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शुक्रवार, 20 दिसंबर 2019

भावी ‘मर्ज’ के भय से उभरा मौजूदा ‘दर्द’

वर्ष 2014 तक पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए तमाम गैर-मुस्लिमों को शरणार्थी और मुसलमानों को घुसपैठिया करार देते हुए गैर-मुस्लिमों को नागरिकता से नवाजने के लिये बनाए गए संशोधित नागरिकता कानून को लेकर पूरा देश बुरी तरह उबल रहा है। कश्मीर से कन्याकुमारी और अटक से कटक तक विरोध की आग धधकती दिखाई दे रही है। इस आग में घी का काम किया है इस कानून के खिलाफ हुए हिंसक प्रदर्शन के दौरान जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में घुसकर पुलिस द्वारा छात्रों पर बल प्रयोग किये जाने की घटना ने।
हालांकि छात्रों के साथ मारपीट के मामले को लेकर देश के 22 से भी अधिक विश्वविद्यालयों में सरकार विरोधी प्रदर्शन होने की बात तो गृहमंत्री अमित शाह भी स्वीकार कर रहे हैं लेकिन वे यह मानने के लिये तैयार नहीं हैं कि इससे सरकार के खिलाफ राष्ट्रव्यापी विरोध की कोई तस्वीर उभर रही है। उनकी तो दलील है कि अगर देश के तकरीबन ढ़ाई सौ सरकारी विश्वविद्यालयों में से सिर्फ 22 में सरकार के खिलाफ आवाज उठाई गई है तो इसे सामान्य विरोध के नजरिये से ही देखा जाना चाहिये और इस मसले को अधिक तूल नहीं दिया जाना चाहिये। साथ ही उनकी समझ में तो यह बात भी नहीं आ रही है कि आखिर संशोधित नागरिकता कानून को लेकर इतना बवाल क्यों कट रहा है। वह भी तब जबकि इस कानून की किसी भी धारा में किसी की भी नगारिकता समाप्त करने का कोई प्रावधान ही नहीं किया गया है। अलबत्ता यह कानून तो भारत के नागरिकों के लिये बनाया ही नहीं गया है बल्कि इसका मकसद तो तीन पड़ोसी मुल्कों से आए घुसपैठियों की दशकों पुरानी समस्या का इलाज करना और धार्मिक आधार पर इन देशों में प्रताड़ित व विलुप्त हो रहे सभी अल्पसंख्यकों को यहां की नागरिकता प्रदान करना है।
निश्चित तौर पर गृहमंत्री ही नहीं बल्कि उनसे जुड़े तमाम संगठनों, सैद्धांतिक सहोदरों और सियासी साथियों की नजर से देखने पर भी संशोधित नागरिकता कानून में ऐसी कोई बात राई-रत्ती भर भी दिखाई नहीं पड़ती है जिसको लेकर पूरा देश सुलग उठे। सभी विरोधी आपसी मतभेदों को भुलाकर एक स्वर से सरकार के खिलाफ सड़क पर हल्ला बोलने लगें। तमाम खासो-आम हाहाकार-चित्कार करे और पूरे शासन-प्रशासन को हर स्तर पर असहज स्थिति का सामना करना पड़े। लेकिन ऐसा हो तो रहा ही है। लिहाजा बड़ा सवाल है कि आखिर इस मामले को लेकर दर्द का ऐसा सैलाब सड़क पर क्यों और किस वजह से उमड़ रहा है? सतही तौर पर देखने से तो यह समझना वाकई बेहद मुश्किल है कि आखिर समूचे देश में मोदी सरकार के खिलाफ विरोध और विद्रोह की आग क्यों धधक रही है लेकिन गहराई से परखने पर ना सिर्फ पूरी तस्वीर स्पष्ट हो जाती है बल्कि तमाम विरोध प्रदर्शन भी जायज दिखाई पड़ते हैं।
दरअसल दर्द का जो सैलाब सड़क पर दिखाई पड़ रहा है उसकी असली वजह वह भावी मर्ज है जो निजाम की ओर से आवाम को दिये जाने का ऐलान संसद में गृहमंत्री ने सीना ठोंक कर किया है। वास्तव में आवाम की ओर से निजाम के खिलाफ ऐलाने जंग की दो बड़ी वजहें हैं। पहली तो संशोधित नागरिकता कानून लागू होने से देश के उन इलाकों में जमीनी स्तर पर होने वाला भाषाई, सांस्कृतिक व सियासी परिवर्तन है जिसका तात्कालिक खामियाजा और बोझ वहां के मौजूदा स्थानीय नागरिकों और उनकी भावी पीढ़ियों के सिर पर वज्रपात करेगा। साथ ही विरोध की दूसरी वजह है आगामी दिनों में तैयार होने वाले राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर यानी एनआरसी में अपना नाम शामिल कराने के लिये आवश्यक कागजात व दस्तावेज नहीं दिखा पाने वाले देशवासियों के साथ इस नागरिकता कानून को आधार बनाकर होने वाले भेदभाव का डर।
अभी बीते दिनों असम में सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश व निगरानी के तहत बनायी गयी एनआरसी की अंतिम सूची में 19 लाख से अधिक लोगों की घुसपैठिये के तौर पर पहचान हुई है। बताया जाता है कि इनमें से 12 लाख घुसपैठिये गैर-मुस्लिम हैं जिनको नए नागरिकता कानून के तहत यहां स्थानीय निवासियों की तरह रहने-बसने का अधिकार मिल जाएगा और बाकियों के लिये गुवाहाटी उच्च न्यायालय के निर्देश पर डिटेंशन सेंटर बनाया जा रहा है जहां उन्हें तमाम अधिक अधिकारों से वंचित करके सिर्फ जीने का हक ही दिया जाएगा। यही वजह है कि नागरिकता कानून का पहला व स्वाभाविक विरोध असम से ही सामने आया है जहां गैर-मुस्लिम विदेशी घुसपैठियों को वहां की नागरिकता मिल जाने के बाद असमिया संस्कार व संस्कृति का बंगालीकरण हो जाने की पूरी संभावना है। इसके अलावा जिन मुस्लिमों को तमाम अधिकारों से वंचित करके डिटेंशन सेंटर में रखा जाएगा उनमें भी बड़ी तादाद में ऐसे लोग शामिल हैं जिनके पुरखों ने भी कभी भारत के बाहर कदम नहीं रखा। यानी वे भारतीय होने का कागजी प्रमाण उपलब्ध नहीं करा पाने के कारण ही नागरिकता से वंचित किये जा रहे हैं।
असम के इस अनुभव के बाद अब पूरे देश में पहले नागरिकता कानून और उसके बाद एनआरसी को लागू करने के सरकार के ऐलान को लेकर भय, घबराहट, आशंका और आक्रोश का माहौल बनना स्वाभाविक ही है। वैसे भी सच तो यही है कि देश के करोड़ों गरीब, असहाय व बेघर-बेसहारा लोग जब अपने जिंदा होने का कागजी प्रमाण प्रस्तुत करने में भी असमर्थ हैं तब वे नागरिकता साबित करने के लिये आवश्यक दस्तावेज कैसे व कहां से लाकर दिखा पाएंगे। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @ Navkant Thakur

गुरुवार, 29 नवंबर 2018

‘उसे कहो कि वो फिर से मुकर न जाए कहीं’

भारत-पाकिस्तान के रिश्ते इन दिनों जिस मोड़ से गुजर रहे हैं उसे सुप्रसिद्ध कवि बल्ली सिंह चीमा के शब्दों में कहें तो- ‘करो न शोर परिन्दा है डर न जाए कहीं, जरा-सा जीव है हाथों में मर न जाए कहीं, वो फिर नए वादों के साथ उतरा है, उसे कहो कि वो फिर से मुकर न जाए कहीं।’ वाकई पाकिस्तान के साथ भारत का जो तजुर्बा रहा है उसमें यह डर लगना स्वाभाविक है कि गले लगने के बहाने कहीं एक बार फिर हमारी पीठ में खंजर ना घोंप दिया जाए। तभी दूध से जलता आ रहा भारत इस बार करतारपुर काॅरिडोर की कथित छाछ भी फूंक-फूक कर पी रहा है। बेशक पाकिस्तान की कोशिश है करतारपुर काॅरिडोर के मामले में गर्मजोशी दिखाकर भारत को एक बार फिर शीशे में उतार लिया जाए और तमाम गतिरोधों को दूर कर रिश्तों पर जमी बर्फ को पूरी तरह पिघला दिया जाए। लेकिन पाकिस्तान की पुरानी करतूतें ऐसी नहीं हैं कि उस पर केवल इस वजह से भरोसा कर लिया जाए क्योंकि उसने दोस्ती की राह पर एक कदम आगे बढ़ते हुए करतारपुर काॅरिडोर को खोलने की दशकों पुरानी हमारी मांग पूरी कर दी है। तभी तो जहां एक ओर सार्क देशों की बैठक में भाग लेने के लिये पाकिस्तान जाने से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ओर से इनकार कर दिया गया है वहीं दूसरी ओर विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने फिर दोहराया है कि आतंकवाद का सिलसिला जारी रहते हुए पाकिस्तान के साथ औपचारिक बातचीत करना संभव ही नहीं है। हालांकि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने बिल्कुल सच कहा है कि दोनों मुल्क एटमी हथियारों से लैस है लिहाजा आपसी मसलों को हल करने के लिये जंग कोई विकल्प ही नहीं है बल्कि जंग के बारे में सोचना भी पागलपन ही है। लेकिन सवाल है कि आखिर ऐसी सोच रखता कौन है और उस दिशा में हमेशा पहलकदमी करने के लिये आतुर कौन रहता है? यह भारत की ओर से की गई पहलकदमियों का ही नतीजा रहा है कि अमन की आशा को पूरा करने के लिये कभी शिमला में समझौता होता है तो कभी शर्म-अल-शेख में। कभी समझौता एक्सप्रेस को हरी झंडी दिखाई जाती है तो कभी कारवां-ए-अमन को आगे बढ़ाया जाता है। इसी कड़ी में अब करतारपुर काॅरिडोर को खोलने की दिशा में दोनों मुल्कों ने पहलकदमी की है। बेशक यह एक नई शुरूआत है, पाकिस्तान में नए निजाम द्वारा शासन की बागडोर संभाले जाने के बाद। लेकिन यह पहली बार नहीं है जब अमन की आशा जगाते हुए सरहद के दोनों तरफ के हुक्मरानों ने इस तरह की पहलकदमी की हो। ऐसी कोशिशें बार-बार और लगातार होती रही हैं। खास तौर से भारत की ओर से। भारत ने हमेशा ही पाकिस्तान को अमन और शांति की दिशा में आगे बढ़ने के लिये प्रेरित किया और बड़े भाई की हैसियत से तमाम पहलकदमियां भी कीं। लेकिन गिले-शिकवे भुलाकर गले लगने की पहलकदमियों के बदले में हर बार पाकिस्तान की ओर से भारत की पीठ में खंजर ही घोंपा गया। कभी संसद पर हमला कराया गया तो कभी कारगिल का युद्ध थोपा गया। कभी 26/11 के मुंबई हमलों की साजिश अंजाम दी गई तो कभी पठानकोट और उड़ी के सैन्य ठिकाने पर हमला हुआ। नतीजन अब स्थिति यह हो गई है कि करतारपुर साहिब काॅरिडोर खुलने के मौके पर भी भारत को एहतियातन कूटनीतिक सावधानी बरतने पर मजबूर होना पड़ रहा है। हालांकि ऐसा नहीं है कि करतारपुर काॅरिडोर खोलने को लेकर दोनों मुल्कों के बीच बनी सहमति से खुशी, उत्साह और उमंग में कोई कमी हो। बल्कि आजादी के बाद से ही इस काॅरिडोर को खोले जाने की जो मांग की जाती रही है उसके पूरा होने पर सियासतदानों से लेकर आम आवाम तक में काफी उत्साह और उमंग है। लेकिन इस उत्साह का अगर दिल खोलकर प्रदर्शन करने के प्रति संकोच दिखाया जा रहा है तो इसकी सबसे बड़ी वजह पाकिस्तान की हरकतों का वह पुराना इतिहास ही है जिसके तहत सुलह की हर बोली का जवाब नफरत की गोली से मिलता आया है। तभी तो पाकिस्तान की ओर से की जा रही खुराफाती हरकतों के प्रति दुख, तकलीफ और आक्रोश के कारण ही इस काॅरिडोर के पाकिस्तान की ओर के हिस्से के शिलान्यास के कार्यक्रम में जाने से पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिन्दर सिंह ने भी परहेज बरता है और विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने भी। यहां तक कि नवजोत सिंह सिद्धू भी निजी हैसियत से ही वहां गए हैं। वर्ना अगर पाकिस्तान ने वाकई अमन की राह पकड़ते हुए खुराफाती आतंकी गतिविधियों को संरक्षण देना और उसका संचालन करना बंद कर दिया होता तो कोई कारण नहीं था कि सरहद के इस तरफ के कार्यक्रम के मुख्य अतिथि इमरान खान होते और सरहद के उस तरफ के कार्यक्रम की शोभा बढ़ाने नरेन्द्र मोदी खुद ही जाते। लेकिन कहते हैं कि चोर अगर चोरी करना छोड़ भी दे तो हेराफेरी करना नहीं छोड़ सकता। शायद तभी इमरान द्वारा काॅरिडोर का शिलान्यास किये जाने के समारोह में आतंकी सरगना हाफिज सईद का सहयोगी और खालिस्तान समर्थक गोपाल चावला भी मौजूद था और पाकिस्तानी सेना प्रमुख कमर जावेद बाजवा से हाथ मिलाता हुआ भी नजर आया। समारोह में चावला की मौजूदगी पाकिस्तान द्वारा रिश्तों में विश्वास की चोरी हो या उसकी फौज द्वारा की गई हेराफेरी, लेकिन इसे नजरअंदाज तो कतई नहीं किया जा सकता। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @नवकांत ठाकुर #Navkant_Thakur

शुक्रवार, 26 अक्टूबर 2018

‘सवाल सीबीआई की आग में राख होती साख का’

वाकई गजब की आग दहक उठी है सीबीआई सरीखी ऐसी संस्था में जो स्वायत्त है, खुद-मुख्तार है। जिसकी स्वायत्तता को बरकरार रखने के इंतजाम कागजी तौर पर इतने ठोस हैं कि सरकार भी सीबीआई के मुखिया को ना तो अपनी मर्जी से पद से हटा सकती है और ना ही उसके दो वर्ष के तयशुदा कार्यकाल की सीमा में कोई फेरबदल कर सकती है। चुंकि सीबीआई के मुखिया की नियुक्ति में प्रधानमंत्री, नेता प्रतिपक्ष और सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश शामिल होते हैं लिहाजा ये तीनों मिलकर ही इस संस्था में कोई फेरबदल कर सकते हैं। ऐसे किलानुमा स्वायत्तता की व्यवस्था के बाद अगर संस्था के दो शीर्षतम अधिकारी आपस में लड़ जाएं, दोनों एक-दूसरे को भ्रष्ट व रिश्वतखोर साबित करने में जुट जाएं और दोनों की यह लड़ाई अदालत की दहलीज तक पहुंच जाए तो मामले की असाधारण संगीनता का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। संस्था भी वह जो कि देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी हो। ऐसे में दांव पर सिर्फ उस संस्था की साख ही नहीं लगती बल्कि देश की प्रतिष्ठा और सरकार की प्रशासनिक क्षमता भी सवालों के घेरे में आ जाती है। लिहाजा जब सीबीआई के डायरेक्टर आलोक वर्मा और स्पेशल डायरेक्टर राकेश अस्थाना ने लंबे समय से जारी अपने शीतयुद्ध को सार्वजनिक तौर पर आर-पार की लड़ाई में तब्दील करने की पहलकदमी कर दी तो सरकार के लिये मूकदर्शक बन कर तमाशा देखते रहना नामुमकिन हो गया। हालांकि इन दोनों के बीच लंबे समय से जारी शीतयुद्ध की सरकार अंतिम वक्त तक अनदेखी ही करती रही। ना तो वर्मा द्वारा अस्थाना की पदोन्नति का विरोध किये जाने का गंभीरता से संज्ञान लिया गया और ना ही अस्थाना द्वारा वर्मा के खिलाफ की जाने वाली शिकायतों को कभी विशेष महत्व दिया गया। सरकार साक्षी भाव से तटस्थ और निष्पक्ष ही बनी रही। लेकिन बात जब एफआईआर दर्ज कराने और अस्थाना की गिरफ्तारी की संभावना तक पहुंच गई तब कुछ ऐसा बच ही नहीं गया जिसकी अनदेखी की जा सके। बात केवल इन दोनों की आपसी लड़ाई की नहीं बल्कि मामला सीबीआई की साख का हो गया जिस पर यह तोहमत लग रही थी कि अपराधियों से रिश्वत लेकर सीबीआई के शीर्ष अधिकारी जांच को बाधित करते हैं और मुजरिमों को राहत पहुंचाते हैं। ऐसे में यह मानना पड़ेगा कि सीमित विकल्पों के बावजूद सरकार ने जो प्रभावी कदम उठाए उससे बेहतर और कुछ भी नहीं हो सकता था। हालांकि इन दोनों की लड़ाई में कौन पीड़ित-प्रताड़ित है और कौन साजिशकर्ता मास्टरमाइंड इसका फैसला तो समुचित व निष्पक्ष जांच के बाद ही होगा। लेकिन फिलहाल सरकार के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती थी सीबीआई की साख को बरकरार रखना, संस्था के काम को प्रभावित होनेे से बचाना और निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करना। इन चुनौतियों से निपटने के लिये सरकार ने ना सिर्फ कार्रवाई में निष्पक्षता सुनिश्चित की बल्कि दोनों के साथ एक-बराबर सलूक करते हुए पूरे मामले को निर्णायक परिणति तक पहुंचाने का प्रभावी इंतजाम भी कर दिया। सरकार ने लंबी छुट्टी पर भेजा तो दोनों को भेजा। एसआईटी से दोनों की बराबर जांच कराने की बात कही गई। दोनों के कार्यालय को एक बराबर तरीके से खंगाला गया और उसमें संस्था के किसी तीसरे को घुसने की इजाजत नहीं दी गई। सीबीआई की कमान भी नंबर तीन कहे जानेवाले नागेश्वर राव को सौंपी गयी जिन्होंने दोनों द्वारा नियुक्त किये गये उनके करीबी अधिकरियों का थोक के भाव में तबादला सुनिश्चित किया। यानि समग्रता में देखें तो विवश होकर सरकार द्वारा सीबीआई में किये गये हस्तक्षेप को किसी भी लिहाज से कतई पक्षपातपूर्ण नहीं कहा जा सकता है। ऐसे में बेहतर होता कि सरकार द्वारा विवशता में उठाए गए इस कदम का एहतराम और सम्मान किया जाता। लेकिन चुनावी वर्ष होने के कारण हर मामले का राजनीतिक पहलू उभारने और सरकार की शासन व प्रशासन क्षमता पर उंगली उठाकर अपनी राजनीति चमकाने का मौका भला कोई कैसे हाथ से जाने दे सकता है। तभी तो वर्मा को सीबीआई का निदेशक बनाये जाने का विरोध करनेवाले अब उन्हें लंबी छुट्टी पर भेजे जाने का भी विरोध कर रहे हैं। विरोध कभी इस स्तर का कि वर्मा के कांधे पर बंदूक रखकर सवोच्च न्यायालय से ऐसा कारतूस हासिल करने का प्रयास किया जा रहा है जिससे सरकार की पगड़ी पर सीधा निशाना दागा जा सके। कांग्रेस तो एक कदम और आगे बढ़ गई और उसने सीबीआई की साख बचाने के लिये सरकार द्वारा उठाए गए कदमों को असंवैधानिक व नियमों के खिलाफ बताते हुए पूरे मामले को राफेल सौदे से जोड़ दिया। जबकि यह सामान्य समझ की बात है कि आखिर राफेल खरीद के मामले से सीबीआई का क्या संबंध हो सकता है? सीबीआई को जब ना तो सरकार ने और ना ही अदालत ने राफेल सौदे की जांच के लिये अधिकृत किया है तो यह कहना वाकई मजाकिया ही है कि राफेल की जांच करने का प्रयास करने के कारण वर्मा पर सरकार का नजला गिरा है। खैर इश्क, जंग और सियासत में जो ना हो जाए वह कम है। वैसे अगर एक मिनट के लिये यह मान भी लिया जाए कि सरकार ने पूरे मामले में बहुत ही गलत किया है तो समस्या गिनाने वालों को कोई ऐसा समाधान भी बताना चाहिये ताकि सीबीआई की साख भी सलामत रहे, दोषियों की पहचान भी हो और निर्दोष को प्रताड़ना से भी बचाया जा सके? ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर #Navkant_Thakur

गुरुवार, 18 अक्टूबर 2018

‘नहीं होने का सवाल ही नहीं था अकबर का इस्तीफा’

इतिहास गवाह है कि किसी भी बड़े आंदोलन की शुरूआत के वक्त उसका उपहास ही होता है। लोग मजाक उड़ाते हैं, फब्तियां कसते हैं और कटाक्ष करते हैं। लेकिन इस शुरूआती प्रतिरोध को झेल कर आंदोलन आगे बढ़ जाए तो फिर उसकी अनदेखी की जाने लगती है। जब अनदेखी से भी आंदोलन की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ता तो अनर्गल प्रलाप करके उसके नकारात्मक पहलुओं को जोर-शोर से उजागर करने का प्रयास किया जाता है। लेकिन इस आखिरी चुनौती से भी आंदोलन टूटता या डिगता नहीं है तो फिर धीरे-धीरे उसके पक्ष में जन-स्वीकार्यता का माहौल बनने लगता है। वही इतिहास महिलाओं के आंदोलन ‘मी-टू’ के साथ भी दोहराया गया है। पहले तो आंदोलन का भरपूर मजाक बनाया गया और पीड़िताओं के प्रति अशोभनीय टिप्पणियां की गईं। बाद में मी-टू के मामलों की अनदेखी भी की गई ताकि ये कहानियां आई-गई होकर समाप्त हो जाएं। यहां तक मामलों को सांप्रदायिक रंग देने और राजनीतिक तौर पर विभाजित करने की भी कोशिश हुई। लेकिन जब तमाम प्रतिरोधों को झेल कर भी पीड़िताएं अड़ी रहीं, डटी रहीं और पीछे नहीं हटीं तो अब उन्हें समाज से स्वीकृति, सहानुभूति और सहयोग भी मिलने लगा है। मी-टू को पहला समर्थन फिल्म इंडस्ट्री से मिला जहां उन लोगों को हाशिये पर धकेला जाने लगा है जिन पर महिलाओं का शोषण करने के आरोप लगे हैं। उसके बाद न्यूज इंडस्ट्री ने मी-टू पीड़िताओं के पक्ष में खड़े होने की पहल की। तमाम खबरिया संस्थानों में उन लोगों को लंबी छुट्टियों पर भेजा जा रहा है और नौकरी से बर्खास्त किया जा रहा है जिन पर महिलाओं ने छेड़छाड़, उत्पीड़न या यौन शोषण के आरोप लगाए हैं। सामाजिक मूल्यों के प्रति अपनी नैतिक प्रतिबद्धता का प्रदर्शन करने के क्रम में स्वतः स्फूर्त तरीके से पीड़ित महिलाओं के साथ हमदर्दी और सहबद्धता दिखाते हुए अब राजनीतिक दल भी मी-टू के मामलों को लेकर सजग हुए हैं और विपक्ष से लेकर सत्तापक्ष तक ने मामलों का संज्ञान लेते हुए ठोस कार्रवाई आरंभ कर दी है। इसी के नतीजे में पहले युवक कांग्रेस यानि एनएसयूआई के राष्ट्रीय अध्यक्ष फिरोज खान से इस्तीफा लिया गया और अब केन्द्रीय विदेश राज्यमंत्री एमजे अकबर को अपने पद से त्याग पत्र देने के लिये विवश किया गया है। हालांकि इन दोनों मामलों को कांग्रेस और भाजपा के बीच नैतिकता की जंग में बढ़त लेने की प्रतिस्पर्धा के तौर पर नहीं देखा जा सकता। बल्कि सच तो यह है कि जिस दिन अकबर पर आरोप लगानेवाली महिलाएं सामने आ गईं उसी दिन भाजपा में रहते हुए अकबर के सार्वजनिक जीवन पर पूर्णविराम लग जाने की बात तय हो गयी। वैसे भी भाजपा का इतिहास रहा है कि महिलाओं के मामले में नाम आने के बाद किसी भी कद या पद के नेता पर कठोरतम कार्रवाई करने में हिचक नहीं दिखाई गई है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण संजय जोशी हैं जिनकी कथित सेक्स सीडी सामने आने के फौरन बाद उन्हें ना सिर्फ केन्द्रीय संगठन महामंत्री के पद से बल्कि पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से भी निष्कासित कर दिया गया। हालांकि बाद में इस बात का सबूत भी सामने आ गया कि जो सीडी संजय जोशी की बतायी जा रही थी उसमें दिख रहे महिला-पुरूष आपस में पति-पत्नी थे। लेकिन इसके बाद भी जोशी को मुख्यधारा की राजनीति में वापसी करने का मौका नहीं दिया गया। इसी प्रकार मेघालय के राज्यपाल के खिलाफ जब राजभवन की महिला कर्मचारियों ने प्रधानमंत्री कार्यालय में शिकायत भेजी तो तत्काल कार्रवाई करते हुए उन्हें पद से हटा दिया गया और अब शायद ही किसी को पता हो कि इन दिनों संघ और भाजपा की सेवा में अपना पूरा जीवन खपा देनेवाले वी. षणमुगनाथन कहां और किस हाल में निर्वासित एकाकी जीवन बिता रहे हैं। मध्यप्रदेश के वरिष्ठ नेता व वित्तमंत्री राघवजी पर जब यौन-उत्पीड़न करने का आरोप लगा तो उन्हें भी किनारे लगा दिया गया। ऐसा ही नाम तरूण विजय का भी है जिन पर शहला मसूद नामक महिला के साथ अंतरंग संबंध रखने का आरोप लगा तो उन्हें सक्रिय राजनीति से बाहर फेंक दिया गया। बताया तो यहां तक जाता है कि पार्टी के संगठन मंत्री राम माधव को केवल इसी वजह से राज्यसभा में नहीं भेजा गया क्योंकि उन पर कुछ आपत्तिजनक इल्जामों की अफवाह उड़ गयी थी। यूपी का सह-प्रभारी रहते हुए भाजपा को लोकसभा चुनाव में ऐतिहासिक सफलता दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभानेवाले रामेश्वर चैरसिया की कहानी भी कुछ इसी प्रकार की बतायी जाती है। यानि कहने का तात्पर्य यह कि अनैतिक संबंधों के आरोपों को लेकर भाजपा हमेशा ही संवेदनशील रही है और आरोपी नेताओं के खिलाफ कठोरतम कार्रवाई करती रही है। भले ही आरोपी संगठन में सबसे ताकतवर ओहदे पर विराजमान संजय जोशी सरीखा राष्ट्रीय महामंत्री ही क्यों ना हो। ऐसे में जब कभी ना कभी विदेश राज्यमंत्री एमजे अकबर की करतूतों से आहत होने वाली बीसियों महिलाएं सामने आकर आरोप लगा रही थीं तब यह कल्पना से भी परे था कि भाजपा संगठन या मोदी सरकार में किसी भी स्तर पर  उनका बचाव किया जाएगा। वैसे भी जब सुषमा स्वराज और मेनका गांधी से लेकर से लेकर स्मृति ईरानी तक ने ही नहीं बल्कि आरएसएस में नंबर दो ही हैसियत रखनेवाले दत्तात्रेय होसबोले ने भी मी-टू मूवमेंट को खुल कर सराहने में कसर नहीं छोड़ी तब सिर्फ इंतजार ही बाकी था कि अकबर खुद पद छोड़ेंगे या धक्का देकर हटाए जाएंगे। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर #Navkant_Thakur

शनिवार, 22 सितंबर 2018

‘श्रेय की सियासत में दफन होती सिद्धू की सिद्धि’

स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी अक्सर कहा करते थे कि- ‘छोटे मन से कोई बड़ा नहीं होता, टूटे मन से कोई खड़ा नहीं होता।’ वाकई इतिहास के पन्नों में सुनहरे हर्फों में बड़ा नाम दर्ज कराने के लिये मन का बड़ा होना भी उतना ही आवश्यक है जितना कर्मों का बड़ा होना। लेकिन बड़ा काम करने के बाद छोटे मन का प्रदर्शन करते हुए श्रेय हासिल करने की होड़ में शामिल होने का नतीजा क्या होता है यह पंजाब सरकार के कांग्रेसी मंत्री व पूर्व क्रिकेटर नवजोत सिंह सिद्धू को देखकर आसानी से समझा जा सकता है। बीते दिनों उन्होंने काम तो बहुत बड़ा किया था। उन्होंने इमरान खान को पाकिस्तान का वजीर-ए-आजम चुने जाने पर बधाई देने के बहाने परोक्ष तौर पर दोनों मुल्कों के बीच की उस डोर को नए सिरे से जोड़ने की पहल की जिसे जोड़ने के अलावा दोनों मुल्कों के पास कोई दूसरा विकल्प ही नहीं है। उन्हें यह मौका दिया केन्द्र की मोदी सरकार ने और उन्होंने भी अपनी पार्टी के नेताओं की नाराजगी की परवाह किए बगैर इस बड़े काम को पूरा करने की दिशा में पूरे आत्मविश्वास के साथ पहल की। दरअसल पाकिस्तान के 22वें प्रधानमंत्री के तौर पर अपने शपथ ग्रहण का साक्षी बनने के लिये इमरान ने तीन भारतीय क्रिकेटर दोस्तों को बुलाया जिनमे कपिल देव और सुनील गावस्कर के अलावा सिद्धू का नाम शामिल था। गावस्कर ने तो विनम्रता से अपनी विवशता दर्शाते हुए बता दिया कि व्यावसायिक व्यस्तताओं के कारण वे शपथ ग्रहण का साक्षी नहीं बन पाएंगे। लेकिन सरकार से अनुमति मिलने पर ही पाकिस्तान जाने की बात सिद्धू ने भी कही और कपिल ने भी। इसके बाद सिद्धू के जाने और कपिल के नहीं जा पाने से यह साफ हो गया कि सरकार ने बेहद सधे व सटीक तरीके से कूटनीतिक कदम आगे बढ़ाया है। वैसे भी अगर सरकार चाहती तो सिद्धू की यात्रा को आसानी से रोक सकती थी। लेकिन विदेशमंत्री सुषमा स्वराज ने सिद्धू को तोते की तरह रटाकर व समझा-बुझाकर इन नसीहतों के साथ पाकिस्तान भेजा कि अव्वल तो वे वहां अति-उत्साह नहीं दिखाएंगे और दूसरे ऐसा कुछ नहीं करेंगे जिससे देश व देशवासियों की भावना आहत हो। साथ ही उन्हें सुषमा ने हमेशा यह बाद अपने दिमाग में रखने की हिदायत दी कि उन्हें लौटकर भारत ही आना है क्योंकि यही उनका अपना देश है। वैसे भी सिद्धू को इस्लामाबाद भेजने के लिये चुनना बेहतरीन कूटनीतिक पहल थी क्योंकि वे ना सिर्फ विपक्षी खेमे के धारदार व आक्रामक नेता हैं बल्कि उनकी वाक्पटुता की पाकिस्तानी निजाम से लेकर वहां की आवाम भी कायल है। सिद्धू ने भी वहां जाकर शांति का झरोखा खोलने के अभियान में सिद्धि हासिल करके यह दर्शा दिया कि उन पर भरोसा किया जाना बिल्कुल सही था। हालांकि शपथ ग्रहण के कार्यक्रम में पाकिस्तानी कब्जेवाले कश्मीर के राष्ट्रपति मसूद खान की बगल वाली कुर्सी पर सिद्धू बैठने और पाकिस्तान के सेना प्रमुख कमर जावेद बाजवा के गले लगने को लेकर कांग्रेसनीत विपक्ष से लेकर भाजपानीत सत्तापक्ष तक ने उनकी काफी आलोचना की लेकिन तटस्थता व निष्पक्षता से देखा जाये तो वे पूरी गर्मजोशी के साथ वहां गए और गरिमापूर्ण ढ़ंग से वापस भी आए। वहां जाकर उन्होंने वही बातें कीं जिसकी शांति व अमन की आशा में पाकिस्तान दौरे पर गए किसी भी सच्चे भारतीय से अपेक्षा की जा सकती है। उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री वाजपेयी की उसी नीति को आगे बढ़ाया कि दोस्त बदले सकते हैं लेकिन पड़ोसी नहीं बदल सकते। उनकी यात्रा का हासिल यह रहा कि अव्वल तो पाकिस्तान की ओर से बातचीत की पेशकश हुई और दूसरे दुनिया को दिखाने के लिये पाकिस्तान ने घोषणा की कि गुरूनानक देख के 500वें प्रकाश पर्व के मौके पर उस करतारपुर बाॅर्डर को भारतीय श्रद्धालुओं के लिये खोल दिया जाएगा जिसे बंटवारे और आजादी के बाद से ही उसने बंद किया हुआ है। हालांकि भारत सरकार ने कूटनीतिक तौर पर पाकिस्तान को औकात में लाने के लिये उसकी किसी बात को तवज्जो नहीं देने की ही नीति अपनाई हुई है और प्रयास हो रहा है कि उसे इतना झुकाने के बाद ही इस तरफ से उसकी किसी पहल का समुचित जवाब दिया जब वह सिर्फ बोली में बात करे और गोली की जुबान से तौबा कर ले। लेकिन करतारपुर काॅरीडोर खुलने संभावना को भुनाने के लिये सिद्धू ने जो हरकत की है वह वाकई बेहद दुर्भाग्यपूर्ण व शर्मनाक है। पूरे किये-धरे का राजनीतिक लाभ लेने और भारत की ओर से पाक पर बनाए गए दबाव के साथ खिलवाड़ करने के क्रम में सिद्धू ने कैसी बचकानी हरकत की है उसे से इसी से समझा जा सकता है कि पूर्व केन्द्रीय मंत्री व कांग्रेस के राज्यसभा सांसद एमएस गिल ने सुषमा स्वराज से मुलाकात का समय मांगा जबकि मिलने के लिये गिल के पीछे-पीछे सिद्धू भी पहुंच गए। साथ ही सिद्धू अपने साथ एक फोटोग्राफर को भी ले गये थे ताकि बाद में दुनिया को बता सकें कि उनके कहने पर ही भारत सरकार पाक के साथ संबंध सुधारने और करतारपुर साहेब का दरवाजा खुलवाने की पहल कर रही है। सिद्धू को समझना चाहिये कि विदेश नीति का मसला दलगत राजनीति से बहुत ऊपर होता है और यह दो देशों के बीच हितों के संतुलन पर टिका होता है जिसमें भारतीय नागरिक होने के नाते उनका फर्ज बिना किसी लोभ-लाभ के सिर्फ भारत का हित सुरक्षित करना है। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर #Navkant_Thakur

शनिवार, 1 सितंबर 2018

‘तेल के खेल की तह से निकलता निदान’

महंगाई का मसला हमारे देश में सियासी तौर पर हमेशा से ही इतना संवेदनशील रहा है कि कभी प्याज की बढ़ी कीमतों के कारण सरकार बदल गई तो कभी अनाज या दलहन के अभाव ने सत्ताधारियों की साख चैपट कर दी। इस बार आग लगी है पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों में। आलम यह है कि तमाम कोशिशों के बावजूद डीजल-पेट्रोल की कीमतें सुरसा की तरह अपना विस्तार करती दिख रही हैं। नतीजन इस मसले पर सरकार को घेरने के लिये राजनीति भी हो रही है और आम लोग भी त्राहिमाम् करते दिख रहे है। हालांकि डीजल-पेट्रोल को जीएसटी के दायरे में लाकर और इस पर से करों का बोझ कम करके लोगों को फौरी राहत अवश्य दी जा सकती है। लेकिन चुंकि यह समस्या देश की अंदरूनी नीतियों के कारण खड़ी नहीं हुई है लिहाजा घरेलू जुगाड़ से इस समस्या के समाधान का प्रयास दूरगामी तौर पर कतई कारगर साबित नहीं हो सकता। सच तो यह है कि पेट्रोलियम पदार्थों की बढ़ती कीमतों की समस्या विश्व व्यवस्था की ओर से भारत पर थोपी व लादी गई है जिसके सामने घुटने टेकने का मतलब होगा विकास व तरक्की की गति से समझौता करना। हालांकि कच्चे तेल की आपूर्ति करनेवाले देशों के संगठन ओपेक के समक्ष भारत लगातार गुहार-मनुहार करता रहा है कि वे अपने रवैये में सुधार लाएं और मुनाफे के लिये मनमानी नीतियों पर अमल ना करें। लेकिन ओपेक देशों द्वारा मुनाफे के लिये कच्चे तेल के उत्पादन में कटौती का सिलसिला लगातार जारी है। दरअसल दुनिया के बड़े तेल उत्पादक देश आपूर्ति पर नियंत्रण बना कर मनमुताबिक कीमतें तय करने के मकसद से ही वर्ष 1960 में ओपेक का मंच बनाकर एकजुट हुए थे। लेकिन 1998 में कच्चे तेल की कीमतें सर्वकालिक न्यूनतम स्तर यानि 10 डाॅलर प्रति बैरल पर आ गईं तब वर्ष 2000 में ओपेक ने तय किया कि कच्चे तेल की कीमत 22 डॉलर से नीचे जाने पर उत्पादन में कटौती की जाएगी और 28 डॉलर प्रति बैरल की कीमत पर आने के बाद ही उत्पादन बढ़ाया जाएगा। हालांकि बाद के सालों में कच्चे तेल की कीमतें न्यूनतम स्तर पर ही रहीं और आपूर्ति की तुलना में निरंकुश उत्पादन की होड़ लगी रही। नतीजन तमाम तेल उत्पादक देशों का घाटा बढ़ने लगा और आखिरकार ओपेक के अलावा अन्य तेल उत्पादक देशों ने भी ओपेक प्लस के नाम से एक मंच बना कर वर्ष 2017 से उत्पादन में 18 लाख बैरल प्रतिदिन की कटौती करने संबंधी एक समझौता कर लिया। नतीजन कच्चे तेल की कीमतें 27 डॉलर से बढ़कर 80 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गईं। इस बीच हाल के कुछ महीनों में वेनेजुएला, लीबिया और अंगोला ने तेल आपूर्ति में लगभग 28 लाख बैरल प्रतिदिन की कटौती की है। साथ ही वेनेजुएला की अर्थव्यवस्था के जमींदोज होने और ईरान पर अमेरिका द्वारा प्रतिबंध लगा दिये जाने के बाद तेल के खेल में चारों तरफ आग ही आग की स्थिति दिख रही है। हालांकि भारत द्वारा दूरगामी तौर पर मांग में कमी करने की चेतावनी और ऊर्जा आवश्यकताओं के लिये अपनी आत्मनिर्भरता बढ़ाने का संकेत दिये जाने के बाद बीते दिनों ओपेक ने कच्चे तेल का उत्पादन एक लाख बैरल प्रतिदिन बढ़ाने का निर्णय अवश्य किया है। लेकिन इससे ना तो समस्या का स्थाई समाधान संभव है और ना ही भविष्य के प्रति निश्चिंत हुआ जा सकता है। ऐसे में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा नाले के गैस से चूल्हा जलाने की कहानी सुनाना वास्तव में ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में तकनीक की आवश्यकता की ओर इशारा है और इस ओर प्रधानमंत्री की नजरें गड़ी होने का सीधा मतलब है कि अब भारत की पहली प्राथमिकता ऊर्जा के लिये विदेशों पर निर्भरता की विवशता से निजात पाना है। बीते सप्ताह बायोफ्यूल से विमान उड़ाकर बॉम्बार्डियर क्यू-400 द्वारा 20 सवारियों के साथ देहरादून से राजधानी दिल्ली के बीच के स्वर्णिम सफर के सपने को साकार किया जाना भी उसी सिलसिले की कड़ी है। दरअसल अब बेहद आवश्यक हो गया है कि हम वैकल्कि ऊर्जा श्रोतों पर गंभीरता से ध्यान दें और पेट्रोलियम पर अपनी निर्भरता को यथासंभव कम करें। इसके लिये इसी साल नैशनल पॉलिसी फॉर बायोफ्यूल भी तैयार की गई है जिसके मुताबिक अगले चार सालों में एथेनॉल के उत्पाद को तीन गुना तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है। इसके अलावा बायोफ्यूल, बायोगैस व सौर ऊर्जा पर भी ध्यान केन्द्रित किया जा रहा है और घरेलू संसाधनों से ऊर्जा जरूरतें पूरी करने की कोशिश की जा रही है। वैकल्पिक अक्षय ऊर्जा को लेकर भारत की जो नीति है उसके तहत वर्ष 2025 तक प्रतिदिन के तेल की खपत में 10 लाख बैरल की भारी कमी आएगी। इसके लिये इलेक्ट्रोनिक व गैर-पेट्रोलियम चालित वाहनों को टोल टैक्स से छूट देने की योजना भी बन रही है और नीति आयोग सरकार को यह सलाह भी दे रहा है कि ऐसे वाहनों की खरीद पर डेढ़ लाख तक की सब्सिडी भी मुहैया कराई जाए ताकि आम लोगों को वैकल्कि ईंधन का इस्तेमाल बढ़ाने के लिये प्रेरित किया जा सके। जाहिर है कि वैकल्पिक ईंधन का काफी बड़ा श्रोत खेतों में उपजेगा जिससे निश्चित ही भारत के किसानों को सीधा लाभ होगा और प्रदूषण के स्तर में भी कमी आएगी। साथ ही तेल का आयात करने में खर्च होनेवाली विदेशी मुद्रा की भी बचत होगी और ऊर्जा में आत्मनिर्भरता से सशक्त भारत की तस्वीर उभर कर सामने आएगी। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर #Navkant_Thakur

सोमवार, 26 फ़रवरी 2018

अनवरत हो रहा विकास... मगर किसका?

अनवरत हो रहा विकास... मगर किसका?

देश को अंग्रेजों से आजादी मिले 71 साल होने को आए। तब से लेकर अब तक देश का लगातार विकास ही हो रहा है। तमाम सरकारें विकास में अपना योगदान देती आ रही हैं। इसका नतीजा भी दिख रहा है कि आज हमारा देश दुनियां की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है। सबसे दिलचस्प बात यह है कि छठे नंबर पर आने के लिए हमने उस ब्रिटेन को जीडीपी की दौड़ में पीछे छोड़ा है जिसने हमें दो सौ साल तक अपना गुलाम बनाकर रखा। इसके अलावा अंतरिक्ष में हम मंगल तक पहुंच चुके हैं। जमीन पर भी पूरी दुनिया में किसी की मजाल नहीं है कि हमें अलग करके विश्व राजनीति के किसी समीकरण की कल्पना भी कर ले। हर क्षेत्र में विकास की तमाम ऊंचाइयां लांघते हुए वाकई हमारा देश विकासशील से विकसित होने की ओर छलांग लगा चुका है। लेकिन विकास की इस अनवरत यात्रा की राहों में हम इतने मशगूल हो गए हैं कि अब यह पता नहीं चल पा रहा कि आखिर इस राह की मंजिल कहां है और इसका मकसद क्या है। अगर सिर्फ कागजों में दिखाने के लिए विकास हो रहा है तब तो कहने या सुनने के लिए कुछ रह ही नहीं जाता है। क्योंकि देश के आम लोगों के लिए तो इस विकास यात्रा का आज भी कोई खास मायने या मतलब नहीं दिख रहा है। अलबत्ता भारत की मौजूदा तस्वीर उस रेल की तरह दिख रही है जिसमें आम आदमी जनरल डिब्बों में घास-भूसे की तरह ठुंसकर सफर करता है और खास आदमी अत्याधुनिक सुख-सुविधाओं से लैस पूरे डब्बे के आकार के सैलून कोच में अकेले सफर का आनंद लेता है। कोई दूसरा झांक भी नहीं सकता उसके कोच में। ट्रेन में पहले, दूसरे व तीसरे दर्जे के वातानुकूलिक डिब्बे भी रहते हैं और स्लीपर क्लास भी होता है। लेकिन आम आदमी का जीवन जनरल से स्लीपर की औकात बनाने में बीत जाता है और स्लीपर वाला तीसरे दर्जे के वातानुकूलित डिब्बे में जाने की जद्दोजहद में जुटा रहता है। अलबत्ता ट्रेन की हालत हर दिन ऐसी ही दिखती है जैसे आम आदमी को घुसने या लटकने भर की इजाजत देकर उसने बहुत बड़ा एहसान कर दिया हो। तभी तो एक ओर दुनिया के 119 देशों में भुखमरी की स्थिति के बारे में आयी रिपोर्ट में भारत को शर्मनाक ढ़ंग से 100वें पायदान पर खड़ा होना पड़ा है। भुखमरी सूचकांक में हमसे बेहतर स्थिति में नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका जैसे पड़ोसी देश हैं। यह स्थिति तब है जबकि फोर्ब्स की हालिया सूची के मुताबिक विश्व के शीर्ष 10 धनवानों में सबसे ज्यादा भारत के ही लोग हैं। विकास के असंतुलन का आलम यह है कि एक ओर अंतरिक्ष को भेदकर मंगल पर ठिकाना बनाने की योजना बन रही है जबकि दूसरी ओर केरल में एक नीम-पागल आदिवासी युवक को पढ़े-लिखे सभ्य समाज के लोग सिर्फ इसलिये पीट-पीटकर मार डालते हैं क्योंकि उसने पेट की आग बुझाने के लिए एक किलो चावल चुराने का गुनाह कर दिया। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर विकास की अंधी दौड़ का मकसद क्या है? इसका निर्णायक मुकाम कहां है? अगर विकास का मकसद सबको पेट भर भोजन मुहैया कराना होता तो देश में भूख से मौतें नहीं हो रही होतीं। केरल में आदिवासी युवक को महज एक किलो चावल के पीछे अपनी जान नहीं गंवानी पड़ती। झारखंड में मां की गोद में सिर रखकर ‘भात-भात’ रटते हुए मासूम संतान को तड़पकर मरना नहीं पड़ता। यानि लोगों का पेट भरने के लिए तो नहीं हो रहा है यह विकास। यह विकास लोगों को तन ढ़ांपने का कपड़ा या सिर छिपाने की छत देने के लिए भी नहीं हो रहा है। अगर ऐसा होता तो दिल्ली की सड़कों पर ही सरकारी आंकड़ों के मुताबिक ऐसे डेढ़ लाख लोगों का बसेरा नहीं होता जिनके पास कुछ भी नहीं है। इस कुछ भी नहीं होने का मतलब वाकई कुछ भी नहीं होना ही है। जब देश की राजधानी में यह स्थिति है तो बाकी इलाकों की व्यथा-कथा का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। यानि गुजरात में जो नारा दिया गया कि विकास पागल हो गया है वह कतई गलत नहीं था। पागल उसको ही तो कहते हैं जिसे पता ही नहीं कि वह क्या कर रहा है और क्यों कर रहा है। खैर, अगर यह भी मान लें कि 70 सालों से अनवरत होता आ रहा विकास देश और देशवासियों की खुशहाली के लिए है तब तो खुशहाली को ही विकास का पैमाना बनाना चाहिए था। जैसा कि भूटान ने बनाया हुआ है। वह जीडीपी के बजाए खुशहाली से अपनी तरक्की को नापता है। भूटान के लिए आम लोगों की खुशहाली मायने रखती है। भले इसके लिए जीडीपी के आंकड़ों को गर्त में ही क्यों ना पहुंचाना पड़े। इसका नतीजा यह है कि वहां के लोग खुश हैं। उन्हें किसी वैश्विक दौड़ या होड़ की परवाह नहीं है। वहां संतुष्टि और खुशहाली के साथ आवश्यक व अनवरत विकास भी हो रहा है। इसके उलट हमारे यहां जो विकास हो रहा है उसमें ना तो सबके लिए रोटी, कपड़ा व मकान की उपलब्धता सुनिश्चित हो रही है और ना ही पढ़ाई, दवाई और कमाई का सबको जुगाड़ मिल पा रहा है। यानि खुशहाली की कौन कहे यहां तो बुनियादी मसले ही हल नहीं हो पा रहे हैं। फिर किसका विकास, कैसा विकास, किस लिए विकास। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’  @नवकांत ठाकुर #Navkant_Thakur

सोमवार, 12 फ़रवरी 2018

‘‘सब्र...., आखिर कब तक....???’’

‘‘सब्र...., आखिर कब तक....???’’

एक बार फिर सुंजवां में वही हुआ जो पहले पठानकोट और उड़ी में हो चुका था। सरहद पार कर आतंकी आए और उन्होंने आर्मी कैंप पर धावा बोल दिया। अंदर घुसकर तबाही मचाने की कोशिश की और ऐसी जगह पोजीशन लेकर बैठ गए जहां से लंबे समय तक सुरक्षा बलों को छकाया जा सके। वैसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि उन्हें मार डालने में हमारे सुरक्षा बल हर बार कामयाब हो जाते हैं। अलबत्ता फर्क इस बात से पड़ता है कि उनसे निपटने में हमारे फौजियों को भी जान से हाथ धोना पड़ता है और सरहद के भीतर उन्हें शांतिकाल में शहादत देने के लिए विवश होना पड़ता है। इस वारदात को अंजाम देने के लिए उस तारीख का चयन किया जाना संकेतों में बहुत कुछ बता रहा है जिस दिन पांच साल पूर्व संसद हमले के आरोपी अफजल गुरू को फांसी दी गई थी। ऐसे में हमले के लिए आज की तारीख का चयन करने के पीछे की सोच और मकसद को भी समझने की जरूरत है। जिस वारदात को पाकिस्तानी आतंकी मनचाहे समय व तारीख पर अंजाम देने में सक्षम हैं उस हरकत को तो मौका मिलते ही कभी भी अंजाम दिया जा सकता था। फिर इसके लिए इस तारीख का चयन करने की आखिर क्या जरूरत थी? वास्तव में देखा जाए तो अफजल गुरू का मामला बेहद ही विचित्र है। कहीं ना कहीं उसको महिमामंडित करने का काम हमारी सियासत ने भी किया है और प्रचार के भूखे उन बुद्धिजीवियों ने भी जिनकी नजर में धर्मनिरपेक्ष होने के लिए मुस्लिम परस्त और हिन्दू विरोधी होना निहायत ही आवश्यक है। कहीं ना कहीं अफजल के बारे में यह मान लिया गया कि उसे देश के अल्पसंख्यकों का समर्थन हासिल है और इसी वजह से सर्वोच्च न्यायालय द्वारा उसे फांसी पर चढ़ाए जाने का आदेश दे दिये जाने के बावजूद पहले तो सालों तक आदेश के अनुपालन को व्यवस्थागत पेंचो-खम में बुरी तरह उलझा कर रखा गया और बाद में जब उसे फांसी से बचाने का आरोप लगने पर तत्कालीन संप्रग सरकार की छवि खराब होने लगी तब कहीं जाकर उसे लटकाने की पहल की गई। लेकिन दूसरी ओर अफजल के कई प्रबुद्ध और नामचीन बुद्धिजीवी हिमायतियों ने उसे फांसी के फंदे से बचाने के लिए अंतिम समय तक अपनी कोशिशें जारी रखीं और इसके लिए सर्वोच्च न्यायालय को ऐतिहासिक तरीके से रात के दो बजे सुनवाई करनी पड़ी। यहां तक कि अफजल को हीरो बनाने का प्रयास उसे फांसी दिए जाने के बाद भी जारी रहा और उसकी फांसी के बाद कई दिनों तक कश्मीर घाटी सुलगती रही, कफ्र्यू लगाना पड़ा और विरोध प्रदर्शनों में कई मौतें भी हुईं। अफजल के महिमामंडन का यह सिलसिला आज भी जारी है और जेएनयू जैसे संस्थान में ‘तुम कितने अफजल मारोगे, हर घर से अफजल निकलेगा’ का नारा बुलंद होता रहता है और ऐसा करने वालों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करने के लिए देश के कई बड़े राजनेता व बुद्धिजीवी सामने आते रहते हैं। बेहद स्वाभाविक है कि भारत के भीतर अफजल को लेकर होने वाली इन गतिविधियों पर पाकिस्तान की भी पैनी निगाहें लगी रही हैं जो पैदा होने के बाद से ही भारत के टुकड़े करने के लिए मरा जा रहा है। ऐसे में अफजल की बरसी के मौके को आतंक के शोलों से सजाने का मौका भला वह कैसे चुक सकता था वह भी तब जबकि उसे लगता है कि सोपोर के मूल निवासी अफजल के लिए ना सिर्फ कश्मीर घाटी में बल्कि देश की काफी बड़ी जमात के दिलों में भी भारी हमदर्दी है। पाक का यह नापाक अंदाजा कितना गलत है इसकी मिसाल तो अफजल के बेटे ने ही यह कह कर दे दी है कि वह हर्गिज अपने बाप की तरह भारत विरोधी नहीं हो सकता है। इसके बावजूद पाकिस्तान यह दुस्साहस दिखा रहा है कि भारत के भीतर आतंकियों को घुसाकर एक ओर दहशत का माहौल बनाया जाए, भारतीय सुरक्षा व्यवस्था को अधिकतम नुकसान पहुंचाया जाए और अफजल के कथित हमदर्दों को दोबारा जगाया जाए। ऐसे में लाजिमी है कि अब सब्र दिखाने का कोई मतलब नहीं रह गया है। बल्कि हमारे सब्र को अब अगर वह हमारी कमजोरी समझ ले तो इसमें उसकी कोई गलती नहीं होगी, क्योंकि भारत के आम लोगों को भी सब्र के इस प्रदर्शन से राजनीतिक इच्छा शक्ति की कमजोरी का ही एहसास हो रहा है। आज ही सीरिया में इजरायल के एक एफ-16 विमान को ईरान ने गिराया तो बदले में इजरायल ने सीरिया के 16 ठिकानों को भारी बमबारी से ध्वस्त कर दिया। वह भी इसलिए क्योंकि सीरिया से लगती इजरायल की सीमा के भीतर एक ईरान निर्मित द्रोण घुस आया था जिसका संचालन सीरिया की जमीन से हो रहा था। उसी संचालन केन्द्र को ध्वस्त करने के लिए भेजे गए एफ-16 पर हमला किए जाने से चिढ़ कर इजरायल ने सीरिया के 16 महत्वपूर्ण सामरिक ठिकानों को जमींदोज कर दिया। स्वाभाविक है कि इस कड़े सबक के बाद सीरिया और ईरान की हिम्मत ही नहीं होगी कि वह इजरायल की ओर आंख उठा कर देखने की जुर्रत भी करे। काश इजरायल से दोस्ती के एवज में ऐसी हिम्मत, मर्दानगी और इच्छा शक्ति भी हमारी सरकार उससे थोड़ी देर के लिए उधार ले पाती तो पूरी तस्वीर का रूख चुटकियों में बदला जा सकता था। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’ @नवकांत ठाकुर #Navkant_Thakur

सोमवार, 22 अगस्त 2016

चीन की चतुराई से बचने में भलाई

चीन की चतुराई से बचने में भलाई


चीन वाकई बेहद चतुर-चालाक ही नहीं बल्कि कुटिल भी है। साथ ही हर चतुर-चालाक की तरह वह भी दूसरों को बेवकूफ ही समझता है। लेकिन भारत को बेवकूफ समझने की गलती अब उसे बेहद महंगी पड़ती दिख रही है। तभी तो भारत के साथ संबंधों को संभालने और संवारने के लिए उसने अपनी कोशिशें तेज कर दी हैं। इसी सिलसिले में उसने औपचारिक तौर पर स्पष्ट कर दिया है कि कश्मीर मसले पर भारत-पाक के बीच जारी विवाद में हस्तक्षेप करने या किसी एक के पक्ष-विपक्ष में खड़े होने का उसका कोई इरादा नहीं है। साथ ही चीनी विदेशमंत्री वांग यी ने अपनी हालिया दिल्ली यात्रा के दौरान परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) में भारत की सदस्यता के मसले पर भविष्य में नरमी बरते जाने का संकेत देने में भी कोई कोताही नहीं बरती है। यानि भारत के साथ विश्वास बहाली के लिये चीन ने कूटनीतिक कवायदें काफी तेज कर दी हैं। लेकिन मसला है इमानदारी का है जिससे दूर-दूर तक चीन का कभी कोई नाता रहा ही नहीं है। उसके लिए सर्वोपरि है अपना हित। इसके लिए वह कभी भी झुक सकता है, और तन सकता है। उसने भारत की तरफ नए सिरे से दोस्ती का हाथ बढ़ाने की जो पहल की है वह भी उसकी इसी कूटनीति का हिस्सा है। लेकिन मसला है भरोसे का। हालांकि विदेशनीति में भरोसा नाम की कोई चीज होती नहीं है। लेकिन दीर्घकालिक ना सही, तात्कालिक भरोसा तो करना ही पड़ता है। इस लिहाज से भी देखें तो चीन कतई भरोसे के काबिल नहीं है। अभी हाल ही में एनएसजी की सदस्यता के मामले में उसने जिस तरह से भारतीय हितों पर कुठाराघात किया है उसे भुलाया नहीं जा सकता। साथ ही उसकी ललचाई नजरें हमारे पूर्वोत्तर राज्यों से लेकर उत्तराखंड तक लगातार मंडराती रहती हैं। यहां तक कि गुलाम कश्मीर के काफी बड़े हिस्से पर उसका ही कब्जा है। इसके अलावा पाकिस्तान के साथ समझौता करके वह समुद्री सीमा पर भी हमारे खिलाफ साजिशें रच रहा है। उसे न तो हमारे सामरिक हितों की परवाह है, ना राष्ट्रीय हितों की, ना सामाजिक हितों की और ना आर्थिक हितों की। हमारे बाजार को उसने नकली और सस्ते सामानों का डंपिंग ग्राउंड बना कर रख दिया है। ऐसे में जरूरत है चीन के प्रति एक ठोस और कठोर नीति अमल में लाने की। आज उसकी बिलबिलाहट सिर्फ इस बात को लेकर है कि दक्षिण चीन सागर में भारत के हस्तक्षेप ने उसके हितों को प्रभावित करना शुरू कर दिया है। वास्तव में दक्षिण चीन सागर पर उसके कब्जे को विश्व बिरादरी ने भी नकार दिया है और अवैध माना है। कायदे से देखें तो दक्षिण चीन सागर 35 लाख वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ ऐसा विस्तृत अंतर्राष्ट्रीय जलक्षेत्र है जो सिंगापुर से लेकर ताइवान सहित विभिन्न देशों को छूता है। इतने बड़े जलमार्ग पर अकेले चीन का कब्जा आखिर किसी को कैसे मंजूर हो सकता है। उस पर तुर्रा यह कि दक्षिण चीन सागर में स्थित जिन नौ तेल के कुओं की वह नीलामी करने में जुटा है उसमें से दो ऐसे हैं जिस पर ताइवान के साथ भारत का समझौता पहले ही हो चुका है। लिहाजा अमेरिका की अगुवाई में वहां हुए युद्धाभ्यास में भारत की शिरकत स्वाभाविक ही थी जिससे चीन बुरी तरह भन्नाया हुआ है।  दरअसल कहां तो उसने पाकिस्तान और उत्तर कोरिया से लेकर खाड़ी व अफ्रीकी देशों तक को अपने पाले में करके विश्व की सबसे बड़ी महाशक्ति बनने का सपना देखा था। लेकिन अब हर मोर्चे पर भारत उसके सपनों के आड़े आने लगा है। एक तरफ भारत ने नए सिरे से उस गुलाम कश्मीर पर अपना दावा प्रस्तुत कर दिया है जहां चीन का भी कब्जा है और दूसरी तरफ अमेरिका और खाड़ी देशों से लेकर ताइवान, सिंगापुर और जापान तक के साथ प्रगाढ़ मित्रता की शुरुआत कर दी है। नतीजन विश्व बिरादरी में चीन बुरी तरह अलग-थलग पड़ता जा रहा है। ऐसे में स्वाभाविक है कि वह भारत को अपने साथ जोड़ने की कोशिश करेगा। हालांकि भारत को भी चीन के साथ मित्रता की उतनी ही आवश्यकता है जितनी किसी अन्य पड़ोसी देश के साथ। लेकिन सवाल है कि आखिर यह मित्रता किस कीमत पर होगी। एक तरफ वह सरहद पर उत्पात मचाता रहे, गुलाम कश्मीर में दखल बरकरार रखे, पाकिस्तान को हर मुमकिन मदद मुहैया कराए, हमारे पड़ोसी मित्रों को हमसे तोड़ने की कोशिशों में जुटा रहे और दूसरी तरफ हमसे मित्रता की उम्मीद भी रखे। ऐसा कैसे संभव हो सकता है? लिहाजा आवश्यकता है कि पहले सामरिक हितों को सुरक्षित करने की दिशा में कदम उठाया जाए और द्विपक्षीय विवाद के कांटों को जड़ से उखाड़ने की पहल की जाये। इसके लिए चीन को सख्त लहजे में बताना होगा कि सरहद पर शांति रहेगी तो ही आपसी संबंधों में विश्वास बहाली संभव है। वरना वह अपने रास्ते और हम अपने रास्ते। इस सख्ती को दर्शाए बिना अगर चीन के साथ मित्रता की नई इबारत लिखने की कोशिश की गई तो उसका कोई मतलब नहीं रह जाएगा। भारत के साथ मित्रता के लिए चीन को पहले सही राह पकड़नी होगी और आत्मानुशासन की अहमियत को समझना होगा। वैसे भी चीन सरीखे मतलबी मुल्क के साथ कोई भी राब्ता कायम करने से पहले सौ बार सोचने की जरूरत है क्योंकि उसके इतिहास और उसकी फितरत को देखते हुए तो उस पर कतई भरोसा नहीं किया जा सकता। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर #NavkantThakur

मंगलवार, 16 अगस्त 2016

जहां सुमति तहां संपति नाना....

जहां सुमति तहां संपति नाना....


गोस्वामी तुलसीदासजी ने रामचरितमानस में लिखा है कि ‘सुमति कुमति सबके उर रहहीं, नाथ पुरान निगम अस कहहीं, जहां सुमति तहां संपति नाना, जहां कुमति तहां विपति निदाना।’ वाकई सुमति और कुमति तो एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। लेकिन अगर कुमति हावी हो जाये तो बनता हुआ काम भी बिगड़ जाता है जबकि सुमति के सहारे बिगड़े हुए काम को भी आसानी से सफल किया जा सकता है। तभी तो जब तक देशहित पर दलगत राजनीति हावी रही तब तक संसद से लेकर सड़क तक बवाल कटता रहा। लेकिन सुमति का साम्राज्य स्थापित होते ही गाड़ी पटरी पर लौट आई। भारतीय संसद ने सर्वसम्मति से निर्विरोध फैसले लेने की ऐसी ताकत का मुजाहिरा किया कि समूचा विश्व चमत्कृत हो उठा। अमेरिका सरीखे विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र को भी औपचारिक तौर पर इसकी सराहना करनी पड़ी। हालांकि अमेरिका ने तो सिर्फ जीएसटी के सर्वसम्मति से पारित होने पर ही भारत की सराहना की है जबकि हकीकत तो यह है कि इस मानसून सत्र में भारतीय संसद ने उन तमाम मसलों पर एकमतता व सर्वसम्मति का मुजाहिरा किया है जिसके बारे में माना जा रहा था कि जब भी ये मसले सदन में उठेंगे तो सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच भारी तकरार व टकराव का माहौल दिखेगा। लेकिन देश के तमाम राजनीतिक दलों ने एक बार फिर दुनियां को यह बता दिया है कि मिल बैठकर, एक दूसरे की बात समझ कर और सच को स्वीकार करके साथ मिलकर आगे बढ़ने का नाम ही लोकतंत्र है। हालांकि लोकतंत्र में विचार-प्रचार और संवाद-विवाद की गुंजाइश हमेशा बनी रहती है। लेकिन सच यही है कि व्यवस्था सिर्फ सत्ता से नहीं चलती। व्यवस्था चलती है सर्वसम्मति से, सबको साथ लेकर। किसी भी मामले में सर्वसम्मति बनाकर ही आगे बढ़ने के सिद्धांत को इस दफा सरकार ने भी व्यावहारिक तौर पर अपनाया और इसमें विपक्ष ने भी पूरा सहयोग किया। इसीका नतीजा रहा कि लोकसभा में तकरीबन 110 फीसदी काम हुआ जबकि राज्यसभा में भी लगभग 99 फीसदी कार्य पूरा हुआ। सत्तापक्ष और प्रतिपक्ष के बीच स्वस्थ तालमेल का ही नतीजा रहा कि लोकसभा से 15 बिल पारित हुए जबकि राज्यसभा से पारित होने वाले विधेयकों की संख्या 14 रही। इसके अलावा चर्चाएं भी हुई और ध्यानाकर्षण प्रस्तावों पर भी बहस हुई। महंगाई पर चर्चा हुई, दलित उत्पीड़न पर चर्चा हुई और जम्मू कश्मीर की मौजूदा स्थिति को लेकर भी चर्चा हुई। हर मसले पर आम सहमति का माहौल ही नहीं बना बल्कि सर्वसम्मति से प्रस्ताव भी पारित किया गया। चर्चा के नाम पर खर्चा-पानी लेकर चढ़-बैठने से विपक्ष ने भी परहेज बरता और सत्तापक्ष की ओर से भी हेकड़ी या मनमानी का मुजाहिरा नहीं किया गया। नतीजन पिछले कई सालों से जो संसद जंग का मैदान बनी हुई थी वह इस दफा सर्वसम्मति के माहौल में सुचारु तरीके से अपने काम को अंजाम देती हुई दिखी। जिस जीएसटी विधेयक को लेकर पिछले एक दशक से वैचारिक व सैद्धांतिक टकराव चल रहा था वह संसद के दोनों सदनों में सर्वसम्मति से पारित हुआ और इसके विरोध में एक भी वोट नहीं पड़ा। यहां तक कि दलितों पर हो रहे अत्याचार के मामले को लेकर हुई चर्चा के बारे में भी संभावित टकराव को लेकर जितने भी कयास लगाए जा रहे थे वे सभी गलत साबित हुए और ना सिर्फ इस पर संसद में स्वस्थ चर्चा हुई बल्कि सर्वसम्मति के साथ प्रस्ताव पारित करके सदन ने बेहद सख्त लहजे में सभी सूबों को स्पष्ट शब्दों में कह दिया कि दलितों की रक्षा और सुरक्षा से कतई समझौता नहीं किया जाना चाहिये। सर्वसम्मति का ऐसा ही माहौल महंगाई पर हुई चर्चा के दौरान भी दिखा। सरकार ने स्वीकार किया कि दाल सहित कुछ खाद्य वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि अवश्य हुई है लेकिन इसे थामने के लिए वह प्रयत्नशील है। सरकार के आश्वासन पर विपक्ष ने भी भरोसा जताया और इस मामले में भी संसद में पूरी आम सहमति का माहौल देखा गया। इसी प्रकार जम्मू कश्मीर के मौजूदा हालातों को लेकर हुई चर्चा में भी पूरी तरह आम सहमति देखी गई और सहमति भी ऐसी कि घरेलू राजनीति में एक दूसरे के कट्टर विरोधी माने जानेवाले सपा के रामगोपाल यादव ने जब पाकिस्तान से सिर्फ गुलाम कश्मीर के मसले पर ही वार्ता किये जाने की बात कही तो राजनीतिक पंडितों ने यहां तक कह दिया कि सपा ने भाजपा की लाइन पकड़ ली है। लेकिन सच तो यह है कि किसी ने किसी की लाइन नहीं पकड़ी है। सबकी अपनी-अपनी लाइन है और किसी की भी लाइन देश के हितों के खिलाफ नहीं हो सकती। यानि बात जब देश की आती है तो भारतीयता की भावना कितनी प्रबल हो जाती है यही दिखाया है हमारी संसद ने और हमारे सांसदों ने। वैसे भी बात जब देश के आन, बान, शान, विकास, सुरक्षा व अखंडता की हो तब अपेक्षित है कि संसद से ऐसा ही सुर निकले जैसा मौजूदा सत्र में निकला है। लिहाजा संसद में इस तरह के माहौल की खुले दिल से सराहना करने में कतई कोताही नहीं बरती जानी चाहिए और आगे भी प्रयत्नशील रहना चाहिए कि संसद देश के विकास में रोड़े अटकाती हुई ना दिखे बल्कि विकास में अपना योगदान करती हुई दिखे। वैसे भी घरेलू राजनीति अपनी जगह है, सत्ता की खींचतान और सैद्धांतिक विरोधाभास अपनी जगह। लेकिन इसे देशहित पर हावी होने की इजाजत तो कतई नहीं दी जा सकती। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर # Navkant Thakur

शुक्रवार, 13 मई 2016

पानी गये ना ऊबरे, मोती मानुष चून

‘रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून’


‘रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून, पानी गये ना ऊबरे, मोती मानुष चून।’ रहीम का यह दोहा सबने पढ़ा भी है और गुना भी है। लेकिन शायद हमारे राजनीतिज्ञों ने इसे सिर्फ पढ़ा है, इसका अर्थ व महत्व समझा नहीं है। अगर समझा होता तो आज राजनीति में पानी बचा होता, इस कदर सूख नहीं जाता। अब तो ऐसा लगता है मानो सबकी आंख का पानी मर चुका है, सूख चुका है। वर्ना कम से कम ऐसी तस्वीर तो कतई नहीं दिखती कि जब देश की एक तिहाई आबादी भयावह सूखे का सामना कर रही हो, बूंद-बूंद पानी के लिये हाहाकार मचा हो तब हमारे माननीय नेतागण एकजुट होकर लोगों को इस भीषण संकट से उबारने का प्रयास करने के बजाय मौजूदा परिस्थियों का भी सियासी दोहन करने में जुटे हुए हों। आपस में श्रेय लूटने की लड़ाई लड़ रहे हों। हालांकि सियासत की इस मौजूदा तस्वीर का एक अलग पहलू यह भी है कि जब हर चीज पर सियासत हो सकती है, हर बात पर ही नहीं बल्कि बेबात भी राजनीति हो सकती है, तो फिर पानी ही इससे अछूती क्यों रहे। वैसे भी स्वतंत्र भारत के इतिहास के सबसे भयावह सूखे के मौजूदा दौर में तो मौका भी है, मौसम भी है और दस्तूर भी। फिर पानी पर सियासत तो होनी ही है और हो भी रही है। हो भी क्यों ना। आखिर जानलेवा सूखे की मार झेल रही देश की एक-तिहाई आबादी का मसला जो ठहरा। इतने बड़े वोट बैंक को कौन नहीं रिझाना चाहेगा। भले इसके लिये ठोस राहत योजना या दूरगामी परियोजना का पूरी तरह अभाव ही क्यों ना हो। दिखाना तो सभी यही चाहेंगे कि सूखा प्रभावितों की मदद में वे जी-जान से व प्राण-पण से जुटे हुए हैं। तभी तो केन्द्र सरकार और राज्यों के बीच इस मसले पर श्रेय बटोरने को लेकर भारी खींचतान का माहौल दिख रहा है। लेकिन इसका सबसे दुखद पहलू यह है कि सूखा प्रभावितों को मिल-जुलकर राहत पहुंचाने के अभियान में जुटने के बजाय केन्द्र और राज्य एक दूसरे की टांग खींचने व एक दूसरे को नीचा दिखाने में लगे हुए हैं। खास तौर से अगर उत्तर प्रदेश के साथ इस मसले पर जारी केन्द्र के शीतयुद्ध की बात करें तो दोनों ही यह साबित करने में जुटे हुए हैं कि उनका काम तो काम है, दूसरे का दिखावा। तभी पहले तो यूपी सरकार को सूखा राहत के मोर्चे पर विफल दिखाने में ना तो सत्ता पक्ष से प्रभावित मीडिया के एक खास वर्ग ने कोई कसर छोड़ी और ना ही केन्द्र ने कभी यह स्वीकार किया कि सूबे में सूखा राहत की दिशा में कोई सराहनीय काम हो रहा है। जबकि हकीकत यह है कि सूबे की सरकार अपने सीमित संसाधनों के सहारे ही ना सिर्फ सूखा प्रभावित इलाकों में लोगों को राहत पहुंचाने के काम में पूरी ताकत से जुटी हुई है बल्कि लोगों को भोजन-पानी से लेकर पशुओं के लिये चारा उपलब्ध कराने का भी हरमुमकिन प्रयास किया जा रहा है। सूखे के कारण रोजी-रोटी की भारी किल्लत का सामना कर रहे परिवारों के बीच राहत पैकेट के रूप में शुरूआती तीस दिनों के लिये आटा, आलू, दाल, तेल व देशी घी से लेकर मिल्क पाउडर भी वितरित किया जा रहा है। इसके अलावा अन्त्योदय लाभार्थी परिवारों को अगले 30 दिनों के लिए भी राहत पैकेट मुहैया कराने का निर्णय प्रदेश सरकार पहले ही कर चुकी है। साथ ही पिछले साल हुई ओलावृष्टि के बाद इस समय भयानक सूखे का सामना कर रहे किसानों को राहत देने के लिए प्रभावित 73 जिलों के 107 लाख किसानों के बीच 4493 करोड़ रुपया बांटा जा चुका है जबकि पिछले साल भी सूखे की मार झेलनेवाले 21 जनपदों के प्रभावितों के बीच 1006.03 करोड़ रुपये की धनराशि बांटने का काम युद्धस्तर पर जारी है। यहां तक कि अपनी क्षमता के मुताबिक प्रदेश सरकार वाटर एटीएम भी लगवा रही है और टैंकरों से पानी की आपूर्ति भी कर रही है। इसके बावजूद प्रदेश सरकार की तारीफ करना किसी को गवारा नहीं है। अलबत्ता सूबे की समस्याओं को लेकर हलकान दिख रही है वह भाजपा जिसके नेतृत्व में चल रही केन्द्र की सरकार ने अब तक पिछले साल के सूखे के मद का 1123.47 करोड़ व ओलावृष्टि के मद का 4741.55 करोड़ रूपया प्रदेश सरकार को आवंटित ही नहीं किया है। यानि मदद के नाम पर केन्द्र से प्रदेश को मिला है तो सिर्फ आश्वासन और लफ्फाजी। उस पर तुर्रा यह कि बुंदेलखंड में पानी पहुंचाने के लिये केन्द्र ने ट्रेन भेज दिया। वह भी खाली टैंकर के साथ। जाहिर है कि प्रदेश सरकार इस दिखावे की मदद को बैरंग वापस नहीं लौटाती तो और क्या करती। कायदे से अगर केन्द्र को कुछ करना ही है तो वह इस साल के सूखा राहत का पैसा हाथोंहाथ नहीं दे सकती तो कम से कम पिछले साल के बकाये का ही पूरा भुगतान कर दे। साथ ही जब प्रदेश सरकार दावा कर रही है कि बुंदेलखंड के जलाशयों में पर्याप्त पानी उपलब्ध है तो उसके वितरण के लिये टैंकरों का समुचित इंतजाम कर दे। प्रदेश तो अपनी क्षमता के मुताबिक जुटा ही हुआ है लेकिन कुछ जिम्मेवारी तो केन्द्र की भी है। जिसे पूरी इमानदारी से निभाने में अगर कोताही बरती गयी तो अगले साल होनेवाले सूबे के विधानसभा चुनाव में भाजपा को इसका भारी खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर # Navkant Thakur

शनिवार, 30 अप्रैल 2016

लोग हर मोड़ पर रूक-रूक के संभलते क्यों हैं....

‘हर मोड़ पर नयी राह पकड़ना नहीं अच्छा’


मशहूर शायर राहत इन्दौरी साहब द्वारा उठाये गये इस सवाल का सटीक जवाब आज तक शायद ही किसी को मिल पाया हो कि ‘लोग हर मोड़ पर रूक-रूक के संभलते क्यों हैं, इतना डरते हैं तो फिर घर से निकलते क्यों हैं।’ यह सवाल इसलिये प्रासंगिक है क्योंकि आम तौर पर लोग स्वामी विवेकानंद की उस सीख का अनुसरण करना गवारा नहीं करते जिसमें उन्होंने एक बार लक्ष्य तय कर लेने के बाद तब तक चैन से नहीं बैठने की बात कही थी जब तक वह पूरी तरह हासिल ना हो जाये। लेकिन सवाल सिर्फ इतना ही नहीं है कि लक्ष्य तय कर लेने के बाद उसे हासिल करने की दिशा में सरपट भागने के बजाय लोग हर मोड़ पर अटकते, ठिठकते, सहमते व संभलते हुए क्यों दिखाई पड़ते हैं। अलबत्ता वे कम से कम तयशुदा लक्ष्य की ओर डरते-डरते भी सधे कदमों से संभलते हुए आगे तो बढ़ते रहते हैं। यहां सवाल तो उनका है जो हर नये मोड़ पर नयी राह पकड़ते हुए दिखाई पड़ते हैं। उस पर तुर्रा यह कि लक्ष्य तो तय ही है, फिर इस बात से क्या फर्क पड़ता कि राह कौन सी चुनी जा रही है। अब ऐसी दलीलों को सरासर थेथरोलाॅजी ना कहें तो और क्या कहें। वैसे भी हर राह से एक ही मंजिल पर पहुंचने की बात आध्यात्मिक लिहाज से तो ठीक है मगर दुनियावी मामलों में इसे कैसे सही माना जा सकता है। बल्कि यह तो भटकाव की स्थिति है जो इन दिनों भारत की विदेश नीति में स्पष्ट दिख रही है। खास तौर से चीन व पाकिस्तान सरीखे पड़ोसी देशों के साथ अमल में लायी जा रही नीतियों पर गौर करें तो इसमें अटकाव, भटकाव व हर मोड़ पर अप्रत्याशित बदलाव की स्थिति साफ तौर पर महसूस की जा सकती है। मिसाल के तौर पर पठानकोट में हुए आतंकी हमले का मामला सामने आने के बाद पाकिस्तान से विदेश सचिव स्तर की वार्ता स्थगित करने के पीछे तर्क दिया गया कि बातचीत तभी संभव है जब सीमापार से इस मामले में कुछ ठोस कार्रवाई होती हुई दिखे। इस घुड़की का असर हुआ कि पाकिस्तान ने ना सिर्फ मामले की जांच शुरू कराई बल्कि कई अन्य लोगों के साथ उस मसूद अजहर को भी उसने नजरबंद किया जो पठानकोट में हुए आतंकी हमले का असली सूत्रधार है। लेकिन पाकिस्तान की इन पहलकदमियों के बावजूद इधर से संतोष नहीं जताया गया और वार्ता प्रक्रिया स्थगित ही रही। लेकिन अब जबकि पठानकोट मामले में पाकिस्तान पूरी तरह अपने वायदों से मुकर गया है और अनौपचारिक तौर पर इस वाकये को हमारी ही खुराफात साबित करने पर आमादा दिख रहा है इसके बावजूद अचानक विदेश सचिव स्तर की वार्ता कराके नई दिल्ली क्या संदेश देना चाह रही है यह समझ से परे ही है। अगर वार्ता प्रक्रिया को जारी रखना था तो पठानकोट मामले की आग में पूर्व निर्धारित बातचीत को होम ही नहीं करते। और अगर बातचीत बंद करके पाकिस्तान को कुछ ठोस कदम उठाने के लिये मजबूर करने की नीति अपनायी गयी तो कम से कम तब तक तो इस नीति पर टिके रहते जब तक वह हमारी एनआईए को पठानकोट मामले की जांच के लिये अपनी सरहद में दाखिल होने की इजाजत नहीं दे देता, उसकी जेआईटी की रिपोर्ट सकारात्मक नहीं दिखती, और अपनी अदालत में वह इस मामले को मजबूती से पेश करता हुआ दिखाई नहीं पड़ता। अलबत्ता हार्ट आॅफ एशिया समिट में हिस्सा लेने के लिये आए पाकिस्तानी विदेश सचिव अहमद चैधरी के साथ अचानक ही अप्रत्याशित तरीके से हुई हमारे विदेश सचिव एस जयशंकर की दो घंटे लंबी चली वार्ता का नतीजा यह है कि पाकिस्तान कश्मीर का राग आलाप रहा है और हम आतंकवाद का रोना रो रहे हैं। दोनों की अपनी ढ़फली है और अपना अलग राग है जिसमें कहीं कोई तालमेल ही नहीं है। अब हालत यह है कि हमारी सरकार यह बताने की हालत में ही नहीं है कि उसने वार्ता प्रक्रिया बहाल करने के लिये पाकिस्तान के समक्ष जो शर्तें रखी थीं उसका क्या हुआ। यानि हुआ यूं कि वार्ता करनी है सो कर ली। महज दिखावे की बेमानी खानापूर्ति। जिससे फायदा तो कुछ नहीं हुआ अलबत्ता नुकसान यह हुआ कि वार्ता प्रक्रिया स्थगित करके पाकिस्तान पर जो दबाव बनाया गया था वह पूरी तरह मटियामेट हो गया। नीतियों में भटकाव की ऐसी ही स्थिति चीन के मामले में भी देखी जा रही है जिसे उसकी ही भाषा में जवाब देने के लिये पहले तो उसके वांक्षित अपराधी व उइगुर नेता डोलकुन इशा को भारत आने का वीजा प्रदान किये जाने की खबर को खूब प्रचारित प्रकाशित किया गया और बाद में जब कांग्रेस ने भी इशा को वीजा दिये जाने का समर्थन करने की पहल की तो अचानक ही उसका वीजा रद्द कर दिया गया। यानि हर नये मोड़ पर नयी राह अपनाने की जो नीति पाकिस्तान के साथ अपनायी गयी उसी का अनुसरण चीन के मामले में भी किया गया। अब भटकाव के इस राह की मंजिल कैसी होगी इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। खैर, इन मामलों के मद्देनजर तो हरिवंश राय बच्चन की यही पंक्तियां सही राह बताती हुई महसूस हो रही हैं कि ‘राह पकड़ तू एक चला चल पा जाएगा मधुशाला।’ वर्ना इस तरह अंधेरे में अटकते-भटकते हुए गलती से भी कोई गलती हो गयी तो बचने की कोई राह नहीं बचेगी। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’ नवकांत ठाकुर Navkant Thakur

शुक्रवार, 8 जनवरी 2016

‘है अगर हसरते दीदार तो सब्र रख, उस बेवफा का नकाब खिसकेगा जरूर’

‘माहौल घिर गया है बेसब्र आंधियों से’

नवकांत ठाकुर
पश्चिमी उत्तर प्रदेश स्थित बुलंदशहर के बनवारीपुर-घंघरावाली में पैदा हुए पिछली सदी के शायर पुरूषोत्तम प्रतीक कहते हैं कि ‘क्यों लाल हो रहा है ये आसमान देखो, धरती नहीं रहेगी यूं बेजुबान देखो, माहौल घिर गया है बेसब्र आंधियों से, बरबाद हो ना जाये अपना जहान देखो।’ वाकई इन दिनों देश का सियासी-सामाजिक माहौल बेहद ही बेसब्र दिख रहा है। अक्षय कुमार कह रहे हैं कि अब पाकिस्तान में घुसकर दुश्मनों को मारने का वक्त आ गया है। विपक्षी दल पूछ रहे हैं कि कहां गया वह छप्पन इंच का सीना और कहां गयी वह बातें जो उन्होंने मुंबई पर हुए हमले के बाद कही थीं। यानि पाकिस्तान के खिलाफ कार्रवाई के हिमायती सभी दिख रहे हैं। लेकिन शासन व्यवस्था खामोश है। खामोशी भी ऐसी कि हर बात पर प्रधानमंत्री की फौरी प्रतिक्रिया उगलनेवाला ट्विटर हैंडल भी पठानकोट के मसले पर मौन है। जाहिर है कि यह खामोशी बहुतों को बहुत खल रही है, और खले भी क्यों ना। आखिर जब पहले से पता चल चुका था कि आतंकी हमारी सरहद में दाखिल हो चुके हैं और उनके निशाने पर पठानकोट का एयरबेस है, इसके बाद भी उन्हें समय रहते रोकना-दबोचना तो दूर बल्कि तयशुदा मंजिल के चाक-चैबंद किले में दाखिल होने से रोक पाना भी संभव नहीं हो सका तो यह सब जानने के बाद किसे निराशा नहीं होगी। यह निराशा और बढ़ जाती है जब याद आता है कि आतंकियों से जारी मुठभेड़ के बारे में देश की आंतरिक सुरक्षा की जिम्मेवारी संभालनेवाले गृहमंत्री भी इस कदर अंधेरे में थे कि उधर लड़ाई जारी थी और इधर वे आॅपरेशन समाप्ति का ऐलान कर रहे थे। प्रधानमंत्री कर्नाटक में व्यस्त थे और संचालन की कमान संभालनेवाले राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की जुबान पर ताला था। हर तरफ बेचैनी थी, अफरातफरी थी और खामोश मुर्दानी थी। सामने आ रहे थे सिर्फ आतंकियों से लोहा ले रहे जवानों की शहादत के आंकड़े। उस पर तुर्रा यह कि बकौल गुहमंत्री, हम मुंहतोड़ जवाब देंगे। अब सवाल है कि तोड़ क्यों नहीं रहे मुंह, रोका किसने है, किस बात का इंतजार है? पूछा जा रहा है कि आखिर कब तक हम ही पीडि़त बने रहेंगे, कसमसाकर और छटपटाकर हर बार की तरह ना सिर्फ इस बार बल्कि भविष्य में भी विवश होकर बैठे रहना और पड़ोस से जारी परोक्ष युद्ध में एकतरफा तौर पर हर दर्द, जख्म और पीड़ा को सहन करते रहना ही हमारी नियति है क्या? पड़ोसी के टुकड़ों पर पलनेवाले रूबिया का अपहरण करें या जहाज को कंधार ले जाकर बंधक बनायें। हम तो सिर्फ समझौते की शर्तों के सामने झुकते ही आये हैं। हमला संसद पर हो, मुंबई में, पठानकोट में हो या कहीं और। हम हर बार सिर्फ जुबानी तैश-तेवर दिखा सकते हैं या बहुत हुआ तो पड़ोसी के साथ जारी शांति वार्ता को एकतरफा तौर पर बंद कर सकते हैं। इससे अधिक कभी कुछ हो पाने की मिसाल तो इतिहास में नदारद ही है। ऐसे में अब अगर इस दफा देश में आक्रोश है, गुस्सा है और कुछ कर गुजरने की चाहत है तो इसे कोई गलत कैसे कह सकता है। खैर, देश की इस भावना को गलत तो वह सरकार भी नहीं कह रही है जिससे उम्मीदें तो बहुत हैं लोगों को लेकिन अपेक्षाओं पर वह खरी नहीं उतर पा रही है। लेकिन इन तमाम निराशाओं के बीच कुछ बातें ऐसी भी हैं जिनसे उम्मीद जगती है पाकिस्तान के साथ अच्छे दिन आने की, संबंध सुधरने की, कुछ अच्छा होने की। मसलन इस दफा पहली बार पाकिस्तान ने यह स्वीकार किया है कि पठानकोट के हमलावर उसकी सरहद से ही घुसे थे। पहली बार उसने भारत में हुई आतंकी वारदात की तत्काल निंदा-भर्तस्ना की है। पहली बार उसने भरोसा दिलाया है कि जांच करके असली दोषियों को सजा दिलाने में वह हमारा सहायक बनेगा। पहली बार भारत में हुए आतंकी हमले के लिये अमेरिका सहित विश्व समुदाय ने पाकिस्तान पर उंगली उठायी है और उससे मामले को अंजाम तक पहुचाने की अपेक्षा प्रकट की है। साथ ही पहली बार कश्मीर और आतंकवाद को अलग करते हुए वह ऊफा में इस बात के लिये सहमत हुआ है कि आतंक पर अलग से पहले चर्चा होगी और कश्मीर सरीखे बाकी अन्य सभी मसलों पर अलग से सहमति व सहयोग की राह तलाशी जाएगी। यानि समग्रता में देखें तो मौजूदा सरकार ने पड़ोसी मुल्क के साथ इतना राब्ता तो कायम कर ही लिया है कि पठानकोट हमले के बाद भी दोनो तरफ के सियासी हुक्मरानों की परस्पर तल्ख बयानबाजी की परंपरा कुछ पीछे छूट गयी है और दोनों मिलजुल कर कुछ करते हुए दिखने के ख्वाहिशमंद नजर आ रहे हैं। यानि सही दिशा में एक शुरूआत होती हुई तो दिख रही है लेकिन निःसंदेह उलझन काफी जटिल है, पुरानी है। लिहाजा इसे सुलझाने का रास्ता भी लंबा और दुर्गम ही होगा जो हर कदम पर सख्त इम्तिहान भी लेगा लेकिन दोनों को अपने क्रोध, उन्माद और भावनाओं पर संयम रखना ही होगा। इसके अलावा कोई विकल्प ही नहीं है। बाकी विकल्प सिर्फ छलावा है, नजरों का धोखा है और दोनों के लिये आत्महंता डगर है जिस पर आगे बढ़ने का कोई मतलब ही नहीं है। यानि, पड़ोसी को सही राह पर लाने के लिये कोई भी कीमत चुकाने का खम ठोंकनेवालों को यही कहना मुनासिब होगा कि, ‘है अगर हसरते दीदार तो सब्र रख, उस बेवफा का नकाब खिसकेगा जरूर।’ ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’    

सोमवार, 4 जनवरी 2016

‘कछुए की मानिंद सिमट ना जाये फिर ये सिलसिला’

‘कछुए की मानिंद सिमट ना जाये फिर ये सिलसिला’

नवकांत ठाकुर
पठानकोट के एयर बेस पर हुए आतंकी हमले के बाद चारों तरफ आक्रोश है, उबाल है। हर किसी की जुबान पर बस यही सवाल है। अब क्या होगा इसके बाद? क्या दशकों से कछुआ चाल से चल रही दोस्ती व विश्वासबहाली की कोशिशों पर फिर विराम लग जाएगा। वार्ता का कछुआ फिर बंदूक की गर्जना से घबराकर खुद को अपने खोल में सिकोड़ लेगा, समेट लेगा। फिर इधर से यही सुर सुनाई देगा कि बोली और गोली को एक साथ स्वीकार नहीं किया जा सकता और जवाब में उधर से वही घिसी-पिटी आवाज आएगी कि सबकुछ इधर का ही किया-धरा है, उसे नाहक बदनाम करने के लिये। अब तक की परंपरा तो ऐसी ही रही है। बातचीत के माध्यम से सुलह-सफाई की गंभीर कोशिशें शुरू होते ही हर बार सीमापार से ऐसी वारदातों को अंजाम दे दिया जाता है जिससे पूरी प्रक्रिया खटाई में पड़ जाती है। मसलन वाजपेयी की लाहौर यात्रा के बाद हई कारगिल की लड़ाई ने वार्ता प्रक्रिया को सिरे से ध्वस्त कर दिया। उसके बाद कश्मीर मसले को निर्णायक मुकाम तक पहुंचाने की मनमोहन की कोशिशों पर मुंबई के हमले ने बट्टा लगा दिया। यहां तक कि मौजूदा मोदी सरकार द्वारा ऊफा में की गयी वार्ता प्रक्रिया बहाल करने की पहली कोशिश को कश्मीरी अलगाववादियों के प्रेम में पड़कर पड़ोसी मुल्क के सियासी हुक्मरानों ने ही पलीता लगा दिया। और हद तो यह है कि अब नवाज को जन्मदिन के तोहफे के तौर पर अपनी दोस्ती से नवाजने लाहौर जा पहुंचे मोदी को बदले में पठानकोट की घटना से पीठ पर वार सहने के लिये मजबूर होना पड़ा है। लिहाजा परंपरा व दस्तूर के मुताबिक एक बार फिर वार्ता की प्रक्रिया पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की संभावना पैदा होना लाजिमी ही है। वह भी तब जबकि फिदायीन हमलावरों की टोली द्वारा हमले से ऐन पहले पाकिस्तानी आकाओं व रिश्तेदारों से की गयी बातचीत रिकार्ड की जा चुकी है और यह जानकारी भी सार्वजनिक हो गयी है कि पिछले महीने आईएसआई ने लश्करे तैयबा, जैशे मोहम्मद, हिजबुल मुजाहिदीन और बब्बर खालसा सरीखे आतंकी संगठनों के साथ मिल-बैठकर भारत में बड़े हमले को अंजाम देने की साजिश रची थी। यानि इस बात में तो शक की गुंजाइश भी नहीं है कि इस पूरी वारदात की पटकथा सरहद के उस पार से लिखी गयी और आत्मघाती हमलावरों का जत्था भी उधर से ही आया था। लिहाजा यह भी तय है कि पाकिस्तानी सेना, वहां के प्रशासन और आईएसआई ने भी इस वारदात को अंजाम देनेवालों की मदद अवश्य की होगी। लेकिन सवाल है कि जब यह पहले से पता था कि आतंकी संगठनों के साथ मिल-बैठकर आईएसआई किसी बड़ी वारदात को अंजाम देने की फिराक में है तो फिर बड़ा दिन के मौके पर नवाज से मिलने व उनके साथ निजी रिश्तों की शुरूआत के बहाने दोनों मुल्कों के बीच विश्वास बहाली की मजबूत पहलकदमी क्यों की गयी? क्या सोच कर की गयी? खैर, इसका जवाब ना तो मिला है और ना मिलने की उम्मीद है। लिहाजा जब जुबानी जवाब ना मिल रहा हो तो क्रिया की प्रतिक्रिया से कुछ जानने-समझने की कोशिश करना ही बेहतर होगा। और प्रतिक्रिया यह है कि जिस वक्त पठानकोट में आतंकी हमला होने की पुख्ता जानकारी मिलने के बाद एनएसजी को वहां भेजने की तैयारी चल रही थी, ऐन उसी वक्त दोनों मुल्कों के बीच परमाणु प्रतिष्ठानों की सूची भी साझा हो रही थी और एक-दूसरे के मुल्कों में कैद मछुआरों व आम नागरिकों की लिस्ट का भी आदान-प्रदान हो रहा था। इसी प्रकार हमले की सूचना सार्वजनिक होने के बाद गृहमंत्री व प्रधानमंत्री कार्यालय के राज्यमंत्री सहित विभिन्न केन्द्रीय मंत्री भी यही बता रहे थे कि जो ताकतें यह नहीं चाहती हैं कि दोनों मुल्कों के बीच अमन व दोस्ती कायम हो वे ही इस तरह की शरारतों के द्वारा वार्ता की गाड़ी को पटरी से उतारने का प्रयास कर रही हैं जिसका मुंहतोड़ जवाब दिया जाएगा। यानि इन प्रतिक्रियाओं से इतना तो साफ है कि अब भारत की सरकार ने पाकिस्तान की सेना, उसकी आईएसआई और उसके आतंकी शुभचिंतकों की खुदमुख्तारी को भी समझ लिया है और वहां के सियासी हुक्मरानों की बेचारगी व लाचारगी को भी महसूस कर लिया है। लिहाजा सियासी हुक्मरानों के साथ बातचीत, दोस्ती व विश्वास बहाली की कोशिशों पर वहां की बाकी खुदमुख्तार ताकतों की साजिशों का साया पड़ने देना अब शायद ही गवारा किया जाए। यानि, उम्मीद तो यही है कि बातचीत अपनी जगह जारी रहेगी जबकि सेना को सेना से जवाब मिलेगा और आईएसआई की खुराफातों को हमारी खुफिया संस्थाएं व पुलिस प्रशासन के द्वारा नाकाम किया जाएगा। लेकिन पाकिस्तान के शुभचिंतक आतंकी संगठनों को कैसे मुंहतोड़ जवाब दिया जाए इसका खाका तैयार करना शायद अभी बाकी ही है। खैर, पाकिस्तानी सेना, आईएसआई और हमारी ओर के भी कुछ गद्दारों की पुश्तपनाही का लाभ उठाते हुए सरहद के उस पार से अपने नापाक मंसूबों को अंजाम देनेवाले इन तत्वों को इनके अंजाम तक पहुंचाने का मार्ग तो तलाशना ही होगा लेकिन इस बहुआयामी कूटनीति के बीच अब असली परख होनी है दोनों मुल्कों के सियासी हुक्मरानों के बीच बने उस कथित निजी व मजबूत तालमेल की जिसके नतीजे में ही पहली बार पाकिस्तानी विदेश विभाग ने ना सिर्फ पठानकोट के वारदात की कड़े शब्दों में निंदा की है बल्कि आतंक के खिलाफ जारी लड़ाई में भरपूर मदद का भरोसा भी दिलाया है। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’   

सोमवार, 28 दिसंबर 2015

‘पड़ोसी के साथ रिश्ते में पर्देदारी पर हंगामा’

‘पड़ोसी के साथ रिश्ते में पर्देदारी पर हंगामा’

नवकांत ठाकुर
प्रधानमंत्री ने पाकिस्तान की सरजमीं पर कदम क्या रखा, हंगामे की पोटली खुल गयी। हर तरफ हंगामा, हर तरफ गुस्सा। आक्रोश इधर भी है और उधर भी। अलबत्ता उधर तो हाफिज सईद सरीखे अमन के दुश्मन हंगामा मचा रहे हैं जबकि इधर बवाल काटनेवाले वे हैं जिनके शख्सियत की पाकीजगी पर कतई सुबहा नहीं किया जा सकता है। चाहे कांग्रेस हो या शिवसेना, यशवंत सिन्हा हों या केसी त्यागी। या फिर दिल्ली में सत्तारूढ़ एएपी ही क्यों ना हो। हर कोई प्रधानमंत्री के पाकिस्तान दौरे से बौखलाहट में है। इनके शब्द भले ही अलग हों लेकिन भाव यही है कि नरेन्द्र मोदी क्यों गये पाकिस्तान? जरूरत क्या थी वहां जाने की। दोनों मुल्कों के रिश्तों में ऐसी कौन सी तब्दीली आ गयी है जिससे बात इस हद तक पहुंच गयी कि पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को जन्मदिन की बधायी देने और उनकी नातिन की शादी से पहले मेंहदी के रस्म में शरीक होकर उसे शुभकामनाएं देने के लिये देशहित को हाशिये के हवाले करते हुए देश व विपक्ष को विश्वास में लिये बिना ही मोदी अचानक काबुल से लौटते हुए पाकिस्तान में उतर गये। मोदी के इस दौरे का विरोध करनेवालों को मलाल इस बात का है कि आखिर निजी रिश्ता निभाने के लिये पाकिस्तान की करतूतों को क्यों भुला दिया गया। मोदी कैसे भूल गये पंजाब की आग को, आतंक के झाग को, खून भरे फाग को, संसद हमले के दाग को, मुंबई के दुर्भाग्य को और गुलाम कश्मीर के भाग को। हेमराज के परिजनों की आस को, देश के विश्वास को, हजारों बेगुनाह मकतूलों के संत्रास को और पाक की नापाकियत के एहसास को भुलाकर अचानक मोदी का पाकिस्तान पहुंच जाना इस तरफ बहुतों को अखर रहा है। जाहिर है कि मोदी की इस यात्रा का विरोध इसलिये तो कतई नहीं किया जा रहा है क्योंकि उनकी राष्ट्रभक्ति पर किसी को कोई संदेह है। बल्कि किसी को आशंका यह भी नहीं है कि देशहित को अलग करके दोस्ती के लिये वे कोई ऐसा समझौता कर गुजरेंगे जिससे देश को जरा भी ठगे जाने का एहसास हो। लेकिन सवाल है पाकिस्तान की नापाक नीयत का और उसकी विश्वासघाती नीतियों का जिसके जाल में इससे पहले के हमारे कई प्रधानमंत्री फंस चुके हैं और देश को इसका खामियाजा भुगतना पड़ा है। वाजपेयी बस लेकर लाहौर गये लेकिन वापसी में झेलना पड़ा कारगिल का युद्ध। मनमोहन सिंह ने सुलह की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना चाहा तो शर्मअल शेख के समझौते में बलूचिस्तान में धधक रही अलगाववाद की आग का गुनहगार बताने की कोशिश हुई भारत को। जब मनमोहन कश्मीर मसला हल करने के करीब पहुंचे तो मुंबई पर ऐसा भीषण हमला कर दिया जिसकी चिंगारी ने गुफ्तगू के सहारे सुलह की गफलत को भस्म कर दिया। खैर, इस हकीकत को तो कतई भुलाया नहीं जा सकता है कि जितने जख्म हमें पाकिस्तान ने दिये हैं उतना किसी ने नहीं दिया। बल्कि यूं कहें तो ज्यादा सही होगा कि हमारे तमाम जख्मों, बाहरी परेशानियों, समस्याओं व सिरदर्दियों का गुनहगार इकलौता पाकिस्तान ही है। दूसरी ओर पाक की नापाकियत का सबब ना सिर्फ कश्मीर है बल्कि बांग्लादेश भी है जिसे विश्व मानचित्र पर खुदमुख्तार वजूद देने के लिये पाकिस्तान को तोड़ दिया गया। साथ ही बलूचिस्तान की आग के लिये भी वह हमें ही जिम्मेवार समझता है। यहां तक कि एक विफल राष्ट्र होने के लिये भी उसकी नजर में हम ही गुनहगार हैं और हमारे कारण ही उसे चीन और अमेरिका से लेकर विभिन्न इस्लामिक मुल्कों की खैरात का मोहताज बनना पड़ा है। यानि जख्मों से कलेजा छलनी इधर भी है और उधर भी है। उस पर तुर्रा यह कि हमारी मौजूदा सरकार ने एक ओर उसकी आतंकपरस्ती को दुनिया में बेनकाब कर दिया है जिससे वैश्विक मदद की इमदाद आधे से भी कम रह गयी है और दूसरी ओर सरहद पर उसकी फौज जम्हाई भी ले तो उसके मंुह में बारूद भर दिया जा रहा है। यहां तक कि हमारे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोवाल ने उसके लिये इतनी सिरदर्दी का सामना इकट्ठा करवा दिया है कि उसकी खुराफाती आईएसआई को अपने मसले सुलझाने से ही फुर्सत नहीं मिल रही। साथ ही कश्मीरी अलगाववादियों को औकात में रहने के लिये मजबूर होना पड़ रहा है। बातचीत का दरवाजा हमारी मर्जी से खुल भी रहा है और बंद भी हो रहा है। उसकी कोई शर्त स्वीकार नहीं की जा रही और आर्थिक गतिविधियां भी ऐसी हैं जिसमें भारत के हित को ही तरजीह दी जा रही है। यानि उसकी चैतरफा घेराबंदी का काम तो पूरा हो चुका है जिसमें फंसकर वह कसमसा भी रहा है और छटपटा भी रहा है। लेकिन कोई रास्ता तो खोलना ही पड़ेगा जिससे दोस्ती के लिये आवश्यक विश्वास बहाली कायम हो सके। वह रास्ता भी सियासी ही हो सकता है। उसकी सेना, आतंकी शुभचिंतकों या आईएसआई से तो बातचीत के हिमायती हम हो ही नहीं सकते। लिहाजा क्या बुरा है कि दोनों मुल्कों के शीर्ष नेता परस्पर दोस्ती का रिश्ता कायम करें और उनके रिश्ते इस हद तक सहज हों कि मेलजोल में सरहद की दीवार आड़े ना आये। वैसे भी ढि़ढ़ोरा पीटकर औपचारिक बातचीत की कोशिशों के अंजाम का इतिहास तो सर्वविदित ही है। क्यों ना टेढ़ी उंगली के बजाय एक बार सीधी उंगली से भी घी निकालने की कोशिश करें। वह भी खामोशी से, चुपके-चुपके। ताकि इन कोशिशों को किसी की नजर ना लगे। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’

शनिवार, 14 नवंबर 2015

‘जीत जरूरी तो है मगर किस कीमत पर?’

नवकांत ठाकुर
वाकई यह सवाल उठना लाजिमी है कि जीत के लिये जारी जंग में किस हद तक कुर्बानी देना जायज है। हालांकि कहते हैं कि इश्क और जंग में सब जायज होता है। लेकिन जंग में जीत के लिये जायज कुर्बानी पर विचार करने से परहेज बरतने के नतीजे में मुमकिन है कि जीत के बाद भी हार का ही एहसास हो। खास तौर से सियासी जंग की बात करें तो इसमें अगर देश और समाज का हित ही दांव पर लग जाये, समूची दुनियां हमारा माखौल उड़ाना शुरू कर दे और हमारे देश व देशवासियों का हर जगह उपहास होने लगे तो जंग के ऐसे रंग को कैसे जायज कहा जा सकता है? लोकतांत्रिक व्यवस्था में स्वस्थ सियासी जंग की पंरपरा का निर्वाह करने से परहेज बरतने का नतीजा कितना घातक हो सकता है यह बात शायद ही किसी को बताने की आवश्यकता हो। तभी तो अब तक हमारे देश में बदस्तूर इसी परंपरा का निर्वाह होता रहा है कि अपनी जान भले चली जाये मगर देश की आन-बान और शान पर हर्गिज बट्टा ना लगे। मगर शायद इन दिनों अब इस परंपरा के निर्वाह की चिंता किसी को नहीं रह गयी है। तभी तो विदेशी दौरों पर घरेलू सियासी प्रतिद्वन्द्वियों और अपने पूर्ववर्तियों की नीति व नीयत पर निशाना साधने से ना तो प्रधानमंत्री परहेज बरतते हैं और ना ही प्रधानमंत्री की जगहंसाई कराने का कोई भी मौका छोड़ना विपक्ष को गवारा हो रहा है। विश्वमंच पर देश की घरेलू राजनीति के टकराव ने ऐसा माहौल बना दिया है जिससे भारत की गरिमा, संप्रभुता और सम्मान को अब भारी खतरे का सामना करने के लिये मजबूर होना पड़ रहा है। माना कि देश के भीतर पहली दफा कांग्रेस को ऐसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ रहा है जिसने उसके अस्तित्व को ही खतरे में डाल दिया है। हर मोर्चे पर उसे मतदाताओं के काफी बड़े वर्ग की विरक्ति का सामना करना पड़ रहा है। यहां तक कि बिहार के चुनाव में भी उसने लंबे अर्से के बाद जो संतोषजनक प्रदर्शन किया है उसे अगर वह अपनी जनस्वीकार्यता का प्रमाण व परिणाम मानने की खुशफहमी पाले तो इसे उसकी नादानी ही मानी जाएगी। ऐसे में स्वाभाविक है कि अभी कांग्रेस को लंबा संघर्ष करना पड़ेगा ताकि अपने दम पर अपने वजूद-वकार को दोबारा नयी बुलंदियों पर पहुंचाते हुए विरोधी पक्ष के प्रति देश के जनमानस में अस्वीकार्यता की जड़ें मजबूत की जा सकें। लेकिन इस लड़ाई में उसे इतना खयाल तो रखना ही पड़ेगा कि उसकी किसी भी हरकत से ना तो देशविरोधी ताकतों को संजीवनी मिले और ना ही भारत की गरिमा व संप्रभुता पर कोई आंच आये। हालांकि देश की सबसे अनुभवी राजनीतिक पार्टी होने के नाते उसने बाकियों के मुकाबले जंग की मर्यादा का बहुत कम मौकों पर ही उल्लंघन किया है लेकिन जिन कुछ मामलों में उसकी ओर से असहिष्णुता का प्रदर्शन किया जा रहा है उसके लिये बाकियों को तो ना चाहते हुए भी कुछ हद तक माफ किया जा सकता है लेकिन कांग्रेस द्वारा ऐसा किये जाने को कतई जायज नहीं कहा जा सकता है। मसलन अगर दादरी के मामले को लेकर आजम खान सरीखे नेता भारत सरकार की कार्यप्रणाली को संयुक्त राष्ट्र संघ के कठघरे में खड़ा करने की पहल करते हैं तो उसे किसी भी नजरिये से उचित नहीं मानेजाने के बावजूद कुछ हद तक उसकी अनदेखी की जा सकती है लेकिन तकरीबन छह दशकों तक देश पर एकछत्र राज करनेवाली कांग्रेस के शीर्ष नेताओं में शुमार होनेवाले सलमान खुर्शीद अगर पाकिस्तान की धरती पर खड़े होकर मुल्क के दुश्मनों की हिमायत व मिजाजपुर्सी करने के क्रम में भारत की विदेशनीति पर प्रहार करें तो इसे कैसे जायज कहा जा सकता है। वह भी तब जब ब्रिटेन की संसद को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री इस बात की जी-तोड़ कोशिश कर रहे हों कि विश्वग्राम व्यवस्था के मौजूदा दौर में पाकिस्तान को पूरी तरह अलग-थलग कर दिया जाये। ऐसे मौके पर अगर सलमान साहब पाकिस्तान के प्रति भारत सरकार की नीति को गलत बतायें, आतंकवाद के साथ जारी लड़ाई में पाकिस्तान की भूमिका को जायज बताते हुए उसकी सराहना करें और पाकिस्तान के प्रति भारत सरकार की सख्त नीति को अफसोसनाक बतायें तो घरेलू राजनीतिक लड़ाई के इस आयाम को कैसे जायज कहा जा सकता है। इस्लामाबाद में प्रवचन देने के क्रम में सलमान ने तो यहां तक कह दिया कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लगातार अमन, शांति व भाईचारे की ही बात कर रहे हैं अलबत्ता भारत की ओर से उन्हें उचित जवाब नहीं मिल रहा है। जाहिर है कि जब सलमान सरीखे विपक्ष के शीर्ष कद्दावर नेता की ओर से विदेशी धरती पर खड़े होकर इस तरह की बयानबाजी की जाएगी तो इसका घरेलू राजनीति पर भले ही कोई अलग प्रभाव ना पड़े लेकिन विश्व मंच पर इसकी चर्चा भी होगी और देश की छवि पर इसका नकारात्मक असर भी होगा। साथ ही इससे हौसला अफजायी होगी उन भारत विरोधी विदेशी ताकतों की जो हमारेे घरेलू राजनीतिक टकराव की आग में घी डालकर अपने स्वार्थ की रोटी सेंकने के मौके की तलाश में रहते हैं। खैर, घरेलू राजनीतिक लड़ाई के बीच किसी भी मंच से विरोधी खेमे की हिमायत करना तो बेहद ही मुश्किल है लेकिन देशहित की अनदेखी करके अपने घर की आग में देश विरोधी तत्वों को रोटी सेंकने का मौका देने को कैसे जायज ठहराया जा सकता है? ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’  

शनिवार, 3 अक्टूबर 2015

‘मित्रता की मिठास में अविश्वास का जहर’

नवकांत ठाकुर
यूं तो हर रिश्ते की बुनियाद विश्वास पर ही टिकी होती है लेकिन मित्रता के मामले में विश्वास की भूमिका कुछ अधिक ही होती है। खून के रिश्तों में कितनी ही दुश्मनी क्यों ना हो जाये लेकिन रक्तसंबंधों में बदलाव नहीं हो सकता। जिसके साथ जो संबंध है वह हमेशा रहेगा ही। भले रिश्ते में मिठास रहे या खटास। लेकिन मित्रता का रिश्ता सिर्फ विश्वास पर ही टिका होता है। विश्वास जितना मजबूत होगा मित्रता भी उतनी ही अटूट होगी। विश्वास की बुनियाद हिलते ही यह रिश्ता सिरे से समाप्त हो जाता है। इन दिनों विश्वास का यही संकट दिख रहा है भारत और नेपाल की मित्रता में। कहने को तो दोनों अलग देश हैं लेकिन बेटी-रोटी का है। भारत से लगती नेपाल की 1700 किलोमीटर लंबी सरहद के दोनों ओर के बाशिंदों को आज तक शायद ही यह महसूस हुआ हो कि इस पार या उस पार में कोई अंतर है। वैसे भी नेपाल को दुनिया के साथ को जोड़ने की कड़ी भी भारत ही है। नेपाल को नमक-तेल से लेकर तमाम जरूरी सामानों की उपलब्धता भारत से ही होती है। भारत में सरकार किसी भी दल या गठबंधन की क्यों ना हो लेकिन नेपाल व नेपालियों को हमेशा हर मामले में अपने अटूट हिस्से सरीखा ही सम्मान व स्थान दिया गया। लेकिन लगता है कि हमारी इस मित्रता पर किसी की बुरी नजर पड़ गयी है। तभी तो नेपाल के संविधान निर्माताओं ने वहां कुछ ऐसी व्यवस्थाएं लागू करने की पहल कर दी है जिसके नतीजे में हर उस नेपाली के हक व अख्तियार में कटौती हो गयी है जिसने भारत के साथ रोटी-बेटी का राब्ता कायम किया हुआ है। हालांकि भारत ने आज तक ना तो कभी नेपाल की संप्रभुता या अंदरूनी मामलों में हस्तक्षेप करने की कोशिश की है और ना ही भारत की नीतियां ऐसा करने की इजाजत देती हैं। बल्कि भारत तो हमेशा ही नेपाल की एकता, अखंडता व संप्रभुता के रक्षक के तौर पर खड़ा रहा है। लेकिन मसला है कि जब भारत से बहू ब्याह कर लाने पर उसे अगर सात साल तक नागरिकता देने से भी नेपाल का नया संविधान इनकार कर रहा हो तो उसे बेहतरीन व्यवस्था बताकर उसका स्वागत कैसे किया जा सकता है। तभी तो भारत ने नेपाल की इस नयी पहल का सिर्फ संज्ञान लेते हुए इस पर कोई भी प्रतिक्रिया देने से परहेज बरत लिया है। लेकिन भारत की यह चुप्पी भी नेपाल को सहन नहीं हो रही। वह इसे नकारात्मक समझ रहा है। अब उसे कौन समझाये कि उसके अंदरूनी मामलों को अच्छा या बुरा कहनेवाले हम होते ही कौन हैं। अगर उसने इस पर सलाह मांगी होती तो शायद परिस्थितियां ऐसी नहीं होती कि पूरे तराई इलाके में संविधान को जलाया जा रहा होता या तमाम मैदानी बाशिंदे आंदोलन पर उतारू होते। लेकिन नेपाल के नये संविधान के निर्माण में भारत की भूमिका सिर्फ इतनी ही है कि उसे लोकतांत्रिक व्यवस्था व एक लिखित संविधान लागू करने के लिये इस तरफ से हमेशा प्रोत्साहित किया जाता रहा है। खैर, नेपाल के नेताओं को पता नहीं मित्रता की मिठास का जायका बदलने के लिये चीन का कौन सा स्वाद रास आ गया है कि वे इन दिनों अपने दोनों बड़े पड़ोसियों के साथ बराबर का संतुलन साधने का राग आलापने लगे हैं। जाहिर तौर पर यह चीन की ही खुराफात है कि उसने नेपाल में यह भ्रम फैला दिया है कि नये संविधान का विरोध करने के लिये तराई के मधेसियों को भारत ही भड़का रहा है और मधेसी आंदोलन के कारण ठप्प पड़ी ट्रकों की आवाजाही वास्तव में भारत द्वारा की गयी आर्थिक नाकेबंदी का नतीजा है। भारत के प्रति फैलाये गये भ्रम का ही नतीजा है कि नेपाल में 42 भारतीय टीवी चैनलों का प्रसारण प्रतिबंधित कर दिया गया है और सिनेमाघरों में हिन्दी फिल्म दिखाने पर भी रोक लगायी जा रही है। इसके पीछे वजह बतायी जा रही है भारत की उस कथित नीति को जिससे नेपाल की एकता, अखंडता व संप्रभुता को खतरा उत्पन्न हो रहा है। अब इस बेसिर-पैर की गलतफहमी पर क्या कहा जा सकता है। लेकिन मसला है कि इस मामले में चुप भी नहीं बैठा जा सकता क्योंकि भारत व नेपाल के बीच गलतफहमी का बीज बोकर चीन अपनी जड़ें जमाने में जुट गया है। जाहिर है कि यह स्थिति बेहद चिंताजनक है। ना सिर्फ भारत के लिये बल्कि इससे कहीं अधिक नेपाल के लिये जिसकी सत्ता का संचालन कर रहे नेताओं को चीन की चालबाजियां  या तो समझ नहीं आ रहीं या वे जानबूझकर नासमझी का ढ़ोंग कर रहे हैं। तभी तो वरिष्ठ भाजपा नेता यशवंत सिन्हा को खुले तौर पर प्रधानमंत्री से यह अपील करनी पड़ी है कि वे नेपाल के मसले की अनदेखी ना करें और दोनों देशों के रिश्तों की प्रगाढ़ता में कमी आने से पहले ही नेपाल में व्याप्त भ्रम, गफलत व गलतफहमी को दूर करने की ठोस पहल करें। हालांकि नेपाल की नियति आज उसे जिस मोड़ पर ले आयी है उसके लिये पूरी तरह उसकी अपनी नीतियां ही जिम्मेवार हैं लेकिन कोई दुश्मन अगर हमारे सगे भाई को भड़का रहा हो और उसे गलत राह पर ले जा रहा हो तो अपने मासूम भाई को उसके हाल पर छोड़कर सिर्फ ‘तेल देखो और तेल की धार देखो’ की नीति पर अमल किये जाने को कैसे उचित कहा जा सकता है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’  

गुरुवार, 20 अगस्त 2015

अपनी ओर से बातचीत का दरवाजा बंद नहीं करेगा भारत 

पाकिस्तान के मसले पर किसी भी दबाव के सामने नहीं झुकेगी सरकार

नवकांत ठाकुर

पाकिस्तान के साथ राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार स्तर की बातचीत से पहले भले ही पड़ोसी देश ने उकसावे की कूटनीति पर अमल करते हुए जम्मू-कश्मीर के अलगाववादी नेताओं को नई दिल्ली स्थित अपने दूतावास में बातचीत के लिये आमंत्रित किया हो लेकिन इस मसले पर मच रहे चैतरफा हंगामे के बावजूद भारत सरकार ने इस मामले को अधिक तवज्जो देना मुनासिब नहीं समझा है। केन्द्र सरकार की ओर से साफ लहजे में यह संकेत दे दिया गया है कि ऊफा में हुई दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों की बैठक में हुए समझौते के तहत दिल्ली में आयोजित हो रही राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार स्तर की इस बैठक को निरस्त या स्थगित करने का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता है। हालांकि सरकार ने यह भी स्पष्ट करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है कि पाकिस्तान की ओर से भारत के खिलाफ जो भी शरारती व खुराफाती हरकतें की जा रही है उसका सटीक व करार जवाब देने में कोई कसर नहीं छोड़ी जाएगी। साथ ही सरकार की ओर से यह जताने में भी कोई कोताही नहीं बरती गयी है कि पाकिस्तान द्वारा अलगावावादियों के साथ गलबहियां किये जाने, सरहद पर संघर्ष विराम का उल्लंघन करके अशांति का माहौल बनाये जाने, सीमापार से आतंकियों की खेप भेजे जाने, सुरक्षा परिषद में कश्मीर के मसले को नये सिरे से उठाने का प्रयास किये जाने और पेशावर में हुए आतंकी हमले का दोष भारत के सिर मढ़ने की कोशिश किये जाने सरीखे मामलों को लेकर विपक्ष से लेकर सत्तापक्ष के भी कई शीर्ष नेताओं द्वारा फिलहाल बातचीत का दरवाजा बंद किये जाने का जो दबाव बनाने की कोशिश हो रही उसे अधिक तवज्जो देना कतई उचित नहीं होगा। 
वास्तव में देखा जाये तो पिछले दिनों गुरदासपुर में हुए आतंकी हमले में जिंदा पकड़े गये आतंकी नावेद के मामले ने पाकिस्तान को इस कदर बैकफुट पर ला दिया है कि फिलहाल वह भारत के साथ नजरें मिलाकर द्विपक्षीय बातचीत करने से बचने की कोशिशों में जुट गया है। इन्हीं कोशिशों के तहत उसने भारत को उकसाने की हरसंभव हरकतें शुरू कर दी हैं ताकि एक ओर उसे फिलहाल इस मामले की सफाई देने से बचने का अवसर मिल जाये और दूसरी ओर विश्व बिरादरी के सामने यह प्रचारित करने का भी मौका मिल जाये कि भारत ही बातचीत के माध्यम से विवादों का हल निकालने का इच्छुक नहीं है। लेकिन पाकिस्तान की इस नापाक नीयत को भारत भी अच्छी तरह समझ रहा है लिहाजा अपनी ओर से वार्ता पर विराम लगाने की पहल करने से परहेज बरतने की नीति अपनायी जा रही है। हालांकि पिछले साल भी इस्लामाबाद में होनेवाली विदेश सचिव स्तर की बातचीत से पूर्व पाकिस्तान ने ऐसी ही खुराफात को अंजाम देते हुए अपने दिल्ली दूतावास में जम्मू कश्मीर के अलगाववादी नेताओं को आमंत्रित कर लिया था जिस पर मचे बवाल के बाद भारत सरकार को वार्ता को स्थगित करने का फैसला करना पड़ा था। लेकिन इस बार उस कूटनीतिक गलती को दुहराने के लिये सरकार कतई तैयार नहीं है। यही वजह है कि विदेश मंत्रालय के उच्च पदस्थ सूत्रों से लेकर केन्द्र में सत्तारूढ़ भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता शाहनवाज हुसैन ने भी बेलाग लहजे में यह जता दिया है राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार स्तर की वार्ता पर विराम लगाना कतई उचित नहीं होगा। हालांकि पाकिस्तान की ताजा हरकतों का उल्लेख करते हुए विपक्षी दलों से लेकर पूर्व भाजपाई विदेशमंत्री यशवंत सिन्हा ने ही नहीं बल्कि शिवसेना सरीखे सरकार के घटक दलों व विहिप सरीखे भाजपा के सहोदर संगठनों ने भी आगामी 23-24 तारीख को नई दिल्ली में होनेवाली इस बातचीत को स्थगित किये जाने का भारी दबाव बनाया हुआ है। लेकिन सरकार का मानना है कि पिछले दिनों आतंकी नावेद को जिंदा पकड़ने में हासिल हुई कामयाबी के बाद इस समय कूटनीतिक स्तर पर भारत का पलड़ा काफी भारी हो गया है जिससे पाकिस्तान को शर्मसार करने व उसे सीधे रास्ते पर आने के लिये बाध्य करने का भारत को सुनहरा मौका मिल गया है। लिहाजा ऐसे समय में अपनी ओर से बातचीत का दरवाजा बंद करने के विकल्प पर विचार करना भी कतई सही नहीं होगा।  




बुधवार, 12 अगस्त 2015

‘खुद पर ही बरसता है क्यों खुद का गुस्सा’

नवकांत ठाकुर
‘फूल बरसे कहीं शबनम कहीं गौहर बरसे, और इस दिल की तरफ बरसे तो पत्थर बरसे, हम से मजबूर का गुस्सा भी अजब बादल है, अपने ही दिल से उठे अपने ही दिल पर बरसे।’ वाकई बशीर बद्र साहब की लिखी इन पंक्तियों का हर शब्द केन्द्र में सत्तारूढ़ भाजपा की सोच व मानसिक स्थिति को प्रतिबिंबित करता हुआ ही प्रतीत होता है। हकीकत तो यही है कि संसद के मौजूदा मानसून सत्र को सुचारू ढंग से संचालित करने व विभिन्न बहुप्रतीक्षित विधेयकों को सदन से पारित कराने में हाथ आयी नाकामी के मद्देनजर भगवाखेमे में आक्रोश व गुस्से की लहर दौड़ना तो स्वाभाविक ही है। तभी तो रोजाना के राजनीतिक मसलों के प्रति बेहद तटस्थ व निरपेक्ष नजर आनेवाले लालकृष्ण आडवाणी सरीखे भाजपा के शीर्षतम मार्गदर्शक पर भी तिमिलाहट व कसमसाहट का भाव आज इस कदर हावी दिखाई दिया कि उन्होंने संसदीय कार्यमंत्री वेंकैया नायडू के माध्यम से लोकसभा अध्यक्षा सुमित्रा महाजन को यह संदेश दिलाने में कोताही नहीं बरती कि सदन में जारी बवाल के प्रति उन्हें अपने सख्त रूख पर डटे रहना चाहिये। साथ ही सदन में जारी हंगामे के बीच आडवाणी का उदास व निराश होकर डबडबाई आंखों के साथ बाहर निकल आना भी यही दिखाता है कि संसद के मौजूदा हालातों ने सत्ताधारी खेमे को बुरी तरह विचलित कर दिया है। साथ ही संसद में जारी गतिरोध के सिलसिले ने जिस तरह से सरकार के हाथ-पांव बांध दिये हैं उसकी बेचैनी व छटपटाहट से भगवाखेमे के सब्र का बांध टूटने का ही नतीजा है कि आज सदन के वेल में आकर बैनर-पोस्टर लहराते हुए हंगामा मचा रहे विपक्षी सांसदों के बीच घुसकर बेहद आक्रोशित लहजे में कांग्रेस के शीर्ष नेताओं को ललकारने से उमा भारती भी खुद को नहीं रोक पायीं। वास्तव में अब मौजूदा मानसून सत्र के समाप्त होने में महज दो दिन का वक्त ही बाकी बच गया है और इस बात के आसार दूर-दूर तक नहीं दिखाई दे रहे हैं कि अंतिम दो दिनों में भी सदन में कोई ठोस कामकाज हो पाएगा। कहां तो सरकार को प्राथमिकता के तहत अगले वित्तीय वर्ष से देश में वस्तु व सेवाकर अधिनियम (जीएसटी) को लागू करने के लिये आवश्यक 122वें संविधान संशोधन को राज्यसभा से पारित कराना था, भूमि अधिग्रहण विधेयक में संशोधन के प्रारूप पर आमसहमति बनानी थी और रियल एस्टेट विधेयक पर संसद के सहमति की मुहर लगवानी थी। लेकिन विपक्ष ने ऐसा गतिरोध बनाया हुआ है कि किसी मसले पर कायदे से चर्चा कराने या ज्वलंत मसलों पर संबंधित मंत्रियों को विस्तार से अपना औपचारिक बयान प्रस्तुत करने में भी कामयाबी नहीं मिल पा रही है। हालांकि सरकार की ओर से लगातार ‘साम, दाम, दंड व भेद’ सरीखे तमाम हथकंडे अपनाए गये लेकिन ‘मर्ज बढ़ता गया ज्यों-ज्यों दवा की।’ इसीका नतीजा है कि राज्यसभा में सबसे अधिक संख्याबल के दम पर कांग्रेस ने कोई कामकाज नहीं होने दिया है जबकि लोकसभा में भी सबसे बड़ा विपक्षी दल होने के नाते उसने सरकार की नाक में दम किया हुआ है। ऐसे में समस्या है कि सरकार करे भी तो क्या करे। बाकी विधेयकों को तो आगामी शीत सत्र के लिये भी टाला जा सकता है लेकिन अगर जीएसटी को अगले सत्र के लिये टालने की नौबत आयी तो अगले वित्तीय वर्ष से देश में इसे लागू करना नामुमकिन की हद तक मुश्किल हो जाएगा। इसका सीधा असर देश के अर्थव्यवस्था की रफ्तार पर पड़ना पूरी तरह है क्योंकि मौजूदा हालातों में रिजर्व बैंक ने देश की जीडीपी तकरीबन साढे सात फीसदी रहने का जो अनुमान व्यक्त किया है उसमें जीएसटी के लागू होने पर न्यूनतम ढाई फीसदी की वृद्धि होना तय है। लेकिन वह तभी संभव है जब पहले तो संसद के दोनों सदनों में दो तिहाई समर्थन से इसे पारित कराया जाए और उसके बाद देश की कम से कम 15 विधानसभा भी इस पर अपनी सहमति की मुहर लगाए। हालांकि कहने को तो वित्तमंत्री ने कह दिया है कि अगर कांग्रेस ने इसे अगले दो दिनों में पारित करने में सहयोग नहीं किया तो सरकार के पास इसे सदन से पारित कराने के और भी रास्ते हैं जिसमें संसद की विशेष बैठक बुलाया जाना भी शामिल है। लेकिन हकीकत यही है कि यह केवल कहने की ही बात है जो तिलमिलाहट की हालत में वित्तमंत्री ने कह दिया है वर्ना जिस विपक्ष ने पूरे सत्र में इसे पारित नहीं होने दिया है वह विशेष बैठक में इसे पारित करने में सरकार का सहयोग करगी, इसका क्या गारंटी है। लेकिन मसला है कि सरकार इसमें चाह कर भी कुछ नहीं कर सकती। सिवाय तिलमिलाने, छटपटाने व बिलबिलाने के। यही तिलमिलाहट व छटपटाहट ऐसे गुस्से के तौर पर सामने आ रही है जिसमें ना सिर्फ प्रधानमंत्री खुद भी कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को देश के विकास में अवरोधक बता रहे हैं बल्कि वेंकैया नायडू व अरूण जेटली से लेकर सत्तापक्ष के तमाम वरिष्ठ-कनिष्ठ नेतागण कांग्रेस के शीर्ष संचालक परिवार को अपने सीधे निशाने पर लेने से परहेज नहीं बरत रहे हैं। खैर, तयशुदा योजनाएं पूरी नहीं हो पाने और चाह कर भी कुछ नहीं कर पाने की तिलमिलाहट से आक्रोश व गुस्से का पनपना तो स्वाभाविक ही है लेकिन हकीकत यही है कि अपनी ही नाकामियों के नतीजे में पनपे इस गुस्से का नुकसान तो खुद को ही झेलना पड़ेगा, किसी और की सेहत पर इससे कोई फर्क नहीं पड़नेवाला। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’  

शुक्रवार, 7 अगस्त 2015

‘मनवा कहै धरम, सिर पै चढ़े करम’

नवकांत ठाकुर
केन्द्र की भाजपानीत राजग सरकार की मौजूदा कार्यप्रणाली बिल्कुल वैसी ही दिख रही है जिसके बारे में संत कबीर ने लिखा है कि ‘मनवा तो फूला फिरै, कहै जो करूं धरम, कोटि करम सिर पै चढ़े, चेति न देखे मरम।’ अपने मन से बेहतरीन काम करने के प्रति यह सरकार पूरी तरह निश्चिंत है। इसके लिये ना तो इसे किसी के परामर्श की आवश्यकता होती है और ना ही साथ या सहयोग की। तभी तो कांग्रेस के 25 सांसदों को पांच दिनों के लिये सदन से निलंबित किये जाने के विरोध में लोकसभा की बैठक का बहिष्कार कर रहे विपक्षी दलों के प्रति अपने आक्रोश का इजहार करते हुए केन्द्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद औपचारिक तौर पर यह बताने में कोई कोताही नहीं बरतते हैं कि विधायी कार्य संपादित करने के लिये उनकी सरकार को विपक्ष के सहयोग या समर्थन की कोई जरूरत नहीं है। जाहिर है कि जिस सरकार के मंत्रियों की मानसिकता इस कदर आत्मकेन्द्रित व ‘एको अहं द्वितीयं नास्ति’ सरीखी होगी उस पर मनमानी व तानाशाही बरतने का आरोप तो लगेगा ही। अपनी सोच को ही पूरा सही मानने की इसी मानसिकता के तहत वरिष्ठ केन्द्रीय मंत्री वेंकैया नायडू ने नरेन्द्र मोदी को देश के लिये भगवान का वरदान भी करार दे दिया। जाहिर है कि सत्तापक्ष की ऐसी सोच से विपक्ष तो कतई इत्तफाक नहीं रख सकता है। लेकिन सत्तापक्ष की जिद है कि विपक्ष भी उसकी सोच को ही पूरा सच माने। उसके द्वारा किये जानेवाले हर काम का दिल खोलकर गुणगान करे। लेकिन मसला यह है कि जब सत्ता में बैठे लोग किसी भी मसले पर ना तो विपक्ष से सलाह-मशविरा करते हों और ना ही संबंधित मामले से जुड़े पक्षों व विभागों को विश्वास में लेना या उसके साथ सूचनाएं साझा करना गवारा कर रहे हों तो ऐसे में उनकी पहलकदमियों का आंख मूंदकर गुणगान करना कैसे संभव है। मिसाल के तौर पर संसद में सुषमा स्वराज ने ललित मोदी के मसले पर जो बयान दिया है वह बेशक बेहद भावनात्मक व मानवीय सरोकारों से लबरेज हो और उन्होंने ब्रिटिश सरकार को जो पत्र लिखा था उसमें किसी नियम, कायदे व दायरे का उल्लंघन नहीं किया गया हो। लेकिन इस सच को कैसे झुठलाया जा सकता है कि विदेशमंत्री की हैसियत से उन्होंने ब्रिटिश सरकार को जो पत्र लिखा था उसके बारे में ना तो उन्होंने तत्कालीन विदेश सचिव सुजाता सिंह को कोई जानकारी दी और ना ही ब्रिटेन स्थित भारतीय दूतावास को कुछ बताना जरूरी समझा। ऐसे में विदेशमंत्री की हैसियत से स्वघोषित तौर पर कैंसर की बीमारी से जूझ रही ललित की पत्नी की मदद करने के लिये कथित मानवीय आधार पर की गयी पहलकदमी सही थी या गलत इस पर भले ही बहस की गुंजाइश दिखती हो लेकिन उन्होंने जिस मनमाने तरीके से इस काम को अंजाम दिया उसे कैसे सही कहा जा सकता है। इसी प्रकार पूर्वोत्तर राज्यों में दशकों से जारी अलगाववादी लड़ाई पर विराम लगाने के लिये प्रधानमंत्री ने जो नागा समझौता किया है उसे भले ही ऐतिहासिक व बेहतरीन मानने से कोई भी संकोच ना करे लेकिन इस समझौते को साकार रूप देने की प्रक्रिया में किसी भी सूबे की सरकार को शामिल करना जरूरी नहीं समझे जाने को कैसे सही कहा जा सकता है। थोड़ी देर के लिये अगर यह मान भी लिया जाये कि ना तो ललित की सहायता करने के पीछे सुषमा का कोई निजी लोभ-लाभ छिपा था और ना नागा समझौते की शर्तों को स्वीकार करने के क्रम में प्रधानमंत्री ने अपनी राष्ट्रवादी मंशा से कोई समझौता किया है लेकिन इन पहलकदमियों को मनमाने तौर-तरीकों से अंजाम दिये जाने का मसला तो विवादों में घिरना लाजिमी ही है। स्वाभाविक तौर पर विपक्ष को तो इस तरह का सवाल उठाना ही चाहिये लेकिन ऐसा करने पर उसकी देशभक्ति व राष्ट्रहित की सोच को ही कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की जा रही है। अब ऐसा ही विवाद आगामी दिनों में तीस्ता जल बंटवारे को लेकर भी उठनेवाला है क्योंकि पश्चिम बंगाल से होकर बांग्लादेश को जानेवाली तीस्ता नदी के पानी पर अधिकार को लेकर जारी विवाद सुलझाने के लिये बांग्लादेश के साथ जिस समझौते के प्रारूप पर बात चल रही है उसके प्रति पश्चिम बंगाल की सरकार को विश्वास में लेना या उसे भी एक पक्षकार के तौर पर बातचीत में शामिल कतई जरूरी नहीं समझा गया है। लिहाजा कल को अगर केन्द्र सरकार अपनी ओर से बांग्लादेश के साथ कोई ऐसा समझौता कर लेती है जिससे पश्चिम बंगाल के हितों में कटौती करके  पड़ोसी देश के साथ जारी विवाद को हमेशा के लिये समाप्त कर दिया जाता है तो इस मामले में भी उस पर तानाशाही नीतियां अपनाने का आरोप लगना लाजिमी ही है। खैर, इस तरह के मामलों को समग्रता में देखा जाये तो भले ही सरकार की नीति व नीयत में कोई गलती ना दिखे लेकिन उसकी कार्यनीति तो ऐसी ही है जिससे विपक्ष को ही नहीं बल्कि अक्सर उसके सहयोगियों व समर्थकों को भी ऐसा लगता है मानो उन्हें पूरी तरह ठेंगे पर रखा जा रहा हो। बहरहाल, लोकतांत्रिक अपेक्षाओं व कार्यप्रणालीय परंपराओं की अनदेखी का सिलसिला बदस्तूर जारी रखते हुए ‘मन के मते’ चलना बदस्तूर जारी रखा गया तो नीति व नीयत में पूर्ण शुचिता के बावजूद सरकार की तुगलकी व तानाशाही छवि बननी तय ही है जिसे विकेन्द्रित लोकशाही व्यवस्था में कतई स्वीकार्यता नहीं मिल सकती है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’