‘दिल को देखो, चेहरा ना देखो’
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मन की बात तो यही है कि ‘चेहरा क्या देखते हो, दिल में उतर कर देखो ना, मौसम पल में बदल जाएगा, पत्थर दिल भी पिघल जाएगा, मेरी मोहब्बत में है ऐसा असर, देखो ना...।’ उनकी पार्टी भाजपा भी लोगों को यही आगाह कर रही है कि ‘दिल को देखो चेहरा ना देखो, चेहरे ने लाखों को लूटा, दिल सच्चा और चेहरा झूठा।’ लेकिन मसला है कि अव्वल तो दिल चीरकर दिखाना मुमकिन नहीं है और दूसरे दिल में उतरकर किसी की अंदरूनी मंशा का मुआयना करने की फुर्सत भी किसी के पास नहीं है। सबकी अपनी जिन्दगी है, परेशानियां हैं, दुश्वारियां हैं, सपने हैं, उलझने हैं। कौन जहमत उठाए चेहरे के रंग का दिल की तस्वीर से मिलान करने की। यहां तो जो दिखता है वही बिकता है। दिखने और बिकने का वह गणित ही तो है जिससे चवन्नी के चिप्स और अठन्नी के काले-पीले शीतलपेय को दस-बीस रूपये का बाजार भाव मिल जाता है। अब कोई लाख समझाये कि ‘ठंडा मतलब टाॅयलेट क्लीनर’ लेकिन किसे फुर्सत है समझने की। यहां तो चट पैसा और झट तरावट का फार्मूला ही चाहिये सबको। भले ही उसकी अंदरूनी असलियत कितनी भी नुकसानदेह क्यों ना हो। ऐसी ही तस्वीर सियासत में भी दिखती है। यहां भी सबको तुरंत के मामले का फौरन से पेश्तर ही नतीजा चाहिये। भले ही बाद में जो भी सच सामने आए। सच सामने आने तक तो शुरूआती तस्वीर के तहत ही पूरा तिया-पांचा हो चुका होता है। मसलन दिल्ली का चुनाव हुआ तो यहां के दो-चार गिरजाघरों में असामाजिक तत्वों द्वारा की गयी चोरी-चकारी व तोड़फोड़ की वारदातों को ऐसा रंग दिया गया मानो इसाई समुदाय की स्थिति इराक व सीरिया के यजीदियों सरीखी हो गयी हो। मामले की गूंज विदेशों तक सुनाई पड़ी। केन्द्र की सरकार गुहार ही लगाती रह गयी कि मामले की तहकीकात हो जाने के बाद ही कोई राय कायम की जाये। मगर सच सामने आने तक सब्र रखने की समझाइश बेअसर रही और तुरत-फुरत में सामने दिख रही तस्वीर के नतीजे में केन्द्र में स्थापित सत्ताधारियों के अरमानों पर एक नवजात सियासी दल का झाड़ू फिर गया। सूबे के सत्तर की सत्ता में महज तीन तिनके ही बचे, बाकी सबका सफाया हो गया। ऐसा ही मामला बिहार चुनाव के दौरान भी दिखा जब बीफ के विवाद में असहिष्णुता का तड़का लगाकर सम्मानवापसी का जोरदार अभियान चलाया गया जिसका नतीजा वही हुआ जो दिल्ली में पहले ही दिख चुका था। भले ही बाद में पता चला हो कि ना बीफ के विवाद में कोई दम था और ना ही इसाईयों पर कोई संकट है। लेकिन यह सच सामने आने तक तो पूरा सियासी खेल समाप्त हो चुका था। अब फिर से ऐसी ही तस्वीर बन रही है दलितों के उत्पीड़न और अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर अतिक्रमण को लेकर। भले ही इसके पीछे का सच कुछ भी हो लेकिन मौजूदा तस्वीर के तहत उठ रहे सवालों ने सियासत में चटख रंग तो भर ही दिया है। शायद ही कोई इस हकीकत की तह में जाना चाहता हो कि आखिर रोहित वेमुला ने क्यों व किन हालातों में आत्महत्या की। सबकी ख्वाहिश है कि इस मामले को दलितों व गैरदलित बहुसंख्यकों के टकराव का रंग देकर आगामी दिनों में होने जा रहे पांच राज्यों के चुनावों में इसकी छटा बिखेरी जाये। वैसे भी मामले की जांच के लिये बने न्यायिक आयोग को अपनी रिपोर्ट देने के लिये तीन माह का वक्त दिया गया है। यानि जब तक अंदरूनी सच सामने आएगा तब तक सतही तस्वीर के तहत इसका सियासी दोहन हो चुका होगा। इसी प्रकार अलीगढ़ मुस्लिम विश्विविद्यालय को दारूल उलूम देवबंद सरीखी स्वायत्तता व स्वरूप दिलाने की लड़ाई के बीच भी यह सवाल सतह के नीचे दफन दिख रहा है कि आखिर देवबंद से एएमयू की तुलना कैसे की जा सकती है। बकौल एमजे अकबर, देवबंद ने आज तक सरकार से एक पैसा अनुदान नहीं लिया, वह समुदाय के सहयोग से शिक्षा का प्रसार व अपना विस्तार करता है। जबकि एएमयू अंग्रेजों के जमाने से ही सरकारी अनुदान पर आश्रित है। जाहिर है कि जनता की गाढ़ी कमाई से संचालित संस्थान को जब तमाम दबावों के बावजूद पंडित जवाहर लाल नेहरू की सरकार से लेकर लालबहादुर शाष्त्री व इंदिरा गांधी तक की सरकार ने संसद में अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा देने से साफ इनकार कर दिया था तब मौजूदा सरकार किस आधार पर इसकी स्थिति में बदलाव की मांग स्वीकार कर सकती है। लेकिन पहले जो हुआ वह कहां तक जायज था अथवा संवैधानिक नजरिये से क्या होना उचित है, इस पर अदालत द्वारा सामने लाये जानेवाले सच का सब्र से इंतजार करना शायद ही किसी को गवारा हो। अलबत्ता तस्वीर तो यही दिखायी जाएगी कि मौजूदा सरकार द्वारा अल्पसंख्यकों का हक मारा जा रहा है। यानि तह में उतरकर अंदरूनी हकीकत को परखने की फुर्सत मतदाताओं को शायद ही मिल सके। लेकिन मसला यह है कि सियासी तुफान में आरोप-प्रत्यारोप की बौछार से अटे-पटे चेहरे को देखकर ही स्वस्ति देने व खारिज करने की जो परंपरा चल निकली है उससे सियासी दलों को तो जो फायदा-नुकसान होना है वह होता रहेगा, लेकिन सब्र के साथ सच को जानने-समझने की समझदारी दिखाने के बजाय आनन-फानन में जारी तमाशे के तहत संवेदना, भावुकता व पूर्वाग्रह के आधार पर मतदान करने का निर्णायक नुकसान तो देश व समाज को ही झेलना पड़ेगा। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर
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