शनिवार, 11 जुलाई 2015

‘डाल-पात को छोड़ सीधा जड़ पर संधान’
बेशक मुनव्वर राणा साहब फरमाते हों कि ‘दिखाते हैं पड़ोसी मुल्क आंखें तो दिखाने दो, कहीं बच्चों के बोसे से भी मां का गाल कटता है।’ लेकिन हकीकत यही है कि हमारा पड़ोसी मुल्क जिस तरह से हमें आंखें दिखाने की जुर्रत करता आ रहा है उसकी तुलना मां के गाल पर बच्चे के बोसे से तो कतई नहीं की जा सकती। वह सीधे तौर पर हमारे खिलाफ परमाणु हथियारों के इस्तेमाल की धमकी दे, हमारी समुद्री सीमा में घुसकर मछुआरों को बंदी बनाए, चीन के साथ मिलकर हमारे इर्द-गिर्द सामरिक चुनौतियों का फंदा बुने, सरहद पर बेवजह अशांति व युद्ध सरीखे हालात उत्पन्न करे, हमारी अंदरूनी सुरक्षा व्यवस्था की धज्जियां उड़ाने के लिये आतंकियों की घुसपैठ कराए, नकली नोटों की खेप भेजकर हमारी अर्थव्यवस्था को अस्थिर करने का प्रयास करे, भारत विरोधी तत्वों व वांछित अपराधियों को शरण, संरक्षण व शह दे, विश्वमंच पर हमें हर तरह से बदनाम करने का कुचक्र रचे और अफगानिस्तान सरीखे देशों में स्थित हमारे दूतावास पर आतंकी हमले कराए तो उसकी इन हरकतों को कब तक बर्दाश्त किया जा सकता है? वैसे भी नई दिल्ली की सत्ता पर नये निजाम का वर्चस्व स्थापित होने के बाद से नीतियों, परिस्थितियों व जमीनी हालातों में आए व्यापक बदलाव के मद्देनजर पाकिस्तान भी बेहतर समझ गया है कि भारत को लेकर दशकों से चली आ रही उसकी कपटपूर्ण विदेशनीति अब ज्यादा दिनों तक उसे फायदा नहीं पहुंचा सकती। सच तो यह है कि पाकिस्तान अपने ही बिछाए जाल में इस कदर फंसता चला गया है कि अब भारत के साथ सुलह-समझौता करके शांति व सहयोग की राह तैयार करने के अलावा उसके पास कोई दूसरा विकल्प ही नहीं बचा है। पहले तो आतंकवाद से लड़ाई की दुहाई देकर और चीन की गोद में बैठने का विकल्प खुला रखकर वह अमेरिका से मोटा अनुदान हासिल कर लेता था लेकिन ओसामा बिन लादेन के एबटाबाद में पाए जाने और आतंकियों के साथ पाकिस्तानी सेना व आईएसआई के सांठगांठ की पूरी हकीकत सार्वजनिक हो जाने के बाद अब वह अमेरिका का विश्वास लगातार खोता जा रहा है। दूसरी ओर रूस के साथ शीतयुद्ध समाप्त होने और भारत के साथ दोस्ती व विश्वास का रिश्ता मजबूत करने के बाद अब अमेरिका की नजर में पाकिस्तान की अहमियत वैसे भी काफी कम हो गयी है। रही-सही कसर पाकिस्तानी हुक्मरानों के चीन के सामने दंडवत हो जाने के घटनाक्रम ने पूरी कर दी है। ऐसे में इस साल पाकिस्तान को दिये जानेवाले अनुदान में पचास फीसदी की कटौती कर चुके अमेरिका ने अगर जल्दी ही पाकिस्तान से पूरी तरह पल्ला झाड़ने की पहल कर दी तो इस पर शायद ही किसी को कोई आश्चर्य होगा। इसी संभावना को देखते हुए इन दिनों पाकिस्तान ने भी चीन के साथ अपनी घनिष्ठता को नया आयाम देना आरंभ कर दिया है। लेकिन पाकिस्तान को भी बेहतर पता है कि भले ही भारत पर दबाव बनाने के लिये चीन भी उसे अपना छोटा भाई बता रहा हो मगर अंदरूनी तौर पर चीन की उसके प्रति कोई हमदर्दी नहीं है। दूसरी ओर भारत का खौफ दिखाकर पाकिस्तान को डराने व उसकी जमीन का भरपूर सामरिक व व्यावसायिक इस्तेमाल करने की चीन की नीतियों ने पाकिस्तान को ऐसे मोड़ पर ला दिया है कि भारत को चिढ़ाने, खिझाने व परेशान करने के लिये बिछाये जा रहे जाल में वह दूरगामी तौर पर खुद ही बुरी तरह फंसता हुआ महसूस कर रहा है। हालांकि इसके बावजूद भी पाकिस्तान की हेकड़ी में अभी तक कोई कमी नहीं आई थी। तभी तो रूस में नमो-नवाज मुलाकात की पूर्व संध्या पर भी सरहद पर युद्धविराम का उल्लंघन करने से उसने परहेज नहीं बरता। लेकिन सकारात्मक तथ्य यह है कि जब मिल-बैठकर बात हुई तो अब उसने भी डाल-पात पर उछल-कूद मचाना छोड़कर जड़ से जुड़े मसलों का समाधान करके विश्वास बहाली की दिशा में कदम उठाना ही बेहतर समझा है। तभी तो दिखावे के लिये आधिकारिक स्तर की बेमानी वार्ता करते रहने के बजाय अब सीधे शीर्ष स्तर की निर्णायक बातचीत करने पर उसने सहमति दे दी है। कूटनीतिक व सियासी मसलों को दोनों देशों के प्रधानमंत्री की आंख-कान माने जानेवाले सुरक्षा सलाहकार सुलझाएंगे जबकि सरहद की सामरिक समस्याएं बीएसएफ व पाकिस्तान रेंजर्स के शीर्ष अधिकारी मिल-बैठकर सुलझाया करेंगे। रहा सवाल रिश्तों की तल्खी का खामियाजा भुगत रहे दोनों देशों के मछुआरों व पर्यटकों का तो उनके हित में भी निर्णायक सहमति बन ही गयी है। साथ ही पाकिस्तान ने आतंकवाद की भारतीय परिभाषा को स्वीकार करते हुए उसे नेस्तनाबूत करने व मुम्बई हमले के दोषियों को सजा दिलाने में सहयोग करने पर भी हामी भर दी है। यानि समग्रता में देखें तो रिश्तों पर जमी बर्फ पिघली अवश्य है वर्ना वैश्विक दबाव के कारण महज दिखावे के मकसद से आधे घंटे के लिये आयोजित की गयी नमो-नवाज की मुलाकात 55 मिनट नहीं खिंचती और बाद में सचिव स्तर की आधे घंटे की वार्ता करके ठोस संयुक्त बयान जारी नहीं किया जाता। यानि आज के घटनाक्रम को सही दिशा में बढ़ाया गया पहला कदम अवश्य कहा जा सकता है लेकिन आवश्यक है कि आज से आरंभ हुए दोस्ताना सफर की रफ्तार को लगातार बढ़ाने का प्रयास किया जाये वर्ना ‘एक कदम आगे दो कदम पीछे’ की परंपरा जारी रखने का परिणाम अब पाकिस्तान के लिये उम्मीद से भी अधिक नकारात्मक साबित होने की संभावना को कतई खारिज नहीं किया जा सकता है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’      

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