लिये भी जेपीसी का गठन करना संभव नहीं है क्योंकि अव्वल तो सुषमा ने ललित मोदी को यात्रा दस्तावेज उपलब्ध कराने में सीधे तौर पर कोई मदद नहीं की थी बल्कि उन्होंने ब्रिटेन की सरकार को केवल इतना ही कहा था कि अगर नियम कायदों का अनुपालन करते हुए उसे यात्रा करने की इजाजत दी जाती है तो इससे भारत व ब्रिटेन के संबंधों पर कोई असर नहीं पड़ेगा। साथ ही सुषमा ने यह बात इंसानियत के नाते केवल इस वजह से कही थी क्योंकि पत्नी के कैंसर का इलाज कराने के लिये मोदी के लिये ब्रिटेन से बाहर जाना अनिवार्य हो गया था। इसी प्रकार वसुंधरा द्वारा मोदी को पहुंचाई गयी मदद के मामले की जांच भी जेपीसी नहीं कर सकती क्योंकि नियम के तहत या तो सरकारी पैसे के दुरूपयोग व गबन की जांच के लिये या फिर किसी संवैधानिक पद पर बैठे हुए व्यक्ति द्वारा की गयी असंवैधानिक, अनैतिक व गैरकानूनी आचरण की पड़ताल के लिये ही जेपीसी का गठन हो सकता है जबकि जिस दौरान वसुंधरा द्वारा मोदी को मदद पहुंचाए जाने की बात सामने आयी है उस वक्त ना तो वह किसी संवैधानिक पद पर थी और ना ही उन्होंने कानून या संविधान के दायरे का उल्लंघन किया है। यानि समग्रता में देखें तो ना तो सुषमा, वसुंधरा व शिवराज के मामले की जांच के लिये जेपीसी का गठन करना सरकार को गवारा है और ना ही केवल कोरी चर्चा का आश्वासन पाकर विपक्ष अपनी जिद से पीछे हटने के लिये तैयार है। ऐसे में सहमति का फार्मूला इन दोनों से अलग ही बनना है जिसमें यह सहमति भी बन सकती है कि ललित मोदी द्वारा अंजाम दिये गये मनी लाॅन्ड्रिंग की प्रवर्तन निदेशालय द्वारा की जा रही जांच को आगे बढ़ाते हुए उसे जेपीसी के हवाले कर दिया जाये। वैसे भी मोदी ने जितना नुकसान भाजपा की छवि को पहुंचाया है उतना ही उसके बयानों से कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की छवि को भी आघात पहुंचा है। लिहाजा उसके खिलाफ जेपीसी की मांग स्वीकृत हो जाने से कांग्रेस के अहम की भी संतुष्टि हो जाएगी क्योंकि उसको मदद पहुंचाने के कारण ही सुषमा व वसुंधरा के इस्तीफे की मांग उठायी जा रही थी जबकि मोदी को जांच के जाल में फांसकर उसे उसके करतूतों की सजा दिलाने से सत्तापक्ष का बदला भी पूरा हो जाएगा। खैर, अभी साझा सरोकार के ऐसे कई और भी फार्मूले सामने आ सकते हैं। लेकिन मसला यह है कि यथाशीघ्र किसी फार्मूले पर आम सहमति बनाने की तत्परता नहीं दिखाये जाने के नतीजे में अगर मौजूदा मानसून सत्र हंगामे की भेट चढ़ने की नौबत आयी तो इसका नकारात्मक प्रभाव सरकार के कामकाज, विपक्ष की छवि व देश के विकास पर एक समान ही पड़ेगा। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’
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