भारत-पाकिस्तान के रिश्ते इन दिनों जिस मोड़ से गुजर रहे हैं उसे सुप्रसिद्ध कवि बल्ली सिंह चीमा के शब्दों में कहें तो- ‘करो न शोर परिन्दा है डर न जाए कहीं, जरा-सा जीव है हाथों में मर न जाए कहीं, वो फिर नए वादों के साथ उतरा है, उसे कहो कि वो फिर से मुकर न जाए कहीं।’ वाकई पाकिस्तान के साथ भारत का जो तजुर्बा रहा है उसमें यह डर लगना स्वाभाविक है कि गले लगने के बहाने कहीं एक बार फिर हमारी पीठ में खंजर ना घोंप दिया जाए। तभी दूध से जलता आ रहा भारत इस बार करतारपुर काॅरिडोर की कथित छाछ भी फूंक-फूक कर पी रहा है। बेशक पाकिस्तान की कोशिश है करतारपुर काॅरिडोर के मामले में गर्मजोशी दिखाकर भारत को एक बार फिर शीशे में उतार लिया जाए और तमाम गतिरोधों को दूर कर रिश्तों पर जमी बर्फ को पूरी तरह पिघला दिया जाए। लेकिन पाकिस्तान की पुरानी करतूतें ऐसी नहीं हैं कि उस पर केवल इस वजह से भरोसा कर लिया जाए क्योंकि उसने दोस्ती की राह पर एक कदम आगे बढ़ते हुए करतारपुर काॅरिडोर को खोलने की दशकों पुरानी हमारी मांग पूरी कर दी है। तभी तो जहां एक ओर सार्क देशों की बैठक में भाग लेने के लिये पाकिस्तान जाने से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ओर से इनकार कर दिया गया है वहीं दूसरी ओर विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने फिर दोहराया है कि आतंकवाद का सिलसिला जारी रहते हुए पाकिस्तान के साथ औपचारिक बातचीत करना संभव ही नहीं है। हालांकि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने बिल्कुल सच कहा है कि दोनों मुल्क एटमी हथियारों से लैस है लिहाजा आपसी मसलों को हल करने के लिये जंग कोई विकल्प ही नहीं है बल्कि जंग के बारे में सोचना भी पागलपन ही है। लेकिन सवाल है कि आखिर ऐसी सोच रखता कौन है और उस दिशा में हमेशा पहलकदमी करने के लिये आतुर कौन रहता है? यह भारत की ओर से की गई पहलकदमियों का ही नतीजा रहा है कि अमन की आशा को पूरा करने के लिये कभी शिमला में समझौता होता है तो कभी शर्म-अल-शेख में। कभी समझौता एक्सप्रेस को हरी झंडी दिखाई जाती है तो कभी कारवां-ए-अमन को आगे बढ़ाया जाता है। इसी कड़ी में अब करतारपुर काॅरिडोर को खोलने की दिशा में दोनों मुल्कों ने पहलकदमी की है। बेशक यह एक नई शुरूआत है, पाकिस्तान में नए निजाम द्वारा शासन की बागडोर संभाले जाने के बाद। लेकिन यह पहली बार नहीं है जब अमन की आशा जगाते हुए सरहद के दोनों तरफ के हुक्मरानों ने इस तरह की पहलकदमी की हो। ऐसी कोशिशें बार-बार और लगातार होती रही हैं। खास तौर से भारत की ओर से। भारत ने हमेशा ही पाकिस्तान को अमन और शांति की दिशा में आगे बढ़ने के लिये प्रेरित किया और बड़े भाई की हैसियत से तमाम पहलकदमियां भी कीं। लेकिन गिले-शिकवे भुलाकर गले लगने की पहलकदमियों के बदले में हर बार पाकिस्तान की ओर से भारत की पीठ में खंजर ही घोंपा गया। कभी संसद पर हमला कराया गया तो कभी कारगिल का युद्ध थोपा गया। कभी 26/11 के मुंबई हमलों की साजिश अंजाम दी गई तो कभी पठानकोट और उड़ी के सैन्य ठिकाने पर हमला हुआ। नतीजन अब स्थिति यह हो गई है कि करतारपुर साहिब काॅरिडोर खुलने के मौके पर भी भारत को एहतियातन कूटनीतिक सावधानी बरतने पर मजबूर होना पड़ रहा है। हालांकि ऐसा नहीं है कि करतारपुर काॅरिडोर खोलने को लेकर दोनों मुल्कों के बीच बनी सहमति से खुशी, उत्साह और उमंग में कोई कमी हो। बल्कि आजादी के बाद से ही इस काॅरिडोर को खोले जाने की जो मांग की जाती रही है उसके पूरा होने पर सियासतदानों से लेकर आम आवाम तक में काफी उत्साह और उमंग है। लेकिन इस उत्साह का अगर दिल खोलकर प्रदर्शन करने के प्रति संकोच दिखाया जा रहा है तो इसकी सबसे बड़ी वजह पाकिस्तान की हरकतों का वह पुराना इतिहास ही है जिसके तहत सुलह की हर बोली का जवाब नफरत की गोली से मिलता आया है। तभी तो पाकिस्तान की ओर से की जा रही खुराफाती हरकतों के प्रति दुख, तकलीफ और आक्रोश के कारण ही इस काॅरिडोर के पाकिस्तान की ओर के हिस्से के शिलान्यास के कार्यक्रम में जाने से पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिन्दर सिंह ने भी परहेज बरता है और विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने भी। यहां तक कि नवजोत सिंह सिद्धू भी निजी हैसियत से ही वहां गए हैं। वर्ना अगर पाकिस्तान ने वाकई अमन की राह पकड़ते हुए खुराफाती आतंकी गतिविधियों को संरक्षण देना और उसका संचालन करना बंद कर दिया होता तो कोई कारण नहीं था कि सरहद के इस तरफ के कार्यक्रम के मुख्य अतिथि इमरान खान होते और सरहद के उस तरफ के कार्यक्रम की शोभा बढ़ाने नरेन्द्र मोदी खुद ही जाते। लेकिन कहते हैं कि चोर अगर चोरी करना छोड़ भी दे तो हेराफेरी करना नहीं छोड़ सकता। शायद तभी इमरान द्वारा काॅरिडोर का शिलान्यास किये जाने के समारोह में आतंकी सरगना हाफिज सईद का सहयोगी और खालिस्तान समर्थक गोपाल चावला भी मौजूद था और पाकिस्तानी सेना प्रमुख कमर जावेद बाजवा से हाथ मिलाता हुआ भी नजर आया। समारोह में चावला की मौजूदगी पाकिस्तान द्वारा रिश्तों में विश्वास की चोरी हो या उसकी फौज द्वारा की गई हेराफेरी, लेकिन इसे नजरअंदाज तो कतई नहीं किया जा सकता। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @नवकांत ठाकुर #Navkant_Thakur
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गुरुवार, 29 नवंबर 2018
मंगलवार, 26 जून 2018
‘इतनी मासूम दुश्मनी पर दोस्ती कुर्बान’
दोस्ती वह होती है जो खुशी, सहारा व ताकत दे और आपसी हितों को सुरक्षित करे। जबकि दुश्मनी में तो दुखी करने, सहारा छीनने, कमजोर करने और नुकसान पहुंचाने की कोशिश की जाती है। लेकिन जब दुश्मनी करने वाले एक दूसरे का नुकसान करने के बजाय परस्पर लाभ पहुंचाते दिखने लगें तो ऐसे रिश्ते की असलियत व हकीकत को लेकर जो असमंजस की स्थिति उत्पन्न होती है वही इन दिनों बीजेपी और पीडीपी के मौजूदा रिश्तों में भी दिख रही है। कहने को तो बीजेपी ने पीडीपी की महबूबा सरकार से समर्थन वापस ले लिया है और मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने अल्पमत में आने के बाद त्यागपत्र भी दे दिया है। गठबंधन टूटने के बाद दोनों दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर भी चला है और दोनों अपने पक्ष को सही बताने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। महबूबा सरकार से समर्थन वापस लेने का ऐलान करते वक्त बीजेपी ने स्पष्ट शब्दों में आरोप लगाया कि सूबे में शांति और विकास के लिये बनाई गई गठबंधन की सरकार अपने मकसद को हासिल करने में नाकाम रही है नतीजन इस सरकार को आगे भी बरकरार रखने का कोई औचित्य नहीं था। दूसरी अरो शांति और विकास का लक्ष्य हासिल नहीं हो पाने के बीजेपी के आरोप पर तो पीडीपी ने चुप्पी साध ली लेकिन पूरे मामले पर अपना पक्ष रखते हुए यह अवश्य कहा कि बीजेपी के साथ सहमति के आधार पर ही महबूबा ने सरकार चलाई लेकिन चुंकि उन्होंने सख्ती के बजाय वार्ता के माध्यम से शांति स्थापना का प्रयास किये जाने और धारा 370 को किसी भी हालत में नहीं हटाए जाने की बात पर जोर दिया इसी वजह से बीजेपी ने सरकार से समर्थन वापस लिया है। सरकार गिरने के बाद महबूबा ने अपनी उपलब्धियां भी गिनाईं कि उनके ही प्रयासों से बीजेपी ग्यारह हजार पत्थरबाज युवाओं पर से मुकदमा वापस लेने, रमजान के दौरान एकतरफा युद्धविराम घोषित करने और चाह कर भी जम्मू कश्मीर से 370 नहीं हटाने पर मजबूर हुई। हालांकि गठबंधन टूटने के बाद शुरूआती दौर में सामने आए दोनों पक्षों के बयानों से एक बार भी यह महसूस नहीं हुआ कि अचानक सरकार से समर्थन वापस लेने के बीजेपी के एकतरफा फैसले से पीडीपी को हताशा या निराशा हुई है अथवा महबूबा सरकार की जनविरोधी रीति-नीति से दुखी होकर बीजेपी ने यह कदम उठाया क्योंकि इसके अलावा दूसरा कोई विकल्प ही नहीं बचा था। ना तो बीजेपी ने महबूबा सरकार की रीति-नीति की बखिया उधेड़ने की पहल की और ना ही पीडीपी ने बीजेपी पर राजनीतिक लाभ के लिये विश्वासघात करने का आरोप लगाया। यानि सतही तौर पर यही तस्वीर उभरी कि शांति और विकास का लक्ष्य पूरा नहीं होने के कारण बीजेपी ने खुद को महबूबा सरकार से अलग किया है और सूबे में राज्यपाल शासन लागू करके सख्ती से आतंकवाद को कुचलने का फैसला किया है क्योंकि महबूबा के मुख्यमंत्री रहते सुरक्षाबलों को एक सीमा से अधिक छूट देना संभव नहीं हो पा रहा था। लेकिन गहराई से परखने पर ऐसा लगता है कि दोनों दलों ने परस्पर लाभ के लिये आपसी सहमति से सरकार बनाई भी थी और आपसी रजामंदी से ही सरकार गिराई भी है। तभी तो दोनों ओर से ऐसे ही बयान सामने आए हैं जिससे कश्मीर घाटी में पीडीपी के पक्ष में विश्वास और सहानुभूति की लहर पैदा हो और सूबे के जम्मू व लद्दाख क्षेत्र सहित देश के बाकी हिस्सों में भाजपा पर लोगों का यकीन बढ़े। वैसे भी कश्मीर घाटी में भाजपा का कोई जनाधार नहीं है जबकि घाटी के बाहर पीडीपी का कोई ‘नाम लेवा पानी देवा’ नहीं है। लिहाजा दोनों दलों के बीच आई दूरी के बावजूद अगर दोनों पक्ष ऐसे ही आरोप लगा रहे हैं और ऐसे ही तथ्य सामने ला रहे हैं जिससे अपने प्रभाव वाले इलाकों में दोनों उसका लाभ उठा सकें तो जाहिर है कि इसे दुश्मनी की नजाकत, मासूमियत और शराफत के नजरिये से ही देखा जाएगा। लेकिन सवाल है कि अगर यह दुश्मनी का स्वरूप है तो फिर आखिर दोस्ती किसे कहते हैं? वैसे दुश्मनी इतनी प्यारी-न्यारी हो तो दोस्ती की जरूरत भी क्या है। तभी तो अपने जम्मू दौरे में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने भी महबूबा पर उतना ही आरोप लगाया जो घाटी में पीडीपी के लिये फायदेमंद हो और बाकी जगह बीजेपी को उसका लाभ मिले। अगर अमित शाह ने विकास की रकम भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ने या गबन-हजम कियेे जाने का आरोप लगाया होता तो पीडीपी की छवि खराब होती। लेकिन उन्होंने आरोप लगाया कि महबूबा सरकार ने सिर्फ कश्मीर घाटी के विकास पर ध्यान दिया और जम्मू व लद्दाख क्षेत्र के साथ सौतेला व्यवहार किया जिसके चलते सूबे के समग्र विकास का लक्ष्य हासिल नहीं हो पाया। जाहिर है कि जब दुश्मनी होने के बाद भी बीजेपी यह प्रमाणपत्र दे रही है कि सूबे के बाकी हिस्सों को छोड़कर महबूबा सरकार ने सिर्फ घाटी के हित में काम किया तो इससे घाटी में महबूबा के प्रति लोगों के स्नेह व विश्वास में वृद्धि होना स्वाभाविक ही है। खैर, तीन साल तक दोस्ती का फायदा उठाने के बाद अब दुश्मनी करके एक-दूसरे को लाभ दिलाने का प्रयास किस हद तक सफल होगा यह कहना तो मुश्किल है, लेकिन जनता को मूर्ख समझने वाले चतुर-सुजान को यह नहीं भूलना चाहिये कि- खैर खून खांसी खुशी वैर प्रीत मद्यपान, रहिमन दाबे ना दबे जानत सकल जहान। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया। @ नवकांत ठाकुर #Navkant_Thakur
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सोमवार, 12 फ़रवरी 2018
‘‘सब्र...., आखिर कब तक....???’’
‘‘सब्र...., आखिर कब तक....???’’
एक बार फिर सुंजवां में वही हुआ जो पहले पठानकोट और उड़ी में हो चुका था। सरहद पार कर आतंकी आए और उन्होंने आर्मी कैंप पर धावा बोल दिया। अंदर घुसकर तबाही मचाने की कोशिश की और ऐसी जगह पोजीशन लेकर बैठ गए जहां से लंबे समय तक सुरक्षा बलों को छकाया जा सके। वैसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि उन्हें मार डालने में हमारे सुरक्षा बल हर बार कामयाब हो जाते हैं। अलबत्ता फर्क इस बात से पड़ता है कि उनसे निपटने में हमारे फौजियों को भी जान से हाथ धोना पड़ता है और सरहद के भीतर उन्हें शांतिकाल में शहादत देने के लिए विवश होना पड़ता है। इस वारदात को अंजाम देने के लिए उस तारीख का चयन किया जाना संकेतों में बहुत कुछ बता रहा है जिस दिन पांच साल पूर्व संसद हमले के आरोपी अफजल गुरू को फांसी दी गई थी। ऐसे में हमले के लिए आज की तारीख का चयन करने के पीछे की सोच और मकसद को भी समझने की जरूरत है। जिस वारदात को पाकिस्तानी आतंकी मनचाहे समय व तारीख पर अंजाम देने में सक्षम हैं उस हरकत को तो मौका मिलते ही कभी भी अंजाम दिया जा सकता था। फिर इसके लिए इस तारीख का चयन करने की आखिर क्या जरूरत थी? वास्तव में देखा जाए तो अफजल गुरू का मामला बेहद ही विचित्र है। कहीं ना कहीं उसको महिमामंडित करने का काम हमारी सियासत ने भी किया है और प्रचार के भूखे उन बुद्धिजीवियों ने भी जिनकी नजर में धर्मनिरपेक्ष होने के लिए मुस्लिम परस्त और हिन्दू विरोधी होना निहायत ही आवश्यक है। कहीं ना कहीं अफजल के बारे में यह मान लिया गया कि उसे देश के अल्पसंख्यकों का समर्थन हासिल है और इसी वजह से सर्वोच्च न्यायालय द्वारा उसे फांसी पर चढ़ाए जाने का आदेश दे दिये जाने के बावजूद पहले तो सालों तक आदेश के अनुपालन को व्यवस्थागत पेंचो-खम में बुरी तरह उलझा कर रखा गया और बाद में जब उसे फांसी से बचाने का आरोप लगने पर तत्कालीन संप्रग सरकार की छवि खराब होने लगी तब कहीं जाकर उसे लटकाने की पहल की गई। लेकिन दूसरी ओर अफजल के कई प्रबुद्ध और नामचीन बुद्धिजीवी हिमायतियों ने उसे फांसी के फंदे से बचाने के लिए अंतिम समय तक अपनी कोशिशें जारी रखीं और इसके लिए सर्वोच्च न्यायालय को ऐतिहासिक तरीके से रात के दो बजे सुनवाई करनी पड़ी। यहां तक कि अफजल को हीरो बनाने का प्रयास उसे फांसी दिए जाने के बाद भी जारी रहा और उसकी फांसी के बाद कई दिनों तक कश्मीर घाटी सुलगती रही, कफ्र्यू लगाना पड़ा और विरोध प्रदर्शनों में कई मौतें भी हुईं। अफजल के महिमामंडन का यह सिलसिला आज भी जारी है और जेएनयू जैसे संस्थान में ‘तुम कितने अफजल मारोगे, हर घर से अफजल निकलेगा’ का नारा बुलंद होता रहता है और ऐसा करने वालों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करने के लिए देश के कई बड़े राजनेता व बुद्धिजीवी सामने आते रहते हैं। बेहद स्वाभाविक है कि भारत के भीतर अफजल को लेकर होने वाली इन गतिविधियों पर पाकिस्तान की भी पैनी निगाहें लगी रही हैं जो पैदा होने के बाद से ही भारत के टुकड़े करने के लिए मरा जा रहा है। ऐसे में अफजल की बरसी के मौके को आतंक के शोलों से सजाने का मौका भला वह कैसे चुक सकता था वह भी तब जबकि उसे लगता है कि सोपोर के मूल निवासी अफजल के लिए ना सिर्फ कश्मीर घाटी में बल्कि देश की काफी बड़ी जमात के दिलों में भी भारी हमदर्दी है। पाक का यह नापाक अंदाजा कितना गलत है इसकी मिसाल तो अफजल के बेटे ने ही यह कह कर दे दी है कि वह हर्गिज अपने बाप की तरह भारत विरोधी नहीं हो सकता है। इसके बावजूद पाकिस्तान यह दुस्साहस दिखा रहा है कि भारत के भीतर आतंकियों को घुसाकर एक ओर दहशत का माहौल बनाया जाए, भारतीय सुरक्षा व्यवस्था को अधिकतम नुकसान पहुंचाया जाए और अफजल के कथित हमदर्दों को दोबारा जगाया जाए। ऐसे में लाजिमी है कि अब सब्र दिखाने का कोई मतलब नहीं रह गया है। बल्कि हमारे सब्र को अब अगर वह हमारी कमजोरी समझ ले तो इसमें उसकी कोई गलती नहीं होगी, क्योंकि भारत के आम लोगों को भी सब्र के इस प्रदर्शन से राजनीतिक इच्छा शक्ति की कमजोरी का ही एहसास हो रहा है। आज ही सीरिया में इजरायल के एक एफ-16 विमान को ईरान ने गिराया तो बदले में इजरायल ने सीरिया के 16 ठिकानों को भारी बमबारी से ध्वस्त कर दिया। वह भी इसलिए क्योंकि सीरिया से लगती इजरायल की सीमा के भीतर एक ईरान निर्मित द्रोण घुस आया था जिसका संचालन सीरिया की जमीन से हो रहा था। उसी संचालन केन्द्र को ध्वस्त करने के लिए भेजे गए एफ-16 पर हमला किए जाने से चिढ़ कर इजरायल ने सीरिया के 16 महत्वपूर्ण सामरिक ठिकानों को जमींदोज कर दिया। स्वाभाविक है कि इस कड़े सबक के बाद सीरिया और ईरान की हिम्मत ही नहीं होगी कि वह इजरायल की ओर आंख उठा कर देखने की जुर्रत भी करे। काश इजरायल से दोस्ती के एवज में ऐसी हिम्मत, मर्दानगी और इच्छा शक्ति भी हमारी सरकार उससे थोड़ी देर के लिए उधार ले पाती तो पूरी तस्वीर का रूख चुटकियों में बदला जा सकता था। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’ @नवकांत ठाकुर #Navkant_Thakur
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बुधवार, 12 जुलाई 2017
‘सलीम ने बचाया अब सलीम को बचाओ’
‘सलीम ने बचाया अब सलीम को बचाओ’
अनंतनाग में आतंकी हमला करने के लिए सावन महीने के पहले सोमवार को चुनना, अमरनाथ की यात्रा से वापस लौट रहे श्रद्धालुओं की बस को निशाना बनाना और गुजरात नंबर की बस में घुसकर तमाम निर्दोष व निहत्थे यात्रियों को जान से मारने की कोशिश करना यह बताने के लिए काफी है कि आतंकियों का मंसूबा क्या था। बेशक सौ तरह की बातों के बहाने यह समझाने की कोशिश की जा रही है कि गुजरात नंबर की बस का आतंकियों के हत्थे चढ़ जाना महज एक इत्तेफाक था लेकिन वास्तव में देखा जाए तो यह कोई इत्तेफाक नहीं था। इत्तेफाक सिर्फ टायर पंचर हो जाना था जिसके कारण बस के आगे चल रही रोड ओपनिंग टीम से उसका संपर्क समाप्त हो गया। वर्ना टुकड़ों में सामने आ रही खबरों, जानकारियों व तथ्यों को जोड़ कर देखा जाए तो अनंतनाग की आतंकी वारदात का पूरा घटनाक्रम कोई इत्तेफाक नहीं था बल्कि बकायदा सोची-समझी रणनीति के तहत इस दानवी कुकृत्य को अंजाम दिया गया। मसलन खुफिया सूत्र बताते हैं कि आतंकियों ने घटनास्थल की रेकी भी की थी। उन्हें पता था कि बुरहान वानी की मौत की बरसी के बाद सुरक्षाकर्मी राहत की सांस लेंगे। उन्हें यह भी पता था कि अंधेरा हो जाने के बाद भी जम्मू-श्रीनगर राजमार्ग पर रोड ओपनिंग टीम की सुरक्षा में पर्यटकों की गाड़ियां आती-जाती रहती हैं। उन्हें वारदात की धमक दूर तक सुनानी थी। इसके लिए बड़ी गाड़ी को ही उन्हें निशाना बनाना था। वे दो मोटरसाइकिलों पर सवार थे। यानि उन्हें घात लगाकर मुठभेड़ नहीं करनी थी बल्कि बिजली की तरह वारदात को अंजाम देकर धुएं की तरह गायब हो जाना था। मामले की चर्चा अधिक हो इसके लिए जम्मू-कश्मीर से बाहर की गाड़ी को निशाना बनाया गया। साथ ही इसके लिए सोमवार का दिन चुना गया क्योंकि सावन माह के दौरान हिन्दू समाज में सोमवार का खास महत्व है। इस दौरान देश-दुनियां से हिन्दू समाज के लोग अमरनाथ की यात्रा पर आते हैं। उन्हें देश के मौजूदा माहौल का भी पूरा अंदाजा था क्योंकि एक तरफ गौ-हत्या व तीन तलाक सरीखे मामले को लेकर सांप्रदायिक स्तर पर वैचारिक तनातनी का माहौल है तो दूसरी तरफ बंगाल से लेकर केरल तक में सांप्रदायिक टकराव की आग धधक रही है। ऐसे में चेतन भगत सरीखे स्वनामधन्य बुद्धिजीवियों के शब्दों में यह खबर सामने आना देश के सांप्रदायिक माहौल को बुरी तरह बिगाड़ सकता था कि हिन्दू तीर्थयात्रियों की मुस्लिम आतंकियों ने सामूहिक हत्या की है। लेकिन इस पूरे मामले में सबसे सुखद इत्तेफाक रहा बस चालक का मुस्लिम होना। तभी तो आतंकी हमले के बाद दो नाम सबसे ज्यादा चर्चा में हैं। मीडिया हो या सोशल मीडिया, हर जगह सलीम और इस्माइल की बातें हो रही हैं। एक तरफ आतंकी इस्माइल ने भगवान शिव के सात भक्तों की जान ली तो वहीं दूसरी ओर बस ड्राइवर शेख सलीम गफूर ने दिलेरी दिखाते हुए 50 से ज्यादा शिव भक्तों की जान बचा ली। हुआ यूं कि सावन का पहला सोमवार होने के कारण अमरनाथ यात्रा मार्ग पर सामान्य से ज्यादा चहल पहल थी। बाबा बर्फानी के हिमलिंग का दर्शन करने के बाद श्रद्धालुओं की बस लेकर सलीम चल दिया। इत्तेफाक से रास्ते में उसकी बस का टायर पंचर हो गया जिसकी वजह से रोड ओपनिंग टीम आगे निकल गई। बस ठीक होकर अभी चली ही थी कि अचानक आतंकियों ने गोलीबारी शुरू कर दी। लेकिन गुजरात स्थित वलसाड के रहने वाले सलीम ने दिलेरी दिखाते हुए हमले के दौरान यात्रियों से भरी बस को तेजी से भगाना शुरू कर दिया और पुलिस पिकेट के पास जाकर ही उसने बस रोकी। इस तरह सलीम ने आतंकियों के मंसूबे पर पानी फेर दिया, क्योंकि आतंकी अगर बस में चढ़ जाते तो उस बस में सवार एक भी यात्री बच नहीं सकता था। हमले के वक्त बस में करीब 56 लोग सवार थे। सलीम की मानें तो उस वक्त खुदा ने उसे आगे बढ़ते रहने की हिम्मत दी थी इसलिए उसने अंधाधुंध फायरिंग से बचाते हुए बस को तेज गति से भगाया और यात्रियों के प्राणों की रक्षा हो सकी। अब इस मामले को एक अलग पहलू से देखें तो इस पूरी वारदात को अंजाम देनेवाला आतंकी इस्माइल भी सलीम की तरह मुस्लिम ही था लेकिन सलीम ने फरिश्ते का किरदार अदा किया जबकि इस्माइल ने इन्सानियत का गला घोंटा है। बताया जा रहा है कि लश्कर-ए-तैयबा के आतंकी इस्माइल ने अपने तीन अन्य साथियों के साथ मिलकर इस वारदात को अंजाम दिया। बेशक सलीम को इस बहादुरी का पारितोषिक तो मिलना ही चाहिए और उसे वीरता पुरस्कार से नवाजा ही जाना चाहिए। उसने सिर्फ यात्रियों की जान ही नहीं बचाई बल्कि समूचे मुस्लिम समाज की आबरू को बचा लिया। उसने देश की गंगा-जमुनी संस्कृति को सवालों में घिरने से बचाया और प्रधानमंत्री मोदी के उस यकीन की रक्षा की जिसके नाते उन्होंने अमेरिका की धरती पर सीना ठोंक कर कहा था कि भारत का कोई भी मुसलमान राष्ट्रद्रोही नहीं हो सकता है। वाकई सलीम सलाम के काबिल है। लेकिन अफसोसनाक बात है कि कुछ शरारती तत्व सलीम पर संदेह जताते हुए सवाल उठा रहे हैं कि, बस पंचर क्यों हुई? दो टायर कैसे पंचर हुए? दोनों पंचर एक साथ सुधारने की क्या जरूरत थी? वगैरह वगैरह। अब इन्हें कैसे समझाया जाए कि अगर सलीम की इस्माइल से मिलीभगत होती तो आज 7 के बजाए 56 लाशें गिर चुकी होतीं। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’
@नवकांत ठाकुर #navkantthakur
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असहिष्णुता,
कश्मीर,
बेतुकी बयानबाजी,
सुरक्षा
सोमवार, 3 अक्टूबर 2016
‘बात निकली है तो अब दूर तलक जाएगी’
‘बात निकली है तो अब दूर तलक जाएगी’
वाकई दशकों से अनसुना ही तो किया जा रहा था पड़ोसी की उस बात को जो वह हमें सुनाता आ रहा था। उसने अपनी बात सुनाने के लिये क्या-क्या नहीं किया। कभी गालियां दी, कभी हिंसक हुआ। कभी गुदगुदाया भी, कभी तमतमाया भी। सिर्फ इसलिये ताकि उसकी बात सुनी जाये। लेकिन वह बात जिसका कोई मायने-मतलब ही नहीं है। आखिर ऐसी बातों को अनसुना ना करते तो और क्या करते। लेकिन वह नहीं माना। उसकी गुस्ताखियां लगातार बढ़ती गयीं। इस तरफ की खामोशी को उसने कमजोरी समझ ली। उसका हौसला लगातार बुलंद होता गया। लेकिन बर्दाश्त की भी एक हद होती है। और जब वह हद आ गयी, तो हो गया वह, जिसकी हमारे पड़ोसी ने सपने में भी कल्पना नहीं की थी। उसे ऐसी जगह पर ऐसा जख्म दे दिया गया जिसे ना तो वह सह सकता है और ना ही किसी से कह सकता है। कहे भी तो क्या कहे, किससे कहे। तभी तो जख्मों से छलनी होने के बावजूद वह मानने के लिये तैयार ही नहीं है कि उसके किस हिस्से पर कैसा वार हुआ है। कुछ समय के लिये अगर मान भी लिया जाये कि उसके खिलाफ कोई वार नहीं किया गया है तो आखिर यह छटपटाहट और बिलबिलाहट क्यों है? क्यों भारत के तमाम टीवी चैनलों को प्रतिबंधित किया गया है? नवाज शरीफ ने आखिर किस बात की निंदा की है? क्यों लश्कर का मुखिया बिलबिलाहट में जहर उगलता और बदला लिये जाने की धमकी देता घूम रहा है? जब कुछ हुआ ही नहीं है तो किसका बदला, कैसा बदला? यानि वह हुआ तो जरूर है जिसे स्वीकार करने का साहस हमारे पड़ोसी मुल्क में है ही नहीं। आखिर वह दुनियां के सामने यह स्वीकार भी कैसे कर सकता है कि उसके कब्जेवाली जमीन पर आतंकी गतिविधियां संचालित हो रही थीं जिसे भारत ने विध्वंसक कार्रवाई करते ध्वस्त कर दिया है। साथ ही वह अपनी आवाम के सामने यह भी कबूल नहीं कर सकता कि उसके कब्जेवाली जमीन पर चहलकदमी करते हुए पड़ोसी मुल्क की फौज ने बड़े आराम और इत्मिनान के साथ सर्जिकल स्ट्राइक को अंजाम दे दिया और उसकी तमाम रक्षा व्यवस्था को इसकी भनक भी नहीं लग सकी। परमाणु और मिसाइलों की तमाम धौंस का बेअसर रहना भी वह स्वीकार नहीं कर सकता। लेकिन वह स्वीकार करे या ना करे, इतना तो तय है कि पलटवार करने का प्रयास जरूर करेगा। तैयारियां इधर भी पूरी हैं। बस इंतजार है कि वह कुछ करे तो सही। जवाब ऐसा मिलेगा कि सिर्फ इतिहास ही नहीं बदलेगा, पूरा भूगोल बदल जाएगा। वैसे भी पहले पठानकोट और उसके बाद उड़ी में कराए गये आतंकी हमले का करारा जवाब देने के क्रम में अंजाम दिये सर्जिकल स्ट्राइक से ही भारत के सीने में सुलग रही बदले की आग कतई शांत नहीं पड़ सकती है। अभी तो सिर्फ ताजा घाव पर मरहम लगा है, नासूर बन चुके पुराने जख्मों का हिसाब-किताब तो बाकी ही है। यह तो आतंक के खिलाफ सीधी कार्रवाई की महज एक शुरूआत भर है। पाक की ओर से थोपे गये छद्म युद्ध के खिलाफ इसे भारत के पहले औपचारिक प्रतिवाद के तौर पर देखा जाना ही उचित होगा। दूसरे शब्दों में कहें तो आतंक के खिलाफ लंबे समय से जारी लड़ाई का यह छोटा सा पड़ाव मात्र है। सच तो यह है कि बेशक अपनी ओर से आर-पार का युद्ध छेड़ने की पहल करने के विकल्प को आजमाने से परहेज बरतने की नीति बदस्तूर जारी रहनेवाली है लेकिन पाकिस्तान को जंग से भी अधिक जहरीला दर्द देने की राह पर भारत लगातार आगे बढ़ता रहेगा। खैर, सर्जिकल स्ट्राइक को अंजाम देने के अलावा पड़ोसी मुल्क को विश्व बिरादरी में अलग-थलग करने का पड़ाव भी अब पूरी तरह पार होने की कगार पर ही है। अमेरिका द्वारा पाक को औकात में रहने का निर्देश दिया जाना, संयुक्त राष्ट्र द्वारा नवाज शरीफ की तमाम दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया जाना, सार्क देशों द्वारा पाक का पूरी तरह बहिष्कार किया जाना, रूस द्वारा पाक सेना के साथ पूर्वनिर्धारित युद्धाभ्यास स्थगित किया जाना और चीन द्वारा पाक में जारी आतंकी गतिविधियों के खिलाफ मुखर होना यह बताने के लिये काफी है कि विश्व बिरादरी में पाक किस कदर अकेला पड़ता जा रहा है। लेकिन लड़ाई अभी बहुत लंबी है। मौजूदा पड़ावों को ही पर्याप्त मानकर शांत बैठ जाने का मतलब होगा सांप को चोटिल करके छोड़ देना। अभी तो उसे महज कुछ ही जख्म दिये गये हैं। फन कुचलना तो अभी बाकी है। जिस जंग का उसने आगाज किया उसे अंजाम तक तो पहुंचाना ही है। इसके लिये रणनीति भी तैयार है। अब जहां एक ओर आर्थिक नुकसान पहुंचाने के लिये उसे एकतरफा तौर पर दिया गया मोस्ट फेवर्ड नेशन का दर्जा उससे वापस लिया जाना है वहीं मित्र देशों को इस बात के लिये सहमत करना है कि वे भी उसके साथ अपना आर्थिक रिश्ता पूरी तरह खत्म ना भी करें तो अधिकतम कम अवश्य कर लें। साथ ही सिंधु सरीखी नदियों के पानी से उसे महरूम करने की ठोस योजना पर भी जल्दी ही अमल आरंभ होनेवाला है। जाहिर तौर पर ऐसे तमाम विकल्पों अमल करना तब तक जारी रखा जाना चाहिये जब तक पाक प्रायोजित आतंकवाद का समूल नाश नहीं हो जाता है और गुलाम कश्मीर की सरजमीं पर निर्णायक तौर पर भारतीय तिरंगा लहराने में कामयाबी नहीं मिल जाती है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर # Navkant Thakur
सोमवार, 6 जुलाई 2015
‘पड़ोसी को होती है हमारे प्यार से पीड़ा’
इमरान प्रतापगढ़ी ने देश की गंगा-जमुनी तहजीब को बखुबी बयान करते हुए लिखा है कि ‘प्यार की बड़ी इससे और मिसाल क्या होगी, हम नमाज भी पढ़ते हैं गंगा में वजू करके।’ वाकई विभिन्न जाति, धर्म, पंथ व फिरके के बीच ऐसा भाईचारा देखकर किसी को भी जलन होना स्वाभाविक है। ऐसे में अगर हमारी खुशहाली से उसकी छाती पर सांप लोट रहा है जो हमसे जुदा होने के बाद से ही लगातार बदहाली व तंगहाली से गुजर रहा है तो इसमें आश्चर्य की क्या बात है। आश्चर्य तो यह है कि अपनी औकात की हद व जद में रहने के बजाय वह दिनों-दिन उकसावे व बदतमीजियों की तमाम सरहदें लांघने पर उतारू होता जा रहा है। कहने को तो उसके साथ हमारा मसला कश्मीर को लेकर ही फंसा हुआ है लेकिन मसले को सुलझाने का प्रयास करने के बजाय उसकी कोशिश लगातार इसे उलझाये रखने की ही प्रतीत होती है। तभी तो अपने राष्ट्रीय दिवस के मौके पर नई दिल्ली स्थित अपने दूतावास में आयोजित समारोह में शिरकत करने के लिये समूचे हिन्दुस्तान में उसे सबसे बेहतरीन हस्तियां वे ही नजर आयीं जिनकी राष्ट्रभक्ति हमेशा से संदिग्ध रही है। जिनका घोषित एजेंडा इस देश को तोड़ने का है। हालांकि इन अलगाववादियों को अपना रहनुमां या शुभचिंतक मानने की गलती हमारे मुल्क में कतई कोई नहीं कर सकता। लेकिन हमारा पड़ोसी अपनी नापाक साजिशों के तहत ऐसे टुच्चे-मुच्चों को सिर पर बिठाये घूम रहा है जिनमें पंचायत का चुनाव लड़ने की भी हिम्मत नहीं है। ऐसा करने के पीछे उसका मकसद भी स्पष्ट है कि वह इनको खबरों की सुर्खियां दिलाकर ना सिर्फ देश मेें मौजूद भाईचारे के माहौल को बिगाड़ना चाहता है बल्कि कश्मीर के मसले को भी लगातार उलझाए रखना चाहता है। अगर हमारे पड़ोसी की नीयत साफ होती तो वह भी चीन की तर्ज पर सीमा विवाद को यथावत छोड़कर बाकी मसलों पर हमारे साथ एकजुट होने का प्रयास करता ताकि यहां बह रही तरक्की व खुशहाली की बयार का वह भी लुत्फ ले पाता। वह तकनीक, शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा, व्यापार, पर्यटन, खेल व संस्कृति सरीखे मामलों में हमारा फायदा लेता और आपसी भरोसे व दोस्ती के माहौल को उस मुकाम तक ले जाता जहां सरहद के विवाद को अमन व शांति के माहौल में आपसी बातचीत व समझदारी से सुलझाना बेहद आसान हो सकता था। लेकिन दुर्भाग्य की बात यही है कि उसे ना तो अपना हित साधने की चिंता है और ना ही वह हमें अमन व शांति के साथ रहने देना चाहता है। तभी तो उसने लगातार एक ही रट लगाई हुई है कि पहले कश्मीर के मामले को सुलझाओ ताकि बाकी मसलों पर आगे बढ़ने की राह तैयार हो सके। जाहिर है कि अगर उसकी यह जिद है कि कश्मीर का मसला सुलझाए बिना वह कतई हमें चैन से नहीं बैठने देगा तो हमारी सोच भी बड़ी स्पष्ट है कि हम कश्मीर को विवादित मसला मानते ही नहीं हैं। कश्मीर तो हमारा ही था, हमारा ही है और हमारा ही रहेगा। केन्द्र या कश्मीर में सरकार किसी की भी दल या गठजोड़ की हो, वह कतई इस सूबे को देश से अलग करने के प्रस्ताव पर विचार करना भी गवारा नहीं कर सकती है। खैर, मजे की बात यह है कि जिस तरह उसकी खुराफाती मंशा व नापाक चाहतों से हम वाकिफ हैं, उसी प्रकार कश्मीर के मामले में हमारी नीति व नीयत से वह भी कतई अंजान नहीं है। फिर भी बकौल अटल बिहारी वाजपेयी, हम दोस्त तो चुन सकते हैं, पड़ोसी नहीं। साथ ही समूचे हिन्दुस्तान की यही परंपरा है कि अगर पड़ोसी के घर में फांका हो तो किसी को भी अपनी चुपड़ी हजम नहीं होती। तभी तो हमारी ओर से हमेशा यही प्रयास होता रहा है कि हम इस पूरे विवाद को यथावत व यथास्थिति में छोड़कर बाकी मामलों में दोस्ती को मजबूत करने की पहल करें जबकि वह अपनी जिद को पूरा करने के लिये कभी सरहद पर अशांति का माहौल बनाता है तो कभी भाड़े के विदेशी आत्मघाती आतंकियों को यहां भेजकर अमन-चैन का माहौल बिगाड़ने का प्रयास करता है। अलगाववादियों को सिर-आंखों पर बिठाने का भी मकसद तो यही है कि कश्मीर के सीधे-सादे लोगों को बरगलाकर उन्हें अपने ही मुल्क के खिलाफ बगावत करने के लिये उकसाया जाये। जिस कश्मीर के प्रति वह झूठी हमदर्दी का दिखावा करता है वहां के बाशिंदों का वह जरा भी भला चाहता तो सरहदी गांवों को निशाना बनाकर गोलीबारी करने या बम-बारूद से लैस आतंकियों को यहां भेजने के बजाय कश्मीर की तरक्की में सहभागिता का प्रस्ताव हमारे पास भेजता। कुछ नहीं तो हुर्रियत सरीखे अलगाववादियों को कश्मीर का पक्षकार बनाने की जिद ठानने के बजाय वह आमने-सामने की बातचीत से पूरे विवाद को सुलझाने का प्रयास करता। लेकिन उसे बेहतर पता है कि आमने-सामने की बातचीत में कश्मीर पर अपना दावा ठोंकने का उसके पास कोई आधार ही नहीं है, क्योंकि दोनों मुल्कों की आजादी व बंटवारे के बाद कश्मीर के राजा हरि सिंह ने अपने सूबे का भारत में विलय कराने के प्रस्ताव पर स्वेच्छा से दस्तखत किया हुआ है। खैर, तुलसीदास की मानें तो ‘अतिशय रगड़ करे जो कोई, अनल प्रगट चंदन ते होई। यानि शीतलता का सर्वोच्च प्रतीक चंदन भी जब एक सीमा के बाद उकसावे के रगड़ की अनदेखी नहीं कर पाता तो किसी और से ऐसी उम्मीद रखना तो व्यर्थ ही है।
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