सोमवार, 6 जुलाई 2015

‘फैसला मजबूरी का, कोशिश मजबूती की’


बादशाह अकबर के नवरत्नों में शुमार होनेवाले रहीम का कहना है कि ‘रहिमन देख बड़ेन को लघु न दीजिये डार, जहां काम आवे सुई कहा करै तलवार।’ यानि बड़ों के सामने छोटों को दरकिनार करना कतई उचित नहीं है क्योंकि छोटों का काम छोटे ही कर सकते हैं। सुई का काम तलवार से नहीं लिया जा सकता। खैर, रहीम की इस सीख से वाकिफ होने के बावजूद अगर बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा इस पर अमल करने से परहेज बरतती दिख रही है तो इसके पीछे कहीं ना कहीं पार्टी की मजबूरी ही छिपी हुई है। वह भी तब जबकि आमने-सामने की टक्कर के लिये विरोधी पक्ष ने सर्वसम्मति से नीतीश कुमार के रूप में मुख्यमंत्री पद के लिये अपने उम्मीदवार के नाम की पहले ही घोषणा कर दी है। इसके बावजूद संघ, संगठन, साथी व सहयोगी के साथ लंबी मगजमारी के बाद अगर यह तय किया गया है कि बिहार में किसी को भी मुख्यमंत्री पद का प्रत्याशी नहीं बनाया जाएगा और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नाम पर ही जनादेश हासिल करने की कोशिश की जाएगी तो इसे मजबूरी में लिये गये निर्णय के तौर पर देखा जाना ही उचित होगा। हालांकि इसी रणनीति पर अमल करते हुए भाजपा ने पिछले दिनों हरियाणा, महाराष्ट्र, झारखंड व जम्मू कश्मीर के विधानसभा चुनाव में एतिहासिक सफलता अर्जित करने में अवश्य कामयाबी हासिल ही है। लेकिन हकीकत यही है कि बिहार के चुनाव को ना तो उन प्रदेशों में हुए चुनाव के चश्मे से देखा जा सकता है और ना ही दिल्ली विधानसभा चुनाव का पैमाना बिहार के लिये सटीक हो सकता है जहां अंतिम समय में किरण बेदी को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने के नतीजे में भाजपा को करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा। वास्तव में जिन सूबों में मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार का नाम घोषित किये बिना ही भाजपा को अपनी जीत दर्ज कराने में कामयाबी हासिल हुई है वहां अव्वल तो मुकाबला बहुकोणीय था और दूसरे किसी भी पक्ष ने या तो मुख्यमंत्री पद के लिये अपने प्रत्याशी के नाम की घोषणा ही नहीं की थी या फिर जिनका नाम घोषित भी था वे पहले से ही सूबाई स्तर पर भारी जनाक्रोश का सामना कर रहे थे। लेकिन एक तथ्य यह भी है कि जिस प्रकार लोकसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी का नाम ही प्रधानमंत्री पद के दावेदार के तौर पर सामने आया और उनके मुकाबले में किसी भी पक्ष ने अपनी ओर से किसी के नाम की घोषणा नहीं की उसका भारी नुकसान भाजपाविरोधियों को झेलना पड़ा और दौड़ में मोदी के अकेले दिखने के कारण मतदाताओं के सामने पैदा हुई विकल्पहीनता व पसोपेश की स्थिति का भाजपा को भरपूर फायदा मिला। ऐसी ही स्थिति दिल्ली विधानसभा के चुनाव में भी देखी गयी जहां मुख्यमंत्री पद के दावेदार के तौर पर एएपी संयोजक अरविंद केजरीवाल ही अंतिम समय तक अकेले दिखाई दिये और पूरा चुनावी वातावरण उनके ही इर्द-गिर्द केन्द्रित रहा। हालांकि अंतिम समय में भाजपा ने किरण बेदी को संगठन में शामिल कराते हुए उनका चेहरा आगे करके मास्टर स्ट्रोक लगाने की कोशिश अवश्य की लेकिन तब तक अव्वल तो काफी देर हो चुकी थी और दूसरे सियासी मलाई की थाली सांगठनिक दावेदारों के सामने से खींचकर किरण के आगे परोस दिये जाने के नतीजे में जमीनी स्तर पर संगठन में इस कदर असंतोष व आक्रोश का माहौल बन गया कि जिन पर जीत का दारोमदार था वे ही कथित तौर पर पार्टी ही हार सुनिश्चित करने में जुट गये। अब कुछ ऐसा ही माहौल बिहार में भी बनता दिखाई दे रहा है जहां मुख्यमंत्री पद की दौड़ में नीतीश कुमार वैसे ही इकलौते दिखाई दे रहे हैं जैसे लोकसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी और दिल्ली विधानसभा के चुनाव में केजरीवाल दिख रहे थे। दूसरी ओर भाजपा में मुख्यमंत्री पद के दावेदारें की सूची इतनी लंबी थी कि किसी एक नाम पर सहमति बनाकर बाकियों को नाराज करने का जोखिम हर्गिज नहीं लिया जा सकता था। बताते हैं कि जिन नेताओं की नजर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर टिकी हुई है उनमें राधा मोहन सिंह, रविशंकर प्रसाद, गिरिराज सिंह व राजीव प्रताप रूढ़ी सरीखे केन्द्रीय मंत्रियों से लेकर सुशील मोदी, नंदकिशोर यादव, सीपी ठाकुर, शाहनावज हुसैन, मंगल पांडे व अश्विनी चैबे का नाम भी मुख्य रूप से शामिल है। इन सबके अपने अलग खेमें, अगल गुट और अलग समर्थक, साथी व सहयोगी हैं। साथ ही इनमें से एक भी ऐसा नाम नहीं है जो निजी जनाधार के आधार पर नीतीश को टक्कर देने की हैसियत रखता हो। ऐसे में भाजपा के पास तीन ही विकल्प बचे थे। किसी एक नाम पर सहमति बनाकर बाकियों को नाराज करने का जोखिम उठाया जाये, दिल्ली चुनाव की ही तर्ज पर संगठन के सभी दावेदारों को दरकिनार कर जीतनराम मांझी सरीखे बाहरी नेता को पार्टी में शामिल करके उसे मुख्यमंत्री पद का प्रत्याशी घोषित कर दिया जाये या फिर सुशासन बाबू कहलानेवाले नीतीश पर नरेन्द्र मोदी के सुशासन के हथियार से ही हमला किया जाये और मोदी के चेहरे को ही आगे करके चुनाव लड़ा जाये। ऐसे में भाजपा ने अंतिम व सबसे सुरक्षित विकल्प को आजमाने का जो फैसला किया है उसकी अटकलें तो काफी पहले से ही लगायी जा रही थीं लेकिन जिस जंग का आगाज ही मजबूरी में लिये गये फैसले से हो रहा हो उसका निर्णायक अंजाम कैसा होगा इसका आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है।

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