‘उल्टा चोर कोतवाल को डांटे’
वाकई बड़ा ही अजब है पाकिस्तान और गजब है उसकी नीति। खास तौर से भारत के प्रति उसका जो व्यवहार है उसके तो कहने ही क्या। लगता तो ऐसा है मानो उसने तय कर रखा है कि भारत के साथ उसे रिश्तों को बेहतर करना ही नहीं है। वर्ना ऐसा कैसे हो सकता है कि भारत की ओर से बार-बार दोस्ती का हाथ बढ़ाए जाने और उसकी पिछली गलतियों को सुपुर्दे खाक किये जाने के बावजूद वह अपनी नापाक हरकतों से बाज नहीं आए। नई दिल्ली में सरकार किसी भी पार्टी की क्यों ना हो, इस्लामाबाद के साथ रिश्ते सुधारने की कोशिशें लगातार जारी रहीं। हर बार उसकी गलतियों को भुलाने की कोशिश की गयी। इस उम्मीद में कि कभी तो हालात सुधरेंगे। कभी तो पाकिस्तान अपनी गलतियों से सबक लेगा और उसे दोबारा नहीं दोहराने की कसम लेगा। लेकिन नहीं, हर बार इधर से दोस्ती की कोशिश हुई और उधर से पीठ में छुरा घोंपा गया। अलबत्ता अब तो उसने अपना पूरा ईमान-धरम गिरवी रखकर उस चीन के साथ भारत के खिलाफ खुल्लम-खुल्ला गठजोड़ कर लिया है जिसका इतिहास ही नहीं है कि वह कभी किसी का सगा साबित हुआ हो। खैर सगा तो पाकिस्तान भी कभी किसी का नहीं हुआ बल्कि जिसने भी उसे सगा समझने की गलती की उसके हिस्से में दगा ही आयी। चाहे वह अफगानिस्तान हो या अमेरिका। लेकिन दूसरों को दगा देकर अगर पाकिस्तान ने अपना ही भला कर लिया होता तो बात कुछ और होती। यहां तो दूसरों को गिराने के लिये खोदे गये गड्ढ़े में हर बार वह खुद भी गिरा, चोटिल हुआ, लहुलुहान हुआ, बंग के रूप में अंग भंग का सामना किया, नाकाम मुल्क के तौर पर बदनाम हुआ लेकिन इससे कोई सबक नहीं लिया। तभी तो गुलाम कश्मीर के हड़पे हुए इलाके के काफी बड़े हिस्से को तस्तरी में परोसकर चीन के हवाले करने से लेकर अपने बंदरगाहों पर चीन को अपनी बादशाहत स्थापित करने के लिये आमंत्रित करने से भी उसने परहेज नहीं बरता है। और बदले में उसे केवल यह चाहिये कि किसी भी तरह से चीन कुछ ऐसा करे ताकि भारत को खून के आंसू रोने के लिये मजबूर किया जा सके। अब ऐसी बेवकूफी भरी विदेशनीति के नाते भले ही उसे पठानकोट हमले के मुख्य सूत्रधार मसूद अजहर को संयुक्त राष्ट्र संघ का प्रतिबंध झेलने से बचाने में फौरी कामयाबी मिल गयी हो या फिर भारत को परमाणु आपूर्तिकता देशों के समूह में शामिल होने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा हो, लेकिन हकीकत यही है कि चीन के साथ दोस्ती के लिये पाकिस्तान की ओर से जो कीमत चुकाई जा रही है वह उसे ही महंगी पड़नेवाली है। खैर, उसे कुछ भी महंगा पड़े या सस्ता, उससे हमें लेना एक ना देना दो। लेकिन जिस बात से हमारा सीधे तौर पर लेना-देना है वह है अपनी अंदरूनी समस्याओं को हमारे मत्थे मढ़ने की पाकिस्तान की कोशिशें। इस मामले में उसकी स्पष्ट नीति उल्टा चोर कोतवाल को डांटे सरीखी ही है। तभी तो पठानकोट के मामले को भारत की ही खुराफात साबित करने की कोशिशों के बीच उसने अपनी अंदरूनी समस्याओं के लिये भी भारत को ही जिम्मेवार बताने की साजिशें शुरू कर दी हैं। पाक अधिकृत गुलाम कश्मीर में आजादी की आवाज उठे या फिर बलूचिस्तान में दमन की इंतहा कर रही पाकिस्तानी फौज के जुल्मो-सितम से चीख-पुकार मचे। सबमें उसे भारत की ही भूमिका दिखाई देती है। यहां तक कि उसकी खुराफाती हरकतों व नापाक शैतानियों से तंग आकर खुद को शांत व मर्यादित रखने के लिये भारत तात्कालिक तौर पर भी गुफ्तगू के लिये बनाए अपने ही झरोखे पर झीना सा पर्दा डालने की कोशिश करे तो वह उसे नाकाबिले बर्दाश्त हो जाता है। अब संयुक्त राष्ट्र संघ में नियुक्त अपनी स्थायी प्रतिनिधि मलीहा लोधी को आगे करके उसने ढ़ोल बजाना शुरू कर दिया है भारत के साथ उसके रिश्ते इसलिये नहीं सुधर रहे हैं क्योंकि नई दिल्ली से समग्र बातचीत के लिये पहलकदमी नहीं की जा रही है। जाहिर है कि इससे बड़ा झूठ तो कुछ हो नहीं सकता। अलबत्ता यह सारी दुनियां जान चुकी है कि पाकिस्तान के साथ रिश्तों को सुधारने के लिये भारत के मौजूदा प्रधानमंत्री ने भी तमाम अंदरूनी आलोचनाओं के बावजूद किस कदर बढ़-चढ़कर अपना हाथ ही आगे नहीं बढ़ाया है बल्कि नवाज की नातिन को आशिर्वाद देने के बहाने खुद को ही आगे कर लिया है। इसके बाद भी अगर पाक के सनातन खुराफाती रवैये में कोई कमी नहीं आ रही है तो आखिरकार हिन्दुस्तानी निजाम को अब इस बात पर विचार करना ही होगा कि कोतवाल को घुड़की देकर खुद को बचाये रखने की चोर की बदमाशी को कब तक बर्दाश्त किया जाए। ये जब चाहे आतंकियों की घुसपैठ करा दे, सरहद पर गोलीबारी शुरू कर दे, विश्वमंच पर हमें बदनाम करता फिरे, हर कीमत अदा करके भी चीन के हाथों हमारा दिल दुखाने की साजिश रचता रहे, हमारे अंदरूनी बौद्धिक विवादों में टांग अड़ाने की कोशिश करे, हमारे मासूम मछुआरों को पकड़कर उन पर जासूसी का इल्जाम लगाये, अलगाववादियों के कांधे पर बंदूक रखकर हमारी अंदरूनी शांति व सामाजिक सौहार्द्र को निशाना बनाए और विश्वशांति के लिये खतरा बने आईएसआईएस को हमारे खिलाफ इस्तेमाल करने की नीति पर आगे बढ़ता दिखे तो ऐसे पड़ोसी के साथ रिश्ते निबाहने के लिये परंपरा की लीक से हटकर कुछ अलग लेकिन असरकारी नीति तो अपनानी ही पड़ेगी। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’
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