‘मनवा कहै धरम, सिर पै चढ़े करम’
नवकांत ठाकुर
केन्द्र की भाजपानीत राजग सरकार की मौजूदा कार्यप्रणाली बिल्कुल वैसी ही दिख रही है जिसके बारे में संत कबीर ने लिखा है कि ‘मनवा तो फूला फिरै, कहै जो करूं धरम, कोटि करम सिर पै चढ़े, चेति न देखे मरम।’ अपने मन से बेहतरीन काम करने के प्रति यह सरकार पूरी तरह निश्चिंत है। इसके लिये ना तो इसे किसी के परामर्श की आवश्यकता होती है और ना ही साथ या सहयोग की। तभी तो कांग्रेस के 25 सांसदों को पांच दिनों के लिये सदन से निलंबित किये जाने के विरोध में लोकसभा की बैठक का बहिष्कार कर रहे विपक्षी दलों के प्रति अपने आक्रोश का इजहार करते हुए केन्द्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद औपचारिक तौर पर यह बताने में कोई कोताही नहीं बरतते हैं कि विधायी कार्य संपादित करने के लिये उनकी सरकार को विपक्ष के सहयोग या समर्थन की कोई जरूरत नहीं है। जाहिर है कि जिस सरकार के मंत्रियों की मानसिकता इस कदर आत्मकेन्द्रित व ‘एको अहं द्वितीयं नास्ति’ सरीखी होगी उस पर मनमानी व तानाशाही बरतने का आरोप तो लगेगा ही। अपनी सोच को ही पूरा सही मानने की इसी मानसिकता के तहत वरिष्ठ केन्द्रीय मंत्री वेंकैया नायडू ने नरेन्द्र मोदी को देश के लिये भगवान का वरदान भी करार दे दिया। जाहिर है कि सत्तापक्ष की ऐसी सोच से विपक्ष तो कतई इत्तफाक नहीं रख सकता है। लेकिन सत्तापक्ष की जिद है कि विपक्ष भी उसकी सोच को ही पूरा सच माने। उसके द्वारा किये जानेवाले हर काम का दिल खोलकर गुणगान करे। लेकिन मसला यह है कि जब सत्ता में बैठे लोग किसी भी मसले पर ना तो विपक्ष से सलाह-मशविरा करते हों और ना ही संबंधित मामले से जुड़े पक्षों व विभागों को विश्वास में लेना या उसके साथ सूचनाएं साझा करना गवारा कर रहे हों तो ऐसे में उनकी पहलकदमियों का आंख मूंदकर गुणगान करना कैसे संभव है। मिसाल के तौर पर संसद में सुषमा स्वराज ने ललित मोदी के मसले पर जो बयान दिया है वह बेशक बेहद भावनात्मक व मानवीय सरोकारों से लबरेज हो और उन्होंने ब्रिटिश सरकार को जो पत्र लिखा था उसमें किसी नियम, कायदे व दायरे का उल्लंघन नहीं किया गया हो। लेकिन इस सच को कैसे झुठलाया जा सकता है कि विदेशमंत्री की हैसियत से उन्होंने ब्रिटिश सरकार को जो पत्र लिखा था उसके बारे में ना तो उन्होंने तत्कालीन विदेश सचिव सुजाता सिंह को कोई जानकारी दी और ना ही ब्रिटेन स्थित भारतीय दूतावास को कुछ बताना जरूरी समझा। ऐसे में विदेशमंत्री की हैसियत से स्वघोषित तौर पर कैंसर की बीमारी से जूझ रही ललित की पत्नी की मदद करने के लिये कथित मानवीय आधार पर की गयी पहलकदमी सही थी या गलत इस पर भले ही बहस की गुंजाइश दिखती हो लेकिन उन्होंने जिस मनमाने तरीके से इस काम को अंजाम दिया उसे कैसे सही कहा जा सकता है। इसी प्रकार पूर्वोत्तर राज्यों में दशकों से जारी अलगाववादी लड़ाई पर विराम लगाने के लिये प्रधानमंत्री ने जो नागा समझौता किया है उसे भले ही ऐतिहासिक व बेहतरीन मानने से कोई भी संकोच ना करे लेकिन इस समझौते को साकार रूप देने की प्रक्रिया में किसी भी सूबे की सरकार को शामिल करना जरूरी नहीं समझे जाने को कैसे सही कहा जा सकता है। थोड़ी देर के लिये अगर यह मान भी लिया जाये कि ना तो ललित की सहायता करने के पीछे सुषमा का कोई निजी लोभ-लाभ छिपा था और ना नागा समझौते की शर्तों को स्वीकार करने के क्रम में प्रधानमंत्री ने अपनी राष्ट्रवादी मंशा से कोई समझौता किया है लेकिन इन पहलकदमियों को मनमाने तौर-तरीकों से अंजाम दिये जाने का मसला तो विवादों में घिरना लाजिमी ही है। स्वाभाविक तौर पर विपक्ष को तो इस तरह का सवाल उठाना ही चाहिये लेकिन ऐसा करने पर उसकी देशभक्ति व राष्ट्रहित की सोच को ही कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की जा रही है। अब ऐसा ही विवाद आगामी दिनों में तीस्ता जल बंटवारे को लेकर भी उठनेवाला है क्योंकि पश्चिम बंगाल से होकर बांग्लादेश को जानेवाली तीस्ता नदी के पानी पर अधिकार को लेकर जारी विवाद सुलझाने के लिये बांग्लादेश के साथ जिस समझौते के प्रारूप पर बात चल रही है उसके प्रति पश्चिम बंगाल की सरकार को विश्वास में लेना या उसे भी एक पक्षकार के तौर पर बातचीत में शामिल कतई जरूरी नहीं समझा गया है। लिहाजा कल को अगर केन्द्र सरकार अपनी ओर से बांग्लादेश के साथ कोई ऐसा समझौता कर लेती है जिससे पश्चिम बंगाल के हितों में कटौती करके पड़ोसी देश के साथ जारी विवाद को हमेशा के लिये समाप्त कर दिया जाता है तो इस मामले में भी उस पर तानाशाही नीतियां अपनाने का आरोप लगना लाजिमी ही है। खैर, इस तरह के मामलों को समग्रता में देखा जाये तो भले ही सरकार की नीति व नीयत में कोई गलती ना दिखे लेकिन उसकी कार्यनीति तो ऐसी ही है जिससे विपक्ष को ही नहीं बल्कि अक्सर उसके सहयोगियों व समर्थकों को भी ऐसा लगता है मानो उन्हें पूरी तरह ठेंगे पर रखा जा रहा हो। बहरहाल, लोकतांत्रिक अपेक्षाओं व कार्यप्रणालीय परंपराओं की अनदेखी का सिलसिला बदस्तूर जारी रखते हुए ‘मन के मते’ चलना बदस्तूर जारी रखा गया तो नीति व नीयत में पूर्ण शुचिता के बावजूद सरकार की तुगलकी व तानाशाही छवि बननी तय ही है जिसे विकेन्द्रित लोकशाही व्यवस्था में कतई स्वीकार्यता नहीं मिल सकती है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’
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