बुधवार, 8 जुलाई 2015

‘वाकई खलने लगी है खामोशी.....’

‘बात ऐसी हुई है क्या साहेब, वादे सब कीजिये वफा साहेब, कुछ तो कहिये कहांकि ये आखिर, लग गयी आपको हवा साहेब, खामोशी और ऐसी खामोशी, कब मोहब्बत में है रवां साहेब।’ वाकई देश के मौजूदा सियासी हालातों के मद्देनजर मशहूर जबलपुरिया शायर सरवर आलम राज के कलम से निकली इस रचना की हर पंक्ति ढ़ाई दशक के लंबे अंतराल के बाद बड़ी उम्मीदों, आशाओं व अपेक्षाओं के साथ किसी एक दल को पूर्ण बहुमत देकर केन्द्र की कुर्सी पर बिठानेवाले मतदाताओं के दिल से निकली आवाज सरीखी ही प्रतीत होती है। खास तौर से अपनी बेबाकी के लिये पहचाने जानेवाले नरेन्द्र मोदी को जब देश के आम लोगों ने प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बिठाया था तब शायद ही किसी को इस बात का जरा भी अंदाजा रहा होगा कि कुर्सी पर काबिज होने के बाद मोदी साहब भी उन्ही मनमोहन सिंह के नक्शेकदम का अनुसरण करने लगेंगे जिनका वे खुद ही ‘मौनमोहन’ कहकर मजाक उड़ाया करते थे। लोकसभा चुनाव से पहले तक तो मोदी ने कभी किसी मसले पर चुप्पी साधना सीखा ही नहीं था। हर बात पर खुलकर बोलने की उनकी बेबाक अदा का ही जादू था कि चुनाव के दौरान समूचे देश में ‘नमो-नमो’ गूंज सुनाई दे रही थी। मसला महंगाई का हो, भ्रष्टाचार का हो, राष्ट्रीय सुरक्षा का हो, विदेश नीति का हो या सियासी कूटनीति का। चुनाव प्रचार के दौरान तो साहेब ने सभी विषयों पर जमकर बोला, खुलकर बोला। इतना बोला कि आम लोगों को सोते-जागते रामराज का सपना साकार होता दिखने लगा। जाहिर है कि ऐसी बेबाकी को देखते हुए कोई सोच भी नहीं सकता था कि साहेब इस कदर बदल जाएंगे। लेकिन लगता है कि अब साहेब वाकई बदल गये हैं। मन की बात तो करते हैं, दिल की बात नहीं कहते। लोग उनसे जानना चाहते हैं ज्वलंत मसलों पर उनकी राय। मगर वे मन की बात करते हैं मनचाहे मसले पर। अनचाहे मामलों का तो कभी जिक्र ही नहीं करते। ऐसे किसी मसले पर अपनी जुबान नहीं खोलते जिसके कारण उनके संगठन व सरकार की विश्वसनीयता पर सवालिया निशान लग रहा है। समूचा विपक्षी खेमा उनसे जानना चाह रहा है कि उनकी ही पार्टी द्वारा संचालित मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ व राजस्थान सरीखे सूबों की सरकार पर घपले-घोटाले, भ्रष्टाचार व आर्थिक अनियमितताओं के जो आरोप लग रह रहे हैं उसके बारे में उनके विचार क्या हैं। सहयोगी दल भी सरकार के कामकाज व उसके द्वारा अपनायी जा रही रीति-नीति पर अक्सर सवालिया निशान लगाते दिख रहे हैं। लेकिन साहेब की खामोशी यथावत कायम है। यहां तक कि सहोदर भगवा संगठनों द्वारा संगठन के मूल सैद्धांतिक व वैचारिक मसलों को लेकर पूछे जानेवाले सवालों पर भी साहेब की चुप्पी अनवरत जारी है। पूर्ववर्ती सरकार के कार्यकाल में महंगाई के मसले को लेकर संसद लेकर सड़क तक पर भीषण संघर्ष करनेवाले मौजूदा सत्ताधारियों की जुबान पर इन दिनों खाद्यान्न, दलहन-तिलहन, किराया-भाड़ा व फल-सब्जी से लेकर दवा-दारू तक में दिख रही कमरतोड़ महंगाई को लेकर पूरी तरह ताला पड़ा हुआ है। विदेशों में जमा कालेधन के मसले को तो पहले ही चुनावी जुमला बताकर उससे किनारा किया जा चुका है। अब तो भ्रष्टाचार के मामले भी साहेब की नजर में नहीं आ रहे हैं। प्रवर्तन निदेशालय द्वारा भगोड़ा घोषित ललित मोदी द्वारा सुषमा स्वराज, वसुंधरा राजे, दुष्यंत सिंह, वरूण गांधी व सुधांशु मित्तल सरीखे नेताओं के बारे में किये गये सनसनीखेज खुलासे का मामला हो या मध्यप्रदेश के लाखों युवाओं की जिन्दगी के साथ खिलवाड़ करते हुए अंजाम दिये गये व्यापम घोटाले का मसला। राजस्थान में सरकारी संपत्ति के गबन का मामला हो या छत्तीसगढ़ में चावल व महाराष्ट्र में चिक्की खरीद की अनियमितता। साहेब को कुछ दिखाई नहीं दे रहा। इनके केबिनेट की सहयोगी द्वारा की गयी शैक्षणिक योग्यता की गलतबयानी का मसला अदालत में विचाराधीन है लेकिन इनकी सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा। चुनाव से पहले धारा 370 की उपयोगिता पर राष्ट्रीय बहस छेड़ने की अपील करनेवाले साहेब अब इस मामले में भी चुप हैं। भाजपा को फर्श से अर्श पर पहुंचा देनेवाले राम मंदिर के मामले से तो ये इस कदर अनभिज्ञ दिख रहे हैं कि प्रधानमंत्री बनने के बाद आज तक रामलला का दर्शन करने भी अयोध्या नहीं गये। चीन की सेना पनडुब्बी में बैठकर हिन्द महासागर में सैर-सपाटा करते हुए कराची से कोलंबो तक पहुंच जाती है लेकिन सुरक्षा में लग रही इस सेंध पर भी खामोशी ही जारी है। समग्रता में कहा जाये तो साहेब की सरकार से रामराज की जो उम्मीद थी वह अभी से टूटती-बिखरती दिख रही है। उस पर तुर्रा ये कि अरूण जेटली से लेकर सदानंद गौड़ा सरीखे अधिकांश केबिनेट मंत्री प्रधानमंत्री से पूछे जा रहे इस तरह के तमाम ज्वलंत सवालों को ही बचकाना, वेवकूफाना, तुच्छ व निराधार बताते हुए उनकी खामोशी को जायज ठहराने से परहेज नहीं बरत रहे। खैर, साहब को पूरा अख्तियार है कि वे अगले 46 महीनों तक मन की बात करें या दिल की बात करें। कुछ बोलें, ना बोलें या फिर जो, जब व जितना जी चाहे उतना ही बोलें। जब ताकत पूर्ण बहुमत की है तो पूरे कार्यकाल में उनकी ही मनमानी चलनी है। लेकिन इस क्रम में गुजारिश ही की जा सकती है कि ज्वलंत मसलों पर आवश्यक, समुचित व त्वरित कार्रवाई करने के बजाय मौन धारण करने या गलतबयानी करने का जो नतीजा मनमोहन सरकार को भुगतना पड़ा उसे ये भी अवश्य याद रखें। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’   

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