शुक्रवार, 18 जनवरी 2019

‘क्या बने बात जब कांग्रेस से बात बनाए ना बने’



बात बनने से पहले ही बिगड़ती हुई दिखे तो कैसा महसूस होता है यह कोई कांग्रेस से पूछे। कहां तो कोशिश थी सभी दलों को साथ जोड़कर महागठबंधन बनाने की ताकि आगामी लोकसभा चुनाव में भाजपा की राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत घेराबंदी की जा सके। लेकिन स्थिति यह है कि किसी भी सूबे में कांग्रेस के साथ कांधे से कांधा मिलाने के लिये कोई तैयार ही नहीं है। हालांकि सबको मालूम है कि चुनावी नतीजा भाजपा के खिलाफ आने के बाद भी अपना कद ऊंचा करने के लिये उसे कांग्रेस के कांधे पर ही चढ़ना होगा। लेकिन इस समय जबकि कांग्रेस को अपनी सियासी डोली को चुनावी सफर में आगे बढ़ाने के लिये क्षेत्रीय दलों के कांधे की जरूरत है तो एक के बाद एक सभी उससे कन्नी काटते दिख रहे हैं। अपने कांधे पर कांग्रेस का वजन उठाने के लिये कोई तैयार नहीं है। यूपी में तो बसपा, सपा व रालोद यानि बुआ, बबुआ और ताऊ की तिकड़ी ने पहले ही कांग्रेस से किनारा कर लिया। लेकिन चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी को भी तेलंगाना में कांग्रेस के साथ गठजोड़ करके चुनाव लड़ने का बेहद बुरा हश्र झेलने के बाद अब आंध्र प्रदेश में हाथ का साथ पकड़ने से परहेज बरतने में ही अपनी भलाई दिख रही है। यहां तक कि लोकसभा की महज सात सीटों वाले सूबे दिल्ली में सत्तारूढ़ अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी भी कांग्रेस की लाख कोशिशों के बावजूद उसके साथ जुड़ने के लिये तैयार नहीं है। जबकि इस गठबंधन में बाधक बन रहे अजय माकन का प्रदेश अध्यक्ष पद से इस्तीफा भी हो गया और प्रदेश कांग्रेस की कमान 80 वर्षीया बुजुर्ग नेत्री शीला दीक्षित को भी सौंप दी गई ताकि आप के साथ संबंध कायम करने में कोई परेशानी ना हो। लेकिन केजरीवाल कांग्रेस को ऊंचा उठाने के लिये अपना कांधा लगाने को कतई तैयार नहीं हैं। आलम यह है कि कर्नाटक में कांग्रेस ने जिस जेडीएस की सरकार बनवाई वह भी बुरी तरह बिदकी हुई है। जेडीएस के शीर्ष नेता एचडी देवेगौड़ा तो काफी पहले ही यह बता चुके हैं कि कांग्रेस के साथ चुनाव पूर्व गठबंधन तार्किक नहीं है। लेकिन मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी जिस तरह कांग्रेसियों से दुखी होकर रो-गा रहे हैं कि उनकी स्थिति क्लर्क की बन कर रह गई है ऐसे में कौन सोच सकता है कि कांग्रेस को सियासी बेड़ा पार करने के लिये जेडीएस अपने कांधे पर सवार होने की इजाजत देगी। उधर ओडिशा में मुख्यमंत्री नवीन पटनायक की बीजू जनता दल तो पहले ही अपना सफर अपने दम पर तय करने का इरादा जता चुकी है जबकि छत्तीसगढ़ में भी अजीत जोगी विधानसभा की तरह लोकसभा चुनाव अपने दम पर ही लड़ने का इरादा जाहिर कर चुके हैं। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस इस डर से कांग्रेस को अपना कांधा मुहैया कराने के लिये तैयार नहीं है कि कहीं कल को वामदलों के साथ मिलकर वह उसके लिये खतरे का तूफान ना खड़ा कर दे जबकि केरल में वामदल कतई कांग्रेस को अपने करीब नहीं आने देना चाह रहे हैं। असम में भी स्थानीय दलों के साथ कांग्रेस का समझौता नहीं हो पा रहा है जबकि जम्मू-कश्मीर में एनसी और पीडीपी के बीच फंसी कांग्रेस तय ही नहीं कर पा रही है कि इधर जाए या उधर जाए। यानि समग्रता में देखें तो राष्ट्रीय स्तर पर तस्वीर ऐसी बन रही है कि लोकसभा के कुल 543 में से 269 सीटों के लिये सांसद चुननेवाले उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, असम, छत्तीसगढ़, जम्मू कश्मीर, कर्नाटक, केरल, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और दिल्ली सरीखे ग्यारह सूबों में यह अभी से तय है कि कांग्रेस को चुनावी वैतरणी पार करने के लिये कोई मजबूत कांधा मयस्सर नहीं हो पाएगा। इन तमाम सूबों में चुनाव त्रिकोणीय होगा जिसमें सबसे बड़ी स्थानीय ताकत का सहयोग कांग्रेस को नहीं मिल पाएगा। दरअसल बीते दिनों हुए चुनाव के नतीजों ने यह उम्मीद प्रबल कर दी है कि इस बार जनमानस का बहुमत भाजपा के खिलाफ जाने वाला है। जबकि कांग्रेस ने बेशक आमने-सामने की लड़ाई में राजस्थान व मध्य प्रदेश से लेकर छत्तीसगढ़ तक में भाजपा को शिकस्त देने में कामयाबी हासिल कर ली हो लेकिन उसकी राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के विकल्प के तौर पर स्वीकार्यता नहीं होने की बात से भी सभी वाकिफ हैं। हालांकि कांग्रेस को साथ लेकर गैर-भाजपाई गठजोड़ बनाने का लाभ भी सबको दिखाई पड़ रहा है लेकिन इसमें स्थानीय ताकतों को अपना हित सुरक्षित नजर नहीं आ रहा है। आखिर राजनीति है भी असीमित संभावनाओं को संभव कर दिखाने का खेल। उसमें भी माहौल इतना बेहतर है कि भाजपा सिमटती दिख रही है और कांग्रेस की स्वीकार्यता में कोई इजाफा नहीं दिख रहा। ऐसे में अगर तीसरी ताकतें कांग्रेस को ऊंचा उठाने के लिये अपना कांधा लगाने के बजाय अपने ही कद को ऊंचा करने की रणनीति बना रही हैं तो इसमें कुछ भी गलत नहीं है। भले ही बाद में सत्ता के शिखर को छूने के लिये आवश्यक ऊंचाई हासिल कर पाना कांग्रेस के कांधे पर सवार हुए बिना संभव ना हो सके। लेकिन कांग्रेस को किनारे लगाकर त्रिकोणीय व बहुकोणीय टकराव में अपना फायदा देखनेवालों को यह नहीं भूलना चाहिये कि विरोधियों के ऐसे ही बिखराव ने बीते आम चुनाव में महज 32 फीसदी वोट पाने वाली भाजपा को अपने दम पर पूर्ण बहुमत का आंकड़ा हासिल करा दिया था। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’  @ नवकांत ठाकुर 


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें