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सोमवार, 30 मई 2016

मांग-आपूर्ति के चक्कर में बाजार व्यवस्था घनचक्कर

अर्थशास्त्र के चक्कर पर भारी बिचौलियों का फच्चर 


अर्थशास्त्र का सिद्धांत बताता है कि अगर आपूर्ति यथावत रहे तो मांग बढ़ने से कीमतें बढ़ती हैं जबकि मांग घटने से कीमत घट जाती है। इसी प्रकार मांग यथावत रहने की स्थिति में आपूर्ति बढ़ने से कीमतें घटने लगती हैं जबकि आपूर्ति में कमी होने पर कीमतें बढ़ने लगती हैं। यानि बाजार में कीमत का निर्धारण मांग और आपूर्ति के बीच संतुलन के आधार पर ही होता है। हालांकि इस सिद्धांत के कुछ अपवादों को भी अर्थशास्त्र में स्वीकार किया जाता है। लेकिन मसला है कि इन दिनों बाजार का पूरा अर्थशास्त्र ही बदला हुआ है। अब तो बाजार में कीमतों का निर्धारण अर्थशास्त्र के सिद्धांतों के आधार पर नहीं बल्कि बिचौलियों की मनमर्जी पर आधारित दिख रहा है। अगर ऐसा नहीं होता तो एक ओर समूचे देश के खुदरा बाजार में प्याज की कीमत पिछले कई महीनों से औसतन बीस रूपये प्रतिकिलो की दर पर टिके रहने के बावजूद महाराष्ट्र के किसान को ढ़ुलाई व मंडी का शुल्क अदा करने के बाद 952 किलो प्याज बेचने के एवज में सिर्फ एक रूपये के सिक्के की बचत नहीं होती जिस पर इन दिनों ठेंगे का निशान छपा रहता है। जाहिर है कि यह अर्थशास्त्र किसी के भी दिमाग की दही जमा सकता है। अब जिस किसान को फसल की लागत मिलने की बात तो दूर रही सिर्फ खेत से मंडी तक अपनी उपज को पहुंचाने व मंडी की पर्ची कटवाने के बाद लगभग एक टन फसल के बदले सिर्फ एक रूपये का मुनाफा मिल रहा हो उसके दिमाग में अगर आत्महत्या कर लेने की बात दस्तक देने लगे तो इसे कैसे अस्वाभाविक कहा जा सकता है। ऐसा नहीं है कि यह नौबत महाराष्ट्र के प्याज उत्पादकों को ही झेलनी पड़ रही है बल्कि यही हाल समूचे देश के किसानों का है जो मंडी में बिचौलियों के हाथों औने-पौने दामों पर अपनी फसल बेचने के लिये मजबूर हैं। किसान आलू पैदा करे या टमाटर, गन्ना उगाए या फल-फूल उपजाये। सबकी व्यथा एक जैसी ही है। इसमें किसी वस्तु का दाम अधिक तेजी से बढ़ जाने पर सरकार अगर हरकत में भी आती है तो जमाखोरों पर छापेमारी के अलावा आयात में इजाफा करने के परंपरागत तौर-तरीकों पर अमल शुरू कर देती है। लेकिन कभी यह कोशिश नहीं होती कि किसानों को उनकी फसल का उचित मूल्य मिले और उपभोक्ताओं को सही कीमत पर बाजार में सामान उपलब्ध हो सके। पिछले साल संसद की कैंटीन में अचानक पहुंचकर भोजन करने के बाद जब प्रधानमंत्री ने खाने के बिल की पर्ची पर आह्लादित भाव से ‘अन्नदाता सुखी भव’ लिखकर अपना उद्गार व्यक्त किया तो ऐसा लगा कि अब अन्नदाता के दिन बहुरने वाले हैं। लेकिन साल पूरा होने के बाद जब आंकड़े सामने आये तो पता चला कि आजादी के बाद वर्ष 2015 में पहली दफा रोजाना औसतन 52 किसानों ने आत्महत्या की। यानि ‘अन्नदाता सुखी भव’ की बात मौजूदा सरकार के कार्यकाल में भी कहने-सुनने की ही बात बनकर रह गयी है। क्योंकि इस सरकार ने जिस साल सत्ता संभाली तब औसतन 42 किसानों को आत्महत्या की राह पकड़नी पड़ी थी जबकि पिछले साल यह आंकड़ा रोजाना 52 आत्महत्याओं तक पहुंच गया। आलम यह है कि किसान को मंडी में महज डेढ़ से दो रूपये प्रति किलो की दर से आलू, प्याज व टमाटर खरीदनेवाले भी बड़ी मुश्किल से मिल रहे हैं जबकि उपभोक्ताओं को इसकी कीमत औसतन बीस रूपये की दर से चुकानी पड़ रही है। ऐसे में सवाल है कि आखिर बीच का 18 रूपया कहां जा रहा है। जाहिर तौर पर यह उन बिचौलियों की तिजोरी में जमा हो रहा है जो प्याज को खेत से किचेन तक का सफर तय कराते हैं। ऐसे में किसान का यथावत बदहाल रहना स्वाभाविक ही है। लिहाजा आवश्यकता है कि बाजार में कीमतों के निर्धारण व नियंत्रण पर भी सरकार व प्रशासन की नजर हो। सिर्फ मांग व आपूर्ति के बीच संतुलन के भरोसे बाजार को छोड़े रखने से ना तो अन्नदाता किसानों को न्याय मिल सकता है और ना ही उपभोक्ताओं को। लेकिन मसला है कि अब तक तीन लाख से अधिक किसानों द्वारा आत्महत्या कर लिये जाने के बावजूद अगर सरकार की योजनाएं क्रॉप-ड्रॉप के बीच संतुलन बनाने और यूरिया पर नीम चढ़ाने तक ही सीमित रहेंगी तो अन्नदाता कैसे सुखी हो पाएगा। चुनावी दिनों में सपना दिखाया गया था कि वैल्यू एडीशन के द्वारा खेती को लाभप्रद बनाया जाएगा लेकिन इस दिशा में कोई बड़ी पहल होती दिख तो नहीं रही है। साथ ही ना तो भंडारण व्यवस्था का विस्तार व सुदृढ़ीकरण होता दिख रहा है और ना ही फसल के न्यूनतम मूल्य निर्धारण व्यवस्था में कोई सुधार हो पाया है। सिर्फ फसल बीमा योजना लाने, आपदा राहत का विस्तार करने, ई-मंडी का सपना दिखाने और मृदा स्वास्थ्य कार्ड तैयार करने से तो अन्नदाता का भला होने से रहा। उसका भला तो तब होगा जब उसे उपज की पूरी लागत के अलावा कुछ मुनाफा भी मिले। यानि बाजार की असली बीमारी का इलाज किये बिना इस अव्यस्था से निजात पाने की कल्पना भी बेकार ही है। लिहाजा आवश्यकता है कि अन्नदाता किसानों और उपभोक्ता के बीच कीमतों का अनुपात निर्धारित किया जाये और बिचौलियों व बाजार की अन्य ताकतों को लागत के मुकाबले एक निश्चित अनुपात में ही मुनाफा कमाने की छूट रहे। वर्ना मांग व आपूर्ति के चक्कर में पड़कर पूरी बाजार व्यवस्था यथावत घनचक्कर बनी रहेगी। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर # Navkant Thakur

शुक्रवार, 13 मई 2016

पानी गये ना ऊबरे, मोती मानुष चून

‘रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून’


‘रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून, पानी गये ना ऊबरे, मोती मानुष चून।’ रहीम का यह दोहा सबने पढ़ा भी है और गुना भी है। लेकिन शायद हमारे राजनीतिज्ञों ने इसे सिर्फ पढ़ा है, इसका अर्थ व महत्व समझा नहीं है। अगर समझा होता तो आज राजनीति में पानी बचा होता, इस कदर सूख नहीं जाता। अब तो ऐसा लगता है मानो सबकी आंख का पानी मर चुका है, सूख चुका है। वर्ना कम से कम ऐसी तस्वीर तो कतई नहीं दिखती कि जब देश की एक तिहाई आबादी भयावह सूखे का सामना कर रही हो, बूंद-बूंद पानी के लिये हाहाकार मचा हो तब हमारे माननीय नेतागण एकजुट होकर लोगों को इस भीषण संकट से उबारने का प्रयास करने के बजाय मौजूदा परिस्थियों का भी सियासी दोहन करने में जुटे हुए हों। आपस में श्रेय लूटने की लड़ाई लड़ रहे हों। हालांकि सियासत की इस मौजूदा तस्वीर का एक अलग पहलू यह भी है कि जब हर चीज पर सियासत हो सकती है, हर बात पर ही नहीं बल्कि बेबात भी राजनीति हो सकती है, तो फिर पानी ही इससे अछूती क्यों रहे। वैसे भी स्वतंत्र भारत के इतिहास के सबसे भयावह सूखे के मौजूदा दौर में तो मौका भी है, मौसम भी है और दस्तूर भी। फिर पानी पर सियासत तो होनी ही है और हो भी रही है। हो भी क्यों ना। आखिर जानलेवा सूखे की मार झेल रही देश की एक-तिहाई आबादी का मसला जो ठहरा। इतने बड़े वोट बैंक को कौन नहीं रिझाना चाहेगा। भले इसके लिये ठोस राहत योजना या दूरगामी परियोजना का पूरी तरह अभाव ही क्यों ना हो। दिखाना तो सभी यही चाहेंगे कि सूखा प्रभावितों की मदद में वे जी-जान से व प्राण-पण से जुटे हुए हैं। तभी तो केन्द्र सरकार और राज्यों के बीच इस मसले पर श्रेय बटोरने को लेकर भारी खींचतान का माहौल दिख रहा है। लेकिन इसका सबसे दुखद पहलू यह है कि सूखा प्रभावितों को मिल-जुलकर राहत पहुंचाने के अभियान में जुटने के बजाय केन्द्र और राज्य एक दूसरे की टांग खींचने व एक दूसरे को नीचा दिखाने में लगे हुए हैं। खास तौर से अगर उत्तर प्रदेश के साथ इस मसले पर जारी केन्द्र के शीतयुद्ध की बात करें तो दोनों ही यह साबित करने में जुटे हुए हैं कि उनका काम तो काम है, दूसरे का दिखावा। तभी पहले तो यूपी सरकार को सूखा राहत के मोर्चे पर विफल दिखाने में ना तो सत्ता पक्ष से प्रभावित मीडिया के एक खास वर्ग ने कोई कसर छोड़ी और ना ही केन्द्र ने कभी यह स्वीकार किया कि सूबे में सूखा राहत की दिशा में कोई सराहनीय काम हो रहा है। जबकि हकीकत यह है कि सूबे की सरकार अपने सीमित संसाधनों के सहारे ही ना सिर्फ सूखा प्रभावित इलाकों में लोगों को राहत पहुंचाने के काम में पूरी ताकत से जुटी हुई है बल्कि लोगों को भोजन-पानी से लेकर पशुओं के लिये चारा उपलब्ध कराने का भी हरमुमकिन प्रयास किया जा रहा है। सूखे के कारण रोजी-रोटी की भारी किल्लत का सामना कर रहे परिवारों के बीच राहत पैकेट के रूप में शुरूआती तीस दिनों के लिये आटा, आलू, दाल, तेल व देशी घी से लेकर मिल्क पाउडर भी वितरित किया जा रहा है। इसके अलावा अन्त्योदय लाभार्थी परिवारों को अगले 30 दिनों के लिए भी राहत पैकेट मुहैया कराने का निर्णय प्रदेश सरकार पहले ही कर चुकी है। साथ ही पिछले साल हुई ओलावृष्टि के बाद इस समय भयानक सूखे का सामना कर रहे किसानों को राहत देने के लिए प्रभावित 73 जिलों के 107 लाख किसानों के बीच 4493 करोड़ रुपया बांटा जा चुका है जबकि पिछले साल भी सूखे की मार झेलनेवाले 21 जनपदों के प्रभावितों के बीच 1006.03 करोड़ रुपये की धनराशि बांटने का काम युद्धस्तर पर जारी है। यहां तक कि अपनी क्षमता के मुताबिक प्रदेश सरकार वाटर एटीएम भी लगवा रही है और टैंकरों से पानी की आपूर्ति भी कर रही है। इसके बावजूद प्रदेश सरकार की तारीफ करना किसी को गवारा नहीं है। अलबत्ता सूबे की समस्याओं को लेकर हलकान दिख रही है वह भाजपा जिसके नेतृत्व में चल रही केन्द्र की सरकार ने अब तक पिछले साल के सूखे के मद का 1123.47 करोड़ व ओलावृष्टि के मद का 4741.55 करोड़ रूपया प्रदेश सरकार को आवंटित ही नहीं किया है। यानि मदद के नाम पर केन्द्र से प्रदेश को मिला है तो सिर्फ आश्वासन और लफ्फाजी। उस पर तुर्रा यह कि बुंदेलखंड में पानी पहुंचाने के लिये केन्द्र ने ट्रेन भेज दिया। वह भी खाली टैंकर के साथ। जाहिर है कि प्रदेश सरकार इस दिखावे की मदद को बैरंग वापस नहीं लौटाती तो और क्या करती। कायदे से अगर केन्द्र को कुछ करना ही है तो वह इस साल के सूखा राहत का पैसा हाथोंहाथ नहीं दे सकती तो कम से कम पिछले साल के बकाये का ही पूरा भुगतान कर दे। साथ ही जब प्रदेश सरकार दावा कर रही है कि बुंदेलखंड के जलाशयों में पर्याप्त पानी उपलब्ध है तो उसके वितरण के लिये टैंकरों का समुचित इंतजाम कर दे। प्रदेश तो अपनी क्षमता के मुताबिक जुटा ही हुआ है लेकिन कुछ जिम्मेवारी तो केन्द्र की भी है। जिसे पूरी इमानदारी से निभाने में अगर कोताही बरती गयी तो अगले साल होनेवाले सूबे के विधानसभा चुनाव में भाजपा को इसका भारी खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर # Navkant Thakur

गुरुवार, 21 अप्रैल 2016

‘सियासत के शीर्ष पर संवेदना का सूखा’

‘सियासत के शीर्ष पर संवेदना का सूखा’


सूखे को लेकर इन दिनों जिस तरह से सियासी पारा उफान पर चल रहा है उसमें संवेदना की नदारदगी वाकई शर्मसार करनेवाली है। खास तौर से जब सर्वोच्च अदालत भी यह स्वीकार कर चुकी है कि देश के कुल 256 जिले भीषण सूखे की चपेट में हैं और हमारी एक चैथाई आबादी पानी की बूंद-बूंद के लिये तरस रही है ऐसे में सियासी श्रेय लेने के लिये मची होड़ के बीच माननीय राजनेताओं द्वारा की जा रही बेसिर-पैर की बातों व ऊटपटांग हरकतों से तो सूखा पीडि़तों के जख्मों पर मरहम की बजाय मिर्च ही लग रही है। संवेदनहीनता की पराकाष्ठा का आलम यह है कि जब कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया सूखे का जायजा लेने के लिये निकलते हैं तो हजारों लीटर पानी सिर्फ इस वजह से सड़क पर उडेल दिया जाता है ताकि उनकी कार को घूल के गुबार से दो-चार ना होना पड़े और जब महाराष्ट्र की ग्रामीण विकास व जल संरक्षणमंत्री पंकजा मुंडे सूखाग्रस्त इलाकों के दौरे पर निकलती हैं तो पीडि़तों के दर्द मंे सहभागी बनने के बजाय वहां अपनी सेल्फी निकालने में मशगूल हो जाती हैं ताकि उसे सोशल मीडिया पर अपलोड करके यह जता सकें कि जमीनी स्तर पर वे किस कदर सक्रिय हैं। उस पर तुर्रा यह कि सिद्धारमैया तो कम से कम पूरे मामले की जांच कराये जाने की बात भी कहते हैं लेकिन पंकजा दलील देती हैं कि पूरे इलाके मेें जब उन्हें सिर्फ एक बांध में पानी की पतली सी धारा बहती हुई नजर आयी तो उन्हें ऐसा महसूस हुआ मानो रेगिस्तान में अमृत का झरना बह रहा हो और उसी खुशी की यादें संजोने के लिये वे सेल्फी लेने से खुद को रोक नहीं पायीं। अब ऐसी दलीलों को संवेदनहीनता की पराकाष्ठा ना कहें तो और क्या कहें। इसी प्रकार जब कर्नाटक के नवनियुक्त भाजपा अध्यक्ष बीएस येदियुरप्पा सूखे का जमीनी जायजा लेने के क्रम में भी अपनी निजी सहूलियत को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए एक करोड़ की आलीशान कार से ही सफर पर निकलते हों बूंद-बूंद के लिये तरस रही प्यासी पथराई आंखें उनसे अपनत्व भरी संवेदना की आस लगाएं भी तो कैसे? सूखे की मार से कराह रहे लोगों के बीच संवेदना का संचार हो भी तो कैसे जब प्यासी धरती के फटे कलेजे को आसमान से निहारने के लिये निकले महाराष्ट्र के राजस्वमंत्री एकनाथ खड़से के उड़नखटोले को घूल से बचाने के लिये हेलीपैड पर दस हजार लीटर पानी की फुहार डाली जा रही हो। इसमें कोढ़ में काज सरीखी असहनीय चुभन तो तब महसूस होती है जब येदियुरप्पा सरीखे नेता एक करोड़ की कार के इस्तेमाल को जायज ठहराने के लिये कभी अपनी सुरक्षा का हवाला देते हैं तो कभी वह कार अपनी होने से इनकार करते हुए इसे मित्र से किराये पर लिया हुआ बताते हैं। लोगों को ऐसी ही चुभन खड़से की बातों से भी महसूस हुई होगी जब उन्होंने कहा कि जिस तरह से उनके हेलीपैड पर धूल उड़ रही थी उसे देखते हुए यह मानना बेहद मुश्किल है कि इस पर दस हजार लीटर पानी की फुहार डाली गयी होगी। ऐसी दलील सुनकर लोग यह उम्मीद तो करेंगे ही काश खड़से साहब लगे हाथों यह भी बता ही देते कि जब उन्हें यह पता चला कि उनके लिये हेलीपैड तैयार किया जा रहा है तब उन्हें इस पर कितना पानी खर्च होने की उम्मीद थी। खैर, सूखे को लेकर मची सियासी श्रेय बटोरने की होड़ में अपनी हिस्सेदारी सुनिश्चित करने के मकसद से बेतुकी बयानबाजी करने में तो दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी और उन्होंने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री को औपचारिक तौर पर यह प्रस्ताव भेज दिया कि अगर वे चाहें तो सूखे से निपटने के लिये उनके सूबे को दिल्ली से पानी की आपूर्ति करायी जा सकती है। शायद इसी को कहते हैं कि घर में नहीं दाने और अम्मा चली भुनाने। इनका अपना सूबा तो पानी के लिये हरियाणा और यूपी पर निर्भर है जहां से पानी की पर्याप्त व निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित कराना हमेशा से टेढ़ी खीर रही है। हाल ही में जाट आरक्षण के लिये हुए आंदोलन के बाद जब कुछ दिनों के लिये हरियाणा से पानी की आपूर्ति बाधित हुई तब दिल्ली में कैसा कोहराम मचा था यह सर्वविदित ही है। यहां तक कि पानी के लिये जारी पंजाब व हरियाणा की जंग में कूदते हुए जब इन्होंने आगामी चुनाव में राजनीतिक लाभ बटोरने के मकसद से पंजाब के पक्ष में बयानबाजी की थी उसके बाद हरियाणा से मिली पानी रोकने की धमकी से ही इनकी सरकार के पेट का पानी डोल उठा था। ऐसे में जब ये सूखे की सियासत में कूदते हुए श्रेय बटोरने की कोशिशों के तहत समुद्री कछारवाले सूबे के दूर-दराज के इलाकों को पानी भेजने का प्रस्ताव भेजने की पहल करते हैं तब यह सवाल उठना लाजिमी ही है कि सूखा पीडि़तों के प्रति इनके मन में कितनी संवेदना है और कहीं ये सूखे की त्रासदी झेल रहे लोगों के साथ भद्दा मजाक तो नहीं कर रहे हैं। खैर, माना कि सियासत का संवेदना से सीधे तौर पर कोई लेना-देना नहीं होता है लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनभावना की निर्णायकता तो जगजाहिर ही है। लिहाजा जनवेदना के प्रति समर्पण व सहानुभूति का प्रदर्शन करने के क्रम में जनसरोकार से जुड़े मसले पर इस कदर लापरवाही का मुजाहिरा करने की भारी कीमत भी चुकानी पड़ सकती है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @नवकांत ठाकुर #NavkantThakur