सियासत सिर्फ मौजूदा समस्याओं पर ही नहीं होती बल्कि सियासत के लिये समस्याएं खड़ी भी की जाती हैं और उन पर मनचाहा रंग चढ़ा कर लोगों की भावनाओं को सुलगाया और भड़काया भी जाता है। खास तौर से धर्म, परंपरा व रीति-रिवाजों को सबसे अधिक अहमियत देने वाले भारतीय समाज में अपनी सियासी पकड़ मजबूत करने के लिये किसी भी मसले को जाति व धर्म की भावनाओं के साथ जोड़ने की कोशिशें यूं तो लगातार चलती रहती हैं लेकिन मौसम चुनाव का हो तो सामाजिक मसलों को मजहबी रंग देकर परवान चढ़ाने की होड़ में कोई पीछे नहीं रहना चाहता। इन दिनों ऐसी ही कोशिशें तीन तलाक के मसले पर भी हो रही है, गौ-हत्या के मामले में भी और सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के मुद्दे पर भी। इन तीनों मामलों में धर्म का पक्ष प्रबल दिखाने की कोशिश हर तरफ से की जा रही है। इसके पीछे रणनीति है कि मामला जब धार्मिक रंग लेगा तभी लोगों की भावनाएं उसके साथ गहराई से जुड़ेंगी और समाज में वैचारिक, सैद्धांतिक व व्यावहारिक स्तर पर ऐसा विभाजन हो पाएगा जिसका पूरा राजनीतिक लाभ लिया जा सके। यही वजह है कि ना तो राजनीति करनेवाले इन मसलों पर धार्मिक रंग चढ़ाने में कोई कसर छोड़ रहे हैं और ना ही राजनीति के कृपा प्रसाद से तृप्त होने की कामना रखनेवाले धर्म के धंधेबाज ही इन मामलों में राजनीतिक दृष्टिकोण को स्थापित करने में अपना सहयोग व समर्थन देने में गुरेज कर रहे हैं। जबकि वास्तव में देखा जाए तो ये तीनों मसले ऐसे हैं जो सीधे तौर पर सामाजिक कुरीतियों से जुड़े हैं। इनका कोई ठोस तार्किक धार्मिक आधार उपलब्ध ही नहीं है। इन्हें आधार मिल रहा है बेसिर-पैर की किंवदंतियों और कपोल-कल्पित कहानियों से जो किसी भी धर्म के स्थापित सिद्धांतों की कसौटी पर खरे नहीं उतरते। अगर तीन तलाक की व्यवस्था का कोई धार्मिक आधार उपलब्ध होता तो दुनिया के दो दर्जन से अधिक इस्लामिक देशों में दशकों पहले इस कुप्रथा पर दंडात्मक प्रतिबंध हर्गिज नहीं लगाया जाता। वास्तव में तीन तलाक का मामला धार्मिक मसला है ही नहीं। यह सामाजिक समस्या है। तभी तो इस कुप्रथा के खिलाफ दाखिल याचिका पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने ना सिर्फ इस व्यवस्था को महिलाओं के प्रति अन्याय करनेवाली कुरीति का नाम देते हुए इसे असंवैधानिक बताया बल्कि इस पर प्रतिबंध लगाने का उपाय करने के लिये केन्द्र सरकार को निर्देश भी दिया। यानि वास्तव में देखें तो महिला को विवाह व्यवस्था में बराबरी का हक देने के लिये ही तीन तलाक को दंडनीय बनाने के लिये केन्द्र सरकार द्वारा कानून लाने की कोशिश की जा रही है जिसे लोकसभा ने तो पारित कर दिया है लेकिन मामले को धर्म के चश्मे से देखनेवालों ने अपना वोट बैंक दुरूस्त करने के लिये इसे राज्यसभा में अटका-लटका दिया है। इसी प्रकार गौ-हत्या की बात करें तो अगर इस्लाम में यह इतना ही सबाब यानि पुण्य का काम होता तो इस्लामिक संगठनों व जानकारों की काफी बड़ी जमात इसके खिलाफ खड़ी ही नहीं होती और कहीं से भी इसे रोकने का कभी कोई फतवा ही सामने नहीं आता। इस काम को अंजाम देनेवाले बूचड़खानों में हिन्दुओं और मुसलमानों की हिस्सेदारी और भागीदारी को अलग करके नहीं देखा जा सकता। गौ-हत्या करनेवाले को सीधे तौर पर मुसलमानों का प्रतिनिधि मान लेना और इसके लिये पूरी कौम को जिम्मेवार ठहरा देना निहायत ही अनुचित है क्योंकि मुस्लिम समाज का बहुत बड़ा तबका ना सिर्फ गौ-हत्या व गौ-मांस के सेवन को निहायत ही गलत मानता है बल्कि उनमें से कई ऐसे हैं जो किसी भी हिन्दू से अधिक गौ-भक्त हैं और गौ-सेवा का काम कर रहे हैं। इसी प्रकार अगर सनातन धर्म की किसी भी मान्यता या परंपरा में गर्भधारण करने में सक्षम महिलाओं को अछूत मानने का कोई आधार होता तो इस धर्म के सर्वाेच्च केन्द्र माने जानेवाले ज्योतिर्लिंगों, शक्ति पीठों या चार धामों के गर्भगृह में भी महिलाओं के प्रवेश को लेकर अवश्य ही कोई अलग मान्यता, परंपरा या व्यवस्था होती। लेकिन सनातन धर्म के इन सर्वोच्च व सर्वमान्य केन्द्रों में महिलाओं को हर तरह से पुरूषों के बराबर ही दर्शन व पूजन का अधिकार हासिल है। ऐसी सूरत में यह समझ से परे है कि गर्भधारण करने में सक्षम आयु वर्ग की महिलाओं को मंदिर से दूर रखने के पीछे आखिर क्या धार्मिक, वैदिक अथवा तार्किक-प्रामाणिक आधार हो सकता है? कहने का तात्पर्य यह है कि मामला चाहे तीन तलाक का हो, गौ-हत्या का अथवा सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का। ये सभी समस्याएं वास्तव में सामाजिक हैं जिसमें गैरबराबरी, खुराफाती और बदमाशी से भरी हुई सोच छिपी हुई है जिसका प्रतिकार अवश्य किया जाना चाहिये। लेकिन मसला है कि आम लोगों की भावना से जुड़े इन मसलों का राजनीतिक लाभ तब तक नहीं मिल सकता जब तक इस पर धर्म का पक्का मुलम्मा ना चढ़ाया जाए और इन समस्याओं को धर्म विशेष के साथ मजबूती से जोड़ा ना जाए। यही वजह है कि धर्म के ठेकेदारों व धंधेबाजों ने राजनीतिक दलों की इस छुपी हुई मंशा को पूरा करने में अपना सहयोग देते हुए समाज को धार्मिक आधार पर विभाजित करने और इन मसलों को धार्मिक रंग देने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। लिहाजा आवश्यक है कि लोग जागरूक हों और सही-गलत का फर्क समझें वर्ना अंधविश्वास और मासूमियत के दोहन का सिलसिला बदस्तूर चलता ही रहेगा। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर #Navkant_Thakur
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