शनिवार, 1 अगस्त 2015

‘अब सहमति के राह की दरकार है सभी को’

नवकांत ठाकुर
कहते हैं कि सियासत में समझौते व आम सहमति की गुंजाइश हमेशा बनी रहती है। पेंच कैसा भी क्यों ना फंसा हो, बातचीत से हर मुश्किल का हल निकल ही आता है। बशर्ते कि सभी पक्ष अपनी जिद छोड़कर सहमति की राह निकालने के लिये इमानदारी से तत्पर हों। यानि सहमति की राह तभी निकल सकती है जब सभी पक्ष अपनी जिद से पीछे हटने का विकल्प खुला रखें। वर्ना जिद पर अड़कर बातचीत का दरवाजा बंद कर लिये जाने का नतीजा वैसा ही होता है जैसा इन दिनों देश की मौजूदा राजनीति में देखा जा रहा है। दरअसल पिछले दो सप्ताह से संसद में जारी गतिरोध के सिलसिले की इकलौती वजह सत्तापक्ष व विपक्ष की वह जिद ही है जिससे रत्तीभर भी पीछे हटना किसी को गवारा नहीं था। कांग्रेस की जिद थी कि ललित गेट के मामले में सुषमा स्वराज व वसुंधरा राजे को और व्यापम विवाद में शिवराज सिंह चैहान के खिलाफ ठोस व कड़ी कार्रवाई होने तक वह संसद को हर्गिज नहीं चलने देगी जबकि सरकार की जिद थी कि वह विपक्ष के दबाव में कोई कार्रवाई नहीं करेगी। जहां एक ओर कांग्रेस ने सरकार के खिलाफ संसद से लेकर सड़क तक व्यापक विरोध का मोर्चा खोल दिया था वहीं सत्तापक्ष ने भी पलटवार करते हुए कांग्रेस के शीर्ष संचालक परिवार के सदस्यों के खिलाफ निजी हमला करना व कांग्रेसशासित राज्यों में हुए घपले-घोटाले के मामलों को राष्ट्रीय स्तर पर तूल देना आरंभ कर दिया था। लेकिन ताजा सूरतेहाल के तहत इस टकराव को लंबे समय तक जारी रखना ना तो सत्ता पक्ष को मुनासिब महसूस हो रहा है और ना ही विपक्ष को। सरकार की मजबूरी है कि अगले साल से देश में ‘वस्तु व सेवाकर अधिनियम’ (जीएसटी) लागू करने के लिये मौजूदा सत्र में ही इसके लिये आवश्यक संविधान संशोधन को राज्यसभा से पारित कराना उसके लिये बेहद अनिवार्य है। साथ ही संसदीय कार्यमंत्री वेंकैया नायडू के मुताबिक सरकार ने मौजूदा सत्र में ही जुवेनाइल जस्टिस, रियल इस्टेट, व्हिसल ब्लोअर व निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट से संबंधित विधेयकों को भी सर्वोच्च प्राथमिकता के तहत संसद से पारित कराने का लक्ष्य तय किया हुआ है। जाहिर है कि ये सभी विधेयक तभी पारित हो सकते हैं जब संसद का कामकाज सुचारू ढंग से संचालित होना आरंभ हो। दूसरी ओर विपक्ष भी सुषमा, वसुंधरा व शिवराज के इस्तीफे की जिद पर डटे रहकर संसद में जारी गतिरोध को बरकरार रखने में अब काफी असहजता महसूस कर रही है। अव्वल तो इस रणनीति में कांग्रेस को बाकी विपक्षी दलों का सहयोग नहीं मिल रहा है और दूसरे सूत्रों की मानें तो पार्टी के मुख्यमंत्रियों ने भी जीएसटी को पारित कराने की राह निकालने के लिये संगठन पर दबाव बनाया हुआ है। इसके अलावा संसद में जारी गतिरोध के कारण विभिन्न राज्यों में आयी बाढ़, से लेकर किसानों की समस्या, राष्ट्रीय सुरक्षा व महंगाई सहित तमाम ज्वलंत मसलों की आवाज संसद की देहरी के भीतर दाखिल नहीं हो पाने का ठीकरा अपने सिर पर फोड़े जाने की संभावना ने कांग्रेस को बुरी तरह परेशान किया हुआ है। यानि समग्रता में देखें तो संसद को बाधित रखने के लिये भले ही विपक्ष के अलावा सत्ता पक्ष की जिद भी बराबर की दोषी क्यों ना हो लेकिन जिद की सरहदों के बीच आम सहमति की धारा बहाने के अलावा दोनों पक्षों के लिये अब कोई दूसरा विकल्प ही नहीं बचा है। यही वजह है कि जहां एक ओर सरकार ने आगामी सोमवार को संसद में जारी गतिरोध को समाप्त करने की राह तलाशने के लिये औपचारिक तौर पर सर्वदलीय बैठक आयोजित करने का फैसला किया है वहीं दूसरी ओर कांग्रेस ने भी अपनी जिद से एक कदम पीछे हटते हुए कहा है कि अगर प्रधानमंत्री की ओर से ललित गेट व व्यापम के मसले पर कोई ठोस प्रस्ताव प्रस्तुत किया जाता है तो वह संसद में जारी गतिरोध को बातचीत के माध्यम से दूर करने के लिये पूरी तरह तैयार है। यानि बिना औपचारिक बातचीत के ही इतनी बात तो बन ही गयी है कि अव्वल तो विपक्ष ने सुषमा, वसुंधरा व शिवराज के इस्तीफे की मांग को ठंडे बस्ते में डालने का मन बना लिया है वहीं दूसरी ओर सरकार ने भी मौजूदा सत्र में ही विवादित भूमि अधिग्रहण विधेयक को सदन से पारित कराने की जिद छोड़ने का संकेत दे दिया है। हालांकि विपक्ष ने ललित गेट व व्यापम के मसले की जांच के लिये संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) गठित किये जाने की मांग अवश्य बुलंद की है लेकिन फिलहाल संवैधानिक व्यवस्थाओं व संसदीय परंपराओं की आड़ लेकर इस मांग को भी स्वीकार करने से सरकार फिलहाल इनकार करती हुई ही दिख रही है। खैर, राहत की बात यही है कि दोनों ही पक्ष अब मौजूदा मानसून सत्र के बचे-खुचे वक्त में अधिक से अधिक कामकाज निपटाने के लिये सहमत होते दिख रहे हैं। लिहाजा जब संसद को सुचारू ढंग से चलाने पर सैद्धांतिक सहमति बन ही रही है तो लाजिमी तौर पर इसका कोई ना कोई बहाना यानि आम सहमति की राह भी निकल ही आएगी। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम से अगर सत्ता पक्ष ने ‘लोहे को लोहे से काटने’ के सिद्धांत की व्यावहारिक निरर्थकता और विपक्ष ने ‘मांग उतनी करो जो मुनासिब भी हो’ की सीख नहीं ली तो दोनों को भविष्य में भी मौजूदा परेशानी का दोबारा सामना करने के लिये तैयार रहना ही होगा। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’

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