बुधवार, 22 जुलाई 2015

‘ज्यादा हों जो उम्मीदें तो बच्चे टूट जाते हैं’

‘जरा सी चोट को महसूस करके टूट जाते हैं, सलामत आईने रहते हैं चेहरे टूट जाते हैं, गुजारिश अब बुजुर्गों से यही करना मुनासिब है, ज्यादा हों जो उम्मीदें तो बच्चे टूट जाते हैं।’ कायदे से देखा जाये तो भारतीय प्रशासनिक सेवा में उत्तर प्रदेश संवर्ग में कार्यरत पवन कुमार द्वारा लिखी गयी यह गजल मौजूदा सियासी माहौल के मद्देनजर केन्द्र में सत्तारूढ़ भाजपा के उन शीर्ष बुजुर्ग नेताओं को ही संबोधित दिखाई देती है जो अपनी पूरी उम्र सक्रिय सियासत में गुजार देने के बाद अब चैथेपन की अवस्था में भी ना तो सत्ता का मोह त्याग पा रहे हैं और ना ही नयी पीढ़ी को अपने मनमुताबिक काम करने की स्वतंत्रता देना गवारा कर रहे हैं। हालांकि बुजुर्गों से अपेक्षा यही रहती है कि वे अपनी विरासत के उत्तराधिकारियों पर ना सिर्फ अपने अनुभवों की बौछार करें बल्कि जीवन पथ पर बच्चों का भरपूर उत्साहवर्धन भी करें ताकि वह पूरे उत्साह के साथ अपनी ऊर्जा, दक्षता व कार्यकुशलता का भरपूर इस्तेमाल करते हुए परिवार व खानदान का नाम रौशन कर सके। लेकिन आम तौर पर सियासत में यही देखा जाता है कि कोई भी बुजुर्ग तब तक नयी पीढ़ी को पूरी तरह अपनी विरासत सौंपना गवारा नहीं करता है जब तक या तो वह पूरी तरह अक्षम नहीं हो जाता या फिर उसका जनाजा नहीं उठ जाता। ऐसे में अगर नयी पीढ़ी आगे बढ़कर नेतृत्व की बागडोर अपने हाथों में लेने व बुजुर्गों को किनारे लगाने की पहल ना करे तो और क्या करे? हालांकि यह और बात है कि जिन बुजुर्गों को किनारे लगाया जाता है वे अक्सर इस बदलाव को हजम नहीं कर पाते हैं और नतीजे में आगे आ रही नयी पीढ़ी के खिलाफ अनर्गल विषवमन करना शुरू कर देते हैं। बेशक यह उनके आंतरिक आक्रोश की अभिव्यक्ति ही होती है जिसका नयी पीढ़ी की दक्षता, क्षमता व कार्यकुशलता से कोई लेना देना नहीं होता लेकिन उनकी इन हरकतों के कारण ना सिर्फ विरोधियों को बैठे-बिठाये आलोचना व निन्दा करने का भरपूर मसाला मिल जाता है बल्कि नेतृत्व की बागडोर संभालनेवाली युवा पीढ़ी के भी उत्साह, आत्मविश्वास व आत्मसम्मान को गहरा धक्का लगता है। वैसे भी सामाजिक तौर पर बुजुर्गों का दोष देखने की परंपरा तो हमारे देश में कभी रही ही नहीं है। वे भले जैसा भी बर्ताव करें लेकिन युवाओं से यही अपेक्षा की जाती है वह उनको तहेदिल से आदरणीय, पूजनीय व अनुकरणीय ही माने। लेकिन सवाल है कि जब पूरा सम्मान व समुचित स्थान देने के के बाद भी बुजुर्गों की ओर से युवाओं की राहों में कांटे ही बिछाये जायें, उसे बेवजह जलील ही किया जाये, सार्वजनिक तौर पर उसको आलोचना ही झेलनी पड़े तो आखिर वह करे भी तो क्या करे? जदयू ने जब अपने वरिष्ठ नेता जार्ज फर्नांडीज को लोकसभा की राजनीति छोड़कर राज्यसभा में मार्गदर्शक की भूमिका निभाने के लिये सहमत करना चाहा तो वे हत्थे से उखड़ गये। पार्टी से बगावत करके स्वतंत्र उम्मीदवार के तौर पर मुजप्फरपुर से चुनाव लड़ने चले गये। बाद में चुनावी हार भी हुई और जदयू में दुबारा समुचित स्थान भी नहीं मिल सका। इसी प्रकार भाजपा में भी वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में हुई करारी हार के बाद आरएसएस की पहलकदमी पर आमसहमति से यह तय हुआ कि 75 वर्ष की उम्र पार कर चुके बुजुर्गों को ना तो कोई पद दिया जाएगा और ना ही सक्रिय राजनीति में उन्हें हिस्सेदारी दी जाएगी। इसी फैसले के तहत लालकृष्ण आडवाणी, डाॅ मुरली मनोहर जोशी, वीके मल्होत्रा, यशवंत सिन्हा, कैलाश जोशी व जसवंत सिंह से लेकर शांता कुमार सरीखे दर्जनों शीर्ष वरिष्ठ नेताओं को सम्मान सहित सक्रिय राजनीति से अलग करने की प्रक्रिया आरंभ हुई। लेकिन इन बुजुर्गों ने अभी तक अपनी मौजूदा वरिष्ठता को स्वीकार करते हुए संगठन के लिये शुभचिंतक व मार्गदर्शक की भूमिका को सहर्ष स्वीकार करना गवारा नहीं किया है। इसे उनके दिल की भड़ास कहें, उनका राजनीतिक प्रपंच कहें या उनके अंदरूनी आक्रोश की अभिव्यक्ति। अक्सर वे संगठन व सरकार के शीर्ष संचालकों की सिरदर्दी में इजाफा करते ही दिखाई पड़ रहे हैं। कभी आडवाणी सार्वजनिक तौर पर पार्टी के मौजूदा निजाम को तानाशाही सोचवाला करार देते हुए देश में दुबारा आपातकाल लागू होने की संभावना पर बल देते दिखाई पड़ते हैं तो कभी केन्द्र सरकार के कामकाज पर प्रत्यक्ष व परोक्ष तौर पर डाॅ जोशी की उंगली उठ जाती है। कभी यशवंत सिन्हा ऐसा बयान दे देते हैं जिसके कारण पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को फजीहत झेलनी पड़ती है तो कभी शांता कुमार का लेटर बम फूट पड़ता है। वाकई अगर इन बुजुर्गों को ऐसा लगता है कि उनके द्वारा स्थापित व पालित-पोषित संगठन को नया नेतृत्ववर्ग किसी गलत दिशा में ले जा रहा है तो उन्हें पूरा हक है कि वे पार्टी के किसी भी नेता को अपने पास बुलाकर एकांत में उसे उचित सलाह व मार्गदर्शन दें। लेकिन सार्वजनिक तौर पर बयानबाजी करने व संगठन व सरकार की किरकिरी कराने के प्रयासों को बुजुर्गों की इमानदार सोच, भलमनसाहत व उदार विचारों की अभिव्यक्ति का नाम कैसे दिया जा सकता है। खैर, मान्यता तो यही है कि बुजुर्गों की गालियों से भी युवाओं के आयु, विद्या, यश व बल में वृद्धि ही होती है लेकिन विचारणीय तथ्य यह है कि सफल, सक्षम व समर्थ उत्तराधिकारियों को बेवजह नाराज करके उनसे अपना हित पूरा कराने का कोई प्रयास कैसे सफल हो सकता है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’

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