सोमवार, 11 जनवरी 2016

"वापसी की दिशा में पहलकदमी, यानि लौट के बुद्धू घर को आये"

‘पुरानी डगर पर आ रहा है लौट कर वापस मुसाफिर’

मशहूर शायर जांनिसार अख्तर साहब अपनी एक रूबाई में बताते हैं कि ‘वो शाम को घर लौट कर आएंगे तो फिर, चाहेंगे कि सब भूलकर उनमें खो जाऊं, जब उन्हें जागना है मैं भी जागूं, जब नींद उन्हें आए तो मैं भी सो जाऊं।’ कायदे से तो यह रूबाई किसी भी सामान्य गृहणी के मनोभाव को अभिव्यक्त करती हुई दिखाई पड़ती है लेकिन मौजूदा सियासी माहौल के मद्देनजर ये पंक्तियां उन मतदाताओं की मनोदशा को भी परिलक्षित करती हुई नजर आती हैं जिनका सहयोग व समर्थन हासिल करना भाजपा का लक्ष्य रहा है। हालांकि हर राजनीतिक पार्टी का लक्ष्य रहता है समाज के सभी तबके-फिरके का अधिकतम समर्थन हासिल करना। जिसके लिये कभी विचारधारा का आधार लिया जाता है तो कभी परंपरा का। लेकिन इस मामले में भाजपा शायद इकलौती ऐसी पार्टी है जो शुरूआत से ही यह तय नहीं कर पायी है कि आखिर उसे किस राह पर निर्णायक रूप से आगे बढ़ना है। कभी तो वह कट्टर हिन्दू राष्ट्रवादिता का लबादा ओढ़े हुए दिखती है और कभी सामाजिक समरसता की बातें करके उन लोगों को रिझाने में मशगूल हो जाती है जो संघ परिवार की इस राजनीतिक शाखा पर कतई भरोसा नहीं कर सकते। जनसंघ से टूटकर अलग होने के बाद लंबे समय तक तो गैरकांग्रेसवाद की पतवार थामकर ही इसने अपनी सियासी नैया को दिशा दी और बाद में मंडल को थाम लिया। लेकिन कमंडल की कूटनीति के तहत जब संघियों की कोशिशों से मंदिर मसले का दावानल भड़का तब जाकर पार्टी को अपना अलग ईंधन नसीब हुआ और मंडल को कमंडल के नीचे दबाया जा सका। लेकिन राम के नाम पर अपना वजूद बड़ा करने और चैबीस दलों का ईंट-रोड़ा जोड़कर राजग के नाम से सत्ता का कुनबा खड़ा करने के बाद उसे एहसास हुआ कि केवल राम का नाम ही सत्ता पर एकाधिकार हासिल करने के लिये काफी नहीं है और अगर अपने दम पर बहुमत चाहिये तो समाज के उस तबके को भी अपने साथ जोड़ना होगा जिसे किसी भी कीमत पर भगवा रंग में रंगना गवारा नहीं है। तभी संघ के शीर्ष सैद्धांतिक मसलों को हाशिये पर डालने के साथ ही अटल हिमायत यात्रा भी निकाली गयी और बड़े पैमाने पर दाढ़ी-टोपीधारकों का सम्मेलन भी कराया गया। लेकिन ना खुदा ही मिला ना विसाले सनम। 2004 में चैबे से छब्बे बनने के चक्कर में दुबे बनकर दुबकने के मजबूर होना पड़ा। हालांकि पार्टी के शीर्ष रणबांकुरों ने हार नहीं मानी और संघ की सलाहियतों को दरकिनार करते हुए धर्मनिरपेक्षता का प्रमाणपत्र हासिल करने के लिये जिन्ना की मजार तक दौड़ लगायी गयी। पर नतीजा वही ढ़ाक के तीन पात निकला। यानि 2009 का मौका भी हाथ से फिसल गया। अब बारी थी 2014 की। पुराने अनुभवों से इतना तो पता ही था कि ना तो अकेले कमंडल में सत्ता समा सकती है और ना ही मंडल में। साथ ही कट्टर धर्मनिरपेक्षतावादी मतदाताओं से समर्थन की आस लगाना भी बेकार ही था। लिहाजा निकाला गया ऐसा फार्मूला जिसके तहत मतदाताओं के सामने मोदी सरीखे कट्टर हिन्दूराष्ट्रवादी का चेहरा और उनकी जात-बिरादरी का घालमेल करके मंडल-कमंडल का मिश्रण पेश कर दिया गया। मोदी का चेहरा आगे था लिहाजा ना जय श्रीराम के नारे की अलग से जरूरत थी और ना ही किसी अन्य वैचारिक-सैद्धांतिक प्रतिबद्धता को दर्शाने की। रही-सही कसर विरोधियों के बिखराव और कांग्रेस के प्रति जारी जनाक्रोश ने पूरी कर दी। नतीजन समग्रता में महज 32 फीसदी वोट पाकर पार्टी ने अपने दम पर लोकसभा में बहुमत हासिल कर लिया जबकि 68 फसदी वोट पाकर भी बाकियों को बाबाजी का ठुल्लू ही मिला। लेकिन इस गड़बड़झाले के बाद की तस्वीर में जिन्होंने मोदी को हिन्दू राष्ट्रवाद का पर्याय मानकर मतदान किया था वे ‘सबका साथ सबका विकास’ के नारे से बिदक गये और जिन बिरादरीवालों ने मोदी में अपना मसीहा देखा उनकी आस रेल-तेल से लेकर दाल के सवाल में उलझकर दम तोड़ गयी। दलितों-पिछड़ों की तुलना कुत्ते से किये जाने और आरक्षण व्यवस्था में बदलाव का संकेत मिलने के बाद तो बिरादरीवालों की रही-सही आस भी समाप्त हो गयी। नतीजन दिल्ली में दर्द मिला और बिहार में तो बंटाधार ही हो गया। बहुसंख्यकवाद की सियासत का फार्मूला इस कदर फेल हुआ कि अगड़े-पिछड़ों ने एक साथ नकार दिया। ऐसे में अब नये सिरे से स्थापित फार्मूले को अमल में लाने के अलावा दूसरा कोई विकल्प भी नहीं है वर्ना परंपरागत मतदाताओं का भी मोहभंग होने की नौबत आयी तो अर्श से गिरने के बाद फर्श भी शायद ही नसीब हो। तभी तो जांची-परखी कमंडल की चिमनी को बयानों की फुंकनी से सुलगाने की कोशिशें लगातार जारी हैं। साथ ही गंगा को भी सूबों के सहयोग से नहीं बल्कि अपने दम पर अविरल-निर्मल करने के अलावा गैया को कसाई से बचाने की जुगत भी भिड़ाई जा रही है। वैसे भी विकास और सुशासन के बंबू पर सत्ता का तंबू ताने रखने के प्रयोग की हवा तो मोदी द्वारा गोद लिये गये आदर्श गांव जयापुर में ही निकल गयी जहां अकल्पनीय विकास की धारा बहाने के बावजूद भाजपा को मतदाताओं ने ठेंगा दिखा दिया। यानि अब मजबूरी तो है पुरानी विचारधारा पर लौटने की, लेकिन अपेक्षा है कि कोई इसके लिये ताना भी ना मारे। कोई ये ना कहे कि लौट के बुद्धू घर को आये। तभी तो वापसी की दिशा में पहलकदमी तो हो रही है मगर बेहद फूंक-फूंककर, संभल-संभलकर। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’  

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