सोमवार, 4 जनवरी 2016

‘कछुए की मानिंद सिमट ना जाये फिर ये सिलसिला’

‘कछुए की मानिंद सिमट ना जाये फिर ये सिलसिला’

नवकांत ठाकुर
पठानकोट के एयर बेस पर हुए आतंकी हमले के बाद चारों तरफ आक्रोश है, उबाल है। हर किसी की जुबान पर बस यही सवाल है। अब क्या होगा इसके बाद? क्या दशकों से कछुआ चाल से चल रही दोस्ती व विश्वासबहाली की कोशिशों पर फिर विराम लग जाएगा। वार्ता का कछुआ फिर बंदूक की गर्जना से घबराकर खुद को अपने खोल में सिकोड़ लेगा, समेट लेगा। फिर इधर से यही सुर सुनाई देगा कि बोली और गोली को एक साथ स्वीकार नहीं किया जा सकता और जवाब में उधर से वही घिसी-पिटी आवाज आएगी कि सबकुछ इधर का ही किया-धरा है, उसे नाहक बदनाम करने के लिये। अब तक की परंपरा तो ऐसी ही रही है। बातचीत के माध्यम से सुलह-सफाई की गंभीर कोशिशें शुरू होते ही हर बार सीमापार से ऐसी वारदातों को अंजाम दे दिया जाता है जिससे पूरी प्रक्रिया खटाई में पड़ जाती है। मसलन वाजपेयी की लाहौर यात्रा के बाद हई कारगिल की लड़ाई ने वार्ता प्रक्रिया को सिरे से ध्वस्त कर दिया। उसके बाद कश्मीर मसले को निर्णायक मुकाम तक पहुंचाने की मनमोहन की कोशिशों पर मुंबई के हमले ने बट्टा लगा दिया। यहां तक कि मौजूदा मोदी सरकार द्वारा ऊफा में की गयी वार्ता प्रक्रिया बहाल करने की पहली कोशिश को कश्मीरी अलगाववादियों के प्रेम में पड़कर पड़ोसी मुल्क के सियासी हुक्मरानों ने ही पलीता लगा दिया। और हद तो यह है कि अब नवाज को जन्मदिन के तोहफे के तौर पर अपनी दोस्ती से नवाजने लाहौर जा पहुंचे मोदी को बदले में पठानकोट की घटना से पीठ पर वार सहने के लिये मजबूर होना पड़ा है। लिहाजा परंपरा व दस्तूर के मुताबिक एक बार फिर वार्ता की प्रक्रिया पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की संभावना पैदा होना लाजिमी ही है। वह भी तब जबकि फिदायीन हमलावरों की टोली द्वारा हमले से ऐन पहले पाकिस्तानी आकाओं व रिश्तेदारों से की गयी बातचीत रिकार्ड की जा चुकी है और यह जानकारी भी सार्वजनिक हो गयी है कि पिछले महीने आईएसआई ने लश्करे तैयबा, जैशे मोहम्मद, हिजबुल मुजाहिदीन और बब्बर खालसा सरीखे आतंकी संगठनों के साथ मिल-बैठकर भारत में बड़े हमले को अंजाम देने की साजिश रची थी। यानि इस बात में तो शक की गुंजाइश भी नहीं है कि इस पूरी वारदात की पटकथा सरहद के उस पार से लिखी गयी और आत्मघाती हमलावरों का जत्था भी उधर से ही आया था। लिहाजा यह भी तय है कि पाकिस्तानी सेना, वहां के प्रशासन और आईएसआई ने भी इस वारदात को अंजाम देनेवालों की मदद अवश्य की होगी। लेकिन सवाल है कि जब यह पहले से पता था कि आतंकी संगठनों के साथ मिल-बैठकर आईएसआई किसी बड़ी वारदात को अंजाम देने की फिराक में है तो फिर बड़ा दिन के मौके पर नवाज से मिलने व उनके साथ निजी रिश्तों की शुरूआत के बहाने दोनों मुल्कों के बीच विश्वास बहाली की मजबूत पहलकदमी क्यों की गयी? क्या सोच कर की गयी? खैर, इसका जवाब ना तो मिला है और ना मिलने की उम्मीद है। लिहाजा जब जुबानी जवाब ना मिल रहा हो तो क्रिया की प्रतिक्रिया से कुछ जानने-समझने की कोशिश करना ही बेहतर होगा। और प्रतिक्रिया यह है कि जिस वक्त पठानकोट में आतंकी हमला होने की पुख्ता जानकारी मिलने के बाद एनएसजी को वहां भेजने की तैयारी चल रही थी, ऐन उसी वक्त दोनों मुल्कों के बीच परमाणु प्रतिष्ठानों की सूची भी साझा हो रही थी और एक-दूसरे के मुल्कों में कैद मछुआरों व आम नागरिकों की लिस्ट का भी आदान-प्रदान हो रहा था। इसी प्रकार हमले की सूचना सार्वजनिक होने के बाद गृहमंत्री व प्रधानमंत्री कार्यालय के राज्यमंत्री सहित विभिन्न केन्द्रीय मंत्री भी यही बता रहे थे कि जो ताकतें यह नहीं चाहती हैं कि दोनों मुल्कों के बीच अमन व दोस्ती कायम हो वे ही इस तरह की शरारतों के द्वारा वार्ता की गाड़ी को पटरी से उतारने का प्रयास कर रही हैं जिसका मुंहतोड़ जवाब दिया जाएगा। यानि इन प्रतिक्रियाओं से इतना तो साफ है कि अब भारत की सरकार ने पाकिस्तान की सेना, उसकी आईएसआई और उसके आतंकी शुभचिंतकों की खुदमुख्तारी को भी समझ लिया है और वहां के सियासी हुक्मरानों की बेचारगी व लाचारगी को भी महसूस कर लिया है। लिहाजा सियासी हुक्मरानों के साथ बातचीत, दोस्ती व विश्वास बहाली की कोशिशों पर वहां की बाकी खुदमुख्तार ताकतों की साजिशों का साया पड़ने देना अब शायद ही गवारा किया जाए। यानि, उम्मीद तो यही है कि बातचीत अपनी जगह जारी रहेगी जबकि सेना को सेना से जवाब मिलेगा और आईएसआई की खुराफातों को हमारी खुफिया संस्थाएं व पुलिस प्रशासन के द्वारा नाकाम किया जाएगा। लेकिन पाकिस्तान के शुभचिंतक आतंकी संगठनों को कैसे मुंहतोड़ जवाब दिया जाए इसका खाका तैयार करना शायद अभी बाकी ही है। खैर, पाकिस्तानी सेना, आईएसआई और हमारी ओर के भी कुछ गद्दारों की पुश्तपनाही का लाभ उठाते हुए सरहद के उस पार से अपने नापाक मंसूबों को अंजाम देनेवाले इन तत्वों को इनके अंजाम तक पहुंचाने का मार्ग तो तलाशना ही होगा लेकिन इस बहुआयामी कूटनीति के बीच अब असली परख होनी है दोनों मुल्कों के सियासी हुक्मरानों के बीच बने उस कथित निजी व मजबूत तालमेल की जिसके नतीजे में ही पहली बार पाकिस्तानी विदेश विभाग ने ना सिर्फ पठानकोट के वारदात की कड़े शब्दों में निंदा की है बल्कि आतंक के खिलाफ जारी लड़ाई में भरपूर मदद का भरोसा भी दिलाया है। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’   

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