मंगलवार, 4 अगस्त 2015

‘चंद कदमों की चहलकदमी बनाम मीलों लंबा फासला’

नवकांत ठाकुर
इन दिनों देश की सियासत ऐसे मोड़ पर पहुंच चुकी है जिसमें सत्तापक्ष व विपक्ष के बीच जारी टकराव के बीच सहमति का फार्मूला निकालना बेहद मुश्किल हो चला है। हालांकि सैद्धांतिक तौर पर दोनों ही पक्ष मौजूदा गतिरोध को समाप्त करने की राह निकालने के लिये सहमत दिख रहे हैं लेकिन मसला यह है कि इन दोनों के बीच की खाई इतनी चैड़ी हो चुकी है कि उसे महज मुट्ठी से मिट्टी डालकर पाटने की तो उम्मीद भी नहीं की जा सकती। आलम यह है कि सफर तय करना है मीलों का लेकिन शुरूआत हो रही है कदमों की चहलकदमी से। लिहाजा मंजिल लगातार नजरों से ओझल ही बनी हुई है। दरअसल दोनों में से कोई भी पक्ष इतना लंबा सफर तय करने का सब्र दिखाना गवारा ही नहीं कर रहा है। ऐसे में चंद कदम आगे बढ़ने के बाद दोनों को ही सहमति की मंजिल दूर-दूर तक नजर नहीं नहीं दिख रही जिसके कारण वे दूबारा अपनी पुरानी जिद के खूंटे पर वापस लौटना ही बेहतर समझ रहे हैं। नतीजन संसद में जारी गतिरोध का हल तलाशने के लिये खुले मन से कोई फार्मूला निकालने का प्रयास आज भी परवान नहीं चढ़ पाया। उम्मीद तो थी कि जिस तरह से कांग्रेस ने शुक्रवार को ही सांकेतिक लहजे में जता दिया था कि अगर उसकी मांगों पर गंभीरता दिखाते हुए प्रधानमंत्री खुद ही पहल करके ललित गेट व व्यापम के मसले पर कोई ठोस कार्रवाई व पहलकदमी की घोषणा कर दें तो वह सहमति के माहौल में संसद को सुचारू ढंग से संचालित करने में सरकार का सहयोग करने से कतई गुरेज नहीं करेगी। इसी प्रकार सत्तारूढ़ भाजपा ने भी विपक्ष के खिलाफ अपने आक्रामक रूख में नरमी लाते हुए संसद में जारी गतिरोध का हल तलाशने के लिये कांग्रेस के साथ सहमति का फार्मूला निकालने के प्रति पूरी गंभीरता का मुजाहिरा किया था। इसी क्रम में संसदीय कार्यमंत्री वेंकैया नायडू ने तो यहां तक कह दिया कि कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के साथ बातचीत करके संसद में जारी गतिरोध का कोई तोड़ अवश्य निकाल लिया जाएगा। लिहाजा उम्मीद बंध चली थी कि आज की सर्वदलीय बैठक में सत्तापक्ष व विपक्ष के बीच समझौते के किसी फार्मूले पर बात अवश्य आगे बढ़ेगी जिसके नतीजे में संसद में बारह दिनों से जारी गतिरोध का सिलसिला जल्दी ही समाप्त हो जाएगा। लेकिन मसला यह फंस गया है कि इन दोनों पक्षों के बीच असहमति व आपसी विरोध की खाई इतनी गहरी हो चुकी है कि इसके बीच सहमति व समझौते का कोई पुल बनाने का फार्मूला किसी की समझ में ही नहीं आ रहा है। विपक्ष ने ललित गेट व व्यापम की जांच के लिये जेपीसी गठित किये जाने व प्रधानमंत्री द्वारा इसकी औपचारिक घोषणा किये जाने का जो फार्मूला पेश किया उसे स्वीकार करना सत्ता पक्ष को गवारा ही नहीं हो रहा है। दूसरी ओर सरकार की ओर से वेंकैया ने किसी भी मसले पर किसी भी नियम के तहत चर्चा कराये जाने की स्वीकृति देने के अलावा उस चर्चा में प्रधानमंत्री द्वारा हस्तक्षेप करके औपचारिक बयान दिये जाने का जो फार्मूला प्रस्तुत किया वह कांग्रेस को महज झुनझुने सरीखा ही महसूस हो रहा है जिसे स्वीकार करके शांत हो जाना उसे कतई गवारा नहीं है। यानि विपक्ष ने सुषमा स्वराज, वसुंधरा राजे और शिवराज सिंह के इस्तीफे की जिद ठानकर संसद को बाधित रखने की जो रणनीति अपनाई हुई है और उसके मुकाबले सत्तापक्ष की ओर से भी जिस तरह से ईंट का जवाब पत्थर से देने की पहलकदमी की जा रही है उन दोनों रणनीतियों में सीधा जमीन-आसमान का अंतर है लिहाजा अब वे दोनों चाह कर भी इस लंबी दूरी के बीच सहमति के मध्यबिन्दु तक की यात्रा करने की राह नहीं निकाल पा रहे हैं। हालांकि कांग्रेस की ओर से अगर सोनिया गांधी व राहुल गांधी और सत्तापक्ष की ओर से इसके पुराने अनुभवी बुजुर्ग नेताओं की टोली आमने-सामने बैठकर कोई हल निकालना चाहे तो ऐसा कोई मसला ही नहीं है जिसका बातचीत से समाधान ना निकल सके। लेकिन दिक्कत है कि ना तो भाजपा के मौजूदा निजाम की सीधी बातचीत कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व से हो रही है और ना ही गांधी परिवार के लिये इन्होंने इतनी राह छोड़ी है कि वह सत्तापक्ष की कथित युवातुर्क टोली के साथ धैर्य, विश्वास व परस्पर सम्मान के माहौल में वार्ता प्रक्रिया आरंभ करने की पहल कर सकें। लिहाजा बात हो भी रही है तो भाजपा की दूसरी पीढ़ी के साथ कांग्रेस के दोयम दर्जे के रणनीतिकारों की जिनको कोई अंतिम फैसला लेने की इजाजत ही नहीं है। ऐसे में अव्वल तो जब तक दोनों पक्षों के ऐसे लोग आमने-सामने बैठकर समझौते के किसी मसौदे पर सहमति बनाने की पहल नहीं करते हैं जिन्हें पार्टी की ओर से कोई निर्णय लेने का पूरा अख्तियार हो तब तक मौजूदा गतिरोध का कोई हल निकल पाने की उम्मीद भी नहीं की जा सकती। साथ ही मौजूदा गतिरोध के बीच समझौते के किसी फार्मूले तक पहुंचने के लिये दोनों पक्ष को अपनी जिद की लकीर छोड़कर लंबा सफर तय करने के लिये सहमत होना पड़ेगा। इसमें अगर एक भी पक्ष खुले मन से पूर्वाग्रह दिखाए या जिद ठाने बगैर समझौते के लिये आवश्यक लंबा सफर तय करने के प्रति हिचक दिखाने की कोशिश भी करेगा तो ऐसे में मौजूदा गतिरोध का हल निकल पाने की उम्मीद यथावत धूमिल ही रहेगी। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’   

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