शनिवार, 8 अगस्त 2015

‘जाने क्यों परखने पर कोई अपना नहीं दिखता’

नवकांत ठाकुर
बशीर बद्र साहब फरमाते हैं कि ‘परखना मत परखने से कोई अपना नहीं रहता, किसी भी आईने में देर तक चेहरा नहीं रहता।’ वाकई मौजूदा सियासी हालातों के मद्देनजर बशीर साहब की यह बात विदेशमंत्री सुषमा स्वराज के लिये सटीक तौर पर प्रासंगिक महसूस होती है। दरअसल सतही तौर पर तो समूचा भगवा खेमा इन दिनों सुषमा के समर्थन में पूरी तरह लामबंद दिख रहा है। भले ही ललित मोदी को ब्रिटेन सरकार से यात्रा दस्तावेज उपलब्ध कराने के मामले में सुषमा पर इस्तीफे का दबाव बनाने के लिये कांग्रेस ने संसद के मौजूदा मानसून सत्र को पूरी तरह बाधित किया हुआ हो लेकिन सत्तापक्ष ने भी साफ तौर पर बता दिया है कि इस मामले में उनसे कतई इस्तीफा नहीं लिया जाएगा। यहां तक कि संसदीय कार्यमंत्री वेंकैया नायडू ने सुषमा को देश की पूंजी करार देते हुए यहां तक कह दिया है कि इस मामले में उनके खिलाफ कोई जांच भी नहीं करायी जाएगी। इसके अलावा कांग्रेस अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गांधी द्वारा सुषमा को नौटंकीबाज बताये जाने और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी द्वारा उन पर ललित से पैसा लेकर उसकी मदद करने का आरोप मढ़े जाने को केन्द्रीय मानव संसाधनमंत्री स्मृति इरानी ने जनादेश का अपमान करार देने से भी परहेज नहीं बरता है। यानि दूसरे शब्दों में कहें तो सुषमा के पक्ष में लामबंद दिखने में सत्तारूढ़ भाजपा के सतह से लेकर शिखर तक के नेतृत्व ने कोई कोताही नहीं बरती है। लेकिन मसला यह है कि किसी के पक्ष में लामबंद दिखना एक बात है और वास्तव में किसी के पक्ष में प्राण-पण से खड़ा होना बिल्कुल ही अलग बात है। इस कसौटी पर अगर सुषमा के पूरे मामले को गहराई से परखा जाये तो समूचे भगवा खेमे व सत्तापक्ष की भूमिका सिर्फ उनके पीछे लामबंद दिखने तक ही सीमित नजर आती है। वास्तव में इस हकीकत से हर्गिज इनकार नहीं किया जा सकता है कि सुषमा को संगठन व सरकार से जितनी मदद मिलने की उम्मीद रही होगी उतनी उन्हें कतई नहीं मिल पा रही है। वर्ना ऐसा कैसे हो सकता है कि सुबह दस बजे उन पर कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व द्वारा रिश्वतखोरी का इल्जाम लगाया जाये और देर शाम तक भाजपा की शीर्ष नीतिनिर्धारक समिति कही जानेवाली 12 सदस्यीय पार्लियामेंट्री बोर्ड के किसी भी सदस्य की जुबान से उनके समर्थन में एक शब्द भी ना निकले। जाहिर है कि इसके पीछे कोई गहरी राजनीति अवश्य छिपी हुई है जिसके तहत किसी भी सीमा तक जाकर सुषमा का बचाव करने के प्रति पार्टी के शीर्ष नेतृत्व का असमंजस स्पष्ट दिखाई दे रहा है। वर्ना यह तो न्यूनतम अपेक्षा ही कही जाएगी कि देश को भ्रष्टाचारमुक्त शासन देने का खम ठोंकनेवाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सबसे रसूखदार मंत्रियों में शुमार होनेवाली सुषमा पर जब मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के सबसे ताकतवर नेता राहुल ने बेलाग लहजे में ललित की मदद करने के एवज में पैसा लेने का आरोप लगाया है तो समूचे संगठन व सरकार को पूरी आक्रामकता के साथ इसका जवाब देने के लिये आगे आना ही चाहिये था। लेकिन जमीनी वास्तविकता यह है कि राहुल द्वारा सुषमा पर लगाये गये आरोप का जवाब देने के लिये पार्टी ने स्मृति को आगे करके जो बात कहलवायी है उसमें राहुल पर तो उन्होंने वैसे ही निशाना साधा है जैसा वे अमेठी में चुनाव लड़ने के वक्त से ही साधती रही हैं लेकिन इसमें जिस संजीदगी, साफगोई व शिद्दत के साथ सुषमा का पक्ष रखे जाने की जरूरत थी उसमें काफी कमी देखी गयी। स्मृति ने निजी तौर पर सुषमा के पक्ष में कुछ भी कहने के बजाय सरकार के पक्ष से ही सारी बातें कहीं। इसी प्रकार सूत्रों की मानें तो राहुल व सोनिया की ओर से सुबह के वक्त हुए प्रहार के बाद सुषमा की इच्छा थी कि उनके बचाव में सरकार के सबसे वरिष्ठ मंत्री वेंकैया खुद सामने आकर मीडिया के माध्यम से कांग्रेस के आरोपों का जवाब दें और उनके पक्ष में पूरी सफाई पेश करें। लेकिन निजी तौर पर अनुरोध किये जाने के बावजूद वेंकैया ने सुषमा के लिये खुलकर सामने आना मुनासिब नहीं समझा अलबत्ता सुषमा की निजी गुजारिश का मान रखते हुए उन्होंने इतना ही किया कि एक संक्षिप्त वक्तव्य मीडिया में जारी कर दिया जिसमें उन आरोपों को निराधार बताया गया है जिस पर कल लोकसभा में सुषमा ने अपना स्वतःस्फूर्त वक्तव्य दिया था। इसके अलावा संगठन व सरकार की ओर से सुषमा पर लगे भ्रष्टाचार के आरोप पर पूरी आक्रामकता के साथ जवाब देने के लिये कोई आगे नहीं आया। सूत्रों की मानें तो पार्टी के मीडिया विभाग ने राहुल के आरोपों का जवाब दिलाने के लिये दोपहर के वक्त एक औपचारिक प्रेस कन्फ्रेंस कराने की भरपूर कोशिश की लेकिन इसके लिये जितने भी केबिनेट मंत्रियों से बात की गयी उन सभी ने अपनी व्यस्तता का हवाला देते हुए इससे कन्नी काट ली जिसके कारण आज पार्टी की प्रेस बैठक भी नहीं हो पायी। खैर, माना कि सुषमा का बचाव करते हुए दिखने की औपचारिकता तो पूरी तरह निभाई जा रही है लेकिन इस काम को आधे-अधूरे व असमंजसपूर्ण तरीके से अंजाम देकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लिये जाने के मद्देनजर भगवा खेमे के रणनीतिकारों को यह नहीं भूलना चाहिये कि इससे  जितना नुकसान सुषमा की सियासत को होगा उससे कहीं अधिक समग्रता में सरकार की छवि पर भी इसका नकारात्मक असर पड़ सकता है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ 

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