सोमवार, 24 अगस्त 2015

               

‘नतीजा न निकला है, न निकालने की मंशा है!’

नवकांत ठाकुर

हरिवंश राय बच्चन लिखते हैं कि ‘इश्वर है-नहीं है, पर बहस है, नतीजा न निकला है, न निकालने की मंशा है, कम क्या बतरस है!’ वाकई कुछ मसलों का हल आज तक ना तो निकल सका है और ना निकालने की मंशा दिखाई गयी है। अलबत्ता बहस अवश्य चलती रहती है जिसमें बतरस से आगे बढ़कर बहस को निर्णायक मोड़ पर लाने की मंशा किसी की नहीं होती। वैसे भी अगर सभी अपनी सोच पर ही अड़े रहें, एक दूसरे की बात सुनना व समझना भी गवारा ना करें, परस्पर एक दूसरे को नीचा दिखाने का कोई भी मौका हाथ से जाने ना दें और अपनी सोच को ही सर्वोपरि मानते रहें तो किसी भी बहस या चर्चा का कोई सार्थक व सर्वसम्मत नतीजा निकलने की उम्मीद कैसे की जा सकती है। यही स्थिति भारत व पाकिस्तान के मामले में भी देखी जा रही है जिसमें दशकों से जारी मतभेद, खुंदक व रंजिश का हल तलाशने की कोशिशें तो लगातार होती रही हैं। लेकिन सवाल है इन कोशिशों के पीछे की इमानदारी का। हकीकत तो यही है कि दशकों से उलझे हुए आपसी रिश्ते के धागों को सुलझाने के लिये आवश्यक गंभीरता, शिद्दत व इमानदारी का आज भी काफी हद तक अभाव ही दिख रहा है। खास तौर से दोनों देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार स्तर की वार्ता को लेकर इस दफा जमीनी स्तर पर जो भारी तमाशे का माहौल बना उसके पीछे पाकिस्तान की नापाक खुराफातें व चालबाजियां तो जिम्मेवार रही ही हैं, लेकिन कुछ हद तक हमारे हुक्मरानों की भी नीतियां व पहलकदमियां ऐसी रही जिससे अगर परहेज बरता जाता तो वार्ता की सफलता, सार्थकता व परिणामदायकता पर हर्गिज सवालिया निशान नहीं लगता। मसलन अगर पाकिस्तान ने परंपरागत तौर पर कश्मीरी अलगाववादी नेताओं को इस बैठक से पूर्व विचार विमर्श के लिये बुला ही लिया तो इस पर हाय-तौबा मचाने के बजाय खामोशी के साथ वही रणनीति अपनायी जा सकती थी जिसका मुजाहिरा अंतिम समय में शब्बीर शाह को दिल्ली में दाखिल होते ही हिरासत में लेकर किया गया। वैसे भी सरहद पर जारी गोलाबारी का करारा जवाब तो हमारी ओर से दिया ही जा रहा है। साथ ही सरहद पार कर हमारी शांति भंग करने के प्रयासों को भी परवान नहीं चढ़ने दिया जा रहा है। विश्व बिरादरी के सामने भी पाकिस्तान को बेनकाब करने में हम पहले ही कामयाब हो चुके हैं और इस्लामिक देशों से लेकर अमेरिका सरीखे उसके तमाम हिमायतियों, संरक्षकों व दानदाताओं को एक-एक उससे लगातार दूर किया ही जा रहा है। ऐसे में पाकिस्तान की हर खुराफाती तिकड़म को नाकाम करते हुए हर स्तर पर उसे उसकी ही भाषा में ठोस, करारा व माकूल जवाब देकर जब उसकी खीझ, कसमसाहट व तिलमिलाहट का पूरे गरिमापूर्ण तरीके से भरपूर मजा लिया जा सकता था तो फिर बेवजह हाय तौबा मचाकर जमीनी स्तर पर भारी तूफान का सुत्रपात करने की जरूरत ही क्या थी। वह भी तब जब इस बैठक को अपनी ओर से निरस्त या स्थगित नहीं करने का सैद्धांतिक फैसला पहले ही लिया जा चुका था और गुरदासपुर में हुए आतंकी हमले में शामिल पाकिस्तानी हमलावर नवेद को जिंदा पकड़ने में कामयाबी हासिल हो चुकी है। ऐसे में तो पाकिस्तान द्वारा औपचारिक तौर पर ठोस गलती किये जाने का इंतजार करना ही सबसे बेहतर विकल्प हो सकता था। वैसे भी जब हम अलगाववादियों को पाकिस्तानी एनएसए से मुलाकात करने से रोकने में पूरी तरह सझम हैं तो फिर बेवहज पाकिस्तान को इस बावत औपचारिक ‘एडवायजरी’ भेजने और विदेश सचिव को आगे करके उसे चिढ़ाने-खिझाने व आईना दिखाए जाने की जरूरत ही क्या थी। यहां तक कि जब पूरे विवादों, अटकलों व कयासों को खारिज करते हुए पाकिस्तानी एनएसए ने सार्वजनिक तौर पर दोपहर के वक्त ही यह बता दिया कि वे ऊफा वार्ता में तय किये गये दायरे का अनुपालन करते हुए बिना किसी पूर्व शर्त के वार्ता करने के लिये तैयार हैं तो फिर शाम के वक्त हमारी विदेशमंत्री को ऐसी प्रेसवार्ता करने की जरूरत ही क्यों पड़ी जिसके नतीजे में पाकिस्तान को वार्ता से पीछे हटने का बहाना मिल गया। यानि जाहिर तौर पर भारत की ओर से इस वार्ता के मामले जो कूटनीतिक राह अख्तियार की गयी उसका मकसद तो यही समझा जा सकता है कि विश्व स्तर पर पाकिस्तान को बदनाम किया जाये और भारी तनाव के कारण वार्ता नहीं हो पाने का ठीकरा भी उसके सिर ही फोड़ दिया जाये। लेकिन सवाल है कि ऐसी मंशा के साथ बनाये गये दबाव के नतीजे में अगर पाकिस्तान को ऊफा वार्ता में तय किये गये दायरे में रहते हुए बिना शर्त बातचीत की टेबल पर आने के किये मजबूर भी कर दिया जाता तो इस बैठक से कोई सार्थक नतीजा सामने आने की क्या उम्मीद की जा सकती थी। वैसे भी यह तो पाकिस्तान को पहले से ही पता था कि यह वार्ता सिर्फ आतंकवाद पर चर्चा करने के लिये ही आयोजित की जा रही है। तभी तो पाकिस्तानी एनएसए ने यह स्वीकार करने से परहेज नहीं बरता कि इस बार के दिल्ली दौरे में वे भारतीय हुक्मरानों से यह जानकारी भी लेना चाहेंगे कि कश्मीर के मसले को सुलझाने के लिये किस स्तर का मैकेनिज्म बनाने की उनकी चाहत है। बहरहाल इन पूरे घटनाक्रमों को समग्रता में देखा जाये तो ‘शठे शठ्यम समाचरेत’ की मौजूदा रणनीति में थोड़ी तब्दीली लाते हुए अगर भविष्य में उद्दंड बालक के साथ सख्त व सकारात्मक शिक्षक सरीखा बर्ताव किया जाये तो ना सिर्फ यह भारत की गरिमा, प्रतिष्ठा व परंपरा के अनुरूप होगा बल्कि इसका परिणाम भी सुखद व सार्थक ही रहेगा। 

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