शनिवार, 23 अप्रैल 2016

‘भुनाने के लिये दाने के जुगाड़ की जद्दोजहद’

‘भुनाने के लिये दाने के जुगाड़ की जद्दोजहद’


‘घर में नहीं दाने और अम्मा चली भुनाने’ के कटाक्षीय मुहावरे से तो सभी वाकिफ हैं। लेकिन यह सामाजिक मुहावरा सियासत में कोई मायने नहीं रखता। यहां तो भुनाने अक्सर वही निकलता है जिसके पास दाने होते ही नहीं और जिसके पास वास्तव में दाने होते हैं वह उसे तत्काल ही भुना लेने की गलती कभी नहीं करता। मसलन इन दिनों भुनाने के लिये तो नीतीश कुमार से लेकर राहुल गांधी और अरविंद केजरीवाल ही नहीं बल्कि सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव भी कतार में हैं लेकिन ना उनके पल्ले दाने दिख रहे हैं और ना ही वर्ष 2019 तक इनके पास इतना दाना जमा हो पाने की फिलहाल कोई उम्मीद नजर आ रही है जिसके दम पर ये अपने पल्ले के दाने की बदौलत प्रधानमंत्री का पद हासिल करने में कामयाब हो सकें। कायदे से देखा जाये तो केन्द्र में जब से नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में भाजपा की सरकार बनी है तबसे ही मोदी के विकल्प की तलाश में तमाम गैरभाजपाई ताकतें विभिन्न फार्मूलों को टटोलने में जुटी हुई हैं। दरअसल यह सबको मालूम है कि लोकसभा चुनाव में पड़े कुल वोटों में से महज 32 फीसदी की हिस्सेदारी के दम पर ही भाजपा ने अपने दम पर बहुमत की सरकार बनायी है। यानि भाजपा की जीत में निर्णायक भूमिका निभाई गैरभाजपाई वोटों के जबर्दस्त बिखराव ने। लिहाजा सबका यह मानना है कि अगर अगले चुनाव में इस बिखराव को टालने में कामयाबी मिल गयी तो भाजपा को आसानी से धूल चटाई जा सकती है। इसी सोच का नतीजा रहा कि गैरभाजपाई ताकतों को एकजुट करने का पहला प्रयास जनता परिवार के बिखरे कुनबे को जोड़ने की कोशिश के तौर पर किया गया। इस प्रयास में पिछले साल सपा, राजद, जदयू, जद एस व इनेलो ने आपस में विलय करने और नयी पार्टी का मुखिया मुलायम सिंह यादव को बनाने पर सैद्धांतिक सहमति भी कायम कर ली। लेकिन अव्वल तो सपा के भीतर ही नये सिरे से पार्टी बनाने पर सहमति नहीं बन पायी और बाकी कसर बिहार के चुनाव में सीट बंटवारे को लेकर हुई तकरार ने पूरी कर दी। लिहाजा जनता परिवार के एकीकरण का विचार गर्त में चला गया। इस बीच बिहार के चुनाव में महागठजोड़ बनाकर गैरभाजपाई वोटों को एकजुट करने का जो प्रयोग किया गया उसका परिणाम उम्मीदों से काफी बेहतर रहा। लिहाजा कांग्रेस ने इसी प्रयोग को अन्य सूबों में भी आगे बढ़ाते हुए राहुल गांधी की खुल्लमखुल्ला असहमति के बावजूद पश्चिम बंगाल में वामदलों के साथ और तमिलनाडु में द्रमुक के साथ चुनावी गठजोड़ किया है। इस गठजोड़ का ही नतीजा है कि दोनों ही सूबों में कांग्रेस के लिये सम्मानजनक स्थिति उत्पन्न हुई है और अस्तित्व के संकट से जूझ रहे वामदलों को भी नये सिरे से प्राणवायु नसीब हुई है। यानि गैरभाजपाई वोटों का बिखराव रोकने का हर वह प्रयोग अब तक पूरी तरह सफल रहा है जिसमें तमाम ताकतें निजी आत्मसम्मान से ऊपर उठकर व आपसी असहमतियों को पीछे छोड़कर एकजुट हो पायी हैं। जबकि जम्मू कश्मीर, हरियाणा व महाराष्ट्र में ऐसा नहीं हो पाने के कारण भाजपा को सत्ता हथियाने का मौका मिल गया और अब असम में भी इसी वजह से उसकी स्थिति काफी मजबूत बतायी जा रही है। यानि भाजपा को रोकने के लिये तमाम गैरभाजपाई ताकतों को एकजुट तो होना ही पड़ेगा। लेकिन सवाल है कि इस एकजुटता का फार्मूला क्या होगा और इसका नेतृत्व किसके हाथों में रहेगा। इसी सवाल पर आकर यह पूरा विचार पंचर हो जा रहा है। अभी नीतीश ने संघ मुक्त भारत के नारे का जो प्रयोग किया है उसमें दम तो दिख रहा है क्योंकि इससे अव्वल तो सनातन भाजपा विरोधी माने जानेवाले अल्पसंख्यक समुदाय को एकजुट किया जा सकता है और दूसरे समाज को संघ के कट्टरवाद और बाकियों के समरसतावाद के बीच विभाजित कर भाजपा की राह रोकी जा सकती है। लेकिन संघ मुक्त भारत के नारे को आगे करने पर भाजपा इसे स्वाभाविक तौर पर राष्ट्रवाद से जोड़ेगी। लिहाजा आखिरकार यह प्रयोग अल्पसंख्यक बनाम बहुसंख्यक की शक्ल ले सकता है और इस बिसात पर भाजपा को पछाड़ना नामुमकिन की हद तक मुश्किल होगा। दूसरी ओर मसला है कि गैरभाजपाई मोर्चे की कमान पर नीतीश की मजबूत पकड़ कैसे बन सकती है जब बिहार की कुल 40 में से 16-17 सीटें ही उनकी पार्टी को लड़ने के लिये दी जाएंगी। साथ ही गैरभाजपाई मोर्चे पर अपना स्वाभाविक एकाधिकार छोड़ना कांग्रेस को कतई गवारा नहीं हो सकता है और राहुल के अलावा किसी अन्य को वह प्रधानमंत्री पद का दावेदार हर्गिज स्वीकार नहीं कर सकती है। लेकिन मसला है कि कांग्रेस के नेतृत्व में लड़ना ना तो सपा को कबूल हो सकता है और ना बीजद, अन्नाद्रमुक, तृणमूल कांग्रेस या फिर राकांपा सरीखे दलों को। क्योंकि इन सभी दलों में त्रिशंकु संसद गठिन होने की हालत में अपने नेता को प्रधानमंत्री बनवाने का सपना लंबे अर्से से पल रहा है। बहरहाल, जहां चाह हो वहां राह निकल ही आती है लिहाजा ऐसा संभव ही नहीं है कि राष्ट्रव्यापी गैरभाजपाई गठजोड़ के गठन की कोशिशों पर विराम लग जाये। अलबत्ता जनता परिवार के एककीरण का विचार ध्वस्त होने के बाद अभी तो इस दिशा में यह दूसरा ही प्रयास शुरू हुआ है। यह सिलसिला तो अभी कई मोड़, जोड़-तोड़ व गठजोड़ से गुजरनेवाला है। जिसके सकारात्मक भविष्य की फिलहाल तो सिर्फ उम्मीद ही की जा सकती है। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’ @नवकांत ठाकुर Navkant Thakur

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