‘माहौल घिर गया है बेसब्र आंधियों से’
नवकांत ठाकुर
पश्चिमी उत्तर प्रदेश स्थित बुलंदशहर के बनवारीपुर-घंघरावाली में पैदा हुए पिछली सदी के शायर पुरूषोत्तम प्रतीक कहते हैं कि ‘क्यों लाल हो रहा है ये आसमान देखो, धरती नहीं रहेगी यूं बेजुबान देखो, माहौल घिर गया है बेसब्र आंधियों से, बरबाद हो ना जाये अपना जहान देखो।’ वाकई इन दिनों देश का सियासी-सामाजिक माहौल बेहद ही बेसब्र दिख रहा है। अक्षय कुमार कह रहे हैं कि अब पाकिस्तान में घुसकर दुश्मनों को मारने का वक्त आ गया है। विपक्षी दल पूछ रहे हैं कि कहां गया वह छप्पन इंच का सीना और कहां गयी वह बातें जो उन्होंने मुंबई पर हुए हमले के बाद कही थीं। यानि पाकिस्तान के खिलाफ कार्रवाई के हिमायती सभी दिख रहे हैं। लेकिन शासन व्यवस्था खामोश है। खामोशी भी ऐसी कि हर बात पर प्रधानमंत्री की फौरी प्रतिक्रिया उगलनेवाला ट्विटर हैंडल भी पठानकोट के मसले पर मौन है। जाहिर है कि यह खामोशी बहुतों को बहुत खल रही है, और खले भी क्यों ना। आखिर जब पहले से पता चल चुका था कि आतंकी हमारी सरहद में दाखिल हो चुके हैं और उनके निशाने पर पठानकोट का एयरबेस है, इसके बाद भी उन्हें समय रहते रोकना-दबोचना तो दूर बल्कि तयशुदा मंजिल के चाक-चैबंद किले में दाखिल होने से रोक पाना भी संभव नहीं हो सका तो यह सब जानने के बाद किसे निराशा नहीं होगी। यह निराशा और बढ़ जाती है जब याद आता है कि आतंकियों से जारी मुठभेड़ के बारे में देश की आंतरिक सुरक्षा की जिम्मेवारी संभालनेवाले गृहमंत्री भी इस कदर अंधेरे में थे कि उधर लड़ाई जारी थी और इधर वे आॅपरेशन समाप्ति का ऐलान कर रहे थे। प्रधानमंत्री कर्नाटक में व्यस्त थे और संचालन की कमान संभालनेवाले राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की जुबान पर ताला था। हर तरफ बेचैनी थी, अफरातफरी थी और खामोश मुर्दानी थी। सामने आ रहे थे सिर्फ आतंकियों से लोहा ले रहे जवानों की शहादत के आंकड़े। उस पर तुर्रा यह कि बकौल गुहमंत्री, हम मुंहतोड़ जवाब देंगे। अब सवाल है कि तोड़ क्यों नहीं रहे मुंह, रोका किसने है, किस बात का इंतजार है? पूछा जा रहा है कि आखिर कब तक हम ही पीडि़त बने रहेंगे, कसमसाकर और छटपटाकर हर बार की तरह ना सिर्फ इस बार बल्कि भविष्य में भी विवश होकर बैठे रहना और पड़ोस से जारी परोक्ष युद्ध में एकतरफा तौर पर हर दर्द, जख्म और पीड़ा को सहन करते रहना ही हमारी नियति है क्या? पड़ोसी के टुकड़ों पर पलनेवाले रूबिया का अपहरण करें या जहाज को कंधार ले जाकर बंधक बनायें। हम तो सिर्फ समझौते की शर्तों के सामने झुकते ही आये हैं। हमला संसद पर हो, मुंबई में, पठानकोट में हो या कहीं और। हम हर बार सिर्फ जुबानी तैश-तेवर दिखा सकते हैं या बहुत हुआ तो पड़ोसी के साथ जारी शांति वार्ता को एकतरफा तौर पर बंद कर सकते हैं। इससे अधिक कभी कुछ हो पाने की मिसाल तो इतिहास में नदारद ही है। ऐसे में अब अगर इस दफा देश में आक्रोश है, गुस्सा है और कुछ कर गुजरने की चाहत है तो इसे कोई गलत कैसे कह सकता है। खैर, देश की इस भावना को गलत तो वह सरकार भी नहीं कह रही है जिससे उम्मीदें तो बहुत हैं लोगों को लेकिन अपेक्षाओं पर वह खरी नहीं उतर पा रही है। लेकिन इन तमाम निराशाओं के बीच कुछ बातें ऐसी भी हैं जिनसे उम्मीद जगती है पाकिस्तान के साथ अच्छे दिन आने की, संबंध सुधरने की, कुछ अच्छा होने की। मसलन इस दफा पहली बार पाकिस्तान ने यह स्वीकार किया है कि पठानकोट के हमलावर उसकी सरहद से ही घुसे थे। पहली बार उसने भारत में हुई आतंकी वारदात की तत्काल निंदा-भर्तस्ना की है। पहली बार उसने भरोसा दिलाया है कि जांच करके असली दोषियों को सजा दिलाने में वह हमारा सहायक बनेगा। पहली बार भारत में हुए आतंकी हमले के लिये अमेरिका सहित विश्व समुदाय ने पाकिस्तान पर उंगली उठायी है और उससे मामले को अंजाम तक पहुचाने की अपेक्षा प्रकट की है। साथ ही पहली बार कश्मीर और आतंकवाद को अलग करते हुए वह ऊफा में इस बात के लिये सहमत हुआ है कि आतंक पर अलग से पहले चर्चा होगी और कश्मीर सरीखे बाकी अन्य सभी मसलों पर अलग से सहमति व सहयोग की राह तलाशी जाएगी। यानि समग्रता में देखें तो मौजूदा सरकार ने पड़ोसी मुल्क के साथ इतना राब्ता तो कायम कर ही लिया है कि पठानकोट हमले के बाद भी दोनो तरफ के सियासी हुक्मरानों की परस्पर तल्ख बयानबाजी की परंपरा कुछ पीछे छूट गयी है और दोनों मिलजुल कर कुछ करते हुए दिखने के ख्वाहिशमंद नजर आ रहे हैं। यानि सही दिशा में एक शुरूआत होती हुई तो दिख रही है लेकिन निःसंदेह उलझन काफी जटिल है, पुरानी है। लिहाजा इसे सुलझाने का रास्ता भी लंबा और दुर्गम ही होगा जो हर कदम पर सख्त इम्तिहान भी लेगा लेकिन दोनों को अपने क्रोध, उन्माद और भावनाओं पर संयम रखना ही होगा। इसके अलावा कोई विकल्प ही नहीं है। बाकी विकल्प सिर्फ छलावा है, नजरों का धोखा है और दोनों के लिये आत्महंता डगर है जिस पर आगे बढ़ने का कोई मतलब ही नहीं है। यानि, पड़ोसी को सही राह पर लाने के लिये कोई भी कीमत चुकाने का खम ठोंकनेवालों को यही कहना मुनासिब होगा कि, ‘है अगर हसरते दीदार तो सब्र रख, उस बेवफा का नकाब खिसकेगा जरूर।’ ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’
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