शुक्रवार, 14 अगस्त 2015

‘सियासी संतुलन के लिये तीसरे मोर्चे की तिकड़म’

नवकांत ठाकुर
भारी गतिरोध, हंगामे, शोर-शराबे और उठापटक के बीच किसी ठोस विधायी कार्य को अंजाम तक पहुंचाए बिना ही अपने अवसान तक पहुंचे संसद के मानसून सत्र ने यह सीख तो अवश्य दी है कि कांग्रेसनीत संप्रग व भाजपानीत राजग के बीच अगर किसी तीसरी निष्पक्ष ताकत को जगह नहीं मिली तो भविष्य में भी संसद का माहौल नकारात्मक ही रहने की संभावना से कतई इनकार नहीं किया जा सकता है। हकीकत तो यही है कि राजग व संप्रग की अडि़यल व अक्खड़ कूटनीतियों के कारण ही इस सत्र के साढ़े तीन हफ्ते का पूरा अर्सा हंगामे की ही भेंट चढ़ गया। दोनों में से किसी भी पक्ष ने अंतिम समय तक ना तो रत्ती भर भी दबना या झुकना गवारा किया और ना ही इन्हें कभी यह एहसास हुआ कि इनकी आपसी रंजिश में बाकी दलों के हितों की किस कदर बलि चढ़ रही है। सच तो यही है कि पूरे सत्र के दौरान भाजपा व कांग्रेस के साथ समानांतर दूरी कायम रखनेवाले दलों का हित पूरी तरह हाशिये पर ही रहा और इनकी आवाज नक्कारखाने में तूती की मानिंद पूरी तरह दब कर रह गयी। जहां एक ओर केन्द्र सरकार के खिलाफ आर-पार की लड़ाई का एलान करनेवाली कांग्रेस ने इनको विश्वास में लेकर अपनी रणनीति तय करने के बजाय ‘एकला चलो’ की राह पकड़ ली वहीं भाजपा ने भी संसद में जारी गतिरोध का तोड़ निकालने के लिये इनके साथ तालमेल बिठाने की पहल करना गवारा नहीं किया। हालांकि संसद के दोनों सदनों का आंकड़ा भी ऐसा है कि राज्यसभा में कांग्रेस के सांसदों की तादाद भाजपानीत राजग के संयुक्त संख्याबल से भी अधिक है जबकि लोकसभा में भाजपा खुद ही अपने दम पर पूर्ण बहुमत हासिल कर चुकी है। यानि कांग्रेस के नजरिये से देखा जाये तो राज्यसभा में सत्तापक्ष की मनमानियों पर लगाम कसने के लिये उसे किसी अन्य के सहायता या सहयोग की आवश्यकता ही नहीं है जबकि लोकसभा में समूचे विपक्ष की भी इतनी हैसियत नहीं है कि वह सामान्य विधायी कार्य निपटाने में सरकार की राहों में अड़ंगा डाल सके। लिहाजा राज्यसभा में जब वह खुद ही सरकार की राह रोकने में पूरी तरह सक्षम है और लोकसभा में सिर्फ हंगामा मचाने या बवाल काटने के अलावा ठोस तरीके से सरकार की मनमानी में अड़ंगा डालना संभव ही नहीं है तो फिर स्वाभाविक तौर पर अपनी सियासी राह तय करने के लिये कांग्रेस को किसी और को साथ लेने की जरूरत ही क्या है। दूसरी ओर भाजपा के नजरिये से देखें तो अव्वल तो लोकसभा में वह खुद ही अपनी मनमानी करने में पूरी तरह सक्षम है जबकि राज्यसभा में बाकी विपक्ष के सहयोग व समर्थन का उसे तब तक कोई लाभ नहीं मिल सकता है जब तक कांग्रेस भी सदन की शांति-व्यवस्था कायम रखने में सहयोगी ना बने। जाहिर है कि जब संसद के दोनों सदनों का समीकरण पूरी तरह इन्हीं दोनों दलों पर केन्द्रित है तो इन दोनों की सियासत भी एक-दूसरे पर ही केन्द्रित होना लाजिमी ही है। वैसे भी संप्रग व राजग के अलावा बाकी दलों की स्थिति पूरी तरह छिन्न-भिन्न व बिखरी हुई है और अपने हितों व अपेक्षाओं को पूरा करने के लिये इन दोनों बड़े ध्रुवों में से किसी एक के साथ सम्बद्ध व सहमत होने के अलावा इनके पास दूसरा कोई विकल्प ही नहीं है। तभी तो पूरा मानसून सत्र कांग्रेस व भाजपा की आपसी रंजिश की भेंट चढ़ जाने के बावजूद बाकी दलों का पक्ष जानना-समझना भी जरूरी नहीं समझा गया। हालांकि इसी समस्या का समाधान करने के लिये पिछले दिनों जनता परिवार के एकीकरण की नींव डालने की कोशिश अवश्य हुई थी लेकिन अव्वल तो जनता परिवार के जिन छह सहोदरों ने एक मंच पर आने की सैद्धांतिक सहमति दी थी उनके बीच सैद्धांतिक व व्यावहारिक मतभेद की खाई इतनी गहरी है कि उसे पाट पाना नामुमकिन की हद तक मुश्किल है और दूसरे इन सबों के एक मंच पर आने के बाद भी संसद में इनकी सदस्य संख्या नगण्य व निष्प्रभावी ही रहनी है। तभी तो अब नये सिरे से तीसरे मोर्चे के गठन की नींव डाली जा रही है जिसमें शुरूआती तौर पर जनता परिवार के अलावा राकांपा, तृणमूल कांग्रेस व एएपी को साथ लाने का प्रयास किया गया है। साथ ही इसका असली जुटान आगामी 22 सितंबर को दिल्ली में होगा जिसमें एकजुट होने के लिये तमाम गैरभाजपा व गैरकांग्रेस शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों को आमंत्रित किया जा रहा है। वास्तव में देखा जाये तो इन दिनों जहां एक ओर कांग्रेस की कथित आत्मकेन्द्रित राजनीति ने भाजपा को बुरी तरह दुखी किया हुआ है वहीं भाजपा की कथित मनमानी व तानाशाही सियासत को स्वीकार करना कांग्रेस को भी नागवार गुजर रहा है। साथ ही इन दोनों पक्षों के अडि़यल व अक्खड़ रवैये से सियासत में सहमति व संतुलन की कोई राह निकालना भी टेढ़ी खीर साबित हो रही है। ऐसे में दोनों ही पक्षों द्वारा इस तीसरी ताकत के अभ्युदय को सकारात्मक सहयोग व समर्थन मिलना लाजिमी ही है। लेकिन इस पूरे समीकरण में आशंका सिर्फ इस बात की है कि ढ़ाई दशक के बाद गठबंधन सरकार की मजबूरी समाप्त होने के बाद क्षेत्रीय दलों की सौदेबाजी से जो निजात हासिल हुई है वही दौर दोबारा ना लौट आए और संतुलन के लिये कायम हो रहा तीसरा मोर्चा सौदेबाजी के लिये अस्तित्व में आया गिरोह बनकर ना रह जाये। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’    

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