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सोमवार, 23 जुलाई 2018

‘नुक्स है कुछ मेरे बयान में क्या...???’




अमरोहा में जन्मे उर्दू के महान शायर जाॅन एलिया भले ही हिन्दुस्तान के बंटवारे के बाद पाकिस्तान में रह-बस गए लेकिन उनकी कलम से एक ऐसी गजल निकली जो पूरी तरह कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के दिल की आवाज बनने के काबिल है। जाॅन लिखते हैं कि- ‘‘उम्र गुजरेगी इम्तहान में क्या? अब भी हूं मै तेरी अमान में क्या? मेरी हर बात बेअसर ही रही, नुक्स है कुछ मेरे बयान में क्या? मुझको तो कोई टोकता भी नहीं, यही होता है खानदान मे क्या? बोलते क्यो नहीं मेरे अपने, आबले पड़ गये जबान में क्या?’’ राहुल वाकई बीते लंबे समय से इसी मसले से जूझ रहे हैं। वर्ना ऐसा कैसे हो सकता कि कोई जान-बूझकर ऐसी बातें और हरकतें करे जिससे उसकी किरकिरी हो, फजीहत हो। लिहाजा लग यही रहा है कि अव्वल तो राहुल को यह पता नहीं चल रहा कि उनसे क्या गलती हो रही है और दूसरे जिन लोगों पर फीडबैक पहुंचाने और सही सलाह देने की जिम्मेवारी है वे अपने कर्तव्य को इमानदारी से अंजाम नहीं दे रहे हैं। नतीजन उनकी जायज व वाजिब बातें भी उनकी हरकतों व गलतियों के बोझ तले दम तोड़ रही हैं। ऐसी ही तस्वीर दिखी लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान भी। यूं तो राहुल ने कितना सच बोला और किस हद तक झूठ का सहारा लिया इस पर अलग से बहस हो सकती है। लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती कि उनका भाषण काफी नपा-तुला, ओजस्वी, आक्रामक और धारदार था। अपने संबोधन को भावनात्मक रूप देते हुए युवाओं, महिलाओं, दलितों व अल्पसंख्यकों को संदेश देने में भी वे सफल रहे। मोदी सरकार की रीति-नीति पर प्रहार करते हुए यह साबित करने की कोशिश भी कामयाब रही कि किस तरह सरकार चुनिंदा उद्योगपतियों को भरपूर लाभ पहुंचाने के लिये आम लोगों की जेब से पैसा निचोड़ रही है। यानि कुल मिलाकर उनका भाषण ठीक वैसा ही था जिसकी मुख्य विपक्षी दल के शीर्ष नेता से अपेक्षा रहती है। लेकिन पूरा गुड़ गोबर हो गया उनकी हरकतों से। उन्होंने कुछ ऐसी हरकतें कर दीं जिसे कतई मर्यादित, संसदीय, अपेक्षित या अनुकरणीय नहीं कह सकते। तभी उनका भाषण हाशिये पर रह गया और हरकतों के कारण उनकी जमकर आलोचना हो रही है। पहली गलती यह हुई कि जब उन्होंने राफेल विमान सौदे को लेकर रक्षामंत्री निर्मला सीतारमण पर गलतबयानी का आरोप लगाया तब अपनी सफाई देने के लिये तुरंत निर्मला खड़ी हुईं लेकिन राहुल ने उन्हें बोलने का मौका ना देते हुए अपना भाषण लगातार जारी रखा। जबकि परंपरा है कि अगर संसद में कोई मंत्री कुछ कहने के लिये खड़ा होता है तो उस समय बोल रहा सदस्य तत्काल चुप होकर बैठ जाता है। लेकिन राहुल ने ऐसा नहीं किया। हालांकि इसके लिये लोकसभा अध्यक्षा ने राहुल को सभ्य भाषा में मर्यादा और परंपरा की याद भी दिलाई लेकिन राहुल की कानों पर जूं तक नहीं रेंगी। इसके बाद दूसरी गलती उन्होंने अकाली दल की सांसद व केन्द्रीय मंत्री हरसिमरत कौर बादल के बारे यह कहके कर दी कि भाषण में व्यवधान के दौरान जब सदन की कार्रवाई कुछ मिनटों के लिये स्थगित हुई तब वे उनकी ओर मुस्कुराते हुए देख रही थीं। जाहिर है कि किसी महिला के लिये ऐसी बात कहना हर लिहाज से बेहद गलत व अमर्यादित आचरण ही कहा जाएगा। तभी बिफरते हुए हरसिमरत ने उनसे पूछ लिया कि आज वे कौन सा नशा करके आए हैं? इसके बाद सबसे बड़ी गलती राहुल ने प्रधानमंत्री मोदी के गले लगने के बहाने उनके गले पड़कर की। गले लगना तो तब कहेंगे जब दो लोग एक साथ गले मिलने के लिये अपनी बांहें फैलाएं। लेकिन जब किसी बैठे हुए आदमी के पास जाकर कोई अचानक उसके गले में बांहों का फंदा डालकर उससे चिपट जाए तो इसे गले पड़ना कहा जाएगा। वैसे भी संसद के भीतर इस तरह के आचरण को कतई सामान्य, शिष्ट या संसदीय नहीं माना जा सकता। तभी इसके लिये लोकसभा अध्यक्षा की ओर कड़ी बात भी कही गई और हरसिमरत को भी यह कहने का मौका मिल गया कि यह मुन्नाभाई का मंच नहीं है जहां पप्पी-झप्पी डाली जाए। राहुल की इस हरकत को राजनाथ सिंह ने भी चिपको आंदोलन का नाम देकर चुटकी लेने में कसर नहीं छोड़ी। लेकिन सबसे आखिर में राहुल ने बेहद ही बचकाने तरीके से आंख मारकर यह जताने की जो कोशिश की कि मानो ऐसी हरकतें करके उन्होंने कोई बड़ा मैदान मार लिया हो वह सबसे अफसोसनाक था। इसका सीधा सा मतलब है कि उन्हें अपनी हरकतों का कोई अफसोस नहीं है और वे कतई यह नहीं मान सकते हैं कि उनसे कोई गलती हुई है। हालांकि लोकसभा अध्यक्षा ने बाद में राहुल को अपने बेटे जैसा बताते हुए उनकी गलतियों को बचपना समझ कर अनदेखा करने की पहल अवश्य की लेकिन यह बचपना था, मासूमियत थी, सरासर बदमाशी या आत्ममुग्धता की निशानी? आत्ममुग्धता इसलिये क्योंकि तमाम गलतियों के बाद राहुल की जुबान से साॅरी का एक छोटा सा औपचारिक अल्फाज भी नहीं निकला। बल्कि वे अपनी हरकतों पर अभीभूत होकर अपने पक्ष के सांसदों की ओर देखकर आंख मारते नजर आए। इस पूरे प्रकरण से हुआ यह है कि विरोधियों द्वारा उनकी पप्पू की जो छवि बनायी जाती रही है उसे इन्होंने खुद ही पूरी मजबूती से स्वीकार व अंगीकार कर लिया है जिसके लिये सिर्फ अफसोस ही जताया जा सकता है। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर #Navkant_Thakur

शुक्रवार, 20 नवंबर 2015

‘सड़क पर ही दिख रहा है संसद का भविष्य’

नवकांत ठाकुर
अगले सप्ताह से शुरू हो रहे संसद के शीतकालीन सत्र में सरकार की कोशिश तो स्वाभाविक तौर पर यही रहेगी कि महज एक माह से भी कम अर्से के इस सत्र में अधिकतम विधेयकों को पारित करा लिया जाये ताकि मानसून सत्र में घुले-धुले कामकाज की यथासंभव भरपायी की जा सके। दूसरी ओर विपक्ष ने पहले ही यह स्पष्ट कर दिया है कि संसद को सुचारू ढंग से संचालित करने की जिम्मेवारी सरकार की है लिहाजा किन्ही कारणों से सत्र का कामकाज बाधित होने की पूरी जिम्मेवारी सत्तापक्ष की ही होगी। यानि विपक्ष ने संसद के संचालन में सरकार का सहयोग नहीं करने का अपना इरादा पहले ही जता दिया है। लिहाजा जब पूरी जिम्मेवारी सरकार पर ही आ गयी है तो लाजिमी है कि वह विपक्ष को संसद में शांति व सहयोग की सीधी राह पर लाने के लिये हरसंभव हथकंडा अपनाने से कतई गुरेज नहीं करेगी। तभी तो सत्तापक्ष ने साम-दाम-दंड-भेद सरीखी तमाम रणनीतियां अमल में लाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। साम-नीति के तहत मान-मानौवल करके समझौते व सहमति की राह निकालने के लिये अरूण जेटली अपनी बिटिया की शादी में आमंत्रित करने के बहाने राहुल गांधी के घर भी गये जबकि दाम-नीति अपनाते हुए भूमि अधिग्रहण विधेयक में मनमाना बदलाव करने की जिद भी छोड़ दी गयी। इसके अलावा दंड-नीति पर अमल करते हुए राहुल पर लगे दोहरी नागरिकता व अघोषित विदेशी बैंकखाता रखने के आरोपों की पड़ताल शुरू कराने के अलावा शीर्ष कांग्रेसी परिवार के इकलौते दामाद राॅबर्ट वाड्रा पर लगे जमीन घोटाले के तमाम आरोपों की परतें भी उधेड़ी जा रही हैं और छह माह के भीतर ही उन्हें सलाखों के पीछे पहुंचा देने की धमकी भी दी जा रही है। साथ ही भेद-नीति के तहत कूटनीतिक वार से फूट डालकर विपक्ष को धराशायी करने के लिये सपा व राकांपा से लेकर अन्नाद्रमुक, बीजद, टीआरएस व तृणमूल कांग्रेस सहित कई छोटे-बड़े दलों को कथित तौर पर इस बात के लिये सहमत कर लिया गया है कि आगामी सत्र के दौरान संसद के कामकाज को बाधित करने के प्रयासों में वे कतई भागीदार ना बनें। यानि समग्रता में देखा जाये तो सत्तापक्ष ने पहले से ही तमाम तिकड़मों को अमल में लाते हुए संसद को बाधित करने के प्रयासों को धता बताने की पूरी तैयारी कर ली है। तभी तो तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों और कांग्रेस व वामपंथी दलों के पूर्वघोषित आक्रामक तेवरों के बावजूद सरकार की ओर से सीना ठोंककर यह विश्वास जताने में कोई कसर नहीं छोड़ी जा रही है कि शीतसत्र का हश्र हर्गिज मानसून सत्र सरीखा नहीं होगा और इसमें जीएसटी सरीखे तमाम महत्वाकांक्षी विधेयकों को अवश्य पारित करा लिया जाएगा। दूसरी ओर सरकार की उम्मीदों व कोशिशों को सदन के भीतर हंगामे व शोरशराबे में नाकाम करने की रणनीतियों के तहत विपक्षी ताकतों ने भी अभी से अपनी तमाम योजनाएं सार्वजनिक करने में कोई कोताही नहीं बरती है। इसी सिलसिले में कांग्रेस ने भाजपा की मातृसंस्था कही जानेवाली आरएसएस को अपने सीधे निशाने पर लेते हुए जहां एक ओर उसकी तुलना सिमी सरीखे प्रतिबंधित आतंकी संगठन से कर दी है वहीं दूसरी ओर देश में कथित तौर पर लगातार बढ़ रही असहिष्णुता के मसलों से लेकर सरकार की विदेशनीति, खाद्य पदार्थों की बढ़ती महंगाई व राजनीतिक प्रतिद्वन्द्वियों के खिलाफ की जा रही दुर्भावनापूर्ण कानूनी कार्रवाई सरीखे मसलों को लेकर सड़क पर संघर्ष का औपचारिक बिगुल बजा दिया है। रहा सवाल सरकार द्वारा विपक्ष को डरा-धमकाकर संसद में सीधी व शांतिपूर्ण राह पर लाने की कोशिशों का तो इसके प्रति भी आक्रमण को ही बचाव के माकूल हथियार के तौर पर आजमाते हुए राहुल गांधी ने बेलाग लहजे में यह एलान कर दिया है कि वे डरनेवालों में से नहीं हैं और उनकी लड़ाई आगे भी जारी रहेगी अलबत्ता अगर सरकार में दम हो तो वह उनके खिलाफ जांच कराके उन्हें जेल में डालने की हिम्मत दिखाए। यानि कांग्रेस ने तो अपनी ओर से आर या पार की लड़ाई का खुला एलान कर दिया है जबकि साम-दाम-दंड-भेद के तमाम शस्त्रास्त्रों को नाकाम होता हुआ देखने के बाद सत्तापक्ष ने भी औपचारिक तौर पर दी गयी प्रतिक्रिया में साफ शब्दों में बता दिया है कि उसे जांच कराने की धमकी ना दी जाये क्योंकि 2जी, कोलगेट, राष्ट्रमंडल खेल व जमीन घोटाले से लेकर अवैध विदेशी बैंकखाते सरीखे मामलों सहित तमाम आरोपों की जांच पहले ही शुरू करा दी गयी है जिसमें जो भी दोषी पाया जाएगा उसे हर्गिज बख्शा नहीं जाएगा। यानि सड़क पर आर-पार की लड़ाई का एलान हो चुका है और देश की सीमाएं लांघकर कांग्रेस ने विश्व बिरादरी को यह संदेश प्रसारित कर दिया है कि मौजूदा सरकार के कार्यकाल में कुछ भी सकारात्मक होने की उम्मीद ना रखी जाये। इससे इतना तो स्पष्ट ही है कि सकारात्मक मसलों पर भी संसद में सरकार को विपक्ष का सहयोग मिलने की अब दूर-दूर तक कोई उम्मीद नहीं है। खैर, इस गतिरोध को तोड़ने के दिखावे में अब विभिन्न स्तरों पर सर्वदलीय बैठकों का दौर शुरू होना तो लाजिमी ही है लेकिन सड़क पर दिख रहे लड़ाई के स्वरूप से संसद के शीतसत्र की जो तस्वीर उभर रही है उससे यह पूरी तरह स्पष्ट है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के तहत देश में लागू संसदीय शासन की मर्यादा, परंपरा व तकाजों के धुर्रे बिखरने का जो दुर्भाग्यपूर्ण सिलसिला मानसून सत्र में शुरू हुआ था वह बदस्तूर जारी ही रहनेवाला है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ 

मंगलवार, 4 अगस्त 2015

‘चंद कदमों की चहलकदमी बनाम मीलों लंबा फासला’

नवकांत ठाकुर
इन दिनों देश की सियासत ऐसे मोड़ पर पहुंच चुकी है जिसमें सत्तापक्ष व विपक्ष के बीच जारी टकराव के बीच सहमति का फार्मूला निकालना बेहद मुश्किल हो चला है। हालांकि सैद्धांतिक तौर पर दोनों ही पक्ष मौजूदा गतिरोध को समाप्त करने की राह निकालने के लिये सहमत दिख रहे हैं लेकिन मसला यह है कि इन दोनों के बीच की खाई इतनी चैड़ी हो चुकी है कि उसे महज मुट्ठी से मिट्टी डालकर पाटने की तो उम्मीद भी नहीं की जा सकती। आलम यह है कि सफर तय करना है मीलों का लेकिन शुरूआत हो रही है कदमों की चहलकदमी से। लिहाजा मंजिल लगातार नजरों से ओझल ही बनी हुई है। दरअसल दोनों में से कोई भी पक्ष इतना लंबा सफर तय करने का सब्र दिखाना गवारा ही नहीं कर रहा है। ऐसे में चंद कदम आगे बढ़ने के बाद दोनों को ही सहमति की मंजिल दूर-दूर तक नजर नहीं नहीं दिख रही जिसके कारण वे दूबारा अपनी पुरानी जिद के खूंटे पर वापस लौटना ही बेहतर समझ रहे हैं। नतीजन संसद में जारी गतिरोध का हल तलाशने के लिये खुले मन से कोई फार्मूला निकालने का प्रयास आज भी परवान नहीं चढ़ पाया। उम्मीद तो थी कि जिस तरह से कांग्रेस ने शुक्रवार को ही सांकेतिक लहजे में जता दिया था कि अगर उसकी मांगों पर गंभीरता दिखाते हुए प्रधानमंत्री खुद ही पहल करके ललित गेट व व्यापम के मसले पर कोई ठोस कार्रवाई व पहलकदमी की घोषणा कर दें तो वह सहमति के माहौल में संसद को सुचारू ढंग से संचालित करने में सरकार का सहयोग करने से कतई गुरेज नहीं करेगी। इसी प्रकार सत्तारूढ़ भाजपा ने भी विपक्ष के खिलाफ अपने आक्रामक रूख में नरमी लाते हुए संसद में जारी गतिरोध का हल तलाशने के लिये कांग्रेस के साथ सहमति का फार्मूला निकालने के प्रति पूरी गंभीरता का मुजाहिरा किया था। इसी क्रम में संसदीय कार्यमंत्री वेंकैया नायडू ने तो यहां तक कह दिया कि कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के साथ बातचीत करके संसद में जारी गतिरोध का कोई तोड़ अवश्य निकाल लिया जाएगा। लिहाजा उम्मीद बंध चली थी कि आज की सर्वदलीय बैठक में सत्तापक्ष व विपक्ष के बीच समझौते के किसी फार्मूले पर बात अवश्य आगे बढ़ेगी जिसके नतीजे में संसद में बारह दिनों से जारी गतिरोध का सिलसिला जल्दी ही समाप्त हो जाएगा। लेकिन मसला यह फंस गया है कि इन दोनों पक्षों के बीच असहमति व आपसी विरोध की खाई इतनी गहरी हो चुकी है कि इसके बीच सहमति व समझौते का कोई पुल बनाने का फार्मूला किसी की समझ में ही नहीं आ रहा है। विपक्ष ने ललित गेट व व्यापम की जांच के लिये जेपीसी गठित किये जाने व प्रधानमंत्री द्वारा इसकी औपचारिक घोषणा किये जाने का जो फार्मूला पेश किया उसे स्वीकार करना सत्ता पक्ष को गवारा ही नहीं हो रहा है। दूसरी ओर सरकार की ओर से वेंकैया ने किसी भी मसले पर किसी भी नियम के तहत चर्चा कराये जाने की स्वीकृति देने के अलावा उस चर्चा में प्रधानमंत्री द्वारा हस्तक्षेप करके औपचारिक बयान दिये जाने का जो फार्मूला प्रस्तुत किया वह कांग्रेस को महज झुनझुने सरीखा ही महसूस हो रहा है जिसे स्वीकार करके शांत हो जाना उसे कतई गवारा नहीं है। यानि विपक्ष ने सुषमा स्वराज, वसुंधरा राजे और शिवराज सिंह के इस्तीफे की जिद ठानकर संसद को बाधित रखने की जो रणनीति अपनाई हुई है और उसके मुकाबले सत्तापक्ष की ओर से भी जिस तरह से ईंट का जवाब पत्थर से देने की पहलकदमी की जा रही है उन दोनों रणनीतियों में सीधा जमीन-आसमान का अंतर है लिहाजा अब वे दोनों चाह कर भी इस लंबी दूरी के बीच सहमति के मध्यबिन्दु तक की यात्रा करने की राह नहीं निकाल पा रहे हैं। हालांकि कांग्रेस की ओर से अगर सोनिया गांधी व राहुल गांधी और सत्तापक्ष की ओर से इसके पुराने अनुभवी बुजुर्ग नेताओं की टोली आमने-सामने बैठकर कोई हल निकालना चाहे तो ऐसा कोई मसला ही नहीं है जिसका बातचीत से समाधान ना निकल सके। लेकिन दिक्कत है कि ना तो भाजपा के मौजूदा निजाम की सीधी बातचीत कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व से हो रही है और ना ही गांधी परिवार के लिये इन्होंने इतनी राह छोड़ी है कि वह सत्तापक्ष की कथित युवातुर्क टोली के साथ धैर्य, विश्वास व परस्पर सम्मान के माहौल में वार्ता प्रक्रिया आरंभ करने की पहल कर सकें। लिहाजा बात हो भी रही है तो भाजपा की दूसरी पीढ़ी के साथ कांग्रेस के दोयम दर्जे के रणनीतिकारों की जिनको कोई अंतिम फैसला लेने की इजाजत ही नहीं है। ऐसे में अव्वल तो जब तक दोनों पक्षों के ऐसे लोग आमने-सामने बैठकर समझौते के किसी मसौदे पर सहमति बनाने की पहल नहीं करते हैं जिन्हें पार्टी की ओर से कोई निर्णय लेने का पूरा अख्तियार हो तब तक मौजूदा गतिरोध का कोई हल निकल पाने की उम्मीद भी नहीं की जा सकती। साथ ही मौजूदा गतिरोध के बीच समझौते के किसी फार्मूले तक पहुंचने के लिये दोनों पक्ष को अपनी जिद की लकीर छोड़कर लंबा सफर तय करने के लिये सहमत होना पड़ेगा। इसमें अगर एक भी पक्ष खुले मन से पूर्वाग्रह दिखाए या जिद ठाने बगैर समझौते के लिये आवश्यक लंबा सफर तय करने के प्रति हिचक दिखाने की कोशिश भी करेगा तो ऐसे में मौजूदा गतिरोध का हल निकल पाने की उम्मीद यथावत धूमिल ही रहेगी। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’   

शुक्रवार, 31 जुलाई 2015

‘दोष किसी और का है दोषी कोई और’

नवकांत ठाकुर
संसद के मौजूदा मानसून सत्र का दूसरा हफ्ता भी हंगामे और बवाल की भेंट चढ़ने के बाद यह सवाल उठना लाजिमी ही है कि आखिर इसका दोष किस पर डाला जाये। लगातार दो सप्ताह से संसद नहीं चल पाने की वजहों पर गौर करें तो इसके लिये सीधे तौर पर विपक्ष को जिम्मेवार ठहरा देना तो बेहद आसान है लेकिन सवाल है कि विपक्ष ने जिन मसलों को तूल देते हुए संसद को बाधित करने का पहले से ही ऐलान किया हुआ था उस पर उसे मनाने, समझाने व सहमति की राह तलाशने के बजाय सत्तापक्ष द्वारा जिस तरह से उसे लगातार उकसाने का प्रयास किया जा रहा है उसे किस रूप में देखा जाये। एक मिनट के लिये अगर यह मान भी लिया जाये कि कांग्रेस ने देश के विकास को बाधित करने और केन्द्र सरकार को नाकारा व निकम्मा साबित करने की सियासी साजिश के तहत निराधार तथ्यों को तूल देते हुए संसद में गतिरोध, हंगामे व बवाल का सिलसिला जारी रखा हुआ है, फिर भी यह बात समझ से परे है कि सत्तापक्ष भी लगातार संसद में जारी बवाल की आग में उकसावे का प्रेट्रोल डालता हुआ क्यों दिखाई पड़ रहा है। दरअसल जिस तरह से सत्तापक्ष ने विरोध व गतिरोध की चिंगारी पर अपने आक्रोश व उकसावे की आग बरसाने का सिलसिला जारी रखा हुआ है उससे तो कतई नहीं लगता है कि वह वास्तव में संसद को सुचारू ढंग से चलाने के प्रति जरा भी गंभीर है। माना कि कांग्रेस ने जिद ठानी हुई है कि जब तक ललित गेट मामले में सुषमा स्वराज व वसुंधरा राजे का और व्यापम घोटाले में शिवराज सिंह चैहान का इस्तीफा नहीं हो जाता है तब तक वह कतई संसद को सुचारू ढंग से संचालित करने में सहभागी नहीं बनेगी। लेकिन इस मसले पर बाकी विपक्षी दलों ने अब तक ऐसी किसी ठोस जिद का तो मुजाहिरा ही नहीं किया है। अलबत्ता जनता परिवार के घटक दल तो संसद के संचालन में सरकार का सहयोग करने के लिये पूरी तरह तैयार हैं। इसी प्रकार वामपंथी दलों ने भी संसद में जारी गतिरोध पर अपना आक्रोश जताने में कोई कोताही नहीं बरती है। साथ ही बीजद व अन्ना द्रमुक सरीखे गुटनिरपेक्ष दलों ने भी संसद को बाधित रखे जाने पर अपनी चिंता ही जाहिर की है और राकांपा व द्रमुक सरीखे संप्रग के घटक दलों को भी संसद में जारी गतिरोध कतई रास नहीं आ रहा है। इन तथ्यों से इतना तो स्पष्ट है कि संसद बाधित रखने में कांग्रेस का सहयोग करना किसी भी रसूखदार दल को कतई गवारा नहीं हो रहा है। लिहाजा गैरकांग्रेसी विपक्ष को विश्वास में लेकर सरकार के लिये संसद में कांग्रेस को अलग-थलग करना काफी आसान हो सकता था। लेकिन अब तक ना तो विपक्षी दलों के साथ सर्वदलीय बैठक आयोजित करने की पहल हुई है और ना ही कांग्रेस के साथ सहमति की राह निकालने का कोई ठोस प्रयास हुआ है। उल्टे पिछले सप्ताह संसदीय कार्यमंत्रालय ने अपनी ओर से जब अनौपचारिक तौर पर सर्वदलीय बैठक आयोजित करने की योजना बनायी तो उसी दिन संसद के भीतर सत्तापक्ष के सांसदों ने राॅबर्ट वाड्रा की आड़ लेकर जिस तरह से सोनिया गांधी पर निजी हमला कर दिया जिससे आहत होकर कांग्रेस ने बैठक में शिरकत करने से इनकार कर दिया नतीजन बैठक हो ही नहीं सकी। हालांकि तय वक्त पर वामदलों के नेताओं से लेकर कई अन्य विपक्षी दलों के नेता भी बैठक के लिये एकत्र हो चुके थे लेकिन सरकार ने कांग्रेस को अलग छोड़कर बाकी विपक्षी दलों के साथ बातचीत करना उचित नहीं समझा। इसी प्रकार आज भी लोकसभा अध्यक्षा सुमित्रा महाजन द्वारा बुलाई गई बैठक से ऐन पहले वित्तमंत्री अरूण जेटली द्वारा बेहद आक्रामक लहजे में कांग्रेस पर ‘तुच्छ, नकारात्मक व गैर जिम्मेदाराना’ राजनीति करने का आरोप लगाने की पहल किये जाने के साथ ही इस बैठक में भी गतिरोध समाप्त होने की कोई राह निकलने की उम्मीद सिरे से समाप्त हो गई। वैसे भी वरिष्ठ कांग्रेसी नेता आनंद शर्मा की मानें तो आज संसद की बैठक शुरू होने से पहले ही सरकार ने विपक्ष को आश्वस्त कर दिया था कि चुंकि सभी दलों के अधिकांश शीर्ष नेता पूर्व राष्ट्रपति डाॅ एपीजे अब्दुल कलाम को अंतिम विदाई देने के लिये रामेश्वरम गये हुए हैं लिहाजा पंजाब में हुए आतंकी हमले के मसले पर ना तो गृहमंत्री द्वारा संसद में बयान दिया जाएगा और ना ही आंतरिक सुरक्षा के मसले पर चर्चा कराई जाएगी। लेकिन इस वायदे से मुकरते हुए अचानक ही पहले तो गृहमंत्री का बयान करा दिया गया और जब इस पर विपक्ष ने हंगामा खड़ा किया तो उस पर सियासी स्वार्थ के लिये राष्ट्रीय सुरक्षा की अनदेखी करने की तोहमत लगा दी गयी। जाहिर है कि इस तरह के उकसावे की कूटनीति का तो यही मतलब निकाला जाएगा कि अब सरकार भी नहीं चाह रही है कि संसद की कार्रवाई सुचारू ढंग से संचालित हो सके। इससे विपक्ष पर नकारात्मक राजनीति करने का आरोप लगाते हुए उसे सार्वजनिक तौर पर बदनाम करना सरकार के लिये काफी आसान हो जाएगा। बहरहाल समग्रता में देखा जाये तो संसद को बाधित रखने के लिये भले ही विपक्ष को ही दोषी ठहराया जा रहा हो लेकिन हकीकत यही है कि इसके लिये जितनी दोषी विपक्ष की सियासी जिद है उससे जरा भी कम सत्ता पक्ष की उकसावे की कूटनीति भी नहीं है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ 

बुधवार, 29 जुलाई 2015

‘बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां से पाय’

नवकांत ठाकुर
संत कबीर ने सीख दी हुई है कि ‘जो तोको कांटा बुवै ताहि बोय तू फूल, तोहि फूल को फूल है वाको है त्रिशूल।’ हालांकि मौजूदा दौर में अव्वल तो यह नीति हर जगह लागू नहीं हो पाती और दूसरे इस पर अमल करने का सब्र रखनेवाले भी विलुप्त होने की कगार पर हैं जो अक्सर चिराग लेकर ढूंढ़ने से भी नहीं मिलते। हालांकि अपनी राहों में कांटे बिछानेवाले की डगर पर फूल बरसाने की दरियादिली व बड़प्पन दिखानेवालों को इन दिनों बेशक वैसा नतीजा नहीं मिल पाता हो जैसा कबीर ने बताया है लेकिन दूसरों की राहों में कांटे बिछानेवालों की अपनी राहें भी फूलों से कतई गुलजार नहीं हो पाती हैं। बल्कि सफलता की राहों में आगे बढ़ने के क्रम में पूरे रास्ते दूसरों के लिये कांटा बिछाते हुए चलनेवालों के सामने जब कभी असफलता से मायूस होकर वापसी की राह पकड़ने की नौबत आती है तो रास्ते में उनका सामना अपने ही हाथों बिछाए गये कांटों से होना तय ही रहता है। तभी तो कहा गया है कि ‘बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां से पाय।’ कुछ ऐसी ही मुश्किलों व परेशानियों का सामना इन दिनों कांग्रेस को भी करना पड़ रहा है लेकिन मुश्किल यह है कि वह इसके लिये किसी दूसरे को दोषी ठहराने की भी स्थिति में नहीं है। दरअसल पूरा मामला संसद के मौजूदा मानसून सत्र से जुड़ा हुआ है जिसमें सरकार की अग्निपरीक्षा लेने में कांग्रेस कोई कसर नहीं छोड़ रही है। अव्वल तो उसे केन्द्र सरकार द्वारा की जा रही भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन की कोशिशें हजम नहीं हो रही हैं और दूसरे ललित गेट व व्यापम के विवाद में सीधे तौर पर सुषमा स्वराज, वसुंधरा राजे व शिवराज सिंह चैहान का नाम सामने आने के बावजूद उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होने से वह बुरी तरह आक्रोशित है। उस पर नीम चढ़े करेले की बात यह है कि सत्ताधारी भगवा खेमे ने जिस तरह से पलटवार करते हुए कांग्रेस के शीर्ष संचालक परिवार के सभी चारों बालिग सदस्यों पर घपले, घोटाले व गलतबयानी का आरोप लगाते हुए सीधा व निजी हमला शुरू कर दिया है और कांग्रेसशासित राज्यों के भ्रष्टाचार के मामलों को राष्ट्रीय स्तर पर तूल देना आरंभ कर दिया है उससे कांग्रेस के क्रोध की चिंगारी अब दावानल की शक्ल लेती दिख रही है। तभी तो अन्य विपक्षी दलों द्वारा इन मसलों पर साथ दिये जाने के प्रति इनकार या इकरार किये जाने से बेपरवाह होकर कांग्रेस ने अकेले दम पर संसद से लेकर सड़क तक सरकार की नींद हराम करने की हरसंभव कोशिश करने में कोई कोताही नहीं बरती है। यहां तक कि अपनी ओर से तो उसने संसद के मौजूदा सत्र के शुरूआती एक तिहाई अर्सेे में सरकार को एक कदम भी आगे बढ़ने या संसद को सुचारू तरीके से संचालित करने की छूट भी नहीं दी है और सड़क पर भी राहुल गांधी की अगुवाई में पार्टी ने अपनी पूरी ताकत से सरकार के खिलाफ आंदोलन, प्रदर्शन व जनजागरण करने की मुहिम चलाई हुई है। लेकिन मसला यह है कि कांग्रेस तो अन्य विपक्षी दलों के काफी बड़े धड़े को अपने साथ जोड़कर संसद में गतिरोध का माहौल बरकरार रखने में अपनी पूरी ऊर्जा खपा रही है लेकिन संसद के भीतर होनेवाले बवाल व हंगामे की तस्वीरें पूरी तरह सामने ही नहीं आ पा रही है। दरअसल संसद के भीतर से उतनी ही तस्वीरें बाहर आ पाती हैं जितना दोनों सदनों के टीवी चैनल प्रसारित करते हैं। संसद के भीतर की तस्वीर दिखाने की इजाजत किसी भी अन्य सरकारी या निजी ब्राॅडकास्टर को हासिल नहीं है लिहाजा सभी अखबारों व खबरिया चैनलों में संसद के भीतर की वही तस्वीर या फुटेज प्रकाशित व प्रसारित होती है जो लोकसभा टीवी या राज्यसभा टीवी द्वारा प्रसारित की जाती है। लेकिन मसला यह है कि संसद में हंगामा मचाने व बवाल काटने की तस्वीरें इन दोनों ही चैनलों से नदारद दिख रही हैं नतीजन कोई अन्य अखबार या खबरिया चैनल भी इसे प्रकाशित व प्रसारित नहीं कर पा रहा है। इसी मसले से परेशान होकर कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी को औपचारिक तौर पर अपना आक्रोश प्रकट करने के लिये मजबूर भी होना पड़ा है। लेकिन मसला यह है कि विपक्ष के विरोध का सीधा प्रसारण नहीं किये जाने की परंपरा अगर मौजूदा सरकार के कार्यकाल में शुरू हुई होती तो कांग्रेस का विरोध उचित माना जा सकता था मगर सच तो यह है कि इस परंपरा की नींव पूर्ववर्ती कांग्रेसनीत संप्रग सरकार के कार्यकाल में तत्कालीन लोकसभा अध्यक्षा मीरा कुमार ने ही डाली थी जिसका अनुपाल मौजूदा वक्त में भी यथावत जारी है। फर्क सिर्फ इतना है कि उन दिनों भाजपा की मेहनत को मीडिया में समुचित जगह नहीं मिल पा रही थी जबकि अब वही परेशानी कांग्रेस के गले पड़ गयी है। काश, विपक्ष की आवाज को दबाने की इस परंपरा का सत्ता में रहते हुए कांग्रेस ने ठोस व पुरजोर विरोध किया होता तो आज उसे संसद के टीवी चैनलों द्वारा सत्तापक्ष व विपक्ष के बीच किये जा रहे भेदभाव का हर्गिज सामना नहीं करना पड़ता। खैर, मौजूदा सत्ताधारियों को भी यह नहीं भूलना चाहिये कि जिस परंपरा के अनुपालन से उन्हें इन दिनों सहूलियत मिल रही है वह जैसे पहले उनके लिये परेशानी का सबब बनी हुई थी वैसी ही परेशानी का सामना उन्हें भविष्य में भी करना पड़ सकता है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’   

शुक्रवार, 24 जुलाई 2015

‘क्या बने बात जहां बात बनाए न बने’

नवकांत ठाकुर
‘नुक्ताचीं है गमे-दिल उसको सुनाए न बने, क्या बने बात जहां बात बनाए न बने, बोझ वो सर से गिरा है कि उठाए न बने, काम वो आन पड़ा है कि बनाए न बने।’ वाकई दीवाने गालिब में संकलित मिर्जा गालिब की कलम से निकली यह गजल मौजूदा सियासी उलझनों के मद्देनजर बेहद प्रासंगिक दिखाई पड़ती है। राष्ट्रीय राजनीति की हालत ऐसी ही है कि बिगड़ी हुई बात बनने की कोई राह निकलती नहीं दिख रही है। वैसे राह भी तब निकले जब बातों का सिलसिला शुरू हो। यहां तो कोई भी पक्ष आमने-सामने बैठकर मौजूदा मुश्किलों का आम सहमति से कोई हल तलाशने के लिये तैयार ही नहीं है। एक ओर कांग्रेस की जिद है कि सुषमा स्वराज, शिवराज सिंह चैहान और वसुंधरा राजे को उनके पद से हटाए जाने से पहले वह सत्ताधारी पक्ष के साथ कतई सहयोग या संवाद नहीं करेगी जबकि सत्तारूढ़ भगवा खेमा किसी भी हालत में एक इंच भी झुकने के लिये तैयार नहीं है। आलम यह है कि कांग्रेस द्वारा संसद से लेकर सड़क तक खोले गये मोर्चे के जवाब में भाजपा ने भी अपने बचाव में विरोधी पक्ष पर पलटवार करते हुए जोरदार आक्रमण करने की ही राह पकड़ ली है। तभी तो ना सिर्फ कांग्रेस शासित सूबों में हुए घपले-घोटाले, भ्रष्टाचार व वित्तीय अनियमितताओं के मामलों को राष्ट्रीय स्तर पर जोरदार तरीके से उजागर करने का सिलसिला शुरू कर दिया है बल्कि कांग्रेस के शीर्ष परिवार के सदस्यों पर निजी हमले करने से भी परहेज नहीं बरता जा रहा है। हालांकि सत्तापक्ष व मुख्य विपक्ष द्वारा बढ़-चढ़कर एक दूसरे के खिलाफ किये जा रहे आक्रामक हमलों के कारण ठप्प पड़ी संसद को सुचारू ढ़ंग से संचालित कराने की राह निकालने के लिये गैर-कांग्रेसी विपक्षी दल खासी मशक्कत करते दिख रहे हैं लेकिन उनके द्वारा सुझाये गये फार्मूलों पर भी कोई बात बनती नहीं दिख रही है। मसला यह है कि बात तो तब बने जब दोनों पक्ष बातचीत के लिये सहमत हों। यहां तो इन दोनों को बातचीत के लिये आमने-सामने बिठाना भी टेढ़ी खीर बनी हुई है। आज की ही बात करें तो सुबह के वक्त सभी राजनीतिक दलों के बीच इस बात पर आम सहमति बन गयी थी कि दोपहर में अनौपचारिक तौर पर एक सर्वदलीय बैठक आयोजित होगी जिसमें संसद में जारी मौजूदा गतिरोध का कोई सर्वसम्मत तोड़ निकालने का प्रयास किया जाएगा। सूत्र बताते हैं कि कांग्रेस के वरिष्ठ रणनीतिकारों ने भी इस बैठक में शिरकत करने के लिये हामी भर दी थी। यानि मामला पटरी पर आता दिखने लगा था। लेकिन सुबह के वक्त जब संसद की कार्यवाही शुरू हुई तो सत्तापक्ष के सांसदों ने ना सिर्फ कांग्रेस के खिलाफ जमकर नारेबाजी की बल्कि पार्टी अध्यक्षा सोनिया गांधी के इकलौते दामाद राॅबर्ट वाड्रा द्वारा किये गये कथित जमीन घोटाले के मामले को तूल देते हुए संसद में बैनर-पोस्टर भी लहराए। यहां तक कि वाड्रा द्वारा संसद में अपने खिलाफ उठाए जा रहे मसले को तुच्छ राजनीति बताए जाने को संसद की अवमानना करार देते हुए बीकानेर के भाजपाई सांसद अर्जुन मेघवाल ने विशेषाधिकार हनन का नोटिस भी दे दिया। नतीजन सत्तापक्ष के सांसदों की इन हरकतों खिन्न होकर कांग्रेसी रणनीतिकारों ने सर्वदलीय बैठक में शिरकत करने से ही इनकार कर दिया जिसके कारण बात बनाने के लिये आरंभ किये जा रहे बातचीत के सिलसिले की शुरूआत ही नहीं हो सकी। हालांकि सूत्र बताते हैं कि इस पूरे घटनाक्रम से गैर-कांग्रेसी दलों के बीच भारी निराशा का माहौल अवश्य बना है क्योंकि आज की बैठक के पूर्व ही वाममोर्चे से लेकर सपा व तृणमूल सरीखे दलों ने भी सरकार को इस बात की सहमति दे दी थी कि संसद जारी गतिरोध को दूर करने के लिये वह कांग्रेस के साथ जो भी समझौता करेगी उसे तहेदिल से स्वीकार करने में वे कतई कोताही नहीं बरतेंगे। लेकिन जब बैठक ही नहीं हो पा रही है तो सहमति की कोई राह निकलने का सवाल ही कहां है। पहली आवश्यकता तो इन दोनों पक्षों को बातचीत के लिये आमने-सामने बिठाने की है। बात होगी तो बात बनने की कोई सूरत निकलेगी लेकिन बात ही नहीं होगी तो बात बनेगी कैसे। खैर, सूत्र बताते हैं कि गैर-कांग्रेसी विपक्ष ने दोनों पक्षों के सामने यह फार्मूला भी पेश किया है कि जिन तीन नेताओं को पद से हटाने की कांग्रेस ने जिद ठानी हुई है उन पर लग रहे आरोपों की जांच के लिये एक संसदीय समिति का गठन कर दिया जाये। लेकिन फिलहाल यह फार्मूला ना तो कांग्रेस को रास आ रहा है और ना ही भाजपा इस पर अमल करने के लिये सहमत दिख रही है। खैर, आज की बैठक स्थगित हो जाने या गैर-कांग्रेसी विपक्ष द्वारा पेश किये जा रहे फार्मूलों पर कोई आम राय नहीं बन पाने के मामले को देखते हुए यह निष्कर्ष निकाल लेना तो जल्दबाजी होगी कि मौजूदा सत्र सुचारू ढ़ंग से संचालित ही नहीं हो पाएगा लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में मतभेदों को सुलझाने का इकलौता रास्ता बातचीत का ही होने के कारण यह तो तय है कि फिलहाल मुलाकात या बात करने से भी इनकार कर रहे दोनों ही पक्षों को कभी ना कभी बातचीत के लिये आमने-सामने बैठना ही होगा। लेकिन बातचीत का दरवाजा खोलने में जितनी देर की जाएगी उसका देश को उतना ही नुकसान झेलना पड़ेगा और इसकी पूरी जिम्मेवारी अपनी-अपनी जिद पर अड़े इन दोनों पक्षों की ही होगी। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’   

मंगलवार, 21 जुलाई 2015

‘साम दान भय भेद का कुछ तो दिखे परिणाम’

विरोधियों से अपनी बात मनवाने के लिये सत्ताधारियों द्वारा अक्सर जिन चार उपायों को अमल में लाये जाने का रामचरित मानस में तुलसीदास ने जिक्र किया है वे हैं साम, दान, भय और भेद। इसमें ‘साम’ का मतलब है समझाना, सम्मान देना व सहमति से संतुलन की राह निकालना। ‘दाम’ का अर्थ है सौदेबाजी, लेन-देन या खरीद-फरोख्त की राह अपनाना। ‘भय’ से तात्पर्य है विरोधी पक्ष को उसकी कमजोरियों व अपनी ताकत का एहसास कराके डराना। और भेद का मतलब है रहस्यात्मक रणनीति व कूटनीति का प्रयोग करते हुए विरोधी पक्ष में फूट डालकर उसे मजबूर, कमजोर व विवश कर देना। कायदे से देखा जाये तो ताजा राजनीतिक माहौल में केन्द्र सरकार भी कल से शुरू हो रहे संसद के मानसून सत्र में संभावित गतिरोध, भिड़ंत व टकराव की स्थिति को टालते हुए संसद को सुचारू ढ़ंग से चलाने के लिये इन चारों उपायों का एक साथ ही प्रयोग करती दिख रही है। दरअसल मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने पहले से ही स्पष्ट कर दिया है कि व्यापम घोटाले के आरोपों में घिरे शिवराज सिंह चैहान और ललित मोदी के मामले में फंसी सुषमा स्वराज व वसुंधरा राजे को उनके पद से हटाए जाने के बाद ही वह संसद को सुचारू ढंग से संचालित करने में सरकार का सहयोग करेगी। साथ ही उसने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि वह वर्ष 2013 में बने भूमि अधिग्रहण कानून में एक शब्द भी संशोधन करने की सरकार को हर्गिज इजाजत नहीं देगी। जाहिर है कि कांग्रेस की इस जिद को देखते हुए संसद का मानसून सत्र पूरी तरह हंगामे की भेंट चढ़ना लाजिमी ही है। लेकिन जहां तक सरकार का सवाल है तो उसकी पूरी कोशिश है कि किसी भी तरह तमाम राजनीतिक दलों के बीच जारी नीतिगत, वैचारिक व सैद्धांतिक गतिरोध को दूर करते हुए संसद को सुचारू ढंग से संचालित करके संसद के सत्र को अधिकतम परिणामदायक बनाया जाये। यही वजह है कि अपने सहयोगियों को मजबूती के साथ अपने पक्ष में खड़ा करने के लिये राजग गठबंधन के घटक दलों को पहली बार औपचारिक तौर पर एकसाथ रात्रिभोज के बहाने बातचीत करने के लिये प्रधानमंत्री ने अपने निवास पर आमंत्रित करने की पहल की। साथ ही विरोधियों को मनाने के लिये ‘साम’ नीति के तहत समझाने की राह अख्तियार करते हुए भूमि अधिग्रहण विधेयक के मसले पर बातचीत करने के लिये पहले भी आमंत्रित किया गया जिसमें शिरकत करने से कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों ने तो साफ तौर पर इनकार कर दिया अलबत्ता भाजपा व उसके साथी दलों के मुख्यमंत्रियों के अलावा बिहार व दिल्ली के सूबेदारों सहित कुछ सोलह प्रदेशों के साथ बातचीत भी हुई। साथ ही संसदीय कार्यमंत्री वेंकैया नायडू ने और लोकसभा अध्यक्षा सुमित्रा महाजन ने सर्वदलीय बैठक बुलाकर तमाम विवादास्पद मसलों पर सभी दलों को समझाने व मनाने की पहल भी की। इस ‘साम’ नीति के नतीजे में कथित तौर पर सपा व बसपा सहित जनता परिवार के घटक दलों सहित अधिकांश राजनीतिक दलों ने तमाम विवादास्पद व उलझाऊ मसलों पर बातचीत के माध्यम से सहमति की राह निकालने व संसद को सुचारू ढंग से संचालित करने पर अपनी सहमति दे दी है। लेकिन कांग्रेस बदस्तूर संसद में गतिरोध का माहौल बनाने की जिद पर अड़ी दिख रही है। हालांकि सूत्रों की मानें तो कांग्रेस को झुकाने व उसे पीछे हटने पर मजबूर करने के लिये ‘दान’ नीति के तहत यह प्रस्ताव भी दे दिया गया है कि अगर वह बाकी मसलों पर अपनी जिद छोड़ दे तो मौजूदा सत्र में भूमि विधेयक को पारित कराने से परहेज बरत लिया जाएगा ताकि बाकी संसदीय कामकाज सुचारू ढंग से संचालित हो सके और जीएसटी व नाबालिग श्रमिकों से जुड़े महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित कराने की राह निकल सके। साथ ही कांग्रेस के खिलाफ ‘भय’ की नीति का प्रयोग करते हुए भाजपा ने स्पष्ट कर दिया है अगर उसने गतिरोध व टकराव का सिलसिला बदस्तूर जारी रखा तो ऐसे में उसके शीर्ष संचालक परिवार के दामाद राबर्ट वाड्रा द्वारा राजस्थान व हरियाणा में कथित तौर पर अंजाम दिये जमीन घोटाले, प्रियंका गांधी द्वारा शिमला में की गयी जमीन की कथित हेराफेरी व सोनिया गांधी की सगी बहन द्वारा ललित मोदी से 500 करोड़ की रिश्वत मांगे जाने के मामले को देशभर में बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनाने और विदेशी कंपनी से घूस लेने के मामले में अमेरिकी अदालत में साबित हो चुकी गोवा की पूर्ववर्ती सरकार के मंत्रियों संलिप्तता के मसले की सीबीआई से जांच कराने से भी परहेज नहीं बरता जाएगा। इसके अलावा ‘भेद’ की नीति के तहत कांग्रेस को संसद से लेकर सड़क तक पूरी तरह अलग-थलग करने व अन्य विपक्षी व तटस्थ दलों के साथ बातचीत के माध्यम से तमाम विवादास्पद मसलों पर आम सहमति की राह निकालने की कोशिशें भी जोरों पर जारी है। यानि समग्रता में देखा जाये तो सरकार ने विपक्ष पर ‘साम दान भय भेद’ के सभी हथियारों का एक साथ ही प्रयोग कर दिया है लेकिन मसला यह है कि इन तमाम हथकंडों को अमल में लाये जाने के बावजूद जिस तरह से कांग्रेस के आक्रोश व आक्रामकता में जरा भी कमी नहीं दिख रही है उसके मद्देनजर अगर सरकार ने समय रहते किसी अन्य उपाय से इस मसले को हल करने की पहल नहीं की तो कल से आरंभ हो रहे संसद के मानसून सत्र में कुछ सकारात्मक परिणाम हासिल करने की उम्मीदें शायद ही परवान चढ़ सकें। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ 

शुक्रवार, 10 जुलाई 2015

‘क्या हासिल पीछे हटने से, आगे बढ़ो प्रहार करो’
नवकांत ठाकुर
ईद के सिवैयों की मिठास के साथ आरंभ होने जा रहे संसद के मानसून सत्र का जायका बेहद तीखा रहने का एलान तो विपक्ष ने पहले ही कर दिया है। मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने बेलाग लहजे में काफी पहले ही बता दिया था कि अगर सरकार ने प्रवर्तन निदेशालय द्वारा भगोड़ा घोषित किये जा चुके ललित मोदी की मदद करने के आरोपों में घिरी विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को उनके पद से नहीं हटाया तो वह संसद के सत्र को हर्गिज सुचारू ढंग से संचालित नहीं होने देगी। साथ ही व्यापम विवाद को लेकर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान को भी पद से हटाये जाने की जिद पर अड़े विपक्ष द्वारा इस मामले को लेकर भी संसद में जोरदार बवाल काटे जाने की पूरी संभावना है। इसके अलावा सरकार ने भूमि अधिग्रहण विधेयक के संशोधित प्रारूप को सदन से पारित कराने की जो जिद ठानी हुई है उससे भी विपक्ष को संसद में बवाल काटने का भरपूर मौका मुहैया होता दिख रहा है। साथ ही खाद्य पदार्थों की आसमान छू रही महंगाई से लेकर राष्ट्रीय सुरक्षा, मौसमी बाढ़-सुखाड़ व किसानों की समस्या सरीखे विभिन्न सदाबहार मामलों के तीर तो सरकार पर हमला करने के लिये विपक्ष की तूणीर में हमेशा ही पड़े रहते हैं। यानि अगर मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के मौजूदा तेवरों व तैयारियों को देखा जाये तो इस बार वह संसद को सुचारू ढंग से संचालित करने में सरकार का सहयोग करने के लिये कतई तैयार नहीं दिख रही है। हालांकि इसके लिये बाकी विपक्षी दलों को भी अपने साथ जोड़ने के प्रति कांग्रेस की ओर से अभी तक कोई औपचारिक प्रयास नहीं किया गया है लेकिन पार्टी का मानना है कि मौजूदा हालातों में बाकी विपक्षी दलों को अपने साथ जोउ़ने के लिये उसे विशेष परिश्रम करने की कोई जरूरत नहीं पड़ेगी बल्कि तमाम विरोधी दल खुद ही इन मामलों को लेकर उसके सुर में अपना सुर मिलाने के लिये आगे आ जाएंगे। अब कांग्रेस की यह अपेक्षाएं किस हद तक पूरी हो पाएंगी यह तो वक्त आने पर ही पता चलेगा लेकिन उसके इन हमलावर तेवरों को देखते हुए सरकार के संचालकों द्वारा जो  जवाबी रणनीति अपनाए जाने का संकेत मिल रहा है उसके तहत विपक्ष की ओर से होनेवाले हमलों का जोरदार प्रतिवाद करने की तैयारियां अभी से तेज कर दी गयी हैं। सूत्रों की मानें तो विपक्ष की घेरेबंदी से बचने के लिये किलाबंदी करके अपना बचाव करने के विकल्प को अमल में लाने के बजाय इस बार सरकारी खेमा भी ईंट का जवाब पत्थर से देने की पूरी तैयारी कर रहा है। इसी सिलसिले में एक ओर तो कांग्रेस को अलग थलग करके विपक्षी घेरेबंदी को कमजोर करने की रणनीति अपनायी जा रही है और दूसरी ओर कांग्रेस के हथियारों की धार को भोथरा करके उसकी ताकत कामजोर करने का भी प्रयास किया जा रहा है। साथ ही गैरकांग्रेसी विपक्षियों की कमजोरियों को हथियार बनाकर उनका अंदरूनी सहयोग व समर्थन हासिल करने की योजना भी बनायी जा रही है। इसी सिलसिले में जनता परिवार को शिकंजे में लेने के लिये सपा की कमजोरियों पर अपनी मजबूत पकड़ बनाने के मकसद से भाजपा ने राष्ट्रीय नेताओं की एक टोली को उत्तर प्रदेश भेजने की योजना बनायी है जो शाहजहांपुर में हुए पत्रकार जगेन्द्र की हत्या के मामले और बाराबंकी में थाने के भीतर महिला को जलाकर मार दिये जाने के मामले की पड़ताल करके संसद सत्र शुरू होने से पहले ही अपनी विस्तृत रिपोर्ट पार्टी अध्यक्ष को सौंप देगी। इसके अलावा व्यापम के मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सीबीआई जांच की अर्जी पर सकारात्मक फैसला सुनाए जाने का स्वागत करके भाजपा ने इस मसले का कांग्रेसी हथियार अभी से कुंद कर दिया है। रहा सवाल ललित मोदी से जुड़े मसलों का तो इस मामले में भी पार्टी ने हमलावर तेवर अख्तियार करते हुए तय किया है कि अगर कांग्रेस ने ललित के भाजपा कनेक्शन को तूल देकर संसद में हंगामा मचाने की पहल की तो इसके जवाब में ललित द्वारा किये गये कांग्रेस के शीर्ष परिवार से जुड़े खुलासों को लेकर उसे सवालों के कठघरे में खड़ा करने से कतई परहेज नहीं बरता जाएगा। इसके अलावा भूमि अधिग्रहण विधेयक के मामले में राज्यसभा की प्रवर समिति द्वारा प्रस्तुत की गयी सिफारिशों को स्वीकार कर लिये जाने के बाद भी अगर कांग्रेस ने इसे पारित करने में सहयोग नहीं किया तो पहली कोशिश तो सभी गैरकांग्रेसी दलों को अपने साथ जोड़कर इसे सदन से पारित कराने की ही होगी जिसके लिये किसी भी हथकंडे को अमल में लाने से कतई संकोच नहीं किया जाएगा। लेकिन अगर फिर भी बात नहीं बनी और इसे राज्यसभा का समर्थन नहीं मिल सका तो इस मामले में भी अब चुप बैठने के बजाय संसद का संयुक्त सत्र बुलाकर विधेयक को पारित कराने के विकल्प पर यथाशीघ्र अमल कर लिया जाएगा। यानि समग्रता में देखा जाये तो इस बार का मानसून सत्र बेहद जोरदार टकराव का गवाह बनने जा रहा है जिसमें कोई भी पक्ष जरा भी पीछे हटने के लिये तैयार नहीं दिख रहा है। बहरहाल, हमले के जवाब में आक्रमण की रणनीति अपनाये जाने को तो कतई गलत नहीं कहा जा सकता है लेकिन विपक्ष को विश्वास में लेकर संसद को सुचारू ढ़ंग से संचालित करने परंपरा के बदस्तूर क्षरण को कैसे सही कहा जा सकता है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’