‘दूल्हा बेकरार, बिचैलिये की पहल का इंतजार’
नवकांत ठाकुर
परंपरागत तौर पर होनेवाले शादी-ब्याह के मामलों में बिचैलियों की भूमिका किसी से छिपी हुई नहीं है। बिचैलिये ना हों तो ना लड़केवालों को मनचाही वधू मिल पाए और ना ही कन्यापक्ष को अपनी बिटिया के लिये सुयोग्य वर मिल पाए। ये बिचैलिये ही होते हैं जो वर-वधू पक्ष के बीच कड़ी की भूमिका निभाते हुए रिश्ते की बुनियाद तैयार करते हैं। खैर, बिचैलियों की भूमिका शादी-ब्याह के मामलों में जितनी महत्वपूर्ण होती है उससे जरा भी जीवन के बाकी क्षेत्रों में नहीं होती। चाहे मामला किसी वस्तु या सेवा की खरीद-फरोख्त का हो या किन्हीं दो पक्षों के बीच किसी भी मामले में सहमति की राह तैयार करने का। जाहिर है कि जब जीवन के हर क्षेत्र में बिचैलियों या मध्यस्थ की भूमिका इस कदर महत्वपूर्ण होती है तो फिर सियासत का क्षेत्र इससे अछूता कैसे रह सकता है। हकीकत तो यही है कि राजनीति के क्षेत्र में अगर बिचैलिये ना हों तो सत्तापक्ष व विपक्ष के बीच कभी सकारात्मक तालमेल कायम ही ना हो। मिसाल के तौर पर इन दिनों ‘वस्तु व सेवाकर अधिनियम’ यानि जीएसटी को पूर्वनिर्धारित समयसीमा के भीतर लागू कराने के लिये बेकरार दिख रही केन्द्र सरकार की तमाम उम्मीदों पर पानी फेरने की हर मुमकिन कोशिश कर रही कांग्रेस के बीच जिस कदर तनातनी व आर-पार की लड़ाई का माहौल बना हुआ है उसके मद्देनजर इनके बीच द्विपक्षीय बातचीत से आमसहमति बनने की तो उम्मीद भी नहीं की जा सकती। वैसे अगर इन दोनों ने आपसी बातचीत का झरोखा भी खुला छोड़ा होता तो शायद सहमति की कोई राह निकल भी सकती थी। लेकिन हकीकत तो यह है कि ये दोनों एक-दूसरे के साथ सीधे मुंह बात करने के लिये भी तैयार नहीं दिख रहे हैं। अलबत्ता मीडिया के माध्यम से जो बातचीत हो भी रही है उससे आग पर पानी की बजाय पेट्रोल ही पड़ रहा है। लेकिन सियासी लड़ाई अपनी जगह है और साझा फायदे के मसले को आगे बढ़ाने की बात बिल्कुल ही अलहदा मसला है। खास तौर से जीएसटी का मामला ऐसा है जिससे दोनों को फायदा ही होना है। वित्तमंत्री अरूण जेटली के मुताबिक जीएसटी लागू होने का असली व प्रत्यक्ष लाभ राजस्व में इजाफे के तौर पर तमाम सूबों की सरकार को ही मिलेगा। तभी तो जीएसटी को तयशुदा समयसीमा के तहत अगले वित्तीय वर्ष से लागू कराने के लिये जितनी बेकरार केन्द्र सरकार है उससे कतई कम कुल दस सूबों में सत्तारूढ़ कांग्रेस भी नहीं है। तभी तो शीर्ष कांग्रेसी नेताओं की जमात भी यह बताने से नहीं हिचक रही है कि उनकी पार्टी जीएसटी के खिलाफ कतई नहीं है। यानि दोनों तरफ है आग बराबर लगी हुई। लेकिन समस्या है कि इनके कूटनीतिक रिश्तों पर इनकी आपसी सियासी रंजिश इस कदर हावी हो गयी है कि सकारात्मक व साझा मुनाफे के मसले पर भी बातचीत का झरोखा नहीं खुल पा रहा है। किसी मसले पर एक ईंच भी करीब आने के लिये दोनों में से कोई तैयार नहीं है। जाहिर तौर पर अब यह मसला तभी सुलझ सकता है जब इन दोनों के बीच कोई ऐसा तीसरा पक्ष बिचैलिये की भूमिका निभाने के लिये तैयार हो जिस पर दोनों को पूरा विश्वास हो और जिसकी निष्पक्षता पर उंगली ना उठायी जा सके। सूत्रों की मानें तो कांग्रेस ने किसी को मध्यस्थ बनाने की पहल करना गवारा नहीं किया है क्योंकि उसकी सोच है कि चुंकि जीएसटी को पारित कराने की जिम्मेवारी सरकार की है लिहाजा मध्यस्थ के माध्यम से सहमति का फार्मूला उसकी ओर से ही पेश किया जाना चाहिये। इसमें राहत की बात यही है कि सरकार ने अपनी इस जिम्मेवारी को स्वीकार करते हुए सुयोग्य, सक्षम व निष्पक्ष बिचैलिये की तलाश काफी तेज कर दी है। हालांकि सरकार ने पिछले दिनों सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव को इस काम पर लगाने की कोशिश अवश्य की थी जिसे मुलायम ने स्वीकार भी कर लिया था लेकिन उनकी निष्पक्षता पर कांग्रेस को भरोसा नहीं हुआ जिसके चलते उनको मध्यस्थ बनाकर पूरे मामले का हल निकालने की योजना परवान नहीं चढ़ पायी। खैर, सूत्रों की माने तो अब सरकार ने राकांपा सुप्रीमो शरद पवार को मध्यस्थ बनाने की कोशिशें काफी तेज कर दी हैं और भगवा खेमे को उम्मीद है कि पवार की निष्पक्षता पर कांग्रेस कतई सवाल नहीं उठाएगी। वैसे राकांपा संप्रग की घटक भी है और बिहार में कांग्रेस के साथ गठजोड़ करके चुनाव भी लड़ रही है। दूसरी ओर यह राकांपा ही थी जिसने भाजपा व शिवसेना के बीच भारी तनातनी के माहौल में अपनी ओर से बिन मांगे ही बिनाशर्त समर्थन देकर महाराष्ट्र में भाजपा की सरकार बनवायी थी। साथ ही राष्ट्रीय राजनीति में कांग्रेस व भाजपा के बीच समानांतर दूरी कायम रखते हुए तमाम गैरकांग्रेसी विपक्ष को एक मंच पर लाकर तीसरे मोर्चे के गठन की पहल करके पवार ने अपने सियासी रसूख को भी इस कदर मजबूत कर लिया है कि उनकी मध्यस्थता में बनी सहमति की राह पर चलने से मुकरने का दुस्साहस ना तो कांगे्रस कर सकती है और ना ही भाजपा। यानि राष्ट्रीय सियासत में एक बार फिर से बिचैलिये की भूमिका ही निर्णायक साबित होनेवाली है लेकिन मसला यह है कि आपसी रिश्ते की मौजूदा संवादहीनता को बरकार रखने के नतीजे में अगर हर मसले पर इन दोनों को मध्यस्थ पर ही निर्भर होना पड़ा तो भविष्य में इन्हें इसकी भारी कीमत भी चुकानी पड़ सकती है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’
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