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गुरुवार, 15 नवंबर 2018

‘जहां से हैं उम्मीदें, वहीं हो रही भाजपा की फजीहत’

जहां से उम्मीदें पाल रखी हों वहीं अगर फजीहत झेलनी पड़ जाए तो किस कदर निराशा का वातावरण बनने लगता है इसका बखूबी अंदाजा इन दिनों भाजपा को हो रहा है। दरअसल आगामी लोकसभा चुनाव में जीत दर्ज करा कर सत्ता पर अपनी पकड़ बरकरार रखने की भाजपा की उम्मीदें इस बार पश्चिम बंगाल और ओडिशा के अलावा उन दक्षिणी सूबों पर टिकी हुई हैं जहां पिछले चुनाव में कथित मोदी लहर का कोई असर नहीं पड़ा था। हालांकि पूर्वोत्तर के विधानसभा चुनावों से लेकर ओडिशा व पश्चिम बंगाल तक में हुए स्थानीय निकायों के चुनावों में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराके भाजपा ने लोकसभा चुनाव में इन क्षेत्रों में बेहत प्रदर्शन की उम्मीदें कायम रखी हुई हैं लेकिन दक्षिणी राज्यों से भाजपा ने जितनी उम्मीदें पाली हुई हैं उसके पूरा हो पाने की संभावना लगातार कमजोर होती दिख रही है। दक्षिण भारत में भाजपा के लिये लिटमस टेस्ट कहे जाने वाले कर्नाटक में हुए लोकसभा के तीन और विधानसभा के दो सीटों के उपचुनाव का जो नतीजा सामने आया है उसने यह साफ कर दिया है तमाम कोशिशों के बावजूद दक्षिणी राज्यों के मतदाताओं का विश्वास जीतने में भाजपा कतई कामयाब नहीं हो पायी है। यह चुनाव ऐसे समय में हुआ है जब अगले साल के लोकसभा चुनाव का वक्त बेहद करीब है और तमाम पार्टियां केन्द्र की सत्ता पर कब्जा जमाने के लिये उतावलापन दिखा रही हैं। ऐसे समय में अगर लोकसभा की तीन में से अपनी जीती हुई केवल एक सीट पर ही बढ़त कायम रहे जबकि दो सीटों पर शिकस्त का सामना करना पड़े और विधानसभा की दोनों सीटें गंवानी पड़े तो समझा जा सकता है कि सूबे का माहौल किस कदर भाजपा के लिये बदस्तूर चुनौती बना हुआ है। हालांकि यह पहला उपचुनाव नहीं है जिसमें भाजपा को शिकस्त का सामना करना पड़ा हो बल्कि वर्ष 2014 में हुए लोकसभा चुनाव के  बाद से अब तक देश भर में 30 लोकसभा सीटों पर उपचुनाव हुए हैं जिनमें से भाजपा को केवल छह सीटें दोबारा जीतने में ही कामयाबी मिल पाई है। जबकि जिन 30 सीटों पर उपचुनाव हुए उनमें से कुल 16 भाजपा के कब्जेवाली थी और विपक्ष की जीती हुई केवल 14 सीटें ही थीं। लेकिन भाजपा को किसी भी उपचुनाव में विपक्ष के कब्जे वाली एक भी सीट जीतने में कामयाबी नहीं मिल सकी और उसने अपने कब्जे वाली दस सीटें भी गंवा दीं जिसके नतीजे में अब लोकसभा में उसकी सीटों का आंकड़ा 282 से घटकर 272 रह गया है। लेकिन अब तक हुए उपचुनावों का नतीजा सामने आने के बाद भाजपा को उम्मीद रहती थी कि स्थिति को सुधार लिया जाएगा जबकि अब स्थिति को सुधारने का वक्त बचा ही नहीं है। अब तो समय है जमीनी हकीकत को स्वीकार करते हुए स्थिति के मुताबिक ढ़लने और खुद को बदलने का ताकि संभावित नुकसान कम से कम किया जा सके। सच तो यह है कि वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने हिन्दी पट्टी के प्रदेशों में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन का रिकार्ड बना लिया था जिसके बाद अब आगामी चुनाव में इससे आगे बढ़ पाने की कोई राह ही नहीं बची है। बल्कि भाजपा को भी पता है कि राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात सरीखे जिन पांच सूबों की सभी लोकसभा सीटों पर उसे पिछली बार सौ फीसदी सीटों पर जीत हासिल हुई थी और यूपी की अस्सी में से 73 सीटों पर उसने कामयाबी का झंडा गाड़ा था उस प्रदर्शन को दोहरा पाना नामुमकिन की हद तक मुश्किल है। ऐसे में उसकी निगाहें पूर्वोत्तर के अलावा दक्षिणी राज्यों पर ही टिकी हुई थीं और उत्तर व पश्चिमी राज्यों में संभावित नुकसान की भरपाई के लिये वह पूरब, पूर्वोत्तर और दक्षिण में ही अपने प्रदर्शन को सुधारने के अभियान में जुटी हुई थी। इसमें कर्नाटक का महत्व इसलिये भी बढ़ जाता है क्योंकि इसे दक्षिण भारत का प्रवेश द्वार कहा जाता है और दक्षिण में भाजपा की जीत का दरवाजा तभी खुल सकता है जब कर्नाटक में बेहतर प्रदर्शन की पक्की गारंटी हो जाए। लेकिन स्थिति यह है कि कर्नाटक, केरल, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और तमिलनाडु की कुल 139 लोकसभा सीटों में से भाजपा को केवल कर्नाटक की 28 और आंध्र प्रदेश की 25 सीटों से ही कुछ आस है जबकि बाकी सूबों में उसका खाता ही खुल जाए तो बहुत बड़ी बात होगी। हालांकि आंध्र और कर्नाटक में भी भाजपा विरोधी वोटों का बिखराव रोकने के लिये कांग्रेस ने मजबूत घेराबंदी कर दी है जिससे बच बेहद मुश्किल होने वाला है। दूसरी ओर बिहार और यूपी की कुल 120 सीटों में से बिहार की 40 सीटों पर उसके लिये मुकाबला बेहद कड़ा रहना स्वाभाविक ही है जबकि यूपी में अगर विपक्षी दलों का महागठजोड़ कायम हो गया तो भाजपा को लेने के देने पड़ सकते हैं। यानि समग्रता में देखा जाये तो लोकसभा की 543 में से दक्षिण और यूपी-बिहार की कुल 259 सीटें अलग कर दें तो बाकी बची 284 सीटों पर ही भाजपा इस समय विपक्ष को टक्कर देने की स्थिति में है और उसमें भी अगर भाजपा की कमजोर स्थिति वाली ओडिशा, पश्चिम बंगाल, जम्मू कश्मीर और पंजाब सरीखे सूबों की सीटों को अलग कर दें तो ऐसी सीटें ही दो सौ से कम बचती हैं जहां से वाकई भाजपा अपनी जीत की बुनियाद रखने में सक्षम हो सकती है। लिहाजा अब केन्द्र में भाजपा की वापसी की संभावनाएं तभी बन सकती हैं जब अव्वल तो विपक्ष का गठजोड़ ना बने और दूसरे अपनी मजबूत उपस्थिति वाली सीटों पर वह जीत दर्ज कराने में कामयाब हो सके। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर  #Navkant_thakur

बुधवार, 31 अक्टूबर 2018

‘साथियों को संतुष्ट करने की चुनौती इधर भी है, उधर भी’

क्षेत्रीय दलों की महत्वाकांक्षाएं राष्ट्रीय दलों को किस कदर हैरान व परेशान करती रही हैं यह सर्व-विदित ही है। तभी तो मोदी-शाह की जुगल जोड़ी के राष्ट्रीय राजनीति में प्रादुर्भाव से पूर्व गठबंधन सरकारों के दौर में लालकृष्ण आडवाणी को एक जनसभा में औपचारिक तौर पर मतदाताओं से अपील करनी पड़ी थी कि वे भाजपा को वोट नहीं देना चाहें तो बेशक ना दें लेकिन किसी क्षेत्रीय पार्टी को वोट देने से बेहतर होगा कि वे कांग्रेस को अपना वोट दे दें। जाहिर तौर पर इस आह्वान के पीछे आडवाणी का वह दर्द ही छिपा हुआ था जो अटल युग में गठबंधन की सरकार चलाने के दौरान भाजपा को क्षेत्रीय दलों से मिला था। हालांकि अपने दम पर बहुमत हासिल नहीं कर पाने वालों क्षेत्रीय दलों के समर्थन से ही मजबूती मिलती है लेकिन इसके एवज में जो कीमत चुकानी पड़ती है उसका दर्द ऐसा होता है कि सहा भी ना जाए और किसी से कहा भी ना जाए। इन दिनों ऐसा ही दर्द भाजपा को भी झेलना पड़ रहा है जिसने लोकसभा में हासिल पूर्ण बहुमत के ताव में बीते साढ़े चार सालों तक अपने समर्थक दलों को मनमर्जी से हाथ उठाकर जो भी दे दिया वे उससे ही संतुष्टि जताते रहे और सही मौके का इंतजार करते रहे। किसी ने उफ तक नहीं की और कोई ऐसी मांग भी सामने नहीं रखी जिससे वह भाजपा की नजरों में खटक जाए। लेकिन अब आगामी आम चुनावों की नजदीकियों को देखते हुए राजग के घटक दलों में असंतोष भी उभरने लगा है और उनकी महत्वाकांक्षाएं भी कुलाचें मारने लगी हैं। ऐसा होना स्वाभाविक भी है क्योंकि भाजपा को अगर दोबारा सत्ता में आना है तो उसे इनको अपने साथ लेकर चलना ही होगा। लेकिन इन दलों के सामने ऐसी कोई विवशता नहीं है। सरकार भाजपा बनाये या कांग्रेस अथवा कोई अन्य मोर्चा। इनकी ख्वाहिश तो बस इतनी ही है कि जो भी सरकार बने वह मजबूर बने। तभी उसे मजबूती देने के एवज में इनकी दसों उंगलियां घी में होंगी और सिर कढ़ाही में। वर्ना अभी की तरह दया से हासिल खैरात पर ही निर्भर रहकर उन्हें पिछलग्गू बनकर चलना होगा और सरकार का जयकार करना होगा। खैर, अभी यह कहना तो जल्दबाजी होगी कि आगामी सरकार मजबूत बनेगी या मजबूर। लेकिन दोनों ही सूरतों के लिये अपनी मजबूती सुनिश्चित करने के मकसद से तमाम क्षेत्रीय दलों ने अभी से अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं। इसी सिलसिले में जिस तरह से बसपा ने कांग्रेस की बांह मरोड़ी हुई है उसी प्रकार राजग के घटक दलों ने भी भाजपा की सींग पकड़ कर उसे नाच नचाना शुरू कर दिया है। इन दलों का साफ तौर पर कहना है कि वे गठबंधन में तभी शामिल होंगे जब उनकी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति की जाएगी और सम्मानजनक संख्या में सीटें आवंटित की जाएंगी। यानि इन दलों का विकल्प खुला हुआ है कि जिधर अधिक मान-सम्मान मिलेगा और भविष्य सुनिश्चित दिखाई देगा उधर कूच करने में ये कतई देर नहीं लगाएंगे। इसके लिये दबाव बढ़ाने की शुरूआत जदयू ने की तो भाजपा ने उसे बिहार में अपने बराबर सीटें देने का वायदा करके उसे मना लिया। लेकिन जदयू से समझौता होने के बाद से रालोसपा और लोजपा फैल गए हैं। लोजपा ने ना सिर्फ अपनी जीती हुई तमाम सीटों पर दावा ठोंक दिया है बल्कि उसने अपने शीर्षतम नेता रामविलास पासवान के लिये भाजपा से राज्यसभा की सीट भी मांगी है। इसके अलावा कांग्रेस छोड़कर लोजपा में शामिल हुए मणिशंकर पांडेय के लिये पार्टी ने यूपी में भी हिस्सेदारी मांगी है। उधर रालोसपा ने भी साफ कर दिया है कि पिछली बार की तरह उसे बिहार की तीन लोकसभा सीटें नहीं दी गई तो वह गठबंधन से बाहर निकलने के विकल्पों पर भी विचार कर सकती है। भाजपा पर दबाव बढ़ाने के लिये रालोसपा ने मध्य प्रदेश की 66 विधानसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार भी उतार दिये हैं। बताया जाता है कि लोजपा और रालोसपा को लपकने के लिये राजद की अगुवाई वाला महागठबंधन भी जुगत बिठा रहा है और इन दोनों दलों को भाजपा द्वारा आवंटित की गई सीटों से अधिक सीटें देने का प्रलोभन भी दिया जा रहा है। दूसरी ओर यूपी में अपना दल हो या सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी। दोनों की ओर से भाजपा पर अधिकतम सीटों का पुरजोर दबाव है। इसी प्रकार शिवसेना भी भाजपा पर इस बात के लिये दबाव बनाए हुए है कि महाराष्ट्र में उसे अधिकतम सीटें आवंटित की जाएं और गुजरात, गोवा व मध्य प्रदेश में भी उसे हिस्सेदारी दी जाए। वर्ना आगामी चुनाव में अपनी खिचड़ी अलग पकाने का ऐलान तो पहले ही किया जा चुका है। ऐसी ही मांगें बाकी दलों की ओर से भी आगे की जा रही हैं और स्थिति यह है कि भाजपा के लिये राजग को पिछले चुनाव की शक्ल में बरकरार रख पाना भारी सिरदर्दी का सबब बनता जा रहा है। वैसे भी बिहार, पंजाब, दिल्ली और कर्नाटक के विधानसभा चुनावों और यूपी के गोरखपुर व फूलपुर सरीखे गढ़ों के उपचुनावों ने यह तो बता ही दिया है कि ना तो मोदी की कोई राष्ट्रव्यापी लहर चलनेवाली है और ना ही भाजपा अपने दम पर अजेय हो सकती है। ऐसे में भाजपा की विवशता है सबको साथ लेकर चलने की और उसकी इस विवशता का अधिकतम दोहन करने से भला कोई क्यों पीछे रहे? ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’   @नवकांत ठाकुर #Navkant_Thakur

गुरुवार, 18 अक्टूबर 2018

‘नहीं होने का सवाल ही नहीं था अकबर का इस्तीफा’

इतिहास गवाह है कि किसी भी बड़े आंदोलन की शुरूआत के वक्त उसका उपहास ही होता है। लोग मजाक उड़ाते हैं, फब्तियां कसते हैं और कटाक्ष करते हैं। लेकिन इस शुरूआती प्रतिरोध को झेल कर आंदोलन आगे बढ़ जाए तो फिर उसकी अनदेखी की जाने लगती है। जब अनदेखी से भी आंदोलन की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ता तो अनर्गल प्रलाप करके उसके नकारात्मक पहलुओं को जोर-शोर से उजागर करने का प्रयास किया जाता है। लेकिन इस आखिरी चुनौती से भी आंदोलन टूटता या डिगता नहीं है तो फिर धीरे-धीरे उसके पक्ष में जन-स्वीकार्यता का माहौल बनने लगता है। वही इतिहास महिलाओं के आंदोलन ‘मी-टू’ के साथ भी दोहराया गया है। पहले तो आंदोलन का भरपूर मजाक बनाया गया और पीड़िताओं के प्रति अशोभनीय टिप्पणियां की गईं। बाद में मी-टू के मामलों की अनदेखी भी की गई ताकि ये कहानियां आई-गई होकर समाप्त हो जाएं। यहां तक मामलों को सांप्रदायिक रंग देने और राजनीतिक तौर पर विभाजित करने की भी कोशिश हुई। लेकिन जब तमाम प्रतिरोधों को झेल कर भी पीड़िताएं अड़ी रहीं, डटी रहीं और पीछे नहीं हटीं तो अब उन्हें समाज से स्वीकृति, सहानुभूति और सहयोग भी मिलने लगा है। मी-टू को पहला समर्थन फिल्म इंडस्ट्री से मिला जहां उन लोगों को हाशिये पर धकेला जाने लगा है जिन पर महिलाओं का शोषण करने के आरोप लगे हैं। उसके बाद न्यूज इंडस्ट्री ने मी-टू पीड़िताओं के पक्ष में खड़े होने की पहल की। तमाम खबरिया संस्थानों में उन लोगों को लंबी छुट्टियों पर भेजा जा रहा है और नौकरी से बर्खास्त किया जा रहा है जिन पर महिलाओं ने छेड़छाड़, उत्पीड़न या यौन शोषण के आरोप लगाए हैं। सामाजिक मूल्यों के प्रति अपनी नैतिक प्रतिबद्धता का प्रदर्शन करने के क्रम में स्वतः स्फूर्त तरीके से पीड़ित महिलाओं के साथ हमदर्दी और सहबद्धता दिखाते हुए अब राजनीतिक दल भी मी-टू के मामलों को लेकर सजग हुए हैं और विपक्ष से लेकर सत्तापक्ष तक ने मामलों का संज्ञान लेते हुए ठोस कार्रवाई आरंभ कर दी है। इसी के नतीजे में पहले युवक कांग्रेस यानि एनएसयूआई के राष्ट्रीय अध्यक्ष फिरोज खान से इस्तीफा लिया गया और अब केन्द्रीय विदेश राज्यमंत्री एमजे अकबर को अपने पद से त्याग पत्र देने के लिये विवश किया गया है। हालांकि इन दोनों मामलों को कांग्रेस और भाजपा के बीच नैतिकता की जंग में बढ़त लेने की प्रतिस्पर्धा के तौर पर नहीं देखा जा सकता। बल्कि सच तो यह है कि जिस दिन अकबर पर आरोप लगानेवाली महिलाएं सामने आ गईं उसी दिन भाजपा में रहते हुए अकबर के सार्वजनिक जीवन पर पूर्णविराम लग जाने की बात तय हो गयी। वैसे भी भाजपा का इतिहास रहा है कि महिलाओं के मामले में नाम आने के बाद किसी भी कद या पद के नेता पर कठोरतम कार्रवाई करने में हिचक नहीं दिखाई गई है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण संजय जोशी हैं जिनकी कथित सेक्स सीडी सामने आने के फौरन बाद उन्हें ना सिर्फ केन्द्रीय संगठन महामंत्री के पद से बल्कि पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से भी निष्कासित कर दिया गया। हालांकि बाद में इस बात का सबूत भी सामने आ गया कि जो सीडी संजय जोशी की बतायी जा रही थी उसमें दिख रहे महिला-पुरूष आपस में पति-पत्नी थे। लेकिन इसके बाद भी जोशी को मुख्यधारा की राजनीति में वापसी करने का मौका नहीं दिया गया। इसी प्रकार मेघालय के राज्यपाल के खिलाफ जब राजभवन की महिला कर्मचारियों ने प्रधानमंत्री कार्यालय में शिकायत भेजी तो तत्काल कार्रवाई करते हुए उन्हें पद से हटा दिया गया और अब शायद ही किसी को पता हो कि इन दिनों संघ और भाजपा की सेवा में अपना पूरा जीवन खपा देनेवाले वी. षणमुगनाथन कहां और किस हाल में निर्वासित एकाकी जीवन बिता रहे हैं। मध्यप्रदेश के वरिष्ठ नेता व वित्तमंत्री राघवजी पर जब यौन-उत्पीड़न करने का आरोप लगा तो उन्हें भी किनारे लगा दिया गया। ऐसा ही नाम तरूण विजय का भी है जिन पर शहला मसूद नामक महिला के साथ अंतरंग संबंध रखने का आरोप लगा तो उन्हें सक्रिय राजनीति से बाहर फेंक दिया गया। बताया तो यहां तक जाता है कि पार्टी के संगठन मंत्री राम माधव को केवल इसी वजह से राज्यसभा में नहीं भेजा गया क्योंकि उन पर कुछ आपत्तिजनक इल्जामों की अफवाह उड़ गयी थी। यूपी का सह-प्रभारी रहते हुए भाजपा को लोकसभा चुनाव में ऐतिहासिक सफलता दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभानेवाले रामेश्वर चैरसिया की कहानी भी कुछ इसी प्रकार की बतायी जाती है। यानि कहने का तात्पर्य यह कि अनैतिक संबंधों के आरोपों को लेकर भाजपा हमेशा ही संवेदनशील रही है और आरोपी नेताओं के खिलाफ कठोरतम कार्रवाई करती रही है। भले ही आरोपी संगठन में सबसे ताकतवर ओहदे पर विराजमान संजय जोशी सरीखा राष्ट्रीय महामंत्री ही क्यों ना हो। ऐसे में जब कभी ना कभी विदेश राज्यमंत्री एमजे अकबर की करतूतों से आहत होने वाली बीसियों महिलाएं सामने आकर आरोप लगा रही थीं तब यह कल्पना से भी परे था कि भाजपा संगठन या मोदी सरकार में किसी भी स्तर पर  उनका बचाव किया जाएगा। वैसे भी जब सुषमा स्वराज और मेनका गांधी से लेकर से लेकर स्मृति ईरानी तक ने ही नहीं बल्कि आरएसएस में नंबर दो ही हैसियत रखनेवाले दत्तात्रेय होसबोले ने भी मी-टू मूवमेंट को खुल कर सराहने में कसर नहीं छोड़ी तब सिर्फ इंतजार ही बाकी था कि अकबर खुद पद छोड़ेंगे या धक्का देकर हटाए जाएंगे। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर #Navkant_Thakur

गुरुवार, 13 सितंबर 2018

‘कनविन्स के बजाय कन्फ्यूज करने का काॅन्फिडेन्स’

वकालत के पेशे में अक्सर यह देखा जाता है कि किसी भी मुकदमे की पैरवी करते वक्त वकीलों की कोशिश रहती है कि तथ्यों, दलीलों, साक्ष्यों, सबूतों व अपनी बातों से जज को कनविन्स कर लिया जाये। लेकिन अगर साक्ष्य व सबूत पर्याप्त ना हों और मुकदमा कमजोर पड़ता दिखाई दे रहा हो तो ऐसे में वकील पुरजोर कोशिश करता है कि पूरे मामले को लेकर जज को इस कदर कन्फ्यूज कर दिया जाये कि वह उलझ कर रह जाए और सही फैसले तक पहुंच ही ना सके। इन दिनों भाजपा भी इसी रणनीति पर अमल करती नजर आ रही है। आगामी चुनावों के मद्देनजर उसने जनता जनार्दन को कन्फ्यूज करने की ऐसी रणनीति पर अमल आरंभ कर दिया है जिससे यह समझना बेहद मुश्किल है कि आखिर उसकी नीति क्या है और नीयत क्या है। हालांकि दावे से यह कहना बेहद मुश्किल है कि वाकई जनता को कन्फ्यूज किया जा रहा है अथवा पार्टी ही कन्फ्यूजन की स्थिति में है। वर्ना ऐसा कैसे हो सकता था कि एक तरफ शपथ तो राष्ट्रवाद के डंडे में विकास का झंडा लगाकर ‘सबका साथ सबका विकास’ की ली जा रही हो और दूसरी ओर विकास से जुड़े मसलों पर चुप्पी साध ली जाए। राष्ट्रवाद को भी इस अंदाज में आगे बढ़ाया जाए जिससे समाज में सांप्रदायिक विभाजन की नींव मजबूत होती हुई दिखाई पड़े। राष्ट्रवाद की आड़ में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का ताना-बाना बुनने की कोशिश के तहत ही तो राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर यानि एनआरसी के मसले को राष्ट्रीय स्तर पर तूल देते हुए एक तरफ खुले शब्दों में ऐलान किया जाता है कि भाजपा की सरकार एक भी रोहिंग्या अथवा बांग्लादेशी को भारत में घुसपैठ करने की छूट नहीं देगी लेकिन लगे हाथों यह बताने से भी परहेज नहीं बरता जाता है कि दुनिया के किसी भी देश से आने वाले हिन्दू, इसाई, बौद्ध, जैन, सिख व पारसी (गैर-मुस्लिम) समाज के लोगों को शरणार्थी के तौर पर स्वीकार करने में कतई संकोच नहीं किया जाएगा। जाहिर है कि इस तरह की बात करके समाज को हिन्दू और मुसलमान के बीच की खाई में गिराने का ही प्रयास किया जा रहा है। वर्ना घुसपैठियों को संप्रदाय के चश्मे से देखने-दिखाने की जरूरत ही क्या है? देश की समस्या यह नहीं है कि किस संप्रदाय के लोग हमारे देश में अवैध घुसपैठिये हैं अथवा किस धर्म को माननेवाले शरणार्थी हैं। देश की मौजूदा समस्या है डाॅलर के मुकाबले रूपये की गिरती सेहत, पेट्रोलियम पदार्थों के आसमान छूते दाम और वोटबैंक की राजनीति के लिये अपनाई गई तुष्टिकरण की राह के कारण आंदोलित सवर्ण समाज का तीखा आक्रोश व असंतोष। लेकिन केन्द्र से लेकर देश के 19 राज्यों में प्रत्यक्ष और जम्मू-कश्मीर सरीखे सूबों में परोक्ष तौर पर शासन कर रही भाजपा इन जमीनी मसलों को चिमटे से भी छूने की जहमत नहीं उठा रही है। अलबत्ता पूरा जोर इस बात पर है कि एनआरसी के मसले को किसी भी तरह से मुख्यधारा की चर्चा के केन्द्र में ला दिया जाए। जाहिर है कि सांप्रदायिक मसलों को चर्चा में लाकर असली मसलों से लोगों का ध्यान हटाने की कोशिश के तहत ही ऐसा किया जा रहा है। इसी प्रकार कहने को तो भाजपा अपनी सोच सकारात्मक व विकास परक बताती है और तमाम मंचों से यही अपील करती है कि राजनीतिक बहस को विकास व सुशासन पर ही केन्द्रित रखा जाये लेकिन व्यवहार में इस पर अमल करने को लेकर पार्टी कहीं से भी आश्वस्त नहीं दिखती है। वर्ना विपक्ष के महागठबंधन को लेकर ऐसी बेचैनी का आलम नहीं दिखता कि भाजपा की मातृसंस्था यानि आरएसएस के मुखिया को वैचारिक व सैद्धांतिक विरोधियों की तुलना कुत्ते से करने के लिये मजबूर होना पड़े। यानि संघ से लेकर भाजपा संगठन और मोदी सरकार तक में बेचैनी का माहौल भी है और सिद्धांत व व्यवहार में संतुलन की तलाश भी हो रही है। लेकिन सवाल है कि जब नीति और नीयत सिर्फ सत्ता पर अपनी पकड़ बरकरार रखने तक ही सीमित हो जाये तब सिद्धांतों की याद दिलाना बेमानी और मजाकिया ही होगा। अगर सत्ता केन्द्रित नीति ना होती तो जनता से जुड़ाव इतना कमजोर कैसे हो सकता था कि जन-मन को मथ रहे मसलों को चिमटे से छूने की भी जरूरत ना समझी जाए। व्यवहार में अगर कुछ कर पाना संभव ना भी हो तो सैद्धांतिक बातें करके लोगों को सांत्वना दी ही जा सकती है। गुड़ ना दे सको तो गुड़ जैसी बातें ही कहो। लेकिन राष्ट्रीय कार्यकारिणी से लेकर विभिन्न स्तरों की बैठकों के बारे में दी जा रही जानकारियों के मुताबिक ना तो रोजगार के मसले पर कहीं कोई चर्चा हो रही है और ना ही डीजल-पेट्रोल की महंगाई को थामने पर विचार करने की जहमत उठाई जा रही है। अलबत्ता रणनीति बन रही है चुनाव जीतने की और इसके लिये लक्ष्य तय किया गया है 51 फीसदी वोटों पर कब्जे का। इसके लिये तुष्टिकरण पिछड़ों का भी किया जा रहा है और दलितों व आदिवासियों का भी। बहुसंख्यकों व गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यकों को रिझाने के लिये शरणार्थियों का मसला भी चमकाया जा रहा है। ऐसे में अगर सवर्णों, मुसलमानों और कुछ अन्य जातियों को चिढ़ाना-खिझाना भी पड़े तो कोई दिक्कत नहीं। लेकिन सवाल है कि जब सिद्धांत और व्यवहार में असंतुलन व दिखावे की स्थिति प्रबल रहेगी तो संगठन व सरकार से जनता का जुड़ाव क्यों, कैसे व कब तक कायम रह पाएगा। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’ @नवकांत ठाकुर #Navkant_Thakur

गुरुवार, 19 जुलाई 2018

‘विश्वास को परखने के लिए अविश्वास का प्रस्ताव’


एक बार फिर संसद में सरकार के खिलाफ विपक्ष द्वारा अविश्वास का प्रस्ताव प्रस्तुत किया गया है। भारतीय संसद के इतिहास का पहला अविश्वास प्रस्ताव वर्ष 1963 में पंडित जवाहरलाल नेहरू की सरकार के खिलाफ लाया गया था और अंतिम बार वर्ष 2003 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार को अविश्वास के प्रस्ताव का सामना करना पड़ा। उसके डेढ़ दशक बाद यह 27वीं बार है जब भारतीय संसद अविश्वास प्रस्ताव की साक्षी बनने जा रही है। इसमें दिलचस्प बात यह है कि अब तक केवल एक ही बार ऐसा मौका आया जब अविश्वास प्रस्ताव के पक्ष में अधिक वोट पड़ जाने के कारण सरकार को सत्ता से हटना पड़ा। वर्ना तमाम अविश्वास प्रस्तावों का इतिहास असफलता का ही रहा है। इस बार भी कोई नया इतिहास लिखे जाने की उम्मीद ना तो विपक्ष को है और ना ही सत्ता पक्ष को। भले ही श्रीमती सोनिया गांधी ने सवालिया लहजे में पूछा हो कि कौन कहता है कि उनके पास संख्याबल नहीं है। लेकिन उन्हें भी बेहतर पता है कि चिराग लेकर ढ़ूंढ़ने से भी शायद ही कोई मिले जो यह स्वीकार करे कि लोकसभा में विपक्ष के पास मोदी सरकार को धूल चटाने के लिये आवश्यक संख्याबल उपलब्ध है। उधर सरकार की ओर से अनंत कुमार ने खम ठोंकते हुए कह दिया है कि शुक्रवार को सुबह ग्यारह बजे से आरंभ होने जा रहे अविश्वास प्रस्ताव पर बहस के बाद शाम छह बजे जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपना जवाब प्रस्तुत करेंगे तो उसके बाद होने वाले मत विभाजन में निश्चित ही विपक्षी खेमे से भी सरकार के पक्ष में काफी वोट पड़ेंगे। यानि विपक्ष की कोशिश है सत्ता पक्ष में सेंध लगाने की और सरकार का दावा है कि वह विपक्षी एकता की कलई खोल देगी। लेकिन इन दावों की गहराई से पड़ताल करें तो वास्तव में यह कहने भर का ही अविश्वास प्रस्ताव नजर आ रहा है बल्कि इसके पीछे अपने विश्वास को मजबूत करने का प्रयास ही छिपा हुआ दिख रहा है। विपक्ष का अपना अलग विश्वास है और सत्ता पक्ष का अपना अलग। आखिर सरकार ने मानसून सत्र के पहले ही दिन अविश्वास प्रस्ताव को स्वीकार करने की जो पहल की है वह केवल अपने संख्याबल के विश्वास को परखने के लिये हर्गिज नहीं की है। मोदी सरकार के शीर्ष संचालकों को तो यह पहले से ही पता है कि इस समय लोकसभा के कुल 534 में से 273 सांसद भाजपा के ही हैं और राजग के घटक दलों के संख्याबल को भी जोड़ लिया जाए तो आंकड़ा 314 तक पहुंच जाता है। यानि सरकार के पास पूर्ण बहुमत के लिये आवश्यक संख्या से काफी अधिक सांसदों का समर्थन उपलब्ध है। इसके बाद भी अगर सरकार ने संसद के बीते सत्र में टीडीपी की भारी मांग के बावजूद उसे संसद में अविश्वास प्रस्ताव लाने का मौका नहीं दिया और इस सत्र के पहले ही दिन उसकी मांग को एक ही झटके में स्वीकार कर लिया है तो इसके पीछे निश्चित ही गहरी कूटनीति छिपी हुई है। दूसरी ओर विपक्ष भी अपनी ताकत से कतई अनभिज्ञ नहीं है। तभी तो सपा के प्रधान महासचिव रामगोपाल यादव ने बेलाग लहजे में कहा है कि विपक्ष के पास भले ही सरकार गिराने के लिये आवश्यक नंबर नहीं है लेकिन इस अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा से सरकार को सवालों के कठघरे में खड़ा करने की सुविधा मिलेगी और सवालों का जवाब देने से सरकार बच नहीं पाएगी। यानि विपक्ष का मकसद भी अविश्वास प्रस्ताव के माध्यम से सरकार गिराना नहीं बल्कि अपनी बात को दूर तक पहुंचाना है जबकि सरकार का मकसद भी विपक्ष से अपना बचाव करना नहीं है बल्कि अविश्वास प्रस्ताव को हथियार के तौर पर इस्तेमाल करके विपक्ष को ऐसी चोट पहुंचाना है जिससे वह आगामी चुनावों तक हर्गिज संभल ना सके। दरअसल यह लड़ाई अपनी जीत सुनिश्चित करने की नहीं बल्कि अपने उस विश्वास को मजबूत करने की है जिसके तहत हर पक्ष आगामी चुनावों का ताना-बाना बुन रहा है। कांग्रेस की कोशिश है कि राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के खिलाफ एक ऐसा महा-गठजोड़ तैयार किया जाये ताकि भाजपा विरोधी वोटों का बिखराव रोक कर मोदी सरकार की वापसी की संभावनाओं पर विराम लगाया जा सके। दूसरी ओर सरकार की कोशिश है कि महा-गठजोड़ के प्रयास को प्रायोगिक स्तर पर ही इस कदर कमजोर कर दिया जाए कि विपक्षियों के बीच साथ मिल कर चुनाव लड़ने के लिये आवश्यक आपसी विश्वास की जमीन ही खिसक जाए। इसी प्रकार विपक्ष को अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा के माध्यम से अपने तमाम आरोपों को देश के समक्ष रखने और संसद के रिकार्ड में दर्ज कराने में कामयाबी मिलेगी जबकि सरकार को सहूलियत होगी कि वह अपने चार साल के कामकाज का पूरा हिसाब किताब संसद के माध्यम से जनता जनार्दन के समक्ष प्रस्तुत कर सके। इसके अलावा विपक्ष का प्रयास होगा कि सत्ता पक्ष में सेंध लगाकर भाजपा के समर्थकों व संगी-साथियों की तादाद में कमी लाए और देश को यह बताए कि राजग की एकता व मजबूती का दावा किस कदर खोखला है जबकि सरकार का प्रयास होगा कि वह विपक्षी खेमे में सेंध लगाकर विरोधियों के आत्मबल को इस कदर कमजोर कर दे कि वे अपनी जीत के विश्वास के प्रति आश्वस्त होकर चुनाव लड़ने की स्थिति में ही ना आ सकें। यानि समग्रता में देखें तो इस अविश्वास प्रस्ताव का मतलब कुछ और है, मकसद कुछ और। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’  @नवकांत ठाकुर #Navkant_Thakur

रविवार, 20 मई 2018

‘आखिरकार बेबसी का सबब बन गयी बेसब्री’


कर्नाटक में जितना स्वाभाविक भाजपा की सरकार का बनना था उतना ही स्वाभाविक इसका बहुमत परीक्षण में असफल होना भी था। जब प्रदेश के चुनाव का नतीजा आया तो त्रिशंकु विधानसभा के लिये मिले खंडित जनादेश में बहुमत के लिये आवश्यक 112 सीटें तो किसी को नहीं मिल सकीं लेकिन कुल 104 सीटें जीत कर भाजपा सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर अवश्य उभरी। दूसरी ओर कांग्रेस को पिछली बार मिली 122 सीटों के मुकाबले इस बार सिर्फ 78 सीटों पर ही सिमट कर रह जाने के लिये मजबूर होना पड़ा जबकि बसपा-जेडीएस गठजोड़ 38 सीटों के साथ तीसरी ताकत के रूप में उभरा। हालांकि अपनी हार का गम गलत करने और भाजपा की जीत का जायका बिगाड़ने के लिये कांग्रेस ने चुनावी नतीजा सामने आने तत्काल बाद ही जेडीएस को बिना शर्त समर्थन का ऐलान करते हुए बहुमत के आंकड़े की स्पष्ट तस्वीर दिखा दी। लेकिन अव्वल को कांग्रेस ने कूटनीतिक ख़ुराफ़ात करके भाजपा को रोकने की कोशिश की थी और दूसरे भाजपा ही सबसे बड़ी ताकत के तौर पर सामने आई थी लिहाजा राज्यपाल वजूभाई वाला ने स्वाभाविक तौर पर भाजपा के सरकार गठन के दावे को स्वीकार कर लिया और बीएस येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाते हुए उन्हें विश्वासमत हासिल करने के लिये पंद्रह दिनों की मोहलत दे दी। यानि कहने का तात्पर्य यह कि ना तो राज्यपाल ने येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री नियुक्त करके कोई गलती की और ना ही भाजपा ने सरकार बनाने का दावा करके कोई अनैतिक काम किया। लेकिन एक तरफ तो भाजपा के पास बहुमत का आंकड़ा उपलब्ध नहीं था और दूसरे कांग्रेस द्वारा सुप्रीम कोर्ट में इंसाफ की गुहार लगाये जाने के बाद विश्वासमत हासिल करने के लिये मिली पंद्रह दिनों की मोहलत महज तीन दिनों में सिमट गई लिहाजा येदियुरप्पा की अल्पमत सरकार का विश्वासमत के दौरान गिरना भी स्वाभाविक ही था। ऐसे में यह कहना कतई गलत नहीं होगा कि चुनाव परिणाम सामने आने के बाद कर्नाटक में जो राजनतिक घटनाक्रम दिखा है वह बेहद स्वाभाविक भी है और सहज भी। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम को राजनीतिक नजरिये से देखा जाये तो यह सीधे तौर पर भाजपा की हार है और कांग्रेस की जीत। भाजपा जीती हुई बाजी हार गयी है और कांग्रेस ने हारे हुए गढ़ पर अपनी जीत का झंडा लहराने में कामयाबी हासिल कर ली है। निश्चित तौर पर कांग्रेस ने भाजपा की हलक में हाथ डालकर जीत के निवाले पर कब्जा जमाया है। लिहाजा कांग्रेस के लिये यह जीत बेहद खास भी है और यादगार भी। कांग्रेस को पूरा हक है कि वह इस जीत का खुलकर जश्न मनाए और जेडीएस के साथ मिलकर या तो साझेदारी की सरकार बनाए या फिर अपने समर्थन से उसकी सरकार बनवाए। लेकिन भाजपा के नजरिये से देखा जाये तो उसके लिये निश्चित तौर पर यह आत्मचिंतन का मसला है कि आखिर ऐसा हुआ क्यों? जब बहुमत का आंकड़ा उसके पास उपलब्ध ही नहीं था और कांग्रेस ने जेडीएस को बिना शर्त समर्थन देने का ऐलान करते हुए तुरूप का इक्का फेंक दिया तो उस बाजी में उलझने की बेसब्री क्यों दिखाई गई। कांग्रेस का समर्थन मिल जाने के बाद जब जेडीएस के पास बहुमत का आंकड़ा स्पष्ट दिखाई पड़ गया तो फिर राज्यपाल के पास जाकर सरकार बनाने का दावा करने की जल्दबाजी करने के बजाय पहले बहुमत का आंकड़ा जुटाने की कोशिश क्यों नहीं की गई। साथ ही सवाल तो यह भी उठेगा ही कि आखिर राज्यपाल ने विश्वासमत हासिल करने के लिये येदियुरप्पा को पंद्रह दिनों की मोहलत देने की ऐतिहासिक दरियादिली क्यों दिखाई जो सुप्रीम कोर्ट को भी हजम नहीं हुई और उसे इस अवधि को कम करने के लिये विवश होना पड़ा। खैर, अब इन तमाम मसलों पर चिंतन करने और गलतियों पर माथा पीटने के लिये भाजपा की कर्नाटक इकाई के पास पर्याप्त समय है। लेकिन पार्टी के केन्द्रीय नेतृत्व को इस पूरे प्रकरण से जो नुकसान पहुंचा है उसकी भरपाई तो नामुमकिन ही है। सच तो यह है कि चुनावी नतीजों में सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरने और बहुमत के लिये आवश्यक आंकड़े से महज सात सीटें ही कम होने के बावजूद भाजपा को जिस कदर भारी फजीहत का सामना करना पड़ा है उसकी मुख्य तौर पर तीन वजहें रही हैं। अव्वल तो लगातार जीत के सिलसिले को कर्नाटक में भी जारी रखने का भारी दबाव पार्टी ने अपने ऊपर ओढ़ लिया जिसके कारण उसे विकल्पहीनता की स्थिति का सामना करना पड़ा और दूसरे गोवा की ही तर्ज पर आनन-फानन में सरकार बनाकर विरोधियों को लाजवाब कर देने की बेसब्री भरी नीति पर कर्नाटक में भी अमल करना उसके लिये आत्मघाती साबित हुआ। इस सबके अलावा तीसरी सबसे बड़ी गलती प्रशासनिक स्तर पर हुई जिसमें विश्वासमत के लिये 15 दिनों के मोहलत को स्वीकार करने के बजाय इसे अधिकतम एक सप्ताह की समय सीमा में समेट दिया जाता तो सुप्रीम कोर्ट को भी इसमें दखल देने की जरूरत महसूस नहीं होती और इस बीच में आसानी से बहुमत जुटाने के लिये उपलब्ध विकल्पों को टाटोला जा सकता था। लेकिन कहावत है कि ‘जाके प्रभु दारूण दुख देहीं, वाकी मति पहिले हरि लेहीं।’ यही भाजपा के साथ भी हुआ है वर्ना पार्टी का वह शीर्ष नेतृत्व एक साथ इतनी आत्मघाती गलतियां कतई नहीं कर सकता था जो प्रतिकूल परिस्थितियों में जीत हासिल करने का चैम्पियन माना जाता हो। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’ @नवकांत ठाकुर #Navkant_Thakur

शनिवार, 31 मार्च 2018

‘सुस्त कदम रास्ते और तेज कदम राहें’

‘सुस्त कदम रास्ते और तेज कदम राहें’

भाजपा के शिखर पुरूष कहे जाने वाले अटल बिहारी वाजपेयी की पंक्तियां हैं कि- ‘दांव पर सब कुछ लगा है रूक नहीं सकते, टूट सकते हैं मगर हम झुक नहीं सकते।’ वाकई वाजपेयी की भाजपा, नरेन्द्र मोदी के मौजूदा दौर में ऐसे मोड़ पर आ गई है जहां से आगे बढ़ने का रास्ता सुस्त और वापसी की राहें बेहद तेज नजर आ रही हैं। बेशक पूर्वोत्तर का चुनाव परिणाम आने के बाद तक पार्टी को अजेय माना जाने लगा था लेकिन उसके कुछ ही दिनों सामने आए फूलपुर और गोरखपुर के चुनाव परिणामों ने पूरी तस्वीर बदल कर रख दी। भाजपा की इस हार ने तमाम गैर-भाजपाई दलों को यह भरोसा दिला कि जब गोरखपुर में भाजपा को हराया जा सकता है तो ऐसी कोई भी सीट नहीं है जहां उसे शिकस्त ना दी जा सके। सिर्फ जरूरत है गैर-भाजपाई वोटों का बिखराव रोकने की और ऐसा माहौल बनाने की जिससे मतदाताओं को आश्वस्त किया जा सके कि अगर उन्होंने भाजपा के खिलाफ वोट दिया तो वह बेकार नहीं जाएगा। इसी उत्साह का नतीजा है कि कांग्रेस की ओर से भी गैर-भाजपाई दलों की गोलबंदी का प्रयास जारी है और ममता बनर्जी व शरद पवार सरीखे नेतागण भी इस काम में जुट गए हैं। कई स्तरों पर यह प्रयास आरंभ हो गया है कि एक मजबूत मोर्चा बनाकर प्रादेशिक स्तर पर घेराबंदी करके भाजपा को धूल चटाई जा सके। दूसरी ओर भाजपा के भीतर भी अंदरूनी तौर पर कुछ ऐसे खेमे सक्रिय होते हुए दिख रहे हैं जिनमें गोरखपुर के चुनावी नतीजों से आशाओं व उम्मीदों का नए सिरे से संचार हुआ है और उनका मानना है कि अगर पार्टी को आगामी चुनाव में बहुमत के आंकड़े तक पहुंचने में कामयाबी नहीं मिल सकी तो प्रधानमंत्री पद के लिए उनके नाम की लाॅटरी लग सकती है। हालांकि पिछले लोकसभा चुनाव में भी मोदी को प्रधानमंत्री पद उम्मीदवार घोषित कराने के पीछे भी इन खेमों का आकलन यही था कि ऐसा करने से पार्टी को अधिकतम दो सौ सीटें मिल जाएंगी और बाद में मोदी के नाम पर अन्य दलों से समर्थन नहीं मिलने पर उनका प्रधानमंत्री बनने का रास्ता साफ हो जाएगा। लेकिन मोदी से मेहनत करा कर सत्ता की मलाई पर कब्जा जमाने की सोच रखनेवालों की उम्मीदों पर मतदाताओं ने पानी फेर दिया और भाजपा के खाते में आवश्यकता से दस सीटें अधिक ही आ गईं। नतीजन पिछले चार साल से मोदी का निष्कंटक राज जारी है और उम्मीदों की आस में मोदी का नाम आगे करनेवालों के पास बेहतर परिस्थिति का इंतजार करने के अलावा दूसरा कोई विकल्प ही नहीं है। लेकिन सूत्र बताते हैं कि इनकी उम्मीदें एक बार फिर जग रही हैं और गोरखपुर के चुनावी नतीजों के बाद इन खेमों के नेताओं को यह यकीन होने लगा है कि उनका जो सपना 2014 में पूरा नहीं हो पाया वह इस बार अवश्य पूरा हो जाएगा। यही वजह है कि उनकी नजरें इस समीकरण पर टिक गई हैं कि अगर बाहर से समर्थन जुटाने की जरूरत पड़े तो ‘प्रदेश अभिमान’ के नाम पर अपने गृह राज्य की सभी पार्टियों के सांसदों का समर्थन हासिल किया जा सके। इसके अलावा अन्य दलों के साथ भी अपना अंदरूनी तालमेल मजबूत करने की कोशिशें जारी हैं ताकि मौके पर बहुमत साबित करने में कोई दिक्कत ना आए। यानि पार्टी के असंतुष्ट तबके में उम्मीदों के आॅक्सीजन का संचार आरंभ होता दिखने लगा है। इसके अलावा बीते दिनों हुए राज्यसभा के टिकटों के बंटवारे को लेकर भी एक बड़े तबके में नाराजगी का माहौल है। पहले आडवाणी को ठेंगा दिखाना और अब राज्यसभा भेजने के मामले में सशक्त दावेदारों को किनारे किया जाना भाजपा के मौजूदा निजाम के प्रति रोष, असंतोष व असहमति का सबब बन रहा है। रही सही कसर निर्णय प्रक्रिया में कथित मनमानी ने पूरी कर दी है। हालांकि भले ही अभी शीर्ष नेतृत्व के भय से असंतोष के ज्वालामुखी का लावा फूटकर ना बह रहा हो लेकिन आगामी दिनों में होने जा रहे विधानसभा चुनावों में मिलने वाली एक भी हार बड़े विस्फोट के साथ इस लावे के बहने का रास्ता खोल सकती है। अगर पार्टी के मौजूदा निजाम यानि मोदी और अमित शाह की जोड़ी की बात करें तो उनके लिए चुनौती है कि एक तरफ अगले आम चुनाव की तारीख की उल्टी गिनती शुरू होने वाली है और दूसरी तरफ कर्नाटक की चुनावी परीक्षा का सामना करने के अलावा साल के आखिर में राजस्थान, मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ जैसे अपने दुर्ग को भी ढ़हने से बचाना है। हालांकि इस जोड़ी ने तमाम प्रतिकूलताओं जूझते हुए केन्द्र के साथ ही 21 राज्यों में प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर सत्ता हासिल करके पार्टी को देश के 68 फीसदी भू-भाग पर राजनीतिक कब्जा दिलाया है। सदस्यों की तादाद के लिहाज से विश्व की सबसे बड़ी पार्टी के रूप में भाजपा का नाम दर्ज कराया है। यहां तक कि बकौल अमित शाह आज भाजपा के पास जो अपना मुख्यालय है वह भी विश्व के किसी भी राजनीतिक दल के मुख्यालय के मुकाबले कहीं अधिक भव्य, दिव्य व विस्तृत है। यानि हर लिहाज से इन्होंने भाजपा कोे ऐसी ऊंचाई पर ला दिया है जो किसी सपने के सच होने जैसा है। लेकिन यह भी सच है कि मौजूदा चुनौती से निपटने पर ही सफलता की गाथा का अगला अध्याय आरंभ होगा वर्ना बोरिया-बिस्तर गोल करने का मौका तलाशने वालों की चांदी होती देर नहीं लगेगी। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’   @नवकांत ठाकुर  #Navkant_Thakur

गुरुवार, 22 मार्च 2018

‘पांव तले के तिनके से आंखों में घनेरी पीड़’



‘पांव तले के तिनके से आंखों में घनेरी पीड़’    

मौजूदा सियासी दौर में सत्तारूढ़ भाजपा के दो शीर्षतम संचालकों यानि नरेन्द्र मोदी और अमित शाह से बेहतर संत कबीर की इस सीख का अनुभव शायद ही किसी को होगा कि- ‘‘तिनका कबहु न निन्दिये, जो पांवन तर होय, कबहुं उड़ी आंखिन पड़े, तो पीड़ घनेरी होय।’’ तिनका-तिनका जोड़कर केन्द्र से लेकर 22 राज्यों में सत्ता का घोंसला बनाने में भी ये कामयाबी हासिल कर चुके हैं और प्रतिकूल सियासी समीकरणों की आंधी में उसी घोंसले के तिनके इनके लिये भारी पीड़ का सबब भी बन रहे हैं। हालांकि घोंसले के तिनकों की ढ़ीली पड़ रही पकड़ को दोबारा मजबूती से गूंथने के प्रयासों के तहत सोहेलदेव-भासपा को अपने साथ जुड़े रहने के लिए मनाने में फिलहाल उन्हें कामयाबी मिल गयी है लेकिन जो तिनके बिखर चुके हैं उन्हें दोबारा गूंथने की राह नहीं मिल रही और जो दायें-बायें देखकर खिसकने की तैयारी में हैं उनको अपने साथ जोड़े रखने की बेहद कठिन चुनौती भी सिर पर खड़ी है। दरअसल तिनके और घोंसले की पूरी कहानी वर्ष 2014 के आम चुनावों से शुरू हुई जिसे सतही तौर पर ‘मोदी मैजिक’ का नाम दे दिया गया। जबकि वास्तव में वह सामूहिक लड़ाई की जीत थी जिसका चेहरा मोदी को बनाया गया था। हालांकि राजस्थान, गुजरात व मध्य प्रदेश सरीखे सूबों में हुई सीधी लड़ाई में कांग्रेस के विरूद्ध भड़की जनाक्रोश की आग में मोदी मैजिक का करिश्मा अवश्य चल निकला। लेकिन बिहार, महाराष्ट्र व उत्तर प्रदेश सरीखे सूबों में क्षेत्रीय दलों को अपने साथ जोड़कर ही भाजपा ने तिनका-तिनका एकत्र करते हुए कामयाबी की इबारत लिखी। उस चुनाव में तिनकों की अहमियत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि केरल व तमिलनाडु सरीखे जिन सूबों में सीधी लड़ाई कांग्रेस से नहीं थी और बड़े क्षेत्रीय दलों को साधने में भी भाजपा को कामयाबी नहीं मिल सकी वहां मोदी मैजिक बेअसर रहा। यानि समग्रता में देखें तो 2014 का जनादेश सिर्फ मोदी के नाम पर नहीं मिला था बल्कि इसमें निर्णायक भूमिका निभाई थी कांग्रेस को सत्ता से खदेड़ने की जनभावना ने और इसमें भाजपा को मदद मिली थी उन स्थानीय व क्षेत्रीय ताकतों से जो अपने दम पर अपना खेल बनाने की ताकत भले ना रखते हों लेकिन किसी दूसरे का खेल बिगाड़ने की जिनमें बखूबी क्षमता है। हालांकि 2014 के चुनाव परिणामों ने राजनीतिक पंडितों को भी इस कदर चमत्कृत कर दिया कि वे पूरी जीत को मोदी मैजिक का नाम देकर स्थानीय ताकतों को इसके श्रेय में हिस्सेदारी देने में कंजूसी कर गए। लेकिन भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को हकीकत की पूरी जानकारी थी और इसी वजह से अपने दम पर पूर्ण बहुमत के लिए आवश्यक आंकड़े से दस सीटें अधिक जीतने के बावजूद मोदी सरकार में राजग के उन तमाम घटक दलों को यथोचित हिस्सेदारी दी गई जिन्होंने पर्दे पर मुख्य भूमिका भले ना निभाई हो लेकिन गैर-कांग्रेसवाद की लहर को मोदी मैजिक में तब्दील करने में निर्णायक भूमिका निभाई थी। साथ ही 2014 के चुनाव को नजीर मानकर भाजपा के नए निजाम ने प्रादेशिक स्तर पर स्थानीय व छोटे-छोटे दलों को अपने साथ जोड़ना आरंभ कर दिया और इसका नतीजा यह रहा कि विधानसभा के चुनावों में एक के बाद एक भाजपा सफलता के झंडे गाड़ती चली गई। जिन सूबों में सही तरीके से चुनावी गठजोड़ नहीं हो सका और जहां सीधी लड़ाई कांग्रेस से नहीं थी वहां भाजपा को शिकस्त का सामना भी करना पड़ा और बिहार, दिल्ली व जम्मू कश्मीर सरीखे सूबे के मतदाताओं ने स्थानीय विकल्प को ही तरजीह देना बेहतर समझा। लेकिन इससे सबक लेकर भाजपा ने पूरे देश में तमाम गैर-कांग्रेसी सियासी ताकतों को अपने साथ जोड़ने का अभियान छेड़ दिया। तमाम सिद्धांतों व पूर्वाग्रहों से किनारा करते हुए बिहार में नीतीश कुमार को और जम्मू-कश्मीर में पीडीपी को राजग के साथ जोड़ा गया। पूर्वोत्तर में भी ऐसे-ऐसे दलों को अपने साथ जोड़ा गया जिन्हें सैद्धांतिक व वैचारिक तौर पर अब तक चिमटे से छूना भी गवारा नहीं किया जा रहा था। तमिलनाडु में अन्ना द्रमुक के साथ पींगें बढ़ाई गईं और गोवा में सरकार बनाने के लिए छोटे सहयोगी दलों की जिद का मान रखने के लिए मनोहर पर्रिकर मुख्यमंत्री बनाकर भेजा गया। यानि भाजपा को जीत का मंत्र मिल गया था और उसकी साधना करके पार्टी ने अभूतपूर्व कामयाबी भी अर्जित की। लेकिन जिस मंत्र का मर्म पार्टी के शीर्ष दोनों रणनीतिकार बेहतर समझ रहे थे उसके बारे में पार्टी का प्रादेशिक नेतृत्व काफी हद तक आज भी अनजान ही है। नतीजन प्रादेशिक स्तर पर यथोचित सम्मान नहीं मिलने से अब राजग के घोंसले की एकजुटता प्रभावित होने लगी है। बिहार में जीतनराम मांझी ने राजग से किनारा किया है तो आंध्र प्रदेश में टीडीपी ने अलग राह पकड़ ली है। महाराष्ट्र में स्वाभिमानी शेतकारी संगठन कांग्रेसनीत संप्रग के साथ जुड़ रहा है जबकि शिवसेना ने अगला लोकसभा चुनाव अपने दम पर लड़ने की पहले ही घोषणा कर दी है। यूपी में भी अपना दल का बड़ा खेमा राजग से अलग हो चुका है और बिहार में लोजपा-जदयू की एक अलग खिचड़ी पक रही है। रालोसपा भी राजग में अपना भविष्य सुरक्षित नहीं समझ रहा। यानि तिनका तिनका जोड़कर जिस नीड़ का निर्माण हुआ उसके बिखरने की भूमिका बनने लगी है। ऐसे में घोंसले के तिनकों की आपसी कसावट में वृद्धि नहीं की गई तो चुनावी वर्ष में भाजपा को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’  @नवकांत ठाकुर #Navkant_Thakur

शनिवार, 13 जनवरी 2018

‘उल्टी गंगा बह रही, राजनीति के घाट’    

कहने-सुनने में भले अटपटा लगे लेकिन सच यही है कि वाकई कहीं-कहीं गंगा उल्टी भी बहती है। जब आगे बढ़ने के लिए सीधी राह ना मिल रही हो तो कुछ दूर उल्टी दिशा में बह कर नई राह गंगा भी तलाशती है और राजनीति भी। यह बात और है कि जहां गंगा उल्टी बहती है वहां उसके महिमा और महात्म्य में काफी इजाफा हो जाता है जबकि सियासत उल्टी दिशा में बहने पर आलोचनाओं का शिकार होने लगती है। उसकी प्रामाणिकता व शुचिता पर सवालिया लगने लगते हैं और उल्टी धारा को दिखावा करार दिया जाने लगता है। हालांकि यह अलग बहस का विषय है कि जब उल्टी बहने पर भी गंगा के पानी की पवित्रता व गुणवत्ता पर कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ता है तो फिर राजनीति की धारा उल्टी बहने पर मैली व गंदली क्यों हो जाती है? शायद इसका कारण धारा के बहाव के मकसद में ही छिपा है। गंगा बहती है सबको तारने, उबारने व संवारने के लिए जबकि राजनीति की दिशा तय होती है वोटरों को लुभाने, रिझाने और सत्ता-व्यवस्था पर अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए। यानि सिर्फ सत्ता का स्वार्थ साधने के लिए उल्टी-सीधी राह पकड़ने के कारण राजनीति आलोचनाओं के केन्द्र में आती है जबकि परमार्थ के मकसद से आगे बढ़ने के लिए आवश्यकता के मुताबिक उल्टी दिशा में बहने से भी परहेज नहीं करना गंगा का ऐसा गुण बन जाता है जो उसकी पवित्रता, स्वीकार्यता और पूजनीयता को बेहद ऊंचे आयाम पर पहुंचा देता है। लेकिन तमाम आलोचनाओं के बावजूद राजनीति अपने रंग-ढ़ंग, दशा-दिशा, तेवर-कलेवर व रीति-नीति में जरूरत के मुताबिक रद्दोबदल करने से कभी पीछे नहीं हटती। बल्कि यूं कहा जाए तो ज्यादा सही होगा कि उल्टी गंगा बहाने में जिस संगठन या शख्सियत को जितनी महारथ हासिल रहती है वह सियासत में उतना ही अधिक सफल होता है। मिसाल के तौर पर कांग्रेस की 70 साल की सियासी सफलता के पीछे सबसे बड़ी वजह यही रही कि सैद्धांतिक तौर पर उसने अपनी वास्तविक दिशा का किसी को पता नहीं चलने दिया। जिस किसी भी कसौटी पर परखा जाता कांग्रेस उसमें ही अव्वल दिखाई देती थी। ब्राह्मण परिवार द्वारा संचालित होने के कारण बहुसंख्यकों की सबसे सगी भी कांग्रेस ही थी और धर्मनिरपेक्षता की जबर्दस्त पैरोकारी के कारण अल्पसंख्यकों के हितों की सबसे बड़ी हिमायती भी कांग्रेस ही थी। रामलला की पूजा के लिए बाबरी मस्जिद का ताला भी कांग्रेस ने ही खुलवाया और अल्पसंख्यकों को सरकारी खर्च पर हज कराने का इंतजाम भी कांग्रेस ने ही किया। आपातकाल लागू करके अभिव्यक्ति की आजादी पर पहरा भी कांग्रेस ने ही बिठाया और लोगों को शासन से सूचना हासिल करने का अधिकार भी कांग्रेस ने ही दिया। उल्टी-सीधी राह पर एक-समान गति से आगे बढ़ने में महारथ के कारण ही देश की हिन्दी-पट्टी पर भी कांग्रेस का ही कब्जा था और हिन्दी विरोधी आंदोलन की आग में दशकों तक दहकते रहे दक्षिणी राज्यों में भी कांग्रेस का ही डंका बजता था। पंचायत से लेकर पार्लियामेंट तक हर जगह बस कांग्रेस ही कांग्रेस थी। सीधी सोच वाले उसकी सीधी धारा से सम्मोहित थे जबकि उल्टी सोच वालों को साधने में उसकी ऊटपटांग कूटनीतियां कामयाब हो जाती थीं। लेकिन खेल बिगड़ा तब जब वह उल्टी-सीधी धारा के बीच संतुलन नहीं बना पाई। एंटनी कमेटी की रिपोर्ट के मुताबिक कांग्रेस के पतन का मुख्य कारण ही यही है कि अल्पसंख्यक हितैषी छवि को निखारने के चक्कर में उसका स्वरूप बहुसंख्यक विरोधी का दिखने लगा। अब बीमारी पकड़ में आ चुकी है तो इलाज भी करना ही होगा। गुजरात में मंदिरों, मठों व घाटों का चक्कर लगाते हुए खुद को पुरजोर तरीके से ब्राह्मण नेता के रूप में प्रस्तुत करके राहुल गांधी ने जो इलाज की प्रक्रिया शुरू की उसका परिणाम भी सुखद ही रहा। वोट फीसद में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई, सीटों की तादाद में भी संतोषजनक इजाफा हुआ और भाजपा को दहाई के आंकड़े में समेटने में वे कामयाब हो गए। यानि जरूरत के मुताबिक दिशा बदलते ही दशा सुधरने लगी। अब यही फार्मूला कांग्रेस कर्नाटक में भी आजमाने जा रही है जहां गुजरात माॅडल पर भाजपा के मोर्चा खोलते ही मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने पुरजोर आवाज में जता दिया कि वे भी हिन्दू ही हैं। इसी प्रकार बंगाल की 30 फीसदी अल्पसंख्यक आबादी की सर्वस्वीकार्य नेत्री बनने के लिए जिस ममता बनर्जी ने दुर्गा प्रतिमा के विसर्जन में अड़ंगा लगाया, रामनवमी का जुलूस निकालने पर त्यौरियां दिखाईं और सरस्वती पूजा के रंग में भंग डालने का भरपूर प्रयास किया वही ममता बनर्जी अब वोट बैंक का विस्तार करने के लिए उल्टी धारा में बहते हुए ब्राह्मण सम्मेलन करवाने और गऊ-दान करने की कवायदें कर रही हैं। जबकि बहुसंख्यकवाद की राजनीति को सर्वोच्च शिखर पर पहुंचाने वाली भाजपा अब पश्चिम बंगाल में अल्पसंख्यक सम्मेलन कराने जा रही है। यानि अपनी धारा के उलट बहकर मतदाताओं को रिझाने-फुसलाने की कोशिश ममता भी कर रही है और भाजपा भी। हालांकि गद्दी पर कोई भी विराजमान हो इससे सत्ता के स्वरूप और सत्ताधारियों की सोच पर कोई फर्क नहीं पड़ता। तभी तो जो आंकड़े पहले कांग्रेस प्रस्तुत करती थी वही अब भाजपा कर रही है और जो योजनाएं कांग्रेस ने इजाद की थी उन्हें ही सुधार कर भाजपा आगे बढ़ा रही है। लेकिन सियासत का अनुभव यही है कि दशा सुधारने के लिए दिशा बदलने की कूटनीति जब उल्टी पड़ती है तो बड़ी बे-भाव की पड़ती है। ‘जैसी नजर, वैस नजरिया।’  @नवकांत ठाकुर #Navkant_Thakur

बुधवार, 27 दिसंबर 2017

‘भावी चुनौतियों का तोड़ निकालने पर जोर’

‘भावी चुनौतियों का तोड़ निकालने पर जोर’


गुजरात और हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव के नतीजे सामने आ जाने और कर्नाटक के अलावा तीन पूर्वोत्तरी राज्यों के विधानसभा चुनाव का औपचारिक शंखनाद होने के बीच अगले महीने होने जा रही भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में चिंतन-मंथन का केन्द्र नवनियुक्त कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ही रहनेवाले हैं। बेशक भाजपा ने बीते दिनों हुए चुनाव में पूर्ण बहुमत के साथ अपनी सरकार बनाने में कामयाबी हासिल कर ली हो लेकिन गुजरात की सरकार बचाने के लिए भाजपा को जिस कदर नाको चने चबाने पड़े उसके मद्देनजर आगामी चुनावों में कांग्रेस की ओर से मिलनेवाली कड़ी टक्कर से निपटने की राह तलाशना ही इस बार की कार्यकारिणी बैठक का मुख्य एजेंडा रहनेवाला है। खास तौर से नवनियुक्त अध्यक्ष राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस के बदले हुए तेवर और कलेवर ने भाजपा की चिंताएं स्वाभाविक तौर पर बढ़ा दी हैं। यहां तक की गुजरात में भाजपा को दहाई के आंकड़े में सिमटने के लिए मजबूर करके राहुल ने अपनी बढ़ती लोकप्रियता व जनस्वीकार्यता भी साबित कर दी है। ऐसे में भाजपा कतई राहुल को अब हल्के में नहीं ले सकती और अगर आगामी चुनावों में उसे अपनी जीत का सिलसिला बरकरार रखना है तो इसके लिए उसे राहुल की ओर से मिल रही चुनौतियों का समय रहते कोई ठोस तोड़ निकालना ही होगा। वैसे भी पार्टी के तमाम शुभचिंतकों को बखूबी पता है कि जिस तरह से भाजपा के जनाधार में सेंध लगने की शुरूआत हो गई है उसे समय रहते नहीं रोका गया तो लोकसभा चुनाव में पिछला प्रदर्शन दोहरा पाना निहायत ही नामुमकिन हो जाएगा। गुजरात चुनाव के नतीजों ने भाजपा को किस कदर मायूस किया है इसका सहज अंदाजा इसीसे लगाया जा सकता है कि चुनावी नतीजा सामने आने के फौरन बाद मीडिया के माध्यम से देश को संदेश देने के क्रम में पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने एक बार भी यह जिक्र नहीं किया कि पिछली बार के मुकाबले इस बार उन्हें काफी कम सीटें क्यों मिली हैं। वे बार-बार वोटों में एक फीसद की बढ़ोत्तरी की दुहाई देते रहे और इसे ही बड़ी उपलब्धि बताते रहे। लेकिन अगर उनकी बात को सही माना जाए तो इस लिहाज से भी भाजपा की हार ही हुई है क्योंकि कांग्रेस के वोट में तो इस बार साढ़े चार फीसदी की वृद्धि हुई है। सच तो यह है कि बीते लोकसभा चुनाव में भाजपा को जितने वोट मिले थे उसे अगर विधानसभा वार देखा जाए तो पार्टी के खाते में 160 से अधिक सीटें आनी चाहिए थीं और इसी वजह से भाजपा ने भी 150 से अधिक सीटें जीतने का लक्ष्य सामने रखकर चुनाव लड़ा था। लेकिन गुजरात में निर्णायक साबित हुआ नोटा का वह बटन जिसने कांग्रेस की दस सीटें कम करा दीं और रही सही कसर बसपा व राकांपा सरीखी तीसरी ताकतों ने पूरी कर दी जिन्होंने तकरीबन एक दर्जन से अधिक सीटों पर गैर-भाजपाई वोटों में सेंध लगाकर कांग्रेस की उम्मीदों पर पानी फेर दिया। इस तरह भाजपा की जीत की पटकथा तैयार हुई और दहाई के अंकों में सिमट कर पार्टी किसी तरह अपनी सरकार बचाने में कामयाब हो गयी। लेकिन जिन परिस्थितियों में अपनी लाज बचाते हुए गुजरात की सत्ता पर अपनी पकड़ बरकरार रखने में भाजपा कामयाब हुई है उसके बाद स्वाभविक तौर पर भावी रीति-नीति पर चर्चा करके निष्कंटक राह तलाशने की जद्दोजहद होनी ही है। वैसे भी अमित शाह यह स्वीकार कर चुके हैं कि गुजरात के नतीजों पर स्थानीय नेतृत्व के साथ चिंतन अवश्य किया जाएगा लेकिन वे कहें या ना कहें सच यही है कि जब गुजरात के सबसे सुरक्षित माने जानेवाले गढ़ में भाजपा को लाज का संकट उत्पन्न हो सकता है तो यह निश्चित तौर पर खतरे संकेत है और इसका राष्ट्रव्यापी असर दिखने की संभावना से कतई इनकार नहीं किया जा सकता है। दूसरी तरफ कांग्रेस के नए निजाम की आक्रामकता और तेवरों ने विपक्ष का पूरा कलेवर ही बदल कर रख दिया है। गैर-भाजपाई ताकतों के बीच कांग्रेस के नेतृत्व की स्वीकार्यता को अब कहीं से भी चुनौती मिलने की उम्मीद नहीं बची है। बिखरे हुए विपक्ष का फायदा उठाते हुए भाजपा ने जो राज कायम किया है उसकी इस हकीकत को नकारा नहीं जा सकता है कि लोकसभा चुनाव में भी भाजपा को तकरीबन 32 फीसदी वोट ही मिले थे जबकि उसके खिलाफ 68 फीसदी वोट पड़े थे। लेकिन विरोधी वोटों के बंटवारे ने लोकसभा में भी भाजपा को जीत दिलाई और आज की तारीख में 19 राज्यों में उसकी प्रत्यक्ष या परोक्ष सरकार बनवा दी है। ऐसे में विपक्ष के समक्ष सिर्फ वोटों का बिखराव रोकने की चुनौती है जबकि भाजपा को अब अपने दम पर जनसमर्थन जुटा कर सत्ता पर अपनी पकड़ बरकरार रखनी है। जाहिर तौर पर असली चुनौती का वक्त अब बेहद करीब आता जा रहा है क्योंकि इस बार मौजूदा सरकार का सही मायनों में आखिरी बजट ही पेश होना है। अगले साल इसे अंतरिम बजट के तौर पर महज औपचारिकता निभाने का ही मौका मिल पाएगा। ऐसे में अब अगले एक साल की कमाई ही वह पूंजी होगी जिसके दम पर सियासी बाजार में चुनावी बहार लूटने या गांठ की दौलत लुटाने की नौबत आएगी। लिहाजा ऐसे मौके पर होनेवाले भाजपाइयों के जुटान को पिछली मेहनत की थकान से उबार कर समय रहते जमीनी स्तर पर सक्रिय करने में हासिल होनेवाली कामयाबी ही पार्टी की भावी दशा-दिशा तय करेगी। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ 
@नवकांत ठाकुर  #Navkant_Thakur

शुक्रवार, 15 सितंबर 2017

‘खतरा, खटका या सत्य का संकेत!’

‘खतरा, खटका या सत्य का संकेत!’

कोई भी बदलाव अनायास ही नहीं होता। उसके पीछे कोई वजह जरूर होती है और उसका कुछ ना कुछ संकेत पहले से ही अवश्य दिखने लगता है। इस लिहाज से देखा जाए तो दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ के चुनाव का नतीजा काफी कुछ कहता हुआ दिख रहा है। जिस डूसू में साल 2013 से ही कांग्रेस की छात्र इकाई एनएसयूआई को जीत नसीब नहीं हो पाई थी वहां इस बार उसने अध्यक्ष के साथ ही उपाध्यक्ष पद पर भी कब्जा कर लिया है जबकि संघ के अनुषांगिक व भाजपा के सहोदर छात्र संगठन एबीवीपी के खाते में सिर्फ सचिव व संयुक्त सचिव का पद ही आया है। भले भाजपा की ओर से इस हार पर कोई निराशा नहीं व्यक्त की जा रही हो और यह बताया जा रहा हो कि जिन सीटों पर जीत हासिल हुई है उसमें जीत-हार का फासला हजारों में है जबकि जिन पदों पर हार हुई है उस पर जय-पराजय का अंतर महज सैकड़ों में है। लेकिन सिर्फ इतना कह देने भर से खतरे की उस घंटी की आवाज को दबाया नहीं जा सकता है जो दूर से आती हुई सुनाई पड़ रही है। इस आवाज को महज भ्रम भी माना जा सकता था लेकिन इससे कुछ ही दिन पहले बवाना विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में भाजपा को झेलनी पड़ी करारी शिकस्त और महज पांच दिन पूर्व जेएनयू छात्र संघ के चुनाव में अपेक्षित सफलता से महरूम रहने की हकीकत से यह स्पष्ट हो जाता है कि खतरे की घंटी की आवाज कोई भ्रम नहीं है बल्कि वह सच में सियासी फिजा में गूंज रही है। भाजपा का प्रदर्शन मध्य प्रदेश के स्थानीय निकायों के चुनावों में भी उस स्तर का नहीं रहा जैसी उसे उम्मीद थी और पंजाब विधानसभा चुनाव में भी नतीजा उसके खिलाफ ही रहा था। यानि ‘पार्लियामेंट से लेकर पंचायत तक’ हर स्तर पर जीत का परचम लहराने और कांग्रेस मुक्त भारत बनाने का जो अभियान भाजपा ने छेड़ा था उसकी सफलता का ग्राफ ढ़लान की ओर बढ़ने की अटकलों को सिरे से खारिज कर देना निहायत ही मुश्किल होता जा रहा है। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह दिख रही है युवाओं के बीच भाजपा की लोकप्रियता में उत्तरोत्तर कमी आना। भाजपा के राष्ट्रवाद का खुमार का असर कम होने की एक बड़ी वजह युवाओं के सपने पूरे नहीं हो पाने को भी माना जा सकता है जिसके कारण प्रधानमंत्री मोदी की मीठी बातें अब उन्हें इस हद तक लुभा नहीं पा रही हैं कि वे भाजपा का जुनून की हद तक समर्थन करें। बेशक इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता है कि पिछले कई दशकों के बाद भारत को सशक्त, सक्षम व बेहतर नेतृत्व मिला है लेकिन इस सरकार ने जितने बेहतरीन प्रदर्शन की आशाएं जगाई थी उन अपेक्षाओं को पूरी तरह पूरा करने में यह सफल नहीं हो पाई है। खास तौर से युवाओं से जुड़े मसलों पर सरकार का प्रदर्शन निहायत औसत रहा है जिसके नतीजे में युवा मतदाताओं का काफी बड़ा वर्ग अब मोदी सरकार के करिश्माई नेतृत्व को लेकर निराश होता जा रहा है। अव्वल तो शिक्षा की सुलभता और गुणवत्ता के मामले में किसी ठोस सुधार की पहल होती हुई नहीं दिखी है और दूसरे शिक्षण-प्रशिक्षण के बाद रोजगार की दुर्लभता बदस्तूर बरकरार है। ऐसे में युवाओं का ना सिर्फ अपने भविष्य को लेकर चिंतित व निराश होना स्वाभाविक है बल्कि मोदी सरकार द्वारा दिखाए गए सपनों के पूरा हो पाने को लेकर निराशा में इजाफा होना भी लाजिमी ही है। जाहिर है कि इस सबका सीधा व प्रत्यक्ष असर चुनावों में ही दिखता है और छात्र संघों के चुनाव का नतीजा तो हमेशा से ही भविष्य का संकेत देता आया है। खास तौर से दिल्ली विश्वविद्यालय का कैंपस तो देश के सियासी भविष्य का संकेत देने के लिए पहले से ही विख्यात है। ऐसे में भाजपा को यह चिंता तो करनी ही होगी कि सियासी समुद्र में सफलता से दौड़ रही उसकी नाव में जो छेद होते दिख रहे हैं उसे समय रहते बंद किया जाए और हार के कारणों पर विचार करके उन कमियों व खामियों को सुधारने पर अपना ध्यान केन्द्रित किया जाए जिसके कारण उसकी बातें जादू जैसा असर नहीं दिखा पा रही है। बेशक ममता बनर्जी और शरद पवार सरीखे नेताओं का मानना हो कि जब तक मोदी के मुकाबले राहुल गांधी का चेहरा आगे बढ़ाया जाता रहेगा तब तक भाजपा के विजय रथ को लगातार आगे बढ़ने से कतई नहीं रोका जा सकता है। लेकिन इतिहास पर गौर करें तो राहुल अकेले ऐसे शीर्ष कांग्रेसी नेता नहीं हैं जिसे बेवकूफ व कमजोर माना गया हो बल्कि एक समय गूंगी गुडिया बताकर इंदिरा गांधी का भी मजाक उड़ाया जाता था और राजीव गांधी के व्यक्तित्व व विचारों को यह कह कर गंभीरता से नहीं लिया जाता था कि उन्हें व्यावहारिक बातों की कोई जानकारी ही नहीं है। लिहाजा मौजूदा वक्त में अगर राहुल को पप्पू कहकर दुष्प्रचारित किया जा रहा है तो इसे इतिहास द्वारा खुद को दोहराए जाने की नजर से भी देखा जा सकता है। लेकिन वक्त के साथ इंदिरा-राजीव की छवि भी बदली और राहुल की भी बदल सकती है। ऐसे में राहुल के प्रति अगर लोगों की संवेदना जाग गई और उनकी मासूमियत और इमानदारी पर मतदाताओं ने ममता दिखा दी तो भाजपा को सत्ता छोड़कर भागने के लिए भी मजबूर होना पड़ सकता है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’  @नवकांत ठाकुर #Navkantthakur

गुरुवार, 10 अगस्त 2017

‘सतह पर कुछ और है गहराई में कुछ और’

‘सतह पर कुछ और है गहराई में कुछ और’

अब तक यही होता आया है कि बेमानी मसलों पर मारामारी के कारण असली मुद्दे हाशिए पर रह जाते थे। जो काम होना चाहिए वह हो नहीं पाता था और बेमतलब का बवाल कटता रहता था। लेकिन मौजूदा निजाम की कार्यप्रणाली इस तरह की है कि जिसमें बवाल अपनी जगह कटता रहता है और काम अपनी जगह होता रहता है। ऐसे में विरोधियों के लिए मुश्किल यह हो जाती है कि आखिर वे सरकार का घेराव किस मसले पर करें। असली काम तो इतनी चतुराई से अंजाम दिया जाता है कि उसका सीधे तौर पर विरोध करने की किसी की हिम्मत ही नहीं होती और जिन कथित ज्वलंत मसलों पर विरोध की आंच सुलगाने का प्रयास किया जाता है उस पर सरकार के रणनीतिकार निर्णायक तौर पर ऐसा पानी फेर देते हैं कि विरोध का मसला ही समाप्त हो जाता है। मिसाल के तौर पर विपक्ष ने सरकार को दलित विरोधी साबित करने की पुरजोर कोशिश की लेकिन एक ही झटके में दलित समाज के व्यक्ति को राष्ट्रपति पद पर बिठाकर सरकार ने मुद्दे को ही समाप्त कर दिया। विपक्ष ने गौ-रक्षकों की गुंडागर्दी का मसला उठाया तो प्रधानमंत्री ने खुद ही उसके खिलाफ इतने कड़े तेवर दिखा दिए कि विपक्ष के पास कहने के लिए कुछ बचा ही नहीं। हर वह मसला जिसे आधार बनाकर सरकार पर वार करने का प्रयास किया गया उसे पूरी तरह भोथरा व ध्वस्त करने में सरकार ने कोई कसर नहीं छोड़ी। यानि विपक्ष की हर चालबाजी को सरकार ने अपनी चतुराई से नाकाम करने का सिलसिला लगातार जारी रखा हुआ है लेकिन सरकार जिस चालाकी के साथ अपने मूलभूत सैद्धांतिक व वैचारिक प्रतिबद्धताओं को अमली जामा पहनाने में जुटी हुई है उस तरफ या तो विपक्ष की नजर ही नहीं जा रही है या फिर उसकी काट कर पाने का कोई ठोस हथियार उपलब्ध नहीं होने के कारण उसकी अनदेखी करना ही बेहतर समझा जा रहा है। वास्तव में देखा जाए तो सत्तारूढ़ भाजपा पर अक्सर यह आरोप लगता रहा है कि जब वह सत्ता में आती है तो सिद्धांतों से पल्ला झाड़ते हुए अपने वैचारिक मसलों से किनारा कर लेती है। हालांकि इस बात पर अलग से बहस हो सकती है कि भाजपा ने सिद्धांतों व विचारों का कितना पोषण और कितना दोहन किया है लेकिन एक बात पर कोई विवाद नहीं हो सकता कि सिद्धांतों को सर्वोपरि मानने से भाजपा ने कभी परहेज नहीं बरता है। मसला चाहे राम मंदिर का हो, समान नागरिक संहिता का हो या फिर धारा 370 का। इन मसलों पर सैद्धांतिक व वैचारिक प्रतिबद्धता दर्शाने में भाजपा कभी नहीं हटी। लेकिन मसला है कि अब तक उसके पास राजनीतिक तौर पर इतनी ताकत ही नहीं थी कि वह अपने सिद्धांतों व विचारों को अमली जामा पहनाने का सपना भी देख सके। लेकिन अब मौका भी मिला है और पार्टी इस मौके को पूरी तरह भुना भी रही है। तभी तो एक तरफ उसने सैद्धांतिक तौर पर अपेक्षित सियासी सपनों को खुद ही पूरा करना आरंभ कर दिया है जबकि उन मामलों को अदालत के माध्यम से निपटाने का निर्णायक प्रयास किया जा रहा है जो संवैधानिक व कानूनी प्रक्रियाओं से जुड़े हुए हैं। सच पूछा जाए तो भाजपा से सैद्धांतिक अपेक्षाएं यही रही हैं कि वह राम मंदिर बनाने, धारा 370 हटाने और समान नागरिक संहिता लागू कराने की राह तैयार कर दे और ‘सब सुधरेंगे तीन सुधारे, नेता कर कानून हमारे’ के नारे को हकीकत में बदल दे। जहां तक नारे को हकीकत में बदलने की बात है तो इसमें मोदी सरकार ने काफी हद तक सफलता हासिल कर ली है। नेताओं को सुधारने के लिए बेनामी कानूनों में संशोधन, कालेधन के खिलाफ लड़ाई, चुनाव सुधार की प्रक्रिया और लालबत्ती की समाप्ति सरीखे कदम उठाए गए है जबकि जीएसटी लागू करके ‘एक देश एक कर’ के विचार को मूर्त रूप देते हुए करों में सुधार का भी इंतजाम कर दिया गया है। इसके अलावा अंग्रेजों के जमाने से चले आ रहे बेमानी, अप्रासंगिक व उलझाऊ कानूनों को थोक के भाव में निरस्त करने और मौजूदा कानूनों को चुस्त-दुरूस्त करके व्यवस्था को सरल-सुगम तरीके से संचालित करने की कोशिशें युद्धस्तर पर जारी हैं। इसके अलावा पार्टी की पहचान से जुड़े सैद्धांतिक व वैचारिक मसलों की बात करें तो जहां एक ओर राम मंदिर के मामले की सर्वोच्च न्यायालय में त्वरित सुनवाई की शुरूआत होने जा रही है वहीं दूसरी ओर समान नागरिक संहिता के एक बड़े तकाजे को पूरा करने के लिए सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में ऐसा इंतजाम कर दिया है कि यह कुप्रथा अब समाप्त होने की कगार पर आ गई है। इस मामले की सुनवाई पूरी हो चुकी है और तीन तलाक की व्यवस्था के निरस्त होते ही पर्सनल लाॅ की व्यवस्था महत्वहीन हो जाएगी और स्वाभाविक तौर पर समान नागरिक संहिता को लागू करने की राह निकल आएगी। रहा सवाल धारा 370 का तो उसकी जान अटकी है संविधान के अनुच्छेद 35-ए में जिसे वर्ष 1954 में संसद से पारित कराए बिना सिर्फ राष्ट्रपति की सहमति के सहारे संविधान का हिस्सा बना दिया गया। जाहिर तौर पर इसकी संवैधानिक मान्यता को सर्वोच्च न्यायालय में दी गई चुनौती अपना रंग अवश्य ही दिखाएगी। यानि तयशुदा लक्ष्य की दिशा में सरकार इतनी दूर निकल गई है कि उसकी राह के आड़े आ पाना विपक्ष के लिए संभव ही नहीं दिख रहा है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @नवकांत ठाकुर #NavkantThakur

सोमवार, 20 मार्च 2017

महज संयोग नहीं है यूपी में योगी का योग

महज संयोग नहीं है यूपी में योगी का योग


अंतिम समय तक मुख्यमंत्री पद की दौड़ से बाहर दिखाई दे रहे अजय सिंह नेगी अर्थात योगी आदित्यनाथ का नाम निर्णायक मौके पर धूमकेतु की तरह चमकना और सूबे की सियासत उनकी मुट्ठी में आ जाना महज सामान्य संयोग नहीं है। तमाम बड़े चेहरों व नामों को दरकिनार करते हुए अगर भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने योगी पर अपना भरोसा दिखाया है तो इसकी सबसे बड़ी वजह है अपने वायदों को पूरा करने के प्रति मतदाताओं को आश्वस्त करना और विरोधियों की भावी रणनीतियों का पहल से ही जवाब तैयार कर लना। मुख्य रूप से 25 महीने बाद होनेवाले लोकसभा चुनाव के मद्देनजर भाजपा ने योगी को यूपी के मोर्चे पर तैनात करके ऐसा जाल बिछा दिया जिसमें उलझने से बचने में विरोधियों को दांतों तले पसीना आ जाए। साथ ही अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की जिस नीति के तहत ना सिर्फ सपा-कांग्रेस की जोड़ी ने बल्कि बसपा ने भी भाजपा के समक्ष हालिया चुनाव में चुनौती पेश की थी उसके खिलाफ बढ़-चढ़कर मतदान करते हुए अगर सूबे की जनता ने भाजपा को दो-तिहाई से भी अधिक सीटों के प्रचंड बहुमत के साथ कुर्सी पर बिठाने का फैसला किया तो इसका सीधा मतलब यही है कि जनता को भाजपा से योगी सरीखे मुख्यमंत्री की ही अपेक्षा थी। योगी की व्यक्तिगत छवि ठीक वैसी ही है जैसा वायदा करके भाजपा ने यूपी के मतदाताओं को भरोसे में लिया है। मसलन अवैध बूचड़खानों को रातोंरात बंद करने का जो वायदा भाजपा ने किया है उसके पूरा होने का भरोसा देना योगी की छवि के बूते की ही बात है क्योंकि उनकी सुबह ही गायों को अपने हाथों से चारा खिलाने के साथ होती है। इसी प्रकार अवैध कब्जे वाली जमीनों को दबंगों से छीनकर उसे उसके असली हकदारों को वापस लौटाने का भाजपा ने जो चुनावी वायदा किया था उसके पूरा होने का भरोसा भी योगी की छवि दिला रही है क्योंकि बकायदा जनता दरबार लगाकर पूर्वांचल के वंचितों, शोषितों व पीड़ितों को जायज हक दिलाने व दबंगों को औकात में रहने के लिए मजबूर करने को लेकर योगी पहले से ही विख्यात हैं। इसी प्रकार सांसद के तौर पर स्थानीय प्रशासन को अपने मनमुताबिक काम करने के लिये मजबूती से मजबूर करनेवाले योगी के बारे में यह धारणा भी बनी हुई है कि नौकरशाहों के मायाजाल में वे कतई नहीं फंस सकते बल्कि नौकरशाही को इनके मनमुताबिक काम करना ही पड़ेगा। स्थापित छवि के मुताबिक योगी पर ना किसी की धौंस चल सकती है और ना ही दबाव काम आ सकता है। इनकी छवि के साथ इमानदारी की चमक भी पहले से जुड़ी हुई है लिहाजा इस पर विश्वास नहीं करने का कोई कारण नहीं है कि उनके कार्यकाल में कोई भी योजना भ्रष्टाचार की भेंट हर्गिज नहीं चढ़ेगी। यानि समग्रता में देखा जाये तो हवा का रूख पहचानने का दावा करनेवालों ने भले ही योगी को मुख्यमंत्री पद का प्रमुख दावेदार मानने से इनकार कर दिया हो लेकिन भाजपा ने चुनाव के दौरान अपना जो संकल्प पत्र प्रस्तुत किया था उसके सबसे करीब अगर सूबे के किसी की भाजपाई नेता की छवि दिखाई देती है तो वे योगी आदित्यनाथ ही हैं। चाहे प्रदेश को वंशवाद, परिवारवाद या तुष्टिकरण के चंगुल से बाहर निकालने की कसौटी पर परखें अथवा बहुसंख्यक मतदाताओं को लुभाने के लिए किये गये सांकेतिक वायदों को आधार बनाकर जांचें। हर नजरिये से योगी ही प्रधानमंत्री मोदी के वायदों को पूरा करने की सबसे मजबूत स्थिति में दिखाई पड़ते हैं। लिहाजा इतना तो स्पष्ट है कि यूपी के साथ योगी का जो योग हुआ है वह पहले से ही सोची समझी रणनीति का हिस्सा है ना कि उस कथित दबाव का नतीजा है जो योगी के समर्थकों ने पार्टी नेतृत्व पर बनाने की कोशिश की थी। इसके अलावा योगी को आगे करने की सबसे बड़ी वजह है भावी राजनीतिक चुनौतियों का मजबूती से सामना करने के लिये अभी से निर्णायक पहल कर लेना। क्योंकि माना यही जा रहा है कि दो साल बाद होनेवाले लोकसभा के चुनाव में तमाम गैर-भाजपाई दलों का एक मंच पर आना तय ही है। ऐसे में स्वाभाविक है कि राजनीति होगी ध्रुवीकरण की और अगर अल्पसंख्यकों को अपने साथ जोड़ने के लिए बाकी दल परस्पर गठबंधन करेंगे तो स्वाभाविक तौर पर बहुसंख्यकवाद की राजनीति को धार देने के अलावा भाजपा के पास दूसरा कोई विकल्प नहीं बचेगा। इस लिहाज से भी देखें तो भाजपा के लिये योगी से अधिक मुफीद चेहरा दूसरा कोई नहीं हो सकता है जिसकी स्वीकार्यता गोरखपुर से लेकर गाजियाबाद तक हो। हालांकि विधायक दल का नेता चुने जाने के फौरन बाद अपने पहले संबोधन में योगी ने साफ कर दिया है वे ‘सबका साथ सबका विकास’ की नीति पर चलते हुए प्रदेश को विकास की राह पर आगे ले जाने के लिये पूरी तरह कृतसंकल्प हैं और अपनी कट्टर हिन्दूवादी छवि को उन्होंने फिलहाल पीछे धकेल देना ही बेहतर समझा है। इसकी वजह भी बिल्कुल साफ है कि चुंकि इस दफा अल्पसंख्यक समुदाय की महिलाओं के काफी बड़े वर्ग ने तीन तलाक के मसले पर भाजपा की नीति से प्रभावित होकर उसे अपना समर्थन दिया है लिहाजा वह अपनी तरफ से कट्टर हिन्दुत्ववादी राह अपनाने की पहल हर्गिज नहीं करेगी। लेकिन ‘अतिशय रगड़ करे जो कोई, अनल प्रगट चंदन से होई’ की नौबत से निपटने में योगी का मुकाबला प्रदेश भाजपा का कोई दूसरा नेता कतई नहीं कर सकता। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’   @ नवकांत ठाकुर # Navkant Thakur

गुरुवार, 16 फ़रवरी 2017

‘खता किसी और की, सजा किसी और को’

‘खता किसी और की, सजा किसी और को’

पुरानी कहावत है कि ‘खेत खाय गधा और मार खाए जुलाहा।’ यह बात सियासत में जितनी सटीकता से लागू होती है उतनी अन्य क्षेत्रों में लागू नहीं होती। यानि सियासत में सिर्फ अपनी ही गलतियों का खामियाजा नहीं भुगतना पड़ता। कई बार ऐसे मामले भी सिरदर्दी का सबब बन जाते हैं  जिस खता को अंजाम देने के बारे में कभी सोचा भी ना गया हो। यही हुआ था बिहार विधानसभा के चुनाव में। कहां तो भाजपा ने ही आनुपातिक तौर पर सबसे अधिक दलित, पिछड़े व आदिवासी समाज के नेताओं को प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री और मंत्री बनने का मौका दिया। देश में आरक्षण की व्यवस्था को लागू करने के लिये कमंडल से पहले मंडल की लड़ाई में पुरजोर हिस्सेदारी की और ‘एकात्म मानव दर्शन’ व ‘अंत्योदय’ सरीखे सिद्धांतों को सियासत का आधार बनाया। लेकिन आरक्षण की स्थापित अवधारणा पर पुनर्विचार की जरूरत बताकर आरएसएस प्रमुख ने ऐसी गलती कर दी जिसका भाजपा को इतना जबर्दस्त खामियाजा भुगतना पड़ा कि उसे याद करके भाजपाई रणनीतिकार आज भी सिहर उठते हैं। बिहार चुनाव के ऐन पहले संघ प्रमुख की जुबान से निकली उस बात को विरोधी महागठबंधन ने इस कदर जमकर भुनाया कि भाजपा का पूरी तरह भट्ठा ही बैठ गया। जबकि हकीकत तो यह है कि मंडल कमीशन की रिपोर्ट को लागू कराने की लड़ाई में अग्रणी भूमिका निभानेवाली भाजपा की केन्द्र या प्रदेशों की किसी सरकार ने आरक्षण व्यवस्था के साथ छेड़छाड़ करने के बारे में कभी सोचना भी गवारा नहीं किया है। लेकिन बात चुंकि पार्टी की मातृ-संस्था कहे जानेवाले संघ के मुखिया ने कही थी तो इसे इस रूप में प्रचारित किया गया मानो भाजपा की सरकार बनते ही आरक्षण व्यवस्था को समाप्त कर दिया जाएगा। जाहिर है कि संघ की उस गलती का भाजपा को खामियाजा तो भुगतना ही था। लेकिन मजाल है कि एक बार की गलती से संघियों ने कोई सीख ली हो। तभी तो मौजूदा पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव से पहले भी संघ परिवार के शीर्ष विचारकों में शुमार होनेवाले मनमोहन वैद्य ने उन्हीं बातों को दोहरा दिया जिसे बयां करके संघ प्रमुख बिहार चुनाव में पहले ही भाजपा का बंटाधार कर चुके हैं। हालांकि वैद्य के बयान की मारक क्षमता को देखते हुए ना सिर्फ संघ की ओर से औपचारिक तौर पर इसका खंडन किया गया बल्कि भाजपा ने भी उनके बयान से तत्काल ही दूरी बना ली और जल्दी ही वैद्य को भी सफाई देने के लिये सामने आना पड़ा। लेकिन बसपा सुप्रीमो मायावती ने वैद्य के इन विचारों को संघ-भाजपा की अंदरूनी सोच साबित करने में रात-दिन एक कर दिया। अब इसका असर भी दिखने लगा है क्योंकि यूपी में जिस बसपा को सभी ने समाप्त मानना शुरू कर दिया था उसने अगर सत्ता के संघर्ष को त्रिकोणीय स्वरूप दे दिया है तो निश्चित तौर पर इसमें वैद्य के विचारों की भूमिका को कतई सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता है। हालांकि भाजपा को दूसरों की गलती का खामियाजा सिर्फ यूपी में ही नहीं भुगतना पड़ रहा है बल्कि इससे कहीं अधिक मार उसे पंजाब और उत्तराखंड में झेलनी पड़ रही है जहां उसने ऐसे लोगों को अपने साथ जोड़ा हुआ है जिनकी करनी का फल उसे ही भुगतना पड़ रहा है। पंजाब की बात करें तो वहां की सत्ता में भाजपा की भूमिका तो सिर्फ छोटे सहयोगी की ही थी। लेकिन अकालियों की करतूतों के कारण ऐसी भद पिटी है कि इस दफा राजग को तीसरे स्थान पर रहना पड़े तो कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी। जाहिर है कि इसकी सबसे अधिक बदनामी केन्द्र की मोदी सरकार के अलावा भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व को ही झेलनी पड़ेगी। कोई यह तो कहेगा नहीं कि अकालियों की सरकार गिर गयी। हर कोई इसे इसी रूप में प्रचारित करेगा कि भाजपा की पकड़ से पंजाब भी निकल गया। इसी प्रकार उत्तराखंड में आज अगर भाजपा को कांग्रेस की कथित ‘वन मैन आर्मी’ से कड़ी टक्कर झेलनी पड़ी है तो इसकी इकलौती वजह है कांग्रेस के उन सूरमाओं को संगठन में शामिल करना जिन्होंने लंबे अर्से तक कांग्रेस में रहकर ऐसे-ऐसे कारनामों को अंजाम दिया कि सूबे की जनता उन्हें कतई माफ करने के मूड में नहीं दिख रही है। खास तौर से जिस केदारनाथ आपदा के मामले को लेकर भाजपा ने प्रदेश की रावत सरकार का घेराव करने की रणनीति अपनाई थी उसके असली कर्ता-धर्ता तो वे माने जाते हैं जो उस समय प्रदेश के मुख्यमंत्री थे और अब पाला बदलकर भाजपा में शामिल हो गये हैं। हालांकि भाजपा ने उन्हें टिकट देने से तो परहेज बरत लिया लेकिन उनके बेटे को टिकट से वंचित करना संभव नहीं हो सका। इसके अलावा कांग्रेस के टिकट पर विधायक चुने जाने के बाद साढ़े चार साल तक सत्ता की मलाई का लुत्फ उठानेवाले एक दर्जन से भी अधिक विधायक इस दफा भाजपा के टिकट पर चुनाव मैदान में दिखाई पड़ रहे हैं। इसीका नतीजा है कि वहां भाजपा से उन सवालों का भी जवाब मांगा जा रहा है जिस गुनाह से उसका दूर का भी वास्ता नहीं है। खैर, इस तरह के मामलों को समग्रता में देखने से इतना तो स्पष्ट हो ही जाता है कि एक बार के लिये दुश्मन की गलतियों का फायदा उठाने में भूल करके भी जीत उम्मीद की जा सकती है लेकिन हिमायतियों की गलतियों का खमियाजा भुगतने से बच पाना तो नामुमकिन ही है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’  @ नवकांत ठाकुर # Navkant Thakur

मंगलवार, 31 जनवरी 2017

‘सियासत से संवेदना की बेमानी उम्मीद’

‘सियासत से संवेदना की बेमानी उम्मीद’


उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिये भाजपा की केन्द्रीय चुनाव समिति द्वारा किये गये टिकट वितरण ने ऐसी आग लगाई है जिसकी चपेट में आकर सूबे के अधिकांश भाजपाईयों की उम्मीदें स्वाहा हो गयी हैं। कहां तो उम्मीद जताई जा रही थी कि जिन जमीनी नेताओं ने लोकसभा की 80 में से 72 सीटों पर कमल खिलाने में अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी उन्हें पुरस्कार के तौर पर विधानसभा का टिकट अवश्य मिलेगा और कहां तो हालत यह हो गयी है कि सूबे के कई जनपदों की तमाम सीटों पर उन लोगों को टिकट दे दिया गया है जो ना सिर्फ दूसरे दलों से आये हैं बल्कि लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा की हार सुनिश्चित कराने के लिये उन्होंने एड़ी-चोटी का जोर लगाया हुआ था। बात चाहे बस्ती, हरदोई व उन्नांव की करें अथवा बाराबंकी, फैजाबाद व अम्बेडकर नगर जनपद की। सूबे के हर इलाके की तस्वीर कमोबेस एक सी ही है। यहां तक कि प्रदेश का हृदय क्षेत्र कहे जानेवाले लखनऊ में भी जब कुल नौ में से सात सीटें उन लोगों को दे दी जाती हों जिनका पूरा राजनीतिक जीवन ही भाजपा को कोसते-गरियाते गुजरा है तो फिर बाकी इलाकों का तो कहना ही क्या। हालांकि पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने साफ कर दिया है कि इस दफा टिकट वितरण का इकलौता पैमाना उम्मीदवार की जीत दर्ज कराने की संभावना को ही बनाया गया है। जिस सीट पर जिसके जीत की संभावना सबसे मजबूत नजर आयी उसे टिकट दे दिया गया। इसमें यह नहीं देखा गया है कि टिकट का दावेदार वैचारिक व सैद्धांतिक तौर पर पार्टी के कितने करीब या दूर रहा है। यानि पार्टी को तो सिर्फ जीत से मतलब है। उसे कोई फर्क नहीं पड़ता कि टिकट वितरण में 40 फीसदी से भी अधिक सीटें बाहरी लोगों को देने के कारण किस कार्यकर्ता की भावना आहत हुई है या किसकी संवेदना को सदमा पहुंचा है। कुल मिलाकर संगठन ने तो अपनी राह तय कर ली है और लगे हाथों पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष ने यह ऐलान भी कर दिया है कि घोषित उम्मीदवारों की सूची में फेरबदल की अब कोई गुंजाइश नहीं है। लेकिन अब असली परेशानी तो उस कार्यकर्ता को झेलनी है जिसे जमीन पर संगठन की जीत सुनिश्चित कराने के लिये मतदाताओं मनाना, समझाना व रिझाना है। उसकी समझ में खुद ही नहीं आ रहा कि आखिर ऐसा कैसे हो गया कि जिस जमीन को उसने दशकों की मेहनत से जोता-सींचा और अपने खून-पसीने की खाद से उपजाऊ बनाया वहां जब फसल काटने की बारी आई तो यह अधिकार उन लोगों को मिल गया जिन्होंने फसल का बीज ही नष्ट करने की कसम खाई हुई थी। जिनके साथ जमीनी संग्राम करते हुए कार्यकर्ताओं ने कमल खिलाने की लड़ाई लड़ी अब उनके लिये ही वोट मांगने मतदाताओं के पास वे जाएं भी तो किस मूंह से। अब तक जिनका विरोध किया उनका अचानक जयकारा लगाने के लिये भी तो 56 ईंच का ही सीना चाहिये। जमीन पर गद्दा बिछाकर हवा में गुलाटियां मारना और बात है। लेकिन सख्त-सपाट जमीन पर अचानक सिर के बल चलने की कलाकारी तो बिरलों को ही आती है। ऐसे में स्वाभाविक है कि पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के फैसलों का विरोध तो होगा ही। वह हो भी रहा है। लखनऊ से लेकर इलाहाबाद तक और बनारस से लेकर दिल्ली तक। कार्यकर्ताओं की टोली कहीं भी अपने बड़े नेताओं के विरोध का कोई मौका नहीं छोड़ रही है। लेकिन सवाल है कि सियासत से संवेदना की उम्मीद टूटने के कारण मुखर हो रहे इस विरोध के प्रति कितनी संवेदना दिखाई जाये। क्यों दिखाई जाये? सिर्फ इसलिये क्योंकि भाजपा ने कार्यकर्ताओं की संवेदना से ज्यादा जीत की संभावना को तरजीह दी है। यहां विचारणीय है कि सत्ता के बिना सिर्फ सूखी संवेदना के दम पर संगठन से कार्यकर्ताओं को क्या हासिल हो सकता है? संगठन अगर सत्ता में आने के बाद कार्यकर्ताओं की अनदेखी करे और अपने हिस्से की मलाई विरोधियों को मुहैया कराये तो इसका विरोध किया जाना चाहिये। लेकिन ऐसा होने का ना तो कोई कारण दिख रहा है और ना ही कोई परंपरा रही है। बल्कि पार्टी की जीत में ही कार्यकर्ताओं का हित निहित रहता है। इस बात को जो कार्यकर्ता नही समझना चाहे उसका तो भगवान भी भला नहीं कर सकते। भलाई इसी में है कि विरोधी को भी अपना बनाया जाये। इसमें तो किसी का भला नहीं है कि अपनों का ही विरोध किया जाये। जिसे पार्टी ने टिकट दिया है उसकी भी अब जिम्मेवारी है कि वह जमीनी कार्यकर्ताओं की भावनाओं को समझे और उनके साथ तालमेल बनाकर आगे बढ़े। साथ ही कार्यकर्ताओं की भी जिम्मेवारी है कि वे पार्टी द्वारा पेश किये गये प्रत्याशी की जीत सुनिश्चित कराने में अपनी पूरी ताकत झोंक दें। वैसे भी सेना में किसे किस मोर्चे पर लगाया गया है यह बात मायने नहीं रखती। मायना होता है सेना की जीत का। जीती हुई राम की सेना का यथासंभव सहयोग करनेवाली गिलहरी से लेकर लंगूर-वानरों को भी आज तक स्नेह व सम्मान हासिल होता आ रहा है। वैसे भी जब भगवान कहे जानेवाले श्रीराम को भी अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिये विरोधी पक्ष के विभिषण को अपने साथ जोड़ना पड़ा था तब आज की सियासत में अगर विरोधी खेमे टूटकर आने वालों को हर जगह सिर-आंखों पर बिठाया जा रहा है तो इसमें गलत ही क्या है? ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर # Navkant Thakur

सोमवार, 24 अक्टूबर 2016

’मन-मन भावे, मूड़ हिलावे‘

’मन-मन भावे, मूड़ हिलावे‘


किसी के भी चाल-चरित्र व स्वभाव के बारे में जितनी सही व पूरी जानकारी उसके धुर विरोधी के पास होती है उतनी किसी और के पास हो ही नहीं सकती। तभी तो भाजपा को अगर सबसे सही तरीके से किसी ने जाना, समझा और पहचाना है, तो वे हैं सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव। खास तौर से ‘मुंडे-मुंडे मतिर्भिन्ना’ का दिखावा करके मतदाताओं व विरोधियों को भ्रम व असमंजस में डालने के भाजपा के जिस चरित्र के प्रति मुलायम लगातार सबको आगाह करते रहे हैं उसी का मुजाहिरा किया है भाजपा की मौजूदा कूटनीति ने। यूपी विधानसभा के चुनाव में पार्टी एक हाथ में राष्ट्रवाद के झंडे और दूसरे में विकास के एजेंडे का तो सार्वजनिक तौर पर मुजाहिरा कर रही है। लेकिन राष्ट्रवादी झंडे के भीतर सांप्रदायिक मसलों का डंडा घुसेड़ने की अपनी कोशिशों को खुलकर स्वीकार करना उसे कतई गवारा नहीं हो रहा है। शायद यही भाजपा का असली स्वभाव जिसके तहत इसके तमाम नेता अधिकांश मसलों पर कभी एक सुर में बोलना गवारा नहीं करते। दूर से सुननेवालों को ऐसा लगता है मानो पार्टी के भीतर सैद्धांतिक व वैचारिक स्तर पर भारी टकराव चल रहा है। लेकिन नजदीक से देखने पर तस्वीर बदली हुई दिखती है। इसमें मजेदार तथ्य यह है कि पार्टी में सबकी राहें बेशक अलग दिखती हों लेकिन उनकी मंजिल एक ही रहती है। अब जहां लक्ष्य को लेकर कोई मतभेद या विरोधाभास ना हो वहां राहों का भेद कोई मायने नहीं रखता। लिहाजा इनका आपसी टकराव व विरोध भी अक्सर दिखावे का ही रहता है। परस्पर मतभेद तो दिखता है लेकिन उसमें मनभेद नहीं होता। मन मिला हुआ ही रहता है। दरअसल संगठनिक स्तर पर होनेवाली इस नूराकुश्ती का मकसद सिर्फ सियासी माहौल में भ्रम की स्थिति उत्पन्न करना ही रहता है। और कुछ भी नहीं। इस भ्रम के शिकार सिर्फ मतदाता ही नहीं होते बल्कि कई दफा विरोधी भी हो जाते हैं। वे समझ ही नहीं पाते कि भाजपा के किस नेता की बात का विरोध करें और किसके बयान की अनदेखी। भ्रम के इसी कुहासे में फंसकर विरोधियों की गाड़ी अक्सर डी-रेल हो जाती है और भाजपा मैदान मार ले जाती है। ऐसा ही माहौल भाजपा ने एक बार फिर बनाने का प्रयास किया है। खास तौर से यूपी विधानसभा के चुनाव को सांप्रदायिक रंग देने के मामले को लेकर। जितने मुंह उतनी बातें। सुब्रमण्यम स्वामी तो राम मंदिर निर्माण की तारीख का भी ऐलान कर चुके हैं। जबकि राजनाथ सिंह ने औपचारिक तौर पर सरकार की विवशता का इजहार करते हुए पहले ही कह दिया है कि चुंकि राज्यसभा में मोदी सरकार को बहुमत हासिल नहीं है लिहाजा संसद से कानून बनाकर मंदिर का निर्माण कर पाना फिलहाल संभव ही नहीं है। दूसरी ओर यूपी के प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य से लेकर उमा भारती तक खम ठोंकते हुए यह कहने से परहेज नहीं बरत रहे हैं कि मंदिर तो मोदी सरकार के कार्यकाल में ही बनेगा। यानि हर किसी की जुबान पर मंदिर का नाम तो है लेकिन सुर अलग-अलग है। विनय कटियार तल्ख सुर में लाॅलीपाॅप की कड़वाहट बयान करते हैं तो महेश शर्मा कहते हैं कि जो किया जा सकता है वह तो कम से कम कर लिया जाये। इस सबसे अलग भाजपा का राष्ट्रीय संगठन मंदिर मसले को आस्था का विषय बताने से तो नहीं हिचक रहा लेकिन लगे हाथों यह समझाने से भी चुक रहा है कि यूपी में मंदिर को चुनावी मुद्दा नहीं बनाया जायेगा बल्कि पार्टी विकास और सुशासन के एजेंडे पर ही चुनाव लड़ेगी। पार्टी का साफ मत है कि मंदिर बनना तो चाहिये लेकिन इसके लिये मनामानी नहीं होनी चाहिये। या तो आम सहमति के आधार पर मंदिर निर्माण हो या फिर अदालत के आदेश पर। अब आम सहमति तो बनने से रही। जब इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा किये गये विवादित जमीन के बंटवारे के दो हिन्दू लाभार्थियों के बीच अब तक सहमति नहीं बन पायी है तो तीसरे मुस्लिम पक्षकार के साथ सहमति बने भी तो कैसे? रहा सवाल अदालत के आदेश से मंदिर निर्माण का, तो इस राह के रोड़े फिलहाल समाप्त होते नहीं दिख रहे। इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फैसला सामने आये तकरीबन दो साल का वक्त गुजर जाने के बावजूद आज तक इस मामले की फाइल सर्वोच्च न्यायालय की आलमारी में धूल ही फांक रही है। अब तक इसकी सुनवाई के लिये पीठ का गठन भी नहीं हो पाया है। पता नहीं कब पीठ का गठन होगा, कब सुनवाई होगी और कब इसका फैसला आएगा। यानि पूरा मामला अभी बदस्तूर अटका-लटका ही रहनेवाला है। इस हकीकत को जानते हुए भी अगर मंदिर मसले की लहर उठाने का प्रयास हो रहा है और कटियार की तल्खी, सरकार की नरमी और संगठन की गर्मी दिख रही है तो इसमें किसी का किसी से कोई विरोधाभास नहीं है। अंदर से सब मिले हुए ही हैं। बस ऊपर से एक दूसरे से असहमत होने का दिखावा किया जा रहा है। ताकि समाज की कट्टरवादी धारा पर भी पकड़ बनी रहे और मध्यममार्गी धारा पर भी। इसके अलावा छोड़-पकड़ की इस खींचतान में विरोधियों को भी उलझाये रखा जाये ताकि वे किसी एक बयान को पकड़कर आगे ना ले जा पायें। अब ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि ‘चित भी मेरी पट भी मेरी’ की जो दोधारी तलवार भाजपा भांज रही है उसकी चपेट इसके विरोधी आते हैं या पार्टी खुद ही लहुलुहान होती है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’  @ नवकांत ठाकुर # Navkant Thakur

शनिवार, 9 अप्रैल 2016

‘जमीनी के कांधों पर जमीन की जिम्मेवारी’

‘जमीनी के कांधों पर जमीन की जिम्मेवारी’


जमीन की समझ उसे ही हो सकती है जो जमीन से जुड़ा रहा हो। लिहाजा जमीन जोतने व जोड़ने की जिम्मेवारी जमीन से जुड़े जमीनी नेताओं को सौंपने की भाजपा में जो नयी परंपरा शुरू हुई है उसका जमीनी स्तर पर सकारात्मक असर दिखने की संभावना को कतई नकारा नहीं जा सकता है। वास्तव में जबसे पार्टी के संस्थापकों और उनके द्वारा आगे लाये गये दूसरी पीढ़ी के नेताओं का संगठन पर वर्चस्व कमजोर पड़ा है तबसे संगठन में बदलाव की बेहद दिलचस्प बयार बहती हुई दिख रही है। खास तौर से पार्टी का नेतृत्व नरेन्द्र मोदी व अमित शाह के रूप में ऐसी जोड़ी के हाथों में आने के बाद से (जो ना तो किसी से उपकृत है और ना किसी पूर्वाग्रह या गुटबाजी से प्रेरित) पार्टी में अहम पदों की जिम्मेवारी सौंपे जाने की अहर्ता व अपेक्षित योग्यता की कसौटी ही मानो बदल गयी है। ना परंपराओं की परवाह की जा रही है और ना ही वर्जनाओं की। ना सिफारिश के आधार पर फैसले हो रहे हैं और ना ही विरोध की परवाह की जा रही है। अगर वर्जनाओं की परवाह या परंपराओं का अनुपालन होता तो ना तो आदिवासी बहुल झारखंड का मुख्यमंत्री गैरआदिवासी रघुवर दास को बनाया जाता और ना जाटबहुल हरियाणा की सूबेदारी गैरजाट मनोहरलाल खट्टर को दी जाती। यहां तक कि पार्टी के तमाम पुराने व स्थापित चेहरों को दरकिनार कर सर्वानंद सोनोवाल को असम का अध्यक्ष व मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने के मामले में भी ना तो सांगठनिक संतुलन की परवाह की गयी और ना परंपरागत सियासी लकीर का अनुसरण किया गया। हालांकि दिल्ली में आयातित नेत्री किरण बेदी को मुख्यमंत्री पद के दावेदारी की जिम्मेवारी सौंपने का मामला भी कुछ ऐसा ही था जिसका पार्टी को भारी खामियाजा भुगतना पड़ा। लेकिन उस एक हार से अपने लिये अपनी नयी लकीर खींचने के मौजूदा निजाम के दृढ़ निश्चय पर कोई असर नहीं पड़ा है। तभी तो आज एक बार फिर पांच राज्यों में नियुक्त किये गये नये प्रदेश अध्यक्षों की सूची में तीन नाम ऐसे हैं जो वाकई नये निजाम की नयी सोच की ओर स्पष्ट इशारा करते हैं। उत्तर प्रदेश में केशव प्रसाद मौर्य, पंजाब में विजय सांपला और तेलंगाना में डाॅ के लक्षमण को प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेवारी सौंपने के फैसले से स्पष्ट है कि तमाम ऐसे स्थापित चेहरे जो जोड़तोड़, गुटबाजी व गणेश परिक्रमा के बूते विभिन्न स्तरों पर पार्टी में लंबे समय से जमे हुए थे उनकी जगह अब ऐसे चेहरों को तरजीह दी जा रही है जो ‘नेकी कर और दरिया में डाल’ की नीति के मुताबिक संगठन की सेवा में लगे रहे हैं। उन्हें ख्वाहिश भले रही हो पार्टी से कुछ पाने की लेकिन उम्मीद तो कतई नहीं थी कि कुछ मिल पाएगा। ऐसे लोगों को जब अचानक मुख्यधारा में शीर्ष पर बिठाने की नीति पर अमल किया जाने लगा तो स्वाभाविक तौर पर यह आरोप तो लगना ही है कि मोदी-शाह की जोड़ी पार्टी पर अपनी पकड़ मजबूत करने के लिये पुराने स्थापितों की अनदेखी करते हुए संगठन में मनमाने परिवर्तन कर रही है ताकि किसी भी मामले में किसी भी स्तर से कभी कोई विरोध या असहमति का स्वर सामने आने की गुंजाइश ही ना रहे। जाहिर तौर पर सियासी समीकरणों की कसौटी पर परखने के बाद इस तरह के आरोपों को सिरे से तो कतई खारिज नहीं किया जा सकता है लेकिन इन फैसलों को एक अलग नजरिये से देखा जाये तो भले ही पिछड़ों-दलितों को साधने के लिये इन्हें आगे आने का मौका दिया गया हो या फिर इन्हें गुटनिरपेक्ष रहने का प्रतिफल मिल रहा हो। सच तो यही है कि मतदाताओं को अंत्योदय के प्रति अपनी प्रतिबद्धता समझाने में पार्टी को इस सांगठनिक अंत्योदय से निश्चित ही काफी लाभ मिलेगा। दरअसल ये वो लोग हैं जिन्होंने संघ परिवार व भाजपा संगठन के लिये अपना सबकुछ अर्पित करने से लेकर पार्टी के लिये खुद को भी समर्पित कर दिया, लेकिन बदले में कुछ पाने के लिये ना तो कभी गुटबाजी की और ना किसी की गणेश परिक्रमा करना गवारा किया। इसीका नतीजा रहा कि जब फूलपुर संसदीय सीट से भाजपा के शीर्ष नेताओं की एक टोली स्वर्गीय लालबहादुर शाष्त्री के नवासे व पार्टी के राष्ट्रीय सचिव सिद्धार्थनाथ सिंह को उम्मीदवार बनाना चाह रही थी और बाकी टोलियां इसके विरोध में जुटी थीं तब टकराव टालने के लिये फूलपुर स्थित सिराथू विधानसभा सीट पर सपा की लहर के बावजूद मजबूती से कमल खिला चुके केशव प्रसाद मौर्य को पार्टी का टिकट दे दिया गया। हालांकि मौर्य कोई आसमान से टपके नेता नहीं थे बल्कि पिछड़े समाज व बेहद गरीब परिवार से आनेवाले मौर्य संघ परिवार से बचपन से ही जुड़े हुए थे और लंबे समय तक विहिप के पूर्णकालिक प्रांत संगठन मंत्री रहने के अलावा पार्टी की यूपी इकाई में भी कई महत्वपूर्ण जिम्मेवारियां संभाल चुके थे। लेकिन उन्हें असली प्रतिफल मिला उस एकला चलो की गुटनिरपेक्ष राजनीति का जिसने उन्हें भी अचंभित करते हुए पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बना दिया है क्योंकि इस पद के लिये लंबी मगजमारी व खींचतान के बाद भी किसी एक नाम पर आम सहमति नहीं बन रही थी। खैर, मौर्य सरीखे नेताओं का नाम भले ही आम लोगों के नजरिये से अधिक आकर्षक ना हो लेकिन जमीन संवारने के लिये जमीनी नेताओं को आगे लाना पार्टी के लिये दूरगामी तौर पर अवश्य फायदेमंद साबित हो सकता है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’  @नवकांत ठाकुर #NavkantThakur

शनिवार, 26 मार्च 2016

दुनियां करे सवाल तो हम क्या जवाब दें ....

‘दुनियां करे सवाल तो हम क्या जवाब दें’

वाकई इन दिनों भाजपा सहित संघ परिवार के तमाम अनुषांगिक संगठनों से जुड़े लोगों के मन में साहिर साहब का यही सवाल सुलग रहा है कि ‘दुनियां करे सवाल तो हम क्या जवाब दें, तुमको ना हो खयाल तो हम क्या जवाब दें।’ यह सवाल लाजिमी भी है। क्योंकि लोग तो पूछेंगे कि विपक्ष में रहने के दौरान जो बड़ी-बड़ी बातें की जा रही थीं उन्हें सत्ता में आने के बाद क्यों भुला दिया गया। बातें सिद्धांतों की, विचारों की और सुनहरे सपनों की। कहते हैं कि भाजपा अलग ही मिट्टी-पानी की पार्टी है जो सत्ता की बजाय सिद्धांतों की सियासत करती है। लिहाजा सत्ता पर पूरी बहुमत से कब्जा हो जाने के बाद सिद्धांतों से किनारा किये जाने पर सवाल तो उठेंगे ही। कहां गये वो सिद्धांत जो कहते थे कि देश में एक भी बांग्लादेशी घुसपैठिये को रहने-बसने की इजाजत नहीं दी जाएगी। कहां गयी वह सोच जो समूचे देश के लिये ‘एक प्रधान, एक विधान और एक निशान’ की बात कहती थी। बातें तो गऊ रक्षा की भी की जाती थी और भव्य राममंदिर की भी। लेकिन अब तमाम बातें खुले में रखे कपूर की मानिंद गायब दिख रही हैं। कहने को तो असम के लिये जारी किये गये विजन डाक्यूमेंट में एक बार फिर भाजपा ने दोहराया है कि बांग्लादेशी घुसपैठियों को हर्गिज देश की सरहद में दाखिल नहीं होने दिया जाएगा। लेकिन सवाल यह है कि अब जबकि केन्द्र की सत्ता संभाले हुए पार्टी को तकरीबन दो साल का वक्त होने जा रहा है तो वह कितने बांग्लादेशियों को असम से खदेड़ कर सरहद के उस पार भेजने में कामयाब हुई है? तरूण गोगोई के शब्दों में जवाब तो सिफर ही है, यानि निल बटा सन्नाटा। ऐसे में अगर पार्टी के ताजा वायदे को विरोधियों द्वारा ‘नये जुमले’ का नाम दिया जा रहा है तो इसमें गलत ही क्या है? कहने को तो अमित शाह ने केवल प्रधानमंत्री के उस वायदे को ही चुनावी जुमला बताया था जिसमें उन्होंने विदेशों में जमा भारतीयों का कालाधन वापस आ जाने के नतीजे में हर किसी के हिस्से में 17 लाख रूपया आने की बात कही थी। लेकिन हकीकत तो यही है कि चुनावी जुमला सिर्फ वही नहीं था। अलबत्ता लच्छेदार भाषा में की गयी संघ परिवार के विचारों व मूलभूत सिद्धांतों से जुड़ी तमाम बातें भी अब जुमलेबाजी सरीखी ही महसूस हो रही हैं। तभी तो पिछले हफ्ते हुई पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में प्रखर राष्ट्रवाद के अलावा उन तमाम मसलों पर पूरी तरह चुप्पी साध ली गयी जो भाजपा की पहचान से जुड़े मुद्दे माने जाते रहे हैं। ना गऊरक्षा की कोई बात हुई और ना ही धारा 370 की। राममंदिर और समान नागरिक संहिता का मसला तो हाशिये पर भी नहीं रहा। उस पर तुर्रा यह कि कार्यकारिणी का औपचारिक समापन करते हुए प्रधानमंत्री ने ‘विकास, विकास और विकास’ के एजेंडे पर ही ध्यान केन्द्रित रखने का निर्देश देते हुए कार्यकर्ताओं को सख्त लहजे में समझा दिया कि वे व्यर्थ के मुद्दों में हर्गिज ना उलझें। अब प्रधानमंत्री ने किन मुद्दों को व्यर्थ बताया यह समझाने में तो गृहमंत्री राजनाथ सिंह भी उलझकर रह गये। लेकिन अगर जीतेन्द्र सिंह द्वारा धारा 370 का मुद्दा उठाये जाने पर उन्हें चुप करा दिया जाता हो और साक्षी महाराज द्वारा वर्ष 2019 से पूर्व ही अयोध्या में भव्य राममंदिर का निर्माण कार्य पूरा हो जाने का एलान किये जाने पर पार्टी नेतृत्व असहज हो जाता हो तो यह समझने में शायद ही किसी को मुश्किल पेश आएगी कि प्रधानमंत्री ने किन मसलों को व्यर्थ बताने की कोशिश की है। सच तो यह है कि खुद को ‘बीफ भक्षक’ बतानेवाले मंत्रीपद पर शोभायमान हैं और गौमांस को प्रतिबंधित किये जाने की मांग करनेवाले गौभक्तों की टोली को गुजरात के राजकोट में सामूहिक आत्महत्या करने के लिये विवश होना पड़ा है। अलबत्ता अपने मूलभूत सिद्धांतों में शामिल प्रखर राष्ट्रवाद के मसले का झंडा आगे रखते हुए ‘भारत माता की जय’ का नारा अवश्य गुलंद किया जा रहा है लेकिन ना कश्मीर में पाकिस्तान का झंडा लहरानेवाली आसिया अंद्राबी पर कोई सख्ती हो रही है और ना ही 370 की कट्टर समर्थक पीडीपी के साथ साझेदारी की सरकार बनाने में कोई संकोच महसूस किया जा रहा है। बल्कि कश्मीर में कदम रखते ही शायद ‘राष्ट्रवाद’ का मसला भी वैसे ही व्यर्थ हो जा रहा है जैसे केरल व नागालैंड सरीखे सूबों में गऊ रक्षा का मुद्दा। अलबत्ता पूरा जोर है ना सिर्फ सत्ता पर अपनी पकड़ को सलामत रखने पर बल्कि अनछुए इलाकों में अपना विस्तार करने पर भी। ऐसे में वैचारिक व सैद्धांतिक मसले अगर व्यर्थ लग रहे हैं तो यह काफी हद तक वैसा ही है जैसे सवर्णों के वोट को अपनी बपौती जागीर समझकर दलितों व पिछड़ों को लुभाने के लिये पूरी ऊर्जा झोंक दिया जाना। अब इसका नतीजा अगर बिहार जैसा ही रहा तो मुश्किल हो भी सकती है लेकिन फिलहाल तो पार्टी को वैसा कुछ होता हुआ दिख नहीं रहा। लिहाजा सैद्धांतिक मसलों पर जुमलेबाजी की भी जरूरत नहीं समझी जा रही है। लेकिन पेंच उन लाखों भाजपाई कार्यकर्ताओं व स्वयंसेवकों के सामने फंसा हुआ है जो इन तमाम मसलों पर पूछे जानेवाले सवालों का कुछ भी जवाब देने की स्थिति में नहीं हैं और खुद ही यह सवाल करते हुए महसूस हो रहे हैं कि ‘दुनियां करे सवाल तो हम क्या जवाब दें.....?’ ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर #NavkantThakur

सोमवार, 25 जनवरी 2016

चेहरा क्या देखते हो, दिल में उतर कर देखो ना....

‘दिल को देखो, चेहरा ना देखो’

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मन की बात तो यही है कि ‘चेहरा क्या देखते हो, दिल में उतर कर देखो ना, मौसम पल में बदल जाएगा, पत्थर दिल भी पिघल जाएगा, मेरी मोहब्बत में है ऐसा असर, देखो ना...।’ उनकी पार्टी भाजपा भी लोगों को यही आगाह कर रही है कि ‘दिल को देखो चेहरा ना देखो, चेहरे ने लाखों को लूटा, दिल सच्चा और चेहरा झूठा।’ लेकिन मसला है कि अव्वल तो दिल चीरकर दिखाना मुमकिन नहीं है और दूसरे दिल में उतरकर किसी की अंदरूनी मंशा का मुआयना करने की फुर्सत भी किसी के पास नहीं है। सबकी अपनी जिन्दगी है, परेशानियां हैं, दुश्वारियां हैं, सपने हैं, उलझने हैं। कौन जहमत उठाए चेहरे के रंग का दिल की तस्वीर से मिलान करने की। यहां तो जो दिखता है वही बिकता है। दिखने और बिकने का वह गणित ही तो है जिससे चवन्नी के चिप्स और अठन्नी के काले-पीले शीतलपेय को दस-बीस रूपये का बाजार भाव मिल जाता है। अब कोई लाख समझाये कि ‘ठंडा मतलब टाॅयलेट क्लीनर’ लेकिन किसे फुर्सत है समझने की। यहां तो चट पैसा और झट तरावट का फार्मूला ही चाहिये सबको। भले ही उसकी अंदरूनी असलियत कितनी भी नुकसानदेह क्यों ना हो। ऐसी ही तस्वीर सियासत में भी दिखती है। यहां भी सबको तुरंत के मामले का फौरन से पेश्तर ही नतीजा चाहिये। भले ही बाद में जो भी सच सामने आए। सच सामने आने तक तो शुरूआती तस्वीर के तहत ही पूरा तिया-पांचा हो चुका होता है। मसलन दिल्ली का चुनाव हुआ तो यहां के दो-चार गिरजाघरों में असामाजिक तत्वों द्वारा की गयी चोरी-चकारी व तोड़फोड़ की वारदातों को ऐसा रंग दिया गया मानो इसाई समुदाय की स्थिति इराक व सीरिया के यजीदियों सरीखी हो गयी हो। मामले की गूंज विदेशों तक सुनाई पड़ी। केन्द्र की सरकार गुहार ही लगाती रह गयी कि मामले की तहकीकात हो जाने के बाद ही कोई राय कायम की जाये। मगर सच सामने आने तक सब्र रखने की समझाइश बेअसर रही और तुरत-फुरत में सामने दिख रही तस्वीर के नतीजे में केन्द्र में स्थापित सत्ताधारियों के अरमानों पर एक नवजात सियासी दल का झाड़ू फिर गया। सूबे के सत्तर की सत्ता में महज तीन तिनके ही बचे, बाकी सबका सफाया हो गया। ऐसा ही मामला बिहार चुनाव के दौरान भी दिखा जब बीफ के विवाद में असहिष्णुता का तड़का लगाकर सम्मानवापसी का जोरदार अभियान चलाया गया जिसका नतीजा वही हुआ जो दिल्ली में पहले ही दिख चुका था। भले ही बाद में पता चला हो कि ना बीफ के विवाद में कोई दम था और ना ही इसाईयों पर कोई संकट है। लेकिन यह सच सामने आने तक तो पूरा सियासी खेल समाप्त हो चुका था। अब फिर से ऐसी ही तस्वीर बन रही है दलितों के उत्पीड़न और अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर अतिक्रमण को लेकर। भले ही इसके पीछे का सच कुछ भी हो लेकिन मौजूदा तस्वीर के तहत उठ रहे सवालों ने सियासत में चटख रंग तो भर ही दिया है। शायद ही कोई इस हकीकत की तह में जाना चाहता हो कि आखिर रोहित वेमुला ने क्यों व किन हालातों में आत्महत्या की। सबकी ख्वाहिश है कि इस मामले को दलितों व गैरदलित बहुसंख्यकों के टकराव का रंग देकर आगामी दिनों में होने जा रहे पांच राज्यों के चुनावों में इसकी छटा बिखेरी जाये। वैसे भी मामले की जांच के लिये बने न्यायिक आयोग को अपनी रिपोर्ट देने के लिये तीन माह का वक्त दिया गया है। यानि जब तक अंदरूनी सच सामने आएगा तब तक सतही तस्वीर के तहत इसका सियासी दोहन हो चुका होगा। इसी प्रकार अलीगढ़ मुस्लिम विश्विविद्यालय को दारूल उलूम देवबंद सरीखी स्वायत्तता व स्वरूप दिलाने की लड़ाई के बीच भी यह सवाल सतह के नीचे दफन दिख रहा है कि आखिर देवबंद से एएमयू की तुलना कैसे की जा सकती है। बकौल एमजे अकबर, देवबंद ने आज तक सरकार से एक पैसा अनुदान नहीं लिया, वह समुदाय के सहयोग से शिक्षा का प्रसार व अपना विस्तार करता है। जबकि एएमयू अंग्रेजों के जमाने से ही सरकारी अनुदान पर आश्रित है। जाहिर है कि जनता की गाढ़ी कमाई से संचालित संस्थान को जब तमाम दबावों के बावजूद पंडित जवाहर लाल नेहरू की सरकार से लेकर लालबहादुर शाष्त्री व इंदिरा गांधी तक की सरकार ने संसद में अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा देने से साफ इनकार कर दिया था तब मौजूदा सरकार किस आधार पर इसकी स्थिति में बदलाव की मांग स्वीकार कर सकती है। लेकिन पहले जो हुआ वह कहां तक जायज था अथवा संवैधानिक नजरिये से क्या होना उचित है, इस पर अदालत द्वारा सामने लाये जानेवाले सच का सब्र से इंतजार करना शायद ही किसी को गवारा हो। अलबत्ता तस्वीर तो यही दिखायी जाएगी कि मौजूदा सरकार द्वारा अल्पसंख्यकों का हक मारा जा रहा है। यानि तह में उतरकर अंदरूनी हकीकत को परखने की फुर्सत मतदाताओं को शायद ही मिल सके। लेकिन मसला यह है कि सियासी तुफान में आरोप-प्रत्यारोप की बौछार से अटे-पटे चेहरे को देखकर ही स्वस्ति देने व खारिज करने की जो परंपरा चल निकली है उससे सियासी दलों को तो जो फायदा-नुकसान होना है वह होता रहेगा, लेकिन सब्र के साथ सच को जानने-समझने की समझदारी दिखाने के बजाय आनन-फानन में जारी तमाशे के तहत संवेदना, भावुकता व पूर्वाग्रह के आधार पर मतदान करने का निर्णायक नुकसान तो देश व समाज को ही झेलना पड़ेगा। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’  @ नवकांत ठाकुर

सोमवार, 11 जनवरी 2016

"वापसी की दिशा में पहलकदमी, यानि लौट के बुद्धू घर को आये"

‘पुरानी डगर पर आ रहा है लौट कर वापस मुसाफिर’

मशहूर शायर जांनिसार अख्तर साहब अपनी एक रूबाई में बताते हैं कि ‘वो शाम को घर लौट कर आएंगे तो फिर, चाहेंगे कि सब भूलकर उनमें खो जाऊं, जब उन्हें जागना है मैं भी जागूं, जब नींद उन्हें आए तो मैं भी सो जाऊं।’ कायदे से तो यह रूबाई किसी भी सामान्य गृहणी के मनोभाव को अभिव्यक्त करती हुई दिखाई पड़ती है लेकिन मौजूदा सियासी माहौल के मद्देनजर ये पंक्तियां उन मतदाताओं की मनोदशा को भी परिलक्षित करती हुई नजर आती हैं जिनका सहयोग व समर्थन हासिल करना भाजपा का लक्ष्य रहा है। हालांकि हर राजनीतिक पार्टी का लक्ष्य रहता है समाज के सभी तबके-फिरके का अधिकतम समर्थन हासिल करना। जिसके लिये कभी विचारधारा का आधार लिया जाता है तो कभी परंपरा का। लेकिन इस मामले में भाजपा शायद इकलौती ऐसी पार्टी है जो शुरूआत से ही यह तय नहीं कर पायी है कि आखिर उसे किस राह पर निर्णायक रूप से आगे बढ़ना है। कभी तो वह कट्टर हिन्दू राष्ट्रवादिता का लबादा ओढ़े हुए दिखती है और कभी सामाजिक समरसता की बातें करके उन लोगों को रिझाने में मशगूल हो जाती है जो संघ परिवार की इस राजनीतिक शाखा पर कतई भरोसा नहीं कर सकते। जनसंघ से टूटकर अलग होने के बाद लंबे समय तक तो गैरकांग्रेसवाद की पतवार थामकर ही इसने अपनी सियासी नैया को दिशा दी और बाद में मंडल को थाम लिया। लेकिन कमंडल की कूटनीति के तहत जब संघियों की कोशिशों से मंदिर मसले का दावानल भड़का तब जाकर पार्टी को अपना अलग ईंधन नसीब हुआ और मंडल को कमंडल के नीचे दबाया जा सका। लेकिन राम के नाम पर अपना वजूद बड़ा करने और चैबीस दलों का ईंट-रोड़ा जोड़कर राजग के नाम से सत्ता का कुनबा खड़ा करने के बाद उसे एहसास हुआ कि केवल राम का नाम ही सत्ता पर एकाधिकार हासिल करने के लिये काफी नहीं है और अगर अपने दम पर बहुमत चाहिये तो समाज के उस तबके को भी अपने साथ जोड़ना होगा जिसे किसी भी कीमत पर भगवा रंग में रंगना गवारा नहीं है। तभी संघ के शीर्ष सैद्धांतिक मसलों को हाशिये पर डालने के साथ ही अटल हिमायत यात्रा भी निकाली गयी और बड़े पैमाने पर दाढ़ी-टोपीधारकों का सम्मेलन भी कराया गया। लेकिन ना खुदा ही मिला ना विसाले सनम। 2004 में चैबे से छब्बे बनने के चक्कर में दुबे बनकर दुबकने के मजबूर होना पड़ा। हालांकि पार्टी के शीर्ष रणबांकुरों ने हार नहीं मानी और संघ की सलाहियतों को दरकिनार करते हुए धर्मनिरपेक्षता का प्रमाणपत्र हासिल करने के लिये जिन्ना की मजार तक दौड़ लगायी गयी। पर नतीजा वही ढ़ाक के तीन पात निकला। यानि 2009 का मौका भी हाथ से फिसल गया। अब बारी थी 2014 की। पुराने अनुभवों से इतना तो पता ही था कि ना तो अकेले कमंडल में सत्ता समा सकती है और ना ही मंडल में। साथ ही कट्टर धर्मनिरपेक्षतावादी मतदाताओं से समर्थन की आस लगाना भी बेकार ही था। लिहाजा निकाला गया ऐसा फार्मूला जिसके तहत मतदाताओं के सामने मोदी सरीखे कट्टर हिन्दूराष्ट्रवादी का चेहरा और उनकी जात-बिरादरी का घालमेल करके मंडल-कमंडल का मिश्रण पेश कर दिया गया। मोदी का चेहरा आगे था लिहाजा ना जय श्रीराम के नारे की अलग से जरूरत थी और ना ही किसी अन्य वैचारिक-सैद्धांतिक प्रतिबद्धता को दर्शाने की। रही-सही कसर विरोधियों के बिखराव और कांग्रेस के प्रति जारी जनाक्रोश ने पूरी कर दी। नतीजन समग्रता में महज 32 फीसदी वोट पाकर पार्टी ने अपने दम पर लोकसभा में बहुमत हासिल कर लिया जबकि 68 फसदी वोट पाकर भी बाकियों को बाबाजी का ठुल्लू ही मिला। लेकिन इस गड़बड़झाले के बाद की तस्वीर में जिन्होंने मोदी को हिन्दू राष्ट्रवाद का पर्याय मानकर मतदान किया था वे ‘सबका साथ सबका विकास’ के नारे से बिदक गये और जिन बिरादरीवालों ने मोदी में अपना मसीहा देखा उनकी आस रेल-तेल से लेकर दाल के सवाल में उलझकर दम तोड़ गयी। दलितों-पिछड़ों की तुलना कुत्ते से किये जाने और आरक्षण व्यवस्था में बदलाव का संकेत मिलने के बाद तो बिरादरीवालों की रही-सही आस भी समाप्त हो गयी। नतीजन दिल्ली में दर्द मिला और बिहार में तो बंटाधार ही हो गया। बहुसंख्यकवाद की सियासत का फार्मूला इस कदर फेल हुआ कि अगड़े-पिछड़ों ने एक साथ नकार दिया। ऐसे में अब नये सिरे से स्थापित फार्मूले को अमल में लाने के अलावा दूसरा कोई विकल्प भी नहीं है वर्ना परंपरागत मतदाताओं का भी मोहभंग होने की नौबत आयी तो अर्श से गिरने के बाद फर्श भी शायद ही नसीब हो। तभी तो जांची-परखी कमंडल की चिमनी को बयानों की फुंकनी से सुलगाने की कोशिशें लगातार जारी हैं। साथ ही गंगा को भी सूबों के सहयोग से नहीं बल्कि अपने दम पर अविरल-निर्मल करने के अलावा गैया को कसाई से बचाने की जुगत भी भिड़ाई जा रही है। वैसे भी विकास और सुशासन के बंबू पर सत्ता का तंबू ताने रखने के प्रयोग की हवा तो मोदी द्वारा गोद लिये गये आदर्श गांव जयापुर में ही निकल गयी जहां अकल्पनीय विकास की धारा बहाने के बावजूद भाजपा को मतदाताओं ने ठेंगा दिखा दिया। यानि अब मजबूरी तो है पुरानी विचारधारा पर लौटने की, लेकिन अपेक्षा है कि कोई इसके लिये ताना भी ना मारे। कोई ये ना कहे कि लौट के बुद्धू घर को आये। तभी तो वापसी की दिशा में पहलकदमी तो हो रही है मगर बेहद फूंक-फूंककर, संभल-संभलकर। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’