सोमवार, 10 अगस्त 2015

‘लम्हों ने खता की थी सदियों ने सजा पायी’

नवकांत ठाकुर
कहते हैं कि प्रकृति हर सांस का हिसाब रखती है। यहां कुछ भी व्यर्थ नहीं जाता। सबका हिसाब होता है और बराबर हिसाब होता है। तभी तो संत कबीर ने कहा भी है कि ‘करम गति टारै नाहिं टरी।’ हालांकि जीवन के बाकी क्षेत्रों में इस सिद्धांत के लागू होने को लेकर हमेशा से विवाद रहा है लेकिन सियासत के क्षेत्र में तो निर्विवाद तौर पर यह सिद्धांत लागू होता ही है। अलबत्ता सियासत में तो अक्सर प्रकृति के इंसाफ का इंतजार करना भी गवारा नहीं किया जाता बल्कि सही मौका मिलते ही सूद समेत हिसाब चुकता कर लिया जाता है। खास तौर से सियासत में दोस्ती का रिश्ता भले ही कच्चे धागे सरीखा नाजुक व कमजोर होता हो लेकिन दुश्मनी का रिश्ता बेहद मजबूत होता है जिसे पूरी शिद्दत व इमानदारी से निभाया जाता है। दुश्मनी का हिसाब बराबर करने के लिये तो मौका मिलते ही चैका मारने से कोई नहीं चूकता। तभी तो सियासत में निजी दुश्मनी मोल लेने से सभी बचने की ही कोशिश करते दिखाई पड़ते हैं। लेकिन कई दफा राजनीतिक रंजिश निजी लड़ाई में भी तब्दील हो जाती है जिसमें बात की शुरूआत भले ही किसी छोटे से लम्हे में होती हो लेकिन वह तब समाप्त नहीं होती है जब तक दोनों में से कोई एक पक्ष पूरी तरह निपट ना जाए। मिसाल के तौर पर इन दिनों राष्ट्रीय राजनीति में विदेशमंत्री सुषमा स्वराज के खिलाफ कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व का जो बेहद आक्रामक हमलावर रूख देखा जा रहा है उसकी वजह सतही तौर पर भले ही प्रवर्तन निदेशालय द्वारा भगोड़ा घोषित किये गये ललित मोदी को ब्रिटेन से यात्रा दस्तावेज दिलाने में उनके द्वारा की गयी मदद ही दिखाई पड़ रही हो लेकिन बारीकी से देखा जाये तो मौजूदा जंग की जड़े बीते वक्त के उन घटनाक्रमों में ही छिपी नजर आती हैं जिसमें सियासी फायदे के लिये सुषमा ने कांग्रेस अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गांधी के साथ निजी दुश्मनी का आगाज किया था। वक्त के पन्नों को पलट कर देखा जाये तो सोनिया के विदेशी मूल के मसले को राजनीतिक तौर पर तूल देने की शुरूआत सुषमा ने ही की थी। वह भी तब जब पहले सास और बाद में पति को राजनीति की बलिवेदी पर कुर्बान होता हुआ देखने के बाद अपने बचे-खुचे परिवार की सलामती के लिये सियासत में सक्रिय होने से इनकार करने के लंबे अर्से बाद सोनिया ने कांग्रेस को काल के गाल में समाने से बचाने के लिये उसकी कमान अपने हाथों में लेने की पहल की थी। अव्वल तो वह वक्त सोनिया के लिये सियासत में सक्रिय होने का फैसला करना निजी तौर पर कतई आसान नहीं था और दूसरे कांग्रेस की लगातार कमजोर होती उन जड़ों को वह भावनात्मक रूप से भी कतई कमजोर होता हुआ नहीं देख पा रही थीं जिसे उनके पूरे परिवार ने पीढ़ी दर पीढ़ी अपने खून-पसीने से सींचा था। उन्ही दिनों भाजपा की ओर से सुषमा ने सोनिया के खिलाफ निजी लड़ाई की शुरूआत करने के क्रम में उनके विदेशी मूल के मसले को जमकर तूल देते हुए सियासत में उनकी शुरूआत को ही खटास से भर दिया। सोनिया ने जब अस्ताचलगामी दिख रही कांग्रेस की कमान संभालते हुए वर्ष 1999 के लोकसभा चुनाव में अमेठी के अलावा बेल्लारी से भी अपना पर्चा दाखिल किया तो उनकी राह रोकने के लिये सुषमा ने भी चुनाव लड़ने के लिये बेल्लारी की सीट ही चुनी। साथ ही पूरे चुनाव प्रचार के दौरान सुषमा ने सोनिया के विदेशी मूल के मसले को तूल देते हुए ना सिर्फ उनकी देशभक्ति को सवालों के दायरे में लाने का भरसक प्रयास किया बल्कि पूरे चुनाव को उन्होंने ‘विदेशी बहू बनाम देसी बेटी’ का रंग देने में भी कोई कोताही नहीं बरती थी। हालांकि वहां सुषमा को सोनिया के हाथों तकरीबन 56 हजार वोटों से शिकस्त झेलनी पड़ी लेकिन सुषमा ने इससे हार नहीं मानी और उन्होंने लगातार सोनिया के विदेशी मूल के मसले को तूल देना जारी रखा। यहां तक कि 2004 के लोकसभा चुनाव में जब सोनिया के नेतृत्व में कांग्रेसनीत संप्रग ने भाजपानीत राजग को पछाड़ते हुए केन्द्र में बहुमत हासिल किया तब भी सुषमा ने सोनिया के निजी विरोध का सिलसिला बदस्तूर जारी रखते हुए ऐलान कर दिया कि अगर विदेशी हाथों में देश की सत्ता आएगी तो वे ना सिर्फ बाल मुंडवाकर साध्वी बन जाएंगी बल्कि पूरा जीवन सूखे चने पर गुजार देंगी। जाहिर है कि यह सुषमा की ही लड़ाई का नतीजा था कि पूर्ण बहुमत का आंकड़ा हासिल होने के बावजूद सोनिया को सिर्फ इसलिये प्रधानमंत्री पद को ठुकराने के लिये मजबूर होना पड़ा ताकि कांग्रेस पर विदेशी हाथों में सत्ता की कमान सौंपने की तोहमत ना लगे। खैर, बाद में ना सिर्फ सर्वोच्च अदालत ने उन पर लगे विदेशी के ठप्पे को खारिज कर दिया बल्कि देश की आवाम ने भी उन्हें अपना पूरा स्नेह व समर्थन देने मे कोई कसर नहीं छोड़ी। लिहाजा विदेशी मूल का मसला तो वक्त के साथ समाप्त हो गया लेकिन सुषमा के प्रति उनके दिल में चुभी खटास की कील नहीं निकल सकी। लिहाजा अब सही मौका मिलने पर उन्होंने सुषमा के खिलाफ निजी तौर पर निशाना साधने की जो पहल की है उसे पुरानी रंजिश के नये अध्याय की शुरूआत का नाम देना ही उचित होगा जिसके लपेटे में अब सुषमा के पति व उनकी इकलौती बिटिया भी आती दिख रही है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें