गुरुवार, 24 जनवरी 2019

‘वक्ता ही हैं सभी, श्रोता कोई नहीं’

बचपन से ही हमें यह सिखाया जाता है कि अच्छा वक्ता बनने की अनिवार्य शर्त है कि पहले अच्छा श्रोता बना जाए। जो अच्छा श्रोता नहीं होगा वह अच्छा वक्ता भी नहीं बन सकता। लिहाजा बोलना कम और सुनना अधिक चाहिये। साथ ही जितना सुना गया उसे अधिक से अधिक गुनना, धुनना और बुनना चाहिये। उसके बाद वैचारिक व सैद्धांतिक बुनावट और कसावट के साथ जुबान से जो बातें निकलेंगी वही अच्छे वक्ता के तौर पर समाज में पहचान दिलाएंगी। यह तो हुई सैद्धांतिक बात। अब अगर व्यवहारिक तौर पर देखें तो माहौल ऐसा है जिसमें सुनने व समझने की ना तो फितरत बची है और ना ही आदत। बस बोलते जाना है। भले उन बातों में कोई तथ्य या प्रामाणिकता हो या ना हों। कोई फर्क नहीं पड़ता। फर्क सिर्फ इस बात से पड़ता हैं कि एक ही बात को कितनी बार दोहराया जा रहा है। इन दिनों देश की सियासत में इसी एकसूत्रीय रणनीति पर अमल हो रहा है। बात चाहे सत्तापक्ष की करें या विपक्ष की। सुनने, समझने, गुनने, धुनने और बुनने की लंबी प्रक्रिया के बाद ही कुछ बोलने की परंपरा अब बीते दिनों की बात बन कर रह गई है। लेकिन सवाल है कि बातों में तथ्य, सत्य, गंभीरता, प्रामाणिकता और विश्वसनीयता तो तब आएगी जब किसी भी मामले पर बोलने से पहले इसके तमाम पहलुओं के बारे में सुनकर विश्लेषण व चिंतन-मनन करके कोई ठोस राय कायम की जाए। लेकिन अगर कोई बोलने की रौ में सुनना-समझना गवारा ही ना कर रहा हो तो उसकी वही हालत होती है जो इन दिनों कांग्रेस और उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी की दिख रही है। कायदे से देखें तो कांग्रेस ने आगामी चुनाव में सत्तारूढ़ भाजपा को घेरने के लिये जिन मुद्दों को मुख्य हथियार के तौर पर चुना है उसमें से एक भी औजार ऐसा नहीं है जो सत्य, तथ्य व प्रामाणिकता की धार व मजबूती से चमक-दमक रहा हो। कांग्रेस ने एक ओर राफेल के मुद्दे को आगे करके चैकीदार को चोर बताने की पहल की है तो दूसरी ओर ईवीएम की कमियां-खामियां गिना कर वह सरकारी तंत्र को बेईमान साबित करने पर तुली हुई है। इसके अलावा नोटबंदी के नुकसान गिनाकर वह आम लोगों की संवेदना बटोरना चाहती है तो जीएसटी को गब्बर सिंह टैक्स का नाम देकर सरकार को लुटेरी साबित करने में जुटी हुई है। साथ ही किसानों के लिये कर्जमाफी का वायदा करके वह जमीनी स्तर पर अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने में लगी है। ये पांच ही वह बड़े मुद्दे हैं जिसके पंच से कांग्रेस की कोशिश है भाजपा को धराशायी करने की। लेकिन इन पांचों मसलों को अलग-अलग टटोलें तो इनमें से एक भी मुद्दा तथ्य व सत्य से ढ़ला ठोस हथौड़ा नहीं है जिससे मोदी सरकार के ताबूत में कील ठोंकी जा सके बल्कि ये सभी मनगढ़ंत बातों की हवा से फूले हुए गुब्बारे ही हैं जो सांच के आंच को एक क्षण भी शायद ही बर्दाश्त कर पाएं। इन पांचों मसलों को सिलसिलेवार ढंग से परखें तो राफेल खरीद के मामले को ही नहीं बल्कि ईवीएम में गड़बड़ी के सवाल को भी पूरी तरह देखने, परखने और समझने के बाद सुप्रीम कोर्ट पहले ही खारिज कर चुका है। राफेल के मामले में कांग्रेस के तमाम सवालों का जवाब संसद में सरकार भी दे चुकी है और मामले से जुड़ी फ्रांस सरकार और दसौं कंपनी से लेकर रिलायंस तक की ओर से पूरे तथ्यों व प्रमाणों के साथ स्थिति स्पष्ट की जा चुकी है। ईवीएम को हैक करना अगर संभव होता तो चुनाव आयोग द्वारा हैक करने के लिये तीन दिन का वक्त दिये जाने का इन्होंने सदुपयोग कर लिया होता। रहा सवाल जीएसटी का तो अगर ये इतना ही खराब है तो जीएसटी लागू करने से लेकर जीएसटी काउंसिल तक में हर फैसला अब तक बहुमत के बजाय सर्वसम्मति से क्यों हुआ? कांग्रेस ने नीति-नियम के निर्धारण से किनारा अथवा विरोध क्यों नहीं किया? नोटबंदी इतनी गलत थी तो राहुल गांधी नोट बदलने के लिये कतार में लगने के बजाय सड़क पर संघर्ष के लिये क्यों नहीं उतरे। मामले को न्यायालय में खींचकर सरकार को शर्मिंदा क्यों नहीं किया? इसी प्रकार किसानों की कर्ज माफी की बात करना भी कांग्रेस के लिये ऐसा ही है जैसे सहेज कर रखने के बजाय अपने ही हाथों से फाड़ी गई चादर पर पैबंद लगाने की बात की जा रही हो। हालांकि ऐसा नहीं है कि बिना सोचे-समझे और सिर्फ बोलते चले जाने के लिये बोलना केवल कांग्रेस और राहुल का शगल है बल्कि ऐसी ही फितरत और आदत का मुजाहिरा सत्तारूढ़ भाजपा भी कर रही है और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी। वर्ना जिस राम मंदिर मसले के विवाद को सुलझाने के लिये सुप्रीम कोर्ट के फैसले की आड़ लेकर अध्यादेश लाने से बचने की कोशिश की जा रही है उसी सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सबरीमला के मसले पर दिये गये फैसले को सार्वजनिक मंच से ललकारने व दुत्कारने का दुस्साहस कतई नहीं किया जाता। यहां तक कि अगस्ता खरीद घोटाले को चुनावी मुद्दा बनाने के लिये प्रधानमंत्री द्वारा मीडिया रिपोर्ट का हवाला नहीं दिया जाता जबकि इसका कथित राजदार क्रिश्चन मिशेल सरकार की पकड़ में आ चुका है। यानि बोलने से पहले सोचना और सोचने के लिये सुनना जब किसी को गवारा ही नहीं है तो उनकी बातों की कितनी गंभीरता, विश्वसनीयता व प्रामाणिकता रहेगी इसे आसानी से समझा जा सकता है। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’     @नवकांत ठाकुर #Navkant_Thakur 

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