‘उठी हुई उंगली के पीछे छिपा हुआ चेहरा’
इन दिनों जिसे देखिये वही दूसरों पर उंगली उठाता हुआ दिख रहा है। सबकी उंगलियां एक दूसरे की ओर हैं। चारों तरफ उंगली ही उंगली। चेहरा तो किसी का दिख ही नहीं रहा। ऐसे में यह समझ पाना बेहद मुश्किल हो चला है कि उंगलियों के पीछे चेहरा छिप जा रहा है या चेहरा छिपाने के लिये ही उंगली उठाई जा रही है। मामला कोलकाता में हुए ओवरब्रिज हादसे का हो या पठानकोट में हुए आतंकी हमले की पड़ताल के लिये भारत आयी पाकिस्तानी जांच टीम का। या फिर कृष्णा गोदावरी बेसिन में भारी भरकम निवेश व कुप्रबंधन के कारण गुजरात के सरकारी खजाने को लगी चपत से लेकर पनामा पेपर्स लीक का मसला ही क्यों ना हो। सतह पर सुलगते दिख रहे तमाम ज्वलंत मामलों में सामने सिर्फ उंगलियां ही दिख रही हैं, जो सभी एक दूसरे की ओर उठाये घूम रहे हैं। हालांकि अपनी खामियों, गलतियों व कमियों को सार्वजनिक तौर पर स्वीकार नहीं करना और दूसरों के हर काम की पूरी शिद्दत से नुक्ताचीनी करना तो सियासत का स्वभाव ही होता है, लेकिन उंगलियां उठाने के क्रम में इन दिनों अपने अधिकार व कर्तव्य क्षेत्र की सीमारेखा का सम्मान करना भी जरूरी नहीं समझा जा रहा है। मिसाल के तौर पर पठानकोट मामले की जांच के लिये भारत आयी पाकिस्तान की जेआईटी के मामले को लेकर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल व उनके करीबी सिपहसालारों ने प्रधानमंत्री के प्रति जिस भाषा व अलंकारों का उपयोग किया है उसे उंगली उठाने के बहाने अपना चेहरा छिपाने की कवायद ना कहें तो और क्या कहें। कहां तो पड़ोसी सूबे हरियाणा से पीने का पानी मांगना भी इनके लिये दुरूह हो रहा है और कहां ये सीधा भारत-पाकिस्तान के रिश्तों का विश्लेषण करने में जुटे हुए हैं। मुफ्त वाईफाई व बेहतरीन सार्वजनिक परिवहन सेवा देने सरीखे अपने मुख्य चुनावी वायदे को तो ये शायद ही कभी याद करते हों लेकिन वर्ष 2012 में सोने पर एक्साइज लगाने का भाजपा द्वारा किया गया विरोध इन्हें बखूबी याद है। इनके मुताबिक पाकिस्तानी जांच दल को पठानकोट जाने की इजाजत देकर प्रधानमंत्री ने भारतमाता की पीठ में छुरा घोंप दिया है लेकिन पाकिस्तानी मीडिया रिपोर्ट पर भरोसा करने के क्रम में भारतीय मीडिया द्वारा प्रचारित-प्रसारित तथ्यों को खारिज करके ये किन तत्वों का मनोबल बढ़ा रहे हैं इस पर तो इन्होंने कभी विचार भी नहीं किया होगा। जाहिर है कि दिल्ली के विकास की अपनी जिम्मेवारी निभाने से ज्यादा केन्द्र सरकार पर गरजने-बरसने में अपनी ऊर्जा खपाने के पीछे कहीं ना कहीं इनकी उंगली उठाने की आड़ में अपना चेहरा छिपाने की रणनीति ही छिपी हुई है। यही हालत कांग्रेस की भी है और भाजपा की भी। गुजरात में केजी बेसिन के मामले में बरती गयी वित्तीय व नीतिगत अनियमितताओं को लेकर सामने आयी कैग रिपोर्ट के बारे में भाजपा से कुछ पूछा जाये तो वह यह कहते हुए सीधे कांग्रेस पर उंगली उठा देती है कि जिसने दस साल के कार्यकाल में सरकारी खजाने का 15 लाख करोड़ रूपया हजम कर लिया हो उसे भ्रष्टाचार के बारे में कोई सवाल करने का नैतिक अधिकार ही नहीं है। दूसरी ओर असम में 15 साल के शासनकाल का हिसाब देने के बजाय कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व केन्द्र सरकार की नाकामियां गिनाकर ही चुनावी भवसागर पार कर लेने में जुटा हुआ है। हालांकि कांग्रेस तो अपने साठ साल के राष्ट्रव्यापी शासन का हिसाब-किताब देना भी गवारा नहीं करती अलबत्ता हर सवाल के जवाब में भाजपा की ओर उंगली उठाकर अपना चेहरा छिपाने से उसे कतई गुरेज नहीं है। खैर, विरोधियों पर उंगली उठाकर अपना चेहरा छिपाने में तो ममता बनर्जी भी कम उस्ताद नहीं हैं जिन्होंने कोलकाता में हुए फ्लाईओवर हादसे की पूरी जिम्मेवारी वामदलों की पूर्ववर्ती सरकार पर थोप दी है। लेकिन वे यह बताना जरूरी नहीं समझती कि जब उन्हें ‘परिवर्तन’ के लिये जनता का समर्थन मिला था तो पिछली सरकार द्वारा उपकृत की गयी कंपनी को ही इनका भी वरदहस्त क्यों मिलता रहा और जब रेल मंत्रालय इनकी मुट्ठी में था तब काली सूची में शामिल इसी कंपनी को बारामुला-उधमपुर में रेल टनल बनाने का ठेका क्यों दे दिया गया। जाहिर है कि हर सवाल के जवाब में उंगली उठाने की कोशिशें वास्तव में अपना चेहरा बचाने की रणनीति का ही हिस्सा रहती हैं। तभी तो पनामा पेपर्स के मामले में सीधे तौर पर आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई शुरू कराने के बजाय भाजपा यह याद दिला रही है कि उसके सभी सांसदों ने जब संसद के दोनों सदनों में अपना कोई विदेशी खाता नहीं होने का शपथपत्र दाखिल किया तो कांग्रेस के शीर्ष संचालक परिवार ने इसमें जरा भी दिलचस्पी नहीं ली और बकौल संबित पात्रा, सोनिया की आलमारी खुल जाये तो पूरा कालाधन बिखरा नजर आएगा। जाहिर है कि ऐसी दलीलों का तो कोई जवाब हो भी नहीं सकता है। लेकिन मसला है कि अपना चेहरा छिपाने के लिये दूसरों पर उंगली उठाने की रणनीति अगर सियासी सफलता की गारंटी दिला सकती तो ना भाजपा की बिहार में बुरी गत होती और ना ही एक के बाद एक विभिन्न कांग्रेसशासित सूबों में आंतरिक विद्रोह का बवंडर उठता। खैर, आम मतदाताओं के सामने दूसरों की गलतियां परोसकर अपनी कमियां छिपाने की रणनीति का कभी-कभार तात्कालिक लाभ अवश्य मिल सकता है बशर्ते बाद में ढ़ोल की पोल खुलने पर होनेवाले नुकसान की भरपाई करने का जोखिम उठाने के लिये तैयार रहा जाए। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @नवकांत ठाकुर #NavkantThakur
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