सोमवार, 6 जुलाई 2015

‘पड़ोसी को होती है हमारे प्यार से पीड़ा’


इमरान प्रतापगढ़ी ने देश की गंगा-जमुनी तहजीब को बखुबी बयान करते हुए लिखा है कि ‘प्यार की बड़ी इससे और मिसाल क्या होगी, हम नमाज भी पढ़ते हैं गंगा में वजू करके।’ वाकई विभिन्न जाति, धर्म, पंथ व फिरके के बीच ऐसा भाईचारा देखकर किसी को भी जलन होना स्वाभाविक है। ऐसे में अगर हमारी खुशहाली से उसकी छाती पर सांप लोट रहा है जो हमसे जुदा होने के बाद से ही लगातार बदहाली व तंगहाली से गुजर रहा है तो इसमें आश्चर्य की क्या बात है। आश्चर्य तो यह है कि अपनी औकात की हद व जद में रहने के बजाय वह दिनों-दिन उकसावे व बदतमीजियों की तमाम सरहदें लांघने पर उतारू होता जा रहा है। कहने को तो उसके साथ हमारा मसला कश्मीर को लेकर ही फंसा हुआ है लेकिन मसले को सुलझाने का प्रयास करने के बजाय उसकी कोशिश लगातार इसे उलझाये रखने की ही प्रतीत होती है। तभी तो अपने राष्ट्रीय दिवस के मौके पर नई दिल्ली स्थित अपने दूतावास में आयोजित समारोह में शिरकत करने के लिये समूचे हिन्दुस्तान में उसे सबसे बेहतरीन हस्तियां वे ही नजर आयीं जिनकी राष्ट्रभक्ति हमेशा से संदिग्ध रही है। जिनका घोषित एजेंडा इस देश को तोड़ने का है। हालांकि इन अलगाववादियों को अपना रहनुमां या शुभचिंतक मानने की गलती हमारे मुल्क में कतई कोई नहीं कर सकता। लेकिन हमारा पड़ोसी अपनी नापाक साजिशों के तहत ऐसे टुच्चे-मुच्चों को सिर पर बिठाये घूम रहा है जिनमें पंचायत का चुनाव लड़ने की भी हिम्मत नहीं है। ऐसा करने के पीछे उसका मकसद भी स्पष्ट है कि वह इनको खबरों की सुर्खियां दिलाकर ना सिर्फ देश मेें मौजूद भाईचारे के माहौल को बिगाड़ना चाहता है बल्कि कश्मीर के मसले को भी लगातार उलझाए रखना चाहता है। अगर हमारे पड़ोसी की नीयत साफ होती तो वह भी चीन की तर्ज पर सीमा विवाद को यथावत छोड़कर बाकी मसलों पर हमारे साथ एकजुट होने का प्रयास करता ताकि यहां बह रही तरक्की व खुशहाली की बयार का वह भी लुत्फ ले पाता। वह तकनीक, शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा, व्यापार, पर्यटन, खेल व संस्कृति सरीखे मामलों में हमारा फायदा लेता और आपसी भरोसे व दोस्ती के माहौल को उस मुकाम तक ले जाता जहां सरहद के विवाद को अमन व शांति के माहौल में आपसी बातचीत व समझदारी से सुलझाना बेहद आसान हो सकता था। लेकिन दुर्भाग्य की बात यही है कि उसे ना तो अपना हित साधने की चिंता है और ना ही वह हमें अमन व शांति के साथ रहने देना चाहता है। तभी तो उसने लगातार एक ही रट लगाई हुई है कि पहले कश्मीर के मामले को सुलझाओ ताकि बाकी मसलों पर आगे बढ़ने की राह तैयार हो सके। जाहिर है कि अगर उसकी यह जिद है कि कश्मीर का मसला सुलझाए बिना वह कतई हमें चैन से नहीं बैठने देगा तो हमारी सोच भी बड़ी स्पष्ट है कि हम कश्मीर को विवादित मसला मानते ही नहीं हैं। कश्मीर तो हमारा ही था, हमारा ही है और हमारा ही रहेगा। केन्द्र या कश्मीर में सरकार किसी की भी दल या गठजोड़ की हो, वह कतई इस सूबे को देश से अलग करने के प्रस्ताव पर विचार करना भी गवारा नहीं कर सकती है। खैर, मजे की बात यह है कि जिस तरह उसकी खुराफाती मंशा व नापाक चाहतों से हम वाकिफ हैं, उसी प्रकार कश्मीर के मामले में हमारी नीति व नीयत से वह भी कतई अंजान नहीं है। फिर भी बकौल अटल बिहारी वाजपेयी, हम दोस्त तो चुन सकते हैं, पड़ोसी नहीं। साथ ही समूचे हिन्दुस्तान की यही परंपरा है कि अगर पड़ोसी के घर में फांका हो तो किसी को भी अपनी चुपड़ी हजम नहीं होती। तभी तो हमारी ओर से हमेशा यही प्रयास होता रहा है कि हम इस पूरे विवाद को यथावत व यथास्थिति में छोड़कर बाकी मामलों में दोस्ती को मजबूत करने की पहल करें जबकि वह अपनी जिद को पूरा करने के लिये कभी सरहद पर अशांति का माहौल बनाता है तो कभी भाड़े के विदेशी आत्मघाती आतंकियों को यहां भेजकर अमन-चैन का माहौल बिगाड़ने का प्रयास करता है। अलगाववादियों को सिर-आंखों पर बिठाने का भी मकसद तो यही है कि कश्मीर के सीधे-सादे लोगों को बरगलाकर उन्हें अपने ही मुल्क के खिलाफ बगावत करने के लिये उकसाया जाये। जिस कश्मीर के प्रति वह झूठी हमदर्दी का दिखावा करता है वहां के बाशिंदों का वह जरा भी भला चाहता तो सरहदी गांवों को निशाना बनाकर गोलीबारी करने या बम-बारूद से लैस आतंकियों को यहां भेजने के बजाय कश्मीर की तरक्की में सहभागिता का प्रस्ताव हमारे पास भेजता। कुछ नहीं तो हुर्रियत सरीखे अलगाववादियों को कश्मीर का पक्षकार बनाने की जिद ठानने के बजाय वह आमने-सामने की बातचीत से पूरे विवाद को सुलझाने का प्रयास करता। लेकिन उसे बेहतर पता है कि आमने-सामने की बातचीत में कश्मीर पर अपना दावा ठोंकने का उसके पास कोई आधार ही नहीं है, क्योंकि दोनों मुल्कों की आजादी व बंटवारे के बाद कश्मीर के राजा हरि सिंह ने अपने सूबे का भारत में विलय कराने के प्रस्ताव पर स्वेच्छा से दस्तखत किया हुआ है। खैर, तुलसीदास की मानें तो ‘अतिशय रगड़ करे जो कोई, अनल प्रगट चंदन ते होई। यानि शीतलता का सर्वोच्च प्रतीक चंदन भी जब एक सीमा के बाद उकसावे के रगड़ की अनदेखी नहीं कर पाता तो किसी और से ऐसी उम्मीद रखना तो व्यर्थ ही है।

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