‘बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां से पाय’
नवकांत ठाकुर
संत कबीर ने सीख दी हुई है कि ‘जो तोको कांटा बुवै ताहि बोय तू फूल, तोहि फूल को फूल है वाको है त्रिशूल।’ हालांकि मौजूदा दौर में अव्वल तो यह नीति हर जगह लागू नहीं हो पाती और दूसरे इस पर अमल करने का सब्र रखनेवाले भी विलुप्त होने की कगार पर हैं जो अक्सर चिराग लेकर ढूंढ़ने से भी नहीं मिलते। हालांकि अपनी राहों में कांटे बिछानेवाले की डगर पर फूल बरसाने की दरियादिली व बड़प्पन दिखानेवालों को इन दिनों बेशक वैसा नतीजा नहीं मिल पाता हो जैसा कबीर ने बताया है लेकिन दूसरों की राहों में कांटे बिछानेवालों की अपनी राहें भी फूलों से कतई गुलजार नहीं हो पाती हैं। बल्कि सफलता की राहों में आगे बढ़ने के क्रम में पूरे रास्ते दूसरों के लिये कांटा बिछाते हुए चलनेवालों के सामने जब कभी असफलता से मायूस होकर वापसी की राह पकड़ने की नौबत आती है तो रास्ते में उनका सामना अपने ही हाथों बिछाए गये कांटों से होना तय ही रहता है। तभी तो कहा गया है कि ‘बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां से पाय।’ कुछ ऐसी ही मुश्किलों व परेशानियों का सामना इन दिनों कांग्रेस को भी करना पड़ रहा है लेकिन मुश्किल यह है कि वह इसके लिये किसी दूसरे को दोषी ठहराने की भी स्थिति में नहीं है। दरअसल पूरा मामला संसद के मौजूदा मानसून सत्र से जुड़ा हुआ है जिसमें सरकार की अग्निपरीक्षा लेने में कांग्रेस कोई कसर नहीं छोड़ रही है। अव्वल तो उसे केन्द्र सरकार द्वारा की जा रही भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन की कोशिशें हजम नहीं हो रही हैं और दूसरे ललित गेट व व्यापम के विवाद में सीधे तौर पर सुषमा स्वराज, वसुंधरा राजे व शिवराज सिंह चैहान का नाम सामने आने के बावजूद उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होने से वह बुरी तरह आक्रोशित है। उस पर नीम चढ़े करेले की बात यह है कि सत्ताधारी भगवा खेमे ने जिस तरह से पलटवार करते हुए कांग्रेस के शीर्ष संचालक परिवार के सभी चारों बालिग सदस्यों पर घपले, घोटाले व गलतबयानी का आरोप लगाते हुए सीधा व निजी हमला शुरू कर दिया है और कांग्रेसशासित राज्यों के भ्रष्टाचार के मामलों को राष्ट्रीय स्तर पर तूल देना आरंभ कर दिया है उससे कांग्रेस के क्रोध की चिंगारी अब दावानल की शक्ल लेती दिख रही है। तभी तो अन्य विपक्षी दलों द्वारा इन मसलों पर साथ दिये जाने के प्रति इनकार या इकरार किये जाने से बेपरवाह होकर कांग्रेस ने अकेले दम पर संसद से लेकर सड़क तक सरकार की नींद हराम करने की हरसंभव कोशिश करने में कोई कोताही नहीं बरती है। यहां तक कि अपनी ओर से तो उसने संसद के मौजूदा सत्र के शुरूआती एक तिहाई अर्सेे में सरकार को एक कदम भी आगे बढ़ने या संसद को सुचारू तरीके से संचालित करने की छूट भी नहीं दी है और सड़क पर भी राहुल गांधी की अगुवाई में पार्टी ने अपनी पूरी ताकत से सरकार के खिलाफ आंदोलन, प्रदर्शन व जनजागरण करने की मुहिम चलाई हुई है। लेकिन मसला यह है कि कांग्रेस तो अन्य विपक्षी दलों के काफी बड़े धड़े को अपने साथ जोड़कर संसद में गतिरोध का माहौल बरकरार रखने में अपनी पूरी ऊर्जा खपा रही है लेकिन संसद के भीतर होनेवाले बवाल व हंगामे की तस्वीरें पूरी तरह सामने ही नहीं आ पा रही है। दरअसल संसद के भीतर से उतनी ही तस्वीरें बाहर आ पाती हैं जितना दोनों सदनों के टीवी चैनल प्रसारित करते हैं। संसद के भीतर की तस्वीर दिखाने की इजाजत किसी भी अन्य सरकारी या निजी ब्राॅडकास्टर को हासिल नहीं है लिहाजा सभी अखबारों व खबरिया चैनलों में संसद के भीतर की वही तस्वीर या फुटेज प्रकाशित व प्रसारित होती है जो लोकसभा टीवी या राज्यसभा टीवी द्वारा प्रसारित की जाती है। लेकिन मसला यह है कि संसद में हंगामा मचाने व बवाल काटने की तस्वीरें इन दोनों ही चैनलों से नदारद दिख रही हैं नतीजन कोई अन्य अखबार या खबरिया चैनल भी इसे प्रकाशित व प्रसारित नहीं कर पा रहा है। इसी मसले से परेशान होकर कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी को औपचारिक तौर पर अपना आक्रोश प्रकट करने के लिये मजबूर भी होना पड़ा है। लेकिन मसला यह है कि विपक्ष के विरोध का सीधा प्रसारण नहीं किये जाने की परंपरा अगर मौजूदा सरकार के कार्यकाल में शुरू हुई होती तो कांग्रेस का विरोध उचित माना जा सकता था मगर सच तो यह है कि इस परंपरा की नींव पूर्ववर्ती कांग्रेसनीत संप्रग सरकार के कार्यकाल में तत्कालीन लोकसभा अध्यक्षा मीरा कुमार ने ही डाली थी जिसका अनुपाल मौजूदा वक्त में भी यथावत जारी है। फर्क सिर्फ इतना है कि उन दिनों भाजपा की मेहनत को मीडिया में समुचित जगह नहीं मिल पा रही थी जबकि अब वही परेशानी कांग्रेस के गले पड़ गयी है। काश, विपक्ष की आवाज को दबाने की इस परंपरा का सत्ता में रहते हुए कांग्रेस ने ठोस व पुरजोर विरोध किया होता तो आज उसे संसद के टीवी चैनलों द्वारा सत्तापक्ष व विपक्ष के बीच किये जा रहे भेदभाव का हर्गिज सामना नहीं करना पड़ता। खैर, मौजूदा सत्ताधारियों को भी यह नहीं भूलना चाहिये कि जिस परंपरा के अनुपालन से उन्हें इन दिनों सहूलियत मिल रही है वह जैसे पहले उनके लिये परेशानी का सबब बनी हुई थी वैसी ही परेशानी का सामना उन्हें भविष्य में भी करना पड़ सकता है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’
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