‘नाव पर गाड़ी है या गाड़ी पर नाव......?’
नवकांत ठाकुर
इन दिनों यह पता करना बेहद मुश्किल हो गया है कि मीडिया का अनुसरण नेता कर रहे हैं या नेताओं का अनुसरण मीडिया। नाव पर गाड़ी है या गाड़ी पर नाव। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से जब उनके गठबंधन के सहयोगी लालू यादव से जुड़े सवाल पर प्रतिक्रिया मांगी जाती है तो वे पूरे मामले से ही अनभिज्ञता जाहिर करते हुए बेहद भोलेपन के साथ यह दलील देते हैं कि जब तक मीडिया नहीं बताएगा तब तक वे किसी भी मामले के बारे में कैसे जान सकते हैं। यानि सुशासन बाबू के नाम से प्रसिद्ध नितीश को यह स्वीकार करने से कोई परहेज नहीं हैं कि उनकी सियासत मीडिया का अनुसरण करते हुए ही आगे बढ़ रही है। दूसरी ओर मीडिया से तो वैसे भी यही अपेक्षा की जाती है कि वह नेताओं का अनुसरण करते हुए ना सिर्फ उन पर बारीकी से नजर रखे बल्कि उनकी पूरी हकीकत बिना किसी लाग लपेट के ज्यों का त्यों सार्वजनिक कर दे। इस लिहाज से देखा जाये तो मीडिया का काम ही है नेताओं का अनुसरण करना। लेकिन नितीश सरीखे नेता जब अपनी सियासी गाड़ी को मीडिया के नाव पर लाद कर चुनावी भवसागर पार करने की मुहिम में जुट जाते हैं तो यह पता करना मुश्किल हो जाता है कि आखिर कौन किसकी सवारी कर रहा है या कौन किसका अनुसरण कर रहा है। खैर, मसला यह नहीं है कि कौन किसकी सवारी कर रहा है बल्कि सवाल तो यह है कि सवारी का सवार सही दिशा में आगे बढ़ रहा है या नहीं। अगर रास्ता सही मंजिल की ओर जा रहा हो तो सवार या सवारी का मसला गौण हो जाता है लेकिन जब मंजिल कहीं और हो और राहेगुजर किसी और ही दिशा की ओर ले जा रहा हो फिर तो सवार और सवारी का सवाल उठना लाजिमी ही है। इस कसौटी पर परखा जाये तो इन दिनों जहां एक ओर मीडिया का जमीन से जुड़ाव लगातार कमजोर होता दिख रहा है वहीं नेताओं की भी मीडिया पर निर्भरता लगातार बढ़ती जा रही है। नेताओं का जनता से सीधा जुड़ाव कमजोर पड़ने का ही नतीजा है कि जिस व्यापम घोटाले को तूल देकर संसद से सड़क तक कांग्रेस ने भारी कोहराम मचाया हुआ था उसी मसले की आंधी के बीच हुए मध्य प्रदेश के जिन दस स्थानीय निकायों के चुनाव परिणाम सामने आये हैं उनमें से उसे महज एक ही जीत नसीब हुई है। जबकि पहले इनमें से छह निकायों पर कांग्रेस का ही कब्जा था। जाहिर है कि अगर व्यापम की जमीन इस कदर बंजर साबित होने के बारे में कांग्रेस को पहले से अंदाजा होता तो वह हर्गिज इस मसले को राष्ट्रीय स्तर पर इतने जोर-शोर से तूल नहीं देती। इसी प्रकार भाजपा का भी जमीन से जुड़ाव कमजोर होने का ही नतीजा है कि भूमि अधिग्रहण विधेयक में संशोधन के प्रस्ताव का जो प्रारूप इसने पेश किया उसके प्रति समूचे देश में भारी प्रतिक्रिया होने के बावजूद वह उसे मनचाहे स्वरूप में संसद से पारित कराने की जिद पर लगातार अड़ी रही। हालांकि विरोधियों, सहोदरों व साथियों द्वारा समाझाए जाने के बाद उसे समय रहते यह एहसास हो गया कि इस मामले में मनमानी का जमीनी स्तर पर भारी खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। तभी तो जहां एक ओर सर्वसम्मति कायम करने की आड़ लेकर उसने विधेयक के प्रारूप में व्यापक बदलाव का फैसला कर लिया है वहीं दूसरी ओर इस पूरे मामले को बिहार विधानसभा चुनाव तक के लिये ठंडे बस्ते के हवाले करने से भी परहेज नहीं बरता गया है ताकि इसका चुनावी नुकसान झेलने से बचा जा सके। इन तमाम मसलों को समग्रता में देखा जाये तो ना तो राजनीतिक दलों व नेताओं ने इन दिनों किसी भी मसले के जमीनी असर का आंकलन करने की जहमत उठायी है और ना ही मीडिया ने जमीनी तौर पर मुआयना करके विवादास्पद मसलों के प्रति आम लोगों की भावना को सही तरीके से उजागर करना जरूरी समझा है। ऐसे में सियासी पार्टियों द्वारा जनभावना के विपरीत खड़ा किये गये तूफान को ही मीडिया भी हवा देती रही और जमीनी परिणाम के प्रति दोनों एक दूसरे पर ही निर्भर रहे। इसका खामियाजा कांग्रेस को मध्य प्रदेश में भुगतना पड़ा है जबकि भाजपा को भी भूमि विधेयक के मसले पर नीचा देखना पड़ा है। अब ऐसी ही हरकत बिहार में नितीश भी करते दिख रहे हैं। भाजपा की उड़ाई अफवाह को तूल देकर मीडिया ने लालू की छवि जंगलराज के महानायक की बना दी तो नितीश ने भी उनके साथ अपनी छवि को जोड़ने से परहेज बरत लिया। आलम यह है कि लालू के समर्थकों का वोट तो नितीश को चाहिये लेकिन लालू की छवि का लोड उठाने के लिये वे कतई तैयार नहीं हैं। नतीजन दोनों के रिश्तों का रायता अब सड़क पर फैलना शुरू हो गया है। खैर, अपेक्षित तो यही है कि नेता और मीडिया दोनों ही जमीनी जुड़ाव को लगातार मजबूत करके आगे बढ़ें और कोई भी एक दूसरे के झांसे में ना आए। लेकिन इन दिनों जिस तरह से जमीनी हकीकतों को नजरअंदाज करके दोनों की परस्पर एक दूसरे पर निर्भरता में लगातार इजाफा देखा जा रहा है उसका नकारात्मक परिणाम मीडिया की विश्वसनीयता पर तो पड़ ही रहा है परंतु असली खामियाजा तो नेताओं को ही झेलना पड़ेगा जिनका अस्तित्व ही हर चुनाव में दांव पर रहता है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’
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