शनिवार, 16 जनवरी 2016

‘सत्ता की व्यस्तता में संवेदना की शून्यता’

‘सत्ता की व्यस्तता में संवेदना की शून्यता’

सत्ता की ऊंचाई और संवेदना की गहराई के बीच आकाश-पाताल का अंतर तो होता ही है। लेकिन अपेक्षा भी तो उससे ही की जाती है जो शिखर पर होता है। उम्मीद की जाती है कि वह सबकी सुनेगा, सबकी अपेक्षाएं पूरी करेगा। जो जितनी ऊंचाई पर होता है उससे अपेक्षाएं भी उतनी ही ज्यादा की जाती हैं। लेकिन सत्ता की भी अपनी व्यस्तता है। उससे सभी जुड़े होते हैं तो उसे भी सबका सोचना होता है। सबके लिये कुछ ना कुछ करना होता है। हमेशा इस उधेड़बुन में जुटे रहना होता है ताकि वे अपेक्षाएं पूरी की जा सकें जो उससे लोगों ने लगा रखी हैं। लेकिन इस रस्साकशी में सबसे दुखद होता है शिखर पर संवेदना की कमी का एहसास होना। इस बारे में अटल विहारी वाजपेयी ने ठीक ही लिखा है कि ‘ऊँचे पहाड़ पर, पेड़ नहीं लगते, पौधे नहीं उगते, न घास ही जमती है, जमती है सिर्फ बर्फ, जो कफन की तरह सफेद और, मौत की तरह ठंडी होती है, खेलती खिलखिलाती नदी, जिसका रूप धारण कर, अपने भाग्य पर बूंद-बूंद रोती है।’ यानि दूसरे शब्दों में कहें तो सत्ता के शिखर पर सियासत के लिये आवश्यक प्राणवायु कही जानेवाली संवेदना का घोर अभाव होता है। सत्ता की इस संवेदनहीनता का खामियाजा अक्सर सियासत में भुगतना पड़ता है जिसका दूसरा नाम ही ‘एंटी इंकम्बेंसी फैक्टर’ है। इतिहास गवाह है कि सत्ता और सियासत के बीच संवेदना के संतुलन की डोर जितनी कमजोर रही, उसका खामियाजा भी उतना ही बड़ा भुगतना पड़ा है। लेकिन पीढि़यां बदलने में भले ही देर नहीं लगती हो लेकिन परंपराओं को बदलना हमेशा से बेहद मुश्किल रहा है। एक बार कोई परंपरा स्थापित हो जाये तो पीढि़यों तक उसके अनुसरण का सिलसिला चलता रहता है। यही बात सत्ता के शिखर पर संवेदना की शून्यता से भी जुड़ी है। हालांकि सियासत के लिये तो संवेदना के हथियार का इस्तेमाल हमेशा किया जाता है लेकिन सत्ता के शिखर से संवेदना की धारा बड़ी मुश्किल से निकलती है। निकलती भी है तो अक्सर सियासत का संतुलन साधने की आवश्यकता को ही पूरा करने के लिये। अगर सियासी जरूरत ना हो तो संवेदना की बरसाती नदी अक्सर विलुप्त ही रहती है। मिसाल के तौर पर मौजूदा दौर की ही बात करें तो सत्ता की व्यस्तता ने संवेदनहीनता को इस स्तर पर ला दिया है कि जिस बनारस की धरती ने प्रधानमंत्री को संसद में पहुंचाया है वहीं से तीन दफा सांसद चुने जा चुके शंकर प्रसाद जायसवाल का निधन हुए दस दिन का वक्त गुजर चुका है लेकिन अब तक ना तो प्रधानमंत्री ने संवेदना व्यक्त करने की औपचारिकता निभायी है और ना ही भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष से लेकर पार्टी के किसी भी बड़े नेता ने अपने इस साथी के शोक-संतप्त परिवार के लिये दिलासे के दो शब्द कहे हैं। जाहिर है कि जहां अपने पुराने साथियों के लिये ही संवेदना की सरिता सूख चुकी हो वहां इस बात की आस करना तो व्यर्थ ही है कि जम्मू-कश्मीर में जिसे अपने समर्थन से पार्टी ने मुख्यमंत्री बनाया था उसके इलाज के दौरान नहीं तो उसके निधन के बाद ही सही, अपनी संवेदना जताने के लिये पार्टी के अध्यक्ष या सरकार के शीर्ष संचालक जम्मू-कश्मीर जाने की जहमत उठाएंगे। उन्हें न जाना था और ना वे गये। बस भेज दिया नितिन गडकरी के तौर पर अपना एक प्रतिनिधि, सईद परिवार को सांत्वना देने के लिये। अब इन दोनों मामलों को संवेदहीनता की पराकाष्ठा ना कहें तो और क्या कहें। पठानकोट पर हुए आतंकी हमले के प्रति प्रधानमंत्री की चुप्पी को कूटनीतिक मानते हुए कुछ देर के लिये उसकी अनदेखी भी की जा सकती है लेकिन जायसवाल के निधन की अनदेखी को तो अनदेखा नहीं किया जा सकता है। जिस जायसवाल ने काशी की धरती पर तीन बार कमल खिलाया, कभी विवादों में नहीं घिरे, भाजपा को वैश्य वर्ग का मजबूत आधार दिया, और बदले में कभी कुछ नहीं चाहा, कुछ नहीं मांगा। उनके निधन पर भी संगठन व सरकार की संवेदना ना जगे। यहां तक कि बनारस का सांसद होने की हैसियत से भी अपने पूर्ववर्ती अग्रज के प्रति संवेदना का प्रकटीकरण ना हो तो इसे संवदेनहीनता की पराकाष्ठा ही तो कहा जाएगा। इसी प्रकार जिस मुफ्ती मोहम्मद सईद के साथ जुड़कर पहली दफा भाजपा ने कश्मीर में सत्ता का स्वाद चखा, जिन्होंने तमाम विरोधों व मतभेदों को दरकिनार कर, कांग्रेस के बिना शर्त समर्थन को ठुकराकर, अपनी सोच व विचारधारा से समझौता करते हुए भविष्य की चिंता किये बगैर भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनायी, वे दिल्ली के एम्स में मृत्यु शैया पर पड़े हों और भाजपा अध्यक्ष या प्रधानमंत्री के पास उन्हें देखने की भी फुर्सत ना हो और उनकी मौत के बाद उनके शोक संतप्त परिवार को वे ढ़ाढ़स बंधाने भी ना जाये तो इसे संवेदनहीनता की पराकाष्ठा के अलावा और क्या नाम दिया जा सकता है। हालांकि इसे सत्ता की बेपरवाही भी कह सकते हैं और व्यस्तता या लाचारी भी। खैर, ना तो जासयसवाल के गुजरने से बनारस में फिलहाल भाजपा की सेहत पर कोई फर्क पड़नेवाला है और ना मुफ्ती के निधन से जम्मू-कश्मीर के सियासी समीकरण में कोई बदलाव आता दिख रहा है। लिहाजा क्या फर्क पड़ता है संवेदना जतायें या ना जतायें। लेकिन, फर्क तो पड़ता है। तत्काल ही सत्ता पर भले ही फर्क ना पड़े लेकिन सियासत पर संवेदनहीनता के मुजाहिरे का दूरगामी नकारात्मक असर पड़ता ही है। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’  ( @ नवकांत ठाकुर )

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