‘बिना ढ़ाल तलवार के हुंकार भी बेकार’
नवकांत ठाकुर
जंग छेड़ने से पहले अपने हथियारों व सुरक्षा उपकरणों की पूरी बारीकी से जांच पड़तान नहीं करने का नतीजा कितना घातक हो सकता है इसकी बेहतरीन मिसाल आज संसद में देखने को मिली। दरअसल ललित मोदी के जिस मामले को लेकर कांग्रेस ने देश की सियासत में भारी तूफान खड़ा करते हुए संसद के मौजूदा मानसून सत्र को भी पूरी तरह बर्बाद कर दिया उसकी अंतिम परिणति इस कदर ‘खोदा पहाड़ निकली चुहिया’ सरीखी होगी इसकी कल्पना तो शायद किसी ने भी नहीं की थी। खास तौर से तमाम विपक्षी दलों के मशविरे को दरकिनार करते हुए कांग्रेस द्वारा इस मुद्दे पर विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के इस्तीफे की जिद ठानना और संसद से सड़क तक चल रहे आंदोलन की अगुवाई करने के लिये कांग्रेस के शीर्ष संचालक परिवार का मैदान में उतर आना इसी बात का संकेत दे रहा था कि यह मामला जब पूरी तरह खुलेगा तो इसकी मार कईयों पर बहुत तगड़ी पड़ेगी। यहां तक कि खुद सोनिया द्वारा सुषमा को नौटंकीबाज बताया जाना और राहुल गांधी द्वारा उन पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया जाना भी यही बता रहा था कि इस मामले में कांग्रेस के पास बेहद पुख्ता तथ्य, सबूत व जानकारी उपलब्ध है। साथ ही राहुल ने सुषमा को अपराधी करार देते हुए उनसे यह भी पूछ लिया था कि उनके परिवार के लोगों के खाते में ललित के बैंक खाते से कितनी रकम आयी है। जाहिर है कि सुषमा पर लगाये गये भ्रष्टाचार के इस इल्जाम के बाद समूचे भगवा खेमे से यही अपेक्षा थी कि उसके तमाम वरिष्ठ-कनिष्ठ नेतागण सुषमा के बचाव में संसद से सड़क तक बेहद आक्रामक मोर्चा खोलने में कोई कसर नहीं छोड़ेगे। लेकिन अब इसे अंदरूनी राजनीति कहें या तयशुदा रणनीति का हिस्सा, हुआ यह कि राहुल द्वारा भ्रष्टाचार का इल्जाम लगाये जाने के बाद पार्टी के तमाम वरिष्ठ नेताओं ने इस मसले पर कोई ठोस सफाई पेश करना गवारा ही नहीं किया। यानि दूसरे शब्दों में कहें तो इस पूरे विवाद को लेकर संदेहों के वातावरण को पुख्ता करने में ना तो कांग्रेस ने कोई कसर छोड़ी और ना ही भाजपा के शीर्ष रणनीतिकारों ने। लेकिन आज लोकसभा में कार्यस्थगन प्रस्ताव के तहत हुई औपचारिक बहस के बाद जब पूरी हकीकत सामने आयी और दूध का दूध और पानी का पानी हो गया तब पूरे प्रकरण के औपचारिक, व्यावहारिक व प्रामाणिक पटाक्षेप के वक्त कांग्रेस इस कदर असहाय व अलग-थलग दिखी कि कुछ धुर भाजपाविरोधी दलों के अलावा उसको सांत्वना देने के लिये भी कोई आगे नहीं आया। यहां तक कि पूरी चर्चा को मुकम्मल अंजाम तक पहुंचाने के क्रम में वित्तमंत्री अरूण जेटली ने राहुल गांधी को अपने सीधे निशाने पर लिया और उनके खिलाफ बेहद सख्त व निजी टिप्पणियां करने की पहल की तो इस दौरान विपक्षी बेंच पर पूरी तरह शांति व खामोशी छायी रही। वास्तव में देखा जाये तो जिस मामले को कांग्रेस ने सरकार के खिलाफ ब्रह्मास्त्र के तौर पर इस्तेमाल करते हुए आर-पार का निर्णायक जंग छेड़ा हुआ था उसकी सटीकता व मारकता की अगर पहले ही पूरी तरह जांच-पड़ताल कर ली गयी होती तो आज उसे ऐसी नौबत हर्गिज नहीं झेलनी पड़ती। लेकिन हुआ यह कि उसने जंग में उतरने से पहले ना तो अपने हथियार की पड़ताल की और ना ही अपनी सुरक्षा के लिये ढ़ाल-कवच साथ रखने की परवाह की। नतीजन बिना मारक हथियार व पुख्ता ढ़ाल के ही विरोधी खेमे को निपटा देने की हुंकार पूरी तरह बेकार चली गयी। वास्तव में कांग्रेस की पूरी व्यूह रचना इस बात को आधार मानकर की गयी थी ललित मोदी बहुत बड़ा अपराधी है जिसे यात्रा दस्तावेज उपलब्ध कराने में मदद पहुंचाकर सुषमा ने और उसे अदालत से राहत दिलवाकर उनकी बिटिया ने बहुत बड़ा अपराध कर दिया है। लेकिन जब पूरे तथ्यों का छिलका उतरा तो यही पता चला कि पिछले महीने तक ललित के खिलाफ कोई ऐसी सरकारी या कानूनी कार्रवाई चल रही थी जिसके तहत उसे एक मिनट के लिये भी हिरासत में लिया जा सकता हो। साथ ही सुषमा की बिटिया द्वारा अधिवक्ता की हैसियत से अदालत में ललित का पक्ष रखे जाने के एवज में पैसा लेने की जो बात कही जा रही थी वह भी निराधार ही साबित हुई क्योंकि वह मुकदमा तो उस सीनियर वकील ने लड़ा था जिसकी जूनियर के तौर पर सुषमा की बिटिया वकालत का ककहरा सीख रही थी। खैर, भले ही इस पूरे विवाद में संसद का मानसून सत्र पूरी तरह धुल गया हो लेकिन गनीमत रही कि आखिर में सबने इस पर चर्चा कर ली और सारी बातें साफ हो जाने के बाद सियासी आसमान बिल्कुल साफ व चमकीला हो गया। लेकिन इस पूरे प्रकरण से दोनों पक्षों को यह सबक लेने की जरूरत है कि सियासी रंजिश निपटाने के लिये कोई भी जंग छेड़ने से पहले अपने ढ़ाल-तलवार की मजबूती व मारकता का बारीकी से मुआयना कर लें और मामला कितना ही बड़ा व गंभीर क्यों ना हो लेकिन बातचीत का झरोखा ही नहीं बल्कि दरवाजा भी खुला रखें। वर्ना, जिस तरह से इस मामले में कांग्रेस की साख को बट्टा लगा है, सरकार के कामकाज का नुकसान हुआ है, देश के विकास की गति बाधित हुई है और संसद का वक्त ही नहीं बल्कि इस पर खर्च होनेवाली रोजाना दो करोड़ के रकम की भी बर्बादी हुई है वैसी नौबत दोबारा कभी भी सामने आ सकती है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’
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