‘मजबूरी के फैसलों पर मजबूती का मुलम्मा’
नवकांत ठाकुर
सियासत के अनगिनत रंगों में एक रंग ऐसा भी होता है जिसमें मजबूरी में लिये गये फैसलों पर भी मजबूती का मुलम्मा चढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी जाती है। तभी तो चैतरफा दबाव के कारण भूमि अधिग्रहण विधेयक में प्रस्तावित कई महत्वपूर्ण संशोधनों को वापस लेने के लिये मजबूर दिख रही केन्द्र सरकार कतई यह नहीं जताना चाह रही है कि उसने इस मसले पर किसी मजबूरी के कारण अपने कदम पीछे खींचने की तैयारी की है। साथ ही बिहार विधानसभा के चुनाव पर नकारात्मक असर पड़ने की संभावना के मद्देनजर इसे अगले सत्र तक के लिये टालने की जो पहलकदमी की गयी है उसमें खुले तौर पर चुनावी मजबूरियों का हवाला देना भी सरकार को गवारा नहीं हो रहा है। अलबत्ता अब सरकारयह प्रचारित करने के प्रयास में है कि वर्ष 2013 में कांग्रेस द्वारा पारित किये गये विधेयक में किसानों की सहमति से ही जमीन का अधिग्रहण करने की जिस व्यवस्था को समाप्त करने का उस पर इल्जाम लगाया जा रहा है वह तो पुराने विधेयक के अनुच्छेद 2/1 पर भी लागू नहीं था जिसके तहत तमाम जरूरतों के लिये जमीन अधिग्रहण की अनुमति दी गयी थी। यानि अधिग्रहण के लिये सहमति की व्यवस्था को स्वीकार करने के क्रम में सरकार यह जताना चाह रही है कि किसानों के हितों की रक्षा का जितना ठोस इंतजाम पुराने विधेयक में भी नहीं किया गया था उससे कहीं अधिक पुख्ता व्यवस्था वह अपने नये विधेयक में करने जा रही है। यानि मजबूरी में स्वीकार की जा रही सहमति से ही जमीन अधिग्रहण करने की व्यवस्था पर अपने मजबूत इरादों व नेकनीयती का मुलम्मा चढ़ाने में सरकार कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती है। खैर, मजबूरी के फैसलों पर मजबूती का मुलम्मा चढ़ाने में तो विपक्ष भी पीछे नहीं दिख रहा है। मसलन आज कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने सुषमा स्वराज, वसुंधरा राजे व शिवराज सिंह चैहान के इस्तीफे की मांग पर डटे रहने के बजाय सिर्फ सुषमा द्वारा यह बता दिये जाने पर ही संसद के सुचारू संचालन की राह तैयार हो जाने की बात कही है कि ललित मोदी के खाते से उनके परिजनों के खाते में कितना पैसा आया है। जाहिर है कि इस रणनीतिक बदलाव के पीछे भी कहीं ना कहीं कांग्रेस की वह मजबूरी ही छिपी हुई जिसके तहत बाकी विपक्षी दलों के साथ ही संगठन के भी काफी बड़े धड़े ने संसद को लगातार बाधित रखे जाने के प्रति अपना विरोध दर्ज कराना आरंभ कर दिया है। तभी तो अब राहुल की कोशिश केवल सुषमा को ही सार्वजनिक तौर पर शर्मसार करने की है लेकिन मजबूरी में अपनायी गयी इस रणनीति के पीछे भी मजबूती का तर्क गढ़ते हुए कांग्रेस यह समझाने में जुट गई है कि अगर ललित मोदी के वकील की हैसियत से अपने पति व बिटिया द्वारा उससे पैसा लिये जाने की बात को सुषमा ने स्वीकार लिया तो यह बात पूरी तरह साबित हो जाएगी कि जहां एक ओर अपने ओहदे व रसूख से सुषमा ने ललित की मदद की वहीं उसे अदालत में राहत पहुचाने का काम उनके पति व बिटिया ने किया जिसके एवज में उससे पर्याप्त रकम भी ऐंठी गयी। खैर, मजबूरी तो मुलायम सिंह यादव की उस मजबूत पहलकदमी में भी छिपी दिख रही है जिसके तहत संसद को बाधित रखने के मसले पर उन्होंने अब कांग्रेस का सहयोग नहीं करने का एलान किया है। कल तक तो सपा पूरी तरह कांग्रेस के पीछे लामबंद थी और जनता परिवार के जदयू सरीखे घटक दल ने तो आज भी इस मसले पर कांग्रेस का पुरजोर समर्थन करने की ही राह अपनाई हुई है। यहां तक कि सपा में भी इस बात पर आमसहमति बनने की गुजाइश बेहद कम है कि सत्तापक्ष व विपक्ष के बीच जारी आरपार की लड़ाई में किसी भी स्तर पर सपा का रूख सरकार के प्रति सकारात्मक दिखे। इन हालातों के बावजूद मुलायम ने अपने ‘वीटो पावर’ का इस्तेमाल करते हुए कांग्रेस से किनारा करने की जो पहल की है उसके पीछे राजनीतिक जानकार उनकी कई मजबूरियां गिनाते दिख रहे हैं। अव्वल तो यादव सिंह के मामले में सीबीआई की अति सक्रियता को सपा सुप्रीमो की ताजा मुलायमियत की वहज मानी जा रही है और दूसरे यूपी की सियासी मजबूरियां भी ऐसी हैं कि भाजपा के मुकाबिल कांग्रेस को खड़ा होने देना वे कतई गवारा नहीं कर सकते हैं। साथ ही बताया जाता है कि उनके समधी लालू यादव ने भी उन पर कांग्रेस से किनारा करने के लिये लगातार दबाव बनाया हुआ था क्योंकि कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल ने ही संप्रग सरकार के कार्यकाल में लाये गये केबिनेट के उस प्रस्ताव को बेवकूफाना करार देते हुए फाड़कर रद्दी की टोकरी में फेंक दिया था जिसे कथित तौर पर अदालत से सजा मिल जाने के बाद लालू के राजनीतिक भविष्य की रक्षा के लिये तैयार किया गया था। खैर, लालू ने भी तो बिहार में जदयू द्वारा हर स्तर पर की जा रही तौहीन का जहर पीते हुए नितीश को मुख्यमंत्री पद का दावेदार स्वीकार करने का जो फैसला किया है वह मजबूरी का ही निर्णय है। बहरहाल, मजबूरी के फैसलों पर मजबूती का मुलम्मा चढ़ानेवाले राजनीतिक दल भले ही इस मुगालते में हो कि उनकी दिखायी तस्वीर पर सभी भरोसा कर लेंगे लेकिन हकीकत यही है कि ‘सच्चाई छिप नहीं सकती बनावट के उसूलों से, खुशबू आ नहीं सकती कभी कागज के फूलों से। ’जैसी नजर वैसा नजरिया।’
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