शनिवार, 9 अप्रैल 2016

‘जमीनी के कांधों पर जमीन की जिम्मेवारी’

‘जमीनी के कांधों पर जमीन की जिम्मेवारी’


जमीन की समझ उसे ही हो सकती है जो जमीन से जुड़ा रहा हो। लिहाजा जमीन जोतने व जोड़ने की जिम्मेवारी जमीन से जुड़े जमीनी नेताओं को सौंपने की भाजपा में जो नयी परंपरा शुरू हुई है उसका जमीनी स्तर पर सकारात्मक असर दिखने की संभावना को कतई नकारा नहीं जा सकता है। वास्तव में जबसे पार्टी के संस्थापकों और उनके द्वारा आगे लाये गये दूसरी पीढ़ी के नेताओं का संगठन पर वर्चस्व कमजोर पड़ा है तबसे संगठन में बदलाव की बेहद दिलचस्प बयार बहती हुई दिख रही है। खास तौर से पार्टी का नेतृत्व नरेन्द्र मोदी व अमित शाह के रूप में ऐसी जोड़ी के हाथों में आने के बाद से (जो ना तो किसी से उपकृत है और ना किसी पूर्वाग्रह या गुटबाजी से प्रेरित) पार्टी में अहम पदों की जिम्मेवारी सौंपे जाने की अहर्ता व अपेक्षित योग्यता की कसौटी ही मानो बदल गयी है। ना परंपराओं की परवाह की जा रही है और ना ही वर्जनाओं की। ना सिफारिश के आधार पर फैसले हो रहे हैं और ना ही विरोध की परवाह की जा रही है। अगर वर्जनाओं की परवाह या परंपराओं का अनुपालन होता तो ना तो आदिवासी बहुल झारखंड का मुख्यमंत्री गैरआदिवासी रघुवर दास को बनाया जाता और ना जाटबहुल हरियाणा की सूबेदारी गैरजाट मनोहरलाल खट्टर को दी जाती। यहां तक कि पार्टी के तमाम पुराने व स्थापित चेहरों को दरकिनार कर सर्वानंद सोनोवाल को असम का अध्यक्ष व मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने के मामले में भी ना तो सांगठनिक संतुलन की परवाह की गयी और ना परंपरागत सियासी लकीर का अनुसरण किया गया। हालांकि दिल्ली में आयातित नेत्री किरण बेदी को मुख्यमंत्री पद के दावेदारी की जिम्मेवारी सौंपने का मामला भी कुछ ऐसा ही था जिसका पार्टी को भारी खामियाजा भुगतना पड़ा। लेकिन उस एक हार से अपने लिये अपनी नयी लकीर खींचने के मौजूदा निजाम के दृढ़ निश्चय पर कोई असर नहीं पड़ा है। तभी तो आज एक बार फिर पांच राज्यों में नियुक्त किये गये नये प्रदेश अध्यक्षों की सूची में तीन नाम ऐसे हैं जो वाकई नये निजाम की नयी सोच की ओर स्पष्ट इशारा करते हैं। उत्तर प्रदेश में केशव प्रसाद मौर्य, पंजाब में विजय सांपला और तेलंगाना में डाॅ के लक्षमण को प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेवारी सौंपने के फैसले से स्पष्ट है कि तमाम ऐसे स्थापित चेहरे जो जोड़तोड़, गुटबाजी व गणेश परिक्रमा के बूते विभिन्न स्तरों पर पार्टी में लंबे समय से जमे हुए थे उनकी जगह अब ऐसे चेहरों को तरजीह दी जा रही है जो ‘नेकी कर और दरिया में डाल’ की नीति के मुताबिक संगठन की सेवा में लगे रहे हैं। उन्हें ख्वाहिश भले रही हो पार्टी से कुछ पाने की लेकिन उम्मीद तो कतई नहीं थी कि कुछ मिल पाएगा। ऐसे लोगों को जब अचानक मुख्यधारा में शीर्ष पर बिठाने की नीति पर अमल किया जाने लगा तो स्वाभाविक तौर पर यह आरोप तो लगना ही है कि मोदी-शाह की जोड़ी पार्टी पर अपनी पकड़ मजबूत करने के लिये पुराने स्थापितों की अनदेखी करते हुए संगठन में मनमाने परिवर्तन कर रही है ताकि किसी भी मामले में किसी भी स्तर से कभी कोई विरोध या असहमति का स्वर सामने आने की गुंजाइश ही ना रहे। जाहिर तौर पर सियासी समीकरणों की कसौटी पर परखने के बाद इस तरह के आरोपों को सिरे से तो कतई खारिज नहीं किया जा सकता है लेकिन इन फैसलों को एक अलग नजरिये से देखा जाये तो भले ही पिछड़ों-दलितों को साधने के लिये इन्हें आगे आने का मौका दिया गया हो या फिर इन्हें गुटनिरपेक्ष रहने का प्रतिफल मिल रहा हो। सच तो यही है कि मतदाताओं को अंत्योदय के प्रति अपनी प्रतिबद्धता समझाने में पार्टी को इस सांगठनिक अंत्योदय से निश्चित ही काफी लाभ मिलेगा। दरअसल ये वो लोग हैं जिन्होंने संघ परिवार व भाजपा संगठन के लिये अपना सबकुछ अर्पित करने से लेकर पार्टी के लिये खुद को भी समर्पित कर दिया, लेकिन बदले में कुछ पाने के लिये ना तो कभी गुटबाजी की और ना किसी की गणेश परिक्रमा करना गवारा किया। इसीका नतीजा रहा कि जब फूलपुर संसदीय सीट से भाजपा के शीर्ष नेताओं की एक टोली स्वर्गीय लालबहादुर शाष्त्री के नवासे व पार्टी के राष्ट्रीय सचिव सिद्धार्थनाथ सिंह को उम्मीदवार बनाना चाह रही थी और बाकी टोलियां इसके विरोध में जुटी थीं तब टकराव टालने के लिये फूलपुर स्थित सिराथू विधानसभा सीट पर सपा की लहर के बावजूद मजबूती से कमल खिला चुके केशव प्रसाद मौर्य को पार्टी का टिकट दे दिया गया। हालांकि मौर्य कोई आसमान से टपके नेता नहीं थे बल्कि पिछड़े समाज व बेहद गरीब परिवार से आनेवाले मौर्य संघ परिवार से बचपन से ही जुड़े हुए थे और लंबे समय तक विहिप के पूर्णकालिक प्रांत संगठन मंत्री रहने के अलावा पार्टी की यूपी इकाई में भी कई महत्वपूर्ण जिम्मेवारियां संभाल चुके थे। लेकिन उन्हें असली प्रतिफल मिला उस एकला चलो की गुटनिरपेक्ष राजनीति का जिसने उन्हें भी अचंभित करते हुए पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बना दिया है क्योंकि इस पद के लिये लंबी मगजमारी व खींचतान के बाद भी किसी एक नाम पर आम सहमति नहीं बन रही थी। खैर, मौर्य सरीखे नेताओं का नाम भले ही आम लोगों के नजरिये से अधिक आकर्षक ना हो लेकिन जमीन संवारने के लिये जमीनी नेताओं को आगे लाना पार्टी के लिये दूरगामी तौर पर अवश्य फायदेमंद साबित हो सकता है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’  @नवकांत ठाकुर #NavkantThakur

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