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शुक्रवार, 18 जनवरी 2019

‘क्या बने बात जब कांग्रेस से बात बनाए ना बने’



बात बनने से पहले ही बिगड़ती हुई दिखे तो कैसा महसूस होता है यह कोई कांग्रेस से पूछे। कहां तो कोशिश थी सभी दलों को साथ जोड़कर महागठबंधन बनाने की ताकि आगामी लोकसभा चुनाव में भाजपा की राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत घेराबंदी की जा सके। लेकिन स्थिति यह है कि किसी भी सूबे में कांग्रेस के साथ कांधे से कांधा मिलाने के लिये कोई तैयार ही नहीं है। हालांकि सबको मालूम है कि चुनावी नतीजा भाजपा के खिलाफ आने के बाद भी अपना कद ऊंचा करने के लिये उसे कांग्रेस के कांधे पर ही चढ़ना होगा। लेकिन इस समय जबकि कांग्रेस को अपनी सियासी डोली को चुनावी सफर में आगे बढ़ाने के लिये क्षेत्रीय दलों के कांधे की जरूरत है तो एक के बाद एक सभी उससे कन्नी काटते दिख रहे हैं। अपने कांधे पर कांग्रेस का वजन उठाने के लिये कोई तैयार नहीं है। यूपी में तो बसपा, सपा व रालोद यानि बुआ, बबुआ और ताऊ की तिकड़ी ने पहले ही कांग्रेस से किनारा कर लिया। लेकिन चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी को भी तेलंगाना में कांग्रेस के साथ गठजोड़ करके चुनाव लड़ने का बेहद बुरा हश्र झेलने के बाद अब आंध्र प्रदेश में हाथ का साथ पकड़ने से परहेज बरतने में ही अपनी भलाई दिख रही है। यहां तक कि लोकसभा की महज सात सीटों वाले सूबे दिल्ली में सत्तारूढ़ अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी भी कांग्रेस की लाख कोशिशों के बावजूद उसके साथ जुड़ने के लिये तैयार नहीं है। जबकि इस गठबंधन में बाधक बन रहे अजय माकन का प्रदेश अध्यक्ष पद से इस्तीफा भी हो गया और प्रदेश कांग्रेस की कमान 80 वर्षीया बुजुर्ग नेत्री शीला दीक्षित को भी सौंप दी गई ताकि आप के साथ संबंध कायम करने में कोई परेशानी ना हो। लेकिन केजरीवाल कांग्रेस को ऊंचा उठाने के लिये अपना कांधा लगाने को कतई तैयार नहीं हैं। आलम यह है कि कर्नाटक में कांग्रेस ने जिस जेडीएस की सरकार बनवाई वह भी बुरी तरह बिदकी हुई है। जेडीएस के शीर्ष नेता एचडी देवेगौड़ा तो काफी पहले ही यह बता चुके हैं कि कांग्रेस के साथ चुनाव पूर्व गठबंधन तार्किक नहीं है। लेकिन मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी जिस तरह कांग्रेसियों से दुखी होकर रो-गा रहे हैं कि उनकी स्थिति क्लर्क की बन कर रह गई है ऐसे में कौन सोच सकता है कि कांग्रेस को सियासी बेड़ा पार करने के लिये जेडीएस अपने कांधे पर सवार होने की इजाजत देगी। उधर ओडिशा में मुख्यमंत्री नवीन पटनायक की बीजू जनता दल तो पहले ही अपना सफर अपने दम पर तय करने का इरादा जता चुकी है जबकि छत्तीसगढ़ में भी अजीत जोगी विधानसभा की तरह लोकसभा चुनाव अपने दम पर ही लड़ने का इरादा जाहिर कर चुके हैं। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस इस डर से कांग्रेस को अपना कांधा मुहैया कराने के लिये तैयार नहीं है कि कहीं कल को वामदलों के साथ मिलकर वह उसके लिये खतरे का तूफान ना खड़ा कर दे जबकि केरल में वामदल कतई कांग्रेस को अपने करीब नहीं आने देना चाह रहे हैं। असम में भी स्थानीय दलों के साथ कांग्रेस का समझौता नहीं हो पा रहा है जबकि जम्मू-कश्मीर में एनसी और पीडीपी के बीच फंसी कांग्रेस तय ही नहीं कर पा रही है कि इधर जाए या उधर जाए। यानि समग्रता में देखें तो राष्ट्रीय स्तर पर तस्वीर ऐसी बन रही है कि लोकसभा के कुल 543 में से 269 सीटों के लिये सांसद चुननेवाले उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, असम, छत्तीसगढ़, जम्मू कश्मीर, कर्नाटक, केरल, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और दिल्ली सरीखे ग्यारह सूबों में यह अभी से तय है कि कांग्रेस को चुनावी वैतरणी पार करने के लिये कोई मजबूत कांधा मयस्सर नहीं हो पाएगा। इन तमाम सूबों में चुनाव त्रिकोणीय होगा जिसमें सबसे बड़ी स्थानीय ताकत का सहयोग कांग्रेस को नहीं मिल पाएगा। दरअसल बीते दिनों हुए चुनाव के नतीजों ने यह उम्मीद प्रबल कर दी है कि इस बार जनमानस का बहुमत भाजपा के खिलाफ जाने वाला है। जबकि कांग्रेस ने बेशक आमने-सामने की लड़ाई में राजस्थान व मध्य प्रदेश से लेकर छत्तीसगढ़ तक में भाजपा को शिकस्त देने में कामयाबी हासिल कर ली हो लेकिन उसकी राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के विकल्प के तौर पर स्वीकार्यता नहीं होने की बात से भी सभी वाकिफ हैं। हालांकि कांग्रेस को साथ लेकर गैर-भाजपाई गठजोड़ बनाने का लाभ भी सबको दिखाई पड़ रहा है लेकिन इसमें स्थानीय ताकतों को अपना हित सुरक्षित नजर नहीं आ रहा है। आखिर राजनीति है भी असीमित संभावनाओं को संभव कर दिखाने का खेल। उसमें भी माहौल इतना बेहतर है कि भाजपा सिमटती दिख रही है और कांग्रेस की स्वीकार्यता में कोई इजाफा नहीं दिख रहा। ऐसे में अगर तीसरी ताकतें कांग्रेस को ऊंचा उठाने के लिये अपना कांधा लगाने के बजाय अपने ही कद को ऊंचा करने की रणनीति बना रही हैं तो इसमें कुछ भी गलत नहीं है। भले ही बाद में सत्ता के शिखर को छूने के लिये आवश्यक ऊंचाई हासिल कर पाना कांग्रेस के कांधे पर सवार हुए बिना संभव ना हो सके। लेकिन कांग्रेस को किनारे लगाकर त्रिकोणीय व बहुकोणीय टकराव में अपना फायदा देखनेवालों को यह नहीं भूलना चाहिये कि विरोधियों के ऐसे ही बिखराव ने बीते आम चुनाव में महज 32 फीसदी वोट पाने वाली भाजपा को अपने दम पर पूर्ण बहुमत का आंकड़ा हासिल करा दिया था। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’  @ नवकांत ठाकुर 


गुरुवार, 20 दिसंबर 2018

‘सत्ता-पक्ष और मुख्य-विपक्ष पर हावी होता तीसरा-पक्ष’

यूपी में कांग्रेस को किनारे धकेल कर बबुआ-बुआ और ताऊ की संयुक्त ताकत से सियासत की नई इबारत लिखने की हो रही कोशिश कतई अप्रत्याशित नहीं है। बहनजी ने तो काफी पहले ही अपने इरादों का इजहार कर दिया था कि वे इस बार केन्द्र में मजबूत नहीं बल्कि मजबूर सरकार बनवाने के पक्ष में हैं। काफी हद तक ऐसी ही चाहत अखिलेश यादव की सपा, शरद पवार की राकांपा, ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस और चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी सरीखे ऐसे दलों की भी है जिन्होंने इस बार अपने हक में सत्ता का छींका टूटने की उम्मीद बांध रखी है। ये वो दल हैं जिनका प्रभाव क्षेत्र इतना विस्तृत है कि इनमें से हर कोई तीसरी सबसे बड़ी ताकत के तौर पर उभरने की पूरी काबलियत रखता है। लिहाजा इन सबके बीच इस बात पर तो पूरी तरह आम सहमति का माहौल है कि इस बार केन्द्र में संसद का स्वरूप त्रिशंकु रहे और जोड़-तोड़ व जुगाड़ के बिना कोई सरकार ना बना पाए। लेकिन मसला है कि त्रिशंकु जनादेश की सूरत में मजबूर सरकार तो तब बनेगी जब संसद में किसी दल को ना तो बहुमत हासिल होगा और ना ही उसकी स्थिति ऐसी होगी कि सिर्फ दो-तीन बड़े दलों के समर्थन से बहुमत के जादूई आंकड़े को हासिल कर ले। यानि देश की दोनों सबसे बड़ी पार्टियां भाजपा और कांग्रेस जब अधिकतम डेढ़ सौ सीटों के नीचे सिमटेंगी तभी तीसरी ताकतों की किस्मत से सत्ता का छींका टूटने की संभावना बन पाएगी। हालांकि भाजपा को कमजोर करने की कोशिश कर रहे भीतराघाती सहयोगियों की ओर से भी ऐसा प्रयास अवश्य किया जाएगा और पांच राज्यों का चुनावी नतीजा सामने आने के बाद इस संभावना को काफी बल मिला है कि अगर क्षेत्रीय ताकतें अपने हितों को सर्वोपरि रखते हुए भाजपा को फैलने और फलने-फूलने के लिये पर्याप्त सीटों पर लड़ने का मौका ना दें तो भगवा खेमा भी चुनाव के बाद जोड़-तोड़ और जुगाड़ के बिना दोबारा अपनी सरकार नहीं बना पाएगा। इसी संभावना को भुनाने के लिये अब रामविलास पासवान की लोजपा ने भी बिहार के अलावा यूपी-झारखंड में हिस्सेदारी के लिये त्यौरियां दिखानी शुरू कर दी हैं और शिवसेना की उम्मीदें और अपेक्षाएं भी कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। इसके अलावा अभी छोटे क्षेत्रीय दलों की मांगों का सामने आना और उस पर विचार होना तो बाकी ही है। यानि राजग के घटक दलों की कोशिश निश्चित ही यही रहेगी कि वे चुनाव लड़ने के लिये अधिकतम सीटें प्राप्त करें ताकि चुनाव के बाद भगवा खेमे की उन पर निर्भरता बढ़े जिससे संसदीय भागीदारी के अनुपात में सत्ता की मलाई में अधिकतम हिस्सेदारी सुनिश्चित की जा सके। दूसरी ओर विपक्षी खेमे में भी इस बात का पुरजोर प्रयास हो रहा है कि भाजपा के स्वाभाविक विकल्प के तौर पर कांग्रेस को कतई नहीं उभरने दिया जाये। इसी सोच के तहत कांग्रेस को किनारे लगाने की कोशिश यूपी में भी होती हुई दिखाई पड़ रही है और इसी रणनीति क तस्वीर तीन राज्यों में हुई कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों की ताजपोशी के मंच पर भी दिखाई पड़ी। उस शपथ ग्रहण समारोह से केवल सपा और बसपा ने ही किनारा नहीं किया बल्कि पवार-ममता सरीखे विपक्ष के दिग्गज छत्रप भी नदारद रहे। दरअसल भाजपा से तीन राज्य छीनने में कामयाब रहनेवाली कांग्रेस अब उन विपक्षियों की आंखों में खटकने लगी है जो मजबूर सरकार गठित करने के ठोस दावेदार के तौर पर उभरने की उम्मीद पाले हुए हैं। इन चुनावों में यह तो स्पष्ट हो ही गया कि अगर कांग्रेस पूरे दम-खम से राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के खिलाफ विकल्प बनकर खड़ी हो जाए और क्षेत्रीय दलों का उसे पूरा सहयोग मिल जाए तो चुनावी नतीजों की तस्वीर में जादूई परिवर्तन होने की संभावना को कतई नकारा नहीं जा सकता है। लेकिन इस समीकरण को सार्थक करना क्षेत्रीय दलों के लिहाज से लाभदायक नहीं है। उनको अधिकतम लाभ तो तब होगा जब भाजपा हार जाए लेकिन कांग्रेस जीत नहीं पाए। ऐसी तस्वीर तभी बन सकती है जब तीसरी व क्षेत्रीय ताकतें सूबाई स्तर पर या तो कांग्रेस को तभी अपने साथ जोड़ें जब वह न्यूनतम सीटों पर लड़ने के लिये सहमत हो वर्ना कांग्रेस और भाजपा से समानांतर दूरी बनाकर चुनाव लड़ना ही उनके लिये श्रेयस्कर होगा। चुंकि यूपी में कांग्रेस की मांग को पूरा करने के बाद सपा-बसपा के पास आपस में बांटने के लिये उतनी सीटें ही नहीं बचेंगी जितनी वे अपने दम पर भी आसानी से जीतने की क्षमता रखती हैं लिहाजा कांग्रेस को किनारे लगाकर आगे बढ़ना ही बुआ-बबुआ और ताऊ के लिये लाभदायक दिखाई पड़ रहा है। यही स्थिति बिहार में भी बन सकती है अगर लोजपा ने राजग से निकल कर महागठबंधन के साथ जुड़ने का मन बना लिया। वैसे भी कांग्रेस की कमजोरी यही है कि उसके पास यूपी, बंगाल, बिहार और झारखंड के ऐसे क्षेत्र में समाज के किसी भी वर्ग के बीच अपना ठोस जनाधार ही नहीं बचा है जहां से लोकसभा के कुल एक-तिहाई से अधिक सांसद जीत कर आते हैं। लोकसभा की एक-तिहाई सीटों का निर्वाचन करनेवाले बंगाल सहित दक्षिणी राज्यों में भाजपा की भी ऐसी ही ठोस जनाधार विहीनता स्थिति है। ऐसे में क्षेत्रीय दलों के उभार को रोकना और किसी बड़ी लहर के बिना होने वाले चुनाव में मजबूत सरकार के लिये जनादेश आ पाना तो नामुमकिन की हद तक मुश्किल ही है। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’   @नवकांत ठाकुर  #Navkant_Thakur    

गुरुवार, 15 नवंबर 2018

‘जहां से हैं उम्मीदें, वहीं हो रही भाजपा की फजीहत’

जहां से उम्मीदें पाल रखी हों वहीं अगर फजीहत झेलनी पड़ जाए तो किस कदर निराशा का वातावरण बनने लगता है इसका बखूबी अंदाजा इन दिनों भाजपा को हो रहा है। दरअसल आगामी लोकसभा चुनाव में जीत दर्ज करा कर सत्ता पर अपनी पकड़ बरकरार रखने की भाजपा की उम्मीदें इस बार पश्चिम बंगाल और ओडिशा के अलावा उन दक्षिणी सूबों पर टिकी हुई हैं जहां पिछले चुनाव में कथित मोदी लहर का कोई असर नहीं पड़ा था। हालांकि पूर्वोत्तर के विधानसभा चुनावों से लेकर ओडिशा व पश्चिम बंगाल तक में हुए स्थानीय निकायों के चुनावों में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराके भाजपा ने लोकसभा चुनाव में इन क्षेत्रों में बेहत प्रदर्शन की उम्मीदें कायम रखी हुई हैं लेकिन दक्षिणी राज्यों से भाजपा ने जितनी उम्मीदें पाली हुई हैं उसके पूरा हो पाने की संभावना लगातार कमजोर होती दिख रही है। दक्षिण भारत में भाजपा के लिये लिटमस टेस्ट कहे जाने वाले कर्नाटक में हुए लोकसभा के तीन और विधानसभा के दो सीटों के उपचुनाव का जो नतीजा सामने आया है उसने यह साफ कर दिया है तमाम कोशिशों के बावजूद दक्षिणी राज्यों के मतदाताओं का विश्वास जीतने में भाजपा कतई कामयाब नहीं हो पायी है। यह चुनाव ऐसे समय में हुआ है जब अगले साल के लोकसभा चुनाव का वक्त बेहद करीब है और तमाम पार्टियां केन्द्र की सत्ता पर कब्जा जमाने के लिये उतावलापन दिखा रही हैं। ऐसे समय में अगर लोकसभा की तीन में से अपनी जीती हुई केवल एक सीट पर ही बढ़त कायम रहे जबकि दो सीटों पर शिकस्त का सामना करना पड़े और विधानसभा की दोनों सीटें गंवानी पड़े तो समझा जा सकता है कि सूबे का माहौल किस कदर भाजपा के लिये बदस्तूर चुनौती बना हुआ है। हालांकि यह पहला उपचुनाव नहीं है जिसमें भाजपा को शिकस्त का सामना करना पड़ा हो बल्कि वर्ष 2014 में हुए लोकसभा चुनाव के  बाद से अब तक देश भर में 30 लोकसभा सीटों पर उपचुनाव हुए हैं जिनमें से भाजपा को केवल छह सीटें दोबारा जीतने में ही कामयाबी मिल पाई है। जबकि जिन 30 सीटों पर उपचुनाव हुए उनमें से कुल 16 भाजपा के कब्जेवाली थी और विपक्ष की जीती हुई केवल 14 सीटें ही थीं। लेकिन भाजपा को किसी भी उपचुनाव में विपक्ष के कब्जे वाली एक भी सीट जीतने में कामयाबी नहीं मिल सकी और उसने अपने कब्जे वाली दस सीटें भी गंवा दीं जिसके नतीजे में अब लोकसभा में उसकी सीटों का आंकड़ा 282 से घटकर 272 रह गया है। लेकिन अब तक हुए उपचुनावों का नतीजा सामने आने के बाद भाजपा को उम्मीद रहती थी कि स्थिति को सुधार लिया जाएगा जबकि अब स्थिति को सुधारने का वक्त बचा ही नहीं है। अब तो समय है जमीनी हकीकत को स्वीकार करते हुए स्थिति के मुताबिक ढ़लने और खुद को बदलने का ताकि संभावित नुकसान कम से कम किया जा सके। सच तो यह है कि वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने हिन्दी पट्टी के प्रदेशों में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन का रिकार्ड बना लिया था जिसके बाद अब आगामी चुनाव में इससे आगे बढ़ पाने की कोई राह ही नहीं बची है। बल्कि भाजपा को भी पता है कि राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात सरीखे जिन पांच सूबों की सभी लोकसभा सीटों पर उसे पिछली बार सौ फीसदी सीटों पर जीत हासिल हुई थी और यूपी की अस्सी में से 73 सीटों पर उसने कामयाबी का झंडा गाड़ा था उस प्रदर्शन को दोहरा पाना नामुमकिन की हद तक मुश्किल है। ऐसे में उसकी निगाहें पूर्वोत्तर के अलावा दक्षिणी राज्यों पर ही टिकी हुई थीं और उत्तर व पश्चिमी राज्यों में संभावित नुकसान की भरपाई के लिये वह पूरब, पूर्वोत्तर और दक्षिण में ही अपने प्रदर्शन को सुधारने के अभियान में जुटी हुई थी। इसमें कर्नाटक का महत्व इसलिये भी बढ़ जाता है क्योंकि इसे दक्षिण भारत का प्रवेश द्वार कहा जाता है और दक्षिण में भाजपा की जीत का दरवाजा तभी खुल सकता है जब कर्नाटक में बेहतर प्रदर्शन की पक्की गारंटी हो जाए। लेकिन स्थिति यह है कि कर्नाटक, केरल, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और तमिलनाडु की कुल 139 लोकसभा सीटों में से भाजपा को केवल कर्नाटक की 28 और आंध्र प्रदेश की 25 सीटों से ही कुछ आस है जबकि बाकी सूबों में उसका खाता ही खुल जाए तो बहुत बड़ी बात होगी। हालांकि आंध्र और कर्नाटक में भी भाजपा विरोधी वोटों का बिखराव रोकने के लिये कांग्रेस ने मजबूत घेराबंदी कर दी है जिससे बच बेहद मुश्किल होने वाला है। दूसरी ओर बिहार और यूपी की कुल 120 सीटों में से बिहार की 40 सीटों पर उसके लिये मुकाबला बेहद कड़ा रहना स्वाभाविक ही है जबकि यूपी में अगर विपक्षी दलों का महागठजोड़ कायम हो गया तो भाजपा को लेने के देने पड़ सकते हैं। यानि समग्रता में देखा जाये तो लोकसभा की 543 में से दक्षिण और यूपी-बिहार की कुल 259 सीटें अलग कर दें तो बाकी बची 284 सीटों पर ही भाजपा इस समय विपक्ष को टक्कर देने की स्थिति में है और उसमें भी अगर भाजपा की कमजोर स्थिति वाली ओडिशा, पश्चिम बंगाल, जम्मू कश्मीर और पंजाब सरीखे सूबों की सीटों को अलग कर दें तो ऐसी सीटें ही दो सौ से कम बचती हैं जहां से वाकई भाजपा अपनी जीत की बुनियाद रखने में सक्षम हो सकती है। लिहाजा अब केन्द्र में भाजपा की वापसी की संभावनाएं तभी बन सकती हैं जब अव्वल तो विपक्ष का गठजोड़ ना बने और दूसरे अपनी मजबूत उपस्थिति वाली सीटों पर वह जीत दर्ज कराने में कामयाब हो सके। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर  #Navkant_thakur

बुधवार, 31 अक्टूबर 2018

‘साथियों को संतुष्ट करने की चुनौती इधर भी है, उधर भी’

क्षेत्रीय दलों की महत्वाकांक्षाएं राष्ट्रीय दलों को किस कदर हैरान व परेशान करती रही हैं यह सर्व-विदित ही है। तभी तो मोदी-शाह की जुगल जोड़ी के राष्ट्रीय राजनीति में प्रादुर्भाव से पूर्व गठबंधन सरकारों के दौर में लालकृष्ण आडवाणी को एक जनसभा में औपचारिक तौर पर मतदाताओं से अपील करनी पड़ी थी कि वे भाजपा को वोट नहीं देना चाहें तो बेशक ना दें लेकिन किसी क्षेत्रीय पार्टी को वोट देने से बेहतर होगा कि वे कांग्रेस को अपना वोट दे दें। जाहिर तौर पर इस आह्वान के पीछे आडवाणी का वह दर्द ही छिपा हुआ था जो अटल युग में गठबंधन की सरकार चलाने के दौरान भाजपा को क्षेत्रीय दलों से मिला था। हालांकि अपने दम पर बहुमत हासिल नहीं कर पाने वालों क्षेत्रीय दलों के समर्थन से ही मजबूती मिलती है लेकिन इसके एवज में जो कीमत चुकानी पड़ती है उसका दर्द ऐसा होता है कि सहा भी ना जाए और किसी से कहा भी ना जाए। इन दिनों ऐसा ही दर्द भाजपा को भी झेलना पड़ रहा है जिसने लोकसभा में हासिल पूर्ण बहुमत के ताव में बीते साढ़े चार सालों तक अपने समर्थक दलों को मनमर्जी से हाथ उठाकर जो भी दे दिया वे उससे ही संतुष्टि जताते रहे और सही मौके का इंतजार करते रहे। किसी ने उफ तक नहीं की और कोई ऐसी मांग भी सामने नहीं रखी जिससे वह भाजपा की नजरों में खटक जाए। लेकिन अब आगामी आम चुनावों की नजदीकियों को देखते हुए राजग के घटक दलों में असंतोष भी उभरने लगा है और उनकी महत्वाकांक्षाएं भी कुलाचें मारने लगी हैं। ऐसा होना स्वाभाविक भी है क्योंकि भाजपा को अगर दोबारा सत्ता में आना है तो उसे इनको अपने साथ लेकर चलना ही होगा। लेकिन इन दलों के सामने ऐसी कोई विवशता नहीं है। सरकार भाजपा बनाये या कांग्रेस अथवा कोई अन्य मोर्चा। इनकी ख्वाहिश तो बस इतनी ही है कि जो भी सरकार बने वह मजबूर बने। तभी उसे मजबूती देने के एवज में इनकी दसों उंगलियां घी में होंगी और सिर कढ़ाही में। वर्ना अभी की तरह दया से हासिल खैरात पर ही निर्भर रहकर उन्हें पिछलग्गू बनकर चलना होगा और सरकार का जयकार करना होगा। खैर, अभी यह कहना तो जल्दबाजी होगी कि आगामी सरकार मजबूत बनेगी या मजबूर। लेकिन दोनों ही सूरतों के लिये अपनी मजबूती सुनिश्चित करने के मकसद से तमाम क्षेत्रीय दलों ने अभी से अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं। इसी सिलसिले में जिस तरह से बसपा ने कांग्रेस की बांह मरोड़ी हुई है उसी प्रकार राजग के घटक दलों ने भी भाजपा की सींग पकड़ कर उसे नाच नचाना शुरू कर दिया है। इन दलों का साफ तौर पर कहना है कि वे गठबंधन में तभी शामिल होंगे जब उनकी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति की जाएगी और सम्मानजनक संख्या में सीटें आवंटित की जाएंगी। यानि इन दलों का विकल्प खुला हुआ है कि जिधर अधिक मान-सम्मान मिलेगा और भविष्य सुनिश्चित दिखाई देगा उधर कूच करने में ये कतई देर नहीं लगाएंगे। इसके लिये दबाव बढ़ाने की शुरूआत जदयू ने की तो भाजपा ने उसे बिहार में अपने बराबर सीटें देने का वायदा करके उसे मना लिया। लेकिन जदयू से समझौता होने के बाद से रालोसपा और लोजपा फैल गए हैं। लोजपा ने ना सिर्फ अपनी जीती हुई तमाम सीटों पर दावा ठोंक दिया है बल्कि उसने अपने शीर्षतम नेता रामविलास पासवान के लिये भाजपा से राज्यसभा की सीट भी मांगी है। इसके अलावा कांग्रेस छोड़कर लोजपा में शामिल हुए मणिशंकर पांडेय के लिये पार्टी ने यूपी में भी हिस्सेदारी मांगी है। उधर रालोसपा ने भी साफ कर दिया है कि पिछली बार की तरह उसे बिहार की तीन लोकसभा सीटें नहीं दी गई तो वह गठबंधन से बाहर निकलने के विकल्पों पर भी विचार कर सकती है। भाजपा पर दबाव बढ़ाने के लिये रालोसपा ने मध्य प्रदेश की 66 विधानसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार भी उतार दिये हैं। बताया जाता है कि लोजपा और रालोसपा को लपकने के लिये राजद की अगुवाई वाला महागठबंधन भी जुगत बिठा रहा है और इन दोनों दलों को भाजपा द्वारा आवंटित की गई सीटों से अधिक सीटें देने का प्रलोभन भी दिया जा रहा है। दूसरी ओर यूपी में अपना दल हो या सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी। दोनों की ओर से भाजपा पर अधिकतम सीटों का पुरजोर दबाव है। इसी प्रकार शिवसेना भी भाजपा पर इस बात के लिये दबाव बनाए हुए है कि महाराष्ट्र में उसे अधिकतम सीटें आवंटित की जाएं और गुजरात, गोवा व मध्य प्रदेश में भी उसे हिस्सेदारी दी जाए। वर्ना आगामी चुनाव में अपनी खिचड़ी अलग पकाने का ऐलान तो पहले ही किया जा चुका है। ऐसी ही मांगें बाकी दलों की ओर से भी आगे की जा रही हैं और स्थिति यह है कि भाजपा के लिये राजग को पिछले चुनाव की शक्ल में बरकरार रख पाना भारी सिरदर्दी का सबब बनता जा रहा है। वैसे भी बिहार, पंजाब, दिल्ली और कर्नाटक के विधानसभा चुनावों और यूपी के गोरखपुर व फूलपुर सरीखे गढ़ों के उपचुनावों ने यह तो बता ही दिया है कि ना तो मोदी की कोई राष्ट्रव्यापी लहर चलनेवाली है और ना ही भाजपा अपने दम पर अजेय हो सकती है। ऐसे में भाजपा की विवशता है सबको साथ लेकर चलने की और उसकी इस विवशता का अधिकतम दोहन करने से भला कोई क्यों पीछे रहे? ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’   @नवकांत ठाकुर #Navkant_Thakur

गुरुवार, 4 अक्टूबर 2018

‘भूमि परा कर गहत अकासा’ की स्थिति में बसपा


कहते हैं कि जिसके पास खोने के लिये कुछ नहीं होता उसके सामने पाने के लिये सारा जहान होता है। यही स्थिति है बसपा सुप्रीमो मायावती की। आखिर बचा ही क्या है उनके पास खोने के लिए? लोकसभा में पिछली बार ही बसपा का पूरी तरह सफाया हो गया था। इस बार सूबे की विधानसभा में भी हाथी की सवारी करके महज 19 विधायक ही जीत दर्ज कराने में कामयाब हो पाए हैं। सच पूछा जाए तो वर्ष 2007 के चुनाव में सोशल इंजीनियरिंग के दम पर 206 सीटें जीत कर सूबे में अपनी सरकार बनाने वाली बसपा का बेड़ा तो 2012 के विधानसभा चुनाव में ही गर्क हो गया जब उसे महज 80 सीटों पर ही जीत नसीब हुई और 126 सीटें उसके हाथों से फिसल गईं। लेकिन वहां से संभलने के बजाय बसपा का हाथी चुनावी दलदल में नीचे की ओर ही धंसता चला गया और इस बार के विधानसभा चुनाव में तो उसे सिर्फ 19 सीटों से ही संतोष करना पड़ा। यानि अब बसपा के पास गंवाने के लिये कुछ नहीं बचा है। कुछ नहीं बचने का मतलब वाकई पल्ले में कुछ नहीं होना ही है क्योंकि अपने मौजूदा विधायकों की तादाद के दम पर बसपा राज्यसभा की एक भी सीट नहीं जीत सकती। लेकिन संसद या विधानसभा में सीटों की तादाद की बात अलग कर दें तो जमीन पर बसपा की स्थिति उतनी प्रतिकूल नहीं है। बीते लोकसभा चुनाव में बसपा ने भले ही एक भी सीट ना जीती हो लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर चार फीसदी से अधिक और यूपी में भी बीस फीसदी से अधिक वोट हासिल करके जनाधार के मामले में वह देश की तीसरी सबसे ताकतवर पार्टी के तौर पर सामने आई। इसी प्रकार यूपी विधानसभा के लिये पिछले साल हुए चुनाव में भी बसपा के खाते में सवा बाईस फीसदी वोट आए। यानि इस बात से कतई इनकार नहीं किया जा सकता है कि तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद बसपा का परंपरागत वोटबैंक लगातार उसके साथ पूरी तरह जुड़ा हुआ है लिहाजा पार्टी को शून्य या समाप्त मान लेना कतई उचित नहीं होगा। ऐसे में बसपा के पास दो विकल्प हैं। या तो वह महा-गठजोड़ में शामिल होकर अपनी वापसी के लिये सुरक्षित राह अपनाए जिसमें सीमित तादाद में सीटों पर लड़ने के बावजूद उसके पास सम्मानजनक संख्या में सीटें जीतने की संभावना बन सकती है। लेकिन इस विकल्प पर अमल करने के नतीजे में उसे केन्द्र की राजनीति में अग्रिम मोर्चे पर आने का लोभ-मोह छोड़ना होगा और कांग्रेस का हाथ मजबूत करने में सहभागी बनना होगा। लेकिन दूसरा विकल्प यह है कि बसपा ‘तूफानों से आंख मिलाए, सैलाबों पर वार करे, मल्लाहों का चक्कर छोड़े, तैर कर दरिया पार करे।’ फिलहाल बसपा ने दूसरे विकल्प को आजमाने की ही राह पकड़ी है ताकि अपने बाजुओं की ताकत को तौलने और जमीनी स्तर पर बह रही हवाओं की दशा-दिशा का ठोस आकलन करने के बाद ही लोकसभा चुनाव के लिये निर्णायक रणनीति बनाई जाए। इसी वजह से पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में उसने कांग्रेस से किनारा करके अपनी अलग राह पकड़ी है। खास तौर से उसे संभावना टटोलनी है मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में जहां उसने तीसरी ताकत के तौर पर उभरने का लक्ष्य निर्धारित किया है। अब तमाम संभावनाएं इस बात पर टिकी हैं कि जमीनी स्तर पर भाजपा की मजबूती यथावत बरकरार है अथवा मतदाता विकल्प की तलाश में हैं। अगर विकल्प की तलाश के प्रति मतदाताओं का रूझान सामने आया तो कांग्रेस और भाजपा के साथ समानांतर दूरी कायम करके चलना ही बसपा के लिये मुनासिब होगा। वैसे भी मतदाताओं द्वारा विकल्प की तलाश किया जाना तीसरी ताकतों के लिये बेहद शुभ संकेत होगा क्योंकि इससे लोकसभा चुनाव में खंडित जनादेश आने की संभावना प्रबल हो जाएगी। हालांकि बसपा इकलौती पार्टी नहीं है जो खंडित जनादेश का सपना देख रही है और केन्द्र में मजबूर सरकार बनने की दुआ कर रही है। बल्कि एनसीपी, तृणमूल कांग्रेस और वामपंथी दलों से लेकर टीडीपी तक की ख्वाहिश यही है कि इस बार के लोकसभा चुनाव में कांग्रेसनीत संप्रग और भाजपानीत राजग में से जो भी आगे निकले उसका सफर अधिकतम डेढ़-सौ से दौ-सौ सीटों के बीच ही ठहर जाए। ऐसी सूरत में तीसरी ताकतों को आगे आने का सुनहरा मौका मिलेगा और उसमें भी जिसकी जितनी संख्या भारी होगी उसकी उतनी ही प्रबल दावेदारी होगी सत्ता की मलाई में अधिकतम हिस्सेदारी की। इसी सोच के तहत कांग्रेस और भाजपा से अलग हटकर कई धाराएं अपनी दिशा तलाश रही हैं जिसमें मायावती से लेकर ममता बनर्जी और शरद पवार का नाम मुख्य रूप से शामिल है। चुंकि मायावती के पास फिलहाल खोने के लिये कुछ भी नहीं बचा है लिहाजा अगर वह ‘भूमि परा कर गहत अकासा’ यानि जमीन से उठकर पूरे आसमान को पकड़ने का प्रयास कर रही है तो इसमें कुछ भी गलत या अस्वाभाविक नहीं है। वैसे भी मौजूदा राजनीतिक हालातों में बसपा के पास दोबारा सोशल इंजीनियरिंग की उस रणनीति को आजमाने का मौका है जिसके दम पर उसने पिछले दशक में यूपी में अपनी पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी। अगर यह रणनीति कामयाब रही तो तीसरी सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरने का बसपा के पास इस बार बेहतरीन मौका है जिसे सिर्फ अपने अस्तित्व पर आए तात्कालिक खतरे से डर कर गंवाना किसी भी लिहाज से कतई उचित नहीं होगा। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’  @ नवकांत ठाकुर #Navkant_Thakur

मंगलवार, 7 अगस्त 2018

जोरदार प्रहार के लिये दमदार मुद्दे की दरकार

केन्द्र की मोदी सरकार को सत्ता से बेदखल करने के लिये विपक्ष की बेचैनी किसी से छिपी ने नहीं है। इसके लिये समूचा विपक्ष कुछ भी कर गुजरने के लिये सैद्धांतिक तौर पर पूरी तरह तैयार हो चुका है। राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस ने प्रधानमंत्री पद पर अपनी दावेदारी वापस ले ली है तो प्रदेश स्तर पर यूपी में सबसे बड़ा विपक्षी दल होने के बावजूद सपा ने महागठबंधन के लिये कुर्बानी देते हुए अपनी तुलना में बसपा को अधिक सीटें देने की स्वीकृति का संकेत दे दिया है। बिहार में राजद ने सभी गैर-भाजपाई ताकतों को महागठबंधन में सम्मानजनक तरीके से समाहित करने के लिये तमाम खिड़की-दरवाजे खोल दिये हैं तो पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के महागठबंधन में शामिल होने का प्रस्ताव लेकर ममता बनर्जी दिल्ली में कांग्रेस के शीर्ष संचालक परिवार सदस्यों से एकांत में बातचीत कर चुकी हैं। सुदूर दक्षिण में द्रमुक के साथ कांग्रेस के तालमेल की रूपरेखा पहले ही तैयार हो चुकी है जबकि जम्मू कश्मीर में नेशनल कांफ्रेंस भी महागठजोड़ का हिस्सा बनने के लिये पहले से तैयार है। कर्नाटक में जद-एस की नाराजगी को दूर करते हुए कांग्रेस ने उसे किसी भी मसले पर सीधा केन्द्रीय नेतृत्व से संवाद कायम करने की मंजूरी दे दी है और आंध्र प्रदेश व तेलंगाना से लेकर महाराष्ट्र तक में भाजपानीत राजग के खिलाफ दिख रहे तमाम दलों को एकजुट होकर चुनाव लड़ने के लिये मनाया-समझाया जा रहा है। यानि बीते लोकसभा चुनाव में विपक्षी वोटों के बिखराव के कारण महज 32 फीसदी वोट पाकर ही संसद में अपने दम पर पूर्ण बहुमत का आंकड़ा हासिल कर लेने वाली भाजपा की चैतरफा घेरेबंदी करके यह सुनिश्चित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी जा रही है कि भाजपा को नकारने के लिये पड़नेवाला एक भी वोट विपक्ष के बिखराव के कारण बर्बाद ना हो सके। इस तरह 2019 के आम चुनाव की रणभूमि के लिये व्यूह रचना की निर्णायक रूपरेखा तैयार कर ली गयी है। लेकिन सवाल है कि महारथियों के व्यूह को धारदार व मारक हथियारों से लैस किये बिना सत्ता पक्ष पर जोरदार प्रहार करके उसे परास्त करने की योजना को कैसे सफल किया जा सकता है। इस लिहाज से देखा जाये तो सरकार पर जोरदार प्रहार करने के लिये दमदार मुद्दों के हथियार का चयन करने के मकसद से हुई कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक के नतीजे से कोई उत्साहजनक वातावरण नहीं बन पा रहा है। हालांकि समान विचारधारा वाले तमाम दलों को अपने साथ मजबूती से जोड़ने के लिये कांग्रेस ने प्रधानमंत्री पद का लाॅलीपाॅप अपने दरवाजे के बाहर अवश्य लटका दिया है लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर सबसे बड़ा गैर-भाजपाई दल होने के नाते महागठबंधन की धुरी की भूमिका तो कांग्रेस को ही निभानी होगी। क्योंकि राष्ट्रीय स्तर पर प्रसार की बात करें तो कांग्रेस के अलावा बाकी सभी पार्टियों की पहुंच क्षेत्रीय व सूबाई स्तर तक ही सिमटी हुई है। लिहाजा चुंकि राष्ट्रीय स्तर पर महागठबंधन बनाकर भाजपा के खिलाफ मजबूत घेराबंदी तैयार करने की जिम्मेवारी कांग्रेस के ही कांधों पर है तो फिर ऐसे मुद्दों के हथियारों का चयन भी उसे ही करना होगा जिसका राष्ट्रव्यापी प्रयोग कर पाना संभव हो। हालांकि इस जिम्मेवारी को निभाते हुए कार्यसमिति की दूसरी बैठक में कांग्रेस ने जिन मुद्दों का चयन किया है उनमें असम के नागरिकता रजिस्टर से 40 लाख लोगों का नाम नदारद होना, फ्रांस से राफेल जहाजों की खरीद में हुआ भ्रष्टाचार, बैंकों में हुई धोखाधड़ी और बढ़ती बेरोजगारी का मसला मुख्य रूप से शामिल है। लेकिन इनमें से एक की भी मारकता ऐसी नहीं दिख रही है जो भाजपा की विश्वसनीयता व स्वीकार्यता के कवच में छेद कर उसके मर्मस्थल को भेदने में सक्षम हो। बल्कि खतरा तो यह है कि कांग्रेस द्वारा चयनित मुद्दों के तमाम हथियार कहीं भाजपा के कवच से टकराकर उल्टा बुमरैंग करके विपक्ष को ही आहत व घायल ना कर दें। मसलन असम के नागरिकता रजिस्टर का मसला भाजपा ने ही विपक्ष को थमाया है लिहाजा विपक्ष जितना इस मुद्दे को तूल देगा उतना ही इससे भाजपा को राष्ट्रीय स्तर फायदा मिलेगा क्योंकि इससे कट्टर राष्ट्रवादी सोच जुड़ी हुई है जिसका प्रसार भाजपा के लिये बेहद फायदेमंद साबित हो सकता है। इसी प्रकार बैंकों में धोखाधड़ी के आंकड़े भी कांग्रेस के ही खिलाफ हैं क्योंकि पूरा एनपीए घोटाला उसके ही कार्यकाल में हुआ। राफेल के मामले में भी गोपनीयता करार वर्ष 2008 में तत्कालीन रक्षामंत्री एके एंटनी ने किया था जिसके लागू रहते हुए इस पर उठनेवाले तमाम सवालों से भाजपा के पक्ष में जनसंवेदना का निर्माण हो सकता है। रहा सवाल रोजगार का तो इसको लेकर सत्तापक्ष या विपक्ष कुछ भी कहे लेकिन जमीनी हकीकत यही है कि यह सनातन समस्या है जिसका राजनीतिक स्तर पर पूर्ण निदान नहीं हो पाने की बात सर्वविदित है। यानि समग्रता में देखा जाये तो कांग्रेस ने जिन मुद्दों का चयन किया है उनकी जड़ें या तो उसके ही कार्यकाल की नाकामियों से जुड़ी हैं अथवा मोदी सरकार ने ही उपहार के तौर पर ये मुद्दे उसे सुलभ कराए हैं। ऐसे में यह विश्वास करना तो बेहद मुश्किल है कि इन मुद्दों से मोदी सरकार की स्वीकार्यता या लोकप्रियता में रत्ती भर भी कमी आ पाएगी अलबत्ता यह देखना अवश्य दिलचस्प होगा कि अगर वाकई विपक्ष ने इन्हीं मुद्दों से सरकार पर प्रहार करने की पहल की तो इसके पलटवार का विपक्ष की सेहत पर क्या असर पड़ेगा। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’   @ नवकांत ठाकुर

गुरुवार, 19 जुलाई 2018

‘विश्वास को परखने के लिए अविश्वास का प्रस्ताव’


एक बार फिर संसद में सरकार के खिलाफ विपक्ष द्वारा अविश्वास का प्रस्ताव प्रस्तुत किया गया है। भारतीय संसद के इतिहास का पहला अविश्वास प्रस्ताव वर्ष 1963 में पंडित जवाहरलाल नेहरू की सरकार के खिलाफ लाया गया था और अंतिम बार वर्ष 2003 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार को अविश्वास के प्रस्ताव का सामना करना पड़ा। उसके डेढ़ दशक बाद यह 27वीं बार है जब भारतीय संसद अविश्वास प्रस्ताव की साक्षी बनने जा रही है। इसमें दिलचस्प बात यह है कि अब तक केवल एक ही बार ऐसा मौका आया जब अविश्वास प्रस्ताव के पक्ष में अधिक वोट पड़ जाने के कारण सरकार को सत्ता से हटना पड़ा। वर्ना तमाम अविश्वास प्रस्तावों का इतिहास असफलता का ही रहा है। इस बार भी कोई नया इतिहास लिखे जाने की उम्मीद ना तो विपक्ष को है और ना ही सत्ता पक्ष को। भले ही श्रीमती सोनिया गांधी ने सवालिया लहजे में पूछा हो कि कौन कहता है कि उनके पास संख्याबल नहीं है। लेकिन उन्हें भी बेहतर पता है कि चिराग लेकर ढ़ूंढ़ने से भी शायद ही कोई मिले जो यह स्वीकार करे कि लोकसभा में विपक्ष के पास मोदी सरकार को धूल चटाने के लिये आवश्यक संख्याबल उपलब्ध है। उधर सरकार की ओर से अनंत कुमार ने खम ठोंकते हुए कह दिया है कि शुक्रवार को सुबह ग्यारह बजे से आरंभ होने जा रहे अविश्वास प्रस्ताव पर बहस के बाद शाम छह बजे जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपना जवाब प्रस्तुत करेंगे तो उसके बाद होने वाले मत विभाजन में निश्चित ही विपक्षी खेमे से भी सरकार के पक्ष में काफी वोट पड़ेंगे। यानि विपक्ष की कोशिश है सत्ता पक्ष में सेंध लगाने की और सरकार का दावा है कि वह विपक्षी एकता की कलई खोल देगी। लेकिन इन दावों की गहराई से पड़ताल करें तो वास्तव में यह कहने भर का ही अविश्वास प्रस्ताव नजर आ रहा है बल्कि इसके पीछे अपने विश्वास को मजबूत करने का प्रयास ही छिपा हुआ दिख रहा है। विपक्ष का अपना अलग विश्वास है और सत्ता पक्ष का अपना अलग। आखिर सरकार ने मानसून सत्र के पहले ही दिन अविश्वास प्रस्ताव को स्वीकार करने की जो पहल की है वह केवल अपने संख्याबल के विश्वास को परखने के लिये हर्गिज नहीं की है। मोदी सरकार के शीर्ष संचालकों को तो यह पहले से ही पता है कि इस समय लोकसभा के कुल 534 में से 273 सांसद भाजपा के ही हैं और राजग के घटक दलों के संख्याबल को भी जोड़ लिया जाए तो आंकड़ा 314 तक पहुंच जाता है। यानि सरकार के पास पूर्ण बहुमत के लिये आवश्यक संख्या से काफी अधिक सांसदों का समर्थन उपलब्ध है। इसके बाद भी अगर सरकार ने संसद के बीते सत्र में टीडीपी की भारी मांग के बावजूद उसे संसद में अविश्वास प्रस्ताव लाने का मौका नहीं दिया और इस सत्र के पहले ही दिन उसकी मांग को एक ही झटके में स्वीकार कर लिया है तो इसके पीछे निश्चित ही गहरी कूटनीति छिपी हुई है। दूसरी ओर विपक्ष भी अपनी ताकत से कतई अनभिज्ञ नहीं है। तभी तो सपा के प्रधान महासचिव रामगोपाल यादव ने बेलाग लहजे में कहा है कि विपक्ष के पास भले ही सरकार गिराने के लिये आवश्यक नंबर नहीं है लेकिन इस अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा से सरकार को सवालों के कठघरे में खड़ा करने की सुविधा मिलेगी और सवालों का जवाब देने से सरकार बच नहीं पाएगी। यानि विपक्ष का मकसद भी अविश्वास प्रस्ताव के माध्यम से सरकार गिराना नहीं बल्कि अपनी बात को दूर तक पहुंचाना है जबकि सरकार का मकसद भी विपक्ष से अपना बचाव करना नहीं है बल्कि अविश्वास प्रस्ताव को हथियार के तौर पर इस्तेमाल करके विपक्ष को ऐसी चोट पहुंचाना है जिससे वह आगामी चुनावों तक हर्गिज संभल ना सके। दरअसल यह लड़ाई अपनी जीत सुनिश्चित करने की नहीं बल्कि अपने उस विश्वास को मजबूत करने की है जिसके तहत हर पक्ष आगामी चुनावों का ताना-बाना बुन रहा है। कांग्रेस की कोशिश है कि राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के खिलाफ एक ऐसा महा-गठजोड़ तैयार किया जाये ताकि भाजपा विरोधी वोटों का बिखराव रोक कर मोदी सरकार की वापसी की संभावनाओं पर विराम लगाया जा सके। दूसरी ओर सरकार की कोशिश है कि महा-गठजोड़ के प्रयास को प्रायोगिक स्तर पर ही इस कदर कमजोर कर दिया जाए कि विपक्षियों के बीच साथ मिल कर चुनाव लड़ने के लिये आवश्यक आपसी विश्वास की जमीन ही खिसक जाए। इसी प्रकार विपक्ष को अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा के माध्यम से अपने तमाम आरोपों को देश के समक्ष रखने और संसद के रिकार्ड में दर्ज कराने में कामयाबी मिलेगी जबकि सरकार को सहूलियत होगी कि वह अपने चार साल के कामकाज का पूरा हिसाब किताब संसद के माध्यम से जनता जनार्दन के समक्ष प्रस्तुत कर सके। इसके अलावा विपक्ष का प्रयास होगा कि सत्ता पक्ष में सेंध लगाकर भाजपा के समर्थकों व संगी-साथियों की तादाद में कमी लाए और देश को यह बताए कि राजग की एकता व मजबूती का दावा किस कदर खोखला है जबकि सरकार का प्रयास होगा कि वह विपक्षी खेमे में सेंध लगाकर विरोधियों के आत्मबल को इस कदर कमजोर कर दे कि वे अपनी जीत के विश्वास के प्रति आश्वस्त होकर चुनाव लड़ने की स्थिति में ही ना आ सकें। यानि समग्रता में देखें तो इस अविश्वास प्रस्ताव का मतलब कुछ और है, मकसद कुछ और। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’  @नवकांत ठाकुर #Navkant_Thakur

बुधवार, 6 जून 2018

‘‘डरे हुए हैं डराने वाले...’’

अक्सर यह देखा गया है कि जो दूसरों को डराने की कोशिश करता है वह भीतर से खुद ही डरा हुआ होता है। जो डरा हुआ नहीं होगा उसे दूसरे को डराने की जरूरत ही क्या है। लिहाजा अगर कोई किसी को डराने की कोशिश करता हुआ दिखाई दे तो आंखें मूंद कर यह मान लेने में कोई हर्ज नहीं है कि अपने डर को छिपाने के लिये ही दूसरे को डराने का प्रयास किया जा रहा है। डर के इसी मनोविज्ञान के कारण आक्रमण को ही बचाव के सबसे कारगर हथियार के तौर पर मान्यता मिली हुई है। लिहाजा सत्य को समझने व परखने के लिये आवश्यक है कि सतह पर चल रही गतिविधियों को यथा रूप में स्वीकार करने के बजाय गहराई में उतर कर मामले की असली वजह को जाना जाये और उसके बाद ही किसी नतीजे पर पहुंचा जाये। देश की मौजूदा राजनीतिक गतिविधियों को अगर इस नजरिये से देखें तो सतह की तस्वीर राजग की सेहत व एकजुटता के लिहाज से बेहद ही खराब दिखाई पड़ रही है। आलम यह है कि राजग के मौजूदा स्वरूप में निर्णायक भूमिका निभा रहे दलों ने इन दिनों भाजपा को धमकाने-डराने का अभियान सरीखा छेड़ दिया है। शिवसेना ताल ठोंक कर अकेले दम पर चुनाव लड़ने का ऐलान कर चुकी है जबकि जदयू ने भी भाजपा की रीति-नीति से अलग रूख प्रदर्शित करना आरंभ कर दिया है। यूपी में ओमप्रकाश राजभर के सुर भी असहमति दर्शा रहे हैं और रामविलास पासवान और उपेन्द्र कुशवाहा भी अंदरूनी तौर पर भाजपा से भरे बैठे हैं। लेकिन सवाल है कि आखिर यह सब हो क्यों रहा है। कहने को भले ही शिवसेना मोदी सरकार पर मतदाताओं से किये गये वायदे तोड़ने और मूल वैचारिक सिद्धांतों को छोड़ने का आरोप लगा रही हो जबकि जदयू द्वारा बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिये जाने का राग आलापा जा रहा हो लेकिन गहराई से परखा जाये तो यह सब दिखावा अपने डर को छिपाने के लिये ही किया जा रहा है। ऐसी ही आड़ लेकर बीते दिनों टीडीपी भी राजग से अलग हुई थी। वह भी तब जबकि टीडीपी की मांग के अनुरूप आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का कागजी सर्टीफिकेट भले ही नहीं दिया गया लेकिन जहां तक विशेष राज्य के तौर पर योजनाओं की सौगात देने की बात है तो उसमें केन्द्र ने कोई कसर नहीं छोड़ी थी। इसके बावजूद अगर टीडीपी ने राजग से अलग होने का फैसला किया तो इसकी मुख्य वजह स्थानीय राजनीति में अपनी ढ़ीली पड़ती पकड़ और अल्पसंख्यक मतदाताओं के बीच अस्वीकार्यता का डर ही था। यही हाल महाराष्ट्र में शिवसेना का है जो आज भी यह स्वीकार करने के लिये तैयार नहीं है कि अब उसकी औकात इतनी बड़ी नहीं बची है कि वह सूबे में सबसे अधिक सीटों पर दावा कर सके या प्रदेश में राजग की कमान अपने हाथों में रख सके। यही वजह है कि उसने सीटों पर तालमेल नहीं होने के कारण ही महाराष्ट्र का विधानसभा चुनाव भी भाजपा से अलग होकर लड़ा था और अब लोकसभा चुनाव भी अपने दम पर लड़ने की बात कह रही है। हालांकि आज भी शिवसेना को कहीं ना कहीं यह उम्मीद है कि दबाव में आने पर भाजपा उसका वर्चस्व अवश्य स्वीकार कर लेगी और महाराष्ट्र की राजनीति में उसे बड़े भाई के तौर पर दोबारा स्वीकार करके उसे अपने से अधिक सीटें अवश्य देगी। इसी उम्मीद में उसने आज तक राजग का दामन नहीं छोड़ा है और प्रदेश से लेकर केन्द्र तक में वह भाजपा के साथ सत्ता में साझेदारी कर रही है। भाजपा भी यही उम्मीद जता रही है कि चुनाव से पहले शिवसेना को साथ मिल कर चुनाव लड़ने के लिये अवश्य मना लिया जाएगा। ऐसे में स्पष्ट है कि शिवसेना द्वारा भाजपा को उकसाने और धमकाने की जो कोशिशें हो रही हैं उसकी असली वजह प्रदेश की राजनीति में कमजोर पड़ने का डर ही है। इसी प्रकार बिहार में राजग के मौजूदा स्वरूप में अपनी भूमिका सुनिश्चित करने के लिये ही नीतीश कुमार भी भाजपा के खिलाफ सख्त तेवर दिखा रहे हैं वर्ना व्यावहारिक या सैद्धांतिक तौर पर जदयू का राजग से कोई मतभेद नहीं है। दरअसल बीते लोकसभा चुनाव में जब महागठबंधन में शामिल होकर जदयू ने राजग के खिलाफ चुनाव लड़ा तब राजग को बिहार की कुल 40 में से 31 सीटें मिली थीं जिसमें भाजपा को 22, पासवान की लोजपा को छह और कुशवाहा की आरएलएसपी को तीन सीटों पर जीत मिली थी। ऐसे में जदयू को डर सता रहा है कि इस बार राजग में उसके लिये शेष नौ सीटें ही बचेंगी जिस पर पिछली बार राजग को हार का सामना करना पड़ा था। यही हाल रामविलास पासवान और उपेन्द्र कुशवाहा का भी है जिन्हें डर है कि जदयू के लिये उन्हें अपनी जीती हुई सीटों की कुर्बानी देनी पड़ सकती है। हालांकि भाजपा स्पष्ट कर चुकी है कि सीटों का तालमेल करने के दौरान सहयोगियों को कतई बलि का बकरा नहीं बनाया जाएगा और जीत के समीकरण की जरूरत के मुताबिक वह भी अपनी जीती हुई सीटों का मोह छोड़ने में कतई संकोच नहीं करेगी। लेकिन इस स्पष्टीकरण से उसके सहयोगियों का डर दूर नहीं हो पा रहा है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि अपने डर को छिपाए रखकर उसका इलाज करने के लिये भाजपा को डराने की रणनीति का क्या नतीजा निकलता है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @नवकांत ठाकुर #Navkant_Thakur

रविवार, 20 मई 2018

‘आखिरकार बेबसी का सबब बन गयी बेसब्री’


कर्नाटक में जितना स्वाभाविक भाजपा की सरकार का बनना था उतना ही स्वाभाविक इसका बहुमत परीक्षण में असफल होना भी था। जब प्रदेश के चुनाव का नतीजा आया तो त्रिशंकु विधानसभा के लिये मिले खंडित जनादेश में बहुमत के लिये आवश्यक 112 सीटें तो किसी को नहीं मिल सकीं लेकिन कुल 104 सीटें जीत कर भाजपा सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर अवश्य उभरी। दूसरी ओर कांग्रेस को पिछली बार मिली 122 सीटों के मुकाबले इस बार सिर्फ 78 सीटों पर ही सिमट कर रह जाने के लिये मजबूर होना पड़ा जबकि बसपा-जेडीएस गठजोड़ 38 सीटों के साथ तीसरी ताकत के रूप में उभरा। हालांकि अपनी हार का गम गलत करने और भाजपा की जीत का जायका बिगाड़ने के लिये कांग्रेस ने चुनावी नतीजा सामने आने तत्काल बाद ही जेडीएस को बिना शर्त समर्थन का ऐलान करते हुए बहुमत के आंकड़े की स्पष्ट तस्वीर दिखा दी। लेकिन अव्वल को कांग्रेस ने कूटनीतिक ख़ुराफ़ात करके भाजपा को रोकने की कोशिश की थी और दूसरे भाजपा ही सबसे बड़ी ताकत के तौर पर सामने आई थी लिहाजा राज्यपाल वजूभाई वाला ने स्वाभाविक तौर पर भाजपा के सरकार गठन के दावे को स्वीकार कर लिया और बीएस येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाते हुए उन्हें विश्वासमत हासिल करने के लिये पंद्रह दिनों की मोहलत दे दी। यानि कहने का तात्पर्य यह कि ना तो राज्यपाल ने येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री नियुक्त करके कोई गलती की और ना ही भाजपा ने सरकार बनाने का दावा करके कोई अनैतिक काम किया। लेकिन एक तरफ तो भाजपा के पास बहुमत का आंकड़ा उपलब्ध नहीं था और दूसरे कांग्रेस द्वारा सुप्रीम कोर्ट में इंसाफ की गुहार लगाये जाने के बाद विश्वासमत हासिल करने के लिये मिली पंद्रह दिनों की मोहलत महज तीन दिनों में सिमट गई लिहाजा येदियुरप्पा की अल्पमत सरकार का विश्वासमत के दौरान गिरना भी स्वाभाविक ही था। ऐसे में यह कहना कतई गलत नहीं होगा कि चुनाव परिणाम सामने आने के बाद कर्नाटक में जो राजनतिक घटनाक्रम दिखा है वह बेहद स्वाभाविक भी है और सहज भी। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम को राजनीतिक नजरिये से देखा जाये तो यह सीधे तौर पर भाजपा की हार है और कांग्रेस की जीत। भाजपा जीती हुई बाजी हार गयी है और कांग्रेस ने हारे हुए गढ़ पर अपनी जीत का झंडा लहराने में कामयाबी हासिल कर ली है। निश्चित तौर पर कांग्रेस ने भाजपा की हलक में हाथ डालकर जीत के निवाले पर कब्जा जमाया है। लिहाजा कांग्रेस के लिये यह जीत बेहद खास भी है और यादगार भी। कांग्रेस को पूरा हक है कि वह इस जीत का खुलकर जश्न मनाए और जेडीएस के साथ मिलकर या तो साझेदारी की सरकार बनाए या फिर अपने समर्थन से उसकी सरकार बनवाए। लेकिन भाजपा के नजरिये से देखा जाये तो उसके लिये निश्चित तौर पर यह आत्मचिंतन का मसला है कि आखिर ऐसा हुआ क्यों? जब बहुमत का आंकड़ा उसके पास उपलब्ध ही नहीं था और कांग्रेस ने जेडीएस को बिना शर्त समर्थन देने का ऐलान करते हुए तुरूप का इक्का फेंक दिया तो उस बाजी में उलझने की बेसब्री क्यों दिखाई गई। कांग्रेस का समर्थन मिल जाने के बाद जब जेडीएस के पास बहुमत का आंकड़ा स्पष्ट दिखाई पड़ गया तो फिर राज्यपाल के पास जाकर सरकार बनाने का दावा करने की जल्दबाजी करने के बजाय पहले बहुमत का आंकड़ा जुटाने की कोशिश क्यों नहीं की गई। साथ ही सवाल तो यह भी उठेगा ही कि आखिर राज्यपाल ने विश्वासमत हासिल करने के लिये येदियुरप्पा को पंद्रह दिनों की मोहलत देने की ऐतिहासिक दरियादिली क्यों दिखाई जो सुप्रीम कोर्ट को भी हजम नहीं हुई और उसे इस अवधि को कम करने के लिये विवश होना पड़ा। खैर, अब इन तमाम मसलों पर चिंतन करने और गलतियों पर माथा पीटने के लिये भाजपा की कर्नाटक इकाई के पास पर्याप्त समय है। लेकिन पार्टी के केन्द्रीय नेतृत्व को इस पूरे प्रकरण से जो नुकसान पहुंचा है उसकी भरपाई तो नामुमकिन ही है। सच तो यह है कि चुनावी नतीजों में सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरने और बहुमत के लिये आवश्यक आंकड़े से महज सात सीटें ही कम होने के बावजूद भाजपा को जिस कदर भारी फजीहत का सामना करना पड़ा है उसकी मुख्य तौर पर तीन वजहें रही हैं। अव्वल तो लगातार जीत के सिलसिले को कर्नाटक में भी जारी रखने का भारी दबाव पार्टी ने अपने ऊपर ओढ़ लिया जिसके कारण उसे विकल्पहीनता की स्थिति का सामना करना पड़ा और दूसरे गोवा की ही तर्ज पर आनन-फानन में सरकार बनाकर विरोधियों को लाजवाब कर देने की बेसब्री भरी नीति पर कर्नाटक में भी अमल करना उसके लिये आत्मघाती साबित हुआ। इस सबके अलावा तीसरी सबसे बड़ी गलती प्रशासनिक स्तर पर हुई जिसमें विश्वासमत के लिये 15 दिनों के मोहलत को स्वीकार करने के बजाय इसे अधिकतम एक सप्ताह की समय सीमा में समेट दिया जाता तो सुप्रीम कोर्ट को भी इसमें दखल देने की जरूरत महसूस नहीं होती और इस बीच में आसानी से बहुमत जुटाने के लिये उपलब्ध विकल्पों को टाटोला जा सकता था। लेकिन कहावत है कि ‘जाके प्रभु दारूण दुख देहीं, वाकी मति पहिले हरि लेहीं।’ यही भाजपा के साथ भी हुआ है वर्ना पार्टी का वह शीर्ष नेतृत्व एक साथ इतनी आत्मघाती गलतियां कतई नहीं कर सकता था जो प्रतिकूल परिस्थितियों में जीत हासिल करने का चैम्पियन माना जाता हो। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’ @नवकांत ठाकुर #Navkant_Thakur

गुरुवार, 17 मई 2018

‘तुम्हारी भी जय-जय, हमारी भी जय-जय’


कर्नाटक में जितना नाटक चुनाव से पहले हुआ, उतना ही चुनाव के दौरान हुआ और उससे भी अधिक चुनाव के बाद। दरअसल वहां का चुनावी नतीजा ही ऐसा है जिसमें हारा कोई नहीं है। सभी जीते ही हैं। सीटों की तादाद के लिहाज से भाजपा को जीत मिली है क्योंकि उसके खाते में सबसे अधिक 104 सीटें आई हैं। वोट के हिसाब से कांग्रेस जीती है क्योंकि उसे भाजपा के मुकाबले 1.8 फीसदी वोट अधिक मिले हैं। भाजपा को सूबे के 36.2 फीसदी मतदाताओं ने अपना वोट दिया है जबकि कांग्रेस की झोली में 38 फीसदी वोट हैं। इसके अलावा जीती तो वह जेडीएस भी है जिसने भाजपा और कांग्रेस के बीच हुई जोरदार कांटे की टक्कर में भी ना सिर्फ पूरी मजबूती के साथ अपना अस्तित्व कायम रखा है बल्कि कुल 37 सीटों पर कब्जा जमाते हुए दोनों राष्ट्रीय पार्टियों को बहुमत के आंकड़े से काफी पीछे ही रोक दिया है। यानि समग्रता में देखा जाये तो यह जनादेश ‘तुम्हारी भी जय-जय और हमारी भी जय-जय’ का ही है। पूरा मामला ‘ना तुम जीते ना हम हारे’ टाइप का होकर रह गया है। वैसे भी जब किसी एक को पूरी जीत मिल ही नहीं पाई है तो दूसरा उसकी जीत और अपनी हार को स्वीकार क्यों करे? ऐसे में जब कोई हार स्वीकार करने के लिये विवश ही नहीं है तो फिर यह घमासान होना तो स्वाभाविक ही है कि आखिर सरकार किसकी बने। मतदान होने तक तो तीनों ही पार्टियां एक दूसरे को हराने और निपटाने में ही जी-जान से पिली हुई थीं लेकिन जनादेश सामने आने के बाद की परिस्थितियों में तस्वीर पलट गई है। अब भाजपा का दावा है कि सरकार बनाने का पहला मौका उसे ही मिलना चाहिये क्योंकि सबसे बड़े दल के तौर पर उभरने में उसे ही सफलता मिली है और बहुमत के आंकड़े के सबसे करीब तक पहुंचने में उसे ही कामयाबी मिली है। लेकिन कांग्रेस का तर्क है कि अगर जनता ने भाजपा को सत्ता के संचालन का जनादेश दिया होता उसे अपने दम पर पूर्ण बहुमत मिल गया होता। लेकिन ऐसा तो हुआ नहीं है। बहुमत के आंकड़े से तो वह भी आठ पायदान नीचे है। ऐसे में मौजूदा विधानसभा में भाजपा के बजाय उसे सरकार बनाने का मौका मिलना चाहिये जिसे बहुमत के लिये आवश्यक तादाद में नवनिर्वाचित विधायक अपना समर्थन दें। इस लिहाज से कांग्रेस ने भाजपा की जीत का जायका बिगाड़ते हुए जेडीएस को अपना समर्थन दे दिया है जिसके नतीजे में इन दोनों दलों की संयुक्त ताकत बहुमत के आंकड़े के लिये आवश्यक आंकड़े से अधिक ही बैठती है। यानि एक ओर भाजपा ने भी सरकार बनाने के लिये कमर कस ली है और दूसरी ओर भाजपा के विजय रथ का पहिया पंचर करने के लिये कांग्रेस ने भी जेडीएस को बिना शर्त अपना समर्थन दे दिया है। दोनों ने राजभवन जाकर अपना दावा भी पेश कर दिया है और दोनों को इंतजार है सरकार बनाने के लिये राजभवन से बुलावे का। यानि गेंद चली गई है राज्यपाल वजूभाई वाला के हाथों में। उन्हें ही फैसला करना है कि किसे सरकार बनाने के लिये आमंत्रित किया जाये। निश्चित तौर पर राज्यपाल का फैसला ही अंतिम होगा जिसे चाहे-अनचाहे सबको स्वीकार भी करना ही होगा। लेकिन इस बीच बड़ा सवाल है कि आखिर इस जनादेश को निष्पक्षता व तटस्टस्था से किस रूप में समझा जा जाए। हालांकि इस बात में तो कोई शक ही नहीं है कि त्रिशंकु विधानसभा का जनादेश ऐसी ही सूरत में सामने आता है जब आम मतदाता भी विकल्प चुनने को लेकर किसी आम राय पर नहीं पहुंच पाते। उनके बीच भी असमंजस व द्वन्द्व की स्थिति रहती है। लेकिन तमाम उहापोह और असमंजस के बीच भी त्रिशंकु विधानसभा के लिए आए इस खंडित जनादेश के मायने बेहद ही स्पष्ट हैं। जनादेश को गहराई से परखा जाए तो इसका सबसे स्पष्ट मतलब यही है कि कांग्रेस को जनता ने सिरे से खारिज कर दिया है और उसे लगातार दूसरी बार सत्ता की बागडोर अपने हाथों में लेने का मौका नहीं दिया है। तभी तो सत्ता की दौड़ में उसे भाजपा से काफी नीचे के पायदान पर खड़ा होने के लिये विवश होना पड़ा है। हालांकि कांग्रेस ने चुपचाप इस जनादेश को शिरोधार्य कर लिया है। तभी तो पूरा नतीजा सामने आने से पहले ही सिद्धारमैया ने अपना त्यागपत्र राज्यपाल को सौंप दिया और कांग्रेस नेतृत्व ने भी पार्टी की सरकार बनाने की कवायदें शुरू करने से परहेज बरत लिया। वैसे यह कांग्रेस को भी बेहतर पता है कि उसके विकल्प के तौर पर जनता ने भाजपा को ही चुना है और जेडीएस को भी तीसरे पायदान पर रखते हुए स्पष्ट तौर पर विपक्ष में बैठने का ही निर्देश दिया है। यानि बहुमत के आंकड़े से दूर रह कर भी यह चुनाव भाजपा के लिये जीत की खुशखबरी लेकर ही आयी है। लेकिन सवाल है कि जब किसी एक दल या चुनाव-पूर्व गठबंधन को अपने दम पर पूर्ण बहुमत का लक्ष्य हासिल नहीं हो पाया है तो आखिर सरकार बनेगी कैसे? तभी तो कांग्रेस ने भाजपा को रोकने के लिये जेडीएस को समर्थन देने का दांव चल दिया है। यानि कर्नाटक का जो नाटक अभी सड़क पर चल रहा है वह राज्यपाल द्वारा किसी एक पक्ष को सरकार बनाने का निमंत्रण दिये जाने के बाद विधानसभा के भीतर बहुमत साबित होने तक बदस्तूर जारी रहेगा। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’

सोमवार, 7 मई 2018

‘दुश्मनी ने दोस्ती का सिलसिला रहने दिया’

मुनव्वर राणा लिखते हैं कि- ‘हमारी दोस्ती से दुश्मनी शरमाई रहती है, हम अकबर हैं हमारे दिल में जोधाबाई रहती है, गिले-शिकवे जरूरी हैं अगर सच्ची मोहब्बत है, जहां पानी बहुत गहरा हो थोड़ी काई रहती है।’ वाकई जहां दोस्ती का रिश्ता काफी गहरा हो वहां आप-जनाब के लहजे में तो कतई बातचीत नहीं होती। लिहाजा कोई अगर किसी को यथोचित सम्मान नहीं दे रहा हो और उसके सामने ही उसे गालियां बक रहा हो तो यह गलतफहमी नहीं पालनी चाहिये कि उनके रिश्तों में कोई खटास है या अंदरूनी तौर पर वे एक-दूसरे को नापसंद करते हैं। बल्कि इस बात के आसार काफी अधिक हो सकते हैं कि उनका रिश्ता इस कदर मजबूत है कि गालियों के अलावा अंतरंगता दिखाने की कोई दूसरी राह उन्हें सूझ ही नहीं रही है। अंतरंगता की इस उलटबांसी को सामाजिक ताने-बाने में साले-बहनोई या देवर-साली के रिश्तों में भी देखा जा सकता है और अरसे से बिछड़े दो दोस्तों की मुलाकात के वक्त भी इस तथ्य को परखा जा सकता है। दूसरे नजरिये से देखें तो जिस्म पर चाकू चलानेवाला हमेशा दुश्मन ही नहीं होता है। बल्कि चिकित्सक भी मर्ज का जड़ से इलाज करने के लिए चाकू से ही जिस्म की चीड़-फाड़ करता है। लिहाजा अगर कोई किसी के जिस्म पर चाकू चला रहा हो तो आंखें मूंद कर यह कतई नहीं मान लेना चाहिये कि वह उसका दुश्मन ही है। हो सकता है कि वह उसका चिकित्सक हो जो उसे उसकी बीमारी से निजात दिलाने के लिए उसके जिस्म को चाकू से काट-कुरेद रहा हो। सियासी समीकरणों के नजरिये से ऐसा ही मामला सामने आया है मध्य प्रदेश में जहां सतही तौर पर देखने से यही समझ में आ रहा है कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने आगामी विधानसभा चुनाव में शिवराज सिंह चैहान को पार्टी का चेहरा नहीं बनाए जाने का संकेत देकर शिवराज की उम्मीदों, अरमानों व अपेक्षाओं की गला काट कर हत्या कर दी है। लेकिन गहराई से परखाने पर पूरी तस्वीर का दूसरा ही रंग दिखाई पड़ रहा है। सच पूछा जाए तो शाह ने शिवराज को चेहरा बनाने से इनकार करके उन्हें ऐसा अभयदान दे दिया है जिसमें जीत का सेहरा तो स्वाभाविक तौर पर उनके नेतृत्व में वर्ष 2005 के नवंबर माह से लगातार सूबे की सेवा कर रही सरकार के सिर ही बंधेगा लेकिन अगर पार्टी को हार का सामना करना पड़ा जो इसकी रत्ती भर की जवाबदेही भी शिवराज की नहीं होगी। इसके अलावा पार्टी की ओर से मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार नहीं होने के कारण ना तो शिवराज को व्यक्तिगत तौर पर पार्टी की नैया पार लगाने की चुनौती का सामना करना पड़ेगा और ना ही पार्टी को सांगठनिक व सतही स्तर पर जारी सत्ता विरोधी लहर से जूझने के लिये मजबूर होना पड़ेगा। इसके अलावा शिवराज के विरोधियों के पास भी अब यह बहाना नहीं बचेगा कि वे भाजपा को तो जीत दिलाना चाहते थे लेकिन शिवराज को लाभ दिलाना उन्हें गवारा नहीं हो रहा था। यानि शाह ने शिवराज के चेहरे को तात्कालिक तौर पर मुख्यमंत्री पद की दौड़ से अलग करके एक ही तीर से कई निशाने साध लिये हैं। वैसे भी इतिहास गवाह है कि भाजपा ने जिसको भी मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करके चुनाव लड़ा है उसकी अपनी सीट ही खतरे में आ जाती रही है। बात चाहे हिमाचल प्रदेश में प्रेम कुमार धूमल की करें या झारखंड में अर्जुन मुंडा की। दोनों ही सूबों में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा को तो बहुमत हासिल हो गया लेकिन पार्टी की ओर से मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने वाले धूमल और मुंडा अपना चुनाव हार गये। कहा तो यही जाता है कि धूमल और मुंडा को विरोधियों ने नहीं हराया। उन्हें उन अपनों ने ही हरा दिया जो मुख्यमंत्री पद पर उनकी दावेदारी को पचा नहीं पा रहे थे। जाहिर है कि अगर मध्य प्रदेश में शिवराज को मुख्यमंत्री पद का दावेदार घोषित करने की पहल की जाती तो उनका हाल भी मुंडा या धूमल जैसा होने से कतई इनकार नहीं किया जा सकता था। लेकिन उनके चेहरे को आगे करने से इनकार करके शाह ने शिवराज का यह संकट भी समाप्त कर दिया है और उनके विरोधियों के लिये सकारात्मक राजनीति की राह पर आगे बढ़ने की चुनौती पेश कर दी है। यानि अब अगर किसी ने भी संगठन के हितों के आड़े आने की गलती की तो वह शिवराज का नहीं बल्कि सीधे तौर पर भाजपा का ही दुश्मन माना जाएगा। जाहिर है कि इतनी बड़ी गलती करने की जुर्रत तो भाजपा का कोई नेता नहीं कर सकता। लिहाजा पार्टी में सांगठनिक स्तर पर जारी गुटबाजी का शाह ने एक ही झटके में जो तोड़ निकाला है वह भी काबिले तारीफ ही कहा जाएगा। लेकिन इस सबसे अलग हटकर भी देखा जाए तो शाह ने औपचारिक तौर पर भले ही यह संकेत दिया हो कि पार्टी की ओर से इस बार शिवराज को औपचारिक तौर पर मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार नहीं बनाया जाएगा लेकिन उन्होंने शिवराज के हितों के उलट एक बात भी नहीं कही है। यानि आगामी चुनाव में पार्टी की ओर से दोबारा जनादेश मांगने की पूरी रणनीति शिवराज के कार्यकाल में हुए काम काज पर ही टिकी होगी। ऐसे में पार्टी को बहुमत हासिल होने की स्थिति में शिवराज को मुख्यमंत्री बनाने से परहेज बरतने का कोई कारण ही नहीं रहेगा। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’   @नवकांत ठाकुर #Navkant_Thakur

शुक्रवार, 9 मार्च 2018

‘दो-दो काटे शून्य, साथ मिले तो बाईस’

‘दो-दो काटे शून्य, साथ मिले तो बाईस’

राजनीति का गणित अलग ही होता है। हर नए समीकरण के साथ इसके परिणाम का आंकड़ा घटता-बढ़ता रहता है। सामान्य गणितीय समीकरण में तो दो और दो हमेशा चार ही होता है। लेकिन राजनीति के आंकड़े इस हद तक अप्रत्याशित होते हैं कि दो और दो को आंखें मूंद कर कतई चार नहीं माना जा सकता। वह शून्य भी हो सकता है, तीन भी, पांच भी और बाईस भी। कई बार जोड़ने के लिए रखे गए दो और दो परस्पर एक दूसरे को काट कर शून्य भी बना देते हैं और कई बार दो और दो एक साथ मिलकर बाईस भी बन जाते हैं। हालांकि कोई भी सियासी गठजोड़ अक्सर दो और दो मिलकर बाईस बनने की उम्मीदों के साथ ही किया जाता है। लेकिन यूपी का राजनीतिक समीकरण जहां एक ओर भाजपा और अपना दल के गठजोड़ को लोकसभा चुनाव में आंकड़ों का ताज पहना देता है वहीं विधानसभा के चुनाव में सपा और कांग्रेस के गठजोड़ को सियासी शून्य की ओर धकेल देता है। इसलिये किसी भी गठजोड़ के भविष्य को लेकर निर्णायक तौर पर तो पहले से कुछ भी नहीं कहा जा सकता। लेकिन दो स्वतंत्र दलों के मिलन पर होने वाले रासायनिक समीकरण को पुरानी प्रक्रियाओं और प्रतिक्रियाओं के आधार पर परखकर उसके भावी प्रदर्शन का मोटा-मोटी खाका तो खींचा ही जा सकता है। इस लिहाज से देखा जाए तो गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा सीट के लिए होने जा रहे उपचुनाव में बसपा ने सपा को अपना जो प्रायोगित समर्थन दिया है उसका अंजाम वैसा ही होने की उम्मीद अधिक दिख रही है जैसा विधानसभा के चुनाव में सपा और कांग्रेस के गठजोड़ का हुआ था। एक जैसा नतीजा आने की संभावना के पीछे इसकी वजहें भी एक जैसी ही हैं। मसलन जमीनी स्तर पर शीर्ष सपा नेता मुलायम सिंह यादव की पहचान गैर-कांग्रेसवाद की राजनीति के चैम्पियन की थी। लेकिन भाजपा के विजय रथ को रोकने के लिए सपा ने उसी कांग्रेस का हाथ थाम लिया जिसके खिलाफ उसके कार्यकर्ता दशकों से संघर्ष करते आए थे। नतीजन इस बेमेल गठजोड़ का नतीजा यह हुआ कि सपा और कांग्रेस के मतदाताओं ने अपने शीर्ष नेतृत्व के फैसले से निराश होकर भाजपा के पक्ष में गोलबंद हो जाना ही बेहतर समझा। परिणाम यह हुआ कि सपा सैंतालीस पर और कांग्रेस महज सात सीटों पर सिमट कर रह गई। अब लोकसभा उपचुनाव में भी परिस्थितियां वैसी ही दिख रही हैं। सपा और बसपा के बीच वर्ष 1995 से ही शीर्ष स्तर पर संवादहीनता, कटुता और जमीनी स्तर पर सीधी दुश्मनी का माहौल रहा है। ऐसे में अब अगर बसपा सुप्रीमो ने कथित सौदेबाजी के तहत एक राज्यसभा सीट के एवज में दो लोकसभा सीट पर समर्थन की बात कही है तो इसे जमीनी स्तर पर कार्यरूप देने के लिए दोनों दलों के उन मतदाताओं को एक मंच पर आना होगा जिनके लिए दशकों पुरानी रंजिश को एक झटके में भुला पाना नामुमकिन की हद तक मुश्किल हो सकता है। ऐसे में अगर अपने शीर्ष नेतृत्व के निर्देश से निराश होकर मतदाताओं का काफी बड़ा वर्ग भाजपा के पक्ष में गोलबंद हो जाए तो इसमें कुछ भी अस्वाभाविक नहीं कहा जाएगा। इसके अलावा सपा और कांग्रेस के एक मंच पर आने से उनका अवसरवादी चेहरा ही सामने आया था जिसे विधानसभा चुनाव में मतदाताओं ने स्वीकार नहीं किया। उसी प्रकार बसपा भी कल तक हर मामले में जिस सपा को कठघरे में खड़ा करने में कोई कसर नहीं छोड़ती थी उसके समर्थन में अचानक बहनजी का खुलकर मैदान में आ जाना मतदाताओं को किस हद तक स्वीकार्य होगा इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। रहा सवाल जातीय समीकरण का तो इसमें भी सपा और बसपा का गठजोड़ उसी प्रकार बेमेल दिख रहा है जिस प्रकार सपा और कांग्रेस की दोस्ती बेमेल साबित हुई थी। इस उपचुनाव में सपा के परंपरागत यादव और मुस्लिम मतदाता को मजबूती देने के लिए अपने दलित वोट को उसके साथ जोड़ने की बहनजी की कवायद का यह परिणाम भी सामने आ सकता है कि मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण के खिलाफ हिन्दू वोटर लामबंद हो जाएं। ऐसे में अगर चुनाव ने स्वाभाविक तौर पर सांप्रदायिक रंग पकड़ा तो बहनजी का दलित और सपा का यादव वोटबैंक किस हद तक उनके साथ जुड़ा रह पाएगा यह कहना भी मुश्किल है। वैसे भी बहनजी के परंपरागत मतदाताओं से अब तक सपा के दोनों परंपरागत समर्थक वर्ग की कभी नहीं बनी। जब भी कहीं सांप्रदायिक मामले सामने आए तो जमीनी टकराव अक्सर दलितों और मुस्लिमों के बीच ही हुआ है। जमीनी स्तर पर उनके बीच इतनी गहरी और चैड़ी खाई बनी हुई है जिसे अचानक किए गए एक फैसले से पूरी तरह पाट पाना कतई संभव नहीं हो सकता है। ऐसे में बहनजी ने भाजपा के बढ़ते प्रसार व जनाधार को देखते हुए अपने राजनीतिक अस्तित्व को बचाने के लिए सायकिल की सावारी के विकल्प को प्रायोगिक तौर पर आजमाने की जो पहलकदमी की है उसकी राहें फिलहाल तो कतई आसान नहीं दिख रही हैं। लेकिन सियासत खेल ही है असीमित संभावनाओं का। लिहाजा चुनावी नतीजा सामने आने से पहले निर्णायक तौर पर किसी नतीजे पर पहुंच जाना उचित नहीं होगा। इसलिए बेहतर यही होगा कि इस गठजोड़ के प्रदर्शन का इंतजार कर लिया जाए ताकि मतदाताओं के मूड का भी पता चल सके और आगामी दिनों के संभावित समीकरणों की तस्वीर भी साफ हो जाए। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’   @नवकांत ठाकुर  #Navkant_Thakur

शनिवार, 13 जनवरी 2018

‘उल्टी गंगा बह रही, राजनीति के घाट’    

कहने-सुनने में भले अटपटा लगे लेकिन सच यही है कि वाकई कहीं-कहीं गंगा उल्टी भी बहती है। जब आगे बढ़ने के लिए सीधी राह ना मिल रही हो तो कुछ दूर उल्टी दिशा में बह कर नई राह गंगा भी तलाशती है और राजनीति भी। यह बात और है कि जहां गंगा उल्टी बहती है वहां उसके महिमा और महात्म्य में काफी इजाफा हो जाता है जबकि सियासत उल्टी दिशा में बहने पर आलोचनाओं का शिकार होने लगती है। उसकी प्रामाणिकता व शुचिता पर सवालिया लगने लगते हैं और उल्टी धारा को दिखावा करार दिया जाने लगता है। हालांकि यह अलग बहस का विषय है कि जब उल्टी बहने पर भी गंगा के पानी की पवित्रता व गुणवत्ता पर कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ता है तो फिर राजनीति की धारा उल्टी बहने पर मैली व गंदली क्यों हो जाती है? शायद इसका कारण धारा के बहाव के मकसद में ही छिपा है। गंगा बहती है सबको तारने, उबारने व संवारने के लिए जबकि राजनीति की दिशा तय होती है वोटरों को लुभाने, रिझाने और सत्ता-व्यवस्था पर अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए। यानि सिर्फ सत्ता का स्वार्थ साधने के लिए उल्टी-सीधी राह पकड़ने के कारण राजनीति आलोचनाओं के केन्द्र में आती है जबकि परमार्थ के मकसद से आगे बढ़ने के लिए आवश्यकता के मुताबिक उल्टी दिशा में बहने से भी परहेज नहीं करना गंगा का ऐसा गुण बन जाता है जो उसकी पवित्रता, स्वीकार्यता और पूजनीयता को बेहद ऊंचे आयाम पर पहुंचा देता है। लेकिन तमाम आलोचनाओं के बावजूद राजनीति अपने रंग-ढ़ंग, दशा-दिशा, तेवर-कलेवर व रीति-नीति में जरूरत के मुताबिक रद्दोबदल करने से कभी पीछे नहीं हटती। बल्कि यूं कहा जाए तो ज्यादा सही होगा कि उल्टी गंगा बहाने में जिस संगठन या शख्सियत को जितनी महारथ हासिल रहती है वह सियासत में उतना ही अधिक सफल होता है। मिसाल के तौर पर कांग्रेस की 70 साल की सियासी सफलता के पीछे सबसे बड़ी वजह यही रही कि सैद्धांतिक तौर पर उसने अपनी वास्तविक दिशा का किसी को पता नहीं चलने दिया। जिस किसी भी कसौटी पर परखा जाता कांग्रेस उसमें ही अव्वल दिखाई देती थी। ब्राह्मण परिवार द्वारा संचालित होने के कारण बहुसंख्यकों की सबसे सगी भी कांग्रेस ही थी और धर्मनिरपेक्षता की जबर्दस्त पैरोकारी के कारण अल्पसंख्यकों के हितों की सबसे बड़ी हिमायती भी कांग्रेस ही थी। रामलला की पूजा के लिए बाबरी मस्जिद का ताला भी कांग्रेस ने ही खुलवाया और अल्पसंख्यकों को सरकारी खर्च पर हज कराने का इंतजाम भी कांग्रेस ने ही किया। आपातकाल लागू करके अभिव्यक्ति की आजादी पर पहरा भी कांग्रेस ने ही बिठाया और लोगों को शासन से सूचना हासिल करने का अधिकार भी कांग्रेस ने ही दिया। उल्टी-सीधी राह पर एक-समान गति से आगे बढ़ने में महारथ के कारण ही देश की हिन्दी-पट्टी पर भी कांग्रेस का ही कब्जा था और हिन्दी विरोधी आंदोलन की आग में दशकों तक दहकते रहे दक्षिणी राज्यों में भी कांग्रेस का ही डंका बजता था। पंचायत से लेकर पार्लियामेंट तक हर जगह बस कांग्रेस ही कांग्रेस थी। सीधी सोच वाले उसकी सीधी धारा से सम्मोहित थे जबकि उल्टी सोच वालों को साधने में उसकी ऊटपटांग कूटनीतियां कामयाब हो जाती थीं। लेकिन खेल बिगड़ा तब जब वह उल्टी-सीधी धारा के बीच संतुलन नहीं बना पाई। एंटनी कमेटी की रिपोर्ट के मुताबिक कांग्रेस के पतन का मुख्य कारण ही यही है कि अल्पसंख्यक हितैषी छवि को निखारने के चक्कर में उसका स्वरूप बहुसंख्यक विरोधी का दिखने लगा। अब बीमारी पकड़ में आ चुकी है तो इलाज भी करना ही होगा। गुजरात में मंदिरों, मठों व घाटों का चक्कर लगाते हुए खुद को पुरजोर तरीके से ब्राह्मण नेता के रूप में प्रस्तुत करके राहुल गांधी ने जो इलाज की प्रक्रिया शुरू की उसका परिणाम भी सुखद ही रहा। वोट फीसद में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई, सीटों की तादाद में भी संतोषजनक इजाफा हुआ और भाजपा को दहाई के आंकड़े में समेटने में वे कामयाब हो गए। यानि जरूरत के मुताबिक दिशा बदलते ही दशा सुधरने लगी। अब यही फार्मूला कांग्रेस कर्नाटक में भी आजमाने जा रही है जहां गुजरात माॅडल पर भाजपा के मोर्चा खोलते ही मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने पुरजोर आवाज में जता दिया कि वे भी हिन्दू ही हैं। इसी प्रकार बंगाल की 30 फीसदी अल्पसंख्यक आबादी की सर्वस्वीकार्य नेत्री बनने के लिए जिस ममता बनर्जी ने दुर्गा प्रतिमा के विसर्जन में अड़ंगा लगाया, रामनवमी का जुलूस निकालने पर त्यौरियां दिखाईं और सरस्वती पूजा के रंग में भंग डालने का भरपूर प्रयास किया वही ममता बनर्जी अब वोट बैंक का विस्तार करने के लिए उल्टी धारा में बहते हुए ब्राह्मण सम्मेलन करवाने और गऊ-दान करने की कवायदें कर रही हैं। जबकि बहुसंख्यकवाद की राजनीति को सर्वोच्च शिखर पर पहुंचाने वाली भाजपा अब पश्चिम बंगाल में अल्पसंख्यक सम्मेलन कराने जा रही है। यानि अपनी धारा के उलट बहकर मतदाताओं को रिझाने-फुसलाने की कोशिश ममता भी कर रही है और भाजपा भी। हालांकि गद्दी पर कोई भी विराजमान हो इससे सत्ता के स्वरूप और सत्ताधारियों की सोच पर कोई फर्क नहीं पड़ता। तभी तो जो आंकड़े पहले कांग्रेस प्रस्तुत करती थी वही अब भाजपा कर रही है और जो योजनाएं कांग्रेस ने इजाद की थी उन्हें ही सुधार कर भाजपा आगे बढ़ा रही है। लेकिन सियासत का अनुभव यही है कि दशा सुधारने के लिए दिशा बदलने की कूटनीति जब उल्टी पड़ती है तो बड़ी बे-भाव की पड़ती है। ‘जैसी नजर, वैस नजरिया।’  @नवकांत ठाकुर #Navkant_Thakur

शुक्रवार, 18 अगस्त 2017

साझी विरासत के बहाने सियासी विरासत की चिंता

साझी विरासत के बहाने सियासी विरासत की चिंता


सियासत में होना और दिखना अमूमन अलग ही रहता है। होता कुछ और है, दिखता कुछ और। दिख तो यह रहा है कि राष्ट्रीय राजनीति में विकल्पहीनता के निर्वात ने दिनों-दिन क्षीण व दीन-हीन होते जा रहे विपक्षी दलों को इतना आकुल-व्याकुल कर दिया है कि वे आपसी मतभेदों को भुलाकर किसी भी बहाने एकजुट हो जाने के लिए बुरी तरह बेचैन हो उठे हैं। इस बेचैनी का ही नतीजा है कि बिना किसी चेहरे और बिना ठोस एजेंडे के ही तमाम भाजपा विरोधी ताकतें उस साझी विरासत को बचाने के बहाने एकजुट होने का प्रयास कर रही हैं जिसमें उनका कुछ भी साझा नहीं है। ना तो सैद्धांतिक तौर पर उनकी कोई आपसी साझेदारी रही है और ना ही व्यावहारिक तौर पर ऐसा कुछ दिखाई दे रहा है जो उनके बीच साझा हो। अलबत्ता मौजूदा समस्याएं अवश्य ही सबकी साझा हैं जिसे तथाकथित विरासत की चाशनी में लपेटकर आम लोगों को ऐसी कहानी सुनाने का प्रयास किया गया है जिसका कोई आदि-अंत ही नहीं है। मौजूदा शासक वर्ग के खिलाफ एकजुट होकर आंदोलन करने के लिए भले ही देश ही साझी विरासत को बचाने की आड़ ली जा रही हो लेकिन दीवार के पीछे की हकीकत को टटोलने से इतना तो स्पष्ट हो जाता है कि यह आंदोलन वास्तव में अपनी सियासी विरासत को बचाने के लिए छेड़ा जा रहा है। चुंकि सियासी विरासत को बचाने की समस्या साझी है इसलिए आंदोलन भी साझेदारी में ही करना होगा। वर्ना सियासी विरासत के समाप्त होने का सिलसिला अगर यूं ही चलता रहा तो जल्दी ही सबकी झोली खाली हो जाने वाली है और वे चाहकर भी अपने उत्तराधिकारियों के लिए कोई विरासत नहीं छोड़ पाएंगे। यानि साझी विरासत को बचाने का आंदोलन बाहर से जितना विस्तृत, व्यापक व विशाल दिखाई पड़ता है, वह अंदरूनी तौर पर उतना ही संकुचित, सीमित व साजिशपूर्ण है। यहां तक कि जिस शरद यादव ने साझी विरासत को बचाने के आंदोलन को खड़ा करने का बीड़ा उठाया है उनके मन में भी देश की साझी विरासत की कितनी चिंता है इसके बारे में उनके निकट सहयोगी भी दावे से कुछ नहीं कह सकते। अलबत्ता अपनी सियासी विरासत को बचाने और उसे अगली पीढ़ी को सौंपने के लिए वे कितने बेचैन हैं इसकी फुसफुसाहट अवश्य सुनाई देने लगी है। बताया जा रहा है कि साझी विरासत को बचाने की आड़ लेकर वे जिस विपक्षी एकता का ताना-बाना बुन रहे हैं उसके पीछे की कहानी पुत्रमोह से ही जुड़ी हुई है। खास तौर से बिहार में जदयू के राजग के जुड़ जाने की आड़ लेकर वे जिस नाराजगी का इजहार कर रहे हैं उसकी असली वजह उनका पुत्रमोह ही है। वर्ना जिस जदयू को उन्होंने खुद ही स्थापित किया हो उसको तोड़ने के लिए वे उस कांग्रेस से शक्ति हर्गिज नहीं लेते जिसका विरोध करके ही उन्होंने अपनी राजनीतिक पहचान कायम की है। लेकिन बताया जाता है शरद अब अपने बेटे शांतनु बुंदेला को राष्ट्रीय राजनीति में स्थापित करना चाहते हैं। शांतनु ने दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक और लंदन यूनिवर्सिटी से मास्टर डिग्री हासिल की है और पिछले लोकसभा चुनाव में जब शरद यादव मधेपुरा से चुनाव लड़ रहे थे तब शांतनु ने ही उनके चुनाव प्रचार की कमान संभाली थी। हालांकि शरद ने अब तक अपनी सियासी विरासत शांतनु को सौंपने की अंदरूनी मंशा को सार्वजनिक नहीं किया है लेकिन जदयू के शीर्ष स्तर से मिली जानकारी के मुताबिक उन्होंने नीतीश कुमार को इसके लिए मनाने, रिझाने व समझाने की तमाम कोशिशें करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। लेकिन नीतीश ने उन्हें कोई ठोस आश्वासन नहीं दिया था जिसके बाद से ही वे नीतीश से नाराज चल रहे हैं और जदयू के साथ वैसा लगाव-जुडाव महसूस नहीं कर पा रहे हैं जो उनसे अपेक्षित है। वे हर हालत में अपने बेटे के लिए मधेपुरा लोकसभा की वही सीट सुरक्षित कराना चाहते हैं जहां से वे संसद के लिए चुने जाते रहे हैं। बेशक पैदाइशी तौर पर शरद का बिहार से कोई नाता-रिश्ता ना हो लेकिन मधेपुरा को उन्होंने अपनी चुनावी कर्मस्थली बनाया हुआ है और इस बात का पूरा पुख्ता इंतजाम भी कर चुके हैं कि वहां उन्हें अब कोई बाहरी बताने की हिम्मत नहीं कर सकता है। जाहिर है कि उस सीट को वे अपने बेटे के बजाय किसी और के लिए छोड़ना कतई गवारा नहीं कर सकते हैं जबकि जदयू में रहते हुए अपनी मनचाही कर पाना उनके लिए नामुमकिन की हद तक मुश्किल हो चला है। लेकिन पुत्रमोह की पट्टी आंखों पर पड़ जाए तो सियासी डगर का सफर किधर मुड़ जाए यह कोई नहीं जानता। भले इसके लिए कुछ भी कीमत क्यों ना चुकानी पड़े। तभी तो सियासी विरासत को आगे बढ़ाने के एवज में अब शरद भी वैसी ही कीमत चुकाने की राह पर आगे बढ़ते दिख रहे हैं जो गांधी, यादव और चौटाला सरीखे कई परिवार अदा कर रहे हैं। इन सभी परिवारों की समस्याएं साझी हैं और भाजपा के रूप में इनकी समस्याओं की जड़ भी साझा ही है लिहाजा साझी विरासत को बचाने के आंदोलन की आड़ लेकर इनके एक मंच में जुटने को कतई अस्वाभाविक नहीं कहा जा सकता है। लेकिन साझी विरासत के बंबू पर सियासी विरासत का तंबू तो तब खड़ा होगा जब इनके साझा एजेंडे की जमीन पर आम लोगों को यकीन हो पाएगा। जिसकी संभावना दूर-दूर तक नहीं दिख रही है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @नवकांत ठाकुर #NavkantThakur

सोमवार, 24 जुलाई 2017

‘दो नावों में एक पांव पर सियासी संतुलन’

‘दो नावों में एक पांव पर सियासी संतुलन’

बेशक आम तौर पर माना जाता हो कि, ‘समझ समझ के समझ को समझो, समझ समझना भी एक समझ है।’ लेकिन सियासत में समझ को समझ से समझने की कोशिश में अक्सर कुछ भी समझ पाना बेहद मुश्किल हो जाता है। तभी तो बिहार में नीतीश कुमार की सियासी पैंतरेबाजी को वे लालू यादव भी नहीं समझ पा रहे जिनकी समझ पर कोई नासमझ भी संदेह नहीं कर सकता। लिहाजा जब लालू की समझदानी में नीतीश की कारस्तानी नहीं समा रही तो लालू के लाल कौन से ऐसे लालबुझक्कड़ हैं? तभी तो तेजप्रताप ने बेलाग लहजे में यह स्वीकार कर लिया कि नीतीश को सिर्फ नीतीश ही समझ सकते हैं। वाकई ऐसी सियासत को कोई क्या समझे जिसमें नरेन्द्र मोदी के साथ अपनी तस्वीर प्रकाशित होने भर से बिदककर राजग का बरसों पुराना याराना एक झटके में तोड़ लिया जाए और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को रात्रि भोज पर निमंत्रित करने के बाद खिलाने से इनकार करके बुरी तरह जलील किया जाए। लेकिन जब वही मोदी प्रधानमंत्री बन जाएं तो नोटबंदी से लेकर जीएसटी तक के तमाम ऐसे मसलों पर उनकी सार्वजनिक सराहना की जाए जिसकी समूचे विपक्ष द्वारा कड़ी आलोचना की जा रही हो। यहां तक कि विपक्षी महागठजोड़ के चुनावी प्रयोग का चेहरा बनने के बाद विपक्षी एकता के लिए बुलाई जानेवाली तमाम बैठकों से खुद को दूर रखा जाए और विपक्ष द्वारा घोषित राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी को समर्थन देने से भी इनकार कर दिया जाए, लेकिन किसी भी बैठक में शिरकत करने के लिए जब भी मोदी का बुलावा आए तो नंगे पांव दौड़ लिया जाए। ऐसे में कोई कैसे समझ सकता है कि आखिर नीतीश वास्तव में किसके साथ हैं? कांग्रेसनीत धर्मनिरपेक्षतावादी विपक्ष के साथ या भाजपानीत राष्ट्रवादी सत्तापक्ष के साथ। इसी प्रकार यूपी में जिस भाजपा के हाथों सपा को शर्मनाक शिकस्त का सामना करना पड़ा हो उसके साथ सपा के शीर्ष संचालक परिवार का बर्ताव कांग्रेसियों की हलक के नीचे नहीं उतर रहा। एक तरफ तो यूपी में सबसे कट्टर भाजपा विरोधी की छवि सपा ने ही हथियाई हुई है और दूसरी तरफ मोदी के साथ कनफुसकी भी मुलायम ही करते हैं और अखिलेश ऐलान करते हैं कि योगी सरकार के प्रदर्शन को आंकने के लिए सब्र के साथ इंतजार किया जाए। यहां तक कि शिवपाल खुलेआम यह ऐलान करते हैं कि सपा नेतृत्व का फैसला चाहे जो भी हो लेकिन राष्ट्रपति चुनाव में उनके विधायकों की टोली भाजपा के प्रत्याशी के पक्ष में ही मतदान करेगी। उस पर तुर्रा यह कि बकौल शिवपाल, उन्हें ऐसा करने के लिए मुलायम ने ही कहा है। अब ऐसे में सपा की सियासत को समझना कांग्रेस के लिए मुहाल होना स्वाभाविक ही है। हालांकि यह अगल बात है कि नीतीश की राजनीति राजद को और सपा की सियासत कांग्रेस को किस प्रकार की दिखाई दे रही है। लेकिन एक आम आदमी की नजर से देखा जाए तो बिहार में जदयू और यूपी में सपा की राजनीति ‘दो नावों पर एक पांव’ वाली ही है। औपचारिक व सैद्धांतिक तौर पर तो ये दोनों दल कांग्रेसनीत विपक्ष के साथ ही जुड़े हुए हैं। बिहार में कांग्रेस व राजद के दम पर ही नीतीश की सरकार चल रही है और यूपी की राजनीति में वापसी करने के लिए सपा भी कांग्रेस व बसपा को अपने साथ जोड़ कर आगे बढ़ने की रणनीति को ही अमली जामा पहनाने में जुटी हुई है। इसके बावजूद अगर ये दोनों दल भाजपानीत राजग के साथ अंदरूनी तौर पर परस्पर समझदारी से सहयोग का गठजोड़ कायम रखना चाहते हैं तो इसका निहितार्थ समझने के लिए इन दोनों दलों की जमीनी समस्याओं व सिरदर्दियों पर नजर डालना बेहद आवश्यक है। जदयू की बात करें तो बेशक वहां सरकार का चेहरा नीतीश को बनाया गया हो लेकिन साझेदारी के तहत सत्ता की मलाई में हिस्सेदारी बंटा रहे राजद व कांग्रेस की करतूतों ने ही नीतीश को इस कदर मजबूर कर दिया है कि वे इन दोनों पर नकेल डालने के लिए इनके साझे दुश्मन के साथ दोस्ती का दिखावा करें। नीतीश सरकार बदनाम हुई शिक्षा व्यवस्था चैपट होने को लेकर लेकिन उस विभाग पर कांग्रेस का कब्जा है। सूबे की स्वास्थ्य व्यवस्था को चैपट करने की कारस्तानी कर रहे हैं लालू के लाल। रही-सही कसर लालू परिवार की अकूत संपत्ति का मामला सामने आने के नतीजे में लगे भ्रष्टाचार के दाग ने पूरी कर दी। लेकिन नीतीश की मजबूरी है कि वे चाह कर भी किसी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं कर सकते। लिहाजा विवश होकर वे विपक्ष की नाव से अपना एक पांव बाहर निकाल कर भविष्य की सुरक्षा का इंतजाम ना करें तो और क्या करें। इसी प्रकार जब सपा सरकार के कार्यकाल में हुए कारनामों का बखान अपनी चुनावी सभाओं में खुद प्रधानमंत्री मोदी कर चुके हों तो अब सरकार बनने के बाद उसकी बखिया उधेड़ा जाना तो तय ही है। ऐसे में विपक्ष की नाव पर निर्भर होकर डूबने की प्रतीक्षा करने से तो बेहतर ही है कि एक पांव बढ़ाकर सरकार से मनुहार करते हुए गुहार लगाई जाए कि बखिया उधेड़ने की कार्रवाई में यथासंभव बचाव की गुंजाइश रखी जाए। लेकिन अपनी ही उत्पादित समस्या से बचाव के लिए दो नाव पर एक साथ पांव रखनेवालों को यह भी याद रखना चाहिए कि दो नाव के सवार का ना तो कभी बेड़ा पार हुआ है और ना हो सकता है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @नवकांत ठाकुर #navkantthakur

शुक्रवार, 16 जून 2017

‘पहले आप, पहले आप’ का निहितार्थ

‘सब्र से चल रहा शह मात का खेल’


चुनाव आयोग द्वारा अगले महीने होने वाले राष्ट्रपति चुनाव के लिए नामांकन दाखिल करने की अधिसूचना जारी कर दिए जाने के साथ ही औपचारिक तौर पर नामांकन प्रक्रिया का आगाज हो गया है। नामांकन दाखिल करने की अंतिम तारीख 28 जून है। एक जुलाई तक नाम वापस वापस लिए जा सकेंगे। 17 जुलाई को वोटिंग होगी और 20 जुलाई को मतगणना होगी। इस पूरी चुनावी प्रक्रिया में देश के कुल 4896 निर्वाचित प्रतिनिधि अपने मताधिकार का इस्तेमाल करेंगे। यानि इतना तो तय है कि 20 जुलाई को नए राष्ट्रपति का नाम सामने आ जाएगा। लेकिन लाख टके का सवाल अब भी बना हुआ है कि आखिर वह कौन होगा जिसे देश का प्रथम नागरिक बनने का सौभाग्य हासिल होगा। अभी तक ना तो सत्ता पक्ष ने अपने उम्मीदवार का चेहरा आगे किया है और ना ही विपक्ष ने। दोनों ओर से चूहे बिल्ली का खेल ही चल रहा है। दोनों की कोशिश है कि आगे बढ़ कर किसी का नाम सामने ना किया जाए बल्कि विरोधी पक्ष की ओर से पेश किए जाने वाले उम्मीदवार का नाम सामने आने की प्रतीक्षा की जाए। शह-मात के इस खेल में सत्ता पक्ष ने भी विभिन्न दलों से बातचीत करके बहुमत के आंकड़े का जुगाड़ करने के लिए तीन सदस्यीय कमेटी गठित कर दी है और विपक्ष ने भी सर्वमान्य चेहरे की तलाश के लिए दस सदस्यीय कमेटी बना दी है। दोनों ओर से कमेटी-कमेटी का खेल शुरू हो गया है। वास्तव में देखा जाए तो राष्ट्रपति के पद पर अपने पसंदीदा उम्मीदवार को जीत दिलाने लायक पर्याप्त वोट ना तो सत्ता पक्ष के पास उपलब्ध है और ना ही विपक्ष के पास। बल्कि भाजपा व कांग्रेस से समानांतर दूरी बनाकर चलनेवाले दलों की तीसरी ताकत के पास ही वह निर्णायक चाबी है जो किसी भी पक्ष के उम्मीदवार के लिए राष्ट्रपति भवन का ताला खोल सकता है। यही वजह है कि सरकार की कोशिश विपक्षी खेमे में सेंध लगाने की है जबकि कांग्रेसनीत विपक्ष का प्रयास है कि गैर-भाजपाई दलों को अपने साथ जोड़कर बहुमत के आंकड़े का जुगाड़ किया जाए। साथ ही विरोधी खेमे में सेंध लगाने को लेकर दोनों ही पक्ष पूरी तरह आशान्वित भी हैं। इतिहास गवाह है कि पिछले दो बार के राष्ट्रपति चुनाव में भाजपानीत राजग की एकता पहले ही तार-तार हो चुकी है और दोनों ही बार शिवसेना ने गठबंधन धर्म को दरकिनार कर कांग्रेस की ओर से पेश किए गए उम्मीदवार के पक्ष में मतदान करने में कोई संकोच नहीं किया। वह भी तब जबकि भाजपा के साथ उसके रिश्ते इतने खराब नहीं थे कि उसे विधानसभा व स्थानीय निकाय का चुनाव अपने दम पर लड़ने के लिए मजबूर होना पड़े। लिहाजा इस दफा वह भाजपा के उम्मीदवार को समर्थन देने के लिए आगे आएगी या नहीं इसके बारे में कुछ भी नहीं कहा जा सकता है। यानि भाजपा के समक्ष इस चुनाव को लेकर दोहरी चुनौती है। अव्वल तो उसे राजग की एकता को बरकरार रखना होगा और दूसरे विरोधी खेमे में सेंध लगाकर बहुमत के आंकड़े का जुगाड़ करना होगा। दूसरी ओर कांग्रेसनीत विपक्ष की राह भी कतई आसान नहीं दिख रही है। कांग्रेस की सबसे बड़ी समस्या तो धुर भाजपा विरोधी दलों को किसी एक नाम पर सहमत करने की है जिसके आसार दूर-दूर तक दिखाई नहीं पड़ रहे। दूसरी चुनौती उस चेहरे के लिए बहुमत का जुगाड़ करने की भी है। इसके लिए तीसरे पाले में खड़े उन दलों को इसे अपने साथ जोड़ना होगा जो ना तो राजग का हिस्सा हैं और ना ही संप्रग का। इसमें कांग्रेस को किस हद तक सफलता मिल पाएगी इसके बारे में कुछ भी दावा नहीं किया जा सकता है क्योंकि तमाम गैर-भाजपाई दलों को एक मंच पर लाना काफी हद तक तराजू में मेंढ़क तौलने सरीखा नामुमकिन की हद तक मुश्किल काम है। राष्ट्रपति पद के लिए जो नाम सपा को पसंद आए वही बसपा को भी पसंद हो और वामपंथी व तृणमूल भी उस पर सहमति दे दें इसकी उम्मीद काफी कम है। फिर आम आदमी पार्टी, जदयू व राजद से लेकर राकांपा, टीआरएस व द्रमुक सरीखे धुर भाजपा विरोधी दलों को भी उसी नाम को समर्थन देने के लिए सहमत करना होगा और इस बात की उम्मीद भी पालनी होगी कि उस नाम पर राजग में भगदड़ मच जाए ताकि सत्ता पक्ष में सेंध लगाने की कोशिशें कामयाब हो सकें। जाहिर है कि ऐसा कोई सर्वस्वीकार्य नाम तलाशना काफी हद तक असंभव ही है। इसी प्रकार भाजपा के समक्ष भी यही चुनौती है कि किसी ऐसे चेहरे को उम्मीदवार बनाया जाए जिसे उन सभी 33 दलों की स्वीकार्यता हासिल हो जिन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में ही 2019 का अगला लोकसभा चुनाव लड़ने पर अपनी सहमति दी हुई है। लेकिन ऐसा हो पाना मुमकिन नहीं दिख रहा क्योंकि एक तरफ शत्रुघ्न सिन्हा ने लालकृष्ण आडवाणी का नाम उछाल दिया है तो दूसरी तरफ राजग का काफी बड़ा खेमा गैर-संघी गुण-सूत्र वाले सर्वमान्य उम्मीदवार की मांग कर रहा है और शिवसेना ने तो संघ सुप्रीमो मोहन भागवत से लेकर एमएस स्वामीनाथन तक का नाम उछालकर अपनी खुराफाती नीयत का संकेत अभी से दे दिया है। यानि चेहरे का चकल्लस इधर भी है और उधर भी। सेंधमारी की ख्वाहिश इधर भी है और उधर भी। लिहाजा बेहतर यही है कि एक दूसरे के सब्र का जमकर इम्तिहान लिया जाए क्योंकि एक की गलती दूसरे की जीत निश्चित ही सुनिश्चित कर देगी। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’  @ नवकांत ठाकुर #navkantthakur

मंगलवार, 7 मार्च 2017

संभावित खिचड़ी में रायते का जायका

संभावित खिचड़ी में रायते का जायका


खेल चल रहा है खुल्लम-खुल्ला। सब खेल रहे हैं। नेता खेल रहे हैं जनता के साथ और जनता खेल रही है नेताओं के साथ। मामला इस कदर गड्डमगड टाईप का हो गया है कि किसी की समझ में कुछ नहीं आ रहा कि कौन किसके साथ खेल-खेल रहा है। हर किसी को अपनी ही पौ-बारह होती दिखाई पड़ रही है। तभी तो सब जोश में हैं। जोश भी ऐसा कि इसमें होश के लिए कोई जगह ही नहीं बची है। चैतरफा शंखनाद से आसमान गुंजायमान है। तुरही बज रही है, ढ़ोल-नगारे बज रहे हैं। उसकी धुन पर नेता भी मदमस्त हैं और जनता भी। हर तरफ रंग ही रंग है, उमंग ही उमंग है। ‘को बड़-छोट कहत अपराधू’ की स्थिति है। आखिर हो भी क्यों ना। जब एक ही दिन और एक ही इलाके में आयोजित वजीरे-आजम के जनता दर्शन से लेकर यूपी के लड़कों की पगडंडी मार्च तक ही नहीं बल्कि तने-तंबू की छांव में आयोजित बहनजी की चैपाल तक में जनसैलाब का ऐसा उफान दिखाई दे कि तुलनात्मक तौर पर किसी एक आयोजन को सफलतम और बाकियों को दोयम साबित करने में बड़े-बड़ों के पसीने छूटने लगें तो फिर कागजी समीकरणों का ध्वस्तीकरण होना स्वाभाविक ही है। तभी तो सूबे की मौजूदा स्थिति को तयशुदा व परंपरागत फार्मूले के खांचे में फिट करते हुए शब्दों के सांचे में ढ़ालकर किसी निर्णायक स्वरूप में प्रस्तुत कर पाना उतना ही मुश्किल हो गया है जितना त्रिदेवों की तिकड़ी में से किसी एक को सर्वसम्मति से सर्वोत्तम बताना। ऐसे में सत्ता का वरण करने के लिये सात फेरों में हो रहे सप्तपदी चुनाव की अंतिम परिक्रमा संपन्न होने तक सबका जुनून सातवें आसमान पर होने को कैसे अस्वाभाविक कहा जा सकता है। उस पर तुर्रा यह कि महीना भी फागुन का है जिसमें सामान्य व हर तरह से ठीक-ठीक आदमी की मनोदशा बिल्कुल वैसी ही रहती है जैसी कार्तिक में कुत्ते, अगहन में भैंसे और चुनाव में नेताओं की होती है। यानि फागुन ने चढ़ा दिया है नीम को करेले पर। चुनाव के कारण नेता और फागुन के कारण मतदाता एक बराबर हो गए हैं। लिहाजा ना नेताओं की बात को लेकर जनता में ठोस खेमेबाजी या निर्णायक गोलबंदी हो रही है और ना ही किसी ठोस मुद्दे को लेकर नेताओं में आपसी उखाड़-पछाड़ का माहौल दिख रहा है। हर कोई अपना अलग ही सुर-ताल सुनाने में पिला है। जनता भी किसी एक की तान पर थिरकने के बजाय अपनी ढ़फली पर अपना राग आलाप रही है। हालांकि नेताओं का सुर-ताल जनता को भी आह्लादित कर रहा है और जनता के आलाप से नेता भी आशान्वित हो रहे हैं। सब मस्त हैं अपनी मस्ती में। फिजा में घुल रहे सियासी रंगों से जनता भी खुलकर खेल रही है। वह भगवा के साथ भी उतने ही प्यार से लिपट रही है जितना लाल, हरे व नीले से। इस चुनावी फागुन में जनता इस कदर होलियाई हुई है कि सियासी हुल्लड़-हुड़दंग में यह परखना बेहद मुश्किल हो रहा है कि वह किससे अंदरूनी तौर पर बिदक रही है और किसके साथ अंतरंगता के साथ चिपक रही है। नतीजन सबका दावा यही है कि इस दफा विरोधियों के अरमानों की होली जलेगी और जीत के रंग की होली तो उनकी ही मनेगी। दावा करें भी क्यों ना। वह भी तब जबकि ऐसे दावों की हवा निकालने का अचूक तर्क हर तरफ से पूरी तरह नदारद हो। तभी तो जो किसी जमात से जुड़े हैं वे तो अपने खेमे की जीत सुनिश्चित बता रहे हैं लेकिन तटस्थ व निष्पक्ष विचारों के सूरमाओं का आकलन है कि अंत में मामला खिचड़ी भी हो सकता है। खिचड़ी का यह शगूफा काफी तेजी से फैल भी रहा है। तभी तो साहेब ने भरी सभा में यह कह दिया कि जिनकी अपनी दाल नहीं गल पा रही वे चुनावी चूल्हे पर खिचड़ी पकाने में जुट गए हैं ताकि किसी और को अपनी दाल गलाने में कामयाबी ना मिल सके। वैसे भी समग्रता में देखा जाए तो हवा का रूख किसी एक के पक्ष में होने की संभावना को स्वीकार कर लेने से पूरा विश्लेषण ही रसहीन हो जाएगा। यही वजह है कि चैपाल की चर्चाओं में हवा दी जा रही है खिचड़ी की संभावना को। इस संभावना में बहुत रस भी है और चटपटा स्वाद भी। तभी तो खिचड़ी की संभावना जताने वाले अब यह भी बताने लगे हैं कि इस फागुन में किस पर किसका रंग चढ़ेगा। इस चर्चा का चकल्लस सिर्फ भगवा को लाल-हरे से दूर रख रहा है। वर्ना जितनी अटकलें नीले के भगवा से मिलने की लगाई जा रही हैं उतनी ही तिरंगे की छांव में सशक्त व सुनिश्चित भविष्य का निर्माण करने के लिए लाल-हरे के साथ नीले के जुड़ने की भी व्यक्त की जा रही हैं। लेकिन एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि अब तक जब भी किसी ने नीले को अपनाया है तो उसके हिस्से में कालिख ही आई है। जब भी कभी रंगों के घाल-मेल की परिस्थिति उत्पन्न हुई है तो इसमें वर्चस्व नीले का ही रहा है। लिहाजा खिचड़ी की सूरत में नीला रंग अपनाकर रंगा सियार बनने के अलावा शायद ही कोई दूसरा विकल्प दिखाई पड़े। खैर, किस पर किसका रंग चढ़ेगा, किसका रंग जमेगा या किसका रंग उतरेगा यह शनिवार को पता चलेगा, लेकिन इतना तय है कि अगर खिचड़ी की नौबत आई तो जमकर रायता भी फैलेगा। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @नवकांत ठाकुर #NavkantThakur

बुधवार, 1 मार्च 2017

‘भावी परिणामों पर टिकीं असीमित संभावनाएं’

‘भावी परिणामों पर टिकीं असीमित संभावनाएं’


चुनावी राजनीति के तहत होनेवाले सियासी खेल में संभावनाओं का अकाल कभी नहीं होता है। हर चुनाव के बाद नई तस्वीर उभरती है और नया सियासी समीकरण बनता है। स्वाभाविक है कि नए संतुलन की तलाश में सियासी समीकरण का चक्र इस बार भी घूमेगा। तभी तो आगामी ग्यारह मार्च को पांच राज्यों के चुनावों का नतीजा सामने आने के बाद ना सिर्फ राष्ट्रीय राजनीति में बड़े बदलावों की उम्मीद जताई जा रही है बल्कि केन्द्र की मोदी सरकार के केबिनेट में भी व्यापक फेरबदल की सुगबुगाहट साफ महसूस की जा रही है। हालांकि इन बदलावों के लिये अपेक्षित नतीजे की भी दरकार है। तभी तो अभी कोई अपने पत्ते नहीं खोलना चाहता। खोले भी क्यों? बंद मुट्ठी लाख की, खुल गयी तो खाक की। फिलहाल हर तरफ से यथास्थिति बरकरार रखने का ही प्रयास किया जा रहा है। लेकिन ताड़नेवाले भी कयामत की नजर रखते हैं। लाख छिपाने के बावजूद छिप नहीं पा रहा कि एक तरफ दिल्ली की राजनीति में एक-दूसरे को फूटी आंख नहीं सुहाने के बावजूद पंजाब का गुणा-भाग दुरूस्त करने के लिये कांग्रेस और एएपी के बीच अघोषित युद्ध विराम हो गया है जबकि दूसरी ओर महाराष्ट्र में शिवसेना भी बीएमसी के मेयर पद पर दावेदारी के मामले को लेकर जारी विचार-विमर्श प्रक्रिया को यथासंभव लंबा खींचने में जुटी है। इसके अलावा मोदी केबिनेट में संभावित बदलावों को लेकर भी राजधानी के सियासी गलियारे में तमाम अटकलों का बाजार गर्म है और कयास लगाए जा रहे हैं कि अगर चुनाव परिणाम अपेक्षा के अनुकूल रहे तो शीर्ष केबिनेट मंत्रियों की जिम्मेवारियों में बड़े बदलाव की तस्वीर शीघ्र ही दिखाई पड़ सकती है। वास्तव में इन तमाम कयासों व अटकलों को चुनाव परिणाम के बाद की स्थितियों से जोड़ कर देखा जा रहा है और माना जा रहा है कि इन परिणामों के मुताबिक सत्ता का समीकरण नयी करवट ले सकता है। मसलन पंजाब के मामले में भले ही भाजपा-अकाली गठबंधन के नेताओं ने भी यह मान लिया है कि वहां बादल सरकार की वापसी नहीं होने जा रही है लेकिन इस बात का दावा करने की स्थिति में भी कोई नहीं है कि सूबे में किसी एक पार्टी को ही पूर्ण बहुमत हासिल हो जाएगा। ऐसे में अगर त्रिशंकु विधानसभा की तस्वीर बनी तो धर्मनिरपेक्षता की अलख जगाते हुए कांग्रेस और एएपी के बीच भाजपा को सत्ता से बाहर रखने के लिये समझौता हो सकता है और इसका प्रभाव निश्चित तौर पर दिल्ली महानगरपालिका के आगामी चुनावों पर भी पड़ेगा। हालांकि कांग्रेस और एएपी को सत्ता में साझेदारी करने का मौका गोवा में भी मिल सकता है बशर्ते वहां भाजपा को बहुमत ना मिल सके। जाहिर है कि इन दोनों दलों को अगर किसी भी सूबे में भाजपा के खिलाफ एक मंच पर आने का मौका मिला तो इस गठजोड़ का विस्तार गुजरात में भी होना तय ही है जहां इस साल के आखिरी दिनों में विधानसभा का चुनाव होना है। इसके अलावा अगर पांच राज्यों के इस चुनाव में कांग्रेस को किन्हीं दो-तीन सूबों में उल्लेखनीय कामयाबी मिल गयी तो इसे मोदी सरकार की खिसकती जमीन का ही परिचायक माना जाएगा और ऐसे में भाजपा से बुरी तरह खार खाई हुई शिवसेना को भी कांग्रेस से हाथ मिलाने का आत्मविश्वास हासिल हो सकता है। वैसे भी राहुल गांधी के नेतृत्व को नकार कर राकांपा अध्यक्ष शरद पवार ने साफ जता दिया है कि कांग्रेस के साथ उनका पुराना याराना दोबारा कायम नहीं पाएगा। इसी प्रकार शिवसेना ने भी भाजपा से अलग होने की पटकथा लिखने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। लिहाजा भाजपा विरोध के वैचारिक धरातल पर इनके बीच आपसी समझौता होने की संभावना को कतई खारिज नहीं किया जा सकता है। लेकिन शर्त यह है कि कांग्रेस को यह साबित करना होगा कि वह राष्ट्रीय राजनीति में दोबारा वापसी करने की राह पर आगे बढ़ रही है। जाहिर है कि महाराष्ट्र का संभावित समीकरण यूपी के नतीजों का ही इंतजार कर रहा है जहां अगर कांग्रेस के साथ सपा का बेड़ा पार हो गया तो शिवसेना भी कांग्रेस के साथ जुड़ने में हर्गिज देरी नहीं करेगी। इसके अलावा इन चुनाव परिणामों के बाद मोदी सरकार के केबिनेट का स्वरूप भी बदल सकता है। खास तौर से गोवा वापसी के लिये अपनी हार्दिक तड़प दिखा चुके मनोहर पर्रिकर को दोबारा मुख्यमंत्री बनाकर वापस भेजे जाने और रक्षा मंत्रालय की जिम्मेवारी एक बार फिर अरूण जेटली के कांधों पर आने की अटकलें काफी जोर-शोर से लगायी जा रही हैं। ऐसे में वित्त विभाग का कामकाज पियूष गोयल को सौंपे जाने की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा रहा है। साथ ही दूर की कौड़ी के तौर पर गाहे-बगाहे यह बात भी उछल रही है कि यूपी में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने का मौका मिलने पर राजनाथ सिंह को प्रदेश की राजनीति में वापस भेजने का मौका गंवाना भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को शायद ही मंजूर हो। यानि इतना तो साफ है कि इन चुनावों का जितना प्रभाव प्रदेशिक राजनीति पर पड़ेगा उससे रत्ती भर भी कम केन्द्र की राजनीति प्रभावित नहीं होगी। लेकिन ये तमाम समीकरण फिलहाल कयासों और अटकलों पर ही आधारित हैं क्योंकि हर संभावित बदलाव के साथ यही जुड़ा हुआ है कि अगर यह होगा तो वह होगा। लिहाजा जो भी होगा वह चुनाव परिणाम की तस्वीर से ही तय होगा। वर्ना सियासत में होने को तो कुछ भी हो सकता है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर # Navkant Thakur

सोमवार, 27 फ़रवरी 2017

‘गधे ही गधे हैं, जहां पर भी देखो’

‘गधे ही गधे हैं, जहां पर भी देखो’


सही कहा गया है कि जहां ना पहुंचे रवि वहां पहुंचे कवि। वर्ना दिवंगत हास्य कवि ओमप्रकाश आदित्य अपनी युवावस्था में ही इस सत्य का साक्षात्कार कतई नहीं कर सकते थे कि ‘इधर भी गधे हैं, उधर भी गधे हैं, जिधर देखता हूं, गधे ही गधे हैं, गधे हंस रहे, आदमी रो रहा है, हिंदोस्तां में ये क्या हो रहा है, जवानी का आलम गधों के लिये है, ये दिल्ली ये पालम गधों के लिये है, धोड़ों को मिलती नहीं घास देखो, गधे खा रहे हैं च्यवनप्राश देखो, जो खेतों में दीखे वो फसली गधा है, जो माइक पे चीखे वो असली गधा है, यहां आदमी की कहां कब बनी है, ये दुनियां गधों के लिये ही बनी है।’ आदित्य साहब की इस कविता को कल तक लोग व्यंग्य-विनोद के तौर पर मजे लेकर सुना करते थे। लेकिन अब तस्वीर बदल गयी है। गधों को लेकर जिस कदर गंभीरता का माहौल बन रहा है उसी अनुपात में इस कविता पर भी गंभीर चिंतन की आवश्यकता शिद्दत से महसूस की जाने लगी है। गधों के प्रति गंभीरता का आलम यह है कि प्रधानमंत्री स्वयं ही सीना ठोंककर यह बता रहे हैं कि देश सेवा की प्रेरणा उन्हें गधों से ही मिली है। गधों को देख-देखकर ही वे कठिन परिश्रम करने में सक्षम हो पाए हैं। गधे की तरह देश की जिम्मेवारियों का बोझ उठाने का मौका मिलने को वे अपना सौभाग्य मानते हैं और पंचायत से लेकर पार्लियामेंट तक की जिम्मेवारी उठाने के लिये लगातार प्रयत्नशील दिखाई पड़ते हैं। अब भले ही दिग्विजय सिंह लाख यह कहें कि मोदी बिल्कुल गधे की तरह काम कर रहे हैं, अथवा ‘रेनकोट’ को गाली बताने वाली कांग्रेस भी औपचारिक तौर पर यह समझाए कि गधा शब्द किसी गाली का पर्याय नहीं है। लेकिन सदी के महानायक से गुजरात के गधों का प्रचार नहीं करने की अपील करके अखिलेश ने जिस गधा-गाथा के गायन-वाचन की शुरूआत कर दी है उसकी मारकता का दायरा लगातार बढ़ता हुआ दिखाई दे रहा है। इस गधा-गाथा की गूंज गुजरात में भी सुनाई देने लगी है जहां पाटीदार आंदोलन के दम पर भाजपा की जड़ खोदने में जुटे हार्दिक पटेल ने प्रदेश के पाटीदारों का नेतृत्व करनेवाले 44 विधायकों को खुले तौर पर गधा करार दे दिया है। यानि गधा-गाथा के सियासी पारायण का श्रीगणेश अभी से गुजरात में भी हो गया है जहां इस साल के अंत में विधानसभा का चुनाव होना है। निश्चित तौर पर कांग्रेस द्वारा ऐसे दल के साथ गठबंधन किया जाना गुजरात के चुनाव में बड़ा मुद्दा बननेवाला है जिसने गुजरातियों को गधा बताया है। खैर, गुजरात के चुनाव में गधा-गाथा का कितना रंग जमेगा यह अभी भविष्य के गर्भ में है लेकिन उत्तर प्रदेश में तो इसका ऐसा चकाचक रंग दिख रहा है कि इसने जनहित के बाकी तमाम ज्वलंत मुद्दों को काफी पीछे छोड़ दिया है। आलम यह है कि तमाम सियासी पार्टियों की पूर्वनिर्धारित चुनावी रणनीति पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है और यह चुनाव सिर्फ इस बात पर केन्द्रित हो गया है कि रोजाना थोक के भाव में उछाले जा रहे बेमानी मुद्दों को अपने साथ जोड़कर किस प्रकार जनता का सहयोग व सहानुभूति अर्जित किया जाये। इसमें किसी भी पार्टी की ओर से कोई कसर नहीं छोड़ी जा रही है। सब पिले पड़े हैं एक दूसरे के पीछे। लेकिन बारीकी से निगाह डाली जाये तो विरोधियों को इस बेमानी बतकुच्चन की राह पर लाने का सेहरा तो मोदी-शाह की जोड़ी को ही जाता है। वर्ना सपा-कांग्रेस ने तो विकास के एजेंडे को ही आगे रखकर चुनाव अभियान की शुरूआत की थी। बसपा ने भी मायावती के पिछले कार्यकाल की याद दिलाते हुए सुदृढ़ कानून व्यवस्था देने का वादा किया था और यह भरोसा दिलाने का प्रयास किया था कि अगली बार सरकार बनाने का मौका मिलने पर वे मूर्ति-स्मारक बनवाने की पिछली गलतियां हर्गिज नहीं दोहराएंगी। लेकिन अगर इस एजेंडे पर ही चुनाव केन्द्रित रहता तो भाजपा के लिये अपनी जगह बनाना बेहद मुश्किल था। पूरी लड़ाई बुआ-भतीजा के बीच ही सिमट कर रह जाती। भाजपा को तो कोई टके के भाव भी नहीं पूछता। लिहाजा अपनी जगह बनाने के लिये आवश्यक था कि विरोधियों को उन मसलों से डिगाया जाये जिसका संतुलन साधकर वे सत्ता में वापसी की कोशिशें कर रहे हैं। यही वजह रही कि शाह और मोदी की जोड़ी ने विरोधियों के मुद्दों को केन्द्र बनाकर ही उन्हें घेरा। जिस विकास को मुद्दा बनाया गया था उसकी असमानता को उजागर करके उसका खोखलापन अनावरित किया गया। विकास की धारा का सिर्फ एक वर्ग विशेष के दरवाजे पर जाकर अटक जाने को तूल देते ही वह हो गया जिसकी भाजपा को जरूरत थी। विकास की बातें पीछे छूट गयीं और केन्द्र में आ गया श्मशान और कब्रिस्तान का मुद्दा, सरकारी नियुक्ति में वर्ग विशेष को मिल रही तरजीह का मामला और सर्वसमाज की बेकदरी का मसला। जाहिर है कि जिस विकास की तस्वीर दिखाकर सत्ता में वापसी की संभावनाएं टटोली जा रही हों उसका गुब्बारा इस कदर फूटेगा तो कोई भी अपना आपा खो सकता है। तभी तो बौखलाहट में अखिलेश ने ऐसी बात कह दी कि पूरी चुनावी चर्चा के केन्द्र में गधे आ गए हैं। लेकिन गधा-गाथा के पारायण में अपनी समस्याओं का निवारण तलाशने वालों को यह नहीं भूलना चाहिये कि गधा सिर्फ बेड़ा पार नहीं करता बल्कि दुलत्ती मारकर पार-घाट भी पहुंचा सकता है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर # Navkant Thakur

शनिवार, 11 फ़रवरी 2017

‘पराई चुपड़ी पर टिकी ललचाई निगाहें’

‘पराई चुपड़ी पर टिकी ललचाई निगाहें’

बेशक बाबा फरीद कह गये हों कि ‘रूखी सूखी खाय के ठंडा पानी पी, देख पराई चुपड़ी ना ललचावे जी।’ लेकिन कोई माने तब ना। आज कल चिराग लेकर ढ़ूढ़ने से भी ऐसा कोई नहीं मिलता जो अपनी चुपड़ी से संतुष्ट हो। ऐसे में रूखी-सूखी से संतुष्ट हो जानेवाले को कौन तलाशे, क्यों तलाशे? आलम यह है कि सबकी निगाहें दूसरों की थाली पर ही टिकी हैं। जिनकी थाली में पहले से ही चुपड़ी पड़ी है वह भी दूसरों को रूखी-सूखी हजम नहीं होने देना चाहते और जिनके हिस्से में रूखी-सूखी आई है वे दूसरों की चुपड़ी में मिट्टी डालने की कोशिश कर रहे हैं। अपनी थाली से अधिक चिंता लोगों को पराई थाली की सता रही है। अपना खाना खराब हो तो हो, मगर दूसरे का जायका पहले बिगाड़ने में सभी जुटे हुए हैं। इसी का नतीजा है कि सबकी अपनी थाली लगातार बिगड़ती जा रही है। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि अपनी थाली बचाने के बजाय दूसरे की थाली का समीकरण समझने और उसके मुताबिक अपने मुनाफे का गुणा-भाग करने में ही सभी मशगूल दिख रहे हैं। इस उठापटक और खुराफाती खुरपेंच ने पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव को बेहद दिलचस्प मोड़ पर ला दिया है। इन पांच चुनावी राज्यों में से दो में कांग्रेस, दो में राजग और एक में सपा की सरकार है। लिहाजा असली मुकाबला भले ही इन दलों के बीच ही दिख रहा हो लेकिन इन तीनों में ही अपनी थाली बचाने से ज्यादा दूसरे का जायका बिगाड़ने की ऐसी होड़ मची है कि अब तीसरी थाली पर ललचाई नजरें गड़ाने के अलावा इसके पास दूसरा कोई विकल्प ही बचा है। मिसाल के तौर पर यूपी की ही बात करें तो अपने परंपरागत वोटबैंक की चिंता में कोई दुबला नहीं हो रहा। सबको चिंता सता रही है उन वोटों की जो उन्हें किसी सूरत में हासिल नहीं हो सकती। तीसरी थाली के उन पकवानों की महक ने सबको मदहोश किया हुआ है और सबको उम्मीद है कि अगर तीसरी थाली थोड़ी सी वजनदार निकल आये तो उनका खाना खराब होने से बच जायेगा। भाजपा का पूरा समीकरण अल्पसंख्यक वोटों के बंटवारे और बहुसंख्यकों के ध्रुवीकरण पर टिका है जबकि सायकिल की हैंडिल पकड़ने का हाथ को मौका दिए जाने के पीछे अल्पसंख्यकों को एकजुट करने के अलावा सवर्ण वोटबैंक में सेंध लगाने की सोच ही छिपी हुई है। लेकिन एक तरफ भाजपा की रणनीति में ऐसा पेंच फंसा है कि ना तो किसी एक पक्ष में अल्पसंख्यकों की एकजुटता उसे अपने लिये फायदेमंद दिख रही है और ना ही ऐसा हुए बगैर बहुसंख्यकों का प्रतिक्रियात्मक ध्रुवीकरण होना संभव हो पा रहा है। लिहाजा उसकी थाली का जायका अब बसपा के समीकरण पर आधारित हो गया है। अगर बसपा ने अल्पसंख्यकों में ठीक-ठाक सेंध लगा ली तो ठीक वर्ना अगले पांच साल फिर हारे को हरिनाम का ही सहारा रहेगा। दूसरी ओर सपा भी सिर्फ अपने परंपरागत वोटबैंक के सहारे चुनावी नैया पार कर पाती तो हाथ का सहारा ही क्यों लेती? उसे बेहतर पता है कि रात में राहें रौशन करने के लिये सिर्फ चांद के भरोसे नहीं रहा जा सकता। लेकिन अपनी रौशनी उसे तभी राहें दिखा सकती हैं जब भाजपा के टाॅर्च की रौशनी को आंखों पर पड़ने से रोका जाये। वर्ना आंखें चुंधिया गईं तो दिन में भी दिखना मुश्किल हो सकता है। लिहाजा उसका जायका तभी सुधर सकता है जब भाजपा की थाली में बसपा का हाथी, सूंढ़ से धूल डालने में कामयाब हो सके। यानि सबका समीकरण दूसरों का खेल बिगड़ने पर ही आधारित दिख रहा है। लेकिन अपने दम पर दूसरे का खेल बिगाड़कर अपना खेल बनाने की हैसियत में कोई नहीं है। सबको तीसरे पक्ष से मजबूत हस्तक्षेप की दरकार है। यही हाल पंजाब और गोवा का भी है जहां तीसरी ताकत की निर्णायक भूमिका पर सभी ललचाई निगाहें गड़ाए हुए हैं। इन दोनों ही सूबों में आप उसी भूमिका में है जो यूपी में बसपा की है। यानि आप का प्रदर्शन ठीक-ठाक रहे तो ही अकाली-भाजपा की आस को आधार मिल पाएगा। हालांकि दोनों सूबों में मतदान समाप्त हो चुका है लेकिन अभी सीना ठोंककर कोई यह दावा नहीं कर सकता है कि वह अपने दम पर बहुमत की बाधा को पार करने वाला है अथवा उसने विरोधी पक्ष को किस स्तर पर पटखनी देने में कामयाबी पाई है। इसकी वजह भी साफ है कि अपनी थाली को सजाने-संवारने के बजाय सभी दूसरों का जायका बिगाड़ने में ही जुटे थे ऐसे में तीसरे की थाली से अपनी बिगड़ी की भरपाई करने के अलावा किसी के पास दूसरा कोई विकल्प नहीं है। हालांकि मणिपुर और उत्तराखंड में सतही तौर पर स्थिति थोड़ी अलग अवश्य दिख रही है लेकिन गहराई से परखने पर वहां भी तीसरी थाली के प्रदर्शन से ही विजेता का चयन हो पाने की तस्वीर दिख रही है। बेशक यह तीसरी थाली अलग से नहीं सजी है बल्कि दो थालियों में हुई बंदरबांट के नतीजे में ही तीसरे का सृजन हुआ है। लेकिन अब यह तीसरी थाली मुख्य दोनों थालियों की जीत-हार तय करने की स्थिति में आ गई है। खैर, किसी और की चुपड़ी पर बाकियों की ललचाई निगाहें कितनी ही मजबूती से क्यों ना गड़ी हों लेकिन इस संभावना को कतई खारिज नहीं किया जा सकता है एक-दूसरे की थाली में मिट्टी डालने वालों को आखिर में तीसरी थाली ही गच्चा दे जाए। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ 
 @ नवकांत ठाकुर # Navkant Thakur